| [1] यइंद्रेति त्रयस्त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य काण्वः पर्वत इंद्र उष्णिक् | |
| य इ᳚न्द्र सोम॒पात॑मो॒ मदः॑ शविष्ठ॒ चेत॑ति|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} येना॒ हंसि॒ न्य१॑(अ॒)त्रिणं॒ तमी᳚महे||{1/33}{6.1.1.1}{8.12.1}{8.2.7.1}{1, 632, 6279} |
| येना॒ दश॑ग्व॒मध्रि॑गुं वे॒पय᳚न्तं॒ स्व᳚र्णरम्|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} येना᳚ समु॒द्रमावि॑था॒ तमी᳚महे||{2/33}{6.1.1.2}{8.12.2}{8.2.7.2}{2, 632, 6280} |
| येन॒ सिन्धुं᳚ म॒हीर॒पो रथाँ᳚, इव प्रचो॒दयः॑|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} पन्था᳚मृ॒तस्य॒ यात॑वे॒ तमी᳚महे||{3/33}{6.1.1.3}{8.12.3}{8.2.7.3}{3, 632, 6281} |
| इ॒मं स्तोम॑म॒भिष्ट॑ये घृ॒तं न पू॒तम॑द्रिवः|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} येना॒ नु स॒द्य ओज॑सा व॒वक्षि॑थ||{4/33}{6.1.1.4}{8.12.4}{8.2.7.4}{4, 632, 6282} |
| इ॒मं जु॑षस्व गिर्वणः समु॒द्र इ॑व पिन्वते|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} इन्द्र॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभि᳚र्व॒वक्षि॑थ||{5/33}{6.1.1.5}{8.12.5}{8.2.7.5}{5, 632, 6283} |
| यो नो᳚ दे॒वः प॑रा॒वतः॑ सखित्व॒नाय॑ माम॒हे|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} दि॒वो न वृ॒ष्टिं प्र॒थय᳚न् व॒वक्षि॑थ||{6/33}{6.1.2.1}{8.12.6}{8.2.7.6}{6, 632, 6284} |
| व॒व॒क्षुर॑स्य के॒तव॑ उ॒त वज्रो॒ गभ॑स्त्योः|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} यत् सूर्यो॒ न रोद॑सी॒, अव॑र्धयत्||{7/33}{6.1.2.2}{8.12.7}{8.2.7.7}{7, 632, 6285} |
| यदि॑ प्रवृद्ध सत्पते स॒हस्रं᳚ महि॒षाँ, अघः॑|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} आदित् त॑ इन्द्रि॒यं महि॒ प्र वा᳚वृधे||{8/33}{6.1.2.3}{8.12.8}{8.2.7.8}{8, 632, 6286} |
| इन्द्रः॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒र्न्य॑र्शसा॒नमो᳚षति|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} अ॒ग्निर्वने᳚व सास॒हिः प्र वा᳚वृधे||{9/33}{6.1.2.4}{8.12.9}{8.2.7.9}{9, 632, 6287} |
| इ॒यं त॑ ऋ॒त्विया᳚वती धी॒तिरे᳚ति॒ नवी᳚यसी|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} स॒प॒र्यन्ती᳚ पुरुप्रि॒या मिमी᳚त॒ इत्||{10/33}{6.1.2.5}{8.12.10}{8.2.7.10}{10, 632, 6288} |
| गर्भो᳚ य॒ज्ञस्य॑ देव॒युः क्रतुं᳚ पुनीत आनु॒षक्|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} स्तोमै॒रिन्द्र॑स्य वावृधे॒ मिमी᳚त॒ इत्||{11/33}{6.1.3.1}{8.12.11}{8.2.7.11}{11, 632, 6289} |
| स॒निर्मि॒त्रस्य॑ पप्रथ॒ इन्द्रः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} प्राची॒ वाशी᳚व सुन्व॒ते मिमी᳚त॒ इत्||{12/33}{6.1.3.2}{8.12.12}{8.2.7.12}{12, 632, 6290} |
| यं विप्रा᳚ उ॒क्थवा᳚हसो ऽभिप्रम॒न्दुरा॒यवः॑|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} घृ॒तं न पि॑प्य आ॒सन्यृ॒तस्य॒ यत्||{13/33}{6.1.3.3}{8.12.13}{8.2.7.13}{13, 632, 6291} |
| उ॒त स्व॒राजे॒, अदि॑तिः॒ स्तोम॒मिन्द्रा᳚य जीजनत्|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} पु॒रु॒प्र॒श॒स्तमू॒तय॑ ऋ॒तस्य॒ यत्||{14/33}{6.1.3.4}{8.12.14}{8.2.7.14}{14, 632, 6292} |
| अ॒भि वह्न॑य ऊ॒तये ऽनू᳚षत॒ प्रश॑स्तये|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} न दे᳚व॒ विव्र॑ता॒ हरी᳚ ऋ॒तस्य॒ यत्||{15/33}{6.1.3.5}{8.12.15}{8.2.7.15}{15, 632, 6293} |
| यत् सोम॑मिन्द्र॒ विष्ण॑वि॒ यद् वा᳚ घ त्रि॒त आ॒प्त्ये|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} यद् वा᳚ म॒रुत्सु॒ मन्द॑से॒ समिन्दु॑भिः||{16/33}{6.1.4.1}{8.12.16}{8.2.7.16}{16, 632, 6294} |
| यद् वा᳚ शक्र परा॒वति॑ समु॒द्रे, अधि॒ मन्द॑से|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} अ॒स्माक॒मित् सु॒ते र॑णा॒ समिन्दु॑भिः||{17/33}{6.1.4.2}{8.12.17}{8.2.7.17}{17, 632, 6295} |
| यद् वासि॑ सुन्व॒तो वृ॒धो यज॑मानस्य सत्पते|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} उ॒क्थे वा॒ यस्य॒ रण्य॑सि॒ समिन्दु॑भिः||{18/33}{6.1.4.3}{8.12.18}{8.2.7.18}{18, 632, 6296} |
| दे॒वंदे᳚वं॒ वोऽव॑स॒ इन्द्र॑मिन्द्रं गृणी॒षणि॑|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} अधा᳚ य॒ज्ञाय॑ तु॒र्वणे॒ व्या᳚नशुः||{19/33}{6.1.4.4}{8.12.19}{8.2.7.19}{19, 632, 6297} |
| य॒ज्ञेभि᳚र्य॒ज्ञवा᳚हसं॒ सोमे᳚भिः सोम॒पात॑मम्|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} होत्रा᳚भि॒रिन्द्रं᳚ वावृधु॒र्व्या᳚नशुः||{20/33}{6.1.4.5}{8.12.20}{8.2.7.20}{20, 632, 6298} |
| म॒हीर॑स्य॒ प्रणी᳚तयः पू॒र्वीरु॒त प्रश॑स्तयः|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} विश्वा॒ वसू᳚नि दा॒शुषे॒ व्या᳚नशुः||{21/33}{6.1.5.1}{8.12.21}{8.2.7.21}{21, 632, 6299} |
| इन्द्रं᳚ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे दे॒वासो᳚ दधिरे पु॒रः|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} इन्द्रं॒ वाणी᳚रनूषता॒ समोज॑से||{22/33}{6.1.5.2}{8.12.22}{8.2.7.22}{22, 632, 6300} |
| म॒हान्तं᳚ महि॒ना व॒यं स्तोमे᳚भिर्हवन॒श्रुत᳚म्|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} अ॒र्कैर॒भि प्र णो᳚नुमः॒ समोज॑से||{23/33}{6.1.5.3}{8.12.23}{8.2.7.23}{23, 632, 6301} |
| न यं वि॑वि॒क्तो रोद॑सी॒ नान्तरि॑क्षाणि व॒ज्रिण᳚म्|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} अमा॒दिद॑स्य तित्विषे॒ समोज॑सः||{24/33}{6.1.5.4}{8.12.24}{8.2.7.24}{24, 632, 6302} |
| यदि᳚न्द्र पृत॒नाज्ये᳚ दे॒वास्त्वा᳚ दधि॒रे पु॒रः|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} आदित् ते᳚ हर्य॒ता हरी᳚ ववक्षतुः||{25/33}{6.1.5.5}{8.12.25}{8.2.7.25}{25, 632, 6303} |
| य॒दा वृ॒त्रं न॑दी॒वृतं॒ शव॑सा वज्रि॒न्नव॑धीः|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} आदित् ते᳚ हर्य॒ता हरी᳚ ववक्षतुः||{26/33}{6.1.6.1}{8.12.26}{8.2.7.26}{26, 632, 6304} |
| य॒दा ते॒ विष्णु॒रोज॑सा॒ त्रीणि॑ प॒दा वि॑चक्र॒मे|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} आदित् ते᳚ हर्य॒ता हरी᳚ ववक्षतुः||{27/33}{6.1.6.2}{8.12.27}{8.2.7.27}{27, 632, 6305} |
| य॒दा ते᳚ हर्य॒ता हरी᳚ वावृ॒धाते᳚ दि॒वेदि॑वे|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} आदित् ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि येमिरे||{28/33}{6.1.6.3}{8.12.28}{8.2.7.28}{28, 632, 6306} |
| य॒दा ते॒ मारु॑ती॒र्विश॒स्तुभ्य॑मिन्द्र नियेमि॒रे|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} आदित् ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि येमिरे||{29/33}{6.1.6.4}{8.12.29}{8.2.7.29}{29, 632, 6307} |
| य॒दा सूर्य॑म॒मुं दि॒वि शु॒क्रं ज्योति॒रधा᳚रयः|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} आदित् ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि येमिरे||{30/33}{6.1.6.5}{8.12.30}{8.2.7.30}{30, 632, 6308} |
| इ॒मां त॑ इन्द्र सुष्टु॒तिं विप्र॑ इयर्ति धी॒तिभिः॑|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} जा॒मिं प॒देव॒ पिप्र॑तीं॒ प्राध्व॒रे||{31/33}{6.1.6.6}{8.12.31}{8.2.7.31}{31, 632, 6309} |
| यद॑स्य॒ धाम॑नि प्रि॒ये स॑मीची॒नासो॒, अस्व॑रन्|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} नाभा᳚ य॒ज्ञस्य॑ दो॒हना॒ प्राध्व॒रे||{32/33}{6.1.6.7}{8.12.32}{8.2.7.32}{32, 632, 6310} |
| सु॒वीर्यं॒ स्वश्व्यं᳚ सु॒गव्य॑मिन्द्र दद्धि नः|{काण्वः पर्वतः | इन्द्रः | उष्णिक्} होते᳚व पू॒र्वचि॑त्तये॒ प्राध्व॒रे||{33/33}{6.1.6.8}{8.12.33}{8.2.7.33}{33, 632, 6311} |
| [2] इंद्रः सुतेष्विति त्रयस्त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य काण्वोनारदइंद्रउष्णिक् | |
| इन्द्रः॑ सु॒तेषु॒ सोमे᳚षु॒ क्रतुं᳚ पुनीत उ॒क्थ्य᳚म्|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} वि॒दे वृ॒धस्य॒ दक्ष॑सो म॒हान् हि षः||{1/33}{6.1.7.1}{8.13.1}{8.3.1.1}{34, 633, 6312} |
| स प्र॑थ॒मे व्यो᳚मनि दे॒वानां॒ सद॑ने वृ॒धः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} सु॒पा॒रः सु॒श्रव॑स्तमः॒ सम॑प्सु॒जित्||{2/33}{6.1.7.2}{8.13.2}{8.3.1.2}{35, 633, 6313} |
| तम॑ह्वे॒ वाज॑सातय॒ इन्द्रं॒ भरा᳚य शु॒ष्मिण᳚म्|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} भवा᳚ नः सु॒म्ने, अन्त॑मः॒ सखा᳚ वृ॒धे||{3/33}{6.1.7.3}{8.13.3}{8.3.1.3}{36, 633, 6314} |
| इ॒यं त॑ इन्द्र गिर्वणो रा॒तिः, क्ष॑रति सुन्व॒तः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} म॒न्दा॒नो, अ॒स्य ब॒र्हिषो॒ वि रा᳚जसि||{4/33}{6.1.7.4}{8.13.4}{8.3.1.4}{37, 633, 6315} |
| नू॒नं तदि᳚न्द्र दद्धि नो॒ यत् त्वा᳚ सु॒न्वन्त॒ ईम॑हे|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} र॒यिं न॑श्चि॒त्रमा भ॑रा स्व॒र्विद᳚म्||{5/33}{6.1.7.5}{8.13.5}{8.3.1.5}{38, 633, 6316} |
| स्तो॒ता यत् ते॒ विच॑र्षणिरतिप्रश॒र्धय॒द् गिरः॑|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} व॒या, इ॒वानु॑ रोहते जु॒षन्त॒ यत्||{6/33}{6.1.8.1}{8.13.6}{8.3.1.6}{39, 633, 6317} |
| प्र॒त्न॒वज्ज॑नया॒ गिरः॑ शृणु॒धी ज॑रि॒तुर्हव᳚म्|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} मदे᳚मदे ववक्षिथा सु॒कृत्व॑ने||{7/33}{6.1.8.2}{8.13.7}{8.3.1.7}{40, 633, 6318} |
| क्रीळ᳚न्त्यस्य सू॒नृता॒, आपो॒ न प्र॒वता᳚ य॒तीः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} अ॒या धि॒या य उ॒च्यते॒ पति॑र्दि॒वः||{8/33}{6.1.8.3}{8.13.8}{8.3.1.8}{41, 633, 6319} |
| उ॒तो पति॒र्य उ॒च्यते᳚ कृष्टी॒नामेक॒ इद्व॒शी|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} न॒मो॒वृ॒धैर॑व॒स्युभिः॑ सु॒ते र॑ण||{9/33}{6.1.8.4}{8.13.9}{8.3.1.9}{42, 633, 6320} |
| स्तु॒हि श्रु॒तं वि॑प॒श्चितं॒ हरी॒ यस्य॑ प्रस॒क्षिणा᳚|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} गन्ता᳚रा दा॒शुषो᳚ गृ॒हं न॑म॒स्विनः॑||{10/33}{6.1.8.5}{8.13.10}{8.3.1.10}{43, 633, 6321} |
| तू॒तु॒जा॒नो म॑हेम॒ते ऽश्वे᳚भिः प्रुषि॒तप्सु॑भिः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} आ या᳚हि य॒ज्ञमा॒शुभिः॒ शमिद्धि ते᳚||{11/33}{6.1.9.1}{8.13.11}{8.3.1.11}{44, 633, 6322} |
| इन्द्र॑ शविष्ठ सत्पते र॒यिं गृ॒णत्सु॑ धारय|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} श्रवः॑ सू॒रिभ्यो᳚ अ॒मृतं᳚ वसुत्व॒नम्||{12/33}{6.1.9.2}{8.13.12}{8.3.1.12}{45, 633, 6323} |
| हवे᳚ त्वा॒ सूर॒ उदि॑ते॒ हवे᳚ म॒ध्यंदि॑ने दि॒वः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} जु॒षा॒ण इ᳚न्द्र॒ सप्ति॑भिर्न॒ आ ग॑हि||{13/33}{6.1.9.3}{8.13.13}{8.3.1.13}{46, 633, 6324} |
| आ तू ग॑हि॒ प्र तु द्र॑व॒ मत्स्वा᳚ सु॒तस्य॒ गोम॑तः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} तन्तुं᳚ तनुष्व पू॒र्व्यं यथा᳚ वि॒दे||{14/33}{6.1.9.4}{8.13.14}{8.3.1.14}{47, 633, 6325} |
| यच्छ॒क्रासि॑ परा॒वति॒ यद᳚र्वा॒वति॑ वृत्रहन्|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} यद् वा᳚ समु॒द्रे, अन्ध॑सोऽवि॒तेद॑सि||{15/33}{6.1.9.5}{8.13.15}{8.3.1.15}{48, 633, 6326} |
| इन्द्रं᳚ वर्धन्तु नो॒ गिर॒ इन्द्रं᳚ सु॒तास॒ इन्द॑वः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} इन्द्रे᳚ ह॒विष्म॑ती॒र्विशो᳚ अराणिषुः||{16/33}{6.1.10.1}{8.13.16}{8.3.1.16}{49, 633, 6327} |
| तमिद् विप्रा᳚ अव॒स्यवः॑ प्र॒वत्व॑तीभिरू॒तिभिः॑|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} इन्द्रं᳚ क्षो॒णीर॑वर्धयन् व॒या, इ॑व||{17/33}{6.1.10.2}{8.13.17}{8.3.1.17}{50, 633, 6328} |
| त्रिक॑द्रुकेषु॒ चेत॑नं दे॒वासो᳚ य॒ज्ञम॑त्नत|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} तमिद् व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑ स॒दावृ॑धम्||{18/33}{6.1.10.3}{8.13.18}{8.3.1.18}{51, 633, 6329} |
| स्तो॒ता यत् ते॒, अनु᳚व्रत उ॒क्थान्यृ॑तु॒था द॒धे|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} शुचिः॑ पाव॒क उ॑च्यते॒ सो, अद्भु॑तः||{19/33}{6.1.10.4}{8.13.19}{8.3.1.19}{52, 633, 6330} |
| तदिद् रु॒द्रस्य॑ चेतति य॒ह्वं प्र॒त्नेषु॒ धाम॑सु|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} मनो॒ यत्रा॒ वि तद्द॒धुर्विचे᳚तसः||{20/33}{6.1.10.5}{8.13.20}{8.3.1.20}{53, 633, 6331} |
| यदि॑ मे स॒ख्यमा॒वर॑ इ॒मस्य॑ पा॒ह्यन्ध॑सः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} येन॒ विश्वा॒, अति॒ द्विषो॒, अता᳚रिम||{21/33}{6.1.11.1}{8.13.21}{8.3.1.21}{54, 633, 6332} |
| क॒दा त॑ इन्द्र गिर्वणः स्तो॒ता भ॑वाति॒ शंत॑मः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} क॒दा नो॒ गव्ये॒, अश्व्ये॒ वसौ᳚ दधः||{22/33}{6.1.11.2}{8.13.22}{8.3.1.22}{55, 633, 6333} |
| उ॒त ते॒ सुष्टु॑ता॒ हरी॒ वृष॑णा वहतो॒ रथ᳚म्|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} अ॒जु॒र्यस्य॑ म॒दिन्त॑मं॒ यमीम॑हे||{23/33}{6.1.11.3}{8.13.23}{8.3.1.23}{56, 633, 6334} |
| तमी᳚महे पुरुष्टु॒तं य॒ह्वं प्र॒त्नाभि॑रू॒तिभिः॑|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} नि ब॒र्हिषि॑ प्रि॒ये स॑द॒दध॑ द्वि॒ता||{24/33}{6.1.11.4}{8.13.24}{8.3.1.24}{57, 633, 6335} |
| वर्ध॑स्वा॒ सु पु॑रुष्टुत॒ ऋषि॑ष्टुताभिरू॒तिभिः॑|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} धु॒क्षस्व॑ पि॒प्युषी॒मिष॒मवा᳚ च नः||{25/33}{6.1.11.5}{8.13.25}{8.3.1.25}{58, 633, 6336} |
| इन्द्र॒ त्वम॑वि॒तेद॑सी॒त्था स्तु॑व॒तो, अ॑द्रिवः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} ऋ॒तादि॑यर्मि ते॒ धियं᳚ मनो॒युज᳚म्||{26/33}{6.1.12.1}{8.13.26}{8.3.1.26}{59, 633, 6337} |
| इ॒ह त्या स॑ध॒माद्या᳚ युजा॒नः सोम॑पीतये|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} हरी᳚ इन्द्र प्र॒तद्व॑सू, अ॒भि स्व॑र||{27/33}{6.1.12.2}{8.13.27}{8.3.1.27}{60, 633, 6338} |
| अ॒भि स्व॑रन्तु॒ ये तव॑ रु॒द्रासः॑ सक्षत॒ श्रिय᳚म्|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} उ॒तो म॒रुत्व॑ती॒र्विशो᳚ अ॒भि प्रयः॑||{28/33}{6.1.12.3}{8.13.28}{8.3.1.28}{61, 633, 6339} |
| इ॒मा, अ॑स्य॒ प्रतू᳚र्तयः प॒दं जु॑षन्त॒ यद्दि॒वि|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} नाभा᳚ य॒ज्ञस्य॒ सं द॑धु॒र्यथा᳚ वि॒दे||{29/33}{6.1.12.4}{8.13.29}{8.3.1.29}{62, 633, 6340} |
| अ॒यं दी॒र्घाय॒ चक्ष॑से॒ प्राचि॑ प्रय॒त्य॑ध्व॒रे|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} मिमी᳚ते य॒ज्ञमा᳚नु॒षग्वि॒चक्ष्य॑||{30/33}{6.1.12.5}{8.13.30}{8.3.1.30}{63, 633, 6341} |
| वृषा॒यमि᳚न्द्र ते॒ रथ॑ उ॒तो ते॒ वृष॑णा॒ हरी᳚|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} वृषा॒ त्वं श॑तक्रतो॒ वृषा॒ हवः॑||{31/33}{6.1.13.1}{8.13.31}{8.3.1.31}{64, 633, 6342} |
| वृषा॒ ग्रावा॒ वृषा॒ मदो॒ वृषा॒ सोमो᳚ अ॒यं सु॒तः|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} वृषा᳚ य॒ज्ञो यमिन्व॑सि॒ वृषा॒ हवः॑||{32/33}{6.1.13.2}{8.13.32}{8.3.1.32}{65, 633, 6343} |
| वृषा᳚ त्वा॒ वृष॑णं हुवे॒ वज्रि᳚ञ्चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑|{काण्वो नारदः | इन्द्रः | उष्णिक्} वा॒वन्थ॒ हि प्रति॑ष्टुतिं॒ वृषा॒ हवः॑||{33/33}{6.1.13.3}{8.13.33}{8.3.1.33}{66, 633, 6344} |
| [3] यदिंद्राहमिति पंचदशर्चस्य सूक्तस्य काण्वायनौगोषूक्त्यश्वसूक्तिनाविंद्रो गायत्री | |
| यदि᳚न्द्रा॒हं यथा॒ त्वमीशी᳚य॒ वस्व॒ एक॒ इत्|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} स्तो॒ता मे॒ गोष॑खा स्यात्||{1/15}{6.1.14.1}{8.14.1}{8.3.2.1}{67, 634, 6345} |
| शिक्षे᳚यमस्मै॒ दित्से᳚यं॒ शची᳚पते मनी॒षिणे᳚|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} यद॒हं गोप॑तिः॒ स्याम्||{2/15}{6.1.14.2}{8.14.2}{8.3.2.2}{68, 634, 6346} |
| धे॒नुष्ट॑ इन्द्र सू॒नृता॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} गामश्वं᳚ पि॒प्युषी᳚ दुहे||{3/15}{6.1.14.3}{8.14.3}{8.3.2.3}{69, 634, 6347} |
| न ते᳚ व॒र्तास्ति॒ राध॑स॒ इन्द्र॑ दे॒वो न मर्त्यः॑|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} यद्दित्स॑सि स्तु॒तो म॒घम्||{4/15}{6.1.14.4}{8.14.4}{8.3.2.4}{70, 634, 6348} |
| य॒ज्ञ इन्द्र॑मवर्धय॒द् यद् भूमिं॒ व्यव॑र्तयत्|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} च॒क्रा॒ण ओ᳚प॒शं दि॒वि||{5/15}{6.1.14.5}{8.14.5}{8.3.2.5}{71, 634, 6349} |
| वा॒वृ॒धा॒नस्य॑ ते व॒यं विश्वा॒ धना᳚नि जि॒ग्युषः॑|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} ऊ॒तिमि॒न्द्रा वृ॑णीमहे||{6/15}{6.1.15.1}{8.14.6}{8.3.2.6}{72, 634, 6350} |
| व्य१॑(अ॒)न्तरि॑क्षमतिर॒न्मदे॒ सोम॑स्य रोच॒ना|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रो॒ यदभि॑नद् व॒लम्||{7/15}{6.1.15.2}{8.14.7}{8.3.2.7}{73, 634, 6351} |
| उद् गा, आ᳚ज॒दङ्गि॑रोभ्य आ॒विष्कृ॒ण्वन् गुहा᳚ स॒तीः|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒र्वाञ्चं᳚ नुनुदे व॒लम्||{8/15}{6.1.15.3}{8.14.8}{8.3.2.8}{74, 634, 6352} |
| इन्द्रे᳚ण रोच॒ना दि॒वो दृ॒ळ्हानि॑ दृंहि॒तानि॑ च|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} स्थि॒राणि॒ न प॑रा॒णुदे᳚||{9/15}{6.1.15.4}{8.14.9}{8.3.2.9}{75, 634, 6353} |
| अ॒पामू॒र्मिर्मद᳚न्निव॒ स्तोम॑ इन्द्राजिरायते|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} वि ते॒ मदा᳚ अराजिषुः||{10/15}{6.1.15.5}{8.14.10}{8.3.2.10}{76, 634, 6354} |
| त्वं हि स्तो᳚म॒वर्ध॑न॒ इन्द्रास्यु॑क्थ॒वर्ध॑नः|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} स्तो॒तॄ॒णामु॒त भ॑द्र॒कृत्||{11/15}{6.1.16.1}{8.14.11}{8.3.2.11}{77, 634, 6355} |
| इन्द्र॒मित् के॒शिना॒ हरी᳚ सोम॒पेया᳚य वक्षतः|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} उप॑ य॒ज्ञं सु॒राध॑सम्||{12/15}{6.1.16.2}{8.14.12}{8.3.2.12}{78, 634, 6356} |
| अ॒पां फेने᳚न॒ नमु॑चेः॒ शिर॑ इ॒न्द्रोद॑वर्तयः|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} विश्वा॒ यदज॑यः॒ स्पृधः॑||{13/15}{6.1.16.3}{8.14.13}{8.3.2.13}{79, 634, 6357} |
| मा॒याभि॑रु॒त्सिसृ॑प्सत॒ इन्द्र॒ द्यामा॒रुरु॑क्षतः|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} अव॒ दस्यूँ᳚रधूनुथाः||{14/15}{6.1.16.4}{8.14.14}{8.3.2.14}{80, 634, 6358} |
| अ॒सु॒न्वामि᳚न्द्र सं॒सदं॒ विषू᳚चीं॒ व्य॑नाशयः|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | गायत्री} सो॒म॒पा, उत्त॑रो॒ भव॑न्||{15/15}{6.1.16.5}{8.14.15}{8.3.2.15}{81, 634, 6359} |
| [4] तम्वभीति त्रयोदशर्चस्य सूक्तस्य काण्वायनौ काण्वायनौगोषूक्त्यश्वसूक्तिनाविंद्रउष्णिक् | |
| तम्व॒भि प्र गा᳚यत पुरुहू॒तं पु॑रुष्टु॒तम्|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} इन्द्रं᳚ गी॒र्भिस्त॑वि॒षमा वि॑वासत||{1/13}{6.1.17.1}{8.15.1}{8.3.3.1}{82, 635, 6360} |
| यस्य॑ द्वि॒बर्ह॑सो बृ॒हत् सहो᳚ दा॒धार॒ रोद॑सी|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} गि॒रीँरज्राँ᳚, अ॒पः स्व᳚र्वृषत्व॒ना||{2/13}{6.1.17.2}{8.15.2}{8.3.3.2}{83, 635, 6361} |
| स रा᳚जसि पुरुष्टुतँ॒, एको᳚ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} इन्द्र॒ जैत्रा᳚ श्रव॒स्या᳚ च॒ यन्त॑वे||{3/13}{6.1.17.3}{8.15.3}{8.3.3.3}{84, 635, 6362} |
| तं ते॒ मदं᳚ गृणीमसि॒ वृष॑णं पृ॒त्सु सा᳚स॒हिम्|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} उ॒ लो॒क॒कृ॒त्नुम॑द्रिवो हरि॒श्रिय᳚म्||{4/13}{6.1.17.4}{8.15.4}{8.3.3.4}{85, 635, 6363} |
| येन॒ ज्योतीं᳚ष्या॒यवे॒ मन॑वे च वि॒वेदि॑थ|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} म॒न्दा॒नो, अ॒स्य ब॒र्हिषो॒ वि रा᳚जसि||{5/13}{6.1.17.5}{8.15.5}{8.3.3.5}{86, 635, 6364} |
| तद॒द्या चि॑त् त उ॒क्थिनो ऽनु॑ ष्टुवन्ति पू॒र्वथा᳚|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} वृष॑पत्नीर॒पो ज॑या दि॒वेदि॑वे||{6/13}{6.1.18.1}{8.15.6}{8.3.3.6}{87, 635, 6365} |
| तव॒ त्यदि᳚न्द्रि॒यं बृ॒हत् तव॒ शुष्म॑मु॒त क्रतु᳚म्|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} वज्रं᳚ शिशाति धि॒षणा॒ वरे᳚ण्यम्||{7/13}{6.1.18.2}{8.15.7}{8.3.3.7}{88, 635, 6366} |
| तव॒ द्यौरि᳚न्द्र॒ पौंस्यं᳚ पृथि॒वी व॑र्धति॒ श्रवः॑|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} त्वामापः॒ पर्व॑तासश्च हिन् विरे||{8/13}{6.1.18.3}{8.15.8}{8.3.3.8}{89, 635, 6367} |
| त्वां विष्णु॑र्बृ॒हन् क्षयो᳚ मि॒त्रो गृ॑णाति॒ वरु॑णः|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} त्वां शर्धो᳚ मद॒त्यनु॒ मारु॑तम्||{9/13}{6.1.18.4}{8.15.9}{8.3.3.9}{90, 635, 6368} |
| त्वं वृषा॒ जना᳚नां॒ मंहि॑ष्ठ इन्द्र जज्ञिषे|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} स॒त्रा विश्वा᳚ स्वप॒त्यानि॑ दधिषे||{10/13}{6.1.18.5}{8.15.10}{8.3.3.10}{91, 635, 6369} |
| स॒त्रा त्वं पु॑रुष्टुतँ॒, एको᳚ वृ॒त्राणि॑ तोशसे|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} नान्य इन्द्रा॒त् कर॑णं॒ भूय॑ इन्वति||{11/13}{6.1.19.1}{8.15.11}{8.3.3.11}{92, 635, 6370} |
| यदि᳚न्द्र मन्म॒शस्त्वा॒ नाना॒ हव᳚न्त ऊ॒तये᳚|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} अ॒स्माके᳚भि॒र्नृभि॒रत्रा॒ स्व॑र्जय||{12/13}{6.1.19.2}{8.15.12}{8.3.3.12}{93, 635, 6371} |
| अरं॒ क्षया᳚य नो म॒हे विश्वा᳚ रू॒पाण्या᳚वि॒शन्|{काण्वायनौ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनः | इन्द्रः | उष्णिक्} इन्द्रं॒ जैत्रा᳚य हर्षया॒ शची॒पति᳚म्||{13/13}{6.1.19.3}{8.15.13}{8.3.3.13}{94, 635, 6372} |
| [5] प्रसम्राजमिति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वइरिंबिठिरिंद्रोगायत्री | |
| प्र स॒म्राजं᳚ चर्षणी॒नामिन्द्रं᳚ स्तोता॒ नव्यं᳚ गी॒र्भिः|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} नरं᳚ नृ॒षाहं॒ मंहि॑ष्ठम्||{1/12}{6.1.20.1}{8.16.1}{8.3.4.1}{95, 636, 6373} |
| यस्मि᳚न्नु॒क्थानि॒ रण्य᳚न्ति॒ विश्वा᳚नि च श्रव॒स्या᳚|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒पामवो॒ न स॑मु॒द्रे||{2/12}{6.1.20.2}{8.16.2}{8.3.4.2}{96, 636, 6374} |
| तं सु॑ष्टु॒त्या वि॑वासे ज्येष्ठ॒राजं॒ भरे᳚ कृ॒त्नुम्|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} म॒हो वा॒जिनं᳚ स॒निभ्यः॑||{3/12}{6.1.20.3}{8.16.3}{8.3.4.3}{97, 636, 6375} |
| यस्यानू᳚ना गभी॒रा मदा᳚ उ॒रव॒स्तरु॑त्राः|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} ह॒र्षु॒मन्तः॒ शूर॑सातौ||{4/12}{6.1.20.4}{8.16.4}{8.3.4.4}{98, 636, 6376} |
| तमिद् धने᳚षु हि॒तेष्व॑धिवा॒काय॑ हवन्ते|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} येषा॒मिन्द्र॒स्ते ज॑यन्ति||{5/12}{6.1.20.5}{8.16.5}{8.3.4.5}{99, 636, 6377} |
| तमिच्च्यौ॒त्नैरार्य᳚न्ति॒ तं कृ॒तेभि॑श्चर्ष॒णयः॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} ए॒ष इन्द्रो᳚ वरिव॒स्कृत्||{6/12}{6.1.20.6}{8.16.6}{8.3.4.6}{100, 636, 6378} |
| इन्द्रो᳚ ब्र॒ह्मेन्द्र॒ ऋषि॒रिन्द्रः॑ पु॒रू पु॑रुहू॒तः|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} म॒हान् म॒हीभिः॒ शची᳚भिः||{7/12}{6.1.21.1}{8.16.7}{8.3.4.7}{101, 636, 6379} |
| स स्तोम्यः॒ स हव्यः॑ स॒त्यः सत्वा᳚ तुविकू॒र्मिः|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} एक॑श्चि॒त् सन्न॒भिभू᳚तिः||{8/12}{6.1.21.2}{8.16.8}{8.3.4.8}{102, 636, 6380} |
| तम॒र्केभि॒स्तं साम॑भि॒स्तं गा᳚य॒त्रैश्च॑र्ष॒णयः॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रं᳚ वर्धन्ति क्षि॒तयः॑||{9/12}{6.1.21.3}{8.16.9}{8.3.4.9}{103, 636, 6381} |
| प्र॒णे॒तारं॒ वस्यो॒, अच्छा॒ कर्ता᳚रं॒ ज्योतिः॑ स॒मत्सु॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} सा॒स॒ह्वांसं᳚ यु॒धामित्रा॑न्||{10/12}{6.1.21.4}{8.16.10}{8.3.4.10}{104, 636, 6382} |
| स नः॒ पप्रिः॑ पारयाति स्व॒स्ति ना॒वा पु॑रुहू॒तः|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रो॒ विश्वा॒, अति॒ द्विषः॑||{11/12}{6.1.21.5}{8.16.11}{8.3.4.11}{105, 636, 6383} |
| स त्वं न॑ इन्द्र॒ वाजे᳚भिर्दश॒स्या च॑ गातु॒या च॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} अच्छा᳚ च नः सु॒म्नं ने᳚षि||{12/12}{6.1.21.6}{8.16.12}{8.3.4.12}{106, 636, 6384} |
| [6] आयाहीति पंचदशर्चस्य सूक्तस्य काण्वइरिंबिठिरिंद्रोगायत्री अंत्येद्वेबृहतीसतोबृहत्यौ | त्वास्तोष्पतइत्यस्यावास्तोष्पतिर्देवतेतिशौनकः | (उपांत्यायाअर्धर्चेदेवोवास्तोष्पतिः स्तुतइति हितद्वाक्यम्) | |
| आ या᳚हि सुषु॒मा हि त॒ इन्द्र॒ सोमं॒ पिबा᳚ इ॒मम्|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} एदं ब॒र्हिः स॑दो॒ मम॑||{1/15}{6.1.22.1}{8.17.1}{8.3.5.1}{107, 637, 6385} |
| आ त्वा᳚ ब्रह्म॒युजा॒ हरी॒ वह॑तामिन्द्र के॒शिना᳚|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} उप॒ ब्रह्मा᳚णि नः शृणु||{2/15}{6.1.22.2}{8.17.2}{8.3.5.2}{108, 637, 6386} |
| ब्र॒ह्माण॑स्त्वा व॒यं यु॒जा सो᳚म॒पामि᳚न्द्र सो॒मिनः॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} सु॒ताव᳚न्तो हवामहे||{3/15}{6.1.22.3}{8.17.3}{8.3.5.3}{109, 637, 6387} |
| आ नो᳚ याहि सु॒ताव॑तो॒ ऽस्माकं᳚ सुष्टु॒तीरुप॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} पिबा॒ सु शि॑प्रि॒न्नन्ध॑सः||{4/15}{6.1.22.4}{8.17.4}{8.3.5.4}{110, 637, 6388} |
| आ ते᳚ सिञ्चामि कु॒क्ष्योरनु॒ गात्रा॒ वि धा᳚वतु|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} गृ॒भा॒य जि॒ह्वया॒ मधु॑||{5/15}{6.1.22.5}{8.17.5}{8.3.5.5}{111, 637, 6389} |
| स्वा॒दुष्टे᳚ अस्तु सं॒सुदे॒ मधु॑मान् त॒न्वे॒३॑(ए॒) तव॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} सोमः॒ शम॑स्तु ते हृ॒दे||{6/15}{6.1.23.1}{8.17.6}{8.3.5.6}{112, 637, 6390} |
| अ॒यमु॑ त्वा विचर्षणे॒ जनी᳚रिवा॒भि संवृ॑तः|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} प्र सोम॑ इन्द्र सर्पतु||{7/15}{6.1.23.2}{8.17.7}{8.3.5.7}{113, 637, 6391} |
| तु॒वि॒ग्रीवो᳚ व॒पोद॑रः सुबा॒हुरन्ध॑सो॒ मदे᳚|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रो᳚ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते||{8/15}{6.1.23.3}{8.17.8}{8.3.5.8}{114, 637, 6392} |
| इन्द्र॒ प्रेहि॑ पु॒रस्त्वं विश्व॒स्येशा᳚न॒ ओज॑सा|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} वृ॒त्राणि॑ वृत्रहञ्जहि||{9/15}{6.1.23.4}{8.17.9}{8.3.5.9}{115, 637, 6393} |
| दी॒र्घस्ते᳚ अस्त्वङ्कु॒शो येना॒ वसु॑ प्र॒यच्छ॑सि|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} यज॑मानाय सुन्व॒ते||{10/15}{6.1.23.5}{8.17.10}{8.3.5.10}{116, 637, 6394} |
| अ॒यं त॑ इन्द्र॒ सोमो॒ निपू᳚तो॒, अधि॑ ब॒र्हिषि॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} एही᳚म॒स्य द्रवा॒ पिब॑||{11/15}{6.1.24.1}{8.17.11}{8.3.5.11}{117, 637, 6395} |
| शाचि॑गो॒ शाचि॑पूजना॒ऽयं रणा᳚य ते सु॒तः|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} आख᳚ण्डल॒ प्र हू᳚यसे||{12/15}{6.1.24.2}{8.17.12}{8.3.5.12}{118, 637, 6396} |
| यस्ते᳚ शृङ्गवृषो नपा॒त् प्रण॑पात् कुण्ड॒पाय्यः॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | गायत्री} न्य॑स्मिन् दध्र॒ आ मनः॑||{13/15}{6.1.24.3}{8.17.13}{8.3.5.13}{119, 637, 6397} |
| वास्तो᳚ष्पते ध्रु॒वा स्थूणांऽस॑त्रं सो॒म्याना᳚म्|{काण्वः इरिम्बिठिः | वास्तोष्पतिर्देवते | बृहति} द्र॒प्सो भे॒त्ता पु॒रां शश्व॑तीना॒मिन्द्रो॒ मुनी᳚नां॒ सखा᳚||{14/15}{6.1.24.4}{8.17.14}{8.3.5.14}{120, 637, 6398} |
| पृदा᳚कुसानुर्यज॒तो ग॒वेष॑ण॒ एकः॒ सन्न॒भि भूय॑सः|{काण्वः इरिम्बिठिः | इन्द्रः | सतोबृहति} भूर्णि॒मश्वं᳚ नयत् तु॒जा पु॒रो गृ॒भेन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{15/15}{6.1.24.5}{8.17.15}{8.3.5.15}{121, 637, 6399} |
| [7] इदंहेति द्वाविंशत्यृचस्य सूक्तस्य काण्वइरिंबिठिरादित्याः चतुर्थषष्ठीसप्तमीनामदितिः अष्टम्याअश्विनौ नवम्याअग्निसूर्यानिला उष्णिक् | |
| इ॒दं ह॑ नू॒नमे᳚षां सु॒म्नं भि॑क्षेत॒ मर्त्यः॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} आ॒दि॒त्याना॒मपू᳚र्व्यं॒ सवी᳚मनि||{1/22}{6.1.25.1}{8.18.1}{8.3.6.1}{122, 638, 6400} |
| अ॒न॒र्वाणो॒ ह्ये᳚षां॒ पन्था᳚ आदि॒त्याना᳚म्|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} अद॑ब्धाः॒ सन्ति॑ पा॒यवः॑ सुगे॒वृधः॑||{2/22}{6.1.25.2}{8.18.2}{8.3.6.2}{123, 638, 6401} |
| तत् सु नः॑ सवि॒ता भगो॒ वरु॑णो मि॒त्रो, अ᳚र्य॒मा|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} शर्म॑ यच्छन्तु स॒प्रथो॒ यदीम॑हे||{3/22}{6.1.25.3}{8.18.3}{8.3.6.3}{124, 638, 6402} |
| दे॒वेभि॑र्देव्यदि॒ते ऽरि॑ष्टभर्म॒न्ना ग॑हि|{काण्वः इरिम्बिठिः | अदितिः | उष्णिक्} स्मत् सू॒रिभिः॑ पुरुप्रिये सु॒शर्म॑भिः||{4/22}{6.1.25.4}{8.18.4}{8.3.6.4}{125, 638, 6403} |
| ते हि पु॒त्रासो॒, अदि॑तेर्वि॒दुर्द्वेषां᳚सि॒ योत॑वे|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} अं॒होश्चि॑दुरु॒चक्र॑योऽने॒हसः॑||{5/22}{6.1.25.5}{8.18.5}{8.3.6.5}{126, 638, 6404} |
| अदि॑तिर्नो॒ दिवा᳚ प॒शुमदि॑ति॒र्नक्त॒मद्व॑याः|{काण्वः इरिम्बिठिः | अदितिः | उष्णिक्} अदि॑तिः पा॒त्वंह॑सः स॒दावृ॑धा||{6/22}{6.1.26.1}{8.18.6}{8.3.6.6}{127, 638, 6405} |
| उ॒त स्या नो॒ दिवा᳚ म॒तिरदि॑तिरू॒त्या ग॑मत्|{काण्वः इरिम्बिठिः | अदितिः | उष्णिक्} सा शंता᳚ति॒ मय॑स्कर॒दप॒ स्रिधः॑||{7/22}{6.1.26.2}{8.18.7}{8.3.6.7}{128, 638, 6406} |
| उ॒त त्या दैव्या᳚ भि॒षजा॒ शं नः॑ करतो, अ॒श्विना᳚|{काण्वः इरिम्बिठिः | अश्विनौ | उष्णिक्} यु॒यु॒याता᳚मि॒तो रपो॒, अप॒ स्रिधः॑||{8/22}{6.1.26.3}{8.18.8}{8.3.6.8}{129, 638, 6407} |
| शम॒ग्निर॒ग्निभिः॑ कर॒च्छं न॑स्तपतु॒ सूर्यः॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | अग्निसूर्यानिलाः | उष्णिक्} शं वातो᳚ वात्वर॒पा, अप॒ स्रिधः॑||{9/22}{6.1.26.4}{8.18.9}{8.3.6.9}{130, 638, 6408} |
| अपामी᳚वा॒मप॒ स्रिध॒मप॑ सेधत दुर्म॒तिम्|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} आदि॑त्यासो यु॒योत॑ना नो॒, अंह॑सः||{10/22}{6.1.26.5}{8.18.10}{8.3.6.10}{131, 638, 6409} |
| यु॒योता॒ शरु॑म॒स्मदाँ, आदि॑त्यास उ॒ताम॑तिम्|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} ऋध॒ग्द्वेषः॑ कृणुत विश्ववेदसः||{11/22}{6.1.27.1}{8.18.11}{8.3.6.11}{132, 638, 6410} |
| तत् सु नः॒ शर्म॑ यच्छ॒ताऽऽदि॑त्या॒ यन्मुमो᳚चति|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} एन॑स्वन्तं चि॒देन॑सः सुदानवः||{12/22}{6.1.27.2}{8.18.12}{8.3.6.12}{133, 638, 6411} |
| यो नः॒ कश्चि॒द् रिरि॑क्षति रक्ष॒स्त्वेन॒ मर्त्यः॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} स्वैः ष एवै᳚ रिरिषीष्ट॒ युर्जनः॑||{13/22}{6.1.27.3}{8.18.13}{8.3.6.13}{134, 638, 6412} |
| समित् तम॒घम॑श्नवद् दुः॒शंसं॒ मर्त्यं᳚ रि॒पुम्|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} यो, अ॑स्म॒त्रा दु॒र्हणा᳚वाँ॒, उप॑ द्व॒युः||{14/22}{6.1.27.4}{8.18.14}{8.3.6.14}{135, 638, 6413} |
| पा॒क॒त्रा स्थ॑न देवा हृ॒त्सु जा᳚नीथ॒ मर्त्य᳚म्|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} उप॑ द्व॒युं चाद्व॑युं च वसवः||{15/22}{6.1.27.5}{8.18.15}{8.3.6.15}{136, 638, 6414} |
| आ शर्म॒ पर्व॑ताना॒मोतापां वृ॑णीमहे|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} द्यावा᳚क्षामा॒रे, अ॒स्मद् रप॑स्कृतम्||{16/22}{6.1.28.1}{8.18.16}{8.3.6.16}{137, 638, 6415} |
| ते नो᳚ भ॒द्रेण॒ शर्म॑णा यु॒ष्माकं᳚ ना॒वा व॑सवः|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} अति॒ विश्वा᳚नि दुरि॒ता पि॑पर्तन||{17/22}{6.1.28.2}{8.18.17}{8.3.6.17}{138, 638, 6416} |
| तु॒चे तना᳚य॒ तत् सु नो॒ द्राघी᳚य॒ आयु॑र्जी॒वसे᳚|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} आदि॑त्यासः सुमहसः कृ॒णोत॑न||{18/22}{6.1.28.3}{8.18.18}{8.3.6.18}{139, 638, 6417} |
| य॒ज्ञो ही॒ळो वो॒, अन्त॑र॒ आदि॑त्या॒, अस्ति॑ मृ॒ळत॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} यु॒ष्मे, इद् वो॒, अपि॑ ष्मसि सजा॒त्ये᳚||{19/22}{6.1.28.4}{8.18.19}{8.3.6.19}{140, 638, 6418} |
| बृ॒हद् वरू᳚थं म॒रुतां᳚ दे॒वं त्रा॒तार॑म॒श्विना᳚|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} मि॒त्रमी᳚महे॒ वरु॑णं स्व॒स्तये᳚||{20/22}{6.1.28.5}{8.18.20}{8.3.6.20}{141, 638, 6419} |
| अ॒ने॒हो मि॑त्रार्यमन् नृ॒वद् व॑रुण॒ शंस्य᳚म्|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} त्रि॒वरू᳚थं मरुतो यन्त नश्छ॒र्दिः||{21/22}{6.1.28.6}{8.18.21}{8.3.6.21}{142, 638, 6420} |
| ये चि॒द्धि मृ॒त्युब᳚न्धव॒ आदि॑त्या॒ मन॑वः॒ स्मसि॑|{काण्वः इरिम्बिठिः | आदित्याः | उष्णिक्} प्र सू न॒ आयु॑र्जी॒वसे᳚ तिरेतन||{22/22}{6.1.28.7}{8.18.22}{8.3.6.22}{143, 638, 6421} |
| [8] तंगूर्धयेति सप्तत्रिंशदृचस्य सूक्तस्य काण्वः सोभरिरग्निः चतुस्त्रिंशीपंचत्रिंश्योरादित्या अंत्ययोर्द्वयोस्त्रसदस्युः प्रथमादिपंचविंश्यंताअयुजःककुभः द्वितीयादिषड्विश्यंतायुजः सतोबृहत्यः पितुर्नेतिसप्तविंशीद्विपदा अष्टाविंशीत्रिंशीद्वात्रिंशीषट्त्रिंश्यः ककुभः एकोनत्रिंश्येकत्रिंशीत्रयस्त्रिंशीपंचत्रिंश्यः सतोबृहत्यः चतुस्त्रिंश्युष्णिक् सप्तत्रिंशीपंक्तिः | |
| तं गू᳚र्धया॒ स्व᳚र्णरं दे॒वासो᳚ दे॒वम॑र॒तिं द॑धन् विरे|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} दे॒व॒त्रा ह॒व्यमोहि॑रे||{1/37}{6.1.29.1}{8.19.1}{8.3.7.1}{144, 639, 6422} |
| विभू᳚तरातिं विप्र चि॒त्रशो᳚चिषम॒ग्निमी᳚ळिष्व य॒न्तुर᳚म्|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} अ॒स्य मेध॑स्य सो॒म्यस्य॑ सोभरे॒ प्रेम॑ध्व॒राय॒ पूर्व्य᳚म्||{2/37}{6.1.29.2}{8.19.2}{8.3.7.2}{145, 639, 6423} |
| यजि॑ष्ठं त्वा ववृमहे दे॒वं दे᳚व॒त्रा होता᳚र॒मम॑र्त्यम्|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु᳚म्||{3/37}{6.1.29.3}{8.19.3}{8.3.7.3}{146, 639, 6424} |
| ऊ॒र्जो नपा᳚तं सु॒भगं᳚ सु॒दीदि॑तिम॒ग्निं श्रेष्ठ॑शोचिषम्|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} स नो᳚ मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ सो, अ॒पामा सु॒म्नं य॑क्षते दि॒वि||{4/37}{6.1.29.4}{8.19.4}{8.3.7.4}{147, 639, 6425} |
| यः स॒मिधा॒ य आहु॑ती॒ यो वेदे᳚न द॒दाश॒ मर्तो᳚ अ॒ग्नये᳚|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} यो नम॑सा स्वध्व॒रः||{5/37}{6.1.29.5}{8.19.5}{8.3.7.5}{148, 639, 6426} |
| तस्येदर्व᳚न्तो रंहयन्त आ॒शव॒स्तस्य॑ द्यु॒म्नित॑मं॒ यशः॑|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} न तमंहो᳚ दे॒वकृ॑तं॒ कुत॑श्च॒न न मर्त्य॑कृतं नशत्||{6/37}{6.1.30.1}{8.19.6}{8.3.7.6}{149, 639, 6427} |
| स्व॒ग्नयो᳚ वो, अ॒ग्निभिः॒ स्याम॑ सूनो सहस ऊर्जां पते|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} सु॒वीर॒स्त्वम॑स्म॒युः||{7/37}{6.1.30.2}{8.19.7}{8.3.7.7}{150, 639, 6428} |
| प्र॒शंस॑मानो॒, अति॑थि॒र्न मि॒त्रियो॒ ऽग्नी रथो॒ न वेद्यः॑|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} त्वे क्षेमा᳚सो॒, अपि॑ सन्ति सा॒धव॒स्त्वं राजा᳚ रयी॒णाम्||{8/37}{6.1.30.3}{8.19.8}{8.3.7.8}{151, 639, 6429} |
| सो, अ॒द्धा दा॒श्व॑ध्व॒रो ऽग्ने॒ मर्तः॑ सुभग॒ स प्र॒शंस्यः॑|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} स धी॒भिर॑स्तु॒ सनि॑ता||{9/37}{6.1.30.4}{8.19.9}{8.3.7.9}{152, 639, 6430} |
| यस्य॒ त्वमू॒र्ध्वो, अ॑ध्व॒राय॒ तिष्ठ॑सि क्ष॒यद्वी᳚रः॒ स सा᳚धते|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} सो, अर्व॑द्भिः॒ सनि॑ता॒ स वि॑प॒न्युभिः॒ स शूरैः॒ सनि॑ता कृ॒तम्||{10/37}{6.1.30.5}{8.19.10}{8.3.7.10}{153, 639, 6431} |
| यस्या॒ग्निर्वपु॑र्गृ॒हे स्तोमं॒ चनो॒ दधी᳚त वि॒श्ववा᳚र्यः|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} ह॒व्या वा॒ वेवि॑ष॒द् विषः॑||{11/37}{6.1.31.1}{8.19.11}{8.3.7.11}{154, 639, 6432} |
| विप्र॑स्य वा स्तुव॒तः स॑हसो यहो म॒क्षूत॑मस्य रा॒तिषु॑|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} अ॒वोदे᳚वमु॒परि॑मर्त्यं कृधि॒ वसो᳚ विवि॒दुषो॒ वचः॑||{12/37}{6.1.31.2}{8.19.12}{8.3.7.12}{155, 639, 6433} |
| यो, अ॒ग्निं ह॒व्यदा᳚तिभि॒र्नमो᳚भिर्वा सु॒दक्ष॑मा॒विवा᳚सति|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} गि॒रा वा᳚जि॒रशो᳚चिषम्||{13/37}{6.1.31.3}{8.19.13}{8.3.7.13}{156, 639, 6434} |
| स॒मिधा॒ यो निशि॑ती॒ दाश॒ददि॑तिं॒ धाम॑भिरस्य॒ मर्त्यः॑|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} विश्वेत् स धी॒भिः सु॒भगो॒ जनाँ॒, अति॑ द्यु॒म्नैरु॒द्न इ॑व तारिषत्||{14/37}{6.1.31.4}{8.19.14}{8.3.7.14}{157, 639, 6435} |
| तद॑ग्ने द्यु॒म्नमा भ॑र॒ यत् सा॒सह॒त् सद॑ने॒ कं चि॑द॒त्रिण᳚म्|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} म॒न्युं जन॑स्य दू॒ढ्यः॑||{15/37}{6.1.31.5}{8.19.15}{8.3.7.15}{158, 639, 6436} |
| येन॒ चष्टे॒ वरु॑णो मि॒त्रो, अ᳚र्य॒मा येन॒ नास॑त्या॒ भगः॑|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} व॒यं तत् ते॒ शव॑सा गातु॒वित्त॑मा॒, इन्द्र॑त्वोता विधेमहि||{16/37}{6.1.32.1}{8.19.16}{8.3.7.16}{159, 639, 6437} |
| ते घेद॑ग्ने स्वा॒ध्यो॒३॑(ओ॒) ये त्वा᳚ विप्र निदधि॒रे नृ॒चक्ष॑सम्|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} विप्रा᳚सो देव सु॒क्रतु᳚म्||{17/37}{6.1.32.2}{8.19.17}{8.3.7.17}{160, 639, 6438} |
| त इद् वेदिं᳚ सुभग॒ त आहु॑तिं॒ ते सोतुं᳚ चक्रिरे दि॒वि|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} त इद् वाजे᳚भिर्जिग्युर्म॒हद् धनं॒ ये त्वे कामं᳚ न्येरि॒रे||{18/37}{6.1.32.3}{8.19.18}{8.3.7.18}{161, 639, 6439} |
| भ॒द्रो नो᳚ अ॒ग्निराहु॑तो भ॒द्रा रा॒तिः सु॑भग भ॒द्रो, अ॑ध्व॒रः|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} भ॒द्रा, उ॒त प्रश॑स्तयः||{19/37}{6.1.32.4}{8.19.19}{8.3.7.19}{162, 639, 6440} |
| भ॒द्रं मनः॑ कृणुष्व वृत्र॒तूर्ये॒ येना᳚ स॒मत्सु॑ सा॒सहः॑|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} अव॑ स्थि॒रा त॑नुहि॒ भूरि॒ शर्ध॑तां व॒नेमा᳚ ते, अ॒भिष्टि॑भिः||{20/37}{6.1.32.5}{8.19.20}{8.3.7.20}{163, 639, 6441} |
| ईळे᳚ गि॒रा मनु᳚र्हितं॒ यं दे॒वा दू॒तम॑र॒तिं न्ये᳚रि॒रे|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} यजि॑ष्ठं हव्य॒वाह॑नम्||{21/37}{6.1.33.1}{8.19.21}{8.3.7.21}{164, 639, 6442} |
| ति॒ग्मज᳚म्भाय॒ तरु॑णाय॒ राज॑ते॒ प्रयो᳚ गायस्य॒ग्नये᳚|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} यः पिं॒शते᳚ सू॒नृता᳚भिः सु॒वीर्य॑म॒ग्निर्घृ॒तेभि॒राहु॑तः||{22/37}{6.1.33.2}{8.19.22}{8.3.7.22}{165, 639, 6443} |
| यदी᳚ घृ॒तेभि॒राहु॑तो॒ वाशी᳚म॒ग्निर्भर॑त॒ उच्चाव॑ च|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} असु॑र इव नि॒र्णिज᳚म्||{23/37}{6.1.33.3}{8.19.23}{8.3.7.23}{166, 639, 6444} |
| यो ह॒व्यान्यैर॑यता॒ मनु᳚र्हितो दे॒व आ॒सा सु॑ग॒न्धिना᳚|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} विवा᳚सते॒ वार्या᳚णि स्वध्व॒रो होता᳚ दे॒वो, अम॑र्त्यः||{24/37}{6.1.33.4}{8.19.24}{8.3.7.24}{167, 639, 6445} |
| यद॑ग्ने॒ मर्त्य॒स्त्वं स्याम॒हं मि॑त्रमहो॒, अम॑र्त्यः|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} सह॑सः सूनवाहुत||{25/37}{6.1.33.5}{8.19.25}{8.3.7.25}{168, 639, 6446} |
| न त्वा᳚ रासीया॒भिश॑स्तये वसो॒ न पा᳚प॒त्वाय॑ सन्त्य|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} न मे᳚ स्तो॒ताम॑ती॒वा न दुर्हि॑तः॒ स्याद॑ग्ने॒ न पा॒पया᳚||{26/37}{6.1.34.1}{8.19.26}{8.3.7.26}{169, 639, 6447} |
| पि॒तुर्न पु॒त्रः सुभृ॑तो दुरो॒ण आ दे॒वाँ, ए᳚तु॒ प्र णो᳚ ह॒विः||{काण्वः सोभरिः | अग्निः | द्विपदा विराट्}{27/37}{6.1.34.2}{8.19.27}{8.3.7.27}{170, 639, 6448} |
| तवा॒हम॑ग्न ऊ॒तिभि॒र्नेदि॑ष्ठाभिः सचेय॒ जोष॒मा व॑सो|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} सदा᳚ दे॒वस्य॒ मर्त्यः॑||{28/37}{6.1.34.3}{8.19.28}{8.3.7.28}{171, 639, 6449} |
| तव॒ क्रत्वा᳚ सनेयं॒ तव॑ रा॒तिभि॒रग्ने॒ तव॒ प्रश॑स्तिभिः|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} त्वामिदा᳚हुः॒ प्रम॑तिं वसो॒ ममाऽग्ने॒ हर्ष॑स्व॒ दात॑वे||{29/37}{6.1.34.4}{8.19.29}{8.3.7.29}{172, 639, 6450} |
| प्र सो, अ॑ग्ने॒ तवो॒तिभिः॑ सु॒वीरा᳚भिस्तिरते॒ वाज॑भर्मभिः|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} यस्य॒ त्वं स॒ख्यमा॒वरः॑||{30/37}{6.1.34.5}{8.19.30}{8.3.7.30}{173, 639, 6451} |
| तव॑ द्र॒प्सो नील॑वान् वा॒श ऋ॒त्विय॒ इन्धा᳚नः सिष्ण॒वा द॑दे|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} त्वं म॑ही॒नामु॒षसा᳚मसि प्रि॒यः, क्ष॒पो वस्तु॑षु राजसि||{31/37}{6.1.35.1}{8.19.31}{8.3.7.31}{174, 639, 6452} |
| तमाग᳚न्म॒ सोभ॑रयः स॒हस्र॑मुष्कं स्वभि॒ष्टिमव॑से|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} स॒म्राजं॒ त्रास॑दस्यवम्||{32/37}{6.1.35.2}{8.19.32}{8.3.7.32}{175, 639, 6453} |
| यस्य॑ ते, अग्ने, अ॒न्ये, अ॒ग्नय॑ उप॒क्षितो᳚ व॒या, इ॑व|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} विपो॒ न द्यु॒म्ना नि यु॑वे॒ जना᳚नां॒ तव॑ क्ष॒त्राणि॑ व॒र्धय॑न्||{33/37}{6.1.35.3}{8.19.33}{8.3.7.33}{176, 639, 6454} |
| यमा᳚दित्यासो, अद्रुहः पा॒रं नय॑थ॒ मर्त्य᳚म्|{काण्वः सोभरिः | आदित्याः | उष्णिक्} म॒घोनां॒ विश्वे᳚षां सुदानवः||{34/37}{6.1.35.4}{8.19.34}{8.3.7.34}{177, 639, 6455} |
| यू॒यं रा᳚जानः॒ कं चि॑च्चर्षणीसहः॒, क्षय᳚न्तं॒ मानु॑षाँ॒, अनु॑|{काण्वः सोभरिः | आदित्याः | सतोबृहती} व॒यं ते वो॒ वरु॑ण॒ मित्रार्य॑म॒न् त्स्यामेदृ॒तस्य॑ र॒थ्यः॑||{35/37}{6.1.35.5}{8.19.35}{8.3.7.35}{178, 639, 6456} |
| अदा᳚न्मे पौरुकु॒त्स्यः प᳚ञ्चा॒शतं᳚ त्र॒सद॑स्युर्व॒धूना᳚म्|{काण्वः सोभरिः | त्रसदस्योर्दानस्तुतिः | ककुभः} मंहि॑ष्ठो, अ॒र्यः सत्प॑तिः||{36/37}{6.1.35.6}{8.19.36}{8.3.7.36}{179, 639, 6457} |
| उ॒त मे᳚ प्र॒यियो᳚र्व॒यियोः᳚ सु॒वास्त्वा॒, अधि॒ तुग्व॑नि|{काण्वः सोभरिः | त्रसदस्योर्दानस्तुतिः | पङ्क्तिः} ति॒सॄ॒णां स॑प्तती॒नां श्या॒वः प्र॑णे॒ता भु॑व॒द् वसु॒र्दिया᳚नां॒ पतिः॑||{37/37}{6.1.35.7}{8.19.37}{8.3.7.37}{180, 639, 6458} |
| [9] आगंतेति षड्विंशत्यृचस्य सूक्तस्य काण्वः सोभरिर्मरुतः अयुजः ककुभो युजःसतोबृहत्यः | |
| आ ग᳚न्ता॒ मा रि॑षण्यत॒ प्रस्था᳚वानो॒ माप॑ स्थाता समन्यवः|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} स्थि॒रा चि᳚न्नमयिष्णवः||{1/26}{6.1.36.1}{8.20.1}{8.3.8.1}{181, 640, 6459} |
| वी॒ळु॒प॒विभि᳚र्मरुत ऋभुक्षण॒ आ रु॑द्रासः सुदी॒तिभिः॑|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} इ॒षा नो᳚ अ॒द्या ग॑ता पुरुस्पृहो य॒ज्ञमा सो᳚भरी॒यवः॑||{2/26}{6.1.36.2}{8.20.2}{8.3.8.2}{182, 640, 6460} |
| वि॒द्मा हि रु॒द्रिया᳚णां॒ शुष्म॑मु॒ग्रं म॒रुतां॒ शिमी᳚वताम्|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} विष्णो᳚रे॒षस्य॑ मी॒ळ्हुषा᳚म्||{3/26}{6.1.36.3}{8.20.3}{8.3.8.3}{183, 640, 6461} |
| वि द्वी॒पानि॒ पाप॑त॒न् तिष्ठ॑द्दु॒च्छुनो॒भे यु॑जन्त॒ रोद॑सी|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} प्र धन्वा᳚न्यैरत शुभ्रखादयो॒ यदेज॑थ स्वभानवः||{4/26}{6.1.36.4}{8.20.4}{8.3.8.4}{184, 640, 6462} |
| अच्यु॑ता चिद् वो॒, अज्म॒न्ना नान॑दति॒ पर्व॑तासो॒ वन॒स्पतिः॑|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} भूमि॒र्यामे᳚षु रेजते||{5/26}{6.1.36.5}{8.20.5}{8.3.8.5}{185, 640, 6463} |
| अमा᳚य वो मरुतो॒ यात॑वे॒ द्यौर्जिही᳚त॒ उत्त॑रा बृ॒हत्|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} यत्रा॒ नरो॒ देदि॑शते त॒नूष्वा त्वक्षां᳚सि बा॒ह्वो᳚जसः||{6/26}{6.1.37.1}{8.20.6}{8.3.8.6}{186, 640, 6464} |
| स्व॒धामनु॒ श्रियं॒ नरो॒ महि॑ त्वे॒षा, अम॑वन्तो॒ वृष॑प्सवः|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} वह᳚न्ते॒, अह्रु॑तप्सवः||{7/26}{6.1.37.2}{8.20.7}{8.3.8.7}{187, 640, 6465} |
| गोभि᳚र्वा॒णो, अ॑ज्यते॒ सोभ॑रीणां॒ रथे॒ कोशे᳚ हिर॒ण्यये᳚|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} गोब᳚न्धवः सुजा॒तास॑ इ॒षे भु॒जे म॒हान्तो᳚ नः॒ स्पर॑से॒ नु||{8/26}{6.1.37.3}{8.20.8}{8.3.8.8}{188, 640, 6466} |
| प्रति॑ वो वृषदञ्जयो॒ वृष्णे॒ शर्धा᳚य॒ मारु॑ताय भरध्वम्|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} ह॒व्या वृष॑प्रयाव्णे||{9/26}{6.1.37.4}{8.20.9}{8.3.8.9}{189, 640, 6467} |
| वृ॒ष॒ण॒श्वेन॑ मरुतो॒ वृष॑प्सुना॒ रथे᳚न॒ वृष॑नाभिना|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} आ श्ये॒नासो॒ न प॒क्षिणो॒ वृथा᳚ नरो ह॒व्या नो᳚ वी॒तये᳚ गत||{10/26}{6.1.37.5}{8.20.10}{8.3.8.10}{190, 640, 6468} |
| स॒मा॒नम॒ञ्ज्ये᳚षां॒ वि भ्रा᳚जन्ते रु॒क्मासो॒, अधि॑ बा॒हुषु॑|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} दवि॑द्युतत्यृ॒ष्टयः॑||{11/26}{6.1.38.1}{8.20.11}{8.3.8.11}{191, 640, 6469} |
| त उ॒ग्रासो॒ वृष॑ण उ॒ग्रबा᳚हवो॒ नकि॑ष्ट॒नूषु॑ येतिरे|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} स्थि॒रा धन्वा॒न्यायु॑धा॒ रथे᳚षु॒ वो ऽनी᳚के॒ष्वधि॒ श्रियः॑||{12/26}{6.1.38.2}{8.20.12}{8.3.8.12}{192, 640, 6470} |
| येषा॒मर्णो॒ न स॒प्रथो॒ नाम॑ त्वे॒षं शश्व॑ता॒मेक॒मिद् भु॒जे|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} वयो॒ न पित्र्यं॒ सहः॑||{13/26}{6.1.38.3}{8.20.13}{8.3.8.13}{193, 640, 6471} |
| तान् व᳚न्दस्व म॒रुत॒स्ताँ, उप॑ स्तुहि॒ तेषां॒ हि धुनी᳚नाम्|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} अ॒राणां॒ न च॑र॒मस्तदे᳚षां दा॒ना म॒ह्ना तदे᳚षाम्||{14/26}{6.1.38.4}{8.20.14}{8.3.8.14}{194, 640, 6472} |
| सु॒भगः॒ स व॑ ऊ॒तिष्वास॒ पूर्वा᳚सु मरुतो॒ व्यु॑ष्टिषु|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} यो वा᳚ नू॒नमु॒तास॑ति||{15/26}{6.1.38.5}{8.20.15}{8.3.8.15}{195, 640, 6473} |
| यस्य॑ वा यू॒यं प्रति॑ वा॒जिनो᳚ नर॒ आ ह॒व्या वी॒तये᳚ ग॒थ|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} अ॒भि ष द्यु॒म्नैरु॒त वाज॑सातिभिः सु॒म्ना वो᳚ धूतयो नशत्||{16/26}{6.1.39.1}{8.20.16}{8.3.8.16}{196, 640, 6474} |
| यथा᳚ रु॒द्रस्य॑ सू॒नवो᳚ दि॒वो वश॒न्त्यसु॑रस्य वे॒धसः॑|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} युवा᳚न॒स्तथेद॑सत्||{17/26}{6.1.39.2}{8.20.17}{8.3.8.17}{197, 640, 6475} |
| ये चार्ह᳚न्ति म॒रुतः॑ सु॒दान॑वः॒ स्मन्मी॒ळ्हुष॒श्चर᳚न्ति॒ ये|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} अत॑श्चि॒दा न॒ उप॒ वस्य॑सा हृ॒दा युवा᳚न॒ आ व॑वृध्वम्||{18/26}{6.1.39.3}{8.20.18}{8.3.8.18}{198, 640, 6476} |
| यून॑ ऊ॒ षु नवि॑ष्ठया॒ वृष्णः॑ पाव॒काँ, अ॒भि सो᳚भरे गि॒रा|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} गाय॒ गा, इ॑व॒ चर्कृ॑षत्||{19/26}{6.1.39.4}{8.20.19}{8.3.8.19}{199, 640, 6477} |
| सा॒हा ये सन्ति॑ मुष्टि॒हेव॒ हव्यो॒ विश्वा᳚सु पृ॒त्सु होतृ॑षु|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} वृष्ण॑श्च॒न्द्रान्न सु॒श्रव॑स्तमान् गि॒रा वन्द॑स्व म॒रुतो॒, अह॑||{20/26}{6.1.39.5}{8.20.20}{8.3.8.20}{200, 640, 6478} |
| गाव॑श्चिद् घा समन्यवः सजा॒त्ये᳚न मरुतः॒ सब᳚न्धवः|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} रि॒ह॒ते क॒कुभो᳚ मि॒थः||{21/26}{6.1.40.1}{8.20.21}{8.3.8.21}{201, 640, 6479} |
| मर्त॑श्चिद् वो नृतवो रुक्मवक्षस॒ उप॑ भ्रातृ॒त्वमाय॑ति|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} अधि॑ नो गात मरुतः॒ सदा॒ हि व॑ आपि॒त्वमस्ति॒ निध्रु॑वि||{22/26}{6.1.40.2}{8.20.22}{8.3.8.22}{202, 640, 6480} |
| मरु॑तो॒ मारु॑तस्य न॒ आ भे᳚ष॒जस्य॑ वहता सुदानवः|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} यू॒यं स॑खायः सप्तयः||{23/26}{6.1.40.3}{8.20.23}{8.3.8.23}{203, 640, 6481} |
| याभिः॒ सिन्धु॒मव॑थ॒ याभि॒स्तूर्व॑थ॒ याभि॑र्दश॒स्यथा॒ क्रिवि᳚म्|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} मयो᳚ नो भूतो॒तिभि᳚र्मयोभुवः शि॒वाभि॑रसचद्विषः||{24/26}{6.1.40.4}{8.20.24}{8.3.8.24}{204, 640, 6482} |
| यत् सिन्धौ॒ यदसि॑क्न्यां॒ यत् स॑मु॒द्रेषु॑ मरुतः सुबर्हिषः|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | ककुभः} यत् पर्व॑तेषु भेष॒जम्||{25/26}{6.1.40.5}{8.20.25}{8.3.8.25}{205, 640, 6483} |
| विश्वं॒ पश्य᳚न्तो बिभृथा त॒नूष्वा ऽऽतेना᳚ नो॒, अधि॑ वोचत|{काण्वः सोभरिः | मरुतः | सतोबृहती} क्ष॒मा रपो᳚ मरुत॒ आतु॑रस्य न॒ इष्क॑र्ता॒ विह्रु॑तं॒ पुनः॑||{26/26}{6.1.40.6}{8.20.26}{8.3.8.26}{206, 640, 6484} |
| [10] वयमुत्वेत्यष्टादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वः सोभरिरिंद्रोंत्ययोर्द्वयोश्चित्रः अयुजःककुभोयुजःसतोबृहृत्यः | |
| व॒यमु॒ त्वाम॑पूर्व्य स्थू॒रं न कच्चि॒द् भर᳚न्तोऽव॒स्यवः॑|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | ककुभः} वाजे᳚ चि॒त्रं ह॑वामहे||{1/18}{6.2.1.1}{8.21.1}{8.4.1.1}{207, 641, 6485} |
| उप॑ त्वा॒ कर्म᳚न्नू॒तये॒ स नो॒ युवो॒ग्रश्च॑क्राम॒ यो धृ॒षत्|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | सतोबृहती} त्वामिद्ध्य॑वि॒तारं᳚ ववृ॒महे॒ सखा᳚य इन्द्र सान॒सिम्||{2/18}{6.2.1.2}{8.21.2}{8.4.1.2}{208, 641, 6486} |
| आ या᳚ही॒म इन्द॒वो ऽश्व॑पते॒ गोप॑त॒ उर्व॑रापते|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | ककुभः} सोमं᳚ सोमपते पिब||{3/18}{6.2.1.3}{8.21.3}{8.4.1.3}{209, 641, 6487} |
| व॒यं हि त्वा॒ बन्धु॑मन्तमब॒न्धवो॒ विप्रा᳚स इन्द्र येमि॒म|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | सतोबृहती} या ते॒ धामा᳚नि वृषभ॒ तेभि॒रा ग॑हि॒ विश्वे᳚भिः॒ सोम॑पीतये||{4/18}{6.2.1.4}{8.21.4}{8.4.1.4}{210, 641, 6488} |
| सीद᳚न्तस्ते॒ वयो᳚ यथा॒ गोश्री᳚ते॒ मधौ᳚ मदि॒रे वि॒वक्ष॑णे|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | ककुभः} अ॒भि त्वामि᳚न्द्र नोनुमः||{5/18}{6.2.1.5}{8.21.5}{8.4.1.5}{211, 641, 6489} |
| अच्छा᳚ च त्वै॒ना नम॑सा॒ वदा᳚मसि॒ किं मुहु॑श्चि॒द् वि दी᳚धयः|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | सतोबृहती} सन्ति॒ कामा᳚सो हरिवो द॒दिष्ट्वं स्मो व॒यं सन्ति॑ नो॒ धियः॑||{6/18}{6.2.2.1}{8.21.6}{8.4.1.6}{212, 641, 6490} |
| नूत्ना॒, इदि᳚न्द्र ते व॒यमू॒ती, अ॑भूम न॒हि नू ते᳚ अद्रिवः|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | ककुभः} वि॒द्मा पु॒रा परी᳚णसः||{7/18}{6.2.2.2}{8.21.7}{8.4.1.7}{213, 641, 6491} |
| वि॒द्मा स॑खि॒त्वमु॒त शू᳚र भो॒ज्य१॑(अ॒)मा ते॒ ता व॑ज्रिन्नीमहे|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | सतोबृहती} उ॒तो स॑मस्मि॒न्ना शि॑शीहि नो वसो॒ वाजे᳚ सुशिप्र॒ गोम॑ति||{8/18}{6.2.2.3}{8.21.8}{8.4.1.8}{214, 641, 6492} |
| यो न॑ इ॒दमि॑दं पु॒रा प्र वस्य॑ आनि॒नाय॒ तमु॑ वः स्तुषे|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | ककुभः} सखा᳚य॒ इन्द्र॑मू॒तये᳚||{9/18}{6.2.2.4}{8.21.9}{8.4.1.9}{215, 641, 6493} |
| हर्य॑श्वं॒ सत्प॑तिं चर्षणी॒सहं॒ स हि ष्मा॒ यो, अम᳚न्दत|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | सतोबृहती} आ तु नः॒ स व॑यति॒ गव्य॒मश्व्यं᳚ स्तो॒तृभ्यो᳚ म॒घवा᳚ श॒तम्||{10/18}{6.2.2.5}{8.21.10}{8.4.1.10}{216, 641, 6494} |
| त्वया᳚ ह स्विद् यु॒जा व॒यं प्रति॑ श्व॒सन्तं᳚ वृषभ ब्रुवीमहि|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | ककुभः} सं॒स्थे जन॑स्य॒ गोम॑तः||{11/18}{6.2.3.1}{8.21.11}{8.4.1.11}{217, 641, 6495} |
| जये᳚म का॒रे पु॑रुहूत का॒रिणो॒ ऽभि ति॑ष्ठेम दू॒ढ्यः॑|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | सतोबृहती} नृभि᳚र्वृ॒त्रं ह॒न्याम॑ शूशु॒याम॒ चाऽवे᳚रिन्द्र॒ प्र णो॒ धियः॑||{12/18}{6.2.3.2}{8.21.12}{8.4.1.12}{218, 641, 6496} |
| अ॒भ्रा॒तृ॒व्यो, अ॒ना त्वमना᳚पिरिन्द्र ज॒नुषा᳚ स॒नाद॑सि|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | ककुभः} यु॒धेदा᳚पि॒त्वमि॑च्छसे||{13/18}{6.2.3.3}{8.21.13}{8.4.1.13}{219, 641, 6497} |
| नकी᳚ रे॒वन्तं᳚ स॒ख्याय॑ विन्दसे॒ पीय᳚न्ति ते सुरा॒श्वः॑|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | सतोबृहती} य॒दा कृ॒णोषि॑ नद॒नुं समू᳚ह॒स्यादित् पि॒तेव॑ हूयसे||{14/18}{6.2.3.4}{8.21.14}{8.4.1.14}{220, 641, 6498} |
| मा ते᳚ अमा॒जुरो᳚ यथा मू॒रास॑ इन्द्र स॒ख्ये त्वाव॑तः|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | ककुभः} नि ष॑दाम॒ सचा᳚ सु॒ते||{15/18}{6.2.3.5}{8.21.15}{8.4.1.15}{221, 641, 6499} |
| मा ते᳚ गोदत्र॒ निर॑राम॒ राध॑स॒ इन्द्र॒ मा ते᳚ गृहामहि|{काण्वः सोभरिः | इन्द्रः | सतोबृहती} दृ॒ळ्हा चि॑द॒र्यः प्र मृ॑शा॒भ्या भ॑र॒ न ते᳚ दा॒मान॑ आ॒दभे᳚||{16/18}{6.2.4.1}{8.21.16}{8.4.1.16}{222, 641, 6500} |
| इन्द्रो᳚ वा॒ घेदिय᳚न्म॒घं सर॑स्वती वा सु॒भगा᳚ द॒दिर्वसु॑|{काण्वः सोभरिः | चित्रस्य दानस्तुतिः | ककुभः} त्वं वा᳚ चित्र दा॒शुषे᳚||{17/18}{6.2.4.2}{8.21.17}{8.4.1.17}{223, 641, 6501} |
| चित्र॒ इद् राजा᳚ राज॒का, इद᳚न्य॒के य॒के सर॑स्वती॒मनु॑|{काण्वः सोभरिः | चित्रस्य दानस्तुतिः | सतोबृहती} प॒र्जन्य॑ इव त॒तन॒द्धि वृ॒ष्ट्या स॒हस्र॑म॒युता॒ दद॑त्||{18/18}{6.2.4.3}{8.21.18}{8.4.1.18}{224, 641, 6502} |
| [11] ओत्यमह्वइत्यष्टादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वः सोभरिरश्विनौ प्रथमातृतीयापंचमीसप्तमीबृहत्यः द्वितीयाचतुर्थीषष्ठयः सतोबृहत्यः अष्टम्यनुष्टुप् नवमीत्रयोदशीपंचदशी सप्तदृश्यः ककुभः दशमीचतुर्दशीषोडश्यष्टादश्यः सतोबृहत्यः एकादशीद्वादश्यौ ककुम्मध्येज्योतिषी | |
| ओ त्यम॑ह्व॒ आ रथ॑म॒द्या दंसि॑ष्ठमू॒तये᳚|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | बृहती} यम॑श्विना सुहवा रुद्रवर्तनी॒, आ सू॒र्यायै᳚ त॒स्थथुः॑||{1/18}{6.2.5.1}{8.22.1}{8.4.2.1}{225, 642, 6503} |
| पू॒र्वा॒पुषं᳚ सु॒हवं᳚ पुरु॒स्पृहं᳚ भु॒ज्युं वाजे᳚षु॒ पूर्व्य᳚म्|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | सतोबृहती} स॒च॒नाव᳚न्तं सुम॒तिभिः॑ सोभरे॒ विद्वे᳚षसमने॒हस᳚म्||{2/18}{6.2.5.2}{8.22.2}{8.4.2.2}{226, 642, 6504} |
| इ॒ह त्या पु॑रु॒भूत॑मा दे॒वा नमो᳚भिर॒श्विना᳚|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | बृहती} अ॒र्वा॒ची॒ना स्वव॑से करामहे॒ गन्ता᳚रा दा॒शुषो᳚ गृ॒हम्||{3/18}{6.2.5.3}{8.22.3}{8.4.2.3}{227, 642, 6505} |
| यु॒वो रथ॑स्य॒ परि॑ च॒क्रमी᳚यत ई॒र्मान्यद् वा᳚मिषण्यति|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | सतोबृहती} अ॒स्माँ, अच्छा᳚ सुम॒तिर्वां᳚ शुभस्पती॒, आ धे॒नुरि॑व धावतु||{4/18}{6.2.5.4}{8.22.4}{8.4.2.4}{228, 642, 6506} |
| रथो॒ यो वां᳚ त्रिवन्धु॒रो हिर᳚ण्याभीशुरश्विना|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | बृहती} परि॒ द्यावा᳚पृथि॒वी भूष॑ति श्रु॒तस्तेन॑ नास॒त्या ग॑तम्||{5/18}{6.2.5.5}{8.22.5}{8.4.2.5}{229, 642, 6507} |
| द॒श॒स्यन्ता॒ मन॑वे पू॒र्व्यं दि॒वि यवं॒ वृके᳚ण कर्षथः|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | सतोबृहती} ता वा᳚म॒द्य सु॑म॒तिभिः॑ शुभस्पती॒, अश्वि॑ना॒ प्र स्तु॑वीमहि||{6/18}{6.2.6.1}{8.22.6}{8.4.2.6}{230, 642, 6508} |
| उप॑ नो वाजिनीवसू या॒तमृ॒तस्य॑ प॒थिभिः॑|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | बृहती} येभि॑स्तृ॒क्षिं वृ॑षणा त्रासदस्य॒वं म॒हे क्ष॒त्राय॒ जिन्व॑थः||{7/18}{6.2.6.2}{8.22.7}{8.4.2.7}{231, 642, 6509} |
| अ॒यं वा॒मद्रि॑भिः सु॒तः सोमो᳚ नरा वृषण्वसू|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | अनुष्टुप्} आ या᳚तं॒ सोम॑पीतये॒ पिब॑तं दा॒शुषो᳚ गृ॒हे||{8/18}{6.2.6.3}{8.22.8}{8.4.2.8}{232, 642, 6510} |
| आ हि रु॒हत॑मश्विना॒ रथे॒ कोशे᳚ हिर॒ण्यये᳚ वृषण्वसू|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | ककुभः} यु॒ञ्जाथां॒ पीव॑री॒रिषः॑||{9/18}{6.2.6.4}{8.22.9}{8.4.2.9}{233, 642, 6511} |
| याभिः॑ प॒क्थमव॑थो॒ याभि॒रध्रि॑गुं॒ याभि॑र्ब॒भ्रुं विजो᳚षसम्|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | सतोबृहती} ताभि᳚र्नो म॒क्षू तूय॑मश्वि॒ना ग॑तं भिष॒ज्यतं॒ यदातु॑रम्||{10/18}{6.2.6.5}{8.22.10}{8.4.2.10}{234, 642, 6512} |
| यदध्रि॑गावो॒, अध्रि॑गू, इ॒दा चि॒दह्नो᳚ अ॒श्विना॒ हवा᳚महे|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | ककुभः} व॒यं गी॒र्भिर्वि॑प॒न्यवः॑||{11/18}{6.2.7.1}{8.22.11}{8.4.2.11}{235, 642, 6513} |
| ताभि॒रा या᳚तं वृष॒णोप॑ मे॒ हवं᳚ वि॒श्वप्सुं᳚ वि॒श्ववा᳚र्यम्|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | मध्येज्योतिस्त्रिष्टुप्} इ॒षा मंहि॑ष्ठा पुरु॒भूत॑मा नरा॒ याभिः॒ क्रिविं᳚ वावृ॒धुस्ताभि॒रा ग॑तम्||{12/18}{6.2.7.2}{8.22.12}{8.4.2.12}{236, 642, 6514} |
| तावि॒दा चि॒दहा᳚नां॒ ताव॒श्विना॒ वन्द॑मान॒ उप॑ ब्रुवे|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | ककुभः} ता, ऊ॒ नमो᳚भिरीमहे||{13/18}{6.2.7.3}{8.22.13}{8.4.2.13}{237, 642, 6515} |
| ताविद्दो॒षा ता, उ॒षसि॑ शु॒भस्पती॒ ता याम᳚न् रु॒द्रव॑र्तनी|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | सतोबृहती} मा नो॒ मर्ता᳚य रि॒पवे᳚ वाजिनीवसू प॒रो रु॑द्रा॒वति॑ ख्यतम्||{14/18}{6.2.7.4}{8.22.14}{8.4.2.14}{238, 642, 6516} |
| आ सुग्म्या᳚य॒ सुग्म्यं᳚ प्रा॒ता रथे᳚ना॒श्विना᳚ वा स॒क्षणी᳚|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | ककुभः} हु॒वे पि॒तेव॒ सोभ॑री||{15/18}{6.2.7.5}{8.22.15}{8.4.2.15}{239, 642, 6517} |
| मनो᳚जवसा वृषणा मदच्युता मक्षुंग॒माभि॑रू॒तिभिः॑|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | सतोबृहती} आ॒रात्ता᳚च्चिद् भूतम॒स्मे, अव॑से पू॒र्वीभिः॑ पुरुभोजसा||{16/18}{6.2.8.1}{8.22.16}{8.4.2.16}{240, 642, 6518} |
| आ नो॒, अश्वा᳚वदश्विना व॒र्तिर्या᳚सिष्टं मधुपातमा नरा|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | उष्णिक्} गोम॑द्दस्रा॒ हिर᳚ण्यवत्||{17/18}{6.2.8.2}{8.22.17}{8.4.2.17}{241, 642, 6519} |
| सु॒प्रा॒व॒र्गं सु॒वीर्यं᳚ सु॒ष्ठु वार्य॒मना᳚धृष्टं रक्ष॒स्विना᳚|{काण्वः सोभरिः | अश्विनौ | सतोबृहती} अ॒स्मिन्ना वा᳚मा॒याने᳚ वाजिनीवसू॒ विश्वा᳚ वा॒मानि॑ धीमहि||{18/18}{6.2.8.3}{8.22.18}{8.4.2.18}{242, 642, 6520} |
| [12] ईळिष्वेति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य वैयश्वोविश्वमनाअग्निरुष्णिक् | |
| ईळि॑ष्वा॒ हि प्र॑ती॒व्य१॑(अं॒) यज॑स्व जा॒तवे᳚दसम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} च॒रि॒ष्णुधू᳚म॒मगृ॑भीतशोचिषम्||{1/30}{6.2.9.1}{8.23.1}{8.4.3.1}{243, 643, 6521} |
| दा॒मानं᳚ विश्वचर्षणे॒ ऽग्निं वि॑श्वमनो गि॒रा|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} उ॒त स्तु॑षे॒ विष्प॑र्धसो॒ रथा᳚नाम्||{2/30}{6.2.9.2}{8.23.2}{8.4.3.2}{244, 643, 6522} |
| येषा᳚माबा॒ध ऋ॒ग्मिय॑ इ॒षः पृ॒क्षश्च॑ नि॒ग्रभे᳚|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} उ॒प॒विदा॒ वह्नि᳚र्विन्दते॒ वसु॑||{3/30}{6.2.9.3}{8.23.3}{8.4.3.3}{245, 643, 6523} |
| उद॑स्य शो॒चिर॑स्थाद् दीदि॒युषो॒ व्य१॑(अ॒)जर᳚म्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} तपु॑र्जम्भस्य सु॒द्युतो᳚ गण॒श्रियः॑||{4/30}{6.2.9.4}{8.23.4}{8.4.3.4}{246, 643, 6524} |
| उदु॑ तिष्ठ स्वध्वर॒ स्तवा᳚नो दे॒व्या कृ॒पा|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} अ॒भि॒ख्या भा॒सा बृ॑ह॒ता शु॑शु॒क्वनिः॑||{5/30}{6.2.9.5}{8.23.5}{8.4.3.5}{247, 643, 6525} |
| अग्ने᳚ या॒हि सु॑श॒स्तिभि᳚र्ह॒व्या जुह्वा᳚न आनु॒षक्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} यथा᳚ दू॒तो ब॒भूथ॑ हव्य॒वाह॑नः||{6/30}{6.2.10.1}{8.23.6}{8.4.3.6}{248, 643, 6526} |
| अ॒ग्निं वः॑ पू॒र्व्यं हु॑वे॒ होता᳚रं चर्षणी॒नाम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} तम॒या वा॒चा गृ॑णे॒ तमु॑ वः स्तुषे||{7/30}{6.2.10.2}{8.23.7}{8.4.3.7}{249, 643, 6527} |
| य॒ज्ञेभि॒रद्भु॑तक्रतुं॒ यं कृ॒पा सू॒दय᳚न्त॒ इत्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} मि॒त्रं न जने॒ सुधि॑तमृ॒ताव॑नि||{8/30}{6.2.10.3}{8.23.8}{8.4.3.8}{250, 643, 6528} |
| ऋ॒तावा᳚नमृतायवो य॒ज्ञस्य॒ साध॑नं गि॒रा|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} उपो᳚ एनं जुजुषु॒र्नम॑सस्प॒दे||{9/30}{6.2.10.4}{8.23.9}{8.4.3.9}{251, 643, 6529} |
| अच्छा᳚ नो॒, अङ्गि॑रस्तमं य॒ज्ञासो᳚ यन्तु सं॒यतः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} होता॒ यो, अस्ति॑ वि॒क्ष्वा य॒शस्त॑मः||{10/30}{6.2.10.5}{8.23.10}{8.4.3.10}{252, 643, 6530} |
| अग्ने॒ तव॒ त्ये, अ॑ज॒रेन्धा᳚नासो बृ॒हद् भाः|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} अश्वा᳚ इव॒ वृष॑णस्तविषी॒यवः॑||{11/30}{6.2.11.1}{8.23.11}{8.4.3.11}{253, 643, 6531} |
| स त्वं न॑ ऊर्जां पते र॒यिं रा᳚स्व सु॒वीर्य᳚म्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} प्राव॑ नस्तो॒के तन॑ये स॒मत्स्वा||{12/30}{6.2.11.2}{8.23.12}{8.4.3.12}{254, 643, 6532} |
| यद् वा, उ॑ वि॒श्पतिः॑ शि॒तः सुप्री᳚तो॒ मनु॑षो वि॒शि|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} विश्वेद॒ग्निः प्रति॒ रक्षां᳚सि सेधति||{13/30}{6.2.11.3}{8.23.13}{8.4.3.13}{255, 643, 6533} |
| श्रु॒ष्ट्य॑ग्ने॒ नव॑स्य मे॒ स्तोम॑स्य वीर विश्पते|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} नि मा॒यिन॒स्तपु॑षा र॒क्षसो᳚ दह||{14/30}{6.2.11.4}{8.23.14}{8.4.3.14}{256, 643, 6534} |
| न तस्य॑ मा॒यया᳚ च॒न रि॒पुरी᳚शीत॒ मर्त्यः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} यो, अ॒ग्नये᳚ द॒दाश॑ ह॒व्यदा᳚तिभिः||{15/30}{6.2.11.5}{8.23.15}{8.4.3.15}{257, 643, 6535} |
| व्य॑श्वस्त्वा वसु॒विद॑मुक्ष॒ण्युर॑प्रीणा॒दृषिः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} म॒हो रा॒ये तमु॑ त्वा॒ समि॑धीमहि||{16/30}{6.2.12.1}{8.23.16}{8.4.3.16}{258, 643, 6536} |
| उ॒शना᳚ का॒व्यस्त्वा॒ नि होता᳚रमसादयत्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} आ॒य॒जिं त्वा॒ मन॑वे जा॒तवे᳚दसम्||{17/30}{6.2.12.2}{8.23.17}{8.4.3.17}{259, 643, 6537} |
| विश्वे॒ हि त्वा᳚ स॒जोष॑सो दे॒वासो᳚ दू॒तमक्र॑त|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} श्रु॒ष्टी दे᳚व प्रथ॒मो य॒ज्ञियो᳚ भुवः||{18/30}{6.2.12.3}{8.23.18}{8.4.3.18}{260, 643, 6538} |
| इ॒मं घा᳚ वी॒रो, अ॒मृतं᳚ दू॒तं कृ᳚ण्वीत॒ मर्त्यः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} पा॒व॒कं कृ॒ष्णव॑र्तनिं॒ विहा᳚यसम्||{19/30}{6.2.12.4}{8.23.19}{8.4.3.19}{261, 643, 6539} |
| तं हु॑वेम य॒तस्रु॑चः सु॒भासं᳚ शु॒क्रशो᳚चिषम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} वि॒शाम॒ग्निम॒जरं᳚ प्र॒त्नमीड्य᳚म्||{20/30}{6.2.12.5}{8.23.20}{8.4.3.20}{262, 643, 6540} |
| यो, अ॑स्मै ह॒व्यदा᳚तिभि॒राहु॑तिं॒ मर्तोऽवि॑धत्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} भूरि॒ पोषं॒ स ध॑त्ते वी॒रव॒द् यशः॑||{21/30}{6.2.13.1}{8.23.21}{8.4.3.21}{263, 643, 6541} |
| प्र॒थ॒मं जा॒तवे᳚दसम॒ग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} प्रति॒ स्रुगे᳚ति॒ नम॑सा ह॒विष्म॑ती||{22/30}{6.2.13.2}{8.23.22}{8.4.3.22}{264, 643, 6542} |
| आभि᳚र्विधेमा॒ग्नये॒ ज्येष्ठा᳚भिर्व्यश्व॒वत्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} मंहि॑ष्ठाभिर्म॒तिभिः॑ शु॒क्रशो᳚चिषे||{23/30}{6.2.13.3}{8.23.23}{8.4.3.23}{265, 643, 6543} |
| नू॒नम॑र्च॒ विहा᳚यसे॒ स्तोमे᳚भिः स्थूरयूप॒वत्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} ऋषे᳚ वैयश्व॒ दम्या᳚या॒ग्नये᳚||{24/30}{6.2.13.4}{8.23.24}{8.4.3.24}{266, 643, 6544} |
| अति॑थिं॒ मानु॑षाणां सू॒नुं वन॒स्पती᳚नाम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} विप्रा᳚ अ॒ग्निमव॑से प्र॒त्नमी᳚ळते||{25/30}{6.2.13.5}{8.23.25}{8.4.3.25}{267, 643, 6545} |
| म॒हो विश्वाँ᳚, अ॒भि ष॒तो॒३॑(ओ॒) ऽभि ह॒व्यानि॒ मानु॑षा|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} अग्ने॒ नि ष॑त्सि॒ नम॒साधि॑ ब॒र्हिषि॑||{26/30}{6.2.14.1}{8.23.26}{8.4.3.26}{268, 643, 6546} |
| वंस्वा᳚ नो॒ वार्या᳚ पु॒रु वंस्व॑ रा॒यः पु॑रु॒स्पृहः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} सु॒वीर्य॑स्य प्र॒जाव॑तो॒ यश॑स्वतः||{27/30}{6.2.14.2}{8.23.27}{8.4.3.27}{269, 643, 6547} |
| त्वं व॑रो सु॒षाम्णे ऽग्ने॒ जना᳚य चोदय|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} सदा᳚ वसो रा॒तिं य॑विष्ठ॒ शश्व॑ते||{28/30}{6.2.14.3}{8.23.28}{8.4.3.28}{270, 643, 6548} |
| त्वं हि सु॑प्र॒तूरसि॒ त्वं नो॒ गोम॑ती॒रिषः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} म॒हो रा॒यः सा॒तिम॑ग्ने॒, अपा᳚ वृधि||{29/30}{6.2.14.4}{8.23.29}{8.4.3.29}{271, 643, 6549} |
| अग्ने॒ त्वं य॒शा, अ॒स्या मि॒त्रावरु॑णा वह|{वैयश्वो विश्वमनाः | अग्निः | उष्णिक्} ऋ॒तावा᳚ना स॒म्राजा᳚ पू॒तद॑क्षसा||{30/30}{6.2.14.5}{8.23.30}{8.4.3.30}{272, 643, 6550} |
| [13] सखायइति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य वैयश्वो विश्वमनाइंद्रोंत्यतृचस्य वरुरुष्णिगंत्यानुष्टुप् (वरुः सौषाम्णोयंराजा) | |
| सखा᳚य॒ आ शि॑षामहि॒ ब्रह्मेन्द्रा᳚य व॒ज्रिणे᳚|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} स्तु॒ष ऊ॒ षु वो॒ नृत॑माय धृ॒ष्णवे᳚||{1/30}{6.2.15.1}{8.24.1}{8.4.4.1}{273, 644, 6551} |
| शव॑सा॒ ह्यसि॑ श्रु॒तो वृ॑त्र॒हत्ये᳚न वृत्र॒हा|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} म॒घैर्म॒घोनो॒, अति॑ शूर दाशसि||{2/30}{6.2.15.2}{8.24.2}{8.4.4.2}{274, 644, 6552} |
| स नः॒ स्तवा᳚न॒ आ भ॑र र॒यिं चि॒त्रश्र॑वस्तमम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} नि॒रे॒के चि॒द् यो ह॑रिवो॒ वसु॑र्द॒दिः||{3/30}{6.2.15.3}{8.24.3}{8.4.4.3}{275, 644, 6553} |
| आ नि॑रे॒कमु॒त प्रि॒यमिन्द्र॒ दर्षि॒ जना᳚नाम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} धृ॒ष॒ता धृ॑ष्णो॒ स्तव॑मान॒ आ भ॑र||{4/30}{6.2.15.4}{8.24.4}{8.4.4.4}{276, 644, 6554} |
| न ते᳚ स॒व्यं न दक्षि॑णं॒ हस्तं᳚ वरन्त आ॒मुरः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} न प॑रि॒बाधो᳚ हरिवो॒ गवि॑ष्टिषु||{5/30}{6.2.15.5}{8.24.5}{8.4.4.5}{277, 644, 6555} |
| आ त्वा॒ गोभि॑रिव व्र॒जं गी॒र्भिरृ॑णोम्यद्रिवः|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} आ स्मा॒ कामं᳚ जरि॒तुरा मनः॑ पृण||{6/30}{6.2.16.1}{8.24.6}{8.4.4.6}{278, 644, 6556} |
| विश्वा᳚नि वि॒श्वम॑नसो धि॒या नो᳚ वृत्रहन्तम|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} उग्र॑ प्रणेत॒रधि॒ षू व॑सो गहि||{7/30}{6.2.16.2}{8.24.7}{8.4.4.7}{279, 644, 6557} |
| व॒यं ते᳚ अ॒स्य वृ॑त्रहन् वि॒द्याम॑ शूर॒ नव्य॑सः|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} वसोः᳚ स्पा॒र्हस्य॑ पुरुहूत॒ राध॑सः||{8/30}{6.2.16.3}{8.24.8}{8.4.4.8}{280, 644, 6558} |
| इन्द्र॒ यथा॒ ह्यस्ति॒ ते ऽप॑रीतं नृतो॒ शवः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} अमृ॑क्ता रा॒तिः पु॑रुहूत दा॒शुषे᳚||{9/30}{6.2.16.4}{8.24.9}{8.4.4.9}{281, 644, 6559} |
| आ वृ॑षस्व महामह म॒हे नृ॑तम॒ राध॑से|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} दृ॒ळ्हश्चि॑द्दृह्य मघवन् म॒घत्त॑ये||{10/30}{6.2.16.5}{8.24.10}{8.4.4.10}{282, 644, 6560} |
| नू, अ॒न्यत्रा᳚ चिदद्रिव॒स्त्वन्नो᳚ जग्मुरा॒शसः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} मघ॑वञ्छ॒ग्धि तव॒ तन्न॑ ऊ॒तिभिः॑||{11/30}{6.2.17.1}{8.24.11}{8.4.4.11}{283, 644, 6561} |
| न॒ह्य१॑(अ॒)ङ्ग नृ॑तो॒ त्वद॒न्यं वि॒न्दामि॒ राध॑से|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} रा॒ये द्यु॒म्नाय॒ शव॑से च गिर्वणः||{12/30}{6.2.17.2}{8.24.12}{8.4.4.12}{284, 644, 6562} |
| एन्दु॒मिन्द्रा᳚य सिञ्चत॒ पिबा᳚ति सो॒म्यं मधु॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} प्र राध॑सा चोदयाते महित्व॒ना||{13/30}{6.2.17.3}{8.24.13}{8.4.4.13}{285, 644, 6563} |
| उपो॒ हरी᳚णां॒ पतिं॒ दक्षं᳚ पृ॒ञ्चन्त॑मब्रवम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} नू॒नं श्रु॑धि स्तुव॒तो, अ॒श्व्यस्य॑||{14/30}{6.2.17.4}{8.24.14}{8.4.4.14}{286, 644, 6564} |
| न॒ह्य१॑(अ॒)ङ्ग पु॒रा च॒न ज॒ज्ञे वी॒रत॑र॒स्त्वत्|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} नकी᳚ रा॒या नैवथा॒ न भ॒न्दना᳚||{15/30}{6.2.17.5}{8.24.15}{8.4.4.15}{287, 644, 6565} |
| एदु॒ मध्वो᳚ म॒दिन्त॑रं सि॒ञ्च वा᳚ध्वर्यो॒, अन्ध॑सः|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} ए॒वा हि वी॒रः स्तव॑ते स॒दावृ॑धः||{16/30}{6.2.18.1}{8.24.16}{8.4.4.16}{288, 644, 6566} |
| इन्द्र॑ स्थातर्हरीणां॒ नकि॑ष्टे पू॒र्व्यस्तु॑तिम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} उदा᳚नंश॒ शव॑सा॒ न भ॒न्दना᳚||{17/30}{6.2.18.2}{8.24.17}{8.4.4.17}{289, 644, 6567} |
| तं वो॒ वाजा᳚नां॒ पति॒महू᳚महि श्रव॒स्यवः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} अप्रा᳚युभिर्य॒ज्ञेभि᳚र्वावृ॒धेन्य᳚म्||{18/30}{6.2.18.3}{8.24.18}{8.4.4.18}{290, 644, 6568} |
| एतो॒ न् विन्द्रं॒ स्तवा᳚म॒ सखा᳚यः॒ स्तोम्यं॒ नर᳚म्|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} कृ॒ष्टीर्यो विश्वा᳚ अ॒भ्यस्त्येक॒ इत्||{19/30}{6.2.18.4}{8.24.19}{8.4.4.19}{291, 644, 6569} |
| अगो᳚रुधाय ग॒विषे᳚ द्यु॒क्षाय॒ दस्म्यं॒ वचः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} घृ॒तात् स्वादी᳚यो॒ मधु॑नश्च वोचत||{20/30}{6.2.18.5}{8.24.20}{8.4.4.20}{292, 644, 6570} |
| यस्यामि॑तानि वी॒र्या॒३॑(आ॒) न राधः॒ पर्ये᳚तवे|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} ज्योति॒र्न विश्व॑म॒भ्यस्ति॒ दक्षि॑णा||{21/30}{6.2.19.1}{8.24.21}{8.4.4.21}{293, 644, 6571} |
| स्तु॒हीन्द्रं᳚ व्यश्व॒वदनू᳚र्मिं वा॒जिनं॒ यम᳚म्|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} अ॒र्यो गयं॒ मंह॑मानं॒ वि दा॒शुषे᳚||{22/30}{6.2.19.2}{8.24.22}{8.4.4.22}{294, 644, 6572} |
| ए॒वा नू॒नमुप॑ स्तुहि॒ वैय॑श्व दश॒मं नव᳚म्|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} सुवि॑द्वांसं च॒र्कृत्यं᳚ च॒रणी᳚नाम्||{23/30}{6.2.19.3}{8.24.23}{8.4.4.23}{295, 644, 6573} |
| वेत्था॒ हि निरृ॑तीनां॒ वज्र॑हस्त परि॒वृज᳚म्|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} अह॑रहः शु॒न्ध्युः प॑रि॒पदा᳚मिव||{24/30}{6.2.19.4}{8.24.24}{8.4.4.24}{296, 644, 6574} |
| तदि॒न्द्राव॒ आ भ॑र॒ येना᳚ दंसिष्ठ॒ कृत्व॑ने|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} द्वि॒ता कुत्सा᳚य शिश्नथो॒ नि चो᳚दय||{25/30}{6.2.19.5}{8.24.25}{8.4.4.25}{297, 644, 6575} |
| तमु॑ त्वा नू॒नमी᳚महे॒ नव्यं᳚ दंसिष्ठ॒ सन्य॑से|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} स त्वं नो॒ विश्वा᳚ अ॒भिमा᳚तीः स॒क्षणिः॑||{26/30}{6.2.20.1}{8.24.26}{8.4.4.26}{298, 644, 6576} |
| य ऋक्षा॒दंह॑सो मु॒चद् यो वार्या᳚त् स॒प्त सिन्धु॑षु|{वैयश्वो विश्वमनाः | इन्द्रः | उष्णिक्} वध॑र्दा॒सस्य॑ तुविनृम्ण नीनमः||{27/30}{6.2.20.2}{8.24.27}{8.4.4.27}{299, 644, 6577} |
| यथा᳚ वरो सु॒षाम्णे᳚ स॒निभ्य॒ आव॑हो र॒यिम्|{वैयश्वो विश्वमनाः | वरोः सौषाम्णस्य दानस्तुतिः | उष्णिक्} व्य॑श्वेभ्यः सुभगे वाजिनीवति||{28/30}{6.2.20.3}{8.24.28}{8.4.4.28}{300, 644, 6578} |
| आ ना॒र्यस्य॒ दक्षि॑णा॒ व्य॑श्वाँ, एतु सो॒मिनः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | वरोः सौषाम्णस्य दानस्तुतिः | उष्णिक्} स्थू॒रं च॒ राधः॑ श॒तव॑त् स॒हस्र॑वत्||{29/30}{6.2.20.4}{8.24.29}{8.4.4.29}{301, 644, 6579} |
| यत् त्वा᳚ पृ॒च्छादी᳚जा॒नः कु॑ह॒या कु॑हयाकृते|{वैयश्वो विश्वमनाः | वरोः सौषाम्णस्य दानस्तुतिः | अनुष्टुप्} ए॒षो, अप॑श्रितो व॒लो गो᳚म॒तीमव॑ तिष्ठति||{30/30}{6.2.20.5}{8.24.30}{8.4.4.30}{302, 644, 6580} |
| [14] तावांविश्वस्येति चतुर्विंशत्यृचस्य सूक्तस्य वैयश्वोविश्वमना मित्रावरुणौ दशम्यादितिसृणां विश्वेदेवाउष्णिक् उपांत्योष्णिग्गर्भा | |
| ता वां॒ विश्व॑स्य गो॒पा दे॒वा दे॒वेषु॑ य॒ज्ञिया᳚|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} ऋ॒तावा᳚ना यजसे पू॒तद॑क्षसा||{1/24}{6.2.21.1}{8.25.1}{8.4.5.1}{303, 645, 6581} |
| मि॒त्रा तना॒ न र॒थ्या॒३॑(आ॒) वरु॑णो॒ यश्च॑ सु॒क्रतुः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} स॒नात् सु॑जा॒ता तन॑या धृ॒तव्र॑ता||{2/24}{6.2.21.2}{8.25.2}{8.4.5.2}{304, 645, 6582} |
| ता मा॒ता वि॒श्ववे᳚दसा ऽसु॒र्या᳚य॒ प्रम॑हसा|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} म॒ही ज॑जा॒नादि॑तिरृ॒ताव॑री||{3/24}{6.2.21.3}{8.25.3}{8.4.5.3}{305, 645, 6583} |
| म॒हान्ता᳚ मि॒त्रावरु॑णा स॒म्राजा᳚ दे॒वावसु॑रा|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} ऋ॒तावा᳚नावृ॒तमा घो᳚षतो बृ॒हत्||{4/24}{6.2.21.4}{8.25.4}{8.4.5.4}{306, 645, 6584} |
| नपा᳚ता॒ शव॑सो म॒हः सू॒नू दक्ष॑स्य सु॒क्रतू᳚|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} सृ॒प्रदा᳚नू, इ॒षो वास्त्वधि॑ क्षितः||{5/24}{6.2.21.5}{8.25.5}{8.4.5.5}{307, 645, 6585} |
| सं या दानू᳚नि ये॒मथु॑र्दि॒व्याः पार्थि॑वी॒रिषः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} नभ॑स्वती॒रा वां᳚ चरन्तु वृ॒ष्टयः॑||{6/24}{6.2.22.1}{8.25.6}{8.4.5.6}{308, 645, 6586} |
| अधि॒ या बृ॑ह॒तो दि॒वो॒३॑(ओ॒) ऽभि यू॒थेव॒ पश्य॑तः|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} ऋ॒तावा᳚ना स॒म्राजा॒ नम॑से हि॒ता||{7/24}{6.2.22.2}{8.25.7}{8.4.5.7}{309, 645, 6587} |
| ऋ॒तावा᳚ना॒ नि षे᳚दतुः॒ साम्रा᳚ज्याय सु॒क्रतू᳚|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} धृ॒तव्र॑ता क्ष॒त्रिया᳚ क्ष॒त्रमा᳚शतुः||{8/24}{6.2.22.3}{8.25.8}{8.4.5.8}{310, 645, 6588} |
| अ॒क्ष्णश्चि॑द् गातु॒वित्त॑रा ऽनुल्ब॒णेन॒ चक्ष॑सा|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} नि चि᳚न्मि॒षन्ता᳚ निचि॒रा नि चि॑क्यतुः||{9/24}{6.2.22.4}{8.25.9}{8.4.5.9}{311, 645, 6589} |
| उ॒त नो᳚ दे॒व्यदि॑तिरुरु॒ष्यतां॒ नास॑त्या|{वैयश्वो विश्वमनाः | विश्वदेवाः | उष्णिक्} उ॒रु॒ष्यन्तु॑ म॒रुतो᳚ वृ॒द्धश॑वसः||{10/24}{6.2.22.5}{8.25.10}{8.4.5.10}{312, 645, 6590} |
| ते नो᳚ ना॒वमु॑रुष्यत॒ दिवा॒ नक्तं᳚ सुदानवः|{वैयश्वो विश्वमनाः | विश्वदेवाः | उष्णिक्} अरि॑ष्यन्तो॒ नि पा॒युभिः॑ सचेमहि||{11/24}{6.2.23.1}{8.25.11}{8.4.5.11}{313, 645, 6591} |
| अघ्न॑ते॒ विष्ण॑वे व॒यमरि॑ष्यन्तः सु॒दान॑वे|{वैयश्वो विश्वमनाः | विश्वदेवाः | उष्णिक्} श्रु॒धि स्व॑यावन् त्सिन्धो पू॒र्वचि॑त्तये||{12/24}{6.2.23.2}{8.25.12}{8.4.5.12}{314, 645, 6592} |
| तद् वार्यं᳚ वृणीमहे॒ वरि॑ष्ठं गोप॒यत्य᳚म्|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} मि॒त्रो यत्पान्ति॒ वरु॑णो॒ यद᳚र्य॒मा||{13/24}{6.2.23.3}{8.25.13}{8.4.5.13}{315, 645, 6593} |
| उ॒त नः॒ सिन्धु॑र॒पां तन्म॒रुत॒स्तद॒श्विना᳚|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} इन्द्रो॒ विष्णु᳚र्मी॒ढ्वांसः॑ स॒जोष॑सः||{14/24}{6.2.23.4}{8.25.14}{8.4.5.14}{316, 645, 6594} |
| ते हि ष्मा᳚ व॒नुषो॒ नरो॒ ऽभिमा᳚तिं॒ कय॑स्य चित्|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} ति॒ग्मं न क्षोदः॑ प्रति॒घ्नन्ति॒ भूर्ण॑यः||{15/24}{6.2.23.5}{8.25.15}{8.4.5.15}{317, 645, 6595} |
| अ॒यमेक॑ इ॒त्था पु॒रू रु च॑ष्टे॒ वि वि॒श्पतिः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} तस्य᳚ व्र॒तान्यनु॑ वश्चरामसि||{16/24}{6.2.24.1}{8.25.16}{8.4.5.16}{318, 645, 6596} |
| अनु॒ पूर्वा᳚ण्यो॒क्या᳚ साम्रा॒ज्यस्य॑ सश्चिम|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} मि॒त्रस्य᳚ व्र॒ता वरु॑णस्य दीर्घ॒श्रुत्||{17/24}{6.2.24.2}{8.25.17}{8.4.5.17}{319, 645, 6597} |
| परि॒ यो र॒श्मिना᳚ दि॒वो ऽन्ता᳚न् म॒मे पृ॑थि॒व्याः|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} उ॒भे, आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा||{18/24}{6.2.24.3}{8.25.18}{8.4.5.18}{320, 645, 6598} |
| उदु॒ ष्य श॑र॒णे दि॒वो ज्योति॑रयंस्त॒ सूर्यः॑|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} अ॒ग्निर्न शु॒क्रः स॑मिधा॒न आहु॑तः||{19/24}{6.2.24.4}{8.25.19}{8.4.5.19}{321, 645, 6599} |
| वचो᳚ दी॒र्घप्र॑सद्म॒नीशे॒ वाज॑स्य॒ गोम॑तः|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} ईशे॒ हि पि॒त्वो᳚ऽवि॒षस्य॑ दा॒वने᳚||{20/24}{6.2.24.5}{8.25.20}{8.4.5.20}{322, 645, 6600} |
| तत् सूर्यं॒ रोद॑सी, उ॒भे दो॒षा वस्तो॒रुप॑ ब्रुवे|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} भो॒जेष्व॒स्माँ, अ॒भ्युच्च॑रा॒ सदा᳚||{21/24}{6.2.25.1}{8.25.21}{8.4.5.21}{323, 645, 6601} |
| ऋ॒ज्रमु॑क्ष॒ण्याय॑ने रज॒तं हर॑याणे|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} रथं᳚ यु॒क्तम॑सनाम सु॒षाम॑णि||{22/24}{6.2.25.2}{8.25.22}{8.4.5.22}{324, 645, 6602} |
| ता मे॒, अश्व्या᳚नां॒ हरी᳚णां नि॒तोश॑ना|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिग्गर्भा} उ॒तो नु कृत्व्या᳚नां नृ॒वाह॑सा||{23/24}{6.2.25.3}{8.25.23}{8.4.5.23}{325, 645, 6603} |
| स्मद॑भीशू॒ कशा᳚वन्ता॒ विप्रा॒ नवि॑ष्ठया म॒ती|{वैयश्वो विश्वमनाः | मित्रावरुणौ | उष्णिक्} म॒हो वा॒जिना॒वर्व᳚न्ता॒ सचा᳚सनम्||{24/24}{6.2.25.4}{8.25.24}{8.4.5.24}{326, 645, 6604} |
| [15] युवोरुष्विति पंचविंशत्यृचस्य सूक्तस्यांगिरसोव्यश्वोश्विनावंत्यषण्णां वायुरुष्णिक् वाहिष्ठोवामित्यादिचतस्रो गायत्र्यः विंश्येकविंश्यंत्याअनुष्टुभः (व्यश्वोवेति सर्वानुक्रमोक्ता वपिशौनके नव्यश्वस्यैवमुख्यत्वद्योतनादुत्रव्यश्वेमुख्यत्वमादृतंतेनपाक्षिकोविश्वमनाः) | |
| यु॒वोरु॒ षू रथं᳚ हुवे स॒धस्तु॑त्याय सू॒रिषु॑|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} अतू᳚र्तदक्षा वृषणा वृषण्वसू||{1/25}{6.2.26.1}{8.26.1}{8.4.6.1}{327, 646, 6605} |
| यु॒वं व॑रो सु॒षाम्णे᳚ म॒हे तने᳚ नासत्या|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} अवो᳚भिर्याथो वृषणा वृषण्वसू||{2/25}{6.2.26.2}{8.26.2}{8.4.6.2}{328, 646, 6606} |
| ता वा᳚म॒द्य ह॑वामहे ह॒व्येभि᳚र्वाजिनीवसू|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} पू॒र्वीरि॒ष इ॒षय᳚न्ता॒वति॑ क्ष॒पः||{3/25}{6.2.26.3}{8.26.3}{8.4.6.3}{329, 646, 6607} |
| आ वां॒ वाहि॑ष्ठो, अश्विना॒ रथो᳚ यातु श्रु॒तो न॑रा|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} उप॒ स्तोमा᳚न् तु॒रस्य॑ दर्शथः श्रि॒ये||{4/25}{6.2.26.4}{8.26.4}{8.4.6.4}{330, 646, 6608} |
| जु॒हु॒रा॒णा चि॑दश्वि॒ना ऽऽ म᳚न्येथां वृषण्वसू|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} यु॒वं हि रु॑द्रा॒ पर्ष॑थो॒, अति॒ द्विषः॑||{5/25}{6.2.26.5}{8.26.5}{8.4.6.5}{331, 646, 6609} |
| द॒स्रा हि विश्व॑मानु॒षङ् म॒क्षूभिः॑ परि॒दीय॑थः|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} धि॒यं॒जि॒न्वा मधु॑वर्णा शु॒भस्पती᳚||{6/25}{6.2.27.1}{8.26.6}{8.4.6.6}{332, 646, 6610} |
| उप॑ नो यातमश्विना रा॒या वि॑श्व॒पुषा᳚ स॒ह|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} म॒घवा᳚ना सु॒वीरा॒वन॑पच्युता||{7/25}{6.2.27.2}{8.26.7}{8.4.6.7}{333, 646, 6611} |
| आ मे᳚ अ॒स्य प्र॑ती॒व्य१॑(अ॒)मिन्द्र॑नासत्या गतम्|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} दे॒वा दे॒वेभि॑र॒द्य स॒चन॑स्तमा||{8/25}{6.2.27.3}{8.26.8}{8.4.6.8}{334, 646, 6612} |
| व॒यं हि वां॒ हवा᳚मह उक्ष॒ण्यन्तो᳚ व्यश्व॒वत्|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} सु॒म॒तिभि॒रुप॑ विप्रावि॒हा ग॑तम्||{9/25}{6.2.27.4}{8.26.9}{8.4.6.9}{335, 646, 6613} |
| अ॒श्विना॒ स्वृ॑षे स्तुहि कु॒वित् ते॒ श्रव॑तो॒ हव᳚म्|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} नेदी᳚यसः कूळयातः प॒णीँरु॒त||{10/25}{6.2.27.5}{8.26.10}{8.4.6.10}{336, 646, 6614} |
| वै॒य॒श्वस्य॑ श्रुतं नरो॒तो मे᳚ अ॒स्य वे᳚दथः|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} स॒जोष॑सा॒ वरु॑णो मि॒त्रो, अ᳚र्य॒मा||{11/25}{6.2.28.1}{8.26.11}{8.4.6.11}{337, 646, 6615} |
| यु॒वाद॑त्तस्य धिष्ण्या यु॒वानी᳚तस्य सू॒रिभिः॑|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} अह॑रहर्वृषणा॒ मह्यं᳚ शिक्षतम्||{12/25}{6.2.28.2}{8.26.12}{8.4.6.12}{338, 646, 6616} |
| यो वां᳚ य॒ज्ञेभि॒रावृ॒तो ऽधि॑वस्त्रा व॒धूरि॑व|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} स॒प॒र्यन्ता᳚ शु॒भे च॑क्राते, अ॒श्विना᳚||{13/25}{6.2.28.3}{8.26.13}{8.4.6.13}{339, 646, 6617} |
| यो वा᳚मुरु॒व्यच॑स्तमं॒ चिके᳚तति नृ॒पाय्य᳚म्|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} व॒र्तिर॑श्विना॒ परि॑ यातमस्म॒यू||{14/25}{6.2.28.4}{8.26.14}{8.4.6.14}{340, 646, 6618} |
| अ॒स्मभ्यं॒ सु वृ॑षण्वसू या॒तं व॒र्तिर्नृ॒पाय्य᳚म्|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | उष्णिक्} वि॒षु॒द्रुहे᳚व य॒ज्ञमू᳚हथुर्गि॒रा||{15/25}{6.2.28.5}{8.26.15}{8.4.6.15}{341, 646, 6619} |
| वाहि॑ष्ठो वां॒ हवा᳚नां॒ स्तोमो᳚ दू॒तो हु॑वन्नरा|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | गायत्री} यु॒वाभ्यां᳚ भूत्वश्विना||{16/25}{6.2.29.1}{8.26.16}{8.4.6.16}{342, 646, 6620} |
| यद॒दो दि॒वो, अ᳚र्ण॒व इ॒षो वा॒ मद॑थो गृ॒हे|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | गायत्री} श्रु॒तमिन्मे᳚ अमर्त्या||{17/25}{6.2.29.2}{8.26.17}{8.4.6.17}{343, 646, 6621} |
| उ॒त स्या श्वे᳚त॒याव॑री॒ वाहि॑ष्ठा वां न॒दीना᳚म्|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | गायत्री} सिन्धु॒र्हिर᳚ण्यवर्तनिः||{18/25}{6.2.29.3}{8.26.18}{8.4.6.18}{344, 646, 6622} |
| स्मदे॒तया᳚ सुकी॒र्त्या ऽश्वि॑ना श्वे॒तया᳚ धि॒या|{आंगिरसोव्यश्वः | अश्विनौ | गायत्री} वहे᳚थे शुभ्रयावाना||{19/25}{6.2.29.4}{8.26.19}{8.4.6.19}{345, 646, 6623} |
| यु॒क्ष्वा हि त्वं र॑था॒सहा᳚ यु॒वस्व॒ पोष्या᳚ वसो|{आंगिरसोव्यश्वः | वायुः | अनुष्टुप्} आन्नो᳚ वायो॒ मधु॑ पिबा॒ऽस्माकं॒ सव॒ना ग॑हि||{20/25}{6.2.29.5}{8.26.20}{8.4.6.20}{346, 646, 6624} |
| तव॑ वायवृतस्पते॒ त्वष्टु॑र्जामातरद्भुत|{आंगिरसोव्यश्वः | वायुः | गायत्री} अवां॒स्या वृ॑णीमहे||{21/25}{6.2.30.1}{8.26.21}{8.4.6.21}{347, 646, 6625} |
| त्वष्टु॒र्जामा᳚तरं व॒यमीशा᳚नं रा॒य ई᳚महे|{आंगिरसोव्यश्वः | वायुः | उष्णिक्} सु॒ताव᳚न्तो वा॒युं द्यु॒म्ना जना᳚सः||{22/25}{6.2.30.2}{8.26.22}{8.4.6.22}{348, 646, 6626} |
| वायो᳚ या॒हि शि॒वा दि॒वो वह॑स्वा॒ सु स्वश्व्य᳚म्|{आंगिरसोव्यश्वः | वायुः | उष्णिक्} वह॑स्व म॒हः पृ॑थु॒पक्ष॑सा॒ रथे᳚||{23/25}{6.2.30.3}{8.26.23}{8.4.6.23}{349, 646, 6627} |
| त्वां हि सु॒प्सर॑स्तमं नृ॒षद॑नेषु हू॒महे᳚|{आंगिरसोव्यश्वः | वायुः | उष्णिक्} ग्रावा᳚णं॒ नाश्व॑पृष्ठं मं॒हना᳚||{24/25}{6.2.30.4}{8.26.24}{8.4.6.24}{350, 646, 6628} |
| स त्वं नो᳚ देव॒ मन॑सा॒ वायो᳚ मन्दा॒नो, अ॑ग्रि॒यः|{आंगिरसोव्यश्वः | वायुः | गायत्री} कृ॒धि वाजाँ᳚, अ॒पो धियः॑||{25/25}{6.2.30.5}{8.26.25}{8.4.6.25}{351, 646, 6629} |
| [16] अग्निरुक्थइति द्वाविंशत्यृचस्य सूक्तस्य वैवस्वतोमनुर्विश्वेदेवाः अयुजोबृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | (अग्निरुक्थइत्यादिवैश्वदेवेषुचतुः सूक्तेषु आद्ययोरंत्येचसर्वेविश्वेदेवाएवनात्रभेदः) | |
| अ॒ग्निरु॒क्थे पु॒रोहि॑तो॒ ग्रावा᳚णो ब॒र्हिर॑ध्व॒रे|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} ऋ॒चा या᳚मि म॒रुतो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं᳚ दे॒वाँ, अवो॒ वरे᳚ण्यम्||{1/22}{6.2.31.1}{8.27.1}{8.4.7.1}{352, 647, 6630} |
| आ प॒शुं गा᳚सि पृथि॒वीं वन॒स्पती᳚नु॒षासा॒ नक्त॒मोष॑धीः|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} विश्वे᳚ च नो वसवो विश्ववेदसो धी॒नां भू᳚त प्रावि॒तारः॑||{2/22}{6.2.31.2}{8.27.2}{8.4.7.2}{353, 647, 6631} |
| प्र सू न॑ एत्वध्व॒रो॒३॑(ओ॒) ऽग्ना दे॒वेषु॑ पू॒र्व्यः|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} आ॒दि॒त्येषु॒ प्र वरु॑णे धृ॒तव्र॑ते म॒रुत्सु॑ वि॒श्वभा᳚नुषु||{3/22}{6.2.31.3}{8.27.3}{8.4.7.3}{354, 647, 6632} |
| विश्वे॒ हि ष्मा॒ मन॑वे वि॒श्ववे᳚दसो॒ भुव᳚न् वृ॒धे रि॒शाद॑सः|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} अरि॑ष्टेभिः पा॒युभि᳚र्विश्ववेदसो॒ यन्ता᳚ नोऽवृ॒कं छ॒र्दिः||{4/22}{6.2.31.4}{8.27.4}{8.4.7.4}{355, 647, 6633} |
| आ नो᳚ अ॒द्य सम॑नसो॒ गन्ता॒ विश्वे᳚ स॒जोष॑सः|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} ऋ॒चा गि॒रा मरु॑तो॒ देव्यदि॑ते॒ सद॑ने॒ पस्त्ये᳚ महि||{5/22}{6.2.31.5}{8.27.5}{8.4.7.5}{356, 647, 6634} |
| अ॒भि प्रि॒या म॑रुतो॒ या वो॒, अश्व्या᳚ ह॒व्या मि॑त्र प्रया॒थन॑|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} आ ब॒र्हिरिन्द्रो॒ वरु॑णस्तु॒रा नर॑ आदि॒त्यासः॑ सदन्तु नः||{6/22}{6.2.32.1}{8.27.6}{8.4.7.6}{357, 647, 6635} |
| व॒यं वो᳚ वृ॒क्तब᳚र्हिषो हि॒तप्र॑यस आनु॒षक्|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} सु॒तसो᳚मासो वरुण हवामहे मनु॒ष्वदि॒द्धाग्न॑यः||{7/22}{6.2.32.2}{8.27.7}{8.4.7.7}{358, 647, 6636} |
| आ प्र या᳚त॒ मरु॑तो॒ विष्णो॒, अश्वि॑ना॒ पूष॒न् माकी᳚नया धि॒या|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} इन्द्र॒ आ या᳚तु प्रथ॒मः स॑नि॒ष्युभि॒र्वृषा॒ यो वृ॑त्र॒हा गृ॒णे||{8/22}{6.2.32.3}{8.27.8}{8.4.7.8}{359, 647, 6637} |
| वि नो᳚ देवासो, अद्रु॒होऽच्छि॑द्रं॒ शर्म॑ यच्छत|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} न यद्दू॒राद् व॑सवो॒ नू चि॒दन्ति॑तो॒ वरू᳚थमाद॒धर्ष॑ति||{9/22}{6.2.32.4}{8.27.9}{8.4.7.9}{360, 647, 6638} |
| अस्ति॒ हि वः॑ सजा॒त्यं᳚ रिशादसो॒ देवा᳚सो॒, अस्त्याप्य᳚म्|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} प्र णः॒ पूर्व॑स्मै सुवि॒ताय॑ वोचत म॒क्षू सु॒म्नाय॒ नव्य॑से||{10/22}{6.2.32.5}{8.27.10}{8.4.7.10}{361, 647, 6639} |
| इ॒दा हि व॒ उप॑स्तुतिमि॒दा वा॒मस्य॑ भ॒क्तये᳚|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} उप॑ वो विश्ववेदसो नम॒स्युराँ, असृ॒क्ष्यन्या᳚मिव||{11/22}{6.2.33.1}{8.27.11}{8.4.7.11}{362, 647, 6640} |
| उदु॒ ष्य वः॑ सवि॒ता सु॑प्रणीत॒यो ऽस्था᳚दू॒र्ध्वो वरे᳚ण्यः|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} नि द्वि॒पाद॒श्चतु॑ष्पादो, अ॒र्थिनो ऽवि॑श्रन् पतयि॒ष्णवः॑||{12/22}{6.2.33.2}{8.27.12}{8.4.7.12}{363, 647, 6641} |
| दे॒वंदे᳚वं॒ वोऽव॑से दे॒वंदे᳚वम॒भिष्ट॑ये|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} दे॒वंदे᳚वं हुवेम॒ वाज॑सातये गृ॒णन्तो᳚ दे॒व्या धि॒या||{13/22}{6.2.33.3}{8.27.13}{8.4.7.13}{364, 647, 6642} |
| दे॒वासो॒ हि ष्मा॒ मन॑वे॒ सम᳚न्यवो॒ विश्वे᳚ सा॒कं सरा᳚तयः|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} ते नो᳚ अ॒द्य ते, अ॑प॒रं तु॒चे तु नो॒ भव᳚न्तु वरिवो॒विदः॑||{14/22}{6.2.33.4}{8.27.14}{8.4.7.14}{365, 647, 6643} |
| प्र वः॑ शंसाम्यद्रुहः सं॒स्थ उप॑स्तुतीनाम्|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} न तं धू॒र्तिर्व॑रुण मित्र॒ मर्त्यं॒ यो वो॒ धाम॒भ्योऽवि॑धत्||{15/22}{6.2.33.5}{8.27.15}{8.4.7.15}{366, 647, 6644} |
| प्र स क्षयं᳚ तिरते॒ वि म॒हीरिषो॒ यो वो॒ वरा᳚य॒ दाश॑ति|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} प्र प्र॒जाभि॑र्जायते॒ धर्म॑ण॒स्पर्यरि॑ष्टः॒ सर्व॑ एधते||{16/22}{6.2.33.6}{8.27.16}{8.4.7.16}{367, 647, 6645} |
| ऋ॒ते स वि᳚न्दते यु॒धः सु॒गेभि᳚र्या॒त्यध्व॑नः|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} अ॒र्य॒मा मि॒त्रो वरु॑णः॒ सरा᳚तयो॒ यं त्राय᳚न्ते स॒जोष॑सः||{17/22}{6.2.34.1}{8.27.17}{8.4.7.17}{368, 647, 6646} |
| अज्रे᳚ चिदस्मै कृणुथा॒ न्यञ्च॑नं दु॒र्गे चि॒दा सु॑सर॒णम्|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} ए॒षा चि॑दस्माद॒शनिः॑ प॒रो नु सास्रे᳚धन्ती॒ वि न॑श्यतु||{18/22}{6.2.34.2}{8.27.18}{8.4.7.18}{369, 647, 6647} |
| यद॒द्य सूर्य॑ उद्य॒ति प्रिय॑क्षत्रा, ऋ॒तं द॒ध|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} यन्नि॒म्रुचि॑ प्र॒बुधि॑ विश्ववेदसो॒ यद् वा᳚ म॒ध्यंदि॑ने दि॒वः||{19/22}{6.2.34.3}{8.27.19}{8.4.7.19}{370, 647, 6648} |
| यद् वा᳚भिपि॒त्वे, अ॑सुरा, ऋ॒तं य॒ते छ॒र्दिर्ये॒म वि दा॒शुषे᳚|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} व॒यं तद् वो᳚ वसवो विश्ववेदस॒ उप॑ स्थेयाम॒ मध्य॒ आ||{20/22}{6.2.34.4}{8.27.20}{8.4.7.20}{371, 647, 6649} |
| यद॒द्य सूर॒ उदि॑ते॒ यन्म॒ध्यंदि॑न आ॒तुचि॑|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} वा॒मं ध॒त्थ मन॑वे विश्ववेदसो॒ जुह्वा᳚नाय॒ प्रचे᳚तसे||{21/22}{6.2.34.5}{8.27.21}{8.4.7.21}{372, 647, 6650} |
| व॒यं तद् वः॑ सम्राज॒ आ वृ॑णीमहे पु॒त्रो न ब॑हु॒पाय्य᳚म्|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} अ॒श्याम॒ तदा᳚दित्या॒ जुह्व॑तो ह॒विर्येन॒ वस्यो॒ऽनशा᳚महै||{22/22}{6.2.34.6}{8.27.22}{8.4.7.22}{373, 647, 6651} |
| [17] येत्रिंशतीति पंचर्चस्य सूक्तस्य वैवस्वतोमनुर्विश्वेदेवागायत्री चतुर्थीपुरउष्णिक् | |
| ये त्रिं॒शति॒ त्रय॑स्प॒रो दे॒वासो᳚ ब॒र्हिरास॑दन्|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | गायत्री} वि॒दन्नह॑ द्वि॒तास॑नन्||{1/5}{6.2.35.1}{8.28.1}{8.4.8.1}{374, 648, 6652} |
| वरु॑णो मि॒त्रो, अ᳚र्य॒मा स्मद्रा᳚तिषाचो, अ॒ग्नयः॑|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | गायत्री} पत्नी᳚वन्तो॒ वष॑ट्कृताः||{2/5}{6.2.35.2}{8.28.2}{8.4.8.2}{375, 648, 6653} |
| ते नो᳚ गो॒पा, अ॑पा॒च्यास्त उद॒क्त इ॒त्था न्य॑क्|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | गायत्री} पु॒रस्ता॒त् सर्व॑या वि॒शा||{3/5}{6.2.35.3}{8.28.3}{8.4.8.3}{376, 648, 6654} |
| यथा॒ वश᳚न्ति दे॒वास्तथेद॑स॒त् तदे᳚षां॒ नकि॒रा मि॑नत्|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | पुर उष्णिक्} अरा᳚वा च॒न मर्त्यः॑||{4/5}{6.2.35.4}{8.28.4}{8.4.8.4}{377, 648, 6655} |
| स॒प्ता॒नां स॒प्त ऋ॒ष्टयः॑ स॒प्त द्यु॒म्नान्ये᳚षाम्|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | गायत्री} स॒प्तो, अधि॒ श्रियो᳚ धिरे||{5/5}{6.2.35.5}{8.28.5}{8.4.8.5}{378, 648, 6656} |
| [18] बभ्रुरेकइति दशर्चस्य सूक्तस्य वैवस्वतो मनुर्विश्वेदेवाद्विपदा विराट् | (भेदपक्षे - सोमः १ अग्निः १ त्वष्टा १ इंद्रः १ रुद्रः १ पूषा १ विष्णुः १ अश्विनौ १ मित्रावरुणौ १ अश्विनौ १ एवंदश । अस्मिन्मारीचः कश्यपर्षिः पाक्षिकः) | |
| ब॒भ्रुरेको॒ विषु॑णः सू॒नरो॒ युवा॒ञ्ज्य᳚ङ्क्ते हिर॒ण्यय᳚म्||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{1/10}{6.2.36.1}{8.29.1}{8.4.9.1}{379, 649, 6657} |
| योनि॒मेक॒ आ स॑साद॒ द्योत॑नो॒ ऽन्तर्दे॒वेषु॒ मेधि॑रः||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{2/10}{6.2.36.2}{8.29.2}{8.4.9.2}{380, 649, 6658} |
| वाशी॒मेको᳚ बिभर्ति॒ हस्त॑ आय॒सीम॒न्तर्दे॒वेषु॒ निध्रु॑विः||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{3/10}{6.2.36.3}{8.29.3}{8.4.9.3}{381, 649, 6659} |
| वज्र॒मेको᳚ बिभर्ति॒ हस्त॒ आहि॑तं॒ तेन॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{4/10}{6.2.36.4}{8.29.4}{8.4.9.4}{382, 649, 6660} |
| ति॒ग्ममेको᳚ बिभर्ति॒ हस्त॒ आयु॑धं॒ शुचि॑रु॒ग्रो जला᳚षभेषजः||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{5/10}{6.2.36.5}{8.29.5}{8.4.9.5}{383, 649, 6661} |
| प॒थ एकः॑ पीपाय॒ तस्क॑रो यथाँ, ए॒ष वे᳚द निधी॒नाम्||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{6/10}{6.2.36.6}{8.29.6}{8.4.9.6}{384, 649, 6662} |
| त्रीण्येक॑ उरुगा॒यो वि च॑क्रमे॒ यत्र॑ दे॒वासो॒ मद᳚न्ति||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{7/10}{6.2.36.7}{8.29.7}{8.4.9.7}{385, 649, 6663} |
| विभि॒र्द्वा च॑रत॒ एक॑या स॒ह प्र प्र॑वा॒सेव॑ वसतः||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{8/10}{6.2.36.8}{8.29.8}{8.4.9.8}{386, 649, 6664} |
| सदो॒ द्वा च॑क्राते, उप॒मा दि॒वि स॒म्राजा᳚ स॒र्पिरा᳚सुती||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{9/10}{6.2.36.9}{8.29.9}{8.4.9.9}{387, 649, 6665} |
| अर्च᳚न्त॒ एके॒ महि॒ साम॑ मन्वत॒ तेन॒ सूर्य॑मरोचयन्||{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | द्विपदाविराट्}{10/10}{6.2.36.10}{8.29.10}{8.4.9.10}{388, 649, 6666} |
| [19] नहिवैति चतुरृचस्य सूक्तस्य वैवस्वतोमनुर्विश्वेदेवागायत्री पुरउष्णिग्बृहत्यनुष्टुभः | |
| न॒हि वो॒, अस्त्य॑र्भ॒को देवा᳚सो॒ न कु॑मार॒कः|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | गायत्री} विश्वे᳚ स॒तोम॑हान्त॒ इत्||{1/4}{6.2.37.1}{8.30.1}{8.4.10.1}{389, 650, 6667} |
| इति॑ स्तु॒तासो᳚ असथा रिशादसो॒ ये स्थ त्रय॑श्च त्रिं॒शच्च॑|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | पुर उष्णिक्} मनो᳚र्देवा यज्ञियासः||{2/4}{6.2.37.2}{8.30.2}{8.4.10.2}{390, 650, 6668} |
| ते न॑स्त्राध्वं॒ ते᳚ऽवत॒ त उ॑ नो॒, अधि॑ वोचत|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | बृहती} मा नः॑ प॒थः पित्र्या᳚न्मान॒वादधि॑ दू॒रं नै᳚ष्ट परा॒वतः॑||{3/4}{6.2.37.3}{8.30.3}{8.4.10.3}{391, 650, 6669} |
| ये दे᳚वास इ॒ह स्थन॒ विश्वे᳚ वैश्वान॒रा, उ॒त|{वैवस्वतोमनुः | विश्वदेवाः | अनुष्टुप्} अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ स॒प्रथो॒ गवेऽश्वा᳚य यच्छत||{4/4}{6.2.37.4}{8.30.4}{8.4.10.4}{392, 650, 6670} |
| [20] योयजातीत्यष्टादशर्चस्य सूक्तस्य वैवस्वतोमनुः यज्ञोदेवतातृतीयादिद्वयोर्यजमानः पंचम्यादीनांदंपती दशम्यादिनवानांदंपत्याशिषोगायत्री नवमीचतुर्दश्यावनुष्टुभौ दशमीपादनिचृदंत्याश्चतस्रः पंक्त्यः (प्रथमयोर्द्वयोरिंद्रो देवतेति केचित् दशम्या यजमानपत्न्याशीः ततोद्वयोः पूषा ततएकस्यामित्रार्यमवरुणाः ततएकस्याअग्निः अंत्यचतस्रणां यजमानइति शौनकाद्यभिप्रायेणकेचिदाहुः) | |
| यो यजा᳚ति॒ यजा᳚त॒ इत् सु॒नव॑च्च॒ पचा᳚ति च|{वैवस्वतोमनुः | यज्ञः यजमानश्च | गायत्री} ब्र॒ह्मेदिन्द्र॑स्य चाकनत्||{1/18}{6.2.38.1}{8.31.1}{8.5.1.1}{393, 651, 6671} |
| पु॒रो॒ळाशं॒ यो, अ॑स्मै॒ सोमं॒ रर॑त आ॒शिर᳚म्|{वैवस्वतोमनुः | यज्ञः यजमानश्च | गायत्री} पादित् तं श॒क्रो, अंह॑सः||{2/18}{6.2.38.2}{8.31.2}{8.5.1.2}{394, 651, 6672} |
| तस्य॑ द्यु॒माँ, अ॑स॒द् रथो᳚ दे॒वजू᳚तः॒ स शू᳚शुवत्|{वैवस्वतोमनुः | यज्ञः यजमानश्च | गायत्री} विश्वा᳚ व॒न्वन्न॑मि॒त्रिया᳚||{3/18}{6.2.38.3}{8.31.3}{8.5.1.3}{395, 651, 6673} |
| अस्य॑ प्र॒जाव॑ती गृ॒हे ऽस॑श्चन्ती दि॒वेदि॑वे|{वैवस्वतोमनुः | यज्ञः यजमानश्च | गायत्री} इळा᳚ धेनु॒मती᳚ दुहे||{4/18}{6.2.38.4}{8.31.4}{8.5.1.4}{396, 651, 6674} |
| या दम्प॑ती॒ सम॑नसा सुनु॒त आ च॒ धाव॑तः|{वैवस्वतोमनुः | दम्पती | गायत्री} देवा᳚सो॒ नित्य॑या॒शिरा᳚||{5/18}{6.2.38.5}{8.31.5}{8.5.1.5}{397, 651, 6675} |
| प्रति॑ प्राश॒व्याँ᳚, इतः स॒म्यञ्चा᳚ ब॒र्हिरा᳚शाते|{वैवस्वतोमनुः | दम्पती | गायत्री} न ता वाजे᳚षु वायतः||{6/18}{6.2.39.1}{8.31.6}{8.5.1.6}{398, 651, 6676} |
| न दे॒वाना॒मपि᳚ ह्नुतः सुम॒तिं न जु॑गुक्षतः|{वैवस्वतोमनुः | दम्पती | गायत्री} श्रवो᳚ बृ॒हद् वि॑वासतः||{7/18}{6.2.39.2}{8.31.7}{8.5.1.7}{399, 651, 6677} |
| पु॒त्रिणा॒ ता कु॑मा॒रिणा॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुतः|{वैवस्वतोमनुः | दम्पती | गायत्री} उ॒भा हिर᳚ण्यपेशसा||{8/18}{6.2.39.3}{8.31.8}{8.5.1.8}{400, 651, 6678} |
| वी॒तिहो᳚त्रा कृ॒तद्व॑सू दश॒स्यन्ता॒मृता᳚य॒ कम्|{वैवस्वतोमनुः | दम्पती | अनुष्टुप्} समूधो᳚ रोम॒शं ह॑तो दे॒वेषु॑ कृणुतो॒ दुवः॑||{9/18}{6.2.39.4}{8.31.9}{8.5.1.9}{401, 651, 6679} |
| आ शर्म॒ पर्व॑तानां वृणी॒महे᳚ न॒दीना᳚म्|{वैवस्वतोमनुः | दम्पत्याशिषः | गायत्री} आ विष्णोः᳚ सचा॒भुवः॑||{10/18}{6.2.39.5}{8.31.10}{8.5.1.10}{402, 651, 6680} |
| ऐतु॑ पू॒षा र॒यिर्भगः॑ स्व॒स्ति स᳚र्व॒धात॑मः|{वैवस्वतोमनुः | दम्पत्याशिषः | गायत्री} उ॒रुरध्वा᳚ स्व॒स्तये᳚||{11/18}{6.2.40.1}{8.31.11}{8.5.1.11}{403, 651, 6681} |
| अ॒रम॑तिरन॒र्वणो॒ विश्वो᳚ दे॒वस्य॒ मन॑सा|{वैवस्वतोमनुः | दम्पत्याशिषः | गायत्री} आ॒दि॒त्याना᳚मने॒ह इत्||{12/18}{6.2.40.2}{8.31.12}{8.5.1.12}{404, 651, 6682} |
| यथा᳚ नो मि॒त्रो, अ᳚र्य॒मा वरु॑णः॒ सन्ति॑ गो॒पाः|{वैवस्वतोमनुः | दम्पत्याशिषः | गायत्री} सु॒गा, ऋ॒तस्य॒ पन्थाः᳚||{13/18}{6.2.40.3}{8.31.13}{8.5.1.13}{405, 651, 6683} |
| अ॒ग्निं वः॑ पू॒र्व्यं गि॒रा दे॒वमी᳚ळे॒ वसू᳚नाम्|{वैवस्वतोमनुः | दम्पत्याशिषः | अनुष्टुप्} स॒प॒र्यन्तः॑ पुरुप्रि॒यं मि॒त्रं न क्षे᳚त्र॒साध॑सम्||{14/18}{6.2.40.4}{8.31.14}{8.5.1.14}{406, 651, 6684} |
| म॒क्षू दे॒वव॑तो॒ रथः॒ शूरो᳚ वा पृ॒त्सु कासु॑ चित्|{वैवस्वतोमनुः | दम्पत्याशिषः | पङ्क्तिः} दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत्||{15/18}{6.2.40.5}{8.31.15}{8.5.1.15}{407, 651, 6685} |
| न य॑जमान रिष्यसि॒ न सु᳚न्वान॒ न दे᳚वयो|{वैवस्वतोमनुः | दम्पत्याशिषः | पङ्क्तिः} दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत्||{16/18}{6.2.40.6}{8.31.16}{8.5.1.16}{408, 651, 6686} |
| नकि॒ष्टं कर्म॑णा नश॒न्न प्र यो᳚ष॒न्न यो᳚षति|{वैवस्वतोमनुः | दम्पत्याशिषः | पङ्क्तिः} दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत्||{17/18}{6.2.40.7}{8.31.17}{8.5.1.17}{409, 651, 6687} |
| अस॒दत्र॑ सु॒वीर्य॑मु॒त त्यदा॒श्वश्व्य᳚म्|{वैवस्वतोमनुः | दम्पत्याशिषः | पङ्क्तिः} दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत्||{18/18}{6.2.40.8}{8.31.18}{8.5.1.18}{410, 651, 6688} |
| [21] प्रकृतानीति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य काण्वोमेधातिथिरिंद्रोगायत्री | |
| प्र कृ॒तान्यृ॑जी॒षिणः॒ कण्वा॒, इन्द्र॑स्य॒ गाथ॑या|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} मदे॒ सोम॑स्य वोचत||{1/30}{6.3.1.1}{8.32.1}{8.5.2.1}{411, 652, 6689} |
| यः सृबि᳚न्द॒मन॑र्शनिं॒ पिप्रुं᳚ दा॒सम॑ही॒शुव᳚म्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} वधी᳚दु॒ग्रो रि॒णन्न॒पः||{2/30}{6.3.1.2}{8.32.2}{8.5.2.2}{412, 652, 6690} |
| न्यर्बु॑दस्य वि॒ष्टपं᳚ व॒र्ष्माणं᳚ बृह॒तस्ति॑र|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} कृ॒षे तदि᳚न्द्र॒ पौंस्य᳚म्||{3/30}{6.3.1.3}{8.32.3}{8.5.2.3}{413, 652, 6691} |
| प्रति॑ श्रु॒ताय॑ वो धृ॒षत् तूर्णा᳚शं॒ न गि॒रेरधि॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} हु॒वे सु॑शि॒प्रमू॒तये᳚||{4/30}{6.3.1.4}{8.32.4}{8.5.2.4}{414, 652, 6692} |
| स गोरश्व॑स्य॒ वि व्र॒जं म᳚न्दा॒नः सो॒म्येभ्यः॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} पुरं॒ न शू᳚र दर्षसि||{5/30}{6.3.1.5}{8.32.5}{8.5.2.5}{415, 652, 6693} |
| यदि॑ मे रा॒रणः॑ सु॒त उ॒क्थे वा॒ दध॑से॒ चनः॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} आ॒रादुप॑ स्व॒धा ग॑हि||{6/30}{6.3.2.1}{8.32.6}{8.5.2.6}{416, 652, 6694} |
| व॒यं घा᳚ ते॒, अपि॑ ष्मसि स्तो॒तार॑ इन्द्र गिर्वणः|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} त्वं नो᳚ जिन्व सोमपाः||{7/30}{6.3.2.2}{8.32.7}{8.5.2.7}{417, 652, 6695} |
| उ॒त नः॑ पि॒तुमा भ॑र संररा॒णो, अवि॑क्षितम्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} मघ॑व॒न् भूरि॑ ते॒ वसु॑||{8/30}{6.3.2.3}{8.32.8}{8.5.2.8}{418, 652, 6696} |
| उ॒त नो॒ गोम॑तस्कृधि॒ हिर᳚ण्यवतो, अ॒श्विनः॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} इळा᳚भिः॒ सं र॑भेमहि||{9/30}{6.3.2.4}{8.32.9}{8.5.2.9}{419, 652, 6697} |
| बृ॒बदु॑क्थं हवामहे सृ॒प्रक॑रस्नमू॒तये᳚|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} साधु॑ कृ॒ण्वन्त॒मव॑से||{10/30}{6.3.2.5}{8.32.10}{8.5.2.10}{420, 652, 6698} |
| यः सं॒स्थे चि॑च्छ॒तक्र॑तु॒रादीं᳚ कृ॒णोति॑ वृत्र॒हा|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} ज॒रि॒तृभ्यः॑ पुरू॒वसुः॑||{11/30}{6.3.3.1}{8.32.11}{8.5.2.11}{421, 652, 6699} |
| स नः॑ श॒क्रश्चि॒दा श॑क॒द् दान॑वाँ, अन्तराभ॒रः|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रो॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभिः॑||{12/30}{6.3.3.2}{8.32.12}{8.5.2.12}{422, 652, 6700} |
| यो रा॒यो॒३॑(ओ॒)ऽवनि᳚र्म॒हान् त्सु॑पा॒रः सु᳚न्व॒तः सखा᳚|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} तमिन्द्र॑म॒भि गा᳚यत||{13/30}{6.3.3.3}{8.32.13}{8.5.2.13}{423, 652, 6701} |
| आ॒य॒न्तारं॒ महि॑ स्थि॒रं पृत॑नासु श्रवो॒जित᳚म्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} भूरे॒रीशा᳚न॒मोज॑सा||{14/30}{6.3.3.4}{8.32.14}{8.5.2.14}{424, 652, 6702} |
| नकि॑रस्य॒ शची᳚नां निय॒न्ता सू॒नृता᳚नाम्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} नकि᳚र्व॒क्ता न दा॒दिति॑||{15/30}{6.3.3.5}{8.32.15}{8.5.2.15}{425, 652, 6703} |
| न नू॒नं ब्र॒ह्मणा᳚मृ॒णं प्रा᳚शू॒नाम॑स्ति सुन्व॒ताम्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} न सोमो᳚ अप्र॒ता प॑पे||{16/30}{6.3.4.1}{8.32.16}{8.5.2.16}{426, 652, 6704} |
| पन्य॒ इदुप॑ गायत॒ पन्य॑ उ॒क्थानि॑ शंसत|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} ब्रह्मा᳚ कृणोत॒ पन्य॒ इत्||{17/30}{6.3.4.2}{8.32.17}{8.5.2.17}{427, 652, 6705} |
| पन्य॒ आ द॑र्दिरच्छ॒ता स॒हस्रा᳚ वा॒ज्यवृ॑तः|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रो॒ यो यज्व॑नो वृ॒धः||{18/30}{6.3.4.3}{8.32.18}{8.5.2.18}{428, 652, 6706} |
| वि षू च॑र स्व॒धा, अनु॑ कृष्टी॒नामन्वा॒हुवः॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्र॒ पिब॑ सु॒ताना᳚म्||{19/30}{6.3.4.4}{8.32.19}{8.5.2.19}{429, 652, 6707} |
| पिब॒ स्वधै᳚नवानामु॒त यस्तुग्र्ये॒ सचा᳚|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} उ॒तायमि᳚न्द्र॒ यस्तव॑||{20/30}{6.3.4.5}{8.32.20}{8.5.2.20}{430, 652, 6708} |
| अती᳚हि मन्युषा॒विणं᳚ सुषु॒वांस॑मु॒पार॑णे|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} इ॒मं रा॒तं सु॒तं पि॑ब||{21/30}{6.3.5.1}{8.32.21}{8.5.2.21}{431, 652, 6709} |
| इ॒हि ति॒स्रः प॑रा॒वत॑ इ॒हि पञ्च॒ जनाँ॒, अति॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} धेना᳚ इन्द्राव॒चाक॑शत्||{22/30}{6.3.5.2}{8.32.22}{8.5.2.22}{432, 652, 6710} |
| सूर्यो᳚ र॒श्मिं यथा᳚ सृ॒जा ऽऽ त्वा᳚ यच्छन्तु मे॒ गिरः॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} नि॒म्नमापो॒ न स॒ध्र्य॑क्||{23/30}{6.3.5.3}{8.32.23}{8.5.2.23}{433, 652, 6711} |
| अध्व᳚र्य॒वा तु हि षि॒ञ्च सोमं᳚ वी॒राय॑ शि॒प्रिणे᳚|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} भरा᳚ सु॒तस्य॑ पी॒तये᳚||{24/30}{6.3.5.4}{8.32.24}{8.5.2.24}{434, 652, 6712} |
| य उ॒द्नः फ॑लि॒गं भि॒नन्न्य१॑(अ॒)क्सिन्धूँ᳚र॒वासृ॑जत्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} यो गोषु॑ प॒क्वं धा॒रय॑त्||{25/30}{6.3.5.5}{8.32.25}{8.5.2.25}{435, 652, 6713} |
| अह᳚न् वृ॒त्रमृची᳚षम और्णवा॒भम॑ही॒शुव᳚म्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} हि॒मेना᳚विध्य॒दर्बु॑दम्||{26/30}{6.3.6.1}{8.32.26}{8.5.2.26}{436, 652, 6714} |
| प्र व॑ उ॒ग्राय॑ नि॒ष्टुरे ऽषा᳚ळ्हाय प्रस॒क्षिणे᳚|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} दे॒वत्तं॒ ब्रह्म॑ गायत||{27/30}{6.3.6.2}{8.32.27}{8.5.2.27}{437, 652, 6715} |
| यो विश्वा᳚न्य॒भि व्र॒ता सोम॑स्य॒ मदे॒, अन्ध॑सः|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रो᳚ दे॒वेषु॒ चेत॑ति||{28/30}{6.3.6.3}{8.32.28}{8.5.2.28}{438, 652, 6716} |
| इ॒ह त्या स॑ध॒माद्या॒ हरी॒ हिर᳚ण्यकेश्या|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} वो॒ळ्हाम॒भि प्रयो᳚ हि॒तम्||{29/30}{6.3.6.4}{8.32.29}{8.5.2.29}{439, 652, 6717} |
| अ॒र्वाञ्चं᳚ त्वा पुरुष्टुत प्रि॒यमे᳚धस्तुता॒ हरी᳚|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} सो॒म॒पेया᳚य वक्षतः||{30/30}{6.3.6.5}{8.32.30}{8.5.2.30}{440, 652, 6718} |
| [22] वयंघेत्येकोनविंशत्यृचस्य सूक्तस्य काण्वोमेध्यातिथिरिंद्रो बृहती षोडश्याद्यास्तिस्रो गायत्र्योन्त्यानुष्टुप् | |
| व॒यं घ॑ त्वा सु॒ताव᳚न्त॒ आपो॒ न वृ॒क्तब᳚र्हिषः|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} प॒वित्र॑स्य प्र॒स्रव॑णेषु वृत्रह॒न् परि॑ स्तो॒तार॑ आसते||{1/19}{6.3.7.1}{8.33.1}{8.5.3.1}{441, 653, 6719} |
| स्वर᳚न्ति त्वा सु॒ते नरो॒ वसो᳚ निरे॒क उ॒क्थिनः॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} क॒दा सु॒तं तृ॑षा॒ण ओक॒ आ ग॑म॒ इन्द्र॑ स्व॒ब्दीव॒ वंस॑गः||{2/19}{6.3.7.2}{8.33.2}{8.5.3.2}{442, 653, 6720} |
| कण्वे᳚भिर्धृष्ण॒वा धृ॒षद् वाजं᳚ दर्षि सह॒स्रिण᳚म्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} पि॒शङ्ग॑रूपं मघवन् विचर्षणे म॒क्षू गोम᳚न्तमीमहे||{3/19}{6.3.7.3}{8.33.3}{8.5.3.3}{443, 653, 6721} |
| पा॒हि गायान्ध॑सो॒ मद॒ इन्द्रा᳚य मेध्यातिथे|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} यः सम्मि॑श्लो॒ हर्यो॒र्यः सु॒ते सचा᳚ व॒ज्री रथो᳚ हिर॒ण्ययः॑||{4/19}{6.3.7.4}{8.33.4}{8.5.3.4}{444, 653, 6722} |
| यः सु॑ष॒व्यः सु॒दक्षि॑ण इ॒नो यः सु॒क्रतु॑र्गृ॒णे|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} य आ᳚क॒रः स॒हस्रा॒ यः श॒ताम॑घ॒ इन्द्रो॒ यः पू॒र्भिदा᳚रि॒तः||{5/19}{6.3.7.5}{8.33.5}{8.5.3.5}{445, 653, 6723} |
| यो धृ॑षि॒तो योऽवृ॑तो॒ यो, अस्ति॒ श्मश्रु॑षु श्रि॒तः|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} विभू᳚तद्युम्न॒श्च्यव॑नः पुरुष्टु॒तः क्रत्वा॒ गौरि॑व शाकि॒नः||{6/19}{6.3.8.1}{8.33.6}{8.5.3.6}{446, 653, 6724} |
| क ईं᳚ वेद सु॒ते सचा॒ पिब᳚न्तं॒ कद् वयो᳚ दधे|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} अ॒यं यः पुरो᳚ विभि॒नत्त्योज॑सा मन्दा॒नः शि॒प्र्यन्ध॑सः||{7/19}{6.3.8.2}{8.33.7}{8.5.3.7}{447, 653, 6725} |
| दा॒ना मृ॒गो न वा᳚र॒णः पु॑रु॒त्रा च॒रथं᳚ दधे|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} नकि॑ष्ट्वा॒ नि य॑म॒दा सु॒ते ग॑मो म॒हाँश्च॑र॒स्योज॑सा||{8/19}{6.3.8.3}{8.33.8}{8.5.3.8}{448, 653, 6726} |
| य उ॒ग्रः सन्ननि॑ष्टृतः स्थि॒रो रणा᳚य॒ संस्कृ॑तः|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} यदि॑ स्तो॒तुर्म॒घवा᳚ शृ॒णव॒द्धवं॒ नेन्द्रो᳚ योष॒त्या ग॑मत्||{9/19}{6.3.8.4}{8.33.9}{8.5.3.9}{449, 653, 6727} |
| स॒त्यमि॒त्था वृषेद॑सि॒ वृष॑जूति॒र्नोऽवृ॑तः|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} वृषा॒ ह्यु॑ग्र शृण्वि॒षे प॑रा॒वति॒ वृषो᳚ अर्वा॒वति॑ श्रु॒तः||{10/19}{6.3.8.5}{8.33.10}{8.5.3.10}{450, 653, 6728} |
| वृष॑णस्ते, अ॒भीश॑वो॒ वृषा॒ कशा᳚ हिर॒ण्ययी᳚|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} वृषा॒ रथो᳚ मघव॒न् वृष॑णा॒ हरी॒ वृषा॒ त्वं श॑तक्रतो||{11/19}{6.3.9.1}{8.33.11}{8.5.3.11}{451, 653, 6729} |
| वृषा॒ सोता᳚ सुनोतु ते॒ वृष᳚न्नृजीपि॒न्ना भ॑र|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} वृषा᳚ दधन्वे॒ वृष॑णं न॒दीष्वा तुभ्यं᳚ स्थातर्हरीणाम्||{12/19}{6.3.9.2}{8.33.12}{8.5.3.12}{452, 653, 6730} |
| एन्द्र॑ याहि पी॒तये॒ मधु॑ शविष्ठ सो॒म्यम्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} नायमच्छा᳚ म॒घवा᳚ शृ॒णव॒द् गिरो॒ ब्रह्मो॒क्था च॑ सु॒क्रतुः॑||{13/19}{6.3.9.3}{8.33.13}{8.5.3.13}{453, 653, 6731} |
| वह᳚न्तु त्वा रथे॒ष्ठामा हर॑यो रथ॒युजः॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} ति॒रश्चि॑द॒र्यं सव॑नानि वृत्रहन्न॒न्येषां॒ या श॑तक्रतो||{14/19}{6.3.9.4}{8.33.14}{8.5.3.14}{454, 653, 6732} |
| अ॒स्माक॑म॒द्यान्त॑मं॒ स्तोमं᳚ धिष्व महामह|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | बृहती} अ॒स्माकं᳚ ते॒ सव॑ना सन्तु॒ शंत॑मा॒ मदा᳚य द्युक्ष सोमपाः||{15/19}{6.3.9.5}{8.33.15}{8.5.3.15}{455, 653, 6733} |
| न॒हि षस्तव॒ नो मम॑ शा॒स्त्रे, अ॒न्यस्य॒ रण्य॑ति|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} यो, अ॒स्मान् वी॒र आन॑यत्||{16/19}{6.3.10.1}{8.33.16}{8.5.3.16}{456, 653, 6734} |
| इन्द्र॑श्चिद् घा॒ तद॑ब्रवीत् स्त्रि॒या, अ॑शा॒स्यं मनः॑|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} उ॒तो, अह॒ क्रतुं᳚ र॒घुम्||{17/19}{6.3.10.2}{8.33.17}{8.5.3.17}{457, 653, 6735} |
| सप्ती᳚ चिद् घा मद॒च्युता᳚ मिथु॒ना व॑हतो॒ रथ᳚म्|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | गायत्री} ए॒वेद् धूर्वृष्ण॒ उत्त॑रा||{18/19}{6.3.10.3}{8.33.18}{8.5.3.18}{458, 653, 6736} |
| अ॒धः प॑श्यस्व॒ मोपरि॑ संत॒रां पा᳚द॒कौ ह॑र|{काण्वो मेधातिथि | इन्द्रः | अनुष्टुप्} मा ते᳚ कशप्ल॒कौ दृ॑श॒न् त्स्त्री हि ब्र॒ह्मा ब॒भूवि॑थ||{19/19}{6.3.10.4}{8.33.19}{8.5.3.19}{459, 653, 6737} |
| [23] एंद्रयाहीत्यष्टादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वोनीपातिथिरिंद्रः आयदिंद्रइत्यादितिसृणामांगिरसाः सहस्रवसुरोचिषऋषयइंद्रोऽनुष्टुबन्त्यास्तिस्रोगायत्र्यः | |
| एन्द्र॑ याहि॒ हरि॑भि॒रुप॒ कण्व॑स्य सुष्टु॒तिम्|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{1/18}{6.3.11.1}{8.34.1}{8.5.4.1}{460, 654, 6738} |
| आ त्वा॒ ग्रावा॒ वद᳚न्नि॒ह सो॒मी घोषे᳚ण यच्छतु|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{2/18}{6.3.11.2}{8.34.2}{8.5.4.2}{461, 654, 6739} |
| अत्रा॒ वि ने॒मिरे᳚षा॒मुरां॒ न धू᳚नुते॒ वृकः॑|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{3/18}{6.3.11.3}{8.34.3}{8.5.4.3}{462, 654, 6740} |
| आ त्वा॒ कण्वा᳚ इ॒हाव॑से॒ हव᳚न्ते॒ वाज॑सातये|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{4/18}{6.3.11.4}{8.34.4}{8.5.4.4}{463, 654, 6741} |
| दधा᳚मि ते सु॒तानां॒ वृष्णे॒ न पू᳚र्व॒पाय्य᳚म्|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{5/18}{6.3.11.5}{8.34.5}{8.5.4.5}{464, 654, 6742} |
| स्मत्पु॑रंधिर्न॒ आ ग॑हि वि॒श्वतो᳚धीर्न ऊ॒तये᳚|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{6/18}{6.3.12.1}{8.34.6}{8.5.4.6}{465, 654, 6743} |
| आ नो᳚ याहि महेमते॒ सह॑स्रोते॒ शता᳚मघ|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{7/18}{6.3.12.2}{8.34.7}{8.5.4.7}{466, 654, 6744} |
| आ त्वा॒ होता॒ मनु᳚र्हितो देव॒त्रा व॑क्ष॒दीड्यः॑|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{8/18}{6.3.12.3}{8.34.8}{8.5.4.8}{467, 654, 6745} |
| आ त्वा᳚ मद॒च्युता॒ हरी᳚ श्ये॒नं प॒क्षेव॑ वक्षतः|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{9/18}{6.3.12.4}{8.34.9}{8.5.4.9}{468, 654, 6746} |
| आ या᳚ह्य॒र्य आ परि॒ स्वाहा॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{10/18}{6.3.12.5}{8.34.10}{8.5.4.10}{469, 654, 6747} |
| आ नो᳚ या॒ह्युप॑श्रुत्यु॒क्थेषु॑ रणया, इ॒ह|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{11/18}{6.3.13.1}{8.34.11}{8.5.4.11}{470, 654, 6748} |
| सरू᳚पै॒रा सु नो᳚ गहि॒ सम्भृ॑तैः॒ सम्भृ॑ताश्वः|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{12/18}{6.3.13.2}{8.34.12}{8.5.4.12}{471, 654, 6749} |
| आ या᳚हि॒ पर्व॑तेभ्यः समु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टपः॑|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{13/18}{6.3.13.3}{8.34.13}{8.5.4.13}{472, 654, 6750} |
| आ नो॒ गव्या॒न्यश्व्या᳚ स॒हस्रा᳚ शूर दर्दृहि|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{14/18}{6.3.13.4}{8.34.14}{8.5.4.14}{473, 654, 6751} |
| आ नः॑ सहस्र॒शो भ॑रा॒ऽयुता᳚नि श॒तानि॑ च|{काण्वो नीपातिथिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दि॒वो, अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं᳚ य॒य दि॑वावसो||{15/18}{6.3.13.5}{8.34.15}{8.5.4.15}{474, 654, 6752} |
| आ यदिन्द्र॑श्च॒ दद्व॑हे स॒हस्रं॒ वसु॑रोचिषः|{आंगिरसाः सहस्रवसुरोचिष | इन्द्रः | गायत्री} ओजि॑ष्ठ॒मश्व्यं᳚ प॒शुम्||{16/18}{6.3.13.6}{8.34.16}{8.5.4.16}{475, 654, 6753} |
| य ऋ॒ज्रा वात॑रंहसो ऽरु॒षासो᳚ रघु॒ष्यदः॑|{आंगिरसाः सहस्रवसुरोचिष | इन्द्रः | गायत्री} भ्राज᳚न्ते॒ सूर्या᳚ इव||{17/18}{6.3.13.7}{8.34.17}{8.5.4.17}{476, 654, 6754} |
| पारा᳚वतस्य रा॒तिषु॑ द्र॒वच्च॑क्रेष्वा॒शुषु॑|{आंगिरसाः सहस्रवसुरोचिष | इन्द्रः | गायत्री} तिष्ठं॒ वन॑स्य॒ मध्य॒ आ||{18/18}{6.3.13.8}{8.34.18}{8.5.4.18}{477, 654, 6755} |
| [24] अग्निर्नेन्द्रेणेति चतुर्विंशत्यृचस्य सूक्तस्यात्रेयः श्यावाश्वोश्विनावुपरिष्टाज्ज्योतिरंत्यास्तिस्रः क्रमेणपंक्तिमहाबृहतीपंक्तयः | |
| अ॒ग्निनेन्द्रे᳚ण॒ वरु॑णेन॒ विष्णु॑ना ऽऽदि॒त्यै रु॒द्रैर्वसु॑भिः सचा॒भुवा᳚|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण च॒ सोमं᳚ पिबतमश्विना||{1/24}{6.3.14.1}{8.35.1}{8.5.5.1}{478, 655, 6756} |
| विश्वा᳚भिर्धी॒भिर्भुव॑नेन वाजिना दि॒वा पृ॑थि॒व्याद्रि॑भिः सचा॒भुवा᳚|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण च॒ सोमं᳚ पिबतमश्विना||{2/24}{6.3.14.2}{8.35.2}{8.5.5.2}{479, 655, 6757} |
| विश्वै᳚र्दे॒वैस्त्रि॒भिरे᳚काद॒शैरि॒हाऽद्भिर्म॒रुद्भि॒र्भृगु॑भिः सचा॒भुवा᳚|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण च॒ सोमं᳚ पिबतमश्विना||{3/24}{6.3.14.3}{8.35.3}{8.5.5.3}{480, 655, 6758} |
| जु॒षेथां᳚ य॒ज्ञं बोध॑तं॒ हव॑स्य मे॒ विश्वे॒ह दे᳚वौ॒ सव॒नाव॑ गच्छतम्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण॒ चेषं᳚ नो वोळ्हमश्विना||{4/24}{6.3.14.4}{8.35.4}{8.5.5.4}{481, 655, 6759} |
| स्तोमं᳚ जुषेथां युव॒शेव॑ क॒न्यनां॒ विश्वे॒ह दे᳚वौ॒ सव॒नाव॑ गच्छतम्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण॒ चेषं᳚ नो वोळ्हमश्विना||{5/24}{6.3.14.5}{8.35.5}{8.5.5.5}{482, 655, 6760} |
| गिरो᳚ जुषेथामध्व॒रं जु॑षेथां॒ विश्वे॒ह दे᳚वौ॒ सव॒नाव॑ गच्छतम्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण॒ चेषं᳚ नो वोळ्हमश्विना||{6/24}{6.3.14.6}{8.35.6}{8.5.5.6}{483, 655, 6761} |
| हा॒रि॒द्र॒वेव॑ पतथो॒ वनेदुप॒ सोमं᳚ सु॒तं म॑हि॒षेवाव॑ गच्छथः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण च॒ त्रिर्व॒र्तिर्या᳚तमश्विना||{7/24}{6.3.15.1}{8.35.7}{8.5.5.7}{484, 655, 6762} |
| हं॒सावि॑व पतथो, अध्व॒गावि॑व॒ सोमं᳚ सु॒तं म॑हि॒षेवाव॑ गच्छथः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण च॒ त्रिर्व॒र्तिर्या᳚तमश्विना||{8/24}{6.3.15.2}{8.35.8}{8.5.5.8}{485, 655, 6763} |
| श्ये॒नावि॑व पतथो ह॒व्यदा᳚तये॒ सोमं᳚ सु॒तं म॑हि॒षेवाव॑ गच्छथः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण च॒ त्रिर्व॒र्तिर्या᳚तमश्विना||{9/24}{6.3.15.3}{8.35.9}{8.5.5.9}{486, 655, 6764} |
| पिब॑तं च तृप्णु॒तं चा च॑ गच्छतं प्र॒जां च॑ ध॒त्तं द्रवि॑णं च धत्तम्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण॒ चोर्जं᳚ नो धत्तमश्विना||{10/24}{6.3.15.4}{8.35.10}{8.5.5.10}{487, 655, 6765} |
| जय॑तं च॒ प्र स्तु॑तं च॒ प्र चा᳚वतं प्र॒जां च॑ ध॒त्तं द्रवि॑णं च धत्तम्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण॒ चोर्जं᳚ नो धत्तमश्विना||{11/24}{6.3.15.5}{8.35.11}{8.5.5.11}{488, 655, 6766} |
| ह॒तं च॒ शत्रू॒न् यत॑तं च मि॒त्रिणः॑ प्र॒जां च॑ ध॒त्तं द्रवि॑णं च धत्तम्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण॒ चोर्जं᳚ नो धत्तमश्विना||{12/24}{6.3.15.6}{8.35.12}{8.5.5.12}{489, 655, 6767} |
| मि॒त्रावरु॑णवन्ता, उ॒त धर्म॑वन्ता म॒रुत्व᳚न्ता जरि॒तुर्ग॑च्छथो॒ हव᳚म्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण चाऽऽदि॒त्यैर्या᳚तमश्विना||{13/24}{6.3.16.1}{8.35.13}{8.5.5.13}{490, 655, 6768} |
| अङ्गि॑रस्वन्ता, उ॒त विष्णु॑वन्ता म॒रुत्व᳚न्ता जरि॒तुर्ग॑च्छथो॒ हव᳚म्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण चाऽऽदि॒त्यैर्या᳚तमश्विना||{14/24}{6.3.16.2}{8.35.14}{8.5.5.14}{491, 655, 6769} |
| ऋ॒भु॒मन्ता᳚ वृषणा॒ वाज॑वन्ता म॒रुत्व᳚न्ता जरि॒तुर्ग॑च्छथो॒ हव᳚म्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण चाऽऽदि॒त्यैर्या᳚तमश्विना||{15/24}{6.3.16.3}{8.35.15}{8.5.5.15}{492, 655, 6770} |
| ब्रह्म॑ जिन्वतमु॒त जि᳚न्वतं॒ धियो᳚ ह॒तं रक्षां᳚सि॒ सेध॑त॒ममी᳚वाः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण च॒ सोमं᳚ सुन्व॒तो, अ॑श्विना||{16/24}{6.3.16.4}{8.35.16}{8.5.5.16}{493, 655, 6771} |
| क्ष॒त्रं जि᳚न्वतमु॒त जि᳚न्वतं॒ नॄन् ह॒तं रक्षां᳚सि॒ सेध॑त॒ममी᳚वाः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण च॒ सोमं᳚ सुन्व॒तो, अ॑श्विना||{17/24}{6.3.16.5}{8.35.17}{8.5.5.17}{494, 655, 6772} |
| धे॒नूर्जि᳚न्वतमु॒त जि᳚न्वतं॒ विशो᳚ ह॒तं रक्षां᳚सि॒ सेध॑त॒ममी᳚वाः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण च॒ सोमं᳚ सुन्व॒तो, अ॑श्विना||{18/24}{6.3.16.6}{8.35.18}{8.5.5.18}{495, 655, 6773} |
| अत्रे᳚रिव शृणुतं पू॒र्व्यस्तु॑तिं श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तो म॑दच्युता|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण॒ चाऽश्वि॑ना ति॒रो,अ᳚ह्न्यम्||{19/24}{6.3.17.1}{8.35.19}{8.5.5.19}{496, 655, 6774} |
| सर्गाँ᳚, इव सृजतं सुष्टु॒तीरुप॑ श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तो म॑दच्युता|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण॒ चाऽश्वि॑ना ति॒रो,अ᳚ह्न्यम्||{20/24}{6.3.17.2}{8.35.20}{8.5.5.20}{497, 655, 6775} |
| र॒श्मीँरि॑व यच्छतमध्व॒राँ, उप॑ श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तो म॑दच्युता|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | उपरिष्टाज्ज्योति} स॒जोष॑सा, उ॒षसा॒ सूर्ये᳚ण॒ चाऽश्वि॑ना ति॒रो,अ᳚ह्न्यम्||{21/24}{6.3.17.3}{8.35.21}{8.5.5.21}{498, 655, 6776} |
| अ॒र्वाग् रथं॒ नि य॑च्छतं॒ पिब॑तं सो॒म्यं मधु॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | पङ्क्तिः} आ या᳚तमश्वि॒ना ग॑तमव॒स्युर्वा᳚म॒हं हु॑वे ध॒त्तं रत्ना᳚नि दा॒शुषे᳚||{22/24}{6.3.17.4}{8.35.22}{8.5.5.22}{499, 655, 6777} |
| न॒मो॒वा॒के प्रस्थि॑ते, अध्व॒रे न॑रा वि॒वक्ष॑णस्य पी॒तये᳚|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | महाबृहती} आ या᳚तमश्वि॒ना ग॑तमव॒स्युर्वा᳚म॒हं हु॑वे ध॒त्तं रत्ना᳚नि दा॒शुषे᳚||{23/24}{6.3.17.5}{8.35.23}{8.5.5.23}{500, 655, 6778} |
| स्वाहा᳚कृतस्य तृम्पतं सु॒तस्य॑ देवा॒वन्ध॑सः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | अश्विनौ | पङ्क्तिः} आ या᳚तमश्वि॒ना ग॑तमव॒स्युर्वा᳚म॒हं हु॑वे ध॒त्तं रत्ना᳚नि दा॒शुषे᳚||{24/24}{6.3.17.6}{8.35.24}{8.5.5.24}{501, 655, 6779} |
| [25] अवितासीति सप्तर्चस्य सूक्तस्यात्रेयः श्यावाश्वइंद्रः शक्वर्यंत्या महापंक्तिः | |
| अ॒वि॒तासि॑ सुन्व॒तो वृ॒क्तब᳚र्हिषः॒ पिबा॒ सोमं॒ मदा᳚य॒ कं श॑तक्रतो|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | शक्वरी} यं ते᳚ भा॒गमधा᳚रय॒न् विश्वाः᳚ सेहा॒नः पृत॑ना, उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ᳚, इन्द्र सत्पते||{1/7}{6.3.18.1}{8.36.1}{8.5.6.1}{502, 656, 6780} |
| प्राव॑ स्तो॒तारं᳚ मघव॒न्नव॒ त्वां पिबा॒ सोमं॒ मदा᳚य॒ कं श॑तक्रतो|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | शक्वरी} यं ते᳚ भा॒गमधा᳚रय॒न् विश्वाः᳚ सेहा॒नः पृत॑ना, उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ᳚, इन्द्र सत्पते||{2/7}{6.3.18.2}{8.36.2}{8.5.6.2}{503, 656, 6781} |
| ऊ॒र्जा दे॒वाँ, अव॒स्योज॑सा॒ त्वां पिबा॒ सोमं॒ मदा᳚य॒ कं श॑तक्रतो|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | शक्वरी} यं ते᳚ भा॒गमधा᳚रय॒न् विश्वाः᳚ सेहा॒नः पृत॑ना, उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ᳚, इन्द्र सत्पते||{3/7}{6.3.18.3}{8.36.3}{8.5.6.3}{504, 656, 6782} |
| ज॒नि॒ता दि॒वो ज॑नि॒ता पृ॑थि॒व्याः पिबा॒ सोमं॒ मदा᳚य॒ कं श॑तक्रतो|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | शक्वरी} यं ते᳚ भा॒गमधा᳚रय॒न् विश्वाः᳚ सेहा॒नः पृत॑ना, उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ᳚, इन्द्र सत्पते||{4/7}{6.3.18.4}{8.36.4}{8.5.6.4}{505, 656, 6783} |
| ज॒नि॒ताश्वा᳚नां जनि॒ता गवा᳚मसि॒ पिबा॒ सोमं॒ मदा᳚य॒ कं श॑तक्रतो|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | शक्वरी} यं ते᳚ भा॒गमधा᳚रय॒न् विश्वाः᳚ सेहा॒नः पृत॑ना, उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ᳚, इन्द्र सत्पते||{5/7}{6.3.18.5}{8.36.5}{8.5.6.5}{506, 656, 6784} |
| अत्री᳚णां॒ स्तोम॑मद्रिवो म॒हस्कृ॑धि॒ पिबा॒ सोमं॒ मदा᳚य॒ कं श॑तक्रतो|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | शक्वरी} यं ते᳚ भा॒गमधा᳚रय॒न् विश्वाः᳚ सेहा॒नः पृत॑ना, उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ᳚, इन्द्र सत्पते||{6/7}{6.3.18.6}{8.36.6}{8.5.6.6}{507, 656, 6785} |
| श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तस्तथा᳚ शृणु॒ यथाशृ॑णो॒रत्रेः॒ कर्मा᳚णि कृण्व॒तः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | महापङ्क्तिः} प्र त्र॒सद॑स्युमाविथ॒ त्वमेक॒ इन्नृ॒षाह्य॒ इन्द्र॒ ब्रह्मा᳚णि व॒र्धय॑न्||{7/7}{6.3.18.7}{8.36.7}{8.5.6.7}{508, 656, 6786} |
| [26] प्रेदमिति सप्तर्चस्य सूक्तस्यात्रेयः श्यावाश्वइंद्रोमहापंक्तिराद्यातिजगती | |
| प्रेदं ब्रह्म॑ वृत्र॒तूर्ये᳚ष्वाविथ॒ प्र सु᳚न्व॒तः श॑चीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभिः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | अतिजगती} माध्यं᳚दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः||{1/7}{6.3.19.1}{8.37.1}{8.5.7.1}{509, 657, 6787} |
| से॒हा॒न उ॑ग्र॒ पृत॑ना, अ॒भि द्रुहः॑ शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभिः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | महापङ्क्तिः} माध्यं᳚दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः||{2/7}{6.3.19.2}{8.37.2}{8.5.7.2}{510, 657, 6788} |
| ए॒क॒राळ॒स्य भुव॑नस्य राजसि शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभिः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | महापङ्क्तिः} माध्यं᳚दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः||{3/7}{6.3.19.3}{8.37.3}{8.5.7.3}{511, 657, 6789} |
| स॒स्थावा᳚ना यवयसि॒ त्वमेक॒ इच्छ॑चीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभिः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | महापङ्क्तिः} माध्यं᳚दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः||{4/7}{6.3.19.4}{8.37.4}{8.5.7.4}{512, 657, 6790} |
| क्षेम॑स्य च प्र॒युज॑श्च॒ त्वमी᳚शिषे शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभिः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | महापङ्क्तिः} माध्यं᳚दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः||{5/7}{6.3.19.5}{8.37.5}{8.5.7.5}{513, 657, 6791} |
| क्ष॒त्राय॑ त्व॒मव॑सि॒ न त्व॑माविथ शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभिः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | महापङ्क्तिः} माध्यं᳚दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः||{6/7}{6.3.19.6}{8.37.6}{8.5.7.6}{514, 657, 6792} |
| श्या॒वाश्व॑स्य॒ रेभ॑त॒स्तथा᳚ शृणु॒ यथाशृ॑णो॒रत्रेः॒ कर्मा᳚णि कृण्व॒तः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्रः | महापङ्क्तिः} प्र त्र॒सद॑स्युमाविथ॒ त्वमेक॒ इन्नृ॒षाह्य॒ इन्द्र॑ क्ष॒त्राणि॑ व॒र्धय॑न्||{7/7}{6.3.19.7}{8.37.7}{8.5.7.7}{515, 657, 6793} |
| [27] यज्ञस्येति दशर्चस्य सूक्तस्यात्रेयः श्यावाश्वइंद्राग्नीगायत्री | |
| य॒ज्ञस्य॒ हि स्थ ऋ॒त्विजा॒ सस्नी॒ वाजे᳚षु॒ कर्म॑सु|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} इन्द्रा᳚ग्नी॒ तस्य॑ बोधतम्||{1/10}{6.3.20.1}{8.38.1}{8.5.8.1}{516, 658, 6794} |
| तो॒शासा᳚ रथ॒यावा᳚ना वृत्र॒हणाप॑राजिता|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} इन्द्रा᳚ग्नी॒ तस्य॑ बोधतम्||{2/10}{6.3.20.2}{8.38.2}{8.5.8.2}{517, 658, 6795} |
| इ॒दं वां᳚ मदि॒रं मध्वधु॑क्ष॒न्नद्रि॑भि॒र्नरः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} इन्द्रा᳚ग्नी॒ तस्य॑ बोधतम्||{3/10}{6.3.20.3}{8.38.3}{8.5.8.3}{518, 658, 6796} |
| जु॒षेथां᳚ य॒ज्ञमि॒ष्टये᳚ सु॒तं सोमं᳚ सधस्तुती|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} इन्द्रा᳚ग्नी॒, आ ग॑तं नरा||{4/10}{6.3.20.4}{8.38.4}{8.5.8.4}{519, 658, 6797} |
| इ॒मा जु॑षेथां॒ सव॑ना॒ येभि᳚र्ह॒व्यान्यू॒हथुः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} इन्द्रा᳚ग्नी॒, आ ग॑तं नरा||{5/10}{6.3.20.5}{8.38.5}{8.5.8.5}{520, 658, 6798} |
| इ॒मां गा᳚य॒त्रव॑र्तनिं जु॒षेथां᳚ सुष्टु॒तिं मम॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} इन्द्रा᳚ग्नी॒, आ ग॑तं नरा||{6/10}{6.3.20.6}{8.38.6}{8.5.8.6}{521, 658, 6799} |
| प्रा॒त॒र्याव॑भि॒रा ग॑तं दे॒वेभि॑र्जेन्यावसू|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} इन्द्रा᳚ग्नी॒ सोम॑पीतये||{7/10}{6.3.21.1}{8.38.7}{8.5.8.7}{522, 658, 6800} |
| श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तो ऽत्री᳚णां शृणुतं॒ हव᳚म्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} इन्द्रा᳚ग्नी॒ सोम॑पीतये||{8/10}{6.3.21.2}{8.38.8}{8.5.8.8}{523, 658, 6801} |
| ए॒वा वा᳚मह्व ऊ॒तये॒ यथाहु॑वन्त॒ मेधि॑राः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} इन्द्रा᳚ग्नी॒ सोम॑पीतये||{9/10}{6.3.21.3}{8.38.9}{8.5.8.9}{524, 658, 6802} |
| आहं सर॑स्वतीवतोरिन्द्रा॒ग्न्योरवो᳚ वृणे|{आत्रेयः श्यावाश्वः | इन्द्राग्नी | गायत्री} याभ्यां᳚ गाय॒त्रमृ॒च्यते᳚||{10/10}{6.3.21.4}{8.38.10}{8.5.8.10}{525, 658, 6803} |
| [28] अग्निमिति दशर्चस्य सूक्तस्य काण्वो नाभाकोग्निर्महापंक्तिः | |
| अ॒ग्निम॑स्तोष्यृ॒ग्मिय॑म॒ग्निमी॒ळा य॒जध्यै᳚|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} अ॒ग्निर्दे॒वाँ, अ॑नक्तु न उ॒भे हि वि॒दथे᳚ क॒विर॒न्तश्चर॑ति दू॒त्य१॑(अं॒) नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{1/10}{6.3.22.1}{8.39.1}{8.5.9.1}{526, 659, 6804} |
| न्य॑ग्ने॒ नव्य॑सा॒ वच॑स्त॒नूषु॒ शंस॑मेषाम्|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} न्यरा᳚ती॒ ररा᳚व्णां॒ विश्वा᳚ अ॒र्यो, अरा᳚तीरि॒तो यु॑च्छन्त्वा॒मुरो॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{2/10}{6.3.22.2}{8.39.2}{8.5.9.2}{527, 659, 6805} |
| अग्ने॒ मन्मा᳚नि॒ तुभ्यं॒ कं घृ॒तं न जु॑ह्व आ॒सनि॑|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} स दे॒वेषु॒ प्र चि॑किद्धि॒ त्वं ह्यसि॑ पू॒र्व्यः शि॒वो दू॒तो वि॒वस्व॑तो॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{3/10}{6.3.22.3}{8.39.3}{8.5.9.3}{528, 659, 6806} |
| तत्त॑द॒ग्निर्वयो᳚ दधे॒ यथा᳚यथा कृप॒ण्यति॑|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} ऊ॒र्जाहु॑ति॒र्वसू᳚नां॒ शं च॒ योश्च॒ मयो᳚ दधे॒ विश्व॑स्यै दे॒वहू᳚त्यै॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{4/10}{6.3.22.4}{8.39.4}{8.5.9.4}{529, 659, 6807} |
| स चि॑केत॒ सही᳚यसा॒ ऽग्निश्चि॒त्रेण॒ कर्म॑णा|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} स होता॒ शश्व॑तीनां॒ दक्षि॑णाभिर॒भीवृ॑त इ॒नोति॑ च प्रती॒व्य१॑(अं॒) नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{5/10}{6.3.22.5}{8.39.5}{8.5.9.5}{530, 659, 6808} |
| अ॒ग्निर्जा॒ता दे॒वाना᳚म॒ग्निर्वे᳚द॒ मर्ता᳚नामपी॒च्य᳚म्|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} अ॒ग्निः स द्र॑विणो॒दा, अ॒ग्निर्द्वारा॒ व्यू᳚र्णुते॒ स्वा᳚हुतो॒ नवी᳚यसा॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{6/10}{6.3.23.1}{8.39.6}{8.5.9.6}{531, 659, 6809} |
| अ॒ग्निर्दे॒वेषु॒ संव॑सुः॒ स वि॒क्षु य॒ज्ञिया॒स्वा|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} स मु॒दा काव्या᳚ पु॒रु विश्वं॒ भूमे᳚व पुष्यति दे॒वो दे॒वेषु॑ य॒ज्ञियो॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{7/10}{6.3.23.2}{8.39.7}{8.5.9.7}{532, 659, 6810} |
| यो, अ॒ग्निः स॒प्तमा᳚नुषः श्रि॒तो विश्वे᳚षु॒ सिन्धु॑षु|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} तमाग᳚न्म त्रिप॒स्त्यं म᳚न्धा॒तुर्द॑स्यु॒हन्त॑मम॒ग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यं नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{8/10}{6.3.23.3}{8.39.8}{8.5.9.8}{533, 659, 6811} |
| अ॒ग्निस्त्रीणि॑ त्रि॒धातू॒न्या क्षे᳚ति वि॒दथा᳚ क॒विः|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} स त्रीँरे᳚काद॒शाँ, इ॒ह यक्ष॑च्च पि॒प्रय॑च्च नो॒ विप्रो᳚ दू॒तः परि॑ष्कृतो॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{9/10}{6.3.23.4}{8.39.9}{8.5.9.9}{534, 659, 6812} |
| त्वं नो᳚ अग्न आ॒युषु॒ त्वं दे॒वेषु॑ पूर्व्य॒ वस्व॒ एक॑ इरज्यसि|{काण्वो नाभाकः | अग्निः | महापङ्क्तिः} त्वामापः॑ परि॒स्रुतः॒ परि॑ यन्ति॒ स्वसे᳚तवो॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{10/10}{6.3.23.5}{8.39.10}{8.5.9.10}{535, 659, 6813} |
| [29] इंद्राग्नीइति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वोनाभाक इंद्राग्नी महापंक्तिर्द्वितीयाशक्वर्यंत्यात्रिष्टुप् | |
| इन्द्रा᳚ग्नी यु॒वं सु नः॒ सह᳚न्ता॒ दास॑थो र॒यिम्|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} येन॑ दृ॒ळ्हा स॒मत्स्वा वी॒ळु चि॑त् साहिषी॒मह्य॒ग्निर्वने᳚व॒ वात॒ इन्नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{1/12}{6.3.24.1}{8.40.1}{8.5.10.1}{536, 660, 6814} |
| न॒हि वां᳚ व॒व्रया᳚म॒हे ऽथेन्द्र॒मिद् य॑जामहे॒ शवि॑ष्ठं नृ॒णां नर᳚म्|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | शक्वरी} स नः॑ क॒दा चि॒दर्व॑ता॒ गम॒दा वाज॑सातये॒ गम॒दा मे॒धसा᳚तये॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{2/12}{6.3.24.2}{8.40.2}{8.5.10.2}{537, 660, 6815} |
| ता हि मध्यं॒ भरा᳚णामिन्द्रा॒ग्नी, अ॑धिक्षि॒तः|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} ता, उ॑ कवित्व॒ना क॒वी पृ॒च्छ्यमा᳚ना सखीय॒ते सं धी॒तम॑श्नुतं नरा॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{3/12}{6.3.24.3}{8.40.3}{8.5.10.3}{538, 660, 6816} |
| अ॒भ्य॑र्च नभाक॒वदि᳚न्द्रा॒ग्नी य॒जसा᳚ गि॒रा|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} ययो॒र्विश्व॑मि॒दं जग॑दि॒यं द्यौः पृ॑थि॒वी म॒ह्यु१॑(उ॒)पस्थे᳚ बिभृ॒तो वसु॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{4/12}{6.3.24.4}{8.40.4}{8.5.10.4}{539, 660, 6817} |
| प्र ब्रह्मा᳚णि नभाक॒वदि᳚न्द्रा॒ग्निभ्या᳚मिरज्यत|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} या स॒प्तबु॑ध्नमर्ण॒वं जि॒ह्मबा᳚रमपोर्णु॒त इन्द्र॒ ईशा᳚न॒ ओज॑सा॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{5/12}{6.3.24.5}{8.40.5}{8.5.10.5}{540, 660, 6818} |
| अपि॑ वृश्च पुराण॒वद् व्र॒तते᳚रिव गुष्पि॒तमोजो᳚ दा॒सस्य॑ दम्भय|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} व॒यं तद॑स्य॒ सम्भृ॑तं॒ वस्विन्द्रे᳚ण॒ वि भ॑जेमहि॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{6/12}{6.3.24.6}{8.40.6}{8.5.10.6}{541, 660, 6819} |
| यदि᳚न्द्रा॒ग्नी जना᳚ इ॒मे वि॒ह्वय᳚न्ते॒ तना᳚ गि॒रा|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} अ॒स्माके᳚भि॒र्नृभि᳚र्व॒यं सा᳚स॒ह्याम॑ पृतन्य॒तो व॑नु॒याम॑ वनुष्य॒तो नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{7/12}{6.3.25.1}{8.40.7}{8.5.10.7}{542, 660, 6820} |
| या नु श्वे॒ताव॒वो दि॒व उ॒च्चरा᳚त॒ उप॒ द्युभिः॑|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} इ॒न्द्रा॒ग्न्योरनु᳚ व्र॒तमुहा᳚ना यन्ति॒ सिन्ध॑वो॒ यान् त्सीं᳚ ब॒न्धादमु᳚ञ्चतां॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{8/12}{6.3.25.2}{8.40.8}{8.5.10.8}{543, 660, 6821} |
| पू॒र्वीष्ट॑ इ॒न्द्रोप॑मातयः पू॒र्वीरु॒त प्रश॑स्तयः॒ सूनो᳚ हि॒न्वस्य॑ हरिवः|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} वस्वो᳚ वी॒रस्या॒पृचो॒ या नु साध᳚न्त नो॒ धियो॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{9/12}{6.3.25.3}{8.40.9}{8.5.10.9}{544, 660, 6822} |
| तं शि॑शीता सुवृ॒क्तिभि॑स्त्वे॒षं सत्वा᳚नमृ॒ग्मिय᳚म्|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} उ॒तो नु चि॒द् य ओज॑सा॒ शुष्ण॑स्या॒ण्डानि॒ भेद॑ति॒ जेष॒त् स्व᳚र्वतीर॒पो नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{10/12}{6.3.25.4}{8.40.10}{8.5.10.10}{545, 660, 6823} |
| तं शि॑शीता स्वध्व॒रं स॒त्यं सत्वा᳚नमृ॒त्विय᳚म्|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | महापङ्क्तिः} उ॒तो नु चि॒द् य ओह॑त आ॒ण्डा शुष्ण॑स्य॒ भेद॒त्यजैः॒ स्व᳚र्वतीर॒पो नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{11/12}{6.3.25.5}{8.40.11}{8.5.10.11}{546, 660, 6824} |
| ए॒वेन्द्रा॒ग्निभ्यां᳚ पितृ॒वन्नवी᳚यो मन्धातृ॒वद᳚ङ्गिर॒स्वद॑वाचि|{काण्वो नाभाकः | इन्द्राग्नी | त्रिष्टुप्} त्रि॒धातु॑ना॒ शर्म॑णा पातम॒स्मान् व॒यं स्या᳚म॒ पत॑यो रयी॒णाम्||{12/12}{6.3.25.6}{8.40.12}{8.5.10.12}{547, 660, 6825} |
| [30] अस्माऊष्विति दशर्चस्य सूक्तस्य काण्वोनाभाकोवरुणोमहापंक्तिः | |
| अ॒स्मा, ऊ॒ षु प्रभू᳚तये॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्यो ऽर्चा᳚ वि॒दुष्ट॑रेभ्यः|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} यो धी॒ता मानु॑षाणां प॒श्वो गा, इ॑व॒ रक्ष॑ति॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{1/10}{6.3.26.1}{8.41.1}{8.5.11.1}{548, 661, 6826} |
| तमू॒ षु स॑म॒ना गि॒रा पि॑तॄ॒णां च॒ मन्म॑भिः|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} ना॒भा॒कस्य॒ प्रश॑स्तिभि॒र्यः सिन्धू᳚ना॒मुपो᳚द॒ये स॒प्तस्व॑सा॒ स म॑ध्य॒मो नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{2/10}{6.3.26.2}{8.41.2}{8.5.11.2}{549, 661, 6827} |
| स क्षपः॒ परि॑ षस्वजे॒ न्यु१॑(उ॒)स्रो मा॒यया᳚ दधे॒ स विश्वं॒ परि॑ दर्श॒तः|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} तस्य॒ वेनी॒रनु᳚ व्र॒तमु॒षस्ति॒स्रो, अ॑वर्धय॒न् नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{3/10}{6.3.26.3}{8.41.3}{8.5.11.3}{550, 661, 6828} |
| यः क॒कुभो᳚ निधार॒यः पृ॑थि॒व्यामधि॑ दर्श॒तः|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} स माता᳚ पू॒र्व्यं प॒दं तद् वरु॑णस्य॒ सप्त्यं॒ स हि गो॒पा, इ॒वेर्यो॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{4/10}{6.3.26.4}{8.41.4}{8.5.11.4}{551, 661, 6829} |
| यो ध॒र्ता भुव॑नानां॒ य उ॒स्राणा᳚मपी॒च्या॒३॑(आ॒) वेद॒ नामा᳚नि॒ गुह्या᳚|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} स क॒विः काव्या᳚ पु॒रु रू॒पं द्यौरि॑व पुष्यति॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{5/10}{6.3.26.5}{8.41.5}{8.5.11.5}{552, 661, 6830} |
| यस्मि॒न् विश्वा᳚नि॒ काव्या᳚ च॒क्रे नाभि॑रिव श्रि॒ता|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} त्रि॒तं जू॒ती स॑पर्यत व्र॒जे गावो॒ न सं॒युजे᳚ यु॒जे, अश्वाँ᳚, अयुक्षत॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{6/10}{6.3.27.1}{8.41.6}{8.5.11.6}{553, 661, 6831} |
| य आ॒स्वत्क॑ आ॒शये॒ विश्वा᳚ जा॒तान्ये᳚षाम्|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} परि॒ धामा᳚नि॒ मर्मृ॑श॒द् वरु॑णस्य पु॒रो गये॒ विश्वे᳚ दे॒वा, अनु᳚ व्र॒तं नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{7/10}{6.3.27.2}{8.41.7}{8.5.11.7}{554, 661, 6832} |
| स स॑मु॒द्रो, अ॑पी॒च्य॑स्तु॒रो द्यामि॑व रोहति॒ नि यदा᳚सु॒ यजु॑र्द॒धे|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} स मा॒या, अ॒र्चिना᳚ प॒दा ऽस्तृ॑णा॒न्नाक॒मारु॑ह॒न्नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{8/10}{6.3.27.3}{8.41.8}{8.5.11.8}{555, 661, 6833} |
| यस्य॑ श्वे॒ता वि॑चक्ष॒णा ति॒स्रो भूमी᳚रधिक्षि॒तः|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} त्रिरुत्त॑राणि प॒प्रतु॒र्वरु॑णस्य ध्रु॒वं सदः॒ स स॑प्ता॒नामि॑रज्यति॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{9/10}{6.3.27.4}{8.41.9}{8.5.11.9}{556, 661, 6834} |
| यः श्वे॒ताँ, अधि॑निर्णिजश्च॒क्रे कृ॒ष्णाँ, अनु᳚ व्र॒ता|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | महापङ्क्तिः} स धाम॑ पू॒र्व्यं म॑मे॒ यः स्क॒म्भेन॒ वि रोद॑सी, अ॒जो न द्यामधा᳚रय॒न्नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{10/10}{6.3.27.5}{8.41.10}{8.5.11.10}{557, 661, 6835} |
| [31] अस्तभ्नादिति षडृचस्य सूक्तस्य काण्वोनाभाकऋषिरंत्यानांतिसृणामात्रेयार्चनानाऋषिराद्यानांतिसृणां वरुणोंत्यानांतिसृणामश्विनौ आद्यास्तिस्रस्त्रिष्टुभोंत्यास्तिस्रोनुष्टुभः | |
| अस्त॑भ्ना॒द्द्यामसु॑रो वि॒श्ववे᳚दा॒, अमि॑मीत वरि॒माणं᳚ पृथि॒व्याः|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | त्रिष्टुप्} आसी᳚द॒द् विश्वा॒ भुव॑नानि स॒म्राड् विश्वेत् तानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑||{1/6}{6.3.28.1}{8.42.1}{8.5.12.1}{558, 662, 6836} |
| ए॒वा व᳚न्दस्व॒ वरु॑णं बृ॒हन्तं᳚ नम॒स्या धीर॑म॒मृत॑स्य गो॒पाम्|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | त्रिष्टुप्} स नः॒ शर्म॑ त्रि॒वरू᳚थं॒ वि यं᳚सत् पा॒तं नो᳚ द्यावापृथिवी, उ॒पस्थे᳚||{2/6}{6.3.28.2}{8.42.2}{8.5.12.2}{559, 662, 6837} |
| इ॒मां धियं॒ शिक्ष॑माणस्य देव॒ क्रतुं॒ दक्षं᳚ वरुण॒ सं शि॑शाधि|{काण्वो नाभाकः | वरुणः | त्रिष्टुप्} ययाति॒ विश्वा᳚ दुरि॒ता तरे᳚म सु॒तर्मा᳚ण॒मधि॒ नावं᳚ रुहेम||{3/6}{6.3.28.3}{8.42.3}{8.5.12.3}{560, 662, 6838} |
| आ वां॒ ग्रावा᳚णो, अश्विना धी॒भिर्विप्रा᳚ अचुच्यवुः|{आत्रेयार्चनानाः | अश्विनौ | अनुष्टुप्} नास॑त्या॒ सोम॑पीतये॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{4/6}{6.3.28.4}{8.42.4}{8.5.12.4}{561, 662, 6839} |
| यथा᳚ वा॒मत्रि॑रश्विना गी॒र्भिर्विप्रो॒, अजो᳚हवीत्|{आत्रेयार्चनानाः | अश्विनौ | अनुष्टुप्} नास॑त्या॒ सोम॑पीतये॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{5/6}{6.3.28.5}{8.42.5}{8.5.12.5}{562, 662, 6840} |
| ए॒वा वा᳚मह्व ऊ॒तये॒ यथाहु॑वन्त॒ मेधि॑राः|{आत्रेयार्चनानाः | अश्विनौ | अनुष्टुप्} नास॑त्या॒ सोम॑पीतये॒ नभ᳚न्तामन्य॒के स॑मे||{6/6}{6.3.28.6}{8.42.6}{8.5.12.6}{563, 662, 6841} |
| [32] इमेविप्रस्येति त्रयस्त्रिंशदृचस्य सूक्तस्यांगिरसोविरूपोग्निर्गायत्री | |
| इ॒मे विप्र॑स्य वे॒धसो॒ ऽग्नेरस्तृ॑तयज्वनः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} गिरः॒ स्तोमा᳚स ईरते||{1/33}{6.3.29.1}{8.43.1}{8.6.1.1}{564, 663, 6842} |
| अस्मै᳚ ते प्रति॒हर्य॑ते॒ जात॑वेदो॒ विच॑र्षणे|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने॒ जना᳚मि सुष्टु॒तिम्||{2/33}{6.3.29.2}{8.43.2}{8.6.1.2}{565, 663, 6843} |
| आ॒रो॒का, इ॑व॒ घेदह॑ ति॒ग्मा, अ॑ग्ने॒ तव॒ त्विषः॑|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} द॒द्भिर्वना᳚नि बप्सति||{3/33}{6.3.29.3}{8.43.3}{8.6.1.3}{566, 663, 6844} |
| हर॑यो धू॒मके᳚तवो॒ वात॑जूता॒, उप॒ द्यवि॑|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} यत᳚न्ते॒ वृथ॑ग॒ग्नयः॑||{4/33}{6.3.29.4}{8.43.4}{8.6.1.4}{567, 663, 6845} |
| ए॒ते त्ये वृथ॑ग॒ग्नय॑ इ॒द्धासः॒ सम॑दृक्षत|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} उ॒षसा᳚मिव के॒तवः॑||{5/33}{6.3.29.5}{8.43.5}{8.6.1.5}{568, 663, 6846} |
| कृ॒ष्णा रजां᳚सि पत्सु॒तः प्र॒याणे᳚ जा॒तवे᳚दसः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निर्यद् रोध॑ति॒ क्षमि॑||{6/33}{6.3.30.1}{8.43.6}{8.6.1.6}{569, 663, 6847} |
| धा॒सिं कृ᳚ण्वा॒न ओष॑धी॒र्बप्स॑द॒ग्निर्न वा᳚यति|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} पुन॒र्यन् तरु॑णी॒रपि॑||{7/33}{6.3.30.2}{8.43.7}{8.6.1.7}{570, 663, 6848} |
| जि॒ह्वाभि॒रह॒ नन्न॑मद॒र्चिषा᳚ जञ्जणा॒भव॑न्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निर्वने᳚षु रोचते||{8/33}{6.3.30.3}{8.43.8}{8.6.1.8}{571, 663, 6849} |
| अ॒प्स्व॑ग्ने॒ सधि॒ष्टव॒ सौष॑धी॒रनु॑ रुध्यसे|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} गर्भे॒ सञ्जा᳚यसे॒ पुनः॑||{9/33}{6.3.30.4}{8.43.9}{8.6.1.9}{572, 663, 6850} |
| उद॑ग्ने॒ तव॒ तद् घृ॒ताद॒र्ची रो᳚चत॒ आहु॑तम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} निंसा᳚नं जु॒ह्वो॒३॑(ओ॒) मुखे᳚||{10/33}{6.3.30.5}{8.43.10}{8.6.1.10}{573, 663, 6851} |
| उ॒क्षान्ना᳚य व॒शान्ना᳚य॒ सोम॑पृष्ठाय वे॒धसे᳚|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} स्तोमै᳚र्विधेमा॒ग्नये᳚||{11/33}{6.3.31.1}{8.43.11}{8.6.1.11}{574, 663, 6852} |
| उ॒त त्वा॒ नम॑सा व॒यं होत॒र्वरे᳚ण्यक्रतो|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने᳚ स॒मिद्भि॑रीमहे||{12/33}{6.3.31.2}{8.43.12}{8.6.1.12}{575, 663, 6853} |
| उ॒त त्वा᳚ भृगु॒वच्छु॑चे मनु॒ष्वद॑ग्न आहुत|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒ङ्गि॒र॒स्वद्ध॑वामहे||{13/33}{6.3.31.3}{8.43.13}{8.6.1.13}{576, 663, 6854} |
| त्वं ह्य॑ग्ने, अ॒ग्निना॒ विप्रो॒ विप्रे᳚ण॒ सन् त्स॒ता|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} सखा॒ सख्या᳚ समि॒ध्यसे᳚||{14/33}{6.3.31.4}{8.43.14}{8.6.1.14}{577, 663, 6855} |
| स त्वं विप्रा᳚य दा॒शुषे᳚ र॒यिं दे᳚हि सह॒स्रिण᳚म्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने᳚ वी॒रव॑ती॒मिष᳚म्||{15/33}{6.3.31.5}{8.43.15}{8.6.1.15}{578, 663, 6856} |
| अग्ने॒ भ्रातः॒ सह॑स्कृत॒ रोहि॑दश्व॒ शुचि᳚व्रत|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} इ॒मं स्तोमं᳚ जुषस्व मे||{16/33}{6.3.32.1}{8.43.16}{8.6.1.16}{579, 663, 6857} |
| उ॒त त्वा᳚ग्ने॒ मम॒ स्तुतो᳚ वा॒श्राय॑ प्रति॒हर्य॑ते|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} गो॒ष्ठं गाव॑ इवाशत||{17/33}{6.3.32.2}{8.43.17}{8.6.1.17}{580, 663, 6858} |
| तुभ्यं॒ ता, अ᳚ङ्गिरस्तम॒ विश्वाः᳚ सुक्षि॒तयः॒ पृथ॑क्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने॒ कामा᳚य येमिरे||{18/33}{6.3.32.3}{8.43.18}{8.6.1.18}{581, 663, 6859} |
| अ॒ग्निं धी॒भिर्म॑नी॒षिणो॒ मेधि॑रासो विप॒श्चितः॑|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒द्म॒सद्या᳚य हिन् विरे||{19/33}{6.3.32.4}{8.43.19}{8.6.1.19}{582, 663, 6860} |
| तं त्वामज्मे᳚षु वा॒जिनं᳚ तन्वा॒ना, अ॑ग्ने, अध्व॒रम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} वह्निं॒ होता᳚रमीळते||{20/33}{6.3.32.5}{8.43.20}{8.6.1.20}{583, 663, 6861} |
| पु॒रु॒त्रा हि स॒दृङ्ङसि॒ विशो॒ विश्वा॒, अनु॑ प्र॒भुः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} स॒मत्सु॑ त्वा हवामहे||{21/33}{6.3.33.1}{8.43.21}{8.6.1.21}{584, 663, 6862} |
| तमी᳚ळिष्व॒ य आहु॑तो॒ ऽग्निर्वि॒भ्राज॑ते घृ॒तैः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} इ॒मं नः॑ शृणव॒द्धव᳚म्||{22/33}{6.3.33.2}{8.43.22}{8.6.1.22}{585, 663, 6863} |
| तं त्वा᳚ व॒यं ह॑वामहे शृ॒ण्वन्तं᳚ जा॒तवे᳚दसम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने॒ घ्नन्त॒मप॒ द्विषः॑||{23/33}{6.3.33.3}{8.43.23}{8.6.1.23}{586, 663, 6864} |
| वि॒शां राजा᳚न॒मद्भु॑त॒मध्य॑क्षं॒ धर्म॑णामि॒मम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निमी᳚ळे॒ स उ॑ श्रवत्||{24/33}{6.3.33.4}{8.43.24}{8.6.1.24}{587, 663, 6865} |
| अ॒ग्निं वि॒श्वायु॑वेपसं॒ मर्यं॒ न वा॒जिनं᳚ हि॒तम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} सप्तिं॒ न वा᳚जयामसि||{25/33}{6.3.33.5}{8.43.25}{8.6.1.25}{588, 663, 6866} |
| घ्नन् मृ॒ध्राण्यप॒ द्विषो॒ दह॒न् रक्षां᳚सि वि॒श्वहा᳚|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने᳚ ति॒ग्मेन॑ दीदिहि||{26/33}{6.3.34.1}{8.43.26}{8.6.1.26}{589, 663, 6867} |
| यं त्वा॒ जना᳚स इन्ध॒ते म॑नु॒ष्वद᳚ङ्गिरस्तम|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने॒ स बो᳚धि मे॒ वचः॑||{27/33}{6.3.34.2}{8.43.27}{8.6.1.27}{590, 663, 6868} |
| यद॑ग्ने दिवि॒जा, अस्य॑प्सु॒जा वा᳚ सहस्कृत|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} तं त्वा᳚ गी॒र्भिर्ह॑वामहे||{28/33}{6.3.34.3}{8.43.28}{8.6.1.28}{591, 663, 6869} |
| तुभ्यं॒ घेत् ते जना᳚ इ॒मे विश्वाः᳚ सुक्षि॒तयः॒ पृथ॑क्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} धा॒सिं हि᳚न्व॒न्त्यत्त॑वे||{29/33}{6.3.34.4}{8.43.29}{8.6.1.29}{592, 663, 6870} |
| ते घेद॑ग्ने स्वा॒ध्यो ऽहा॒ विश्वा᳚ नृ॒चक्ष॑सः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} तर᳚न्तः स्याम दु॒र्गहा᳚||{30/33}{6.3.34.5}{8.43.30}{8.6.1.30}{593, 663, 6871} |
| अ॒ग्निं म॒न्द्रं पु॑रुप्रि॒यं शी॒रं पा᳚व॒कशो᳚चिषम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} हृ॒द्भिर्म॒न्द्रेभि॑रीमहे||{31/33}{6.3.35.1}{8.43.31}{8.6.1.31}{594, 663, 6872} |
| स त्वम॑ग्ने वि॒भाव॑सुः सृ॒जन् त्सूर्यो॒ न र॒श्मिभिः॑|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} शर्ध॒न् तमां᳚सि जिघ्नसे||{32/33}{6.3.35.2}{8.43.32}{8.6.1.32}{595, 663, 6873} |
| तत् ते᳚ सहस्व ईमहे दा॒त्रं यन्नोप॒दस्य॑ति|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} त्वद॑ग्ने॒ वार्यं॒ वसु॑||{33/33}{6.3.35.3}{8.43.33}{8.6.1.33}{596, 663, 6874} |
| [33] समिधाग्निमिति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्यांगिरसो विरूपोग्निर्गायत्री | |
| स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो᳚धय॒ताति॑थिम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन||{1/30}{6.3.36.1}{8.44.1}{8.6.2.1}{597, 664, 6875} |
| अग्ने॒ स्तोमं᳚ जुषस्व मे॒ वर्ध॑स्वा॒नेन॒ मन्म॑ना|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} प्रति॑ सू॒क्तानि॑ हर्य नः||{2/30}{6.3.36.2}{8.44.2}{8.6.2.2}{598, 664, 6876} |
| अ॒ग्निं दू॒तं पु॒रो द॑धे हव्य॒वाह॒मुप॑ ब्रुवे|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} दे॒वाँ, आ सा᳚दयादि॒ह||{3/30}{6.3.36.3}{8.44.3}{8.6.2.3}{599, 664, 6877} |
| उत् ते᳚ बृ॒हन्तो᳚ अ॒र्चयः॑ समिधा॒नस्य॑ दीदिवः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने᳚ शु॒क्रास॑ ईरते||{4/30}{6.3.36.4}{8.44.4}{8.6.2.4}{600, 664, 6878} |
| उप॑ त्वा जु॒ह्वो॒३॑(ओ॒) मम॑ घृ॒ताची᳚र्यन्तु हर्यत|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने᳚ ह॒व्या जु॑षस्व नः||{5/30}{6.3.36.5}{8.44.5}{8.6.2.5}{601, 664, 6879} |
| म॒न्द्रं होता᳚रमृ॒त्विजं᳚ चि॒त्रभा᳚नुं वि॒भाव॑सुम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निमी᳚ळे॒ स उ॑ श्रवत्||{6/30}{6.3.37.1}{8.44.6}{8.6.2.6}{602, 664, 6880} |
| प्र॒त्नं होता᳚र॒मीड्यं॒ जुष्ट॑म॒ग्निं क॒विक्र॑तुम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒ध्व॒राणा᳚मभि॒श्रिय᳚म्||{7/30}{6.3.37.2}{8.44.7}{8.6.2.7}{603, 664, 6881} |
| जु॒षा॒णो, अ᳚ङ्गिरस्तमे॒मा ह॒व्यान्या᳚नु॒षक्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने᳚ य॒ज्ञं न॑य ऋतु॒था||{8/30}{6.3.37.3}{8.44.8}{8.6.2.8}{604, 664, 6882} |
| स॒मि॒धा॒न उ॑ सन्त्य॒ शुक्र॑शोच इ॒हा व॑ह|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} चि॒कि॒त्वान् दैव्यं॒ जन᳚म्||{9/30}{6.3.37.4}{8.44.9}{8.6.2.9}{605, 664, 6883} |
| विप्रं॒ होता᳚रम॒द्रुहं᳚ धू॒मके᳚तुं वि॒भाव॑सुम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} य॒ज्ञानां᳚ के॒तुमी᳚महे||{10/30}{6.3.37.5}{8.44.10}{8.6.2.10}{606, 664, 6884} |
| अग्ने॒ नि पा᳚हि न॒स्त्वं प्रति॑ ष्म देव॒ रीष॑तः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} भि॒न्धि द्वेषः॑ सहस्कृत||{11/30}{6.3.38.1}{8.44.11}{8.6.2.11}{607, 664, 6885} |
| अ॒ग्निः प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना॒ शुम्भा᳚नस्त॒न्व१॑(अं॒) स्वाम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} क॒विर्विप्रे᳚ण वावृधे||{12/30}{6.3.38.2}{8.44.12}{8.6.2.12}{608, 664, 6886} |
| ऊ॒र्जो नपा᳚त॒मा हु॑वे॒ ऽग्निं पा᳚व॒कशो᳚चिषम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒स्मिन् य॒ज्ञे स्व॑ध्व॒रे||{13/30}{6.3.38.3}{8.44.13}{8.6.2.13}{609, 664, 6887} |
| स नो᳚ मित्रमह॒स्त्वमग्ने᳚ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा᳚|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} दे॒वैरा स॑त्सि ब॒र्हिषि॑||{14/30}{6.3.38.4}{8.44.14}{8.6.2.14}{610, 664, 6888} |
| यो, अ॒ग्निं त॒न्वो॒३॑(ओ॒) दमे᳚ दे॒वं मर्तः॑ सप॒र्यति॑|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} तस्मा॒, इद्दी᳚दय॒द् वसु॑||{15/30}{6.3.38.5}{8.44.15}{8.6.2.15}{611, 664, 6889} |
| अ॒ग्निर्मू॒र्धा दि॒वः क॒कुत् पतिः॑ पृथि॒व्या, अ॒यम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒पां रेतां᳚सि जिन्वति||{16/30}{6.3.39.1}{8.44.16}{8.6.2.16}{612, 664, 6890} |
| उद॑ग्ने॒ शुच॑य॒स्तव॑ शु॒क्रा भ्राज᳚न्त ईरते|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} तव॒ ज्योतीं᳚ष्य॒र्चयः॑||{17/30}{6.3.39.2}{8.44.17}{8.6.2.17}{613, 664, 6891} |
| ईशि॑षे॒ वार्य॑स्य॒ हि दा॒त्रस्या᳚ग्ने॒ स्व॑र्पतिः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} स्तो॒ता स्यां॒ तव॒ शर्म॑णि||{18/30}{6.3.39.3}{8.44.18}{8.6.2.18}{614, 664, 6892} |
| त्वाम॑ग्ने मनी॒षिण॒स्त्वां हि᳚न्वन्ति॒ चित्ति॑भिः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} त्वां व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑||{19/30}{6.3.39.4}{8.44.19}{8.6.2.19}{615, 664, 6893} |
| अद॑ब्धस्य स्व॒धाव॑तो दू॒तस्य॒ रेभ॑तः॒ सदा᳚|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्नेः स॒ख्यं वृ॑णीमहे||{20/30}{6.3.39.5}{8.44.20}{8.6.2.20}{616, 664, 6894} |
| अ॒ग्निः शुचि᳚व्रततमः॒ शुचि॒र्विप्रः॒ शुचिः॑ क॒विः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} शुची᳚ रोचत॒ आहु॑तः||{21/30}{6.3.40.1}{8.44.21}{8.6.2.21}{617, 664, 6895} |
| उ॒त त्वा᳚ धी॒तयो॒ मम॒ गिरो᳚ वर्धन्तु वि॒श्वहा᳚|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने᳚ स॒ख्यस्य॑ बोधि नः||{22/30}{6.3.40.2}{8.44.22}{8.6.2.22}{618, 664, 6896} |
| यद॑ग्ने॒ स्याम॒हं त्वं त्वं वा᳚ घा॒ स्या, अ॒हम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} स्युष्टे᳚ स॒त्या, इ॒हाशिषः॑||{23/30}{6.3.40.3}{8.44.23}{8.6.2.23}{619, 664, 6897} |
| वसु॒र्वसु॑पति॒र्हि क॒मस्य॑ग्ने वि॒भाव॑सुः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} स्याम॑ ते सुम॒तावपि॑||{24/30}{6.3.40.4}{8.44.24}{8.6.2.24}{620, 664, 6898} |
| अग्ने᳚ धृ॒तव्र॑ताय ते समु॒द्राये᳚व॒ सिन्ध॑वः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} गिरो᳚ वा॒श्रास॑ ईरते||{25/30}{6.3.40.5}{8.44.25}{8.6.2.25}{621, 664, 6899} |
| युवा᳚नं वि॒श्पतिं᳚ क॒विं वि॒श्वादं᳚ पुरु॒वेप॑सम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निं शु᳚म्भामि॒ मन्म॑भिः||{26/30}{6.3.41.1}{8.44.26}{8.6.2.26}{622, 664, 6900} |
| य॒ज्ञानां᳚ र॒थ्ये᳚ व॒यं ति॒ग्मज᳚म्भाय वी॒ळवे᳚|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} स्तोमै᳚रिषेमा॒ग्नये᳚||{27/30}{6.3.41.2}{8.44.27}{8.6.2.27}{623, 664, 6901} |
| अ॒यम॑ग्ने॒ त्वे, अपि॑ जरि॒ता भू᳚तु सन्त्य|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} तस्मै᳚ पावक मृळय||{28/30}{6.3.41.3}{8.44.28}{8.6.2.28}{624, 664, 6902} |
| धीरो॒ ह्यस्य॑द्म॒सद् विप्रो॒ न जागृ॑विः॒ सदा᳚|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अग्ने᳚ दी॒दय॑सि॒ द्यवि॑||{29/30}{6.3.41.4}{8.44.29}{8.6.2.29}{625, 664, 6903} |
| पु॒राग्ने᳚ दुरि॒तेभ्यः॑ पु॒रा मृ॒ध्रेभ्यः॑ कवे|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} प्र ण॒ आयु᳚र्वसो तिर||{30/30}{6.3.41.5}{8.44.30}{8.6.2.30}{626, 664, 6904} |
| [34] आघायइति द्विचत्वारिंशदृचस्य सूक्तस्य काण्वस्त्रिशोकइंद्र आद्याया अग्नींद्रागायत्री | |
| आ घा॒ ये, अ॒ग्निमि᳚न्ध॒ते स्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरा᳚नु॒षक्|{काण्वः त्रिशोकः | अग्नींद्रौ | गायत्री} येषा॒मिन्द्रो॒ युवा॒ सखा᳚||{1/42}{6.3.42.1}{8.45.1}{8.6.3.1}{627, 665, 6905} |
| बृ॒हन्निदि॒ध्म ए᳚षां॒ भूरि॑ श॒स्तं पृ॒थुः स्वरुः॑|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} येषा॒मिन्द्रो॒ युवा॒ सखा᳚||{2/42}{6.3.42.2}{8.45.2}{8.6.3.2}{628, 665, 6906} |
| अयु॑द्ध॒ इद् यु॒धा वृतं॒ शूर॒ आज॑ति॒ सत्व॑भिः|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} येषा॒मिन्द्रो॒ युवा॒ सखा᳚||{3/42}{6.3.42.3}{8.45.3}{8.6.3.3}{629, 665, 6907} |
| आ बु॒न्दं वृ॑त्र॒हा द॑दे जा॒तः पृ॑च्छ॒द् वि मा॒तर᳚म्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} क उ॒ग्राः के ह॑ शृण्विरे||{4/42}{6.3.42.4}{8.45.4}{8.6.3.4}{630, 665, 6908} |
| प्रति॑ त्वा शव॒सी व॑दद् गि॒रावप्सो॒ न यो᳚धिषत्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} यस्ते᳚ शत्रु॒त्वमा᳚च॒के||{5/42}{6.3.42.5}{8.45.5}{8.6.3.5}{631, 665, 6909} |
| उ॒त त्वं म॑घवञ्छृणु॒ यस्ते॒ वष्टि॑ व॒वक्षि॒ तत्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} यद् वी॒ळया᳚सि वी॒ळु तत्||{6/42}{6.3.43.1}{8.45.6}{8.6.3.6}{632, 665, 6910} |
| यदा॒जिं यात्या᳚जि॒कृदिन्द्रः॑ स्वश्व॒युरुप॑|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} र॒थीत॑मो र॒थीना᳚म्||{7/42}{6.3.43.2}{8.45.7}{8.6.3.7}{633, 665, 6911} |
| वि षु विश्वा᳚ अभि॒युजो॒ वज्रि॒न् विष्व॒ग्यथा᳚ वृह|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} भवा᳚ नः सु॒श्रव॑स्तमः||{8/42}{6.3.43.3}{8.45.8}{8.6.3.8}{634, 665, 6912} |
| अ॒स्माकं॒ सु रथं᳚ पु॒र इन्द्रः॑ कृणोतु सा॒तये᳚|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} न यं धूर्व᳚न्ति धू॒र्तयः॑||{9/42}{6.3.43.4}{8.45.9}{8.6.3.9}{635, 665, 6913} |
| वृ॒ज्याम॑ ते॒ परि॒ द्विषो ऽरं᳚ ते शक्र दा॒वने᳚|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} ग॒मेमेदि᳚न्द्र॒ गोम॑तः||{10/42}{6.3.43.5}{8.45.10}{8.6.3.10}{636, 665, 6914} |
| शनै᳚श्चि॒द् यन्तो᳚ अद्रि॒वो ऽश्वा᳚वन्तः शत॒ग्विनः॑|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} वि॒वक्ष॑णा, अने॒हसः॑||{11/42}{6.3.44.1}{8.45.11}{8.6.3.11}{637, 665, 6915} |
| ऊ॒र्ध्वा हि ते᳚ दि॒वेदि॑वे स॒हस्रा᳚ सू॒नृता᳚ श॒ता|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} ज॒रि॒तृभ्यो᳚ वि॒मंह॑ते||{12/42}{6.3.44.2}{8.45.12}{8.6.3.12}{638, 665, 6916} |
| वि॒द्मा हि त्वा᳚ धनंज॒यमिन्द्र॑ दृ॒ळ्हा चि॑दारु॒जम्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} आ॒दा॒रिणं॒ यथा॒ गय᳚म्||{13/42}{6.3.44.3}{8.45.13}{8.6.3.13}{639, 665, 6917} |
| क॒कु॒हं चि॑त् त्वा कवे॒ मन्द᳚न्तु धृष्ण॒विन्द॑वः|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} आ त्वा᳚ प॒णिं यदीम॑हे||{14/42}{6.3.44.4}{8.45.14}{8.6.3.14}{640, 665, 6918} |
| यस्ते᳚ रे॒वाँ, अदा᳚शुरिः प्रम॒मर्ष॑ म॒घत्त॑ये|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} तस्य॑ नो॒ वेद॒ आ भ॑र||{15/42}{6.3.44.5}{8.45.15}{8.6.3.15}{641, 665, 6919} |
| इ॒म उ॑ त्वा॒ वि च॑क्षते॒ सखा᳚य इन्द्र सो॒मिनः॑|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} पु॒ष्टाव᳚न्तो॒ यथा᳚ प॒शुम्||{16/42}{6.3.45.1}{8.45.16}{8.6.3.16}{642, 665, 6920} |
| उ॒त त्वाब॑धिरं व॒यं श्रुत्क᳚र्णं॒ सन्त॑मू॒तये᳚|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} दू॒रादि॒ह ह॑वामहे||{17/42}{6.3.45.2}{8.45.17}{8.6.3.17}{643, 665, 6921} |
| यच्छु॑श्रू॒या, इ॒मं हवं᳚ दु॒र्मर्षं᳚ चक्रिया, उ॒त|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} भवे᳚रा॒पिर्नो॒, अन्त॑मः||{18/42}{6.3.45.3}{8.45.18}{8.6.3.18}{644, 665, 6922} |
| यच्चि॒द्धि ते॒, अपि॒ व्यथि॑र्जग॒न्वांसो॒, अम᳚न्महि|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} गो॒दा, इदि᳚न्द्र बोधि नः||{19/42}{6.3.45.4}{8.45.19}{8.6.3.19}{645, 665, 6923} |
| आ त्वा᳚ र॒म्भं न जिव्र॑यो रर॒भ्मा श॑वसस्पते|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} उ॒श्मसि॑ त्वा स॒धस्थ॒ आ||{20/42}{6.3.45.5}{8.45.20}{8.6.3.20}{646, 665, 6924} |
| स्तो॒त्रमिन्द्रा᳚य गायत पुरुनृ॒म्णाय॒ सत्व॑ने|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} नकि॒र्यं वृ᳚ण्व॒ते यु॒धि||{21/42}{6.3.46.1}{8.45.21}{8.6.3.21}{647, 665, 6925} |
| अ॒भि त्वा᳚ वृषभा सु॒ते सु॒तं सृ॑जामि पी॒तये᳚|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} तृ॒म्पा व्य॑श्नुही॒ मद᳚म्||{22/42}{6.3.46.2}{8.45.22}{8.6.3.22}{648, 665, 6926} |
| मा त्वा᳚ मू॒रा, अ॑वि॒ष्यवो॒ मोप॒हस्वा᳚न॒ आ द॑भन्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} माकीं᳚ ब्रह्म॒द्विषो᳚ वनः||{23/42}{6.3.46.3}{8.45.23}{8.6.3.23}{649, 665, 6927} |
| इ॒ह त्वा॒ गोप॑रीणसा म॒हे म᳚न्दन्तु॒ राध॑से|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} सरो᳚ गौ॒रो यथा᳚ पिब||{24/42}{6.3.46.4}{8.45.24}{8.6.3.24}{650, 665, 6928} |
| या वृ॑त्र॒हा प॑रा॒वति॒ सना॒ नवा᳚ च चुच्यु॒वे|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} ता सं॒सत्सु॒ प्र वो᳚चत||{25/42}{6.3.46.5}{8.45.25}{8.6.3.25}{651, 665, 6929} |
| अपि॑बत् क॒द्रुवः॑ सु॒तमिन्द्रः॑ स॒हस्र॑बाह्वे|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} अत्रा᳚देदिष्ट॒ पौंस्य᳚म्||{26/42}{6.3.47.1}{8.45.26}{8.6.3.26}{652, 665, 6930} |
| स॒त्यं तत् तु॒र्वशे॒ यदौ॒ विदा᳚नो, अह्नवा॒य्यम्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} व्या᳚नट् तु॒र्वणे॒ शमि॑||{27/42}{6.3.47.2}{8.45.27}{8.6.3.27}{653, 665, 6931} |
| त॒रणिं᳚ वो॒ जना᳚नां त्र॒दं वाज॑स्य॒ गोम॑तः|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} स॒मा॒नमु॒ प्र शं᳚सिषम्||{28/42}{6.3.47.3}{8.45.28}{8.6.3.28}{654, 665, 6932} |
| ऋ॒भु॒क्षणं॒ न वर्त॑व उ॒क्थेषु॑ तुग्र्या॒वृध᳚म्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रं॒ सोमे॒ सचा᳚ सु॒ते||{29/42}{6.3.47.4}{8.45.29}{8.6.3.29}{655, 665, 6933} |
| यः कृ॒न्तदिद् वि यो॒न्यं त्रि॒शोका᳚य गि॒रिं पृ॒थुम्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} गोभ्यो᳚ गा॒तुं निरे᳚तवे||{30/42}{6.3.47.5}{8.45.30}{8.6.3.30}{656, 665, 6934} |
| यद्द॑धि॒षे म॑न॒स्यसि॑ मन्दा॒नः प्रेदिय॑क्षसि|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} मा तत् क॑रिन्द्र मृ॒ळय॑||{31/42}{6.3.48.1}{8.45.31}{8.6.3.31}{657, 665, 6935} |
| द॒भ्रं चि॒द्धि त्वाव॑तः कृ॒तं शृ॒ण्वे, अधि॒ क्षमि॑|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} जिगा᳚त्विन्द्र ते॒ मनः॑||{32/42}{6.3.48.2}{8.45.32}{8.6.3.32}{658, 665, 6936} |
| तवेदु॒ ताः सु॑की॒र्तयो ऽस᳚न्नु॒त प्रश॑स्तयः|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} यदि᳚न्द्र मृ॒ळया᳚सि नः||{33/42}{6.3.48.3}{8.45.33}{8.6.3.33}{659, 665, 6937} |
| मा न॒ एक॑स्मि॒न्नाग॑सि॒ मा द्वयो᳚रु॒त त्रि॒षु|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} वधी॒र्मा शू᳚र॒ भूरि॑षु||{34/42}{6.3.48.4}{8.45.34}{8.6.3.34}{660, 665, 6938} |
| बि॒भया॒ हि त्वाव॑त उ॒ग्राद॑भिप्रभ॒ङ्गिणः॑|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} द॒स्माद॒हमृ॑ती॒षहः॑||{35/42}{6.3.48.5}{8.45.35}{8.6.3.35}{661, 665, 6939} |
| मा सख्युः॒ शून॒मा वि॑दे॒ मा पु॒त्रस्य॑ प्रभूवसो|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} आ॒वृत्व॑द् भूतु ते॒ मनः॑||{36/42}{6.3.49.1}{8.45.36}{8.6.3.36}{662, 665, 6940} |
| को नु म᳚र्या॒, अमि॑थितः॒ सखा॒ सखा᳚यमब्रवीत्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} ज॒हा को, अ॒स्मदी᳚षते||{37/42}{6.3.49.2}{8.45.37}{8.6.3.37}{663, 665, 6941} |
| ए॒वारे᳚ वृषभा सु॒ते ऽसि᳚न्व॒न् भूर्या᳚वयः|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} श्व॒घ्नीव॑ नि॒वता॒ चर॑न्||{38/42}{6.3.49.3}{8.45.38}{8.6.3.38}{664, 665, 6942} |
| आ त॑ ए॒ता व॑चो॒युजा॒ हरी᳚ गृभ्णे सु॒मद्र॑था|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} यदीं᳚ ब्र॒ह्मभ्य॒ इद्ददः॑||{39/42}{6.3.49.4}{8.45.39}{8.6.3.39}{665, 665, 6943} |
| भि॒न्धि विश्वा॒, अप॒ द्विषः॒ परि॒ बाधो᳚ ज॒ही मृधः॑|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र||{40/42}{6.3.49.5}{8.45.40}{8.6.3.40}{666, 665, 6944} |
| यद्वी॒ळावि᳚न्द्र॒ यत् स्थि॒रे यत् पर्शा᳚ने॒ परा᳚भृतम्|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र||{41/42}{6.3.49.6}{8.45.41}{8.6.3.41}{667, 665, 6945} |
| यस्य॑ ते वि॒श्वमा᳚नुषो॒ भूरे᳚र्द॒त्तस्य॒ वेद॑ति|{काण्वः त्रिशोकः | इन्द्रः | गायत्री} वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र||{42/42}{6.3.49.7}{8.45.42}{8.6.3.42}{668, 665, 6946} |
| [35] त्वावतइति त्रयस्त्रिंशदृचस्य सूक्तस्याश्व्योवशऋषिः पृथुश्रवादेवता आद्यानांविंशत्यृचामिंद्रोदेवता आनोवायवित्यादिचतसृणां शतंदासइत्यस्याश्चवायुर्देवता आद्यापादनिचृत् द्वितीयादितिस्रोगायत्र्यः पंचम्याद्याः क्रमेण ककुब्गायत्री बृहत्यनुष्टुप् सतोबृहती गायत्री बृहती विपरीतद्विपदागायत्री बृहती पिपीलिकमध्य ककुम्न्यं कुशिरा विराड्जगत्युपरिष्टाद्बृहतबृहती विषमपदाबृहती पंक्तिसंस्तारपंक्ति गायत्री पंक्ति बृहती सतोबृहती बृहती सतोबृहती गायत्री द्विपदविराड् उष्णिक् पंक्ति गायत्र्यः | (पृथुश्रवाः कानीतोराजातस्यदानस्तुतिः) | |
| त्वाव॑तः पुरूवसो व॒यमि᳚न्द्र प्रणेतः|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | गायत्री} स्मसि॑ स्थातर्हरीणाम्||{1/33}{6.4.1.1}{8.46.1}{8.6.4.1}{669, 666, 6947} |
| त्वां हि स॒त्यम॑द्रिवो वि॒द्म दा॒तार॑मि॒षाम्|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | गायत्री} वि॒द्म दा॒तारं᳚ रयी॒णाम्||{2/33}{6.4.1.2}{8.46.2}{8.6.4.2}{670, 666, 6948} |
| आ यस्य॑ ते महि॒मानं॒ शत॑मूते॒ शत॑क्रतो|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | गायत्री} गी॒र्भिर्गृ॒णन्ति॑ का॒रवः॑||{3/33}{6.4.1.3}{8.46.3}{8.6.4.3}{671, 666, 6949} |
| सु॒नी॒थो घा॒ स मर्त्यो॒ यं म॒रुतो॒ यम᳚र्य॒मा|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | गायत्री} मि॒त्रः पान्त्य॒द्रुहः॑||{4/33}{6.4.1.4}{8.46.4}{8.6.4.4}{672, 666, 6950} |
| दधा᳚नो॒ गोम॒दश्व॑वत् सु॒वीर्य॑मादि॒त्यजू᳚त एधते|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | ककुभः} सदा᳚ रा॒या पु॑रु॒स्पृहा᳚||{5/33}{6.4.1.5}{8.46.5}{8.6.4.5}{673, 666, 6951} |
| तमिन्द्रं॒ दान॑मीमहे शवसा॒नमभी᳚र्वम्|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | गायत्री} ईशा᳚नं रा॒य ई᳚महे||{6/33}{6.4.2.1}{8.46.6}{8.6.4.6}{674, 666, 6952} |
| तस्मि॒न् हि सन्त्यू॒तयो॒ विश्वा॒, अभी᳚रवः॒ सचा᳚|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | बृहती} तमा व॑हन्तु॒ सप्त॑यः पुरू॒वसुं॒ मदा᳚य॒ हर॑यः सु॒तम्||{7/33}{6.4.2.2}{8.46.7}{8.6.4.7}{675, 666, 6953} |
| यस्ते॒ मदो॒ वरे᳚ण्यो॒ य इ᳚न्द्र वृत्र॒हन्त॑मः|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} य आ᳚द॒दिः स्व१॑(अ॒)र्नृभि॒र्यः पृत॑नासु दु॒ष्टरः॑||{8/33}{6.4.2.3}{8.46.8}{8.6.4.8}{676, 666, 6954} |
| यो दु॒ष्टरो᳚ विश्ववार श्र॒वाय्यो॒ वाजे॒ष्वस्ति॑ तरु॒ता|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | सतोबृहती} स नः॑ शविष्ठ॒ सव॒ना व॑सो गहि ग॒मेम॒ गोम॑ति व्र॒जे||{9/33}{6.4.2.4}{8.46.9}{8.6.4.9}{677, 666, 6955} |
| ग॒व्यो षु णो॒ यथा᳚ पु॒रा ऽश्व॒योत र॑थ॒या|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | गायत्री} व॒रि॒व॒स्य म॑हामह||{10/33}{6.4.2.5}{8.46.10}{8.6.4.10}{678, 666, 6956} |
| न॒हि ते᳚ शूर॒ राध॒सो ऽन्तं᳚ वि॒न्दामि॑ स॒त्रा|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | बृहती} द॒श॒स्या नो᳚ मघव॒न्नू चि॑दद्रिवो॒ धियो॒ वाजे᳚भिराविथ||{11/33}{6.4.3.1}{8.46.11}{8.6.4.11}{679, 666, 6957} |
| य ऋ॒ष्वः श्रा᳚व॒यत्स॑खा॒ विश्वेत् स वे᳚द॒ जनि॑मा पुरुष्टु॒तः|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | विपरीत बृहती} तं विश्वे॒ मानु॑षा यु॒गेन्द्रं᳚ हवन्ते तवि॒षं य॒तस्रु॑चः||{12/33}{6.4.3.2}{8.46.12}{8.6.4.12}{680, 666, 6958} |
| स नो॒ वाजे᳚ष्ववि॒ता पु॑रू॒वसुः॑ पुरःस्था॒ता म॒घवा᳚ वृत्र॒हा भु॑वत्||{आश्व्योवशः | इन्द्रः | द्विपदा जगती}{13/33}{6.4.3.3}{8.46.13}{8.6.4.13}{681, 666, 6959} |
| अ॒भि वो᳚ वी॒रमन्ध॑सो॒ मदे᳚षु गाय गि॒रा म॒हा विचे᳚तसम्|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | बृहती पिपीलिकमध्य} इन्द्रं॒ नाम॒ श्रुत्यं᳚ शा॒किनं॒ वचो॒ यथा᳚||{14/33}{6.4.3.4}{8.46.14}{8.6.4.14}{682, 666, 6960} |
| द॒दी रेक्ण॑स्त॒न्वे᳚ द॒दिर्वसु॑ द॒दिर्वाजे᳚षु पुरुहूत वा॒जिन᳚म्|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | ककुम्न्यंकुशिरा} नू॒नमथ॑||{15/33}{6.4.3.5}{8.46.15}{8.6.4.15}{683, 666, 6961} |
| विश्वे᳚षामिर॒ज्यन्तं॒ वसू᳚नां सास॒ह्वांसं᳚ चिद॒स्य वर्प॑सः|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | विराट्} कृ॒प॒य॒तो नू॒नमत्यथ॑||{16/33}{6.4.4.1}{8.46.16}{8.6.4.16}{684, 666, 6962} |
| म॒हः सु वो॒, अर॑मिषे॒ स्तवा᳚महे मी॒ळ्हुषे᳚ अरंग॒माय॒ जग्म॑ये|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | जगती} य॒ज्ञेभि॑र्गी॒र्भिर्वि॒श्वम॑नुषां म॒रुता᳚मियक्षसि॒ गाये᳚ त्वा॒ नम॑सा गि॒रा||{17/33}{6.4.4.2}{8.46.17}{8.6.4.17}{685, 666, 6963} |
| ये पा॒तय᳚न्ते॒, अज्म॑भिर्गिरी॒णां स्नुभि॑रेषाम्|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | उपरिष्टाद् बृहती} य॒ज्ञं म॑हि॒ष्वणी᳚नां सु॒म्नं तु॑वि॒ष्वणी᳚नां॒ प्राध्व॒रे||{18/33}{6.4.4.3}{8.46.18}{8.6.4.18}{686, 666, 6964} |
| प्र॒भ॒ङ्गं दु᳚र्मती॒नामिन्द्र॑ शवि॒ष्ठा भ॑र|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | बृहती} र॒यिम॒स्मभ्यं॒ युज्यं᳚ चोदयन्मते॒ ज्येष्ठं᳚ चोदयन्मते||{19/33}{6.4.4.4}{8.46.19}{8.6.4.19}{687, 666, 6965} |
| सनि॑तः॒ सुस॑नित॒रुग्र॒ चित्र॒ चेति॑ष्ठ॒ सूनृ॑त|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | विषमपदाबृहती} प्रा॒सहा᳚ सम्रा॒ट् सहु॑रिं॒ सह᳚न्तं भु॒ज्युं वाजे᳚षु॒ पूर्व्य᳚म्||{20/33}{6.4.4.5}{8.46.20}{8.6.4.20}{688, 666, 6966} |
| आ स ए᳚तु॒ य ईव॒दाँ, अदे᳚वः पू॒र्तमा᳚द॒दे|{आश्व्योवश शतंदासश्च | पृथुश्रवादेवता | पङ्क्तिः} यथा᳚ चि॒द्वशो᳚ अ॒श्व्यः पृ॑थु॒श्रव॑सि कानी॒ते॒३॑(ए॒)ऽस्या व्युष्या᳚द॒दे||{21/33}{6.4.5.1}{8.46.21}{8.6.4.21}{689, 666, 6967} |
| ष॒ष्टिं स॒हस्राश्व्य॑स्या॒युता᳚सन॒मुष्ट्रा᳚नां विंश॒तिं श॒ता|{आश्व्योवश शतंदासश्च | पृथुश्रवादेवता | संस्तार पङ्क्तिः} दश॒ श्यावी᳚नां श॒ता दश॒ त्र्य॑रुषीणां॒ दश॒ गवां᳚ स॒हस्रा᳚||{22/33}{6.4.5.2}{8.46.22}{8.6.4.22}{690, 666, 6968} |
| दश॑ श्या॒वा, ऋ॒धद्र॑यो वी॒तवा᳚रास आ॒शवः॑|{आश्व्योवश शतंदासश्च | पृथुश्रवादेवता | पङ्क्तिः} म॒थ्रा ने॒मिं नि वा᳚वृतुः||{23/33}{6.4.5.3}{8.46.23}{8.6.4.23}{691, 666, 6969} |
| दाना᳚सः पृथु॒श्रव॑सः कानी॒तस्य॑ सु॒राध॑सः|{आश्व्योवशः | पृथुश्रवादेवता | पङ्क्तिः} रथं᳚ हिर॒ण्ययं॒ दद॒न्मंहि॑ष्ठः सू॒रिर॑भू॒द्वर्षि॑ष्ठमकृत॒ श्रवः॑||{24/33}{6.4.5.4}{8.46.24}{8.6.4.24}{692, 666, 6970} |
| आ नो᳚ वायो म॒हे तने᳚ या॒हि म॒खाय॒ पाज॑से|{आश्व्योवशः | वायुः | बृहती} व॒यं हि ते᳚ चकृ॒मा भूरि॑ दा॒वने᳚ स॒द्यश्चि॒न्महि॑ दा॒वने᳚||{25/33}{6.4.5.5}{8.46.25}{8.6.4.25}{693, 666, 6971} |
| यो, अश्वे᳚भि॒र्वह॑ते॒ वस्त॑ उ॒स्रास्त्रिः स॒प्त स॑प्तती॒नाम्|{आश्व्योवशः | वायुः | सतो बृहती} ए॒भिः सोमे᳚भिः सोम॒सुद्भिः॑ सोमपा दा॒नाय॑ शुक्रपूतपाः||{26/33}{6.4.6.1}{8.46.26}{8.6.4.26}{694, 666, 6972} |
| यो म॑ इ॒मं चि॑दु॒ त्मनाम᳚न्दच्चि॒त्रं दा॒वने᳚|{आश्व्योवशः | वायुः | बृहती} अ॒र॒ट्वे, अक्षे॒ नहु॑षे सु॒कृत्व॑नि सु॒कृत्त॑राय सु॒क्रतुः॑||{27/33}{6.4.6.2}{8.46.27}{8.6.4.27}{695, 666, 6973} |
| उ॒च॒थ्ये॒३॑(ए॒) वपु॑षि॒ यः स्व॒राळु॒त वा᳚यो घृत॒स्नाः|{आश्व्योवशः | वायुः | सतो बृहती} अश्वे᳚षितं॒ रजे᳚षितं॒ शुने᳚षितं॒ प्राज्म॒ तदि॒दं नु तत्||{28/33}{6.4.6.3}{8.46.28}{8.6.4.28}{696, 666, 6974} |
| अध॑ प्रि॒यमि॑षि॒राय॑ ष॒ष्टिं स॒हस्रा᳚सनम्|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | गायत्री} अश्वा᳚ना॒मिन्न वृष्णा᳚म्||{29/33}{6.4.6.4}{8.46.29}{8.6.4.29}{697, 666, 6975} |
| गावो॒ न यू॒थमुप॑ यन्ति॒ वध्र॑य॒ उप॒ मा य᳚न्ति॒ वध्र॑यः||{आश्व्योवशः | इन्द्रः | द्विपदा विराट्}{30/33}{6.4.6.5}{8.46.30}{8.6.4.30}{698, 666, 6976} |
| अध॒ यच्चार॑थे ग॒णे श॒तमुष्ट्राँ॒, अचि॑क्रदत्|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | उषिक्} अध॒ श्वित्ने᳚षु विंश॒तिं श॒ता||{31/33}{6.4.6.6}{8.46.31}{8.6.4.31}{699, 666, 6977} |
| श॒तं दा॒से ब᳚ल्बू॒थे विप्र॒स्तरु॑क्ष॒ आ द॑दे|{आश्व्योवशः | वायुः | पङ्क्तिः} ते ते᳚ वायवि॒मे जना॒ मद॒न्तीन्द्र॑गोपा॒ मद᳚न्ति दे॒वगो᳚पाः||{32/33}{6.4.6.7}{8.46.32}{8.6.4.32}{700, 666, 6978} |
| अध॒ स्या योष॑णा म॒ही प्र॑ती॒ची वश॑म॒श्व्यम्|{आश्व्योवशः | इन्द्रः | गायत्री} अधि॑रुक्मा॒ वि नी᳚यते||{33/33}{6.4.6.8}{8.46.33}{8.6.4.33}{701, 666, 6979} |
| [36] महिवइत्यष्टादशर्चस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रित आदित्या अंत्यपंचानामादित्योषसो महापंक्तिः | (अंत्याः पंचदु:स्वप्नघ्न्यः) | |
| महि॑ वो मह॒तामवो॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ दा॒शुषे᳚|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} यमा᳚दित्या, अ॒भि द्रु॒हो रक्ष॑था॒ नेम॒घं न॑शदने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{1/18}{6.4.7.1}{8.47.1}{8.6.5.1}{702, 667, 6980} |
| वि॒दा दे᳚वा, अ॒घाना॒मादि॑त्यासो, अ॒पाकृ॑तिम्|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} प॒क्षा वयो॒ यथो॒परि॒ व्य१॑(अ॒)स्मे शर्म॑ यच्छताने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{2/18}{6.4.7.2}{8.47.2}{8.6.5.2}{703, 667, 6981} |
| व्य१॑(अ॒)स्मे, अधि॒ शर्म॒ तत् प॒क्षा वयो॒ न य᳚न्तन|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} विश्वा᳚नि विश्ववेदसो वरू॒थ्या᳚ मनामहे ऽने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{3/18}{6.4.7.3}{8.47.3}{8.6.5.3}{704, 667, 6982} |
| यस्मा॒, अरा᳚सत॒ क्षयं᳚ जी॒वातुं᳚ च॒ प्रचे᳚तसः|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} मनो॒र्विश्व॑स्य॒ घेदि॒म आ᳚दि॒त्या रा॒य ई᳚शते ऽने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{4/18}{6.4.7.4}{8.47.4}{8.6.5.4}{705, 667, 6983} |
| परि॑ णो वृणजन्न॒घा दु॒र्गाणि॑ र॒थ्यो᳚ यथा|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} स्यामेदिन्द्र॑स्य॒ शर्म᳚ण्यादि॒त्याना᳚मु॒ताव॑स्यने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{5/18}{6.4.7.5}{8.47.5}{8.6.5.5}{706, 667, 6984} |
| प॒रि॒ह्वृ॒तेद॒ना जनो᳚ यु॒ष्माद॑त्तस्य वायति|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} देवा॒, अद॑भ्रमाश वो॒ यमा᳚दित्या॒, अहे᳚तनाने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{6/18}{6.4.8.1}{8.47.6}{8.6.5.6}{707, 667, 6985} |
| न तं ति॒ग्मं च॒न त्यजो॒ न द्रा᳚सद॒भि तं गु॒रु|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} यस्मा᳚ उ॒ शर्म॑ स॒प्रथ॒ आदि॑त्यासो॒, अरा᳚ध्वमने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{7/18}{6.4.8.2}{8.47.7}{8.6.5.7}{708, 667, 6986} |
| यु॒ष्मे दे᳚वा॒, अपि॑ ष्मसि॒ युध्य᳚न्त इव॒ वर्म॑सु|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} यू॒यं म॒हो न॒ एन॑सो यू॒यमर्भा᳚दुरुष्यताने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{8/18}{6.4.8.3}{8.47.8}{8.6.5.8}{709, 667, 6987} |
| अदि॑तिर्न उरुष्य॒त्वदि॑तिः॒ शर्म॑ यच्छतु|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} मा॒ता मि॒त्रस्य॑ रे॒वतो᳚ ऽर्य॒म्णो वरु॑णस्य चाने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{9/18}{6.4.8.4}{8.47.9}{8.6.5.9}{710, 667, 6988} |
| यद्दे᳚वाः॒ शर्म॑ शर॒णं यद्भ॒द्रं यद॑नातु॒रम्|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} त्रि॒धातु॒ यद्व॑रू॒थ्य१॑(अं॒) तद॒स्मासु॒ वि य᳚न्तनाने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{10/18}{6.4.8.5}{8.47.10}{8.6.5.10}{711, 667, 6989} |
| आदि॑त्या॒, अव॒ हि ख्यताधि॒ कूला᳚दिव॒ स्पशः॑|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} सु॒ती॒र्थमर्व॑तो य॒थानु॑ नो नेषथा सु॒गम॑ने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{11/18}{6.4.9.1}{8.47.11}{8.6.5.11}{712, 667, 6990} |
| नेह भ॒द्रं र॑क्ष॒स्विने॒ नाव॒यै नोप॒या, उ॒त|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} गवे᳚ च भ॒द्रं धे॒नवे᳚ वी॒राय॑ च श्रवस्य॒ते᳚ ऽने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{12/18}{6.4.9.2}{8.47.12}{8.6.5.12}{713, 667, 6991} |
| यदा॒विर्यद॑पी॒च्य१॑(अं॒) देवा᳚सो॒, अस्ति॑ दुष्कृ॒तम्|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्याः | महापङ्क्तिः} त्रि॒ते तद्विश्व॑मा॒प्त्य आ॒रे, अ॒स्मद्द॑धातनाने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{13/18}{6.4.9.3}{8.47.13}{8.6.5.13}{714, 667, 6992} |
| यच्च॒ गोषु॑ दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ यच्चा॒स्मे दु॑हितर्दिवः|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्या उषाश्च | महापङ्क्तिः} त्रि॒ताय॒ तद्वि॑भावर्या॒प्त्याय॒ परा᳚ वहाने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{14/18}{6.4.9.4}{8.47.14}{8.6.5.14}{715, 667, 6993} |
| नि॒ष्कं वा᳚ घा कृ॒णव॑ते॒ स्रजं᳚ वा दुहितर्दिवः|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्या उषाश्च | महापङ्क्तिः} त्रि॒ते दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ सर्व॑मा॒प्त्ये परि॑ दद्मस्यने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{15/18}{6.4.9.5}{8.47.15}{8.6.5.15}{716, 667, 6994} |
| तद᳚न्नाय॒ तद॑पसे॒ तं भा॒गमु॑पसे॒दुषे᳚|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्या उषाश्च | महापङ्क्तिः} त्रि॒ताय॑ च द्वि॒ताय॒ चोषो᳚ दु॒ष्ष्वप्न्यं᳚ वहाने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{16/18}{6.4.10.1}{8.47.16}{8.6.5.16}{717, 667, 6995} |
| यथा᳚ क॒लां यथा᳚ श॒फं यथ॑ ऋ॒णं सं॒नया᳚मसि|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्या उषाश्च | महापङ्क्तिः} ए॒वा दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ सर्व॑मा॒प्त्ये सं न॑यामस्यने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{17/18}{6.4.10.2}{8.47.17}{8.6.5.17}{718, 667, 6996} |
| अजै᳚ष्मा॒द्यास॑नाम॒ चाभू॒माना᳚गसो व॒यम्|{अप्त्यस्त्रितः | आदित्या उषाश्च | महापङ्क्तिः} उषो॒ यस्मा᳚द्दु॒ष्ष्वप्न्या॒दभै॒ष्माप॒ तदु॑च्छत्वने॒हसो᳚ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो᳚ व ऊ॒तयः॑||{18/18}{6.4.10.3}{8.47.18}{8.6.5.18}{719, 667, 6997} |
| [37] स्वादोरिति पंचदशर्चस्य सूक्तस्य काण्वः प्रगाथः सोमस्त्रिष्टुप् पंचमी जगती | |
| स्वा॒दोर॑भक्षि॒ वय॑सः सुमे॒धाः स्वा॒ध्यो᳚ वरिवो॒वित्त॑रस्य|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} विश्वे॒ यं दे॒वा, उ॒त मर्त्या᳚सो॒ मधु॑ ब्रु॒वन्तो᳚ अ॒भि सं॒चर᳚न्ति||{1/15}{6.4.11.1}{8.48.1}{8.6.6.1}{720, 668, 6998} |
| अ॒न्तश्च॒ प्रागा॒, अदि॑तिर्भवास्यवया॒ता हर॑सो॒ दैव्य॑स्य|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} इन्द॒विन्द्र॑स्य स॒ख्यं जु॑षा॒णः श्रौष्टी᳚व॒ धुर॒मनु॑ रा॒य ऋ॑ध्याः||{2/15}{6.4.11.2}{8.48.2}{8.6.6.2}{721, 668, 6999} |
| अपा᳚म॒ सोम॑म॒मृता᳚ अभू॒माग᳚न्म॒ ज्योति॒रवि॑दाम दे॒वान्|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} किं नू॒नम॒स्मान् कृ॑णव॒दरा᳚तिः॒ किमु॑ धू॒र्तिर॑मृत॒ मर्त्य॑स्य||{3/15}{6.4.11.3}{8.48.3}{8.6.6.3}{722, 668, 7000} |
| शं नो᳚ भव हृ॒द आ पी॒त इ᳚न्दो पि॒तेव॑ सोम सू॒नवे᳚ सु॒शेवः॑|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} सखे᳚व॒ सख्य॑ उरुशंस॒ धीरः॒ प्र ण॒ आयु॑र्जी॒वसे᳚ सोम तारीः||{4/15}{6.4.11.4}{8.48.4}{8.6.6.4}{723, 668, 7001} |
| इ॒मे मा᳚ पी॒ता य॒शस॑ उरु॒ष्यवो॒ रथं॒ न गावः॒ सम॑नाह॒ पर्व॑सु|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} ते मा᳚ रक्षन्तु वि॒स्रस॑श्च॒रित्रा᳚दु॒त मा॒ स्रामा᳚द्यवय॒न्त्विन्द॑वः||{5/15}{6.4.11.5}{8.48.5}{8.6.6.5}{724, 668, 7002} |
| अ॒ग्निं न मा᳚ मथि॒तं सं दि॑दीपः॒ प्र च॑क्षय कृणु॒हि वस्य॑सो नः|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} अथा॒ हि ते॒ मद॒ आ सो᳚म॒ मन्ये᳚ रे॒वाँ, इ॑व॒ प्र च॑रा पु॒ष्टिमच्छ॑||{6/15}{6.4.12.1}{8.48.6}{8.6.6.6}{725, 668, 7003} |
| इ॒षि॒रेण॑ ते॒ मन॑सा सु॒तस्य॑ भक्षी॒महि॒ पित्र्य॑स्येव रा॒यः|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} सोम॑ राज॒न् प्र ण॒ आयूं᳚षि तारी॒रहा᳚नीव॒ सूर्यो᳚ वास॒राणि॑||{7/15}{6.4.12.2}{8.48.7}{8.6.6.7}{726, 668, 7004} |
| सोम॑ राजन् मृ॒ळया᳚ नः स्व॒स्ति तव॑ स्मसि व्र॒त्या॒३॑(आ॒)स्तस्य॑ विद्धि|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} अल॑र्ति॒ दक्ष॑ उ॒त म॒न्युरि᳚न्दो॒ मा नो᳚ अ॒र्यो, अ॑नुका॒मं परा᳚ दाः||{8/15}{6.4.12.3}{8.48.8}{8.6.6.8}{727, 668, 7005} |
| त्वं हि न॑स्त॒न्वः॑ सोम गो॒पा गात्रे᳚गात्रे निष॒सत्था᳚ नृ॒चक्षाः᳚|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} यत् ते᳚ व॒यं प्र॑मि॒नाम᳚ व्र॒तानि॒ स नो᳚ मृळ सुष॒खा दे᳚व॒ वस्यः॑||{9/15}{6.4.12.4}{8.48.9}{8.6.6.9}{728, 668, 7006} |
| ऋ॒दू॒दरे᳚ण॒ सख्या᳚ सचेय॒ यो मा॒ न रिष्ये᳚द्धर्यश्व पी॒तः|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} अ॒यं यः सोमो॒ न्यधा᳚य्य॒स्मे तस्मा॒, इन्द्रं᳚ प्र॒तिर॑मे॒म्यायुः॑||{10/15}{6.4.12.5}{8.48.10}{8.6.6.10}{729, 668, 7007} |
| अप॒ त्या, अ॑स्थु॒रनि॑रा॒, अमी᳚वा॒ निर॑त्रस॒न् तमि॑षीची॒रभै᳚षुः|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} आ सोमो᳚ अ॒स्माँ, अ॑रुह॒द् विहा᳚या॒, अग᳚न्म॒ यत्र॑ प्रति॒रन्त॒ आयुः॑||{11/15}{6.4.13.1}{8.48.11}{8.6.6.11}{730, 668, 7008} |
| यो न॒ इन्दुः॑ पितरो हृ॒त्सु पी॒तो ऽम॑र्त्यो॒ मर्त्याँ᳚, आवि॒वेश॑|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} तस्मै॒ सोमा᳚य ह॒विषा᳚ विधेम मृळी॒के, अ॑स्य सुम॒तौ स्या᳚म||{12/15}{6.4.13.2}{8.48.12}{8.6.6.12}{731, 668, 7009} |
| त्वं सो᳚म पि॒तृभिः॑ संविदा॒नो ऽनु॒ द्यावा᳚पृथि॒वी, आ त॑तन्थ|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} तस्मै᳚ त इन्दो ह॒विषा᳚ विधेम व॒यं स्या᳚म॒ पत॑यो रयी॒णाम्||{13/15}{6.4.13.3}{8.48.13}{8.6.6.13}{732, 668, 7010} |
| त्राता᳚रो देवा॒, अधि॑ वोचता नो॒ मा नो᳚ नि॒द्रा, ई᳚शत॒ मोत जल्पिः॑|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} व॒यं सोम॑स्य वि॒श्वह॑ प्रि॒यासः॑ सु॒वीरा᳚सो वि॒दथ॒मा व॑देम||{14/15}{6.4.13.4}{8.48.14}{8.6.6.14}{733, 668, 7011} |
| त्वं नः॑ सोम वि॒श्वतो᳚ वयो॒धास्त्वं स्व॒र्विदा वि॑शा नृ॒चक्षाः᳚|{काण्वः प्रगाथः | सोमः | त्रिष्टुप्} त्वं न॑ इन्द ऊ॒तिभिः॑ स॒जोषाः᳚ पा॒हि प॒श्चाता᳚दु॒त वा᳚ पु॒रस्ता᳚त्||{15/15}{6.4.13.5}{8.48.15}{8.6.6.15}{734, 668, 7012} |
| [38] अभिप्रेति दशर्चस्य सूक्तस्य काण्वःप्रस्कण्व इंद्रः अयुजोबृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | |
| अ॒भि प्र वः॑ सु॒राध॑स॒मिन्द्र॑मर्च॒ यथा᳚ वि॒दे|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | बृहती} यो ज॑रि॒तृभ्यो᳚ म॒घवा᳚ पुरू॒वसुः॑ स॒हस्रे᳚णेव॒ शिक्ष॑ति||{1/10}{6.4.14.1}{8.49.1}{8.6.7.1}{735, 669, 7013} |
| श॒तानी᳚केव॒ प्र जि॑गाति धृष्णु॒या हन्ति॑ वृ॒त्राणि॑ दा॒शुषे᳚|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | सतोबृहती} गि॒रेरि॑व॒ प्र रसा᳚ अस्य पिन् विरे॒ दत्रा᳚णि पुरु॒भोज॑सः||{2/10}{6.4.14.2}{8.49.2}{8.6.7.2}{736, 669, 7014} |
| आ त्वा᳚ सु॒तास॒ इन्द॑वो॒ मदा॒ य इ᳚न्द्र गिर्वणः|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | बृहती} आपो॒ न व॑ज्रि॒न्नन्वो॒क्य१॑(अं॒) सरः॑ पृ॒णन्ति॑ शूर॒ राध॑से||{3/10}{6.4.14.3}{8.49.3}{8.6.7.3}{737, 669, 7015} |
| अ॒ने॒हसं᳚ प्र॒तर॑णं वि॒वक्ष॑णं॒ मध्वः॒ स्वादि॑ष्ठमीं पिब|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | सतोबृहती} आ यथा᳚ मन्दसा॒नः कि॒रासि॑ नः॒ प्र क्षु॒द्रेव॒ त्मना᳚ धृ॒षत्||{4/10}{6.4.14.4}{8.49.4}{8.6.7.4}{738, 669, 7016} |
| आ नः॒ स्तोम॒मुप॑ द्र॒वद्धि॑या॒नो, अश्वो॒ न सोतृ॑भिः|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | बृहती} यं ते᳚ स्वधावन् त्स्व॒दय᳚न्ति धे॒नव॒ इन्द्र॒ कण्वे᳚षु रा॒तयः॑||{5/10}{6.4.14.5}{8.49.5}{8.6.7.5}{739, 669, 7017} |
| उ॒ग्रं न वी॒रं नम॒सोप॑ सेदिम॒ विभू᳚ति॒मक्षि॑तावसुम्|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | सतोबृहती} उ॒द्रीव॑ वज्रिन्नव॒तो न सि᳚ञ्च॒ते क्षर᳚न्तीन्द्र धी॒तयः॑||{6/10}{6.4.15.1}{8.49.6}{8.6.7.6}{740, 669, 7018} |
| यद्ध॑ नू॒नं यद्वा᳚ य॒ज्ञे यद्वा᳚ पृथि॒व्यामधि॑|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | बृहती} अतो᳚ नो य॒ज्ञमा॒शुभि᳚र्महेमत उ॒ग्र उ॒ग्रेभि॒रा ग॑हि||{7/10}{6.4.15.2}{8.49.7}{8.6.7.7}{741, 669, 7019} |
| अ॒जि॒रासो॒ हर॑यो॒ ये त॑ आ॒शवो॒ वाता᳚ इव प्रस॒क्षिणः॑|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | सतोबृहती} येभि॒रप॑त्यं॒ मनु॑षः प॒रीय॑से॒ येभि॒र्विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे||{8/10}{6.4.15.3}{8.49.8}{8.6.7.8}{742, 669, 7020} |
| ए॒ताव॑तस्त ईमह॒ इन्द्र॑ सु॒म्नस्य॒ गोम॑तः|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | बृहती} यथा॒ प्रावो᳚ मघव॒न् मेध्या᳚तिथिं॒ यथा॒ नीपा᳚तिथिं॒ धने᳚||{9/10}{6.4.15.4}{8.49.9}{8.6.7.9}{743, 669, 7021} |
| यथा॒ कण्वे᳚ मघवन् त्र॒सद॑स्यवि॒ यथा᳚ प॒क्थे दश᳚व्रजे|{काण्वः प्रस्कण्वः | इन्द्रः | सतोबृहती} यथा॒ गोश᳚र्ये॒, अस॑नोरृ॒जिश्व॒नीन्द्र॒ गोम॒द्धिर᳚ण्यवत्||{10/10}{6.4.15.5}{8.49.10}{8.6.7.10}{744, 669, 7022} |
| [39] प्रसुश्रुतमिति दशर्चस्य सूक्तस्य पुष्टिगुरिंद्रः अयुजो बृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | |
| प्र सु श्रु॒तं सु॒राध॑स॒मर्चा᳚ श॒क्रम॒भिष्ट॑ये|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} यः सु᳚न्व॒ते स्तु॑व॒ते काम्यं॒ वसु॑ स॒हस्रे᳚णेव॒ मंह॑ते||{1/10}{6.4.16.1}{8.50.1}{8.6.8.1}{745, 670, 7023} |
| श॒तानी᳚का हे॒तयो᳚ अस्य दु॒ष्टरा॒, इन्द्र॑स्य स॒मिषो᳚ म॒हीः|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} गि॒रिर्न भु॒ज्मा म॒घव॑त्सु पिन्वते॒ यदीं᳚ सु॒ता, अम᳚न्दिषुः||{2/10}{6.4.16.2}{8.50.2}{8.6.8.2}{746, 670, 7024} |
| यदीं᳚ सु॒तास॒ इन्द॑वो॒ ऽभि प्रि॒यमम᳚न्दिषुः|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} आपो॒ न धा᳚यि॒ सव॑नं म॒ आ व॑सो॒ दुघा᳚ इ॒वोप॑ दा॒शुषे᳚||{3/10}{6.4.16.3}{8.50.3}{8.6.8.3}{747, 670, 7025} |
| अ॒ने॒हसं᳚ वो॒ हव॑मानमू॒तये॒ मध्वः॑, क्षरन्ति धी॒तयः॑|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} आ त्वा᳚ वसो॒ हव॑मानास॒ इन्द॑व॒ उप॑ स्तो॒त्रेषु॑ दधिरे||{4/10}{6.4.16.4}{8.50.4}{8.6.8.4}{748, 670, 7026} |
| आ नः॒ सोमे᳚ स्वध्व॒र इ॑या॒नो, अत्यो॒ न तो᳚शते|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} यं ते᳚ स्वदाव॒न् त्स्वद᳚न्ति गू॒र्तयः॑ पौ॒रे छ᳚न्दयसे॒ हव᳚म्||{5/10}{6.4.16.5}{8.50.5}{8.6.8.5}{749, 670, 7027} |
| प्र वी॒रमु॒ग्रं विवि॑चिं धन॒स्पृतं॒ विभू᳚तिं॒ राध॑सो म॒हः|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} उ॒द्रीव॑ वज्रिन्नव॒तो व॑सुत्व॒ना सदा᳚ पीपेथ दा॒शुषे᳚||{6/10}{6.4.17.1}{8.50.6}{8.6.8.6}{750, 670, 7028} |
| यद्ध॑ नू॒नं प॑रा॒वति॒ यद् वा᳚ पृथि॒व्यां दि॒वि|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} यु॒जा॒न इ᳚न्द्र॒ हरि॑भिर्महेमत ऋ॒ष्व ऋ॒ष्वेभि॒रा ग॑हि||{7/10}{6.4.17.2}{8.50.7}{8.6.8.7}{751, 670, 7029} |
| र॒थि॒रासो॒ हर॑यो॒ ये ते᳚ अ॒स्रिध॒ ओजो॒ वात॑स्य॒ पिप्र॑ति|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} येभि॒र्नि दस्युं॒ मनु॑षो नि॒घोष॑यो॒ येभिः॒ स्वः॑ प॒रीय॑से||{8/10}{6.4.17.3}{8.50.8}{8.6.8.8}{752, 670, 7030} |
| ए॒ताव॑तस्ते वसो वि॒द्याम॑ शूर॒ नव्य॑सः|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} यथा॒ प्राव॒ एत॑शं॒ कृत्व्ये॒ धने॒ यथा॒ वशं॒ दश᳚व्रजे||{9/10}{6.4.17.4}{8.50.9}{8.6.8.9}{753, 670, 7031} |
| यथा॒ कण्वे᳚ मघव॒न् मेधे᳚ अध्व॒रे दी॒र्घनी᳚थे॒ दमू᳚नसि|{पुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} यथा॒ गोश᳚र्ये॒, असि॑षासो, अद्रिवो॒ मयि॑ गो॒त्रं ह॑रि॒श्रिय᳚म्||{10/10}{6.4.17.5}{8.50.10}{8.6.8.10}{754, 670, 7032} |
| [40] यथामनाविति दशर्चस्य सूक्तस्य श्रुष्टिगुरिंद्रः अयुजोबृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | |
| यथा॒ मनौ॒ सांव॑रणौ॒ सोम॑मि॒न्द्रापि॑बः सु॒तम्|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} नीपा᳚तिथौ मघव॒न् मेध्या᳚तिथौ॒ पुष्टि॑गौ॒ श्रुष्टि॑गौ॒ सचा᳚||{1/10}{6.4.18.1}{8.51.1}{8.6.9.1}{755, 671, 7033} |
| पा॒र्ष॒द्वा॒णः प्रस्क᳚ण्वं॒ सम॑सादय॒च्छया᳚नं॒ जिव्रि॒मुद्धि॑तम्|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} स॒हस्रा᳚ण्यसिषास॒द् गवा॒मृषि॒स्त्वोतो॒ दस्य॑वे॒ वृकः॑||{2/10}{6.4.18.2}{8.51.2}{8.6.9.2}{756, 671, 7034} |
| य उ॒क्थेभि॒र्न वि॒न्धते᳚ चि॒किद्य ऋ॑षि॒चोद॑नः|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} इन्द्रं॒ तमच्छा᳚ वद॒ नव्य॑स्या म॒त्यरि॑ष्यन्तं॒ न भोज॑से||{3/10}{6.4.18.3}{8.51.3}{8.6.9.3}{757, 671, 7035} |
| यस्मा᳚ अ॒र्कं स॒प्तशी᳚र्षाणमानृ॒चुस्त्रि॒धातु॑मुत्त॒मे प॒दे|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} स त्वि१॑(इ॒)मा विश्वा॒ भुव॑नानि चिक्रद॒दादिज्ज॑निष्ट॒ पौंस्य᳚म्||{4/10}{6.4.18.4}{8.51.4}{8.6.9.4}{758, 671, 7036} |
| यो नो᳚ दा॒ता वसू᳚ना॒मिन्द्रं॒ तं हू᳚महे व॒यम्|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} वि॒द्मा ह्य॑स्य सुम॒तिं नवी᳚यसीं ग॒मेम॒ गोम॑ति व्र॒जे||{5/10}{6.4.18.5}{8.51.5}{8.6.9.5}{759, 671, 7037} |
| यस्मै॒ त्वं व॑सो दा॒नाय॒ शिक्ष॑सि॒ स रा॒यस्पोष॑मश्नुते|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} तं त्वा᳚ व॒यं म॑घवन्निन्द्र गिर्वणः सु॒ताव᳚न्तो हवामहे||{6/10}{6.4.19.1}{8.51.6}{8.6.9.6}{760, 671, 7038} |
| क॒दा च॒न स्त॒रीर॑सि॒ नेन्द्र॑ सश्चसि दा॒शुषे᳚|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} उपो॒पेन्नु म॑घव॒न् भूय॒ इन्नु ते॒ दानं᳚ दे॒वस्य॑ पृच्यते||{7/10}{6.4.19.2}{8.51.7}{8.6.9.7}{761, 671, 7039} |
| प्र यो न॑न॒क्षे, अ॒भ्योज॑सा॒ क्रिविं᳚ व॒धैः शुष्णं᳚ निघो॒षय॑न्|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} य॒देदस्त᳚म्भीत् प्र॒थय᳚न्न॒मूं दिव॒मादिज्ज॑निष्ट॒ पार्थि॑वः||{8/10}{6.4.19.3}{8.51.8}{8.6.9.8}{762, 671, 7040} |
| यस्या॒यं विश्व॒ आर्यो॒ दासः॑ शेवधि॒पा, अ॒रिः|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | बृहती} ति॒रश्चि॑द॒र्ये रुश॑मे॒ पवी᳚रवि॒ तुभ्येत् सो, अ॑ज्यते र॒यिः||{9/10}{6.4.19.4}{8.51.9}{8.6.9.9}{763, 671, 7041} |
| तु॒र॒ण्यवो॒ मधु॑मन्तं घृत॒श्चुतं॒ विप्रा᳚सो, अ॒र्कमा᳚नृचुः|{श्रुष्टिगुः | इन्द्रः | सतोबृहती} अ॒स्मे र॒यिः प॑प्रथे॒ वृष्ण्यं॒ शवो॒ ऽस्मे सु॑वा॒नास॒ इन्द॑वः||{10/10}{6.4.19.5}{8.51.10}{8.6.9.10}{764, 671, 7042} |
| [41] यथामनाविति दशर्चस्य सूक्तस्यायुरिंद्रः अयुजोबृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | |
| यथा॒ मनौ॒ विव॑स्वति॒ सोमं᳚ श॒क्रापि॑बः सु॒तम्|{आयुः | इन्द्रः | बृहती} यथा᳚ त्रि॒ते छन्द॑ इन्द्र॒ जुजो᳚षस्या॒यौ मा᳚दयसे॒ सचा᳚||{1/10}{6.4.20.1}{8.52.1}{8.6.10.1}{765, 672, 7043} |
| पृष॑ध्रे॒ मेध्ये᳚ मात॒रिश्व॒नीन्द्र॑ सुवा॒ने, अम᳚न्दथाः|{आयुः | इन्द्रः | सतोबृहती} यथा॒ सोमं॒ दश॑शिप्रे॒ दशो᳚ण्ये॒ स्यूम॑रश्मा॒वृजू᳚नसि||{2/10}{6.4.20.2}{8.52.2}{8.6.10.2}{766, 672, 7044} |
| य उ॒क्था केव॑ला द॒धे यः सोमं᳚ धृषि॒तापि॑बत्|{आयुः | इन्द्रः | बृहती} यस्मै॒ विष्णु॒स्त्रीणि॑ प॒दा वि॑चक्र॒म उप॑ मि॒त्रस्य॒ धर्म॑भिः||{3/10}{6.4.20.3}{8.52.3}{8.6.10.3}{767, 672, 7045} |
| यस्य॒ त्वमि᳚न्द्र॒ स्तोमे᳚षु चा॒कनो॒ वाजे᳚ वाजिञ्छतक्रतो|{आयुः | इन्द्रः | सतोबृहती} तं त्वा᳚ व॒यं सु॒दुघा᳚मिव गो॒दुहो᳚ जुहू॒मसि॑ श्रव॒स्यवः॑||{4/10}{6.4.20.4}{8.52.4}{8.6.10.4}{768, 672, 7046} |
| यो नो᳚ दा॒ता स नः॑ पि॒ता म॒हाँ, उ॒ग्र ई᳚शान॒कृत्|{आयुः | इन्द्रः | बृहती} अया᳚मन्नु॒ग्रो म॒घवा᳚ पुरू॒वसु॒र्गोरश्व॑स्य॒ प्र दा᳚तु नः||{5/10}{6.4.20.5}{8.52.5}{8.6.10.5}{769, 672, 7047} |
| यस्मै॒ त्वं व॑सो दा॒नाय॒ मंह॑से॒ स रा॒यस्पोष॑मिन्वति|{आयुः | इन्द्रः | सतोबृहती} व॒सू॒यवो॒ वसु॑पतिं श॒तक्र॑तुं॒ स्तोमै॒रिन्द्रं᳚ हवामहे||{6/10}{6.4.21.1}{8.52.6}{8.6.10.6}{770, 672, 7048} |
| क॒दा च॒न प्र यु॑च्छस्यु॒भे नि पा᳚सि॒ जन्म॑नी|{आयुः | इन्द्रः | बृहती} तुरी᳚यादित्य॒ हव॑नं त इन्द्रि॒यमा त॑स्थाव॒मृतं᳚ दि॒वि||{7/10}{6.4.21.2}{8.52.7}{8.6.10.7}{771, 672, 7049} |
| यस्मै॒ त्वं म॑घवन्निन्द्र गिर्वणः॒ शिक्षो॒ शिक्ष॑सि दा॒शुषे᳚|{आयुः | इन्द्रः | सतोबृहती} अ॒स्माकं॒ गिर॑ उ॒त सु॑ष्टु॒तिं व॑सो कण्व॒वच्छृ॑णुधी॒ हव᳚म्||{8/10}{6.4.21.3}{8.52.8}{8.6.10.8}{772, 672, 7050} |
| अस्ता᳚वि॒ मन्म॑ पू॒र्व्यं ब्रह्मेन्द्रा᳚य वोचत|{आयुः | इन्द्रः | बृहती} पू॒र्वीरृ॒तस्य॑ बृह॒तीर॑नूषत स्तो॒तुर्मे॒धा, अ॑सृक्षत||{9/10}{6.4.21.4}{8.52.9}{8.6.10.9}{773, 672, 7051} |
| समिन्द्रो॒ रायो᳚ बृह॒तीर॑धूनुत॒ सं क्षो॒णी समु॒ सूर्य᳚म्|{आयुः | इन्द्रः | सतोबृहती} सं शु॒क्रासः॒ शुच॑यः॒ सं गवा᳚शिरः॒ सोमा॒, इन्द्र॑ममन्दिषुः||{10/10}{6.4.21.5}{8.52.10}{8.6.10.10}{774, 672, 7052} |
| [42] उपमंत्वेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य मेध्य इंद्रः अयुजो बृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | |
| उ॒प॒मं त्वा᳚ म॒घोनां॒ ज्येष्ठं᳚ च वृष॒भाणा᳚म्|{मेध्यः | इन्द्रः | बृहती} पू॒र्भित्त॑मं मघवन्निन्द्र गो॒विद॒मीशा᳚नं रा॒य ई᳚महे||{1/8}{6.4.22.1}{8.53.1}{8.6.11.1}{775, 673, 7053} |
| य आ॒युं कुत्स॑मतिथि॒ग्वमर्द॑यो वावृधा॒नो दि॒वेदि॑वे|{मेध्यः | इन्द्रः | सतोबृहती} तं त्वा᳚ व॒यं हर्य॑श्वं श॒तक्र॑तुं वाज॒यन्तो᳚ हवामहे||{2/8}{6.4.22.2}{8.53.2}{8.6.11.2}{776, 673, 7054} |
| आ नो॒ विश्वे᳚षां॒ रसं॒ मध्वः॑ सिञ्च॒न्त्वद्र॑यः|{मेध्यः | इन्द्रः | बृहती} ये प॑रा॒वति॑ सुन् वि॒रे जने॒ष्वा ये, अ᳚र्वा॒वतीन्द॑वः||{3/8}{6.4.22.3}{8.53.3}{8.6.11.3}{777, 673, 7055} |
| विश्वा॒ द्वेषां᳚सि ज॒हि चाव॒ चा कृ॑धि॒ विश्वे᳚ सन्व॒न्त्वा वसु॑|{मेध्यः | इन्द्रः | सतोबृहती} शीष्टे᳚षु चित्ते मदि॒रासो᳚ अं॒शवो॒ यत्रा॒ सोम॑स्य तृ॒म्पसि॑||{4/8}{6.4.22.4}{8.53.4}{8.6.11.4}{778, 673, 7056} |
| इन्द्र॒ नेदी᳚य॒ एदि॑हि मि॒तमे᳚धाभिरू॒तिभिः॑|{मेध्यः | इन्द्रः | बृहती} आ शं᳚तम॒ शंत॑माभिर॒भिष्टि॑भि॒रा स्वा᳚पे स्वा॒पिभिः॑||{5/8}{6.4.23.1}{8.53.5}{8.6.11.5}{779, 673, 7057} |
| आ॒जि॒तुरं॒ सत्प॑तिं वि॒श्वच॑र्षणिं कृ॒धि प्र॒जास्वाभ॑गम्|{मेध्यः | इन्द्रः | सतोबृहती} प्र सू ति॑रा॒ शची᳚भि॒र्ये त॑ उ॒क्थिनः॒ क्रतुं᳚ पुन॒त आ᳚नु॒षक्||{6/8}{6.4.23.2}{8.53.6}{8.6.11.6}{780, 673, 7058} |
| यस्ते॒ साधि॒ष्ठोऽव॑से॒ ते स्या᳚म॒ भरे᳚षु ते|{मेध्यः | इन्द्रः | बृहती} व॒यं होत्रा᳚भिरु॒त दे॒वहू᳚तिभिः सस॒वांसो᳚ मनामहे||{7/8}{6.4.23.3}{8.53.7}{8.6.11.7}{781, 673, 7059} |
| अ॒हं हि ते᳚ हरिवो॒ ब्रह्म॑ वाज॒युरा॒जिं यामि॒ सदो॒तिभिः॑|{मेध्यः | इन्द्रः | सतोबृहती} त्वामिदे॒व तममे॒ सम॑श्व॒युर्ग॒व्युरग्रे᳚ मथी॒नाम्||{8/8}{6.4.23.4}{8.53.8}{8.6.11.8}{782, 673, 7060} |
| [43] एतत्तइत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य मातरिश्वानइंद्रस्तृतीयाचतुर्थ्योर्विश्वेदेवाः अयुजोबृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | |
| ए॒तत्त॑ इन्द्र वी॒र्यं᳚ गी॒र्भिर्गृ॒णन्ति॑ का॒रवः॑|{मातरिश्वानः | इन्द्रः | बृहती} ते स्तोभ᳚न्त॒ ऊर्ज॑मावन् घृत॒श्चुतं᳚ पौ॒रासो᳚ नक्षन् धी॒तिभिः॑||{1/8}{6.4.24.1}{8.54.1}{8.6.12.1}{783, 674, 7061} |
| नक्ष᳚न्त॒ इन्द्र॒मव॑से सुकृ॒त्यया॒ येषां᳚ सु॒तेषु॒ मन्द॑से|{मातरिश्वानः | इन्द्रः | सतोबृहती} यथा᳚ संव॒र्ते, अम॑दो॒ यथा᳚ कृ॒श ए॒वास्मे, इ᳚न्द्र मत्स्व||{2/8}{6.4.24.2}{8.54.2}{8.6.12.2}{784, 674, 7062} |
| आ नो॒ विश्वे᳚ स॒जोष॑सो॒ देवा᳚सो॒ गन्त॒नोप॑ नः|{मातरिश्वानः | विश्वदेवाः | बृहती} वस॑वो रु॒द्रा, अव॑से न॒ आ ग॑मञ्छृ॒ण्वन्तु॑ म॒रुतो॒ हव᳚म्||{3/8}{6.4.24.3}{8.54.3}{8.6.12.3}{785, 674, 7063} |
| पू॒षा विष्णु॒र्हव॑नं मे॒ सर॑स्व॒त्यव᳚न्तु स॒प्त सिन्ध॑वः|{मातरिश्वानः | विश्वदेवाः | सतोबृहती} आपो॒ वातः॒ पर्व॑तासो॒ वन॒स्पतिः॑ शृ॒णोतु॑ पृथि॒वी हव᳚म्||{4/8}{6.4.24.4}{8.54.4}{8.6.12.4}{786, 674, 7064} |
| यदि᳚न्द्र॒ राधो॒, अस्ति॑ ते॒ माघो᳚नं मघवत्तम|{मातरिश्वानः | इन्द्रः | बृहती} तेन॑ नो बोधि सध॒माद्यो᳚ वृ॒धे भगो᳚ दा॒नाय॑ वृत्रहन्||{5/8}{6.4.25.1}{8.54.5}{8.6.12.5}{787, 674, 7065} |
| आजि॑पते नृपते॒ त्वमिद्धि नो॒ वाज॒ आ व॑क्षि सुक्रतो|{मातरिश्वानः | इन्द्रः | सतोबृहती} वी॒ती होत्रा᳚भिरु॒त दे॒ववी᳚तिभिः सस॒वांसो॒ वि शृ᳚ण्विरे||{6/8}{6.4.25.2}{8.54.6}{8.6.12.6}{788, 674, 7066} |
| सन्ति॒ ह्य१॑(अ॒)र्य आ॒शिष॒ इन्द्र॒ आयु॒र्जना᳚नाम्|{मातरिश्वानः | इन्द्रः | बृहती} अ॒स्मान् न॑क्षस्व मघव॒न्नुपाव॑से धु॒क्षस्व॑ पि॒प्युषी॒मिष᳚म्||{7/8}{6.4.25.3}{8.54.7}{8.6.12.7}{789, 674, 7067} |
| व॒यं त॑ इन्द्र॒ स्तोमे᳚भिर्विधेम॒ त्वम॒स्माकं᳚ शतक्रतो|{मातरिश्वानः | इन्द्रः | सतोबृहती} महि॑ स्थू॒रं श॑श॒यं राधो॒, अह्र॑यं॒ प्रस्क᳚ण्वाय॒ नि तो᳚शय||{8/8}{6.4.25.4}{8.54.8}{8.6.12.8}{790, 674, 7068} |
| [44] भूरीदिति पंचर्चस्य सूक्तस्य कृशइंद्रोगायत्री तृतीयापंचम्यावनुष्टुभौ | |
| भूरीदिन्द्र॑स्य वी॒र्य१॑(अं॒) व्यख्य॑म॒भ्याय॑ति|{कृशः | इन्द्रः | गायत्री} राध॑स्ते दस्यवे वृक||{1/5}{6.4.26.1}{8.55.1}{8.6.13.1}{791, 675, 7069} |
| श॒तं श्वे॒तास॑ उ॒क्षणो᳚ दि॒वि तारो॒ न रो᳚चन्ते|{कृशः | इन्द्रः | गायत्री} म॒ह्ना दिवं॒ न त॑स्तभुः||{2/5}{6.4.26.2}{8.55.2}{8.6.13.2}{792, 675, 7070} |
| श॒तं वे॒णूञ्छ॒तं शुनः॑ श॒तं चर्मा᳚णि म्ला॒तानि॑|{कृशः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} श॒तं मे᳚ बल्बजस्तु॒का, अरु॑षीणां॒ चतुः॑शतम्||{3/5}{6.4.26.3}{8.55.3}{8.6.13.3}{793, 675, 7071} |
| सु॒दे॒वाः स्थ॑ काण्वायना॒ वयो᳚वयो विच॒रन्तः॑|{कृशः | इन्द्रः | गायत्री} अश्वा᳚सो॒ न च᳚ङ्क्रमत||{4/5}{6.4.26.4}{8.55.4}{8.6.13.4}{794, 675, 7072} |
| आदित् सा॒प्तस्य॑ चर्किर॒न्नानू᳚नस्य॒ महि॒ श्रवः॑|{कृशः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} श्यावी᳚रतिध्व॒सन् प॒थश्चक्षु॑षा च॒न सं॒नशे᳚||{5/5}{6.4.26.5}{8.55.5}{8.6.13.5}{795, 675, 7073} |
| [45] प्रतितइति पंचर्चस्य सूक्तस्य पृषध्रइंद्रोंत्याया अग्निसूर्यौगायत्र्यंत्यापंक्तिः | |
| प्रति॑ ते दस्यवे वृक॒ राधो᳚ अद॒र्श्यह्र॑यम्|{पृषध्रः | इन्द्रः | गायत्री} द्यौर्न प्र॑थि॒ना शवः॑||{1/5}{6.4.27.1}{8.56.1}{8.6.14.1}{796, 676, 7074} |
| दश॒ मह्यं᳚ पौतक्र॒तः स॒हस्रा॒ दस्य॑वे॒ वृकः॑|{पृषध्रः | इन्द्रः | गायत्री} नित्या᳚द्रा॒यो, अ॑मंहत||{2/5}{6.4.27.2}{8.56.2}{8.6.14.2}{797, 676, 7075} |
| श॒तं मे᳚ गर्द॒भानां᳚ श॒तमूर्णा᳚वतीनाम्|{पृषध्रः | इन्द्रः | गायत्री} श॒तं दा॒साँ, अति॒ स्रजः॑||{3/5}{6.4.27.3}{8.56.3}{8.6.14.3}{798, 676, 7076} |
| तत्रो॒, अपि॒ प्राणी᳚यत पू॒तक्र॑तायै॒ व्य॑क्ता|{पृषध्रः | इन्द्रः | गायत्री} अश्वा᳚ना॒मिन्न यू॒थ्या᳚म्||{4/5}{6.4.27.4}{8.56.4}{8.6.14.4}{799, 676, 7077} |
| अचे᳚त्य॒ग्निश्चि॑कि॒तुर्ह᳚व्य॒वाट् स सु॒मद्र॑थः|{पृषध्रः | अग्निसूर्यौ | पङ्क्तिः} अ॒ग्निः शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा᳚ बृ॒हत्सूरो᳚ अरोचत दि॒वि सूर्यो᳚ अरोचत||{5/5}{6.4.27.5}{8.56.5}{8.6.14.5}{800, 676, 7078} |
| [46] युवंदेवेति चतुरृचस्य सूक्तस्य मेध्योश्विनौत्रिष्टुप् | |
| यु॒वं दे᳚वा॒ क्रतु॑ना पू॒र्व्येण॑ यु॒क्ता रथे᳚न तवि॒षं य॑जत्रा|{मेध्यः | अश्विनौ | त्रिष्टुप्} आग॑च्छतं नासत्या॒ शची᳚भिरि॒दं तृ॒तीयं॒ सव॑नं पिबाथः||{1/4}{6.4.28.1}{8.57.1}{8.6.15.1}{801, 677, 7079} |
| यु॒वां दे॒वास्त्रय॑ एकाद॒शासः॑ स॒त्याः स॒त्यस्य॑ ददृशे पु॒रस्ता᳚त्|{मेध्यः | अश्विनौ | त्रिष्टुप्} अ॒स्माकं᳚ य॒ज्ञं सव॑नं जुषा॒णा पा॒तं सोम॑मश्विना॒ दीद्य॑ग्नी||{2/4}{6.4.28.2}{8.57.2}{8.6.15.2}{802, 677, 7080} |
| प॒नाय्यं॒ तद॑श्विना कृ॒तं वां᳚ वृष॒भो दि॒वो रज॑सः पृथि॒व्याः|{मेध्यः | अश्विनौ | त्रिष्टुप्} स॒हस्रं॒ शंसा᳚ उ॒त ये गवि॑ष्टौ॒ सर्वाँ॒, इत् ताँ, उप॑ याता॒ पिब॑ध्यै||{3/4}{6.4.28.3}{8.57.3}{8.6.15.3}{803, 677, 7081} |
| अ॒यं वां᳚ भा॒गो निहि॑तो यजत्रे॒मा गिरो᳚ नास॒त्योप॑ यातम्|{मेध्यः | अश्विनौ | त्रिष्टुप्} पिब॑तं॒ सोमं॒ मधु॑मन्तम॒स्मे प्र दा॒श्वांस॑मवतं॒ शची᳚भिः||{4/4}{6.4.28.4}{8.57.4}{8.6.15.4}{804, 677, 7082} |
| [47] यमृत्विजइति तृचस्य सूक्तस्य मेध्योविश्वेदेवास्त्रिष्टुप् (आद्यायाऋत्विजोदेवतावा) | |
| यमृ॒त्विजो᳚ बहु॒धा क॒ल्पय᳚न्तः॒ सचे᳚तसो य॒ज्ञमि॒मं वह᳚न्ति|{मेध्यः | विश्वेदेवा ऋत्विजो वा | त्रिष्टुप्} यो, अ॑नूचा॒नो ब्रा᳚ह्म॒णो यु॒क्त आ᳚सी॒त् का स्वि॒त् तत्र॒ यज॑मानस्य सं॒वित्||{1/3}{6.4.29.1}{8.58.1}{8.6.16.1}{805, 678, 7083} |
| एक॑ ए॒वाग्निर्ब॑हु॒धा समि॑द्ध॒ एकः॒ सूर्यो॒ विश्व॒मनु॒ प्रभू᳚तः|{मेध्यः | विश्वदेवाः | त्रिष्टुप्} एकै॒वोषाः सर्व॑मि॒दं वि भा॒त्येकं॒ वा, इ॒दं वि ब॑भूव॒ सर्व᳚म्||{2/3}{6.4.29.2}{8.58.2}{8.6.16.2}{806, 678, 7084} |
| ज्योति॑ष्मन्तं केतु॒मन्तं᳚ त्रिच॒क्रं सु॒खं रथं᳚ सु॒षदं॒ भूरि॑वारम्|{मेध्यः | विश्वदेवाः | त्रिष्टुप्} चि॒त्राम॑घा॒ यस्य॒ योगे᳚ऽधिजज्ञे॒ तं वां᳚ हु॒वे, अति॑ रिक्तं॒ पिब॑ध्यै||{3/3}{6.4.29.3}{8.58.3}{8.6.16.3}{807, 678, 7085} |
| [48] इमानिवामिति सप्तर्चस्य सूक्तस्य सुपर्णइंद्रावरुणौजगती | |
| इ॒मानि॑ वां भाग॒धेया᳚नि सिस्रत॒ इन्द्रा᳚वरुणा॒ प्र म॒हे सु॒तेषु॑ वाम्|{सुपर्णः | इन्द्रावरुणौ | जगती} य॒ज्ञेय॑ज्ञे ह॒ सव॑ना भुर॒ण्यथो॒ यत् सु᳚न्व॒ते यज॑मानाय॒ शिक्ष॑थः||{1/7}{6.4.30.1}{8.59.1}{8.6.17.1}{808, 679, 7086} |
| नि॒ष्षिध्व॑री॒रोष॑धी॒राप॑ आस्ता॒मिन्द्रा᳚वरुणा महि॒मान॒माश॑त|{सुपर्णः | इन्द्रावरुणौ | जगती} या सिस्र॑तू॒ रज॑सः पा॒रे, अध्व॑नो॒ ययोः॒ शत्रु॒र्नकि॒रादे᳚व॒ ओह॑ते||{2/7}{6.4.30.2}{8.59.2}{8.6.17.2}{809, 679, 7087} |
| स॒त्यं तदि᳚न्द्रावरुणा कृ॒शस्य॑ वां॒ मध्व॑ ऊ॒र्मिं दु॑हते स॒प्त वाणीः᳚|{सुपर्णः | इन्द्रावरुणौ | जगती} ताभि॑र्दा॒श्वांस॑मवतं शुभस्पती॒ यो वा॒मद॑ब्धो, अ॒भि पाति॒ चित्ति॑भिः||{3/7}{6.4.30.3}{8.59.3}{8.6.17.3}{810, 679, 7088} |
| घृ॒त॒प्रुषः॒ सौम्या᳚ जी॒रदा᳚नवः स॒प्त स्वसा᳚रः॒ सद॑न ऋ॒तस्य॑|{सुपर्णः | इन्द्रावरुणौ | जगती} या ह॑ वामिन्द्रावरुणा घृत॒श्चुत॒स्ताभि॑र्धत्तं॒ यज॑मानाय शिक्षतम्||{4/7}{6.4.30.4}{8.59.4}{8.6.17.4}{811, 679, 7089} |
| अवो᳚चाम मह॒ते सौभ॑गाय स॒त्यं त्वे॒षाभ्यां᳚ महि॒मान॑मिन्द्रि॒यम्|{सुपर्णः | इन्द्रावरुणौ | जगती} अ॒स्मान् त्स्वि᳚न्द्रावरुणा घृत॒श्चुत॒स्त्रिभिः॑ सा॒प्तेभि॑रवतं शुभस्पती||{5/7}{6.4.31.1}{8.59.5}{8.6.17.5}{812, 679, 7090} |
| इन्द्रा᳚वरुणा॒ यदृ॒षिभ्यो᳚ मनी॒षां वा॒चो म॒तिं श्रु॒तम॑दत्त॒मग्रे᳚|{सुपर्णः | इन्द्रावरुणौ | जगती} यानि॒ स्थाना᳚न्यसृजन्त॒ धीरा᳚ य॒ज्ञं त᳚न्वा॒नास्तप॑सा॒भ्य॑पश्यम्||{6/7}{6.4.31.2}{8.59.6}{8.6.17.6}{813, 679, 7091} |
| इन्द्रा᳚वरुणा सौमन॒समदृ॑प्तं रा॒यस्पोषं॒ यज॑मानेषु धत्तम्|{सुपर्णः | इन्द्रावरुणौ | जगती} प्र॒जां पु॒ष्टिं भू᳚तिम॒स्मासु॑ धत्तं दीर्घायु॒त्वाय॒ प्र ति॑रतं न॒ आयुः॑||{7/7}{6.4.31.3}{8.59.7}{8.6.17.7}{814, 679, 7092} |
| [49] अग्नआयाहीति विंशत्यृचस्य सूक्तस्य प्रागाथोभर्गोग्निः अयुजोबृहत्योयुजःसतोबृहत्यः | |
| अग्न॒ आ या᳚ह्य॒ग्निभि॒र्होता᳚रं त्वा वृणीमहे|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} आ त्वाम॑नक्तु॒ प्रय॑ता ह॒विष्म॑ती॒ यजि॑ष्ठं ब॒र्हिरा॒सदे᳚||{1/20}{6.4.32.1}{8.60.1}{8.7.1.1}{815, 680, 7093} |
| अच्छा॒ हि त्वा᳚ सहसः सूनो, अङ्गिरः॒ स्रुच॒श्चर᳚न्त्यध्व॒रे|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} ऊ॒र्जो नपा᳚तं घृ॒तके᳚शमीमहे॒ ऽग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम्||{2/20}{6.4.32.2}{8.60.2}{8.7.1.2}{816, 680, 7094} |
| अग्ने᳚ क॒विर्वे॒धा, अ॑सि॒ होता᳚ पावक॒ यक्ष्यः॑|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} म॒न्द्रो यजि॑ष्ठो, अध्व॒रेष्वीड्यो॒ विप्रे᳚भिः शुक्र॒ मन्म॑भिः||{3/20}{6.4.32.3}{8.60.3}{8.7.1.3}{817, 680, 7095} |
| अद्रो᳚घ॒मा व॑होश॒तो य॑विष्ठ्य दे॒वाँ, अ॑जस्र वी॒तये᳚|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} अ॒भि प्रयां᳚सि॒ सुधि॒ता व॑सो गहि॒ मन्द॑स्व धी॒तिभि᳚र्हि॒तः||{4/20}{6.4.32.4}{8.60.4}{8.7.1.4}{818, 680, 7096} |
| त्वमित् स॒प्रथा᳚ अ॒स्यग्ने᳚ त्रातरृ॒तस्क॒विः|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} त्वां विप्रा᳚सः समिधान दीदिव॒ आ वि॑वासन्ति वे॒धसः॑||{5/20}{6.4.32.5}{8.60.5}{8.7.1.5}{819, 680, 7097} |
| शोचा᳚ शोचिष्ठ दीदि॒हि वि॒शे मयो॒ रास्व॑ स्तो॒त्रे म॒हाँ, अ॑सि|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} दे॒वानां॒ शर्म॒न् मम॑ सन्तु सू॒रयः॑ शत्रू॒षाहः॑ स्व॒ग्नयः॑||{6/20}{6.4.33.1}{8.60.6}{8.7.1.6}{820, 680, 7098} |
| यथा᳚ चिद् वृ॒द्धम॑त॒समग्ने᳚ सं॒जूर्व॑सि॒ क्षमि॑|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} ए॒वा द॑ह मित्रमहो॒ यो, अ॑स्म॒ध्रुग् दु॒र्मन्मा॒ कश्च॒ वेन॑ति||{7/20}{6.4.33.2}{8.60.7}{8.7.1.7}{821, 680, 7099} |
| मा नो॒ मर्ता᳚य रि॒पवे᳚ रक्ष॒स्विने॒ माघशं᳚साय रीरधः|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} अस्रे᳚धद्भिस्त॒रणि॑भिर्यविष्ठ्य शि॒वेभिः॑ पाहि पा॒युभिः॑||{8/20}{6.4.33.3}{8.60.8}{8.7.1.8}{822, 680, 7100} |
| पा॒हि नो᳚ अग्न॒ एक॑या पा॒ह्यु१॑(उ॒)त द्वि॒तीय॑या|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} पा॒हि गी॒र्भिस्ति॒सृभि॑रूर्जां पते पा॒हि च॑त॒सृभि᳚र्वसो||{9/20}{6.4.33.4}{8.60.9}{8.7.1.9}{823, 680, 7101} |
| पा॒हि विश्व॑स्माद्र॒क्षसो॒, अरा᳚व्णः॒ प्र स्म॒ वाजे᳚षु नोऽव|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} त्वामिद्धि नेदि॑ष्ठं दे॒वता᳚तय आ॒पिं नक्षा᳚महे वृ॒धे||{10/20}{6.4.33.5}{8.60.10}{8.7.1.10}{824, 680, 7102} |
| आ नो᳚ अग्ने वयो॒वृधं᳚ र॒यिं पा᳚वक॒ शंस्य᳚म्|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} रास्वा᳚ च न उपमाते पुरु॒स्पृहं॒ सुनी᳚ती॒ स्वय॑शस्तरम्||{11/20}{6.4.34.1}{8.60.11}{8.7.1.11}{825, 680, 7103} |
| येन॒ वंसा᳚म॒ पृत॑नासु॒ शर्ध॑त॒स्तर᳚न्तो, अ॒र्य आ॒दिशः॑|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} स त्वं नो᳚ वर्ध॒ प्रय॑सा शचीवसो॒ जिन्वा॒ धियो᳚ वसु॒विदः॑||{12/20}{6.4.34.2}{8.60.12}{8.7.1.12}{826, 680, 7104} |
| शिशा᳚नो वृष॒भो य॑था॒ग्निः शृङ्गे॒ दवि॑ध्वत्|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} ति॒ग्मा, अ॑स्य॒ हन॑वो॒ न प्र॑ति॒धृषे᳚ सु॒जम्भः॒ सह॑सो य॒हुः||{13/20}{6.4.34.3}{8.60.13}{8.7.1.13}{827, 680, 7105} |
| न॒हि ते᳚ अग्ने वृषभ प्रति॒धृषे॒ जम्भा᳚सो॒ यद्वि॒तिष्ठ॑से|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} स त्वं नो᳚ होतः॒ सुहु॑तं ह॒विष्कृ॑धि॒ वंस्वा᳚ नो॒ वार्या᳚ पु॒रु||{14/20}{6.4.34.4}{8.60.14}{8.7.1.14}{828, 680, 7106} |
| शेषे॒ वने᳚षु मा॒त्रोः सं त्वा॒ मर्ता᳚स इन्धते|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} अत᳚न्द्रो ह॒व्या व॑हसि हवि॒ष्कृत॒ आदिद्दे॒वेषु॑ राजसि||{15/20}{6.4.34.5}{8.60.15}{8.7.1.15}{829, 680, 7107} |
| स॒प्त होता᳚र॒स्तमिदी᳚ळते॒ त्वा ऽग्ने᳚ सु॒त्यज॒मह्र॑यम्|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} भि॒नत्स्यद्रिं॒ तप॑सा॒ वि शो॒चिषा॒ प्राग्ने᳚ तिष्ठ॒ जनाँ॒, अति॑||{16/20}{6.4.35.1}{8.60.16}{8.7.1.16}{830, 680, 7108} |
| अ॒ग्निम॑ग्निं वो॒, अध्रि॑गुं हु॒वेम॑ वृ॒क्तब᳚र्हिषः|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} अ॒ग्निं हि॒तप्र॑यसः शश्व॒तीष्वा ऽऽ होता᳚रं चर्षणी॒नाम्||{17/20}{6.4.35.2}{8.60.17}{8.7.1.17}{831, 680, 7109} |
| केते᳚न॒ शर्म᳚न् त्सचते सुषा॒मण्यग्ने॒ तुभ्यं᳚ चिकि॒त्वना᳚|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} इ॒ष॒ण्यया᳚ नः पुरु॒रूप॒मा भ॑र॒ वाजं॒ नेदि॑ष्ठमू॒तये᳚||{18/20}{6.4.35.3}{8.60.18}{8.7.1.18}{832, 680, 7110} |
| अग्ने॒ जरि॑तर्वि॒श्पति॑स्तेपा॒नो दे᳚व र॒क्षसः॑|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | बृहती} अप्रो᳚षिवान् गृ॒हप॑तिर्म॒हाँ, अ॑सि दि॒वस्पा॒युर्दु॑रोण॒युः||{19/20}{6.4.35.4}{8.60.19}{8.7.1.19}{833, 680, 7111} |
| मा नो॒ रक्ष॒ आ वे᳚शीदाघृणीवसो॒ मा या॒तुर्या᳚तु॒माव॑ताम्|{प्रागाथो भर्गः | अग्निः | सतोबृहती} प॒रो॒ग॒व्यू॒त्यनि॑रा॒मप॒ क्षुध॒मग्ने॒ सेध॑ रक्ष॒स्विनः॑||{20/20}{6.4.35.5}{8.60.20}{8.7.1.20}{834, 680, 7112} |
| [50] उभयमित्यष्टादशर्चस्य सूक्तस्य प्रागाथोभर्गइंद्रः अयुजो बृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | |
| उ॒भयं᳚ शृ॒णव॑च्च न॒ इन्द्रो᳚ अ॒र्वागि॒दं वचः॑|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | बृहती} स॒त्राच्या᳚ म॒घवा॒ सोम॑पीतये धि॒या शवि॑ष्ठ॒ आ ग॑मत्||{1/18}{6.4.36.1}{8.61.1}{8.7.2.1}{835, 681, 7113} |
| तं हि स्व॒राजं᳚ वृष॒भं तमोज॑से धि॒षणे᳚ निष्टत॒क्षतुः॑|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | सतोबृहती} उ॒तोप॒मानां᳚ प्रथ॒मो नि षी᳚दसि॒ सोम॑कामं॒ हि ते॒ मनः॑||{2/18}{6.4.36.2}{8.61.2}{8.7.2.2}{836, 681, 7114} |
| आ वृ॑षस्व पुरूवसो सु॒तस्ये॒न्द्रान्ध॑सः|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | बृहती} वि॒द्मा हि त्वा᳚ हरिवः पृ॒त्सु सा᳚स॒हिमधृ॑ष्टं चिद्दधृ॒ष्वणि᳚म्||{3/18}{6.4.36.3}{8.61.3}{8.7.2.3}{837, 681, 7115} |
| अप्रा᳚मिसत्य मघव॒न् तथेद॑स॒दिन्द्र॒ क्रत्वा॒ यथा॒ वशः॑|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | सतोबृहती} स॒नेम॒ वाजं॒ तव॑ शिप्रि॒न्नव॑सा म॒क्षू चि॒द्यन्तो᳚ अद्रिवः||{4/18}{6.4.36.4}{8.61.4}{8.7.2.4}{838, 681, 7116} |
| श॒ग्ध्यू॒३॑(ऊ॒) षु श॑चीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभिः॑|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | बृहती} भगं॒ न हि त्वा᳚ य॒शसं᳚ वसु॒विद॒मनु॑ शूर॒ चरा᳚मसि||{5/18}{6.4.36.5}{8.61.5}{8.7.2.5}{839, 681, 7117} |
| पौ॒रो, अश्व॑स्य पुरु॒कृद् गवा᳚म॒स्युत्सो᳚ देव हिर॒ण्ययः॑|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | सतोबृहती} नकि॒र्हि दानं᳚ परि॒मर्धि॑ष॒त् त्वे यद्य॒द्यामि॒ तदा भ॑र||{6/18}{6.4.37.1}{8.61.6}{8.7.2.6}{840, 681, 7118} |
| त्वं ह्येहि॒ चेर॑वे वि॒दा भगं॒ वसु॑त्तये|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | बृहती} उद् वा᳚वृषस्व मघव॒न् गवि॑ष्टय॒ उदि॒न्द्राश्व॑मिष्टये||{7/18}{6.4.37.2}{8.61.7}{8.7.2.7}{841, 681, 7119} |
| त्वं पु॒रू स॒हस्रा᳚णि श॒तानि॑ च यू॒था दा॒नाय॑ मंहसे|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | सतोबृहती} आ पु॑रंद॒रं च॑कृम॒ विप्र॑वचस॒ इन्द्रं॒ गाय॒न्तोऽव॑से||{8/18}{6.4.37.3}{8.61.8}{8.7.2.8}{842, 681, 7120} |
| अ॒वि॒प्रो वा॒ यदवि॑ध॒द्विप्रो᳚ वेन्द्र ते॒ वचः॑|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | बृहती} स प्र म॑मन्दत् त्वा॒या श॑तक्रतो॒ प्राचा᳚मन्यो॒, अहं᳚सन||{9/18}{6.4.37.4}{8.61.9}{8.7.2.9}{843, 681, 7121} |
| उ॒ग्रबा᳚हुर्म्रक्ष॒कृत्वा᳚ पुरंद॒रो यदि॑ मे शृ॒णव॒द्धव᳚म्|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | सतोबृहती} व॒सू॒यवो॒ वसु॑पतिं श॒तक्र॑तुं॒ स्तोमै॒रिन्द्रं᳚ हवामहे||{10/18}{6.4.37.5}{8.61.10}{8.7.2.10}{844, 681, 7122} |
| न पा॒पासो᳚ मनामहे॒ नारा᳚यासो॒ न जळ्ह॑वः|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | बृहती} यदिन्न्विन्द्रं॒ वृष॑णं॒ सचा᳚ सु॒ते सखा᳚यं कृ॒णवा᳚महै||{11/18}{6.4.38.1}{8.61.11}{8.7.2.11}{845, 681, 7123} |
| उ॒ग्रं यु॑युज्म॒ पृत॑नासु सास॒हिमृ॒णका᳚ति॒मदा᳚भ्यम्|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | सतोबृहती} वेदा᳚ भृ॒मं चि॒त् सनि॑ता र॒थीत॑मो वा॒जिनं॒ यमिदू॒ नश॑त्||{12/18}{6.4.38.2}{8.61.12}{8.7.2.12}{846, 681, 7124} |
| यत॑ इन्द्र॒ भया᳚महे॒ ततो᳚ नो॒, अभ॑यं कृधि|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | बृहती} मघ॑वञ्छ॒ग्धि तव॒ तन्न॑ ऊ॒तिभि॒र्वि द्विषो॒ वि मृधो᳚ जहि||{13/18}{6.4.38.3}{8.61.13}{8.7.2.13}{847, 681, 7125} |
| त्वं हि रा᳚धस्पते॒ राध॑सो म॒हः, क्षय॒स्यासि॑ विध॒तः|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | सतोबृहती} तं त्वा᳚ व॒यं म॑घवन्निन्द्र गिर्वणः सु॒ताव᳚न्तो हवामहे||{14/18}{6.4.38.4}{8.61.14}{8.7.2.14}{848, 681, 7126} |
| इन्द्रः॒ स्पळु॒त वृ॑त्र॒हा प॑र॒स्पा नो॒ वरे᳚ण्यः|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | बृहती} स नो᳚ रक्षिषच्चर॒मं स म॑ध्य॒मं स प॒श्चात् पा᳚तु नः पु॒रः||{15/18}{6.4.38.5}{8.61.15}{8.7.2.15}{849, 681, 7127} |
| त्वं नः॑ प॒श्चाद॑ध॒रादु॑त्त॒रात् पु॒र इन्द्र॒ नि पा᳚हि वि॒श्वतः॑|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | सतोबृहती} आ॒रे, अ॒स्मत् कृ॑णुहि॒ दैव्यं᳚ भ॒यमा॒रे हे॒तीरदे᳚वीः||{16/18}{6.4.39.1}{8.61.16}{8.7.2.16}{850, 681, 7128} |
| अ॒द्याद्या॒ श्वःश्व॒ इन्द्र॒ त्रास्व॑ प॒रे च॑ नः|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | बृहती} विश्वा᳚ च नो जरि॒तॄन् त्स॑त्पते॒, अहा॒ दिवा॒ नक्तं᳚ च रक्षिषः||{17/18}{6.4.39.2}{8.61.17}{8.7.2.17}{851, 681, 7129} |
| प्र॒भ॒ङ्गी शूरो᳚ म॒घवा᳚ तु॒वीम॑घः॒ सम्मि॑श्लो वि॒र्या᳚य॒ कम्|{प्रागाथो भर्गः | इन्द्रः | सतोबृहती} उ॒भा ते᳚ बा॒हू वृष॑णा शतक्रतो॒ नि या वज्रं᳚ मिमि॒क्षतुः॑||{18/18}{6.4.39.3}{8.61.18}{8.7.2.18}{852, 681, 7130} |
| [51] प्रोअस्माइति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वःप्रगाथइंद्रः पंक्तिः सप्तम्याद्यास्तिस्रो बृहत्यः | |
| प्रो, अ॑स्मा॒, उप॑स्तुतिं॒ भर॑ता॒ यज्जुजो᳚षति|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} उ॒क्थैरिन्द्र॑स्य॒ माहि॑नं॒ वयो᳚ वर्धन्ति सो॒मिनो᳚ भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{1/12}{6.4.40.1}{8.62.1}{8.7.3.1}{853, 682, 7131} |
| अ॒यु॒जो, अस॑मो॒ नृभि॒रेकः॑ कृ॒ष्टीर॒यास्यः॑|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} पू॒र्वीरति॒ प्र वा᳚वृधे॒ विश्वा᳚ जा॒तान्योज॑सा भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{2/12}{6.4.40.2}{8.62.2}{8.7.3.2}{854, 682, 7132} |
| अहि॑तेन चि॒दर्व॑ता जी॒रदा᳚नुः सिषासति|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} प्र॒वाच्य॑मिन्द्र॒ तत् तव॑ वी॒र्या᳚णि करिष्य॒तो भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{3/12}{6.4.40.3}{8.62.3}{8.7.3.3}{855, 682, 7133} |
| आ या᳚हि कृ॒णवा᳚म त॒ इन्द्र॒ ब्रह्मा᳚णि॒ वर्ध॑ना|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} येभिः॑ शविष्ठ चा॒कनो᳚ भ॒द्रमि॒ह श्र॑वस्य॒ते भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{4/12}{6.4.40.4}{8.62.4}{8.7.3.4}{856, 682, 7134} |
| धृ॒ष॒तश्चि॑द् धृ॒षन्मनः॑ कृ॒णोषी᳚न्द्र॒ यत् त्वम्|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} ती॒व्रैः सोमैः᳚ सपर्य॒तो नमो᳚भिः प्रति॒भूष॑तो भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{5/12}{6.4.40.5}{8.62.5}{8.7.3.5}{857, 682, 7135} |
| अव॑ चष्ट॒ ऋची᳚षमो ऽव॒ताँ, इ॑व॒ मानु॑षः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} जु॒ष्ट्वी दक्ष॑स्य सो॒मिनः॒ सखा᳚यं कृणुते॒ युजं᳚ भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{6/12}{6.4.40.6}{8.62.6}{8.7.3.6}{858, 682, 7136} |
| विश्वे᳚ त इन्द्र वी॒र्यं᳚ दे॒वा, अनु॒ क्रतुं᳚ ददुः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | बृहती} भुवो॒ विश्व॑स्य॒ गोप॑तिः पुरुष्टुत भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{7/12}{6.4.41.1}{8.62.7}{8.7.3.7}{859, 682, 7137} |
| गृ॒णे तदि᳚न्द्र ते॒ शव॑ उप॒मं दे॒वता᳚तये|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | बृहती} यद्धंसि॑ वृ॒त्रमोज॑सा शचीपते भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{8/12}{6.4.41.2}{8.62.8}{8.7.3.8}{860, 682, 7138} |
| सम॑नेव वपुष्य॒तः कृ॒णव॒न्मानु॑षा यु॒गा|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | बृहती} वि॒दे तदिन्द्र॒श्चेत॑न॒मध॑ श्रु॒तो भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{9/12}{6.4.41.3}{8.62.9}{8.7.3.9}{861, 682, 7139} |
| उज्जा॒तमि᳚न्द्र ते॒ शव॒ उत् त्वामुत् तव॒ क्रतु᳚म्|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} भूरि॑गो॒ भूरि॑ वावृधु॒र्मघ॑व॒न् तव॒ शर्म॑णि भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{10/12}{6.4.41.4}{8.62.10}{8.7.3.10}{862, 682, 7140} |
| अ॒हं च॒ त्वं च॑ वृत्रह॒न्त्सं यु॑ज्याव स॒निभ्य॒ आ|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} अ॒रा॒ती॒वा चि॑दद्रि॒वो ऽनु॑ नौ शूर मंसते भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{11/12}{6.4.41.5}{8.62.11}{8.7.3.11}{863, 682, 7141} |
| स॒त्यमिद् वा, उ॒ तं व॒यमिन्द्रं᳚ स्तवाम॒ नानृ॑तम्|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} म॒हाँ, असु᳚न्वतो व॒धो भूरि॒ ज्योतीं᳚षि सुन्व॒तो भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑||{12/12}{6.4.41.6}{8.62.12}{8.7.3.12}{864, 682, 7142} |
| [52] सपूर्व्यइति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वः प्रगाथइंद्रोत्यायादेवागायत्री आद्या चतुर्थीपंचमीसप्तम्योनुष्टुभः अंत्यात्रिष्टुप् | |
| स पू॒र्व्यो म॒हानां᳚ वे॒नः क्रतु॑भिरानजे|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} यस्य॒ द्वारा॒ मनु॑ष्पि॒ता दे॒वेषु॒ धिय॑ आन॒जे||{1/12}{6.4.42.1}{8.63.1}{8.7.4.1}{865, 683, 7143} |
| दि॒वो मानं॒ नोत्स॑द॒न् त्सोम॑पृष्ठासो॒, अद्र॑यः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} उ॒क्था ब्रह्म॑ च॒ शंस्या᳚||{2/12}{6.4.42.2}{8.63.2}{8.7.4.2}{866, 683, 7144} |
| स वि॒द्वाँ, अङ्गि॑रोभ्य॒ इन्द्रो॒ गा, अ॑वृणो॒दप॑|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} स्तु॒षे तद॑स्य॒ पौंस्य᳚म्||{3/12}{6.4.42.3}{8.63.3}{8.7.4.3}{867, 683, 7145} |
| स प्र॒त्नथा᳚ कविवृ॒ध इन्द्रो᳚ वा॒कस्य॑ व॒क्षणिः॑|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} शि॒वो, अ॒र्कस्य॒ होम᳚न्यस्म॒त्रा ग॒न्त्वव॑से||{4/12}{6.4.42.4}{8.63.4}{8.7.4.4}{868, 683, 7146} |
| आदू॒ नु ते॒, अनु॒ क्रतुं॒ स्वाहा॒ वर॑स्य॒ यज्य॑वः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} श्वा॒त्रम॒र्का, अ॑नूष॒तेन्द्र॑ गो॒त्रस्य॑ दा॒वने᳚||{5/12}{6.4.42.5}{8.63.5}{8.7.4.5}{869, 683, 7147} |
| इन्द्रे॒ विश्वा᳚नि वी॒र्या᳚ कृ॒तानि॒ कर्त्वा᳚नि च|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} यम॒र्का, अ॑ध्व॒रं वि॒दुः||{6/12}{6.4.42.6}{8.63.6}{8.7.4.6}{870, 683, 7148} |
| यत् पाञ्च॑जन्यया वि॒शेन्द्रे॒ घोषा॒, असृ॑क्षत|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} अस्तृ॑णाद्ब॒र्हणा᳚ वि॒पो॒३॑(ओ॒) ऽर्यो मान॑स्य॒ स क्षयः॑||{7/12}{6.4.43.1}{8.63.7}{8.7.4.7}{871, 683, 7149} |
| इ॒यमु॑ ते॒, अनु॑ष्टुतिश्चकृ॒षे तानि॒ पौंस्या᳚|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} प्राव॑श्च॒क्रस्य॑ वर्त॒निम्||{8/12}{6.4.43.2}{8.63.8}{8.7.4.8}{872, 683, 7150} |
| अ॒स्य वृष्णो॒ व्योद॑न उ॒रु क्र॑मिष्ट जी॒वसे᳚|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} यवं॒ न प॒श्व आ द॑दे||{9/12}{6.4.43.3}{8.63.9}{8.7.4.9}{873, 683, 7151} |
| तद्दधा᳚ना, अव॒स्यवो᳚ यु॒ष्माभि॒र्दक्ष॑पितरः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} स्याम॑ म॒रुत्व॑तो वृ॒धे||{10/12}{6.4.43.4}{8.63.10}{8.7.4.10}{874, 683, 7152} |
| बळृ॒त्विया᳚य॒ धाम्न॒ ऋक्व॑भिः शूर नोनुमः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} जेषा᳚मेन्द्र॒ त्वया᳚ यु॒जा||{11/12}{6.4.43.5}{8.63.11}{8.7.4.11}{875, 683, 7153} |
| अ॒स्मे रु॒द्रा मे॒हना॒ पर्व॑तासो वृत्र॒हत्ये॒ भर॑हूतौ स॒जोषाः᳚|{काण्वः प्रगाथः | देवाः | त्रिष्टुप्} यः शंस॑ते स्तुव॒ते धायि॑ प॒ज्र इन्द्र॑ज्येष्ठा, अ॒स्माँ, अ॑वन्तु दे॒वाः||{12/12}{6.4.43.6}{8.63.12}{8.7.4.12}{876, 683, 7154} |
| [53] उत्त्वामंदत्विति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वःप्रगाथइंद्रोगायत्री | |
| उत् त्वा᳚ मन्दन्तु॒ स्तोमाः᳚ कृणु॒ष्व राधो᳚ अद्रिवः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} अव॑ ब्रह्म॒द्विषो᳚ जहि||{1/12}{6.4.44.1}{8.64.1}{8.7.5.1}{877, 684, 7155} |
| प॒दा प॒णीँर॑रा॒धसो॒ नि बा᳚धस्व म॒हाँ, अ॑सि|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} न॒हि त्वा॒ कश्च॒न प्रति॑||{2/12}{6.4.44.2}{8.64.2}{8.7.5.2}{878, 684, 7156} |
| त्वमी᳚शिषे सु॒ताना॒मिन्द्र॒ त्वमसु॑तानाम्|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} त्वं राजा॒ जना᳚नाम्||{3/12}{6.4.44.3}{8.64.3}{8.7.5.3}{879, 684, 7157} |
| एहि॒ प्रेहि॒ क्षयो᳚ दि॒व्या॒३॑(आ॒)घोष᳚ञ्चर्षणी॒नाम्|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} ओभे पृ॑णासि॒ रोद॑सी||{4/12}{6.4.44.4}{8.64.4}{8.7.5.4}{880, 684, 7158} |
| त्यं चि॒त् पर्व॑तं गि॒रिं श॒तव᳚न्तं सह॒स्रिण᳚म्|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} वि स्तो॒तृभ्यो᳚ रुरोजिथ||{5/12}{6.4.44.5}{8.64.5}{8.7.5.5}{881, 684, 7159} |
| व॒यमु॑ त्वा॒ दिवा᳚ सु॒ते व॒यं नक्तं᳚ हवामहे|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒स्माकं॒ काम॒मा पृ॑ण||{6/12}{6.4.44.6}{8.64.6}{8.7.5.6}{882, 684, 7160} |
| क्व१॑(अ॒) स्य वृ॑ष॒भो युवा᳚ तुवि॒ग्रीवो॒, अना᳚नतः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} ब्र॒ह्मा कस्तं स॑पर्यति||{7/12}{6.4.45.1}{8.64.7}{8.7.5.7}{883, 684, 7161} |
| कस्य॑ स्वि॒त् सव॑नं॒ वृषा᳚ जुजु॒ष्वाँ, अव॑ गच्छति|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रं॒ क उ॑ स्वि॒दा च॑के||{8/12}{6.4.45.2}{8.64.8}{8.7.5.8}{884, 684, 7162} |
| कं ते᳚ दा॒ना, अ॑सक्षत॒ वृत्र॑ह॒न् कं सु॒वीर्या᳚|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} उ॒क्थे क उ॑ स्वि॒दन्त॑मः||{9/12}{6.4.45.3}{8.64.9}{8.7.5.9}{885, 684, 7163} |
| अ॒यं ते॒ मानु॑षे॒ जने॒ सोमः॑ पू॒रुषु॑ सूयते|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} तस्येहि॒ प्र द्र॑वा॒ पिब॑||{10/12}{6.4.45.4}{8.64.10}{8.7.5.10}{886, 684, 7164} |
| अ॒यं ते᳚ शर्य॒णाव॑ति सु॒षोमा᳚या॒मधि॑ प्रि॒यः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} आ॒र्जी॒कीये᳚ म॒दिन्त॑मः||{11/12}{6.4.45.5}{8.64.11}{8.7.5.11}{887, 684, 7165} |
| तम॒द्य राध॑से म॒हे चारुं॒ मदा᳚य॒ घृष्व॑ये|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} एही᳚मिन्द्र॒ द्रवा॒ पिब॑||{12/12}{6.4.45.6}{8.64.12}{8.7.5.12}{888, 684, 7166} |
| [54] यदिंद्रेति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वःप्रगाथइंद्रोगायत्री | |
| यदि᳚न्द्र॒ प्रागपा॒गुद॒ङ् न्य॑ग्वा हू॒यसे॒ नृभिः॑|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} आ या᳚हि॒ तूय॑मा॒शुभिः॑||{1/12}{6.4.46.1}{8.65.1}{8.7.6.1}{889, 685, 7167} |
| यद्वा᳚ प्र॒स्रव॑णे दि॒वो मा॒दया᳚से॒ स्व᳚र्णरे|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} यद्वा᳚ समु॒द्रे, अन्ध॑सः||{2/12}{6.4.46.2}{8.65.2}{8.7.6.2}{890, 685, 7168} |
| आ त्वा᳚ गी॒र्भिर्म॒हामु॒रुं हु॒वे गामि॑व॒ भोज॑से|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्र॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{3/12}{6.4.46.3}{8.65.3}{8.7.6.3}{891, 685, 7169} |
| आ त॑ इन्द्र महि॒मानं॒ हर॑यो देव ते॒ महः॑|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} रथे᳚ वहन्तु॒ बिभ्र॑तः||{4/12}{6.4.46.4}{8.65.4}{8.7.6.4}{892, 685, 7170} |
| इन्द्र॑ गृणी॒ष उ॑ स्तु॒षे म॒हाँ, उ॒ग्र ई᳚शान॒कृत्|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} एहि॑ नः सु॒तं पिब॑||{5/12}{6.4.46.5}{8.65.5}{8.7.6.5}{893, 685, 7171} |
| सु॒ताव᳚न्तस्त्वा व॒यं प्रय॑स्वन्तो हवामहे|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} इ॒दं नो᳚ ब॒र्हिरा॒सदे᳚||{6/12}{6.4.46.6}{8.65.6}{8.7.6.6}{894, 685, 7172} |
| यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒मसीन्द्र॒ साधा᳚रण॒स्त्वम्|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} तं त्वा᳚ व॒यं ह॑वामहे||{7/12}{6.4.47.1}{8.65.7}{8.7.6.7}{895, 685, 7173} |
| इ॒दं ते᳚ सो॒म्यं मध्वधु॑क्ष॒न्नद्रि॑भि॒र्नरः॑|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} जु॒षा॒ण इ᳚न्द्र॒ तत् पि॑ब||{8/12}{6.4.47.2}{8.65.8}{8.7.6.8}{896, 685, 7174} |
| विश्वाँ᳚, अ॒र्यो वि॑प॒श्चितो ऽति॑ ख्य॒स्तूय॒मा ग॑हि|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒स्मे धे᳚हि॒ श्रवो᳚ बृ॒हत्||{9/12}{6.4.47.3}{8.65.9}{8.7.6.9}{897, 685, 7175} |
| दा॒ता मे॒ पृष॑तीनां॒ राजा᳚ हिरण्य॒वीना᳚म्|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} मा दे᳚वा म॒घवा᳚ रिषत्||{10/12}{6.4.47.4}{8.65.10}{8.7.6.10}{898, 685, 7176} |
| स॒हस्रे॒ पृष॑तीना॒मधि॑ श्च॒न्द्रं बृ॒हत् पृ॒थु|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} शु॒क्रं हिर᳚ण्य॒मा द॑दे||{11/12}{6.4.47.5}{8.65.11}{8.7.6.11}{899, 685, 7177} |
| नपा᳚तो दु॒र्गह॑स्य मे स॒हस्रे᳚ण सु॒राध॑सः|{काण्वः प्रगाथः | इन्द्रः | गायत्री} श्रवो᳚ दे॒वेष्व॑क्रत||{12/12}{6.4.47.6}{8.65.12}{8.7.6.12}{900, 685, 7178} |
| [55] तरोभिरिति पंचदशर्चस्य सूक्तस्य प्रागाथः कलिरिंद्रः प्रथमादित्रयोदश्यंताअयुजोवृहत्यः द्वितीयादियुजःसतोबृहत्योंत्यानुष्टुप् | |
| तरो᳚भिर्वो वि॒दद्व॑सु॒मिन्द्रं᳚ स॒बाध॑ ऊ॒तये᳚|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | बृहती} बृ॒हद्गाय᳚न्तः सु॒तसो᳚मे, अध्व॒रे हु॒वे भरं॒ न का॒रिण᳚म्||{1/15}{6.4.48.1}{8.66.1}{8.7.7.1}{901, 686, 7179} |
| न यं दु॒ध्रा वर᳚न्ते॒ न स्थि॒रा मुरो॒ मदे᳚ सुशि॒प्रमन्ध॑सः|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | सतोबृहती} य आ॒दृत्या᳚ शशमा॒नाय॑ सुन्व॒ते दाता᳚ जरि॒त्र उ॒क्थ्य᳚म्||{2/15}{6.4.48.2}{8.66.2}{8.7.7.2}{902, 686, 7180} |
| यः श॒क्रो मृ॒क्षो, अश्व्यो॒ यो वा॒ कीजो᳚ हिर॒ण्ययः॑|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | बृहती} स ऊ॒र्वस्य॑ रेजय॒त्यपा᳚वृति॒मिन्द्रो॒ गव्य॑स्य वृत्र॒हा||{3/15}{6.4.48.3}{8.66.3}{8.7.7.3}{903, 686, 7181} |
| निखा᳚तं चि॒द्यः पु॑रुसम्भृ॒तं वसूदिद्वप॑ति दा॒शुषे᳚|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | सतोबृहती} व॒ज्री सु॑शि॒प्रो हर्य॑श्व॒ इत् क॑र॒दिन्द्रः॒ क्रत्वा॒ यथा॒ वश॑त्||{4/15}{6.4.48.4}{8.66.4}{8.7.7.4}{904, 686, 7182} |
| यद्वा॒वन्थ॑ पुरुष्टुत पु॒रा चि॑च्छूर नृ॒णाम्|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | बृहती} व॒यं तत् त॑ इन्द्र॒ सं भ॑रामसि य॒ज्ञमु॒क्थं तु॒रं वचः॑||{5/15}{6.4.48.5}{8.66.5}{8.7.7.5}{905, 686, 7183} |
| सचा॒ सोमे᳚षु पुरुहूत वज्रिवो॒ मदा᳚य द्युक्ष सोमपाः|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | सतोबृहती} त्वमिद्धि ब्र᳚ह्म॒कृते॒ काम्यं॒ वसु॒ देष्ठः॑ सुन्व॒ते भुवः॑||{6/15}{6.4.49.1}{8.66.6}{8.7.7.6}{906, 686, 7184} |
| व॒यमे᳚नमि॒दा ह्यो ऽपी᳚पेमे॒ह व॒ज्रिण᳚म्|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | बृहती} तस्मा᳚ उ अ॒द्य स॑म॒ना सु॒तं भ॒रा ऽऽ नू॒नं भू᳚षत श्रु॒ते||{7/15}{6.4.49.2}{8.66.7}{8.7.7.7}{907, 686, 7185} |
| वृक॑श्चिदस्य वार॒ण उ॑रा॒मथि॒रा व॒युने᳚षु भूषति|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | सतोबृहती} सेमं नः॒ स्तोमं᳚ जुजुषा॒ण आ ग॒हीन्द्र॒ प्र चि॒त्रया᳚ धि॒या||{8/15}{6.4.49.3}{8.66.8}{8.7.7.8}{908, 686, 7186} |
| कदू॒ न्व१॑(अ॒)स्याकृ॑त॒मिन्द्र॑स्यास्ति॒ पौंस्य᳚म्|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | बृहती} केनो॒ नु कं॒ श्रोम॑तेन॒ न शु॑श्रुवे ज॒नुषः॒ परि॑ वृत्र॒हा||{9/15}{6.4.49.4}{8.66.9}{8.7.7.9}{909, 686, 7187} |
| कदू᳚ म॒हीरधृ॑ष्टा, अस्य॒ तवि॑षीः॒ कदु॑ वृत्र॒घ्नो, अस्तृ॑तम्|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | सतोबृहती} इन्द्रो॒ विश्वा᳚न् बेक॒नाटाँ᳚, अह॒र्दृश॑ उ॒त क्रत्वा᳚ प॒णीँर॒भि||{10/15}{6.4.49.5}{8.66.10}{8.7.7.10}{910, 686, 7188} |
| व॒यं घा᳚ ते॒, अपू॒र्व्येन्द्र॒ ब्रह्मा᳚णि वृत्रहन्|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | बृहती} पु॒रू॒तमा᳚सः पुरुहूत वज्रिवो भृ॒तिं न प्र भ॑रामसि||{11/15}{6.4.50.1}{8.66.11}{8.7.7.11}{911, 686, 7189} |
| पू॒र्वीश्चि॒द्धि त्वे तु॑विकूर्मिन्ना॒शसो॒ हव᳚न्त इन्द्रो॒तयः॑|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | सतोबृहती} ति॒रश्चि॑द॒र्यः सव॒ना व॑सो गहि॒ शवि॑ष्ठ श्रु॒धि मे॒ हव᳚म्||{12/15}{6.4.50.2}{8.66.12}{8.7.7.12}{912, 686, 7190} |
| व॒यं घा᳚ ते॒ त्वे, इद्विन्द्र॒ विप्रा॒, अपि॑ ष्मसि|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | बृहती} न॒हि त्वद॒न्यः पु॑रुहूत॒ कश्च॒न मघ॑व॒न्नस्ति॑ मर्डि॒ता||{13/15}{6.4.50.3}{8.66.13}{8.7.7.13}{913, 686, 7191} |
| त्वं नो᳚ अ॒स्या, अम॑तेरु॒त क्षु॒धो॒३॑(ओ॒) ऽभिश॑स्ते॒रव॑ स्पृधि|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | सतोबृहती} त्वं न॑ ऊ॒ती तव॑ चि॒त्रया᳚ धि॒या शिक्षा᳚ शचिष्ठ गातु॒वित्||{14/15}{6.4.50.4}{8.66.14}{8.7.7.14}{914, 686, 7192} |
| सोम॒ इद्वः॑ सु॒तो, अ॑स्तु॒ कल॑यो॒ मा बि॑भीतन|{प्रगाथः कलिः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} अपेदे॒ष ध्व॒स्माय॑ति स्व॒यं घै॒षो, अपा᳚यति||{15/15}{6.4.50.5}{8.66.15}{8.7.7.15}{915, 686, 7193} |
| [56] त्यान्न्वित्येकविंशत्यृचस्य सूक्तस्य सांमदोमत्स्य आदित्या दशम्यादितिसृणामदितिर्गायत्री (मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाऋष) | |
| त्यान्नु क्ष॒त्रियाँ॒, अव॑ आदि॒त्यान् या᳚चिषामहे|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} सु॒मृ॒ळी॒काँ, अ॒भिष्ट॑ये||{1/21}{6.4.51.1}{8.67.1}{8.7.8.1}{916, 687, 7194} |
| मि॒त्रो नो॒, अत्यं᳚ह॒तिं वरु॑णः पर्षदर्य॒मा|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} आ॒दि॒त्यासो॒ यथा᳚ वि॒दुः||{2/21}{6.4.51.2}{8.67.2}{8.7.8.2}{917, 687, 7195} |
| तेषां॒ हि चि॒त्रमु॒क्थ्य१॑(अं॒) वरू᳚थ॒मस्ति॑ दा॒शुषे᳚|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} आ॒दि॒त्याना᳚मरं॒कृते᳚||{3/21}{6.4.51.3}{8.67.3}{8.7.8.3}{918, 687, 7196} |
| महि॑ वो मह॒तामवो॒ वरु॑ण॒ मित्रार्य॑मन्|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} अवां॒स्या वृ॑णीमहे||{4/21}{6.4.51.4}{8.67.4}{8.7.8.4}{919, 687, 7197} |
| जी॒वान्नो᳚ अ॒भि धे᳚त॒नाऽऽदि॑त्यासः पु॒रा हथा᳚त्|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} कद्ध॑ स्थ हवनश्रुतः||{5/21}{6.4.51.5}{8.67.5}{8.7.8.5}{920, 687, 7198} |
| यद्वः॑ श्रा॒न्ताय॑ सुन्व॒ते वरू᳚थ॒मस्ति॒ यच्छ॒र्दिः|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} तेना᳚ नो॒, अधि॑ वोचत||{6/21}{6.4.52.1}{8.67.6}{8.7.8.6}{921, 687, 7199} |
| अस्ति॑ देवा, अं॒होरु॒र्वस्ति॒ रत्न॒मना᳚गसः|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} आदि॑त्या॒, अद्भु॑तैनसः||{7/21}{6.4.52.2}{8.67.7}{8.7.8.7}{922, 687, 7200} |
| मा नः॒ सेतुः॑ सिषेद॒यं म॒हे वृ॑णक्तु न॒स्परि॑|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} इन्द्र॒ इद्धि श्रु॒तो व॒शी||{8/21}{6.4.52.3}{8.67.8}{8.7.8.8}{923, 687, 7201} |
| मा नो᳚ मृ॒चा रि॑पू॒णां वृ॑जि॒नाना᳚मविष्यवः|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} देवा᳚ अ॒भि प्र मृ॑क्षत||{9/21}{6.4.52.4}{8.67.9}{8.7.8.9}{924, 687, 7202} |
| उ॒त त्वाम॑दिते मह्य॒हं दे॒व्युप॑ ब्रुवे|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदितिः | गायत्री} सु॒मृ॒ळी॒काम॒भिष्ट॑ये||{10/21}{6.4.52.5}{8.67.10}{8.7.8.10}{925, 687, 7203} |
| पर्षि॑ दी॒ने ग॑भी॒र आँ, उग्र॑पुत्रे॒ जिघां᳚सतः|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदितिः | गायत्री} माकि॑स्तो॒कस्य॑ नो रिषत्||{11/21}{6.4.53.1}{8.67.11}{8.7.8.11}{926, 687, 7204} |
| अ॒ने॒हो न॑ उरुव्रज॒ उरू᳚चि॒ वि प्रस॑र्तवे|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदितिः | गायत्री} कृ॒धि तो॒काय॑ जी॒वसे᳚||{12/21}{6.4.53.2}{8.67.12}{8.7.8.12}{927, 687, 7205} |
| ये मू॒र्धानः॑, क्षिती॒नामद॑ब्धासः॒ स्वय॑शसः|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} व्र॒ता रक्ष᳚न्ते, अ॒द्रुहः॑||{13/21}{6.4.53.3}{8.67.13}{8.7.8.13}{928, 687, 7206} |
| ते न॑ आ॒स्नो वृका᳚णा॒मादि॑त्यासो मु॒मोच॑त|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} स्ते॒नं ब॒द्धमि॑वादिते||{14/21}{6.4.53.4}{8.67.14}{8.7.8.14}{929, 687, 7207} |
| अपो॒ षु ण॑ इ॒यं शरु॒रादि॑त्या॒, अप॑ दुर्म॒तिः|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} अ॒स्मदे॒त्वज॑घ्नुषी||{15/21}{6.4.53.5}{8.67.15}{8.7.8.15}{930, 687, 7208} |
| शश्व॒द्धि वः॑ सुदानव॒ आदि॑त्या, ऊ॒तिभि᳚र्व॒यम्|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} पु॒रा नू॒नं बु॑भु॒ज्महे᳚||{16/21}{6.4.54.1}{8.67.16}{8.7.8.16}{931, 687, 7209} |
| शश्व᳚न्तं॒ हि प्र॑चेतसः प्रति॒यन्तं᳚ चि॒देन॑सः|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} देवाः᳚ कृणु॒थ जी॒वसे᳚||{17/21}{6.4.54.2}{8.67.17}{8.7.8.17}{932, 687, 7210} |
| तत्सु नो॒ नव्यं॒ सन्य॑स॒ आदि॑त्या॒ यन्मुमो᳚चति|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} ब॒न्धाद्ब॒द्धमि॑वादिते||{18/21}{6.4.54.3}{8.67.18}{8.7.8.18}{933, 687, 7211} |
| नास्माक॑मस्ति॒ तत्तर॒ आदि॑त्यासो, अति॒ष्कदे᳚|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} यू॒यम॒स्मभ्यं᳚ मृळत||{19/21}{6.4.54.4}{8.67.19}{8.7.8.19}{934, 687, 7212} |
| मा नो᳚ हे॒तिर्वि॒वस्व॑त॒ आदि॑त्याः कृ॒त्रिमा॒ शरुः॑|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} पु॒रा नु ज॒रसो᳚ वधीत्||{20/21}{6.4.54.5}{8.67.20}{8.7.8.20}{935, 687, 7213} |
| वि षु द्वेषो॒ व्यं᳚ह॒तिमादि॑त्यासो॒ वि संहि॑तम्|{मैत्रावरुणिर्मान्यो बहवोवामत्स्या जालनद्धाः | आदित्याः | गायत्री} विष्व॒ग्वि वृ॑हता॒ रपः॑||{21/21}{6.4.54.6}{8.67.21}{8.7.8.21}{936, 687, 7214} |
| [57] आत्वेत्येकोनविंशत्यृचस्य सूक्तस्यांगिरसः प्रियमेधइंद्रश्चतुर्दश्यादिषण्णामृक्षाश्वमेधौगायत्री आद्याचतुर्थी सप्तमीदम्योनुष्टुभः | |
| आ त्वा॒ रथं॒ यथो॒तये᳚ सु॒म्नाय॑ वर्तयामसि|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} तु॒वि॒कू॒र्मिमृ॑ती॒षह॒मिन्द्र॒ शवि॑ष्ठ॒ सत्प॑ते||{1/19}{6.5.1.1}{8.68.1}{8.7.9.1}{937, 688, 7215} |
| तुवि॑शुष्म॒ तुवि॑क्रतो॒ शची᳚वो॒ विश्व॑या मते|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} आ प॑प्राथ महित्व॒ना||{2/19}{6.5.1.2}{8.68.2}{8.7.9.2}{938, 688, 7216} |
| यस्य॑ ते महि॒ना म॒हः परि॑ ज्मा॒यन्त॑मी॒यतुः॑|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} हस्ता॒ वज्रं᳚ हिर॒ण्यय᳚म्||{3/19}{6.5.1.3}{8.68.3}{8.7.9.3}{939, 688, 7217} |
| वि॒श्वान॑रस्य व॒स्पति॒मना᳚नतस्य॒ शव॑सः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} एवै᳚श्च चर्षणी॒नामू॒ती हु॑वे॒ रथा᳚नाम्||{4/19}{6.5.1.4}{8.68.4}{8.7.9.4}{940, 688, 7218} |
| अ॒भिष्ट॑ये स॒दावृ॑धं॒ स्व᳚र्मीळ्हेषु॒ यं नरः॑|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} नाना॒ हव᳚न्त ऊ॒तये᳚||{5/19}{6.5.1.5}{8.68.5}{8.7.9.5}{941, 688, 7219} |
| प॒रोमा᳚त्र॒मृची᳚षम॒मिन्द्र॑मु॒ग्रं सु॒राध॑सम्|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} ईशा᳚नं चि॒द्वसू᳚नाम्||{6/19}{6.5.2.1}{8.68.6}{8.7.9.6}{942, 688, 7220} |
| तंत॒मिद्राध॑से म॒ह इन्द्रं᳚ चोदामि पी॒तये᳚|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} यः पू॒र्व्यामनु॑ष्टुति॒मीशे᳚ कृष्टी॒नां नृ॒तुः||{7/19}{6.5.2.2}{8.68.7}{8.7.9.7}{943, 688, 7221} |
| न यस्य॑ ते शवसान स॒ख्यमा॒नंश॒ मर्त्यः॑|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} नकिः॒ शवां᳚सि ते नशत्||{8/19}{6.5.2.3}{8.68.8}{8.7.9.8}{944, 688, 7222} |
| त्वोता᳚स॒स्त्वा यु॒जा ऽप्सु सूर्ये᳚ म॒हद्धन᳚म्|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} जये᳚म पृ॒त्सु व॑ज्रिवः||{9/19}{6.5.2.4}{8.68.9}{8.7.9.9}{945, 688, 7223} |
| तं त्वा᳚ य॒ज्ञेभि॑रीमहे॒ तं गी॒र्भिर्गि᳚र्वणस्तम|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} इन्द्र॒ यथा᳚ चि॒दावि॑थ॒ वाजे᳚षु पुरु॒माय्य᳚म्||{10/19}{6.5.2.5}{8.68.10}{8.7.9.10}{946, 688, 7224} |
| यस्य॑ ते स्वा॒दु स॒ख्यं स्वा॒द्वी प्रणी᳚तिरद्रिवः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} य॒ज्ञो वि॑तन्त॒साय्यः॑||{11/19}{6.5.3.1}{8.68.11}{8.7.9.11}{947, 688, 7225} |
| उ॒रु ण॑स्त॒न्वे॒३॑(ए॒) तन॑ उ॒रु क्षया᳚य नस्कृधि|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} उ॒रु णो᳚ यन्धि जी॒वसे᳚||{12/19}{6.5.3.2}{8.68.12}{8.7.9.12}{948, 688, 7226} |
| उ॒रुं नृभ्य॑ उ॒रुं गव॑ उ॒रुं रथा᳚य॒ पन्था᳚म्|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} दे॒ववी᳚तिं मनामहे||{13/19}{6.5.3.3}{8.68.13}{8.7.9.13}{949, 688, 7227} |
| उप॑ मा॒ षड् द्वाद्वा॒ नरः॒ सोम॑स्य॒ हर्ष्या᳚|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | ऋक्षाश्वमेधः | गायत्री} तिष्ठ᳚न्ति स्वादुरा॒तयः॑||{14/19}{6.5.3.4}{8.68.14}{8.7.9.14}{950, 688, 7228} |
| ऋ॒ज्रावि᳚न्द्रो॒त आ द॑दे॒ हरी॒, ऋक्ष॑स्य सू॒नवि॑|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | ऋक्षाश्वमेधः | गायत्री} आ॒श्व॒मे॒धस्य॒ रोहि॑ता||{15/19}{6.5.3.5}{8.68.15}{8.7.9.15}{951, 688, 7229} |
| सु॒रथाँ᳚, आतिथि॒ग्वे स्व॑भी॒शूँरा॒र्क्षे|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | ऋक्षाश्वमेधः | गायत्री} आ॒श्व॒मे॒धे सु॒पेश॑सः||{16/19}{6.5.4.1}{8.68.16}{8.7.9.16}{952, 688, 7230} |
| षळश्वाँ᳚, आतिथि॒ग्व इ᳚न्द्रो॒ते व॒धूम॑तः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | ऋक्षाश्वमेधः | गायत्री} सचा᳚ पू॒तक्र॑तौ सनम्||{17/19}{6.5.4.2}{8.68.17}{8.7.9.17}{953, 688, 7231} |
| ऐषु॑ चेत॒द्वृष᳚ण्वत्य॒न्तरृ॒ज्रेष्वरु॑षी|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | ऋक्षाश्वमेधः | गायत्री} स्व॒भी॒शुः कशा᳚वती||{18/19}{6.5.4.3}{8.68.18}{8.7.9.18}{954, 688, 7232} |
| न यु॒ष्मे वा᳚जबन्धवो निनि॒त्सुश्च॒न मर्त्यः॑|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | ऋक्षाश्वमेधः | गायत्री} अ॒व॒द्यमधि॑ दीधरत्||{19/19}{6.5.4.4}{8.68.19}{8.7.9.19}{955, 688, 7233} |
| [58] प्रप्रवइत्यष्टादशर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः प्रियमेधइंद्रः अपादिंद्रइत्यस्यविश्वेदेववरुणादेवताः सुदेवइत्यस्यवरुणोनुष्टुप् द्वितीयोष्णिक् चतुर्थ्याद्यास्तिस्रोगायत्र्यः एकादशीषोळश्यौपंक्ती अंत्येद्वेबृहत्यौ | |
| प्रप्र॑ वस्त्रि॒ष्टुभ॒मिषं᳚ म॒न्दद्वी᳚रा॒येन्द॑वे|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} धि॒या वो᳚ मे॒धसा᳚तये॒ पुरं॒ध्या वि॑वासति||{1/18}{6.5.5.1}{8.69.1}{8.7.10.1}{956, 689, 7234} |
| न॒दं व॒ ओद॑तीनां न॒दं योयु॑वतीनाम्|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | उष्णिक्} पतिं᳚ वो॒, अघ्न्या᳚नां धेनू॒नामि॑षुध्यसि||{2/18}{6.5.5.2}{8.69.2}{8.7.10.2}{957, 689, 7235} |
| ता, अ॑स्य॒ सूद॑दोहसः॒ सोमं᳚ श्रीणन्ति॒ पृश्न॑यः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} जन्म᳚न् दे॒वानां॒ विश॑स्त्रि॒ष्वा रो᳚च॒ने दि॒वः||{3/18}{6.5.5.3}{8.69.3}{8.7.10.3}{958, 689, 7236} |
| अ॒भि प्र गोप॑तिं गि॒रेन्द्र॑मर्च॒ यथा᳚ वि॒दे|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} सू॒नुं स॒त्यस्य॒ सत्प॑तिम्||{4/18}{6.5.5.4}{8.69.4}{8.7.10.4}{959, 689, 7237} |
| आ हर॑यः ससृज्रि॒रे ऽरु॑षी॒रधि॑ ब॒र्हिषि॑|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} यत्रा॒भि सं॒नवा᳚महे||{5/18}{6.5.5.5}{8.69.5}{8.7.10.5}{960, 689, 7238} |
| इन्द्रा᳚य॒ गाव॑ आ॒शिरं᳚ दुदु॒ह्रे व॒ज्रिणे॒ मधु॑|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | गायत्री} यत् सी᳚मुपह्व॒रे वि॒दत्||{6/18}{6.5.6.1}{8.69.6}{8.7.10.6}{961, 689, 7239} |
| उद्यद्ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपं᳚ गृ॒हमिन्द्र॑श्च॒ गन्व॑हि|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} मध्वः॑ पी॒त्वा स॑चेवहि॒ त्रिः स॒प्त सख्युः॑ प॒दे||{7/18}{6.5.6.2}{8.69.7}{8.7.10.7}{962, 689, 7240} |
| अर्च॑त॒ प्रार्च॑त॒ प्रिय॑मेधासो॒, अर्च॑त|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} अर्च᳚न्तु पुत्र॒का, उ॒त पुरं॒ न धृ॒ष्ण्व॑र्चत||{8/18}{6.5.6.3}{8.69.8}{8.7.10.8}{963, 689, 7241} |
| अव॑ स्वराति॒ गर्ग॑रो गो॒धा परि॑ सनिष्वणत्|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} पिङ्गा॒ परि॑ चनिष्कद॒दिन्द्रा᳚य॒ ब्रह्मोद्य॑तम्||{9/18}{6.5.6.4}{8.69.9}{8.7.10.9}{964, 689, 7242} |
| आ यत् पत᳚न्त्ये॒न्यः॑ सु॒दुघा॒, अन॑पस्फुरः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} अ॒प॒स्फुरं᳚ गृभायत॒ सोम॒मिन्द्रा᳚य॒ पात॑वे||{10/18}{6.5.6.5}{8.69.10}{8.7.10.10}{965, 689, 7243} |
| अपा॒दिन्द्रो॒, अपा᳚द॒ग्निर्विश्वे᳚ दे॒वा, अ॑मत्सत|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | १/२:विश्वेदेवाः २/२:वरुणः | पङ्क्तिः} वरु॑ण॒ इदि॒ह क्ष॑य॒त् तमापो᳚ अ॒भ्य॑नूषत व॒त्सं सं॒शिश्व॑रीरिव||{11/18}{6.5.7.1}{8.69.11}{8.7.10.11}{966, 689, 7244} |
| सु॒दे॒वो, अ॑सि वरुण॒ यस्य॑ ते स॒प्त सिन्ध॑वः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | वरुणः | अनुष्टुप्} अ॒नु॒क्षर᳚न्ति का॒कुदं᳚ सू॒र्म्यं᳚ सुषि॒रामि॑व||{12/18}{6.5.7.2}{8.69.12}{8.7.10.12}{967, 689, 7245} |
| यो व्यतीँ॒रफा᳚णय॒त् सुयु॑क्ताँ॒, उप॑ दा॒शुषे᳚|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} त॒क्वो ने॒ता तदिद्वपु॑रुप॒मा यो, अमु॑च्यत||{13/18}{6.5.7.3}{8.69.13}{8.7.10.13}{968, 689, 7246} |
| अतीदु॑ श॒क्र ओ᳚हत॒ इन्द्रो॒ विश्वा॒, अति॒ द्विषः॑|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} भि॒नत् क॒नीन॑ ओद॒नं प॒च्यमा᳚नं प॒रो गि॒रा||{14/18}{6.5.7.4}{8.69.14}{8.7.10.14}{969, 689, 7247} |
| अ॒र्भ॒को न कु॑मार॒को ऽधि॑ तिष्ठ॒न् नवं॒ रथ᳚म्|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} स प॑क्षन्महि॒षं मृ॒गं पि॒त्रे मा॒त्रे वि॑भु॒क्रतु᳚म्||{15/18}{6.5.7.5}{8.69.15}{8.7.10.15}{970, 689, 7248} |
| आ तू सु॑शिप्र दम्पते॒ रथं᳚ तिष्ठा हिर॒ण्यय᳚म्|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} अध॑ द्यु॒क्षं स॑चेवहि स॒हस्र॑पादमरु॒षं स्व॑स्ति॒गाम॑ने॒हस᳚म्||{16/18}{6.5.7.6}{8.69.16}{8.7.10.16}{971, 689, 7249} |
| तं घे᳚मि॒त्था न॑म॒स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | बृहती} अर्थं᳚ चिदस्य॒ सुधि॑तं॒ यदेत॑व आव॒र्तय᳚न्ति दा॒वने᳚||{17/18}{6.5.7.7}{8.69.17}{8.7.10.17}{972, 689, 7250} |
| अनु॑ प्र॒त्नस्यौक॑सः प्रि॒यमे᳚धास एषाम्|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | इन्द्रः | बृहती} पूर्वा॒मनु॒ प्रय॑तिं वृ॒क्तब᳚र्हिषो हि॒तप्र॑यस आशत||{18/18}{6.5.7.8}{8.69.18}{8.7.10.18}{973, 689, 7251} |
| [59] योराजेति पंचदशर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः पुरुहन्मेंद्रो बृहती द्वितीयाचतुर्थीषष्ट्यः सतोबृहत्यः त्रयोदश्युष्णिक् चतुर्दश्यनुष्टुबंत्या पुरउष्णिक् | |
| यो राजा᳚ चर्षणी॒नां याता॒ रथे᳚भि॒रध्रि॑गुः|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | बृहती} विश्वा᳚सां तरु॒ता पृत॑नानां॒ ज्येष्ठो॒ यो वृ॑त्र॒हा गृ॒णे||{1/15}{6.5.8.1}{8.70.1}{8.8.1.1}{974, 690, 7252} |
| इन्द्रं॒ तं शु᳚म्भ पुरुहन्म॒न्नव॑से॒ यस्य॑ द्वि॒ता वि॑ध॒र्तरि॑|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | सतोबृहती} हस्ता᳚य॒ वज्रः॒ प्रति॑ धायि दर्श॒तो म॒हो दि॒वे न सूर्यः॑||{2/15}{6.5.8.2}{8.70.2}{8.8.1.2}{975, 690, 7253} |
| नकि॒ष्टं कर्म॑णा नश॒द्यश्च॒कार॑ स॒दावृ॑धम्|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | बृहती} इन्द्रं॒ न य॒ज्ञैर्वि॒श्वगू᳚र्त॒मृभ्व॑स॒मधृ॑ष्टं धृ॒ष्ण्वो᳚जसम्||{3/15}{6.5.8.3}{8.70.3}{8.8.1.3}{976, 690, 7254} |
| अषा᳚ळ्हमु॒ग्रं पृत॑नासु सास॒हिं यस्मि᳚न् म॒हीरु॑रु॒ज्रयः॑|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | सतोबृहती} सं धे॒नवो॒ जाय॑माने, अनोनवु॒र्द्यावः॒, क्षामो᳚ अनोनवुः||{4/15}{6.5.8.4}{8.70.4}{8.8.1.4}{977, 690, 7255} |
| यद्द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमी᳚रु॒त स्युः|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | बृहती} न त्वा᳚ वज्रिन् त्स॒हस्रं॒ सूर्या॒, अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी||{5/15}{6.5.8.5}{8.70.5}{8.8.1.5}{978, 690, 7256} |
| आ प॑प्राथ महि॒ना वृष्ण्या᳚ वृष॒न् विश्वा᳚ शविष्ठ॒ शव॑सा|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | सतोबृहती} अ॒स्माँ, अ॑व मघव॒न् गोम॑ति व्र॒जे वज्रि᳚ञ्चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑||{6/15}{6.5.9.1}{8.70.6}{8.8.1.6}{979, 690, 7257} |
| न सी॒मदे᳚व आप॒दिषं᳚ दीर्घायो॒ मर्त्यः॑|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | बृहती} एत॑ग्वा चि॒द्य एत॑शा यु॒योज॑ते॒ हरी॒, इन्द्रो᳚ यु॒योज॑ते||{7/15}{6.5.9.2}{8.70.7}{8.8.1.7}{980, 690, 7258} |
| तं वो᳚ म॒हो म॒हाय्य॒मिन्द्रं᳚ दा॒नाय॑ स॒क्षणि᳚म्|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | बृहती} यो गा॒धेषु॒ य आर॑णेषु॒ हव्यो॒ वाजे॒ष्वस्ति॒ हव्यः॑||{8/15}{6.5.9.3}{8.70.8}{8.8.1.8}{981, 690, 7259} |
| उदू॒ षु णो᳚ वसो म॒हे मृ॒शस्व॑ शूर॒ राध॑से|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | बृहती} उदू॒ षु म॒ह्यै म॑घवन् म॒घत्त॑य॒ उदि᳚न्द्र॒ श्रव॑से म॒हे||{9/15}{6.5.9.4}{8.70.9}{8.8.1.9}{982, 690, 7260} |
| त्वं न॑ इन्द्र ऋत॒युस्त्वा॒निदो॒ नि तृ᳚म्पसि|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | बृहती} मध्ये᳚ वसिष्व तुविनृम्णो॒र्वोर्नि दा॒सं शि॑श्नथो॒ हथैः᳚||{10/15}{6.5.9.5}{8.70.10}{8.8.1.10}{983, 690, 7261} |
| अ॒न्यव्र॑त॒ममा᳚नुष॒मय॑ज्वान॒मदे᳚वयुम्|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | बृहती} अव॒ स्वः सखा᳚ दुधुवीत॒ पर्व॑तः सु॒घ्नाय॒ दस्युं॒ पर्व॑तः||{11/15}{6.5.10.1}{8.70.11}{8.8.1.11}{984, 690, 7262} |
| त्वं न॑ इन्द्रासां॒ हस्ते᳚ शविष्ठ दा॒वने᳚|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | बृहती} धा॒नानां॒ न सं गृ॑भायास्म॒युर्द्विः सं गृ॑भायास्म॒युः||{12/15}{6.5.10.2}{8.70.12}{8.8.1.12}{985, 690, 7263} |
| सखा᳚यः॒ क्रतु॑मिच्छत क॒था रा᳚धाम श॒रस्य॑|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | उष्णिक्} उप॑स्तुतिं भो॒जः सू॒रिर्यो, अह्र॑यः||{13/15}{6.5.10.3}{8.70.13}{8.8.1.13}{986, 690, 7264} |
| भूरि॑भिः समह॒ ऋषि॑भिर्ब॒र्हिष्म॑द्भिः स्तविष्यसे|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | अनुष्टुप्} यदि॒त्थमेक॑मेक॒मिच्छर॑ व॒त्सान् प॑रा॒ददः॑||{14/15}{6.5.10.4}{8.70.14}{8.8.1.14}{987, 690, 7265} |
| क॒र्ण॒गृह्या᳚ म॒घवा᳚ शौरदे॒व्यो व॒त्सं न॑स्त्रि॒भ्य आन॑यत्|{पुरुहन्मा | इन्द्रः | पुर उष्णिक्} अ॒जां सू॒रिर्न धात॑वे||{15/15}{6.5.10.5}{8.70.15}{8.8.1.15}{988, 690, 7266} |
| [60] त्वंनोअग्नइति पंचदशर्चस्य सूक्तस्य सुदीतिपुरुमीळ्हावाग्निर्गायत्री दशमीद्वादशीचतुर्दश्योबृहत्यः एकादशीत्रयोदशीपंचदश्यः सतोबृहत्यः | (अत्रसुदीतिपुरुमीळ्हयोरन्यतरोवाऋषिः) | |
| त्वं नो᳚ अग्ने॒ महो᳚भिः पा॒हि विश्व॑स्या॒, अरा᳚तेः|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | गायत्री} उ॒त द्वि॒षो मर्त्य॑स्य||{1/15}{6.5.11.1}{8.71.1}{8.8.2.1}{989, 691, 7267} |
| न॒हि म॒न्युः पौरु॑षेय॒ ईशे॒ हि वः॑ प्रियजात|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | गायत्री} त्वमिद॑सि॒ क्षपा᳚वान्||{2/15}{6.5.11.2}{8.71.2}{8.8.2.2}{990, 691, 7268} |
| स नो॒ विश्वे᳚भिर्दे॒वेभि॒रूर्जो᳚ नपा॒द्भद्र॑शोचे|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | गायत्री} र॒यिं दे᳚हि वि॒श्ववा᳚रम्||{3/15}{6.5.11.3}{8.71.3}{8.8.2.3}{991, 691, 7269} |
| न तम॑ग्ने॒, अरा᳚तयो॒ मर्तं᳚ युवन्त रा॒यः|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | गायत्री} यं त्राय॑से दा॒श्वांस᳚म्||{4/15}{6.5.11.4}{8.71.4}{8.8.2.4}{992, 691, 7270} |
| यं त्वं वि॑प्र मे॒धसा᳚ता॒वग्ने᳚ हि॒नोषि॒ धना᳚य|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | गायत्री} स तवो॒ती गोषु॒ गन्ता᳚||{5/15}{6.5.11.5}{8.71.5}{8.8.2.5}{993, 691, 7271} |
| त्वं र॒यिं पु॑रु॒वीर॒मग्ने᳚ दा॒शुषे॒ मर्ता᳚य|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | गायत्री} प्र णो᳚ नय॒ वस्यो॒, अच्छ॑||{6/15}{6.5.12.1}{8.71.6}{8.8.2.6}{994, 691, 7272} |
| उ॒रु॒ष्या णो॒ मा परा᳚ दा, अघाय॒ते जा᳚तवेदः|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | गायत्री} दु॒रा॒ध्ये॒३॑(ए॒) मर्ता᳚य||{7/15}{6.5.12.2}{8.71.7}{8.8.2.7}{995, 691, 7273} |
| अग्ने॒ माकि॑ष्टे दे॒वस्य॑ रा॒तिमदे᳚वो युयोत|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | गायत्री} त्वमी᳚शिषे॒ वसू᳚नाम्||{8/15}{6.5.12.3}{8.71.8}{8.8.2.8}{996, 691, 7274} |
| स नो॒ वस्व॒ उप॑ मा॒स्यूर्जो᳚ नपा॒न्माहि॑नस्य|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | गायत्री} सखे᳚ वसो जरि॒तृभ्यः॑||{9/15}{6.5.12.4}{8.71.9}{8.8.2.9}{997, 691, 7275} |
| अच्छा᳚ नः शी॒रशो᳚चिषं॒ गिरो᳚ यन्तु दर्श॒तम्|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | बृहती} अच्छा᳚ य॒ज्ञासो॒ नम॑सा पुरू॒वसुं᳚ पुरुप्रश॒स्तमू॒तये᳚||{10/15}{6.5.12.5}{8.71.10}{8.8.2.10}{998, 691, 7276} |
| अ॒ग्निं सू॒नुं सह॑सो जा॒तवे᳚दसं दा॒नाय॒ वार्या᳚णाम्|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | सतोबृहती} द्वि॒ता यो भूद॒मृतो॒ मर्त्ये॒ष्वा होता᳚ म॒न्द्रत॑मो वि॒शि||{11/15}{6.5.13.1}{8.71.11}{8.8.2.11}{999, 691, 7277} |
| अ॒ग्निं वो᳚ देवय॒ज्यया॒ ऽग्निं प्र॑य॒त्य॑ध्व॒रे|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | बृहती} अ॒ग्निं धी॒षु प्र॑थ॒मम॒ग्निमर्व॑त्य॒ग्निं क्षैत्रा᳚य॒ साध॑से||{12/15}{6.5.13.2}{8.71.12}{8.8.2.12}{1000, 691, 7278} |
| अ॒ग्निरि॒षां स॒ख्ये द॑दातु न॒ ईशे॒ यो वार्या᳚णाम्|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | सतोबृहती} अ॒ग्निं तो॒के तन॑ये॒ शश्व॑दीमहे॒ वसुं॒ सन्तं᳚ तनू॒पाम्||{13/15}{6.5.13.3}{8.71.13}{8.8.2.13}{1001, 691, 7279} |
| अ॒ग्निमी᳚ळि॒ष्वाव॑से॒ गाथा᳚भिः शी॒रशो᳚चिषम्|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | बृहती} अ॒ग्निं रा॒ये पु॑रुमीळ्ह श्रु॒तं नरो॒ ऽग्निं सु॑दी॒तये᳚ छ॒र्दिः||{14/15}{6.5.13.4}{8.71.14}{8.8.2.14}{1002, 691, 7280} |
| अ॒ग्निं द्वेषो॒ योत॒वै नो᳚ गृणीमस्य॒ग्निं शं योश्च॒ दात॑वे|{सुदीतिपुरुमीळ्हौ | अग्निः | सतोबृहती} विश्वा᳚सु वि॒क्ष्व॑वि॒तेव॒ हव्यो॒ भुव॒द्वस्तु᳚रृषू॒णाम्||{15/15}{6.5.13.5}{8.71.15}{8.8.2.15}{1003, 691, 7281} |
| [61] हरिरित्यष्टादशर्चस्य सूक्तस्य प्रागाथोहर्यतोग्निर्गायत्री | (हविषांस्तुतिर्वादेवता) |
| ह॒विष्कृ॑णुध्व॒मा ग॑मदध्व॒र्युर्व॑नते॒ पुनः॑|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} वि॒द्वाँ, अ॑स्य प्र॒शास॑नम्||{1/18}{6.5.14.1}{8.72.1}{8.8.3.1}{1004, 692, 7282} |
| नि ति॒ग्मम॒भ्य१॑(अं॒)शुं सीद॒द्धोता᳚ म॒नावधि॑|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} जु॒षा॒णो, अ॑स्य स॒ख्यम्||{2/18}{6.5.14.2}{8.72.2}{8.8.3.2}{1005, 692, 7283} |
| अ॒न्तरि॑च्छन्ति॒ तं जने᳚ रु॒द्रं प॒रो म॑नी॒षया᳚|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} गृ॒भ्णन्ति॑ जि॒ह्वया᳚ स॒सम्||{3/18}{6.5.14.3}{8.72.3}{8.8.3.3}{1006, 692, 7284} |
| जा॒म्य॑तीतपे॒ धनु᳚र्वयो॒धा, अ॑रुह॒द्वन᳚म्|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} दृ॒षदं᳚ जि॒ह्वयाव॑धीत्||{4/18}{6.5.14.4}{8.72.4}{8.8.3.4}{1007, 692, 7285} |
| चर᳚न् व॒त्सो रुश᳚न्नि॒ह नि॑दा॒तारं॒ न वि᳚न्दते|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} वेति॒ स्तोत॑व अ॒म्ब्य᳚म्||{5/18}{6.5.14.5}{8.72.5}{8.8.3.5}{1008, 692, 7286} |
| उ॒तो न्व॑स्य॒ यन्म॒हदश्वा᳚व॒द्योज॑नं बृ॒हद्|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} दा॒मा रथ॑स्य॒ ददृ॑शे||{6/18}{6.5.15.1}{8.72.6}{8.8.3.6}{1009, 692, 7287} |
| दु॒हन्ति॑ स॒प्तैका॒मुप॒ द्वा पञ्च॑ सृजतः|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} ती॒र्थे सिन्धो॒रधि॑ स्व॒रे||{7/18}{6.5.15.2}{8.72.7}{8.8.3.7}{1010, 692, 7288} |
| आ द॒शभि᳚र्वि॒वस्व॑त॒ इन्द्रः॒ कोश॑मचुच्यवीत्|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} खेद॑या त्रि॒वृता᳚ दि॒वः||{8/18}{6.5.15.3}{8.72.8}{8.8.3.8}{1011, 692, 7289} |
| परि॑ त्रि॒धातु॑रध्व॒रं जू॒र्णिरे᳚ति॒ नवी᳚यसी|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} मध्वा॒ होता᳚रो, अञ्जते||{9/18}{6.5.15.4}{8.72.9}{8.8.3.9}{1012, 692, 7290} |
| सि॒ञ्चन्ति॒ नम॑साव॒तमु॒च्चाच॑क्रं॒ परि॑ज्मानम्|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} नी॒चीन॑बार॒मक्षि॑तम्||{10/18}{6.5.15.5}{8.72.10}{8.8.3.10}{1013, 692, 7291} |
| अ॒भ्यार॒मिदद्र॑यो॒ निषि॑क्तं॒ पुष्क॑रे॒ मधु॑|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} अ॒व॒तस्य॑ वि॒सर्ज॑ने||{11/18}{6.5.16.1}{8.72.11}{8.8.3.11}{1014, 692, 7292} |
| गाव॒ उपा᳚वताव॒तं म॒ही य॒ज्ञस्य॑ र॒प्सुदा᳚|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} उ॒भा कर्णा᳚ हिर॒ण्यया᳚||{12/18}{6.5.16.2}{8.72.12}{8.8.3.12}{1015, 692, 7293} |
| आ सु॒ते सि᳚ञ्चत॒ श्रियं॒ रोद॑स्योरभि॒श्रिय᳚म्|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} र॒सा द॑धीत वृष॒भम्||{13/18}{6.5.16.3}{8.72.13}{8.8.3.13}{1016, 692, 7294} |
| ते जा᳚नत॒ स्वमो॒क्य१॑(अं॒) सं व॒त्सासो॒ न मा॒तृभिः॑|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} मि॒थो न॑सन्त जा॒मिभिः॑||{14/18}{6.5.16.4}{8.72.14}{8.8.3.14}{1017, 692, 7295} |
| उप॒ स्रक्वे᳚षु॒ बप्स॑तः कृण्व॒ते ध॒रुणं᳚ दि॒वि|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} इन्द्रे᳚ अ॒ग्ना नमः॒ स्वः॑||{15/18}{6.5.16.5}{8.72.15}{8.8.3.15}{1018, 692, 7296} |
| अधु॑क्षत् पि॒प्युषी॒मिष॒मूर्जं᳚ स॒प्तप॑दीम॒रिः|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} सूर्य॑स्य स॒प्त र॒श्मिभिः॑||{16/18}{6.5.17.1}{8.72.16}{8.8.3.16}{1019, 692, 7297} |
| सोम॑स्य मित्रावरु॒णोदि॑ता॒ सूर॒ आ द॑दे|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} तदातु॑रस्य भेष॒जम्||{17/18}{6.5.17.2}{8.72.17}{8.8.3.17}{1020, 692, 7298} |
| उ॒तो न्व॑स्य॒ यत् प॒दं ह᳚र्य॒तस्य॑ निधा॒न्य᳚म्|{प्रागाथो हर्यतः | अग्निः | गायत्री} परि॒ द्यां जि॒ह्वया᳚तनत्||{18/18}{6.5.17.3}{8.72.18}{8.8.3.18}{1021, 692, 7299} |
| [62] उदीराथामित्यष्टादशर्चस्य सूक्तस्यात्रेयोगोपवनोश्विनौगायत्री | ( सप्तवध्निर्वाऋषिः) |
| उदी᳚राथामृताय॒ते यु॒ञ्जाथा᳚मश्विना॒ रथ᳚म्|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{1/18}{6.5.18.1}{8.73.1}{8.8.4.1}{1022, 693, 7300} |
| नि॒मिष॑श्चि॒ज्जवी᳚यसा॒ रथे॒ना या᳚तमश्विना|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{2/18}{6.5.18.2}{8.73.2}{8.8.4.2}{1023, 693, 7301} |
| उप॑ स्तृणीत॒मत्र॑ये हि॒मेन॑ घ॒र्मम॑श्विना|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{3/18}{6.5.18.3}{8.73.3}{8.8.4.3}{1024, 693, 7302} |
| कुह॑ स्थः॒ कुह॑ जग्मथुः॒ कुह॑ श्ये॒नेव॑ पेतथुः|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{4/18}{6.5.18.4}{8.73.4}{8.8.4.4}{1025, 693, 7303} |
| यद॒द्य कर्हि॒ कर्हि॑ चिच्छुश्रू॒यात॑मि॒मं हव᳚म्|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{5/18}{6.5.18.5}{8.73.5}{8.8.4.5}{1026, 693, 7304} |
| अ॒श्विना᳚ याम॒हूत॑मा॒ नेदि॑ष्ठं या॒म्याप्य᳚म्|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{6/18}{6.5.19.1}{8.73.6}{8.8.4.6}{1027, 693, 7305} |
| अव᳚न्त॒मत्र॑ये गृ॒हं कृ॑णु॒तं यु॒वम॑श्विना|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{7/18}{6.5.19.2}{8.73.7}{8.8.4.7}{1028, 693, 7306} |
| वरे᳚थे, अ॒ग्निमा॒तपो॒ वद॑ते व॒ल्ग्वत्र॑ये|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{8/18}{6.5.19.3}{8.73.8}{8.8.4.8}{1029, 693, 7307} |
| प्र स॒प्तव॑ध्रिरा॒शसा॒ धारा᳚म॒ग्नेर॑शायत|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{9/18}{6.5.19.4}{8.73.9}{8.8.4.9}{1030, 693, 7308} |
| इ॒हा ग॑तं वृषण्वसू शृणु॒तं म॑ इ॒मं हव᳚म्|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{10/18}{6.5.19.5}{8.73.10}{8.8.4.10}{1031, 693, 7309} |
| किमि॒दं वां᳚ पुराण॒वज्जर॑तोरिव शस्यते|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{11/18}{6.5.20.1}{8.73.11}{8.8.4.11}{1032, 693, 7310} |
| स॒मा॒नं वां᳚ सजा॒त्यं᳚ समा॒नो बन्धु॑रश्विना|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{12/18}{6.5.20.2}{8.73.12}{8.8.4.12}{1033, 693, 7311} |
| यो वां॒ रजां᳚स्यश्विना॒ रथो᳚ वि॒याति॒ रोद॑सी|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{13/18}{6.5.20.3}{8.73.13}{8.8.4.13}{1034, 693, 7312} |
| आ नो॒ गव्ये᳚भि॒रश्व्यैः᳚ स॒हस्रै॒रुप॑ गच्छतम्|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{14/18}{6.5.20.4}{8.73.14}{8.8.4.14}{1035, 693, 7313} |
| मा नो॒ गव्ये᳚भि॒रश्व्यैः᳚ स॒हस्रे᳚भि॒रति॑ ख्यतम्|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{15/18}{6.5.20.5}{8.73.15}{8.8.4.15}{1036, 693, 7314} |
| अ॒रु॒णप्सु॑रु॒षा, अ॑भू॒दक॒र्ज्योति᳚रृ॒ताव॑री|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{16/18}{6.5.20.6}{8.73.16}{8.8.4.16}{1037, 693, 7315} |
| अ॒श्विना॒ सु वि॒चाक॑शद्वृ॒क्षं प॑रशु॒माँ, इ॑व|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{17/18}{6.5.20.7}{8.73.17}{8.8.4.17}{1038, 693, 7316} |
| पुरं॒ न धृ॑ष्ण॒वा रु॑ज कृ॒ष्णया᳚ बाधि॒तो वि॒शा|{आत्रेयो गोपवनः | अश्विनौ | गायत्री} अन्ति॒ षद्भू᳚तु वा॒मवः॑||{18/18}{6.5.20.8}{8.73.18}{8.8.4.18}{1039, 693, 7317} |
| [63] विशोविशइति पंचदशर्चस्य सूक्तस्यात्रेयोगोपवनोग्निरंत्यतिसृणां श्रुतर्वागायत्री आद्याचतुर्थीसप्तमीदशम्यस्त्रयोदश्यादितिस्रश्चानुष्टुभः | |
| वि॒शोवि॑शो वो॒, अति॑थिं वाज॒यन्तः॑ पुरुप्रि॒यम्|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | अनुष्टुप्} अ॒ग्निं वो॒ दुर्यं॒ वचः॑ स्तु॒षे शू॒षस्य॒ मन्म॑भिः||{1/15}{6.5.21.1}{8.74.1}{8.8.5.1}{1040, 694, 7318} |
| यं जना᳚सो ह॒विष्म᳚न्तो मि॒त्रं न स॒र्पिरा᳚सुतिम्|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | गायत्री} प्र॒शंस᳚न्ति॒ प्रश॑स्तिभिः||{2/15}{6.5.21.2}{8.74.2}{8.8.5.2}{1041, 694, 7319} |
| पन्यां᳚सं जा॒तवे᳚दसं॒ यो दे॒वता॒त्युद्य॑ता|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | गायत्री} ह॒व्यान्यैर॑यद्दि॒वि||{3/15}{6.5.21.3}{8.74.3}{8.8.5.3}{1042, 694, 7320} |
| आग᳚न्म वृत्र॒हन्त॑मं॒ ज्येष्ठ॑म॒ग्निमान॑वम्|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | अनुष्टुप्} यस्य॑ श्रु॒तर्वा᳚ बृ॒हन्ना॒र्क्षो, अनी᳚क॒ एध॑ते||{4/15}{6.5.21.4}{8.74.4}{8.8.5.4}{1043, 694, 7321} |
| अ॒मृतं᳚ जा॒तवे᳚दसं ति॒रस्तमां᳚सि दर्श॒तम्|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | गायत्री} घृ॒ताह॑वन॒मीड्य᳚म्||{5/15}{6.5.21.5}{8.74.5}{8.8.5.5}{1044, 694, 7322} |
| स॒बाधो॒ यं जना᳚ इ॒मे॒३॑(ए॒) ऽग्निं ह॒व्येभि॒रीळ॑ते|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | गायत्री} जुह्वा᳚नासो य॒तस्रु॑चः||{6/15}{6.5.22.1}{8.74.6}{8.8.5.6}{1045, 694, 7323} |
| इ॒यं ते॒ नव्य॑सी म॒तिरग्ने॒, अधा᳚य्य॒स्मदा|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | अनुष्टुप्} मन्द्र॒ सुजा᳚त॒ सुक्र॒तो ऽमू᳚र॒ दस्माति॑थे||{7/15}{6.5.22.2}{8.74.7}{8.8.5.7}{1046, 694, 7324} |
| सा ते᳚ अग्ने॒ शंत॑मा॒ चनि॑ष्ठा भवतु प्रि॒या|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | गायत्री} तया᳚ वर्धस्व॒ सुष्टु॑तः||{8/15}{6.5.22.3}{8.74.8}{8.8.5.8}{1047, 694, 7325} |
| सा द्यु॒म्नैर्द्यु॒म्निनी᳚ बृ॒हदुपो᳚प॒ श्रव॑सि॒ श्रवः॑|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | गायत्री} दधी᳚त वृत्र॒तूर्ये᳚||{9/15}{6.5.22.4}{8.74.9}{8.8.5.9}{1048, 694, 7326} |
| अश्व॒मिद्गां र॑थ॒प्रां त्वे॒षमिन्द्रं॒ न सत्प॑तिम्|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | अनुष्टुप्} यस्य॒ श्रवां᳚सि॒ तूर्व॑थ॒ पन्य᳚म्पन्यं च कृ॒ष्टयः॑||{10/15}{6.5.22.5}{8.74.10}{8.8.5.10}{1049, 694, 7327} |
| यं त्वा᳚ गो॒पव॑नो गि॒रा चनि॑ष्ठदग्ने, अङ्गिरः|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | गायत्री} स पा᳚वक श्रुधी॒ हव᳚म्||{11/15}{6.5.23.1}{8.74.11}{8.8.5.11}{1050, 694, 7328} |
| यं त्वा॒ जना᳚स॒ ईळ॑ते स॒बाधो॒ वाज॑सातये|{आत्रेयो गोपवनः | अग्निः | गायत्री} स बो᳚धि वृत्र॒तूर्ये᳚||{12/15}{6.5.23.2}{8.74.12}{8.8.5.12}{1051, 694, 7329} |
| अ॒हं हु॑वा॒न आ॒र्क्षे श्रु॒तर्व॑णि मद॒च्युति॑|{आत्रेयो गोपवनः | श्रुतर्वाः | अनुष्टुप्} शर्धां᳚सीव स्तुका॒विनां᳚ मृ॒क्षा शी॒र्षा च॑तु॒र्णाम्||{13/15}{6.5.23.3}{8.74.13}{8.8.5.13}{1052, 694, 7330} |
| मां च॒त्वार॑ आ॒शवः॒ शवि॑ष्ठस्य द्रवि॒त्नवः॑|{आत्रेयो गोपवनः | श्रुतर्वाः | अनुष्टुप्} सु॒रथा᳚सो, अ॒भि प्रयो॒ वक्ष॒न् वयो॒ न तुग्र्य᳚म्||{14/15}{6.5.23.4}{8.74.14}{8.8.5.14}{1053, 694, 7331} |
| स॒त्यमित् त्वा᳚ महेनदि॒ परु॒ष्ण्यव॑ देदिशम्|{आत्रेयो गोपवनः | श्रुतर्वाः | अनुष्टुप्} नेमा᳚पो, अश्व॒दात॑रः॒ शवि॑ष्ठादस्ति॒ मर्त्यः॑||{15/15}{6.5.23.5}{8.74.15}{8.8.5.15}{1054, 694, 7332} |
| [64] युक्ष्वाहीति षोळशर्चस्य सूक्तस्यांगिरसो विरूपोग्निर्गायत्री | |
| यु॒क्ष्वा हि दे᳚व॒हूत॑माँ॒, अश्वाँ᳚, अग्ने र॒थीरि॑व|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} नि होता᳚ पू॒र्व्यः स॑दः||{1/16}{6.5.24.1}{8.75.1}{8.8.6.1}{1055, 695, 7333} |
| उ॒त नो᳚ देव दे॒वाँ, अच्छा᳚ वोचो वि॒दुष्ट॑रः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} श्रद्विश्वा॒ वार्या᳚ कृधि||{2/16}{6.5.24.2}{8.75.2}{8.8.6.2}{1056, 695, 7334} |
| त्वं ह॒ यद्य॑विष्ठ्य॒ सह॑सः सूनवाहुत|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} ऋ॒तावा᳚ य॒ज्ञियो॒ भुवः॑||{3/16}{6.5.24.3}{8.75.3}{8.8.6.3}{1057, 695, 7335} |
| अ॒यम॒ग्निः स॑ह॒स्रिणो॒ वाज॑स्य श॒तिन॒स्पतिः॑|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} मू॒र्धा क॒वी र॑यी॒णाम्||{4/16}{6.5.24.4}{8.75.4}{8.8.6.4}{1058, 695, 7336} |
| तं ने॒मिमृ॒भवो᳚ य॒था ऽऽ न॑मस्व॒ सहू᳚तिभिः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} नेदी᳚यो य॒ज्ञम᳚ङ्गिरः||{5/16}{6.5.24.5}{8.75.5}{8.8.6.5}{1059, 695, 7337} |
| तस्मै᳚ नू॒नम॒भिद्य॑वे वा॒चा वि॑रूप॒ नित्य॑या|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} वृष्णे᳚ चोदस्व सुष्टु॒तिम्||{6/16}{6.5.25.1}{8.75.6}{8.8.6.6}{1060, 695, 7338} |
| कमु॑ ष्विदस्य॒ सेन॑या॒ऽग्नेरपा᳚कचक्षसः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} प॒णिं गोषु॑ स्तरामहे||{7/16}{6.5.25.2}{8.75.7}{8.8.6.7}{1061, 695, 7339} |
| मा नो᳚ दे॒वानां॒ विशः॑ प्रस्ना॒तीरि॑वो॒स्राः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} कृ॒शं न हा᳚सु॒रघ्न्याः᳚||{8/16}{6.5.25.3}{8.75.8}{8.8.6.8}{1062, 695, 7340} |
| मा नः॑ समस्य दू॒ढ्य१॑(अः॒) परि॑द्वेषसो, अंह॒तिः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} ऊ॒र्मिर्न नाव॒मा व॑धीत्||{9/16}{6.5.25.4}{8.75.9}{8.8.6.9}{1063, 695, 7341} |
| नम॑स्ते, अग्न॒ ओज॑से गृ॒णन्ति॑ देव कृ॒ष्टयः॑|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अमै᳚र॒मित्र॑मर्दय||{10/16}{6.5.25.5}{8.75.10}{8.8.6.10}{1064, 695, 7342} |
| कु॒वित् सु नो॒ गवि॑ष्ट॒ये ऽग्ने᳚ सं॒वेषि॑षो र॒यिम्|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} उरु॑कृदु॒रु ण॑स्कृधि||{11/16}{6.5.26.1}{8.75.11}{8.8.6.11}{1065, 695, 7343} |
| मा नो᳚ अ॒स्मिन् म॑हाध॒ने परा᳚ वर्ग्भार॒भृद्य॑था|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} सं॒वर्गं॒ सं र॒यिं ज॑य||{12/16}{6.5.26.2}{8.75.12}{8.8.6.12}{1066, 695, 7344} |
| अ॒न्यम॒स्मद्भि॒या, इ॒यमग्ने॒ सिष॑क्तु दु॒च्छुना᳚|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} वर्धा᳚ नो॒, अम॑व॒च्छवः॑||{13/16}{6.5.26.3}{8.75.13}{8.8.6.13}{1067, 695, 7345} |
| यस्याजु॑षन्नम॒स्विनः॒ शमी॒मदु᳚र्मखस्य वा|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} तं घेद॒ग्निर्वृ॒धाव॑ति||{14/16}{6.5.26.4}{8.75.14}{8.8.6.14}{1068, 695, 7346} |
| पर॑स्या॒, अधि॑ सं॒वतो ऽव॑राँ, अ॒भ्या त॑र|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} यत्रा॒हमस्मि॒ ताँ, अ॑व||{15/16}{6.5.26.5}{8.75.15}{8.8.6.15}{1069, 695, 7347} |
| वि॒द्मा हि ते᳚ पु॒रा व॒यमग्ने᳚ पि॒तुर्यथाव॑सः|{आङ्गिरसो विरूपः | अग्निः | गायत्री} अधा᳚ ते सु॒म्नमी᳚महे||{16/16}{6.5.26.6}{8.75.16}{8.8.6.16}{1070, 695, 7348} |
| [65] इमंन्विति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वः कुरुसुतिरिंद्रोगायत्री | |
| इ॒मं नु मा॒यिनं᳚ हुव॒ इन्द्र॒मीशा᳚न॒मोज॑सा|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} म॒रुत्व᳚न्तं॒ न वृ॒ञ्जसे᳚||{1/12}{6.5.27.1}{8.76.1}{8.8.7.1}{1071, 696, 7349} |
| अ॒यमिन्द्रो᳚ म॒रुत्स॑खा॒ वि वृ॒त्रस्या᳚भिन॒च्छिरः॑|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} वज्रे᳚ण श॒तप᳚र्वणा||{2/12}{6.5.27.2}{8.76.2}{8.8.7.2}{1072, 696, 7350} |
| वा॒वृ॒धा॒नो म॒रुत्स॒खेन्द्रो॒ वि वृ॒त्रमै᳚रयत्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} सृ॒जन् त्स॑मु॒द्रिया᳚ अ॒पः||{3/12}{6.5.27.3}{8.76.3}{8.8.7.3}{1073, 696, 7351} |
| अ॒यं ह॒ येन॒ वा, इ॒दं स्व᳚र्म॒रुत्व॑ता जि॒तम्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रे᳚ण॒ सोम॑पीतये||{4/12}{6.5.27.4}{8.76.4}{8.8.7.4}{1074, 696, 7352} |
| म॒रुत्व᳚न्तमृजी॒षिण॒मोज॑स्वन्तं विर॒प्शिन᳚म्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रं᳚ गी॒र्भिर्ह॑वामहे||{5/12}{6.5.27.5}{8.76.5}{8.8.7.5}{1075, 696, 7353} |
| इन्द्रं᳚ प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना म॒रुत्व᳚न्तं हवामहे|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये᳚||{6/12}{6.5.27.6}{8.76.6}{8.8.7.6}{1076, 696, 7354} |
| म॒रुत्वाँ᳚, इन्द्र मीढ्वः॒ पिबा॒ सोमं᳚ शतक्रतो|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒स्मिन् य॒ज्ञे पु॑रुष्टुत||{7/12}{6.5.28.1}{8.76.7}{8.8.7.7}{1077, 696, 7355} |
| तुभ्येदि᳚न्द्र म॒रुत्व॑ते सु॒ताः सोमा᳚सो, अद्रिवः|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} हृ॒दा हू᳚यन्त उ॒क्थिनः॑||{8/12}{6.5.28.2}{8.76.8}{8.8.7.8}{1078, 696, 7356} |
| पिबेदि᳚न्द्र म॒रुत्स॑खा सु॒तं सोमं॒ दिवि॑ष्टिषु|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} वज्रं॒ शिशा᳚न॒ ओज॑सा||{9/12}{6.5.28.3}{8.76.9}{8.8.7.9}{1079, 696, 7357} |
| उ॒त्तिष्ठ॒न्नोज॑सा स॒ह पी॒त्वी शिप्रे᳚ अवेपयः|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} सोम॑मिन्द्र च॒मू सु॒तम्||{10/12}{6.5.28.4}{8.76.10}{8.8.7.10}{1080, 696, 7358} |
| अनु॑ त्वा॒ रोद॑सी, उ॒भे क्रक्ष॑माणमकृपेताम्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्र॒ यद्द॑स्यु॒हाभ॑वः||{11/12}{6.5.28.5}{8.76.11}{8.8.7.11}{1081, 696, 7359} |
| वाच॑म॒ष्टाप॑दीम॒हं नव॑स्रक्तिमृत॒स्पृश᳚म्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रा॒त्परि॑ त॒न्वं᳚ ममे||{12/12}{6.5.28.6}{8.76.12}{8.8.7.12}{1082, 696, 7360} |
| [66] जज्ञानइत्येकादशर्चस्य सूक्तस्य काण्वः कुरुसुतिरिंद्रोगायत्री अंत्येद्वेबृहती सतोबृहत्यौ | |
| ज॒ज्ञा॒नो नु श॒तक्र॑तु॒र्वि पृ॑च्छ॒दिति॑ मा॒तर᳚म्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} क उ॒ग्राः के ह॑ शृण्विरे||{1/11}{6.5.29.1}{8.77.1}{8.8.8.1}{1083, 697, 7361} |
| आदीं᳚ शव॒स्य॑ब्रवीदौर्णवा॒भम॑ही॒शुव᳚म्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} ते पु॑त्र सन्तु नि॒ष्टुरः॑||{2/11}{6.5.29.2}{8.77.2}{8.8.8.2}{1084, 697, 7362} |
| समित्तान् वृ॑त्र॒हाखि॑द॒त्खे, अ॒राँ, इ॑व॒ खेद॑या|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} प्रवृ॑द्धो दस्यु॒हाभ॑वत्||{3/11}{6.5.29.3}{8.77.3}{8.8.8.3}{1085, 697, 7363} |
| एक॑या प्रति॒धापि॑बत्सा॒कं सरां᳚सि त्रिं॒शत᳚म्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रः॒ सोम॑स्य काणु॒का||{4/11}{6.5.29.4}{8.77.4}{8.8.8.4}{1086, 697, 7364} |
| अ॒भि ग᳚न्ध॒र्वम॑तृणदबु॒ध्नेषु॒ रज॒स्स्वा|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रो᳚ ब्र॒ह्मभ्य॒ इद्वृ॒धे||{5/11}{6.5.29.5}{8.77.5}{8.8.8.5}{1087, 697, 7365} |
| निरा᳚विध्यद्गि॒रिभ्य॒ आ धा॒रय॑त्प॒क्वमो᳚द॒नम्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रो᳚ बु॒न्दं स्वा᳚ततम्||{6/11}{6.5.30.1}{8.77.6}{8.8.8.6}{1088, 697, 7366} |
| श॒तब्र॑ध्न॒ इषु॒स्तव॑ स॒हस्र॑पर्ण॒ एक॒ इत्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} यमि᳚न्द्र चकृ॒षे युज᳚म्||{7/11}{6.5.30.2}{8.77.7}{8.8.8.7}{1089, 697, 7367} |
| तेन॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॒ नृभ्यो॒ नारि॑भ्यो॒, अत्त॑वे|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} स॒द्यो जा॒त ऋ॑भुष्ठिर||{8/11}{6.5.30.3}{8.77.8}{8.8.8.8}{1090, 697, 7368} |
| ए॒ता च्यौ॒त्नानि॑ ते कृ॒ता वर्षि॑ष्ठानि॒ परी᳚णसा|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} हृ॒दा वी॒ड्व॑धारयः||{9/11}{6.5.30.4}{8.77.9}{8.8.8.9}{1091, 697, 7369} |
| विश्वेत्ता विष्णु॒राभ॑रदुरुक्र॒मस्त्वेषि॑तः|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | बृहती} श॒तं म॑हि॒षान् क्षी᳚रपा॒कमो᳚द॒नं व॑रा॒हमिन्द्र॑ एमु॒षम्||{10/11}{6.5.30.5}{8.77.10}{8.8.8.10}{1092, 697, 7370} |
| तु॒वि॒क्षं ते॒ सुकृ॑तं सू॒मयं॒ धनुः॑ सा॒धुर्बु॒न्दो हि॑र॒ण्ययः॑|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | सतोबृहती} उ॒भा ते᳚ बा॒हू रण्या॒ सुसं᳚स्कृत ऋदू॒पे चि॑दृदू॒वृधा᳚||{11/11}{6.5.30.6}{8.77.11}{8.8.8.11}{1093, 697, 7371} |
| [67] पुरोळाशमिति दशर्चस्य सूक्तस्य काण्वःकुरुसुतिरिंद्रोगायत्र्यंत्या बृहती | |
| पु॒रो॒ळाशं᳚ नो॒, अन्ध॑स॒ इन्द्र॑ स॒हस्र॒मा भ॑र|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} श॒ता च॑ शूर॒ गोना᳚म्||{1/10}{6.5.31.1}{8.78.1}{8.8.9.1}{1094, 698, 7372} |
| आ नो᳚ भर॒ व्यञ्ज॑नं॒ गामश्व॑म॒भ्यञ्ज॑नम्|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} सचा᳚ म॒ना हि॑र॒ण्यया᳚||{2/10}{6.5.31.2}{8.78.2}{8.8.9.2}{1095, 698, 7373} |
| उ॒त नः॑ कर्ण॒शोभ॑ना पु॒रूणि॑ धृष्ण॒वा भ॑र|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} त्वं हि शृ᳚ण्वि॒षे व॑सो||{3/10}{6.5.31.3}{8.78.3}{8.8.9.3}{1096, 698, 7374} |
| नकीं᳚ वृधी॒क इ᳚न्द्र ते॒ न सु॒षा न सु॒दा, उ॒त|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} नान्यस्त्वच्छू᳚र वा॒घतः॑||{4/10}{6.5.31.4}{8.78.4}{8.8.9.4}{1097, 698, 7375} |
| नकी॒मिन्द्रो॒ निक॑र्तवे॒ न श॒क्रः परि॑शक्तवे|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} विश्वं᳚ शृणोति॒ पश्य॑ति||{5/10}{6.5.31.5}{8.78.5}{8.8.9.5}{1098, 698, 7376} |
| स म॒न्युं मर्त्या᳚ना॒मद॑ब्धो॒ नि चि॑कीषते|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} पु॒रा नि॒दश्चि॑कीषते||{6/10}{6.5.32.1}{8.78.6}{8.8.9.6}{1099, 698, 7377} |
| क्रत्व॒ इत्पू॒र्णमु॒दरं᳚ तु॒रस्या᳚स्ति विध॒तः|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} वृ॒त्र॒घ्नः सो᳚म॒पाव्नः॑||{7/10}{6.5.32.2}{8.78.7}{8.8.9.7}{1100, 698, 7378} |
| त्वे वसू᳚नि॒ संग॑ता॒ विश्वा᳚ च सोम॒ सौभ॑गा|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} सु॒दात्वप॑रिह्वृता||{8/10}{6.5.32.3}{8.78.8}{8.8.9.8}{1101, 698, 7379} |
| त्वामिद्य॑व॒युर्मम॒ कामो᳚ ग॒व्युर्हि॑रण्य॒युः|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | गायत्री} त्वाम॑श्व॒युरेष॑ते||{9/10}{6.5.32.4}{8.78.9}{8.8.9.9}{1102, 698, 7380} |
| तवेदि᳚न्द्रा॒हमा॒शसा॒ हस्ते॒ दात्रं᳚ च॒ना द॑दे|{काण्वः कुरुसुतिः | इन्द्रः | बृहती} दि॒नस्य॑ वा मघव॒न् त्सम्भृ॑तस्य वा पू॒र्धि यव॑स्य का॒शिना᳚||{10/10}{6.5.32.5}{8.78.10}{8.8.9.10}{1103, 698, 7381} |
| [68] अयंकृत्नुरिति नवर्चस्य सूक्तस्य कृत्नुर्भार्गवः सोमोगायत्र्यंत्यानुष्टुप् | |
| अ॒यं कृ॒त्नुरगृ॑भीतो विश्व॒जिदु॒द्भिदित्सोमः॑|{कृत्नुर्भार्गवः | सोमः | गायत्री} ऋषि॒र्विप्रः॒ काव्ये᳚न||{1/9}{6.5.33.1}{8.79.1}{8.8.10.1}{1104, 699, 7382} |
| अ॒भ्यू᳚र्णोति॒ यन्न॒ग्नं भि॒षक्ति॒ विश्वं॒ यत्तु॒रम्|{कृत्नुर्भार्गवः | सोमः | गायत्री} प्रेम॒न्धः ख्य॒न्निः श्रो॒णो भू᳚त्||{2/9}{6.5.33.2}{8.79.2}{8.8.10.2}{1105, 699, 7383} |
| त्वं सो᳚म तनू॒कृद्भ्यो॒ द्वेषो᳚भ्यो॒ऽन्यकृ॑तेभ्यः|{कृत्नुर्भार्गवः | सोमः | गायत्री} उ॒रु य॒न्तासि॒ वरू᳚थम्||{3/9}{6.5.33.3}{8.79.3}{8.8.10.3}{1106, 699, 7384} |
| त्वं चि॒त्ती तव॒ दक्षै᳚र्दि॒व आ पृ॑थि॒व्या, ऋ॑जीषिन्|{कृत्नुर्भार्गवः | सोमः | गायत्री} यावी᳚र॒घस्य॑ चि॒द्द्वेषः॑||{4/9}{6.5.33.4}{8.79.4}{8.8.10.4}{1107, 699, 7385} |
| अ॒र्थिनो॒ यन्ति॒ चेदर्थं॒ गच्छा॒निद्द॒दुषो᳚ रा॒तिम्|{कृत्नुर्भार्गवः | सोमः | गायत्री} व॒वृ॒ज्युस्तृष्य॑तः॒ काम᳚म्||{5/9}{6.5.33.5}{8.79.5}{8.8.10.5}{1108, 699, 7386} |
| वि॒दद्यत्पू॒र्व्यं न॒ष्टमुदी᳚मृता॒युमी᳚रयत्|{कृत्नुर्भार्गवः | सोमः | गायत्री} प्रेमायु॑स्तारी॒दती᳚र्णम्||{6/9}{6.5.34.1}{8.79.6}{8.8.10.6}{1109, 699, 7387} |
| सु॒शेवो᳚ नो मृळ॒याकु॒रदृ॑प्तक्रतुरवा॒तः|{कृत्नुर्भार्गवः | सोमः | गायत्री} भवा᳚ नः सोम॒ शं हृ॒दे||{7/9}{6.5.34.2}{8.79.7}{8.8.10.7}{1110, 699, 7388} |
| मा नः॑ सोम॒ सं वी᳚विजो॒ मा वि बी᳚भिषथा राजन्|{कृत्नुर्भार्गवः | सोमः | गायत्री} मा नो॒ हार्दि॑ त्वि॒षा व॑धीः||{8/9}{6.5.34.3}{8.79.8}{8.8.10.8}{1111, 699, 7389} |
| अव॒ यत्स्वे स॒धस्थे᳚ दे॒वानां᳚ दुर्म॒तीरीक्षे᳚|{कृत्नुर्भार्गवः | सोमः | अनुष्टुप्} राज॒न्नप॒ द्विषः॑ सेध॒ मीढ्वो॒, अप॒ स्रिधः॑ सेध||{9/9}{6.5.34.4}{8.79.9}{8.8.10.9}{1112, 699, 7390} |
| [69] नह्यान्यमिति दशर्चस्य सूक्तस्य नौधस एकद्यूरिंद्रोंत्यायादेवागायत्र्यंत्यात्रिष्टुप् | |
| न॒ह्य१॑(अ॒)न्यं ब॒ळाक॑रं मर्डि॒तारं᳚ शतक्रतो|{नौधस एकद्यूः | इन्द्रः | गायत्री} त्वं न॑ इन्द्र मृळय||{1/10}{6.5.35.1}{8.80.1}{8.8.11.1}{1113, 700, 7391} |
| यो नः॒ शश्व॑त्पु॒रावि॒थामृ॑ध्रो॒ वाज॑सातये|{नौधस एकद्यूः | इन्द्रः | गायत्री} स त्वं न॑ इन्द्र मृळय||{2/10}{6.5.35.2}{8.80.2}{8.8.11.2}{1114, 700, 7392} |
| किम॒ङ्ग र॑ध्र॒चोद॑नः सुन्वा॒नस्या᳚वि॒तेद॑सि|{नौधस एकद्यूः | इन्द्रः | गायत्री} कु॒वित्स्वि᳚न्द्र णः॒ शकः॑||{3/10}{6.5.35.3}{8.80.3}{8.8.11.3}{1115, 700, 7393} |
| इन्द्र॒ प्र णो॒ रथ॑मव प॒श्चाच्चि॒त्सन्त॑मद्रिवः|{नौधस एकद्यूः | इन्द्रः | गायत्री} पु॒रस्ता᳚देनं मे कृधि||{4/10}{6.5.35.4}{8.80.4}{8.8.11.4}{1116, 700, 7394} |
| हन्तो॒ नु किमा᳚ससे प्रथ॒मं नो॒ रथं᳚ कृधि|{नौधस एकद्यूः | इन्द्रः | गायत्री} उ॒प॒मं वा᳚ज॒यु श्रवः॑||{5/10}{6.5.35.5}{8.80.5}{8.8.11.5}{1117, 700, 7395} |
| अवा᳚ नो वाज॒युं रथं᳚ सु॒करं᳚ ते॒ किमित्परि॑|{नौधस एकद्यूः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒स्मान् त्सु जि॒ग्युष॑स्कृधि||{6/10}{6.5.36.1}{8.80.6}{8.8.11.6}{1118, 700, 7396} |
| इन्द्र॒ दृह्य॑स्व॒ पूर॑सि भ॒द्रा त॑ एति निष्कृ॒तम्|{नौधस एकद्यूः | इन्द्रः | गायत्री} इ॒यं धीरृ॒त्विया᳚वती||{7/10}{6.5.36.2}{8.80.7}{8.8.11.7}{1119, 700, 7397} |
| मा सी᳚मव॒द्य आ भा᳚गु॒र्वी काष्ठा᳚ हि॒तं धन᳚म्|{नौधस एकद्यूः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒पावृ॑क्ता, अर॒त्नयः॑||{8/10}{6.5.36.3}{8.80.8}{8.8.11.8}{1120, 700, 7398} |
| तु॒रीयं॒ नाम॑ य॒ज्ञियं᳚ य॒दा कर॒स्तदु॑श्मसि|{नौधस एकद्यूः | इन्द्रः | गायत्री} आदित्पति᳚र्न ओहसे||{9/10}{6.5.36.4}{8.80.9}{8.8.11.9}{1121, 700, 7399} |
| अवी᳚वृधद्वो, अमृता॒, अम᳚न्दीदेक॒द्यूर्दे᳚वा, उ॒त याश्च॑ देवीः|{नौधस एकद्यूः | देवाः | त्रिष्टुप्} तस्मा᳚ उ॒ राधः॑ कृणुत प्रश॒स्तं प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात्||{10/10}{6.5.36.5}{8.80.10}{8.8.11.10}{1122, 700, 7400} |
| [70] आतूनइति नवर्चस्य सूक्तस्य काण्वः कुसीदींद्रो गायत्री | |
| आ तू न॑ इन्द्र क्षु॒मन्तं᳚ चि॒त्रं ग्रा॒भं सं गृ॑भाय|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} म॒हा॒ह॒स्ती दक्षि॑णेन||{1/9}{6.5.37.1}{8.81.1}{8.9.1.1}{1123, 701, 7401} |
| वि॒द्मा हि त्वा᳚ तुविकू॒र्मिं तु॒विदे᳚ष्णं तु॒वीम॑घम्|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} तु॒वि॒मा॒त्रमवो᳚भिः||{2/9}{6.5.37.2}{8.81.2}{8.9.1.2}{1124, 701, 7402} |
| न॒हि त्वा᳚ शूर दे॒वा न मर्ता᳚सो॒ दित्स᳚न्तम्|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} भी॒मं न गां वा॒रय᳚न्ते||{3/9}{6.5.37.3}{8.81.3}{8.9.1.3}{1125, 701, 7403} |
| एतो॒ न्विन्द्रं॒ स्तवा॒मेशा᳚नं॒ वस्वः॑ स्व॒राज᳚म्|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} न राध॑सा मर्धिषन्नः||{4/9}{6.5.37.4}{8.81.4}{8.9.1.4}{1126, 701, 7404} |
| प्र स्तो᳚ष॒दुप॑ गासिष॒च्छ्रव॒त् साम॑ गी॒यमा᳚नम्|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒भि राध॑सा जुगुरत्||{5/9}{6.5.37.5}{8.81.5}{8.9.1.5}{1127, 701, 7405} |
| आ नो᳚ भर॒ दक्षि॑णेना॒भि स॒व्येन॒ प्र मृ॑श|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्र॒ मा नो॒ वसो॒र्निर्भा᳚क्||{6/9}{6.5.38.1}{8.81.6}{8.9.1.6}{1128, 701, 7406} |
| उप॑ क्रम॒स्वा भ॑र धृष॒ता धृ॑ष्णो॒ जना᳚नाम्|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} अदा᳚शूष्टरस्य॒ वेदः॑||{7/9}{6.5.38.2}{8.81.7}{8.9.1.7}{1129, 701, 7407} |
| इन्द्र॒ य उ॒ नु ते॒, अस्ति॒ वाजो॒ विप्रे᳚भिः॒ सनि॑त्वः|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒स्माभिः॒ सु तं स॑नुहि||{8/9}{6.5.38.3}{8.81.8}{8.9.1.8}{1130, 701, 7408} |
| स॒द्यो॒जुव॑स्ते॒ वाजा᳚ अ॒स्मभ्यं᳚ वि॒श्वश्च᳚न्द्राः|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} वशै᳚श्च म॒क्षू ज॑रन्ते||{9/9}{6.5.38.4}{8.81.9}{8.9.1.9}{1131, 701, 7409} |
| [71] आप्रद्रवइति नवर्चस्य सूक्तस्य काण्वः कुसीदींद्रो गायत्री | |
| आ प्र द्र॑व परा॒वतो᳚ऽर्वा॒वत॑श्च वृत्रहन्|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} मध्वः॒ प्रति॒ प्रभ᳚र्मणि||{1/9}{6.6.1.1}{8.82.1}{8.9.2.1}{1132, 702, 7410} |
| ती॒व्राः सोमा᳚स॒ आ ग॑हि सु॒तासो᳚ मादयि॒ष्णवः॑|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} पिबा᳚ द॒धृग्यथो᳚चि॒षे||{2/9}{6.6.1.2}{8.82.2}{8.9.2.2}{1133, 702, 7411} |
| इ॒षा म᳚न्द॒स्वादु॒ तेऽरं॒ वरा᳚य म॒न्यवे᳚|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} भुव॑त्त इन्द्र॒ शं हृ॒दे||{3/9}{6.6.1.3}{8.82.3}{8.9.2.3}{1134, 702, 7412} |
| आ त्व॑शत्र॒वा ग॑हि॒ न्यु१॑(उ॒)क्थानि॑ च हूयसे|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} उ॒प॒मे रो᳚च॒ने दि॒वः||{4/9}{6.6.1.4}{8.82.4}{8.9.2.4}{1135, 702, 7413} |
| तुभ्या॒यमद्रि॑भिः सु॒तो गोभिः॑ श्री॒तो मदा᳚य॒ कम्|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} प्र सोम॑ इन्द्र हूयते||{5/9}{6.6.1.5}{8.82.5}{8.9.2.5}{1136, 702, 7414} |
| इन्द्र॑ श्रु॒धि सु मे॒ हव॑म॒स्मे सु॒तस्य॒ गोम॑तः|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} वि पी॒तिं तृ॒प्तिम॑श्नुहि||{6/9}{6.6.2.1}{8.82.6}{8.9.2.6}{1137, 702, 7415} |
| य इ᳚न्द्र चम॒सेष्वा सोम॑श्च॒मूषु॑ ते सु॒तः|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} पिबेद॑स्य॒ त्वमी᳚शिषे||{7/9}{6.6.2.2}{8.82.7}{8.9.2.7}{1138, 702, 7416} |
| यो, अ॒प्सु च॒न्द्रमा᳚ इव॒ सोम॑श्च॒मूषु॒ ददृ॑शे|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} पिबेद॑स्य॒ त्वमी᳚शिषे||{8/9}{6.6.2.3}{8.82.8}{8.9.2.8}{1139, 702, 7417} |
| यं ते᳚ श्ये॒नः प॒दाभ॑रत्ति॒रो रजां॒स्यस्पृ॑तम्|{काण्वः कुसीदीः | इन्द्रः | गायत्री} पिबेद॑स्य॒ त्वमी᳚शिषे||{9/9}{6.6.2.4}{8.82.9}{8.9.2.9}{1140, 702, 7418} |
| [72] देवानामिति नवर्चस्य सूक्तस्य काण्वः कुसीदीविश्वेदेवा गायत्री | (भेदपक्षे - विश्वेदेवाः ३ अर्यमवरुणौ १ विश्वेदेवाः ५ एवं ९) | |
| दे॒वाना॒मिदवो᳚ म॒हत्तदा वृ॑णीमहे व॒यम्|{काण्वः कुसीदीः | विश्वदेवाः | गायत्री} वृष्णा᳚म॒स्मभ्य॑मू॒तये᳚||{1/9}{6.6.3.1}{8.83.1}{8.9.3.1}{1141, 703, 7419} |
| ते नः॑ सन्तु॒ युजः॒ सदा॒ वरु॑णो मि॒त्रो, अ᳚र्य॒मा|{काण्वः कुसीदीः | विश्वदेवाः | गायत्री} वृ॒धास॑श्च॒ प्रचे᳚तसः||{2/9}{6.6.3.2}{8.83.2}{8.9.3.2}{1142, 703, 7420} |
| अति॑ नो विष्पि॒ता पु॒रु नौ॒भिर॒पो न प॑र्षथ|{काण्वः कुसीदीः | विश्वदेवाः | गायत्री} यू॒यमृ॒तस्य॑ रथ्यः||{3/9}{6.6.3.3}{8.83.3}{8.9.3.3}{1143, 703, 7421} |
| वा॒मं नो᳚ अस्त्वर्यमन्वा॒मं व॑रुण॒ शंस्य᳚म्|{काण्वः कुसीदीः | विश्वदेवाः | गायत्री} वा॒मं ह्या᳚वृणी॒महे᳚||{4/9}{6.6.3.4}{8.83.4}{8.9.3.4}{1144, 703, 7422} |
| वा॒मस्य॒ हि प्र॑चेतस॒ ईशा᳚नाशो रिशादसः|{काण्वः कुसीदीः | विश्वदेवाः | गायत्री} नेमा᳚दित्या, अ॒घस्य॒ यत्||{5/9}{6.6.3.5}{8.83.5}{8.9.3.5}{1145, 703, 7423} |
| व॒यमिद्वः॑ सुदानवः, क्षि॒यन्तो॒ यान्तो॒, अध्व॒न्ना|{काण्वः कुसीदीः | विश्वदेवाः | गायत्री} देवा᳚ वृ॒धाय॑ हूमहे||{6/9}{6.6.4.1}{8.83.6}{8.9.3.6}{1146, 703, 7424} |
| अधि॑ न इन्द्रैषां॒ विष्णो᳚ सजा॒त्या᳚नाम्|{काण्वः कुसीदीः | विश्वदेवाः | गायत्री} इ॒ता मरु॑तो॒, अश्वि॑ना||{7/9}{6.6.4.2}{8.83.7}{8.9.3.7}{1147, 703, 7425} |
| प्र भ्रा᳚तृ॒त्वं सु॑दान॒वोऽध॑ द्वि॒ता स॑मा॒न्या|{काण्वः कुसीदीः | विश्वदेवाः | गायत्री} मा॒तुर्गर्भे᳚ भरामहे||{8/9}{6.6.4.3}{8.83.8}{8.9.3.8}{1148, 703, 7426} |
| यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानव॒ इन्द्र॑ज्येष्ठा, अ॒भिद्य॑वः|{काण्वः कुसीदीः | विश्वदेवाः | गायत्री} अधा᳚ चिद्व उ॒त ब्रु॑वे||{9/9}{6.6.4.4}{8.83.9}{8.9.3.9}{1149, 703, 7427} |
| [73] प्रेष्ठंवइति नवर्चस्य सूक्तस्य काव्य उशनाअग्निर्गायत्री | |
| प्रेष्ठं᳚ वो॒, अति॑थिं स्तु॒षे मि॒त्रमि॑व प्रि॒यम्|{काव्य उशनाः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निं रथं॒ न वेद्य᳚म्||{1/9}{6.6.5.1}{8.84.1}{8.9.4.1}{1150, 704, 7428} |
| क॒विमि॑व॒ प्रचे᳚तसं॒ यं दे॒वासो॒, अध॑ द्वि॒ता|{काव्य उशनाः | अग्निः | गायत्री} नि मर्त्ये᳚ष्वाद॒धुः||{2/9}{6.6.5.2}{8.84.2}{8.9.4.2}{1151, 704, 7429} |
| त्वं य॑विष्ठ दा॒शुषो॒ नॄँः पा᳚हि शृणु॒धी गिरः॑|{काव्य उशनाः | अग्निः | गायत्री} रक्षा᳚ तो॒कमु॒त त्मना᳚||{3/9}{6.6.5.3}{8.84.3}{8.9.4.3}{1152, 704, 7430} |
| कया᳚ ते, अग्ने, अङ्गिर॒ ऊर्जो᳚ नपा॒दुप॑स्तुतिम्|{काव्य उशनाः | अग्निः | गायत्री} वरा᳚य देव म॒न्यवे᳚||{4/9}{6.6.5.4}{8.84.4}{8.9.4.4}{1153, 704, 7431} |
| दाशे᳚म॒ कस्य॒ मन॑सा य॒ज्ञस्य॑ सहसो यहो|{काव्य उशनाः | अग्निः | गायत्री} कदु॑ वोच इ॒दं नमः॑||{5/9}{6.6.5.5}{8.84.5}{8.9.4.5}{1154, 704, 7432} |
| अधा॒ त्वं हि न॒स्करो॒ विश्वा᳚ अ॒स्मभ्यं᳚ सुक्षि॒तीः|{काव्य उशनाः | अग्निः | गायत्री} वाज॑द्रविणसो॒ गिरः॑||{6/9}{6.6.6.1}{8.84.6}{8.9.4.6}{1155, 704, 7433} |
| कस्य॑ नू॒नं परी᳚णसो॒ धियो᳚ जिन्वसि दम्पते|{काव्य उशनाः | अग्निः | गायत्री} गोषा᳚ता॒ यस्य॑ ते॒ गिरः॑||{7/9}{6.6.6.2}{8.84.7}{8.9.4.7}{1156, 704, 7434} |
| तं म॑र्जयन्त सु॒क्रतुं᳚ पुरो॒यावा᳚नमा॒जिषु॑|{काव्य उशनाः | अग्निः | गायत्री} स्वेषु॒ क्षये᳚षु वा॒जिन᳚म्||{8/9}{6.6.6.3}{8.84.8}{8.9.4.8}{1157, 704, 7435} |
| क्षेति॒ क्षेमे᳚भिः सा॒धुभि॒र्नकि॒र्यं घ्नन्ति॒ हन्ति॒ यः|{काव्य उशनाः | अग्निः | गायत्री} अग्ने᳚ सु॒वीर॑ एधते||{9/9}{6.6.6.4}{8.84.9}{8.9.4.9}{1158, 704, 7436} |
| [74] आमेहवमिति नवर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः कृष्णोश्विनौ गायत्री | |
| आ मे॒ हवं᳚ नास॒त्याश्वि॑ना॒ गच्छ॑तं यु॒वम्|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | गायत्री} मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{1/9}{6.6.7.1}{8.85.1}{8.9.5.1}{1159, 705, 7437} |
| इ॒मं मे॒ स्तोम॑मश्विने॒मं मे᳚ शृणुतं॒ हव᳚म्|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | गायत्री} मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{2/9}{6.6.7.2}{8.85.2}{8.9.5.2}{1160, 705, 7438} |
| अ॒यं वां॒ कृष्णो᳚ अश्विना॒ हव॑ते वाजिनीवसू|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | गायत्री} मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{3/9}{6.6.7.3}{8.85.3}{8.9.5.3}{1161, 705, 7439} |
| शृ॒णु॒तं ज॑रि॒तुर्हवं॒ कृष्ण॑स्य स्तुव॒तो न॑रा|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | गायत्री} मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{4/9}{6.6.7.4}{8.85.4}{8.9.5.4}{1162, 705, 7440} |
| छ॒र्दिर्य᳚न्त॒मदा᳚भ्यं॒ विप्रा᳚य स्तुव॒ते न॑रा|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | गायत्री} मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{5/9}{6.6.7.5}{8.85.5}{8.9.5.5}{1163, 705, 7441} |
| गच्छ॑तं दा॒शुषो᳚ गृ॒हमि॒त्था स्तु॑व॒तो, अ॑श्विना|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | गायत्री} मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{6/9}{6.6.8.1}{8.85.6}{8.9.5.6}{1164, 705, 7442} |
| यु॒ञ्जाथां॒ रास॑भं॒ रथे᳚ वी॒ड्व᳚ङ्गे वृषण्वसू|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | गायत्री} मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{7/9}{6.6.8.2}{8.85.7}{8.9.5.7}{1165, 705, 7443} |
| त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॒ रथे॒ना या᳚तमश्विना|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | गायत्री} मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{8/9}{6.6.8.3}{8.85.8}{8.9.5.8}{1166, 705, 7444} |
| नू मे॒ गिरो᳚ नास॒त्याश्वि॑ना॒ प्राव॑तं यु॒वम्|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | गायत्री} मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{9/9}{6.6.8.4}{8.85.9}{8.9.5.9}{1167, 705, 7445} |
| [75] उभाहीति पंचर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः कृष्णोश्विनौजगती | (अत्रकाणिर्विश्वकऋषिः पाक्षिकः) |
| उ॒भा हि द॒स्रा भि॒षजा᳚ मयो॒भुवो॒भा दक्ष॑स्य॒ वच॑सो बभू॒वथुः॑|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | जगती} ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ᳚ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्||{1/5}{6.6.9.1}{8.86.1}{8.9.6.1}{1168, 706, 7446} |
| क॒था नू॒नं वां॒ विम॑ना॒, उप॑ स्तवद्यु॒वं धियं᳚ ददथु॒र्वस्य॑इष्टये|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | जगती} ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ᳚ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्||{2/5}{6.6.9.2}{8.86.2}{8.9.6.2}{1169, 706, 7447} |
| यु॒वं हि ष्मा᳚ पुरुभुजे॒ममे᳚ध॒तुं वि॑ष्णा॒प्वे᳚ द॒दथु॒र्वस्य॑इष्टये|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | जगती} ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ᳚ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्||{3/5}{6.6.9.3}{8.86.3}{8.9.6.3}{1170, 706, 7448} |
| उ॒त त्यं वी॒रं ध॑न॒सामृ॑जी॒षिणं᳚ दू॒रे चि॒त्सन्त॒मव॑से हवामहे|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | जगती} यस्य॒ स्वादि॑ष्ठा सुम॒तिः पि॒तुर्य॑था॒ मा नो॒ वि यौ᳚ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्||{4/5}{6.6.9.4}{8.86.4}{8.9.6.4}{1171, 706, 7449} |
| ऋ॒तेन॑ दे॒वः स॑वि॒ता श॑मायत ऋ॒तस्य॒ शृङ्ग॑मुर्वि॒या वि प॑प्रथे|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | जगती} ऋ॒तं सा᳚साह॒ महि॑ चित् पृतन्य॒तो मा नो॒ वि यौ᳚ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्||{5/5}{6.6.9.5}{8.86.5}{8.9.6.5}{1172, 706, 7450} |
| [76] द्युम्नीवामिति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसः कृष्णोश्विनौअयुजोबृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | ( अत्रवासिष्ठोद्युम्नीकआंगिरसः प्रियमेधश्चेत्युभावृषीवैकल्पिकौ) | |
| द्यु॒म्नी वां॒ स्तोमो᳚ अश्विना॒ क्रिवि॒र्न सेक॒ आ ग॑तम्|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | बृहती} मध्वः॑ सु॒तस्य॒ स दि॒वि प्रि॒यो न॑रा पा॒तं गौ॒रावि॒वेरि॑णे||{1/6}{6.6.10.1}{8.87.1}{8.9.7.1}{1173, 707, 7451} |
| पिब॑तं घ॒र्मं मधु॑मन्तमश्वि॒ना ब॒र्हिः सी᳚दतं नरा|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | सतोबृहती} ता म᳚न्दसा॒ना मनु॑षो दुरो॒ण आ नि पा᳚तं॒ वेद॑सा॒ वयः॑||{2/6}{6.6.10.2}{8.87.2}{8.9.7.2}{1174, 707, 7452} |
| आ वां॒ विश्वा᳚भिरू॒तिभिः॑ प्रि॒यमे᳚धा, अहूषत|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | बृहती} ता व॒र्तिर्या᳚त॒मुप॑ वृ॒क्तब᳚र्हिषो॒ जुष्टं᳚ य॒ज्ञं दिवि॑ष्टिषु||{3/6}{6.6.10.3}{8.87.3}{8.9.7.3}{1175, 707, 7453} |
| पिब॑तं॒ सोमं॒ मधु॑मन्तमश्वि॒ना ब॒र्हिः सी᳚दतं सु॒मत्|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | सतोबृहती} ता वा᳚वृधा॒ना, उप॑ सुष्टु॒तिं दि॒वो ग॒न्तं गौ॒रावि॒वेरि॑णम्||{4/6}{6.6.10.4}{8.87.4}{8.9.7.4}{1176, 707, 7454} |
| आ नू॒नं या᳚तमश्वि॒नाश्वे᳚भिः प्रुषि॒तप्सु॑भिः|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | बृहती} दस्रा॒ हिर᳚ण्यवर्तनी शुभस्पती पा॒तं सोम॑मृतावृधा||{5/6}{6.6.10.5}{8.87.5}{8.9.7.5}{1177, 707, 7455} |
| व॒यं हि वां॒ हवा᳚महे विप॒न्यवो॒ विप्रा᳚सो॒ वाज॑सातये|{आङ्गिरसः कृष्णः | अश्विनौ | सतोबृहती} ता व॒ल्गू द॒स्रा पु॑रु॒दंस॑सा धि॒याश्वि॑ना श्रु॒ष्ट्या ग॑तम्||{6/6}{6.6.10.6}{8.87.6}{8.9.7.6}{1178, 707, 7456} |
| [77] तंवोदस्ममिति षडृचस्य सूक्तस्य गौतमोनोधाइंद्रः अयुजोबृहत्योयुजःसतोबृहत्यः | |
| तं वो᳚ द॒स्ममृ॑ती॒षहं॒ वसो᳚र्मन्दा॒नमन्ध॑सः|{गौतमो नोधा | इन्द्रः | बृहती} अ॒भि व॒त्सं न स्वस॑रेषु धे॒नव॒ इन्द्रं᳚ गी॒र्भिर्न॑वामहे||{1/6}{6.6.11.1}{8.88.1}{8.9.8.1}{1179, 708, 7457} |
| द्यु॒क्षं सु॒दानुं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं गि॒रिं न पु॑रु॒भोज॑सम्|{गौतमो नोधा | इन्द्रः | सतोबृहती} क्षु॒मन्तं॒ वाजं᳚ श॒तिनं᳚ सह॒स्रिणं᳚ म॒क्षू गोम᳚न्तमीमहे||{2/6}{6.6.11.2}{8.88.2}{8.9.8.2}{1180, 708, 7458} |
| न त्वा᳚ बृ॒हन्तो॒, अद्र॑यो॒ वर᳚न्त इन्द्र वी॒ळवः॑|{गौतमो नोधा | इन्द्रः | बृहती} यद्दित्स॑सि स्तुव॒ते माव॑ते॒ वसु॒ नकि॒ष्टदा मि॑नाति ते||{3/6}{6.6.11.3}{8.88.3}{8.9.8.3}{1181, 708, 7459} |
| योद्धा᳚सि॒ क्रत्वा॒ शव॑सो॒त दं॒सना॒ विश्वा᳚ जा॒ताभि म॒ज्मना᳚|{गौतमो नोधा | इन्द्रः | सतोबृहती} आ त्वा॒यम॒र्क ऊ॒तये᳚ ववर्तति॒ यं गोत॑मा॒, अजी᳚जनन्||{4/6}{6.6.11.4}{8.88.4}{8.9.8.4}{1182, 708, 7460} |
| प्र हि रि॑रि॒क्ष ओज॑सा दि॒वो, अन्ते᳚भ्य॒स्परि॑|{गौतमो नोधा | इन्द्रः | बृहती} न त्वा᳚ विव्याच॒ रज॑ इन्द्र॒ पार्थि॑व॒मनु॑ स्व॒धां व॑वक्षिथ||{5/6}{6.6.11.5}{8.88.5}{8.9.8.5}{1183, 708, 7461} |
| नकिः॒ परि॑ष्टिर्मघवन्म॒घस्य॑ ते॒ यद्दा॒शुषे᳚ दश॒स्यसि॑|{गौतमो नोधा | इन्द्रः | सतोबृहती} अ॒स्माकं᳚ बोध्यु॒चथ॑स्य चोदि॒ता मंहि॑ष्ठो॒ वाज॑सातये||{6/6}{6.6.11.6}{8.88.6}{8.9.8.6}{1184, 708, 7462} |
| [78] बृहदिंद्रायेति सप्तर्चस्य सूक्तस्यांगिरसौ नृमेधपुरुमेधाविंद्रो बृहती द्वितीयाचतुर्थ्यौसतोबृहत्यौ पंचमीषष्ठ्यावनुष्टुभौ | |
| बृ॒हदिन्द्रा᳚य गायत॒ मरु॑तो वृत्र॒हन्त॑मम्|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | बृहती} येन॒ ज्योति॒रज॑नयन्नृता॒वृधो᳚ दे॒वं दे॒वाय॒ जागृ॑वि||{1/7}{6.6.12.1}{8.89.1}{8.9.9.1}{1185, 709, 7463} |
| अपा᳚धमद॒भिश॑स्तीरशस्ति॒हाथेन्द्रो᳚ द्यु॒म्न्याभ॑वत्|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | सतोबृहती} दे॒वास्त॑ इन्द्र स॒ख्याय॑ येमिरे॒ बृह॑द्भानो॒ मरु॑द्गण||{2/7}{6.6.12.2}{8.89.2}{8.9.9.2}{1186, 709, 7464} |
| प्र व॒ इन्द्रा᳚य बृह॒ते मरु॑तो॒ ब्रह्मा᳚र्चत|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | बृहती} वृ॒त्रं ह॑नति वृत्र॒हा श॒तक्र॑तु॒र्वज्रे᳚ण श॒तप᳚र्वणा||{3/7}{6.6.12.3}{8.89.3}{8.9.9.3}{1187, 709, 7465} |
| अ॒भि प्र भ॑र धृष॒ता धृ॑षन्मनः॒ श्रव॑श्चित्ते, असद्बृ॒हत्|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | सतोबृहती} अर्ष॒न्त्वापो॒ जव॑सा॒ वि मा॒तरो॒ हनो᳚ वृ॒त्रं जया॒ स्वः॑||{4/7}{6.6.12.4}{8.89.4}{8.9.9.4}{1188, 709, 7466} |
| यज्जाय॑था, अपूर्व्य॒ मघ॑वन् वृत्र॒हत्या᳚य|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} तत् पृ॑थि॒वीम॑प्रथय॒स्तद॑स्तभ्ना, उ॒त द्याम्||{5/7}{6.6.12.5}{8.89.5}{8.9.9.5}{1189, 709, 7467} |
| तत्ते᳚ य॒ज्ञो, अ॑जायत॒ तद॒र्क उ॒त हस्कृ॑तिः|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} तद्विश्व॑मभि॒भूर॑सि॒ यज्जा॒तं यच्च॒ जन्त्व᳚म्||{6/7}{6.6.12.6}{8.89.6}{8.9.9.6}{1190, 709, 7468} |
| आ॒मासु॑ प॒क्वमैर॑य॒ आ सूर्यं᳚ रोहयो दि॒वि|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | बृहती} घ॒र्मं न साम᳚न् तपता सुवृ॒क्तिभि॒र्जुष्टं॒ गिर्व॑णसे बृ॒हत्||{7/7}{6.6.12.7}{8.89.7}{8.9.9.7}{1191, 709, 7469} |
| [79] आनोविश्वास्थिति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसौ नृमेधपुरुमेधाविंद्रः अयुजोबृहत्योयुजःसतोबृहत्यः | |
| आ नो॒ विश्वा᳚सु॒ हव्य॒ इन्द्रः॑ स॒मत्सु॑ भूषतु|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | बृहती} उप॒ ब्रह्मा᳚णि॒ सव॑नानि वृत्र॒हा प॑रम॒ज्या, ऋची᳚षमः||{1/6}{6.6.13.1}{8.90.1}{8.9.10.1}{1192, 710, 7470} |
| त्वं दा॒ता प्र॑थ॒मो राध॑साम॒स्यसि॑ स॒त्य ई᳚शान॒कृत्|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | सतोबृहती} तु॒वि॒द्यु॒म्नस्य॒ युज्या वृ॑णीमहे पु॒त्रस्य॒ शव॑सो म॒हः||{2/6}{6.6.13.2}{8.90.2}{8.9.10.2}{1193, 710, 7471} |
| ब्रह्मा᳚ त इन्द्र गिर्वणः क्रि॒यन्ते॒, अन॑तिद्भुता|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | बृहती} इ॒मा जु॑षस्व हर्यश्व॒ योज॒नेन्द्र॒ या ते॒, अम᳚न्महि||{3/6}{6.6.13.3}{8.90.3}{8.9.10.3}{1194, 710, 7472} |
| त्वं हि स॒त्यो म॑घव॒न्नना᳚नतो वृ॒त्रा भूरि᳚ न्यृ॒ञ्जसे᳚|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | सतोबृहती} स त्वं श॑विष्ठ वज्रहस्त दा॒शुषे॒ऽर्वाञ्चं᳚ र॒यिमा कृ॑धि||{4/6}{6.6.13.4}{8.90.4}{8.9.10.4}{1195, 710, 7473} |
| त्वमि᳚न्द्र य॒शा, अ॑स्यृजी॒षी श॑वसस्पते|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | बृहती} त्वं वृ॒त्राणि॑ हंस्यप्र॒तीन्येक॒ इदनु॑त्ता चर्षणी॒धृता᳚||{5/6}{6.6.13.5}{8.90.5}{8.9.10.5}{1196, 710, 7474} |
| तमु॑ त्वा नू॒नम॑सुर॒ प्रचे᳚तसं॒ राधो᳚ भा॒गमि॑वेमहे|{आङ्गिरसौ नृमधपुरुमेधः | इन्द्रः | सतोबृहती} म॒हीव॒ कृत्तिः॑ शर॒णा त॑ इन्द्र॒ प्र ते᳚ सु॒म्ना नो᳚ अश्नवन्||{6/6}{6.6.13.6}{8.90.6}{8.9.10.6}{1197, 710, 7475} |
| [80] कन्यावारिति सप्तर्चस्य सूक्तस्यात्रेय्यपालेंद्रोनुष्टुबाद्येद्वेपंक्ती | |
| क॒न्या॒३॑(आ॒) वार॑वाय॒ती सोम॒मपि॑ स्रु॒तावि॑दत्|{आत्रेय्यपालः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} अस्तं॒ भर᳚न्त्यब्रवी॒दिन्द्रा᳚य सुनवै त्वा श॒क्राय॑ सुनवै त्वा||{1/7}{6.6.14.1}{8.91.1}{8.9.11.1}{1198, 711, 7476} |
| अ॒सौ य एषि॑ वीर॒को गृ॒हंगृ॑हं वि॒चाक॑शद्|{आत्रेय्यपालः | इन्द्रः | पङ्क्तिः} इ॒मं जम्भ॑सुतं पिब धा॒नाव᳚न्तं कर॒म्भिण॑मपू॒पव᳚न्तमु॒क्थिन᳚म्||{2/7}{6.6.14.2}{8.91.2}{8.9.11.2}{1199, 711, 7477} |
| आ च॒न त्वा᳚ चिकित्सा॒मोऽधि॑ च॒न त्वा॒ नेम॑सि|{आत्रेय्यपालः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} शनै᳚रिव शन॒कैरि॒वेन्द्रा᳚येन्दो॒ परि॑ स्रव||{3/7}{6.6.14.3}{8.91.3}{8.9.11.3}{1200, 711, 7478} |
| कु॒विच्छक॑त्कु॒वित्कर॑त्कु॒विन्नो॒ वस्य॑स॒स्कर॑त्|{आत्रेय्यपालः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} कु॒वित्प॑ति॒द्विषो᳚ य॒तीरिन्द्रे᳚ण सं॒गमा᳚महै||{4/7}{6.6.14.4}{8.91.4}{8.9.11.4}{1201, 711, 7479} |
| इ॒मानि॒ त्रीणि॑ वि॒ष्टपा॒ तानी᳚न्द्र॒ वि रो᳚हय|{आत्रेय्यपालः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} शिर॑स्त॒तस्यो॒र्वरा॒मादि॒दं म॒ उपो॒दरे᳚||{5/7}{6.6.14.5}{8.91.5}{8.9.11.5}{1202, 711, 7480} |
| अ॒सौ च॒ या न॑ उ॒र्वरादि॒मां त॒न्व१॑(अं॒) मम॑|{आत्रेय्यपालः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} अथो᳚ त॒तस्य॒ यच्छिरः॒ सर्वा॒ ता रो᳚म॒शा कृ॑धि||{6/7}{6.6.14.6}{8.91.6}{8.9.11.6}{1203, 711, 7481} |
| खे रथ॑स्य॒ खेऽन॑सः॒ खे यु॒गस्य॑ शतक्रतो|{आत्रेय्यपालः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} अ॒पा॒लामि᳚न्द्र॒ त्रिष्पू॒त्व्यकृ॑णोः॒ सूर्य॑त्वचम्||{7/7}{6.6.14.7}{8.91.7}{8.9.11.7}{1204, 711, 7482} |
| [81] पांतमिति त्रयस्त्रिंशदृचस्य सूक्तस्यांगिरसः श्रुतकक्ष इंद्रोगायत्र्याद्यानुष्टुप् (सुकक्षोवाऋषिः ) | |
| पान्त॒मा वो॒, अन्ध॑स॒ इन्द्र॑म॒भि प्र गा᳚यत|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} वि॒श्वा॒साहं᳚ श॒तक्र॑तुं॒ मंहि॑ष्ठं चर्षणी॒नाम्||{1/33}{6.6.15.1}{8.92.1}{8.9.12.1}{1205, 712, 7483} |
| पु॒रु॒हू॒तं पु॑रुष्टु॒तं गा᳚था॒न्य१॑(अं॒) सन॑श्रुतम्|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्र॒ इति॑ ब्रवीतन||{2/33}{6.6.15.2}{8.92.2}{8.9.12.2}{1206, 712, 7484} |
| इन्द्र॒ इन्नो᳚ म॒हानां᳚ दा॒ता वाजा᳚नां नृ॒तुः|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} म॒हाँ, अ॑भि॒ज्ञ्वा य॑मत्||{3/33}{6.6.15.3}{8.92.3}{8.9.12.3}{1207, 712, 7485} |
| अपा᳚दु शि॒प्र्यन्ध॑सः सु॒दक्ष॑स्य प्रहो॒षिणः॑|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} इन्दो॒रिन्द्रो॒ यवा᳚शिरः||{4/33}{6.6.15.4}{8.92.4}{8.9.12.4}{1208, 712, 7486} |
| तम्व॒भि प्रार्च॒तेन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} तदिद्ध्य॑स्य॒ वर्ध॑नम्||{5/33}{6.6.15.5}{8.92.5}{8.9.12.5}{1209, 712, 7487} |
| अ॒स्य पी॒त्वा मदा᳚नां दे॒वो दे॒वस्यौज॑सा|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} विश्वा॒भि भुव॑ना भुवत्||{6/33}{6.6.16.1}{8.92.6}{8.9.12.6}{1210, 712, 7488} |
| त्यमु॑ वः सत्रा॒साहं॒ विश्वा᳚सु गी॒र्ष्वाय॑तम्|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} आ च्या᳚वयस्यू॒तये᳚||{7/33}{6.6.16.2}{8.92.7}{8.9.12.7}{1211, 712, 7489} |
| यु॒ध्मं सन्त॑मन॒र्वाणं᳚ सोम॒पामन॑पच्युतम्|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} नर॑मवा॒र्यक्र॑तुम्||{8/33}{6.6.16.3}{8.92.8}{8.9.12.8}{1212, 712, 7490} |
| शिक्षा᳚ ण इन्द्र रा॒य आ पु॒रु वि॒द्वाँ ऋ॑चीषम|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} अवा᳚ नः॒ पार्ये॒ धने᳚||{9/33}{6.6.16.4}{8.92.9}{8.9.12.9}{1213, 712, 7491} |
| अत॑श्चिदिन्द्र ण॒ उपा या᳚हि श॒तवा᳚जया|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} इ॒षा स॒हस्र॑वाजया||{10/33}{6.6.16.5}{8.92.10}{8.9.12.10}{1214, 712, 7492} |
| अया᳚म॒ धीव॑तो॒ धियोऽर्व॑द्भिः शक्र गोदरे|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} जये᳚म पृ॒त्सु व॑ज्रिवः||{11/33}{6.6.17.1}{8.92.11}{8.9.12.11}{1215, 712, 7493} |
| व॒यमु॑ त्वा शतक्रतो॒ गावो॒ न यव॑से॒ष्वा|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} उ॒क्थेषु॑ रणयामसि||{12/33}{6.6.17.2}{8.92.12}{8.9.12.12}{1216, 712, 7494} |
| विश्वा॒ हि म॑र्त्यत्व॒नानु॑का॒मा श॑तक्रतो|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} अग᳚न्म वज्रिन्ना॒शसः॑||{13/33}{6.6.17.3}{8.92.13}{8.9.12.13}{1217, 712, 7495} |
| त्वे सु पु॑त्र शव॒सोऽवृ॑त्र॒न् काम॑कातयः|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} न त्वामि॒न्द्राति॑ रिच्यते||{14/33}{6.6.17.4}{8.92.14}{8.9.12.14}{1218, 712, 7496} |
| स नो᳚ वृष॒न् त्सनि॑ष्ठया॒ सं घो॒रया᳚ द्रवि॒त्न्वा|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} धि॒यावि॑ड्ढि॒ पुरं᳚ध्या||{15/33}{6.6.17.5}{8.92.15}{8.9.12.15}{1219, 712, 7497} |
| यस्ते᳚ नू॒नं श॑तक्रत॒विन्द्र॑ द्यु॒म्नित॑मो॒ मदः॑|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} तेन॑ नू॒नं मदे᳚ मदेः||{16/33}{6.6.18.1}{8.92.16}{8.9.12.16}{1220, 712, 7498} |
| यस्ते᳚ चि॒त्रश्र॑वस्तमो॒ य इ᳚न्द्र वृत्र॒हन्त॑मः|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} य ओ᳚जो॒दात॑मो॒ मदः॑||{17/33}{6.6.18.2}{8.92.17}{8.9.12.17}{1221, 712, 7499} |
| वि॒द्मा हि यस्ते᳚ अद्रिव॒स्त्वाद॑त्तः सत्य सोमपाः|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} विश्वा᳚सु दस्म कृ॒ष्टिषु॑||{18/33}{6.6.18.3}{8.92.18}{8.9.12.18}{1222, 712, 7500} |
| इन्द्रा᳚य॒ मद्व॑ने सु॒तं परि॑ ष्टोभन्तु नो॒ गिरः॑|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} अ॒र्कम॑र्चन्तु का॒रवः॑||{19/33}{6.6.18.4}{8.92.19}{8.9.12.19}{1223, 712, 7501} |
| यस्मि॒न् विश्वा॒, अधि॒ श्रियो॒ रण᳚न्ति स॒प्त सं॒सदः॑|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} इन्द्रं᳚ सु॒ते ह॑वामहे||{20/33}{6.6.18.5}{8.92.20}{8.9.12.20}{1224, 712, 7502} |
| त्रिक॑द्रुकेषु॒ चेत॑नं दे॒वासो᳚ य॒ज्ञम॑त्नत|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} तमिद्व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑||{21/33}{6.6.19.1}{8.92.21}{8.9.12.21}{1225, 712, 7503} |
| आ त्वा᳚ विश॒न्त्विन्द॑वः समु॒द्रमि॑व॒ सिन्ध॑वः|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} न त्वामि॒न्द्राति॑ रिच्यते||{22/33}{6.6.19.2}{8.92.22}{8.9.12.22}{1226, 712, 7504} |
| वि॒व्यक्थ॑ महि॒ना वृ॑षन् भ॒क्षं सोम॑स्य जागृवे|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} य इ᳚न्द्र ज॒ठरे᳚षु ते||{23/33}{6.6.19.3}{8.92.23}{8.9.12.23}{1227, 712, 7505} |
| अरं᳚ त इन्द्र कु॒क्षये॒ सोमो᳚ भवतु वृत्रहन्|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} अरं॒ धाम॑भ्य॒ इन्द॑वः||{24/33}{6.6.19.4}{8.92.24}{8.9.12.24}{1228, 712, 7506} |
| अर॒मश्वा᳚य गायति श्रु॒तक॑क्षो॒, अरं॒ गवे᳚|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} अर॒मिन्द्र॑स्य॒ धाम्ने᳚||{25/33}{6.6.19.5}{8.92.25}{8.9.12.25}{1229, 712, 7507} |
| अरं॒ हि ष्म॑ सु॒तेषु॑ णः॒ सोमे᳚ष्विन्द्र॒ भूष॑सि|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} अरं᳚ ते शक्र दा॒वने᳚||{26/33}{6.6.19.6}{8.92.26}{8.9.12.26}{1230, 712, 7508} |
| प॒रा॒कात्ता᳚च्चिदद्रिव॒स्त्वां न॑क्षन्त नो॒ गिरः॑|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} अरं᳚ गमाम ते व॒यम्||{27/33}{6.6.20.1}{8.92.27}{8.9.12.27}{1231, 712, 7509} |
| ए॒वा ह्यसि॑ वीर॒युरे॒वा शूर॑ उ॒त स्थि॒रः|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} ए॒वा ते॒ राध्यं॒ मनः॑||{28/33}{6.6.20.2}{8.92.28}{8.9.12.28}{1232, 712, 7510} |
| ए॒वा रा॒तिस्तु॑वीमघ॒ विश्वे᳚भिर्धायि धा॒तृभिः॑|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} अधा᳚ चिदिन्द्र मे॒ सचा᳚||{29/33}{6.6.20.3}{8.92.29}{8.9.12.29}{1233, 712, 7511} |
| मो षु ब्र॒ह्मेव॑ तन्द्र॒युर्भुवो᳚ वाजानां पते|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} मत्स्वा᳚ सु॒तस्य॒ गोम॑तः||{30/33}{6.6.20.4}{8.92.30}{8.9.12.30}{1234, 712, 7512} |
| मा न॑ इन्द्रा॒भ्या॒३॑(आ॒)दिशः॒ सूरो᳚ अ॒क्तुष्वा य॑मन्|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} त्वा यु॒जा व॑नेम॒ तत्||{31/33}{6.6.20.5}{8.92.31}{8.9.12.31}{1235, 712, 7513} |
| त्वयेदि᳚न्द्र यु॒जा व॒यं प्रति॑ ब्रुवीमहि॒ स्पृधः॑|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} त्वम॒स्माकं॒ तव॑ स्मसि||{32/33}{6.6.20.6}{8.92.32}{8.9.12.32}{1236, 712, 7514} |
| त्वामिद्धि त्वा॒यवो᳚ऽनु॒नोनु॑वत॒श्चरा॑न्|{आङ्गिरसः श्रुतकक्षः | इन्द्रः | गायत्री} सखा᳚य इन्द्र का॒रवः॑||{33/33}{6.6.20.7}{8.92.33}{8.9.12.33}{1237, 712, 7515} |
| [82] उद्घेदभीति चतुस्त्रिंशदृचस्य सूक्तस्यांगिरसः सुकक्ष इंद्रोंत्याया इंद्रर्भवो गायत्री | |
| उद्घेद॒भि श्रु॒ताम॑घं वृष॒भं नर्या᳚पसम्|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} अस्ता᳚रमेषि सूर्य||{1/34}{6.6.21.1}{8.93.1}{8.9.13.1}{1238, 713, 7516} |
| नव॒ यो न॑व॒तिं पुरो᳚ बि॒भेद॑ बा॒ह्वो᳚जसा|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} अहिं᳚ च वृत्र॒हाव॑धीत्||{2/34}{6.6.21.2}{8.93.2}{8.9.13.2}{1239, 713, 7517} |
| स न॒ इन्द्रः॑ शि॒वः सखाश्वा᳚व॒द्गोम॒द्यव॑मत्|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} उ॒रुधा᳚रेव दोहते||{3/34}{6.6.21.3}{8.93.3}{8.9.13.3}{1240, 713, 7518} |
| यद॒द्य कच्च॑ वृत्रहन्नु॒दगा᳚ अ॒भि सू᳚र्य|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} सर्वं॒ तदि᳚न्द्र ते॒ वशे᳚||{4/34}{6.6.21.4}{8.93.4}{8.9.13.4}{1241, 713, 7519} |
| यद्वा᳚ प्रवृद्ध सत्पते॒ न म॑रा॒, इति॒ मन्य॑से|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} उ॒तो तत्स॒त्यमित्तव॑||{5/34}{6.6.21.5}{8.93.5}{8.9.13.5}{1242, 713, 7520} |
| ये सोमा᳚सः परा॒वति॒ ये, अ᳚र्वा॒वति॑ सुन् वि॒रे|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} सर्वाँ॒स्ताँ, इ᳚न्द्र गच्छसि||{6/34}{6.6.22.1}{8.93.6}{8.9.13.6}{1243, 713, 7521} |
| तमिन्द्रं᳚ वाजयामसि म॒हे वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} स वृषा᳚ वृष॒भो भु॑वत्||{7/34}{6.6.22.2}{8.93.7}{8.9.13.7}{1244, 713, 7522} |
| इन्द्रः॒ स दाम॑ने कृ॒त ओजि॑ष्ठः॒ स मदे᳚ हि॒तः|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} द्यु॒म्नी श्लो॒की स सो॒म्यः||{8/34}{6.6.22.3}{8.93.8}{8.9.13.8}{1245, 713, 7523} |
| गि॒रा वज्रो॒ न सम्भृ॑तः॒ सब॑लो॒, अन॑पच्युतः|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} व॒व॒क्ष ऋ॒ष्वो, अस्तृ॑तः||{9/34}{6.6.22.4}{8.93.9}{8.9.13.9}{1246, 713, 7524} |
| दु॒र्गे चि᳚न्नः सु॒गं कृ॑धि गृणा॒न इ᳚न्द्र गिर्वणः|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} त्वं च॑ मघव॒न्वशः॑||{10/34}{6.6.22.5}{8.93.10}{8.9.13.10}{1247, 713, 7525} |
| यस्य॑ ते॒ नू चि॑दा॒दिशं॒ न मि॒नन्ति॑ स्व॒राज्य᳚म्|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} न दे॒वो नाध्रि॑गु॒र्जनः॑||{11/34}{6.6.23.1}{8.93.11}{8.9.13.11}{1248, 713, 7526} |
| अधा᳚ ते॒, अप्र॑तिष्कुतं दे॒वी शुष्मं᳚ सपर्यतः|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} उ॒भे सु॑शिप्र॒ रोद॑सी||{12/34}{6.6.23.2}{8.93.12}{8.9.13.12}{1249, 713, 7527} |
| त्वमे॒तद॑धारयः कृ॒ष्णासु॒ रोहि॑णीषु च|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} परु॑ष्णीषु॒ रुश॒त्पयः॑||{13/34}{6.6.23.3}{8.93.13}{8.9.13.13}{1250, 713, 7528} |
| वि यदहे॒रध॑ त्वि॒षो विश्वे᳚ दे॒वासो॒, अक्र॑मुः|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} वि॒दन् मृ॒गस्य॒ ताँ, अमः॑||{14/34}{6.6.23.4}{8.93.14}{8.9.13.14}{1251, 713, 7529} |
| आदु॑ मे निव॒रो भु॑वद्वृत्र॒हादि॑ष्ट॒ पौंस्य᳚म्|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} अजा᳚तशत्रु॒रस्तृ॑तः||{15/34}{6.6.23.5}{8.93.15}{8.9.13.15}{1252, 713, 7530} |
| श्रु॒तं वो᳚ वृत्र॒हन्त॑मं॒ प्र शर्धं᳚ चर्षणी॒नाम्|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} आ शु॑षे॒ राध॑से म॒हे||{16/34}{6.6.24.1}{8.93.16}{8.9.13.16}{1253, 713, 7531} |
| अ॒या धि॒या च॑ गव्य॒या पुरु॑णाम॒न् पुरु॑ष्टुत|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} यत्सोमे᳚सोम॒ आभ॑वः||{17/34}{6.6.24.2}{8.93.17}{8.9.13.17}{1254, 713, 7532} |
| बो॒धिन्म॑ना॒, इद॑स्तु नो वृत्र॒हा भूर्या᳚सुतिः|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} शृ॒णोतु॑ श॒क्र आ॒शिष᳚म्||{18/34}{6.6.24.3}{8.93.18}{8.9.13.18}{1255, 713, 7533} |
| कया॒ त्वं न॑ ऊ॒त्याभि प्र म᳚न्दसे वृषन्|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} कया᳚ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र||{19/34}{6.6.24.4}{8.93.19}{8.9.13.19}{1256, 713, 7534} |
| कस्य॒ वृषा᳚ सु॒ते सचा᳚ नि॒युत्वा᳚न् वृष॒भो र॑णत्|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} वृ॒त्र॒हा सोम॑पीतये||{20/34}{6.6.24.5}{8.93.20}{8.9.13.20}{1257, 713, 7535} |
| अ॒भी षु ण॒स्त्वं र॒यिं म᳚न्दसा॒नः स॑ह॒स्रिण᳚म्|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} प्र॒य॒न्ता बो᳚धि दा॒शुषे᳚||{21/34}{6.6.25.1}{8.93.21}{8.9.13.21}{1258, 713, 7536} |
| पत्नी᳚वन्तः सु॒ता, इ॒म उ॒शन्तो᳚ यन्ति वी॒तये᳚|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} अ॒पां जग्मि᳚र्निचुम्पु॒णः||{22/34}{6.6.25.2}{8.93.22}{8.9.13.22}{1259, 713, 7537} |
| इ॒ष्टा होत्रा᳚ असृक्ष॒तेन्द्रं᳚ वृ॒धासो᳚ अध्व॒रे|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} अच्छा᳚वभृ॒थमोज॑सा||{23/34}{6.6.25.3}{8.93.23}{8.9.13.23}{1260, 713, 7538} |
| इ॒ह त्या स॑ध॒माद्या॒ हरी॒ हिर᳚ण्यकेश्या|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} वो॒ळ्हाम॒भि प्रयो᳚ हि॒तम्||{24/34}{6.6.25.4}{8.93.24}{8.9.13.24}{1261, 713, 7539} |
| तुभ्यं॒ सोमाः᳚ सु॒ता, इ॒मे स्ती॒र्णं ब॒र्हिर्वि॑भावसो|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} स्तो॒तृभ्य॒ इन्द्र॒मा व॑ह||{25/34}{6.6.25.5}{8.93.25}{8.9.13.25}{1262, 713, 7540} |
| आ ते॒ दक्षं॒ वि रो᳚च॒ना दध॒द्रत्ना॒ वि दा॒शुषे᳚|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} स्तो॒तृभ्य॒ इन्द्र॑मर्चत||{26/34}{6.6.26.1}{8.93.26}{8.9.13.26}{1263, 713, 7541} |
| आ ते᳚ दधामीन्द्रि॒यमु॒क्था विश्वा᳚ शतक्रतो|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} स्तो॒तृभ्य॑ इन्द्र मृळय||{27/34}{6.6.26.2}{8.93.27}{8.9.13.27}{1264, 713, 7542} |
| भ॒द्रम्भ॑द्रं न॒ आ भ॒रेष॒मूर्जं᳚ शतक्रतो|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} यदि᳚न्द्र मृ॒ळया᳚सि नः||{28/34}{6.6.26.3}{8.93.28}{8.9.13.28}{1265, 713, 7543} |
| स नो॒ विश्वा॒न्या भ॑र सुवि॒तानि॑ शतक्रतो|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} यदि᳚न्द्र मृ॒ळया᳚सि नः||{29/34}{6.6.26.4}{8.93.29}{8.9.13.29}{1266, 713, 7544} |
| त्वामिद्वृ॑त्रहन्तम सु॒ताव᳚न्तो हवामहे|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} यदि᳚न्द्र मृ॒ळया᳚सि नः||{30/34}{6.6.26.5}{8.93.30}{8.9.13.30}{1267, 713, 7545} |
| उप॑ नो॒ हरि॑भिः सु॒तं या॒हि म॑दानां पते|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} उप॑ नो॒ हरि॑भिः सु॒तम्||{31/34}{6.6.27.1}{8.93.31}{8.9.13.31}{1268, 713, 7546} |
| द्वि॒ता यो वृ॑त्र॒हन्त॑मो वि॒द इन्द्रः॑ श॒तक्र॑तुः|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} उप॑ नो॒ हरि॑भिः सु॒तम्||{32/34}{6.6.27.2}{8.93.32}{8.9.13.32}{1269, 713, 7547} |
| त्वं हि वृ॑त्रहन्नेषां पा॒ता सोमा᳚ना॒मसि॑|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्रः | गायत्री} उप॑ नो॒ हरि॑भिः सु॒तम्||{33/34}{6.6.27.3}{8.93.33}{8.9.13.33}{1270, 713, 7548} |
| इन्द्र॑ इ॒षे द॑दातु न ऋभु॒क्षण॑मृ॒भुं र॒यिम्|{आङ्गिरसः सुकक्ष | इन्द्र ऋभवश्च | गायत्री} वा॒जी द॑दातु वा॒जिन᳚म्||{34/34}{6.6.27.4}{8.93.34}{8.9.13.34}{1271, 713, 7549} |
| [83] गौर्धयतीति द्वादशर्चस्य सूक्तस्यांगिरसोबिंदुर्मरुतोगायत्री (पूतदक्षोवाऋषिः) | |
| गौर्ध॑यति म॒रुतां᳚ श्रव॒स्युर्मा॒ता म॒घोना᳚म्|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} यु॒क्ता वह्नी॒ रथा᳚नाम्||{1/12}{6.6.28.1}{8.94.1}{8.10.1.1}{1272, 714, 7550} |
| यस्या᳚ दे॒वा, उ॒पस्थे᳚ व्र॒ता विश्वे᳚ धा॒रय᳚न्ते|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} सूर्या॒मासा᳚ दृ॒शे कम्||{2/12}{6.6.28.2}{8.94.2}{8.10.1.2}{1273, 714, 7551} |
| तत्सु नो॒ विश्वे᳚ अ॒र्य आ सदा᳚ गृणन्ति का॒रवः॑|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} म॒रुतः॒ सोम॑पीतये||{3/12}{6.6.28.3}{8.94.3}{8.10.1.3}{1274, 714, 7552} |
| अस्ति॒ सोमो᳚ अ॒यं सु॒तः पिब᳚न्त्यस्य म॒रुतः॑|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} उ॒त स्व॒राजो᳚ अ॒श्विना᳚||{4/12}{6.6.28.4}{8.94.4}{8.10.1.4}{1275, 714, 7553} |
| पिब᳚न्ति मि॒त्रो, अ᳚र्य॒मा तना᳚ पू॒तस्य॒ वरु॑णः|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} त्रि॒ष॒ध॒स्थस्य॒ जाव॑तः||{5/12}{6.6.28.5}{8.94.5}{8.10.1.5}{1276, 714, 7554} |
| उ॒तो न्व॑स्य॒ जोष॒माँ, इन्द्रः॑ सु॒तस्य॒ गोम॑तः|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} प्रा॒तर्होते᳚व मत्सति||{6/12}{6.6.28.6}{8.94.6}{8.10.1.6}{1277, 714, 7555} |
| कद॑त्विषन्त सू॒रय॑स्ति॒र आप॑ इव॒ स्रिधः॑|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} अर्ष᳚न्ति पू॒तद॑क्षसः||{7/12}{6.6.29.1}{8.94.7}{8.10.1.7}{1278, 714, 7556} |
| कद्वो᳚ अ॒द्य म॒हानां᳚ दे॒वाना॒मवो᳚ वृणे|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} त्मना᳚ च द॒स्मव॑र्चसाम्||{8/12}{6.6.29.2}{8.94.8}{8.10.1.8}{1279, 714, 7557} |
| आ ये विश्वा॒ पार्थि॑वानि प॒प्रथ᳚न्रोच॒ना दि॒वः|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} म॒रुतः॒ सोम॑पीतये||{9/12}{6.6.29.3}{8.94.9}{8.10.1.9}{1280, 714, 7558} |
| त्यान्नु पू॒तद॑क्षसो दि॒वो वो᳚ मरुतो हुवे|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये᳚||{10/12}{6.6.29.4}{8.94.10}{8.10.1.10}{1281, 714, 7559} |
| त्यान्नु ये वि रोद॑सी तस्त॒भुर्म॒रुतो᳚ हुवे|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये᳚||{11/12}{6.6.29.5}{8.94.11}{8.10.1.11}{1282, 714, 7560} |
| त्यं नु मारु॑तं ग॒णं गि॑रि॒ष्ठां वृष॑णं हुवे|{आङ्गिरसो बिन्दुः | मरुतः | गायत्री} अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये᳚||{12/12}{6.6.29.6}{8.94.12}{8.10.1.12}{1283, 714, 7561} |
| [84] आत्वागिरइति नवर्चस्य सूक्तस्याङ्गिरसस्तिरश्चीरिंद्रोनुष्टुप् | |
| आ त्वा॒ गिरो᳚ र॒थीरि॒वास्थुः॑ सु॒तेषु॑ गिर्वणः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} अ॒भि त्वा॒ सम॑नूष॒तेन्द्र॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑||{1/9}{6.6.30.1}{8.95.1}{8.10.2.1}{1284, 715, 7562} |
| आ त्वा᳚ शु॒क्रा, अ॑चुच्यवुः सु॒तास॑ इन्द्र गिर्वणः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} पिबा॒ त्व१॑(अ॒)स्यान्ध॑स॒ इन्द्र॒ विश्वा᳚सु ते हि॒तम्||{2/9}{6.6.30.2}{8.95.2}{8.10.2.2}{1285, 715, 7563} |
| पिबा॒ सोमं॒ मदा᳚य॒ कमिन्द्र॑ श्ये॒नाभृ॑तं सु॒तम्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} त्वं हि शश्व॑तीनां॒ पती॒ राजा᳚ वि॒शामसि॑||{3/9}{6.6.30.3}{8.95.3}{8.10.2.3}{1286, 715, 7564} |
| श्रु॒धी हवं᳚ तिर॒श्च्या, इन्द्र॒ यस्त्वा᳚ सप॒र्यति॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} सु॒वीर्य॑स्य॒ गोम॑तो रा॒यस्पू᳚र्धि म॒हाँ, अ॑सि||{4/9}{6.6.30.4}{8.95.4}{8.10.2.4}{1287, 715, 7565} |
| इन्द्र॒ यस्ते॒ नवी᳚यसीं॒ गिरं᳚ म॒न्द्रामजी᳚जनत्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} चि॒कि॒त्विन्म॑नसं॒ धियं᳚ प्र॒त्नामृ॒तस्य॑ पि॒प्युषी᳚म्||{5/9}{6.6.30.5}{8.95.5}{8.10.2.5}{1288, 715, 7566} |
| तमु॑ ष्टवाम॒ यं गिर॒ इन्द्र॑मु॒क्थानि॑ वावृ॒धुः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} पु॒रूण्य॑स्य॒ पौंस्या॒ सिषा᳚सन्तो वनामहे||{6/9}{6.6.31.1}{8.95.6}{8.10.2.6}{1289, 715, 7567} |
| एतो॒ न् विन्द्रं॒ स्तवा᳚म शु॒द्धं शु॒द्धेन॒ साम्ना᳚|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} शु॒द्धैरु॒क्थैर्वा᳚वृ॒ध्वांसं᳚ शु॒द्ध आ॒शीर्वा᳚न्ममत्तु||{7/9}{6.6.31.2}{8.95.7}{8.10.2.7}{1290, 715, 7568} |
| इन्द्र॑ शु॒द्धो न॒ आ ग॑हि शु॒द्धः शु॒द्धाभि॑रू॒तिभिः॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} शु॒द्धो र॒यिं नि धा᳚रय शु॒द्धो म॑मद्धि सो॒म्यः||{8/9}{6.6.31.3}{8.95.8}{8.10.2.8}{1291, 715, 7569} |
| इन्द्र॑ शु॒द्धो हि नो᳚ र॒यिं शु॒द्धो रत्ना᳚नि दा॒शुषे᳚|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} शु॒द्धो वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे शु॒द्धो वाजं᳚ सिषाससि||{9/9}{6.6.31.4}{8.95.9}{8.10.2.9}{1292, 715, 7570} |
| [85] अस्माइत्येकविंशत्यृचस्य सूक्तस्याङ्गिरसस्तिरश्चीरिंद्रश्चतुर्दश्याइंद्रामरुतः पंचदश्याइंद्राबृहस्पतीत्रिष्टुप् चतुर्थीविराट् (द्युतानोवाऋषिः) | |
| अ॒स्मा, उ॒षास॒ आति॑रन्त॒ याम॒मिन्द्रा᳚य॒ नक्त॒मूर्म्याः᳚ सु॒वाचः॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} अ॒स्मा, आपो᳚ मा॒तरः॑ स॒प्त त॑स्थु॒र्नृभ्य॒स्तरा᳚य॒ सिन्ध॑वः सुपा॒राः||{1/21}{6.6.32.1}{8.96.1}{8.10.3.1}{1293, 716, 7571} |
| अति॑विद्धा विथु॒रेणा᳚ चि॒दस्त्रा॒ त्रिः स॒प्त सानु॒ संहि॑ता गिरी॒णाम्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} न तद्दे॒वो न मर्त्य॑स्तुतुर्या॒द्यानि॒ प्रवृ॑द्धो वृष॒भश्च॒कार॑||{2/21}{6.6.32.2}{8.96.2}{8.10.3.2}{1294, 716, 7572} |
| इन्द्र॑स्य॒ वज्र॑ आय॒सो निमि॑श्ल॒ इन्द्र॑स्य बा॒ह्वोर्भूयि॑ष्ठ॒मोजः॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} शी॒र्षन्निन्द्र॑स्य॒ क्रत॑वो निरे॒क आ॒सन्नेष᳚न्त॒ श्रुत्या᳚ उपा॒के||{3/21}{6.6.32.3}{8.96.3}{8.10.3.3}{1295, 716, 7573} |
| मन्ये᳚ त्वा य॒ज्ञियं᳚ य॒ज्ञिया᳚नां॒ मन्ये᳚ त्वा॒ च्यव॑न॒मच्यु॑तानाम्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | विराट्} मन्ये᳚ त्वा॒ सत्व॑नामिन्द्र के॒तुं मन्ये᳚ त्वा वृष॒भं च॑र्षणी॒नाम्||{4/21}{6.6.32.4}{8.96.4}{8.10.3.4}{1296, 716, 7574} |
| आ यद्वज्रं᳚ बा॒ह्वोरि᳚न्द्र॒ धत्से᳚ मद॒च्युत॒मह॑ये॒ हन्त॒वा, उ॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} प्र पर्व॑ता॒, अन॑वन्त॒ प्र गावः॒ प्र ब्र॒ह्माणो᳚ अभि॒नक्ष᳚न्त॒ इन्द्र᳚म्||{5/21}{6.6.32.5}{8.96.5}{8.10.3.5}{1297, 716, 7575} |
| तमु॑ ष्टवाम॒ य इ॒मा ज॒जान॒ विश्वा᳚ जा॒तान्यव॑राण्यस्मात्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} इन्द्रे᳚ण मि॒त्रं दि॑धिषेम गी॒र्भिरुपो॒ नमो᳚भिर्वृष॒भं वि॑शेम||{6/21}{6.6.33.1}{8.96.6}{8.10.3.6}{1298, 716, 7576} |
| वृ॒त्रस्य॑ त्वा श्व॒सथा॒दीष॑माणा॒ विश्वे᳚ दे॒वा, अ॑जहु॒र्ये सखा᳚यः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} म॒रुद्भि॑रिन्द्र स॒ख्यं ते᳚ अ॒स्त्वथे॒मा विश्वाः॒ पृत॑ना जयासि||{7/21}{6.6.33.2}{8.96.7}{8.10.3.7}{1299, 716, 7577} |
| त्रिः ष॒ष्टिस्त्वा᳚ म॒रुतो᳚ वावृधा॒ना, उ॒स्रा, इ॑व रा॒शयो᳚ य॒ज्ञिया᳚सः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} उप॒ त्वेमः॑ कृ॒धि नो᳚ भाग॒धेयं॒ शुष्मं᳚ त ए॒ना ह॒विषा᳚ विधेम||{8/21}{6.6.33.3}{8.96.8}{8.10.3.8}{1300, 716, 7578} |
| ति॒ग्ममायु॑धं म॒रुता॒मनी᳚कं॒ कस्त॑ इन्द्र॒ प्रति॒ वज्रं᳚ दधर्ष|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} अ॒ना॒यु॒धासो॒, असु॑रा, अदे॒वाश्च॒क्रेण॒ ताँ, अप॑ वप ऋजीषिन्||{9/21}{6.6.33.4}{8.96.9}{8.10.3.9}{1301, 716, 7579} |
| म॒ह उ॒ग्राय॑ त॒वसे᳚ सुवृ॒क्तिं प्रेर॑य शि॒वत॑माय प॒श्वः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} गिर्वा᳚हसे॒ गिर॒ इन्द्रा᳚य पू॒र्वीर्धे॒हि त॒न्वे᳚ कु॒विद॒ङ्ग वेद॑त्||{10/21}{6.6.33.5}{8.96.10}{8.10.3.10}{1302, 716, 7580} |
| उ॒क्थवा᳚हसे वि॒भ्वे᳚ मनी॒षां द्रुणा॒ न पा॒रमी᳚रया न॒दीना᳚म्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} नि स्पृ॑श धि॒या त॒न् वि॑ श्रु॒तस्य॒ जुष्ट॑तरस्य कु॒विद॒ङ्ग वेद॑त्||{11/21}{6.6.34.1}{8.96.11}{8.10.3.11}{1303, 716, 7581} |
| तद्वि॑विड्ढि॒ यत्त॒ इन्द्रो॒ जुजो᳚षत् स्तु॒हि सु॑ष्टु॒तिं नम॒सा वि॑वास|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} उप॑ भूष जरित॒र्मा रु॑वण्यः श्रा॒वया॒ वाचं᳚ कु॒विद॒ङ्ग वेद॑त्||{12/21}{6.6.34.2}{8.96.12}{8.10.3.12}{1304, 716, 7582} |
| अव॑ द्र॒प्सो, अं᳚शु॒मती᳚मतिष्ठदिया॒नः कृ॒ष्णो द॒शभिः॑ स॒हस्रैः᳚|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} आव॒त्तमिन्द्रः॒ शच्या॒ धम᳚न्त॒मप॒ स्नेहि॑तीर्नृ॒मणा᳚ अधत्त||{13/21}{6.6.34.3}{8.96.13}{8.10.3.13}{1305, 716, 7583} |
| द्र॒प्सम॑पश्यं॒ विषु॑णे॒ चर᳚न्तमुपह्व॒रे न॒द्यो᳚ अंशु॒मत्याः᳚|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः, मरुतः | त्रिष्टुप्} नभो॒ न कृ॒ष्णम॑वतस्थि॒वांस॒मिष्या᳚मि वो वृषणो॒ युध्य॑ता॒जौ||{14/21}{6.6.34.4}{8.96.14}{8.10.3.14}{1306, 716, 7584} |
| अध॑ द्र॒प्सो, अं᳚शु॒मत्या᳚ उ॒पस्थेऽधा᳚रयत्त॒न्वं᳚ तित्विषा॒णः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इंद्राबृहस्पती | त्रिष्टुप्} विशो॒, अदे᳚वीर॒भ्या॒३॑(आ॒)चर᳚न्ती॒र्बृह॒स्पति॑ना यु॒जेन्द्रः॑ ससाहे||{15/21}{6.6.34.5}{8.96.15}{8.10.3.15}{1307, 716, 7585} |
| त्वं ह॒ त्यत्स॒प्तभ्यो॒ जाय॑मानोऽश॒त्रुभ्यो᳚ अभवः॒ शत्रु॑रिन्द्र|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} गू॒ळ्हे द्यावा᳚पृथि॒वी, अन्व॑विन्दो विभु॒मद्भ्यो॒ भुव॑नेभ्यो॒ रणं᳚ धाः||{16/21}{6.6.35.1}{8.96.16}{8.10.3.16}{1308, 716, 7586} |
| त्वं ह॒ त्यद॑प्रतिमा॒नमोजो॒ वज्रे᳚ण वज्रिन्धृषि॒तो ज॑घन्थ|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} त्वं शुष्ण॒स्यावा᳚तिरो॒ वध॑त्रै॒स्त्वं गा, इ᳚न्द्र॒ शच्येद॑विन्दः||{17/21}{6.6.35.2}{8.96.17}{8.10.3.17}{1309, 716, 7587} |
| त्वं ह॒ त्यद्वृ॑षभ चर्षणी॒नां घ॒नो वृ॒त्राणां᳚ तवि॒षो ब॑भूथ|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} त्वं सिन्धूँ᳚रसृजस्तस्तभा॒नान्त्वम॒पो, अ॑जयो दा॒सप॑त्नीः||{18/21}{6.6.35.3}{8.96.18}{8.10.3.18}{1310, 716, 7588} |
| स सु॒क्रतू॒ रणि॑ता॒ यः सु॒तेष्वनु॑त्तमन्यु॒र्यो, अहे᳚व रे॒वान्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} य एक॒ इन्नर्यपां᳚सि॒ कर्ता॒ स वृ॑त्र॒हा प्रतीद॒न्यमा᳚हुः||{19/21}{6.6.35.4}{8.96.19}{8.10.3.19}{1311, 716, 7589} |
| स वृ॑त्र॒हेन्द्र॑श्चर्षणी॒धृत्तं सु॑ष्टु॒त्या हव्यं᳚ हुवेम|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} स प्रा᳚वि॒ता म॒घवा᳚ नोऽधिव॒क्ता स वाज॑स्य श्रव॒स्य॑स्य दा॒ता||{20/21}{6.6.35.5}{8.96.20}{8.10.3.20}{1312, 716, 7590} |
| स वृ॑त्र॒हेन्द्र॑ ऋभु॒क्षाः स॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो हव्यो᳚ बभूव|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} कृ॒ण्वन्नपां᳚सि॒ नर्या᳚ पु॒रूणि॒ सोमो॒ न पी॒तो हव्यः॒ सखि॑भ्यः||{21/21}{6.6.35.6}{8.96.21}{8.10.3.21}{1313, 716, 7591} |
| [86] याइंद्रेति पंचदशर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोरेभइंद्रो बृहती दशम्याद्याः क्रमेणातिजगत्युपरिष्टाद्बृहत्योजगतीत्रिष्टुप्जगत्यः | |
| या, इ᳚न्द्र॒ भुज॒ आभ॑रः॒ स्व᳚र्वाँ॒, असु॑रेभ्यः|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | बृहती} स्तो॒तार॒मिन्म॑घवन्नस्य वर्धय॒ ये च॒ त्वे वृ॒क्तब᳚र्हिषः||{1/15}{6.6.36.1}{8.97.1}{8.10.4.1}{1314, 717, 7592} |
| यमि᳚न्द्र दधि॒षे त्वमश्वं॒ गां भा॒गमव्य॑यम्|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | बृहती} यज॑माने सुन्व॒ति दक्षि॑णावति॒ तस्मि॒न्तं धे᳚हि॒ मा प॒णौ||{2/15}{6.6.36.2}{8.97.2}{8.10.4.2}{1315, 717, 7593} |
| य इ᳚न्द्र॒ सस्त्य᳚व्र॒तो᳚ऽनु॒ष्वाप॒मदे᳚वयुः|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | बृहती} स्वैः ष एवै᳚र्मुमुर॒त्पोष्यं᳚ र॒यिं स॑नु॒तर्धे᳚हि॒ तं ततः॑||{3/15}{6.6.36.3}{8.97.3}{8.10.4.3}{1316, 717, 7594} |
| यच्छ॒क्रासि॑ परा॒वति॒ यद᳚र्वा॒वति॑ वृत्रहन्|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | बृहती} अत॑स्त्वा गी॒र्भिर्द्यु॒गदि᳚न्द्र के॒शिभिः॑ सु॒तावाँ॒, आ वि॑वासति||{4/15}{6.6.36.4}{8.97.4}{8.10.4.4}{1317, 717, 7595} |
| यद्वासि॑ रोच॒ने दि॒वः स॑मु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टपि॑|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | बृहती} यत्पार्थि॑वे॒ सद॑ने वृत्रहन्तम॒ यद॒न्तरि॑क्ष॒ आ ग॑हि||{5/15}{6.6.36.5}{8.97.5}{8.10.4.5}{1318, 717, 7596} |
| स नः॒ सोमे᳚षु सोमपाः सु॒तेषु॑ शवसस्पते|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | बृहती} मा॒दय॑स्व॒ राध॑सा सू॒नृता᳚व॒तेन्द्र॑ रा॒या परी᳚णसा||{6/15}{6.6.37.1}{8.97.6}{8.10.4.6}{1319, 717, 7597} |
| मा न॑ इन्द्र॒ परा᳚ वृण॒ग्भवा᳚ नः सध॒माद्यः॑|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} त्वं न॑ ऊ॒ती त्वमिन्न॒ आप्यं॒ मा न॑ इन्द्र॒ परा᳚ वृणक्||{7/15}{6.6.37.2}{8.97.7}{8.10.4.7}{1320, 717, 7598} |
| अ॒स्मे, इ᳚न्द्र॒ सचा᳚ सु॒ते नि ष॑दा पी॒तये॒ मधु॑|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | बृहती} कृ॒धी ज॑रि॒त्रे म॑घव॒न्नवो᳚ म॒हद॒स्मे, इ᳚न्द्र॒ सचा᳚ सु॒ते||{8/15}{6.6.37.3}{8.97.8}{8.10.4.8}{1321, 717, 7599} |
| न त्वा᳚ दे॒वास॑ आशत॒ न मर्त्या᳚सो, अद्रिवः|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | बृहती} विश्वा᳚ जा॒तानि॒ शव॑साभि॒भूर॑सि॒ न त्वा᳚ दे॒वास॑ आशत||{9/15}{6.6.37.4}{8.97.9}{8.10.4.9}{1322, 717, 7600} |
| विश्वाः॒ पृत॑ना, अभि॒भूत॑रं॒ नरं᳚ स॒जूस्त॑तक्षु॒रिन्द्रं᳚ जज॒नुश्च॑ रा॒जसे᳚|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | जगती} क्रत्वा॒ वरि॑ष्ठं॒ वर॑ आ॒मुरि॑मु॒तोग्रमोजि॑ष्ठं त॒वसं᳚ तर॒स्विन᳚म्||{10/15}{6.6.37.5}{8.97.10}{8.10.4.10}{1323, 717, 7601} |
| समीं᳚ रे॒भासो᳚ अस्वर॒न्निन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | उपरिष्टाद्बृहती} स्व॑र्पतिं॒ यदीं᳚ वृ॒धे धृ॒तव्र॑तो॒ ह्योज॑सा॒ समू॒तिभिः॑||{11/15}{6.6.38.1}{8.97.11}{8.10.4.11}{1324, 717, 7602} |
| ने॒मिं न॑मन्ति॒ चक्ष॑सा मे॒षं विप्रा᳚ अभि॒स्वरा᳚|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | उपरिष्टाद्बृहती} सु॒दी॒तयो᳚ वो, अ॒द्रुहोऽपि॒ कर्णे᳚ तर॒स्विनः॒ समृक्व॑भिः||{12/15}{6.6.38.2}{8.97.12}{8.10.4.12}{1325, 717, 7603} |
| तमिन्द्रं᳚ जोहवीमि म॒घवा᳚नमु॒ग्रं स॒त्रा दधा᳚न॒मप्र॑तिष्कुतं॒ शवां᳚सि|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | जगती} मंहि॑ष्ठो गी॒र्भिरा च॑ य॒ज्ञियो᳚ व॒वर्त॑द्रा॒ये नो॒ विश्वा᳚ सु॒पथा᳚ कृणोतु व॒ज्री||{13/15}{6.6.38.3}{8.97.13}{8.10.4.13}{1326, 717, 7604} |
| त्वं पुर॑ इन्द्र चि॒किदे᳚ना॒ व्योज॑सा शविष्ठ शक्र नाश॒यध्यै᳚|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} त्वद्विश्वा᳚नि॒ भुव॑नानि वज्रि॒न्द्यावा᳚ रेजेते पृथि॒वी च॑ भी॒षा||{14/15}{6.6.38.4}{8.97.14}{8.10.4.14}{1327, 717, 7605} |
| तन्म॑ ऋ॒तमि᳚न्द्र शूर चित्र पात्व॒पो न व॑ज्रिन्दुरि॒ताति॑ पर्षि॒ भूरि॑|{काश्यपो रेभः | इन्द्रः | जगती} क॒दा न॑ इन्द्र रा॒य आ द॑शस्येर्वि॒श्वप्स्न्य॑स्य स्पृह॒याय्य॑स्य राजन्||{15/15}{6.6.38.5}{8.97.15}{8.10.4.15}{1328, 717, 7606} |
| [87] इंद्रायसामेति द्वादशर्चस्यसूक्तस्यांगिरसोनृमेधइंद्र उष्णिक् सप्तमीदशम्येकादश्यः ककुभो नवम्यंत्येपुरउष्णिहौ | |
| इन्द्रा᳚य॒ साम॑ गायत॒ विप्रा᳚य बृह॒ते बृ॒हत्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | उष्णिक्} ध॒र्म॒कृते᳚ विप॒श्चिते᳚ पन॒स्यवे᳚||{1/12}{6.7.1.1}{8.98.1}{8.10.5.1}{1329, 718, 7607} |
| त्वमि᳚न्द्राभि॒भूर॑सि॒ त्वं सूर्य॑मरोचयः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | उष्णिक्} वि॒श्वक᳚र्मा वि॒श्वदे᳚वो म॒हाँ, अ॑सि||{2/12}{6.7.1.2}{8.98.2}{8.10.5.2}{1330, 718, 7608} |
| वि॒भ्राज॒ञ्ज्योति॑षा॒ स्व१॑(अ॒)रग॑च्छो रोच॒नं दि॒वः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | उष्निक्} दे॒वास्त॑ इन्द्र स॒ख्याय॑ येमिरे||{3/12}{6.7.1.3}{8.98.3}{8.10.5.3}{1331, 718, 7609} |
| एन्द्र॑ नो गधि प्रि॒यः स॑त्रा॒जिदगो᳚ह्यः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | उष्णिक्} गि॒रिर्न वि॒श्वत॑स्पृ॒थुः पति॑र्दि॒वः||{4/12}{6.7.1.4}{8.98.4}{8.10.5.4}{1332, 718, 7610} |
| अ॒भि हि स॑त्य सोमपा, उ॒भे ब॒भूथ॒ रोद॑सी|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | उष्णिक्} इन्द्रासि॑ सुन्व॒तो वृ॒धः पति॑र्दि॒वः||{5/12}{6.7.1.5}{8.98.5}{8.10.5.5}{1333, 718, 7611} |
| त्वं हि शश्व॑तीना॒मिन्द्र॑ द॒र्ता पु॒रामसि॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | उष्णिक्} ह॒न्ता दस्यो॒र्मनो᳚र्वृ॒धः पति॑र्दि॒वः||{6/12}{6.7.1.6}{8.98.6}{8.10.5.6}{1334, 718, 7612} |
| अधा॒ ही᳚न्द्र गिर्वण॒ उप॑ त्वा॒ कामा᳚न्म॒हः स॑सृ॒ज्महे᳚|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | ककुभः} उ॒देव॒ यन्त॑ उ॒दभिः॑||{7/12}{6.7.2.1}{8.98.7}{8.10.5.7}{1335, 718, 7613} |
| वार्ण त्वा᳚ य॒व्याभि॒र्वर्ध᳚न्ति शूर॒ ब्रह्मा᳚णि|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | उष्निक्} वा॒वृ॒ध्वांसं᳚ चिदद्रिवो दि॒वेदि॑वे||{8/12}{6.7.2.2}{8.98.8}{8.10.5.8}{1336, 718, 7614} |
| यु॒ञ्जन्ति॒ हरी᳚ इषि॒रस्य॒ गाथ॑यो॒रौ रथ॑ उ॒रुयु॑गे|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | पुर उष्णिक्} इ॒न्द्र॒वाहा᳚ वचो॒युजा᳚||{9/12}{6.7.2.3}{8.98.9}{8.10.5.9}{1337, 718, 7615} |
| त्वं न॑ इ॒न्द्रा भ॑रँ॒, ओजो᳚ नृ॒म्णं श॑तक्रतो विचर्षणे|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | ककुभः} आ वी॒रं पृ॑तना॒षह᳚म्||{10/12}{6.7.2.4}{8.98.10}{8.10.5.10}{1338, 718, 7616} |
| त्वं हि नः॑ पि॒ता व॑सो॒ त्वं मा॒ता श॑तक्रतो ब॒भूवि॑थ|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | ककुभः} अधा᳚ ते सु॒म्नमी᳚महे||{11/12}{6.7.2.5}{8.98.11}{8.10.5.11}{1339, 718, 7617} |
| त्वां शु॑ष्मिन् पुरुहूत वाज॒यन्त॒मुप॑ ब्रुवे शतक्रतो|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | पुर उष्निक्} स नो᳚ रास्व सु॒वीर्य᳚म्||{12/12}{6.7.2.6}{8.98.12}{8.10.5.12}{1340, 718, 7618} |
| [88] त्वामिदेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्यांगिरसोनृमेधइंद्रः अयुजोबृहत्योयुजः सतोबृहत्यः | |
| त्वामि॒दा ह्यो नरोऽपी᳚प्यन्वज्रि॒न् भूर्ण॑यः|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | बृहती} स इ᳚न्द्र॒ स्तोम॑वाहसामि॒ह श्रु॒ध्युप॒ स्वस॑र॒मा ग॑हि||{1/8}{6.7.3.1}{8.99.1}{8.10.6.1}{1341, 719, 7619} |
| मत्स्वा᳚ सुशिप्र हरिव॒स्तदी᳚महे॒ त्वे, आ भू᳚षन्ति वे॒धसः॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | सतोबृहती} तव॒ श्रवां᳚स्युप॒मान्यु॒क्थ्या᳚ सु॒तेष्वि᳚न्द्र गिर्वणः||{2/8}{6.7.3.2}{8.99.2}{8.10.6.2}{1342, 719, 7620} |
| श्राय᳚न्त इव॒ सूर्यं॒ विश्वेदिन्द्र॑स्य भक्षत|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | बृहती} वसू᳚नि जा॒ते जन॑मान॒ ओज॑सा॒ प्रति॑ भा॒गं न दी᳚धिम||{3/8}{6.7.3.3}{8.99.3}{8.10.6.3}{1343, 719, 7621} |
| अन॑र्शरातिं वसु॒दामुप॑ स्तुहि भ॒द्रा, इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | सतोबृहती} सो, अ॑स्य॒ कामं᳚ विध॒तो न रो᳚षति॒ मनो᳚ दा॒नाय॑ चो॒दय॑न्||{4/8}{6.7.3.4}{8.99.4}{8.10.6.4}{1344, 719, 7622} |
| त्वमि᳚न्द्र॒ प्रतू᳚र्तिष्व॒भि विश्वा᳚ असि॒ स्पृधः॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | बृहती} अ॒श॒स्ति॒हा ज॑नि॒ता वि॑श्व॒तूर॑सि॒ त्वं तू᳚र्य तरुष्य॒तः||{5/8}{6.7.3.5}{8.99.5}{8.10.6.5}{1345, 719, 7623} |
| अनु॑ ते॒ शुष्मं᳚ तु॒रय᳚न्तमीयतुः, क्षो॒णी शिशुं॒ न मा॒तरा᳚|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | सतोबृहती} विश्वा᳚स्ते॒ स्पृधः॑ श्नथयन्त म॒न्यवे᳚ वृ॒त्रं यदि᳚न्द्र॒ तूर्व॑सि||{6/8}{6.7.3.6}{8.99.6}{8.10.6.6}{1346, 719, 7624} |
| इ॒त ऊ॒ती वो᳚ अ॒जरं᳚ प्रहे॒तार॒मप्र॑हितम्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | बृहती} आ॒शुं जेता᳚रं॒ हेता᳚रं र॒थीत॑म॒मतू᳚र्तं तुग्र्या॒वृध᳚म्||{7/8}{6.7.3.7}{8.99.7}{8.10.6.7}{1347, 719, 7625} |
| इ॒ष्क॒र्तार॒मनि॑ष्कृतं॒ सह॑स्कृतं श॒तमू᳚तिं श॒तक्र॑तुम्|{आङ्गिरसो नृमेधः | इन्द्रः | सतोबृहती} स॒मा॒नमिन्द्र॒मव॑से हवामहे॒ वस॑वानं वसू॒जुव᳚म्||{8/8}{6.7.3.8}{8.99.8}{8.10.6.8}{1348, 719, 7626} |
| [89] अयंतइति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य भार्गवोनेमऋषिः अयंतइतिद्वयोरिंद्रऋषिः इंद्रोदेवतामनोजवाइत्यस्याः सुपर्णोदेवता समुद्रेइत्यस्यावज्रं यद्वाग्वदंती तिद्वयोर्वाग्देवतात्रिष्टुप् षष्ठीजगती सप्तम्याद्यास्तिस्रोनुष्टुभः | |
| अ॒यं त॑ एमि त॒न्वा᳚ पु॒रस्ता॒द्विश्वे᳚ दे॒वा, अ॒भि मा᳚ यन्ति प॒श्चात्|{भार्गवो नेमः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} य॒दा मह्यं॒ दीध॑रो भा॒गमि॒न्द्रादिन्मया᳚ कृणवो वी॒र्या᳚णि||{1/12}{6.7.4.1}{8.100.1}{8.10.7.1}{1349, 720, 7627} |
| दधा᳚मि ते॒ मधु॑नो भ॒क्षमग्रे᳚ हि॒तस्ते᳚ भा॒गः सु॒तो, अ॑स्तु॒ सोमः॑|{भार्गवो नेमः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} अस॑श्च॒ त्वं द॑क्षिण॒तः सखा॒ मेऽधा᳚ वृ॒त्राणि॑ जङ्घनाव॒ भूरि॑||{2/12}{6.7.4.2}{8.100.2}{8.10.7.2}{1350, 720, 7628} |
| प्र सु स्तोमं᳚ भरत वाज॒यन्त॒ इन्द्रा᳚य स॒त्यं यदि॑ स॒त्यमस्ति॑|{भार्गवो नेमः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} नेन्द्रो᳚ अ॒स्तीति॒ नेम॑ उ त्व आह॒ क ईं᳚ ददर्श॒ कम॒भि ष्ट॑वाम||{3/12}{6.7.4.3}{8.100.3}{8.10.7.3}{1351, 720, 7629} |
| अ॒यम॑स्मि जरितः॒ पश्य॑ मे॒ह विश्वा᳚ जा॒तान्य॒भ्य॑स्मि म॒ह्ना|{इन्द्रः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} ऋ॒तस्य॑ मा प्र॒दिशो᳚ वर्धयन्त्यादर्दि॒रो भुव॑ना दर्दरीमि||{4/12}{6.7.4.4}{8.100.4}{8.10.7.4}{1352, 720, 7630} |
| आ यन्मा᳚ वे॒ना, अरु॑हन्नृ॒तस्यँ॒, एक॒मासी᳚नं हर्य॒तस्य॑ पृ॒ष्ठे|{इन्द्रः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} मन॑श्चिन्मे हृ॒द आ प्रत्य॑वोच॒दचि॑क्रद॒ञ्छिशु॑मन्तः॒ सखा᳚यः||{5/12}{6.7.4.5}{8.100.5}{8.10.7.5}{1353, 720, 7631} |
| विश्वेत्ता ते॒ सव॑नेषु प्र॒वाच्या॒ या च॒कर्थ॑ मघवन्निन्द्र सुन्व॒ते|{भार्गवो नेमः | सुपर्णः | जगती} पारा᳚वतं॒ यत्पु॑रुसम्भृ॒तं वस्व॒पावृ॑णोः शर॒भाय॒ ऋषि॑बन्धवे||{6/12}{6.7.4.6}{8.100.6}{8.10.7.6}{1354, 720, 7632} |
| प्र नू॒नं धा᳚वता॒ पृथ॒ङ्नेह यो वो॒, अवा᳚वरीत्|{भार्गवो नेमः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} नि षीं᳚ वृ॒त्रस्य॒ मर्म॑णि॒ वज्र॒मिन्द्रो᳚ अपीपतत्||{7/12}{6.7.5.1}{8.100.7}{8.10.7.7}{1355, 720, 7633} |
| मनो᳚जवा॒, अय॑मान आय॒सीम॑तर॒त्पुर᳚म्|{भार्गवो नेमः | इन्द्रः | अनुष्टुप्} दिवं᳚ सुप॒र्णो ग॒त्वाय॒ सोमं᳚ व॒ज्रिण॒ आभ॑रत्||{8/12}{6.7.5.2}{8.100.8}{8.10.7.8}{1356, 720, 7634} |
| स॒मु॒द्रे, अ॒न्तः श॑यत उ॒द्ना वज्रो᳚ अ॒भीवृ॑तः|{भार्गवो नेमः | वज्रो वा | अनुष्टुप्} भर᳚न्त्यस्मै सं॒यतः॑ पु॒रःप्र॑स्रवणा ब॒लिम्||{9/12}{6.7.5.3}{8.100.9}{8.10.7.9}{1357, 720, 7635} |
| यद्वाग्वद᳚न्त्यविचेत॒नानि॒ राष्ट्री᳚ दे॒वानां᳚ निष॒साद॑ म॒न्द्रा|{भार्गवो नेमः | वाक् | त्रिष्टुप्} चत॑स्र॒ ऊर्जं᳚ दुदुहे॒ पयां᳚सि॒ क्व॑ स्विदस्याः पर॒मं ज॑गाम||{10/12}{6.7.5.4}{8.100.10}{8.10.7.10}{1358, 720, 7636} |
| दे॒वीं वाच॑मजनयन्त दे॒वास्तां वि॒श्वरू᳚पाः प॒शवो᳚ वदन्ति|{भार्गवो नेमः | वाक् | त्रिष्टुप्} सा नो᳚ म॒न्द्रेष॒मूर्जं॒ दुहा᳚ना धे॒नुर्वाग॒स्मानुप॒ सुष्टु॒तैतु॑||{11/12}{6.7.5.5}{8.100.11}{8.10.7.11}{1359, 720, 7637} |
| सखे᳚ विष्णो वित॒रं वि क्र॑मस्व॒ द्यौर्दे॒हि लो॒कं वज्रा᳚य वि॒ष्कभे᳚|{भार्गवो नेमः | इन्द्रः | त्रिष्टुप्} हना᳚व वृ॒त्रं रि॒णचा᳚व॒ सिन्धू॒निन्द्र॑स्य यन्तु प्रस॒वे विसृ॑ष्टाः||{12/12}{6.7.5.6}{8.100.12}{8.10.7.12}{1360, 720, 7638} |
| [90] ऋधगित्थेति षोळशर्चस्य सूक्तस्य भार्गवोजमदग्निरृषिर्मित्रावरुणौदेवते पंचम्यामित्रावरुणादित्यादेवताः षष्ठ्या आदित्याः सप्तम्यष्टम्योरश्विनौ नवमीदशम्योर्वायुरेकादशीद्वादश्योः सूर्यस्त्रयोदश्या उषाश्चतुर्दश्याः पवमानस्ततोद्वयोर्गौर्बृहती द्वितीयाचतुर्थी षष्ठ्यष्ठम्यः सतोबृहत्यः तृतीयागायत्र्यंत्यास्तिस्रत्रिष्टुभः |
| ऋध॑गि॒त्था स मर्त्यः॑ शश॒मे दे॒वता᳚तये|{भार्गवो जमदग्निः | मित्रावरुणौ | बृहती} यो नू॒नं मि॒त्रावरु॑णाव॒भिष्ट॑य आच॒क्रे ह॒व्यदा᳚तये||{1/16}{6.7.6.1}{8.101.1}{8.10.8.1}{1361, 721, 7639} |
| वर्षि॑ष्ठक्षत्रा, उरु॒चक्ष॑सा॒ नरा॒ राजा᳚ना दीर्घ॒श्रुत्त॑मा|{भार्गवो जमदग्निः | मित्रावरुणौ | सतोबृहती} ता बा॒हुता॒ न दं॒सना᳚ रथर्यतः सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑||{2/16}{6.7.6.2}{8.101.2}{8.10.8.2}{1362, 721, 7640} |
| प्र यो वां᳚ मित्रावरुणाजि॒रो दू॒तो, अद्र॑वत्|{भार्गवो जमदग्निः | मित्रावरुणौ | गायत्री} अयः॑शीर्षा॒ मदे᳚रघुः||{3/16}{6.7.6.3}{8.101.3}{8.10.8.3}{1363, 721, 7641} |
| न यः स॒म्पृच्छे॒ न पुन॒र्हवी᳚तवे॒ न सं᳚वा॒दाय॒ रम॑ते|{भार्गवो जमदग्निः | मित्रावरुणौ | सतोबृहती} तस्मा᳚न्नो, अ॒द्य समृ॑तेरुरुष्यतं बा॒हुभ्यां᳚ न उरुष्यतम्||{4/16}{6.7.6.4}{8.101.4}{8.10.8.4}{1364, 721, 7642} |
| प्र मि॒त्राय॒ प्रार्य॒म्णे स॑च॒थ्य॑मृतावसो|{भार्गवो जमदग्निः | मित्रावरुणौ, आदित्याः | बृहती} व॒रू॒थ्य१॑(अं॒) वरु॑णे॒ छन्द्यं॒ वचः॑ स्तो॒त्रं राज॑सु गायत||{5/16}{6.7.6.5}{8.101.5}{8.10.8.5}{1365, 721, 7643} |
| ते हि᳚न् विरे, अरु॒णं जेन्यं॒ वस्वेकं᳚ पु॒त्रं ति॑सॄ॒णाम्|{भार्गवो जमदग्निः | आदित्याः | सतोबृहती} ते धामा᳚न्य॒मृता॒ मर्त्या᳚ना॒मद॑ब्धा, अ॒भि च॑क्षते||{6/16}{6.7.7.1}{8.101.6}{8.10.8.6}{1366, 721, 7644} |
| आ मे॒ वचां॒स्युद्य॑ता द्यु॒मत्त॑मानि॒ कर्त्वा᳚|{भार्गवो जमदग्निः | अश्विनौ | बृहती} उ॒भा या᳚तं नासत्या स॒जोष॑सा॒ प्रति॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये᳚||{7/16}{6.7.7.2}{8.101.7}{8.10.8.7}{1367, 721, 7645} |
| रा॒तिं यद्वा᳚मर॒क्षसं॒ हवा᳚महे यु॒वाभ्यां᳚ वाजिनीवसू|{भार्गवो जमदग्निः | अश्विनौ | सतोबृहती} प्राचीं॒ होत्रां᳚ प्रति॒रन्ता᳚वितं नरा गृणा॒ना ज॒मद॑ग्निना||{8/16}{6.7.7.3}{8.101.8}{8.10.8.8}{1368, 721, 7646} |
| आ नो᳚ य॒ज्ञं दि॑वि॒स्पृशं॒ वायो᳚ या॒हि सु॒मन्म॑भिः|{भार्गवो जमदग्निः | वायुः | बृहती} अ॒न्तः प॒वित्र॑ उ॒परि॑ श्रीणा॒नो॒३॑(ओ॒)ऽयं शु॒क्रो, अ॑यामि ते||{9/16}{6.7.7.4}{8.101.9}{8.10.8.9}{1369, 721, 7647} |
| वेत्य॑ध्व॒र्युः प॒थिभी॒ रजि॑ष्ठैः॒ प्रति॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये᳚|{भार्गवो जमदग्निः | वायुः | सतोबृहती} अधा᳚ नियुत्व उ॒भय॑स्य नः पिब॒ शुचिं॒ सोमं॒ गवा᳚शिरम्||{10/16}{6.7.7.5}{8.101.10}{8.10.8.10}{1370, 721, 7648} |
| बण्म॒हाँ, अ॑सि सूर्य॒ बळा᳚दित्य म॒हाँ, अ॑सि|{भार्गवो जमदग्निः | सूर्यः | बृहती} म॒हस्ते᳚ स॒तो म॑हि॒मा प॑नस्यते॒ऽद्धा दे᳚व म॒हाँ, अ॑सि||{11/16}{6.7.8.1}{8.101.11}{8.10.8.11}{1371, 721, 7649} |
| बट् सू᳚र्य॒ श्रव॑सा म॒हाँ, अ॑सि स॒त्रा दे᳚व म॒हाँ, अ॑सि|{भार्गवो जमदग्निः | सूर्यः | सतोबृहती} म॒ह्ना दे॒वाना᳚मसु॒र्यः॑ पु॒रोहि॑तो वि॒भु ज्योति॒रदा᳚भ्यम्||{12/16}{6.7.8.2}{8.101.12}{8.10.8.12}{1372, 721, 7650} |
| इ॒यं या नीच्य॒र्किणी᳚ रू॒पा रोहि᳚ण्या कृ॒ता|{भार्गवो जमदग्निः | उषाः सूर्यप्रभा वा | बृहती} चि॒त्रेव॒ प्रत्य॑दर्श्याय॒त्य१॑(अ॒)न्तर्द॒शसु॑ बा॒हुषु॑||{13/16}{6.7.8.3}{8.101.13}{8.10.8.13}{1373, 721, 7651} |
| प्र॒जा ह॑ ति॒स्रो, अ॒त्याय॑मीयु॒र्न्य१॑(अ॒)न्या, अ॒र्कम॒भितो᳚ विविश्रे|{भार्गवो जमदग्निः | पवमानः | त्रिष्टुप्} बृ॒हद्ध॑ तस्थौ॒ भुव॑नेष्व॒न्तः पव॑मानो ह॒रित॒ आ वि॑वेश||{14/16}{6.7.8.4}{8.101.14}{8.10.8.14}{1374, 721, 7652} |
| मा॒ता रु॒द्राणां᳚ दुहि॒ता वसू᳚नां॒ स्वसा᳚दि॒त्याना᳚म॒मृत॑स्य॒ नाभिः॑|{भार्गवो जमदग्निः | गौः | त्रिष्टुप्} प्र नु वो᳚चं चिकि॒तुषे॒ जना᳚य॒ मा गामना᳚गा॒मदि॑तिं वधिष्ट||{15/16}{6.7.8.5}{8.101.15}{8.10.8.15}{1375, 721, 7653} |
| व॒चो॒विदं॒ वाच॑मुदी॒रय᳚न्तीं॒ विश्वा᳚भिर्धी॒भिरु॑प॒तिष्ठ॑मानाम्|{भार्गवो जमदग्निः | गौः | त्रिष्टुप्} दे॒वीं दे॒वेभ्यः॒ पर्ये॒युषीं॒ गामा मा᳚वृक्त॒ मर्त्यो᳚ द॒भ्रचे᳚ताः||{16/16}{6.7.8.6}{8.101.16}{8.10.8.16}{1376, 721, 7654} |
| [91] त्वमग्नइति द्वाविंशत्यृचस्य सूक्तस्य भार्गवःप्रयोगोग्निर्गायत्री | (अस्मिन्सूक्तेएतऋषयोविकल्प्यंते - बार्हस्पत्योग्निः पावकः यद्वासहसः पुत्रौगृहपतियविष्ठौ अनयोरन्यतरोवा ) | |
| त्वम॑ग्ने बृ॒हद्वयो॒ दधा᳚सि देव दा॒शुषे᳚|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} क॒विर्गृ॒हप॑ति॒र्युवा᳚||{1/22}{6.7.9.1}{8.102.1}{8.10.9.1}{1377, 722, 7655} |
| स न॒ ईळा᳚नया स॒ह दे॒वाँ, अ॑ग्ने दुव॒स्युवा᳚|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} चि॒किद्वि॑भान॒वा व॑ह||{2/22}{6.7.9.2}{8.102.2}{8.10.9.2}{1378, 722, 7656} |
| त्वया᳚ ह स्विद्यु॒जा व॒यं चोदि॑ष्ठेन यविष्ठ्य|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} अ॒भि ष्मो॒ वाज॑सातये||{3/22}{6.7.9.3}{8.102.3}{8.10.9.3}{1379, 722, 7657} |
| औ॒र्व॒भृ॒गु॒वच्छुचि॑मप्नवान॒वदा हु॑वे|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा᳚ससम्||{4/22}{6.7.9.4}{8.102.4}{8.10.9.4}{1380, 722, 7658} |
| हु॒वे वात॑स्वनं क॒विं प॒र्जन्य॑क्रन्द्यं॒ सहः॑|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा᳚ससम्||{5/22}{6.7.9.5}{8.102.5}{8.10.9.5}{1381, 722, 7659} |
| आ स॒वं स॑वि॒तुर्य॑था॒ भग॑स्येव भु॒जिं हु॑वे|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा᳚ससम्||{6/22}{6.7.10.1}{8.102.6}{8.10.9.6}{1382, 722, 7660} |
| अ॒ग्निं वो᳚ वृ॒धन्त॑मध्व॒राणां᳚ पुरू॒तम᳚म्|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} अच्छा॒ नप्त्रे॒ सह॑स्वते||{7/22}{6.7.10.2}{8.102.7}{8.10.9.7}{1383, 722, 7661} |
| अ॒यं यथा᳚ न आ॒भुव॒त्त्वष्टा᳚ रू॒पेव॒ तक्ष्या᳚|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} अ॒स्य क्रत्वा॒ यश॑स्वतः||{8/22}{6.7.10.3}{8.102.8}{8.10.9.8}{1384, 722, 7662} |
| अ॒यं विश्वा᳚ अ॒भि श्रियो॒ऽग्निर्दे॒वेषु॑ पत्यते|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} आ वाजै॒रुप॑ नो गमत्||{9/22}{6.7.10.4}{8.102.9}{8.10.9.9}{1385, 722, 7663} |
| विश्वे᳚षामि॒ह स्तु॑हि॒ होतॄ᳚णां य॒शस्त॑मम्|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम्||{10/22}{6.7.10.5}{8.102.10}{8.10.9.10}{1386, 722, 7664} |
| शी॒रं पा᳚व॒कशो᳚चिषं॒ ज्येष्ठो॒ यो दमे॒ष्वा|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} दी॒दाय॑ दीर्घ॒श्रुत्त॑मः||{11/22}{6.7.11.1}{8.102.11}{8.10.9.11}{1387, 722, 7665} |
| तमर्व᳚न्तं॒ न सा᳚न॒सिं गृ॑णी॒हि वि॑प्र शु॒ष्मिण᳚म्|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} मि॒त्रं न या᳚त॒यज्ज॑नम्||{12/22}{6.7.11.2}{8.102.12}{8.10.9.12}{1388, 722, 7666} |
| उप॑ त्वा जा॒मयो॒ गिरो॒ देदि॑शतीर्हवि॒ष्कृतः॑|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} वा॒योरनी᳚के, अस्थिरन्||{13/22}{6.7.11.3}{8.102.13}{8.10.9.13}{1389, 722, 7667} |
| यस्य॑ त्रि॒धात्ववृ॑तं ब॒र्हिस्त॒स्थावसं᳚दिनम्|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} आप॑श्चि॒न्नि द॑धा प॒दम्||{14/22}{6.7.11.4}{8.102.14}{8.10.9.14}{1390, 722, 7668} |
| प॒दं दे॒वस्य॑ मी॒ळ्हुषोऽना᳚धृष्टाभिरू॒तिभिः॑|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} भ॒द्रा सूर्य॑ इवोप॒दृक्||{15/22}{6.7.11.5}{8.102.15}{8.10.9.15}{1391, 722, 7669} |
| अग्ने᳚ घृ॒तस्य॑ धी॒तिभि॑स्तेपा॒नो दे᳚व शो॒चिषा᳚|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} आ दे॒वान् व॑क्षि॒ यक्षि॑ च||{16/22}{6.7.12.1}{8.102.16}{8.10.9.16}{1392, 722, 7670} |
| तं त्वा᳚जनन्त मा॒तरः॑ क॒विं दे॒वासो᳚ अङ्गिरः|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} ह॒व्य॒वाह॒मम॑र्त्यम्||{17/22}{6.7.12.2}{8.102.17}{8.10.9.17}{1393, 722, 7671} |
| प्रचे᳚तसं त्वा क॒वेऽग्ने᳚ दू॒तं वरे᳚ण्यम्|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} ह॒व्य॒वाहं॒ नि षे᳚दिरे||{18/22}{6.7.12.3}{8.102.18}{8.10.9.18}{1394, 722, 7672} |
| न॒हि मे॒, अस्त्यघ्न्या॒ न स्वधि॑ति॒र्वन᳚न्वति|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} अथै᳚ता॒दृग्भ॑रामि ते||{19/22}{6.7.12.4}{8.102.19}{8.10.9.19}{1395, 722, 7673} |
| यद॑ग्ने॒ कानि॒ कानि॑ चि॒दा ते॒ दारू᳚णि द॒ध्मसि॑|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} ता जु॑षस्व यविष्ठ्य||{20/22}{6.7.12.5}{8.102.20}{8.10.9.20}{1396, 722, 7674} |
| यदत्त्यु॑प॒जिह्वि॑का॒ यद्व॒म्रो, अ॑ति॒सर्प॑ति|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} सर्वं॒ तद॑स्तु ते घृ॒तम्||{21/22}{6.7.12.6}{8.102.21}{8.10.9.21}{1397, 722, 7675} |
| अ॒ग्निमिन्धा᳚नो॒ मन॑सा॒ धियं᳚ सचेत॒ मर्त्यः॑|{भार्गवः प्रयोगः | अग्निः | गायत्री} अ॒ग्निमी᳚धे वि॒वस्व॑भिः||{22/22}{6.7.12.7}{8.102.22}{8.10.9.22}{1398, 722, 7676} |
| [92] अदर्शीति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य काण्वः सोभरिरग्निरंत्याया अग्नामरुतोबृहती पंचमीविराड्रूपा सप्तम्याद्ययुजःसतोबृहत्योऽष्टम्यादियुजः क्रमेणककुब्हसीयसीककुबनुष्टुभः | |
| अद॑र्शि गातु॒वित्त॑मो॒ यस्मि᳚न्व्र॒तान्या᳚द॒धुः|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | बृहती} उपो॒ षु जा॒तमार्य॑स्य॒ वर्ध॑नम॒ग्निं न॑क्षन्त नो॒ गिरः॑||{1/14}{6.7.13.1}{8.103.1}{8.10.10.1}{1399, 723, 7677} |
| प्र दैवो᳚दासो, अ॒ग्निर्दे॒वाँ, अच्छा॒ न म॒ज्मना᳚|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | बृहती} अनु॑ मा॒तरं᳚ पृथि॒वीं वि वा᳚वृते त॒स्थौ नाक॑स्य॒ सान॑वि||{2/14}{6.7.13.2}{8.103.2}{8.10.10.2}{1400, 723, 7678} |
| यस्मा॒द्रेज᳚न्त कृ॒ष्टय॑श्च॒र्कृत्या᳚नि कृण्व॒तः|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | बृहती} स॒ह॒स्र॒सां मे॒धसा᳚ताविव॒ त्मना॒ग्निं धी॒भिः स॑पर्यत||{3/14}{6.7.13.3}{8.103.3}{8.10.10.3}{1401, 723, 7679} |
| प्र यं रा॒ये निनी᳚षसि॒ मर्तो॒ यस्ते᳚ वसो॒ दाश॑त्|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | बृहती} स वी॒रं ध॑त्ते, अग्न उक्थशं॒सिनं॒ त्मना᳚ सहस्रपो॒षिण᳚म्||{4/14}{6.7.13.4}{8.103.4}{8.10.10.4}{1402, 723, 7680} |
| स दृ॒ळ्हे चि॑द॒भि तृ॑णत्ति॒ वाज॒मर्व॑ता॒ स ध॑त्ते॒, अक्षि॑ति॒ श्रवः॑|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | विराड्रूपा} त्वे दे᳚व॒त्रा सदा᳚ पुरूवसो॒ विश्वा᳚ वा॒मानि॑ धीमहि||{5/14}{6.7.13.5}{8.103.5}{8.10.10.5}{1403, 723, 7681} |
| यो विश्वा॒ दय॑ते॒ वसु॒ होता᳚ म॒न्द्रो जना᳚नाम्|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | बृहती} मधो॒र्न पात्रा᳚ प्रथ॒मान्य॑स्मै॒ प्र स्तोमा᳚ यन्त्य॒ग्नये᳚||{6/14}{6.7.14.1}{8.103.6}{8.10.10.6}{1404, 723, 7682} |
| अश्वं॒ न गी॒र्भी र॒थ्यं᳚ सु॒दान॑वो मर्मृ॒ज्यन्ते᳚ देव॒यवः॑|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} उ॒भे तो॒के तन॑ये दस्म विश्पते॒ पर्षि॒ राधो᳚ म॒घोना᳚म्||{7/14}{6.7.14.2}{8.103.7}{8.10.10.7}{1405, 723, 7683} |
| प्र मंहि॑ष्ठाय गायत ऋ॒ताव्ने᳚ बृह॒ते शु॒क्रशो᳚चिषे|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} उप॑स्तुतासो, अ॒ग्नये᳚||{8/14}{6.7.14.3}{8.103.8}{8.10.10.8}{1406, 723, 7684} |
| आ वं᳚सते म॒घवा᳚ वी॒रव॒द्यशः॒ समि॑द्धो द्यु॒म्न्याहु॑तः|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} कु॒विन्नो᳚ अस्य सुम॒तिर्नवी᳚य॒स्यच्छा॒ वाजे᳚भिरा॒गम॑त्||{9/14}{6.7.14.4}{8.103.9}{8.10.10.9}{1407, 723, 7685} |
| प्रेष्ठ॑मु प्रि॒याणां᳚ स्तु॒ह्या᳚सा॒वाति॑थिम्|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ह्रसीयसी गायत्री} अ॒ग्निं रथा᳚नां॒ यम᳚म्||{10/14}{6.7.14.5}{8.103.10}{8.10.10.10}{1408, 723, 7686} |
| उदि॑ता॒ यो निदि॑ता॒ वेदि॑ता॒ वस्वा य॒ज्ञियो᳚ व॒वर्त॑ति|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} दु॒ष्टरा॒ यस्य॑ प्रव॒णे नोर्मयो᳚ धि॒या वाजं॒ सिषा᳚सतः||{11/14}{6.7.15.1}{8.103.11}{8.10.10.11}{1409, 723, 7687} |
| मा नो᳚ हृणीता॒मति॑थि॒र्वसु॑र॒ग्निः पु॑रुप्रश॒स्त ए॒षः|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | ककुभः} यः सु॒होता᳚ स्वध्व॒रः||{12/14}{6.7.15.2}{8.103.12}{8.10.10.12}{1410, 723, 7688} |
| मो ते रि॑ष॒न्ये, अच्छो᳚क्तिभिर्व॒सोऽग्ने॒ केभि॑श्चि॒देवैः᳚|{काण्वः सोभरिः | अग्निः | सतोबृहती} की॒रिश्चि॒द्धि त्वामीट्टे᳚ दू॒त्या᳚य रा॒तह᳚व्यः स्वध्व॒रः||{13/14}{6.7.15.3}{8.103.13}{8.10.10.13}{1411, 723, 7689} |
| आग्ने᳚ याहि म॒रुत्स॑खा रु॒द्रेभिः॒ सोम॑पीतये|{काण्वः सोभरिः | अग्नामरुतः | अनुष्टुप्} सोभ᳚र्या॒, उप॑ सुष्टु॒तिं मा॒दय॑स्व॒ स्व᳚र्णरे||{14/14}{6.7.15.4}{8.103.14}{8.10.10.14}{1412, 723, 7690} |
| [93] स्वादिष्ठयेति दशर्चस्य सूक्तस्य वैश्वामित्रोमधुच्छंदाः पवमान सोमो गायत्री | (पवमान पारायण प्रथमोध्यायः) |
| स्वादि॑ष्ठया॒ मदि॑ष्ठया॒ पव॑स्व सोम॒ धार॑या|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द्रा᳚य॒ पात॑वे सु॒तः||{1/10}{6.7.16.1}{9.1.1}{9.1.1.1}{1413, 724, 7691} |
| र॒क्षो॒हा वि॒श्वच॑र्षणिर॒भि योनि॒मयो᳚हतम्|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} द्रुणा᳚ स॒धस्थ॒मास॑दत्||{2/10}{6.7.16.2}{9.1.2}{9.1.1.2}{1414, 724, 7692} |
| व॒रि॒वो॒धात॑मो भव॒ मंहि॑ष्ठो वृत्र॒हन्त॑मः|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} पर्षि॒ राधो᳚ म॒घोना᳚म्||{3/10}{6.7.16.3}{9.1.3}{9.1.1.3}{1415, 724, 7693} |
| अ॒भ्य॑र्ष म॒हानां᳚ दे॒वानां᳚ वी॒तिमन्ध॑सा|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि वाज॑मु॒त श्रवः॑||{4/10}{6.7.16.4}{9.1.4}{9.1.1.4}{1416, 724, 7694} |
| त्वामच्छा᳚ चरामसि॒ तदिदर्थं᳚ दि॒वेदि॑वे|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दो॒ त्वे न॑ आ॒शसः॑||{5/10}{6.7.16.5}{9.1.5}{9.1.1.5}{1417, 724, 7695} |
| पु॒नाति॑ ते परि॒स्रुतं॒ सोमं॒ सूर्य॑स्य दुहि॒ता|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} वारे᳚ण॒ शश्व॑ता॒ तना᳚||{6/10}{6.7.17.1}{9.1.6}{9.1.1.6}{1418, 724, 7696} |
| तमी॒मण्वीः᳚ सम॒र्य आ गृ॒भ्णन्ति॒ योष॑णो॒ दश॑|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} स्वसा᳚रः॒ पार्ये᳚ दि॒वि||{7/10}{6.7.17.2}{9.1.7}{9.1.1.7}{1419, 724, 7697} |
| तमीं᳚ हिन्वन्त्य॒ग्रुवो॒ धम᳚न्ति बाकु॒रं दृति᳚म्|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} त्रि॒धातु॑ वार॒णं मधु॑||{8/10}{6.7.17.3}{9.1.8}{9.1.1.8}{1420, 724, 7698} |
| अ॒भी॒३॑(ई॒)ममघ्न्या᳚ उ॒त श्री॒णन्ति॑ धे॒नवः॒ शिशु᳚म्|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोम॒मिन्द्रा᳚य॒ पात॑वे||{9/10}{6.7.17.4}{9.1.9}{9.1.1.9}{1421, 724, 7699} |
| अ॒स्येदिन्द्रो॒ मदे॒ष्वा विश्वा᳚ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते|{वैश्वामित्रो मधुच्छंदाः | पवमानः सोमः | गायत्री} शूरो᳚ म॒घा च॑ मंहते||{10/10}{6.7.17.5}{9.1.10}{9.1.1.10}{1422, 724, 7700} |
| [94] पवस्वेति दशर्चस्य सूक्तस्य काण्वोमेधातिथिः पवमानसोमोगायत्री | |
| पव॑स्व देव॒वीरति॑ प॒वित्रं᳚ सोम॒ रंह्या᳚|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द्र॑मिन्दो॒ वृषा वि॑श||{1/10}{6.7.18.1}{9.2.1}{9.1.2.1}{1423, 725, 7701} |
| आ व॑च्यस्व॒ महि॒ प्सरो॒ वृषे᳚न्दो द्यु॒म्नव॑त्तमः|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} आ योनिं᳚ धर्ण॒सिः स॑दः||{2/10}{6.7.18.2}{9.2.2}{9.1.2.2}{1424, 725, 7702} |
| अधु॑क्षत प्रि॒यं मधु॒ धारा᳚ सु॒तस्य॑ वे॒धसः॑|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒पो व॑सिष्ट सु॒क्रतुः॑||{3/10}{6.7.18.3}{9.2.3}{9.1.2.3}{1425, 725, 7703} |
| म॒हान्तं᳚ त्वा म॒हीरन्वापो᳚ अर्षन्ति॒ सिन्ध॑वः|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} यद्गोभि᳚र्वासयि॒ष्यसे᳚||{4/10}{6.7.18.4}{9.2.4}{9.1.2.4}{1426, 725, 7704} |
| स॒मु॒द्रो, अ॒प्सु मा᳚मृजे विष्ट॒म्भो ध॒रुणो᳚ दि॒वः|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमः॑ प॒वित्रे᳚ अस्म॒युः||{5/10}{6.7.18.5}{9.2.5}{9.1.2.5}{1427, 725, 7705} |
| अचि॑क्रद॒द्वृषा॒ हरि᳚र्म॒हान् मि॒त्रो न द॑र्श॒तः|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} सं सूर्ये᳚ण रोचते||{6/10}{6.7.19.1}{9.2.6}{9.1.2.6}{1428, 725, 7706} |
| गिर॑स्त इन्द॒ ओज॑सा मर्मृ॒ज्यन्ते᳚ अप॒स्युवः॑|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} याभि॒र्मदा᳚य॒ शुम्भ॑से||{7/10}{6.7.19.2}{9.2.7}{9.1.2.7}{1429, 725, 7707} |
| तं त्वा॒ मदा᳚य॒ घृष्व॑य उ लोककृ॒त्नुमी᳚महे|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} तव॒ प्रश॑स्तयो म॒हीः||{8/10}{6.7.19.3}{9.2.8}{9.1.2.8}{1430, 725, 7708} |
| अ॒स्मभ्य॑मिन्दविन्द्र॒युर्मध्वः॑ पवस्व॒ धार॑या|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} प॒र्जन्यो᳚ वृष्टि॒माँ, इ॑व||{9/10}{6.7.19.4}{9.2.9}{9.1.2.9}{1431, 725, 7709} |
| गो॒षा, इ᳚न्दो नृ॒षा, अ॑स्यश्व॒सा वा᳚ज॒सा, उ॒त|{काण्वो मेधातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} आ॒त्मा य॒ज्ञस्य॑ पू॒र्व्यः||{10/10}{6.7.19.5}{9.2.10}{9.1.2.10}{1432, 725, 7710} |
| [95] एषदेव इति दशर्चस्य सूक्तस्याजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमोवैश्वामित्रोदेवरातः पवमान सोमो गायत्री । |
| ए॒ष दे॒वो, अम॑र्त्यः पर्ण॒वीरि॑व दीयति|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि द्रोणा᳚न्या॒सद᳚म्||{1/10}{6.7.20.1}{9.3.1}{9.1.3.1}{1433, 726, 7711} |
| ए॒ष दे॒वो वि॒पा कृ॒तोऽति॒ ह्वरां᳚सि धावति|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑मानो॒, अदा᳚भ्यः||{2/10}{6.7.20.2}{9.3.2}{9.1.3.2}{1434, 726, 7712} |
| ए॒ष दे॒वो वि॑प॒न्युभिः॒ पव॑मान ऋता॒युभिः॑|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} हरि॒र्वाजा᳚य मृज्यते||{3/10}{6.7.20.3}{9.3.3}{9.1.3.3}{1435, 726, 7713} |
| ए॒ष विश्वा᳚नि॒ वार्या॒ शूरो॒ यन्नि॑व॒ सत्व॑भिः|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑मानः सिषासति||{4/10}{6.7.20.4}{9.3.4}{9.1.3.4}{1436, 726, 7714} |
| ए॒ष दे॒वो र॑थर्यति॒ पव॑मानो दशस्यति|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} आ॒विष्कृ॑णोति वग्व॒नुम्||{5/10}{6.7.20.5}{9.3.5}{9.1.3.5}{1437, 726, 7715} |
| ए॒ष विप्रै᳚र॒भिष्टु॑तो॒ऽपो दे॒वो वि गा᳚हते|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} दध॒द्रत्ना᳚नि दा॒शुषे᳚||{6/10}{6.7.21.1}{9.3.6}{9.1.3.6}{1438, 726, 7716} |
| ए॒ष दिवं॒ वि धा᳚वति ति॒रो रजां᳚सि॒ धार॑या|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑मानः॒ कनि॑क्रदत्||{7/10}{6.7.21.2}{9.3.7}{9.1.3.7}{1439, 726, 7717} |
| ए॒ष दिवं॒ व्यास॑रत् ति॒रो रजां॒स्यस्पृ॑तः|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑मानः स्वध्व॒रः||{8/10}{6.7.21.3}{9.3.8}{9.1.3.8}{1440, 726, 7718} |
| ए॒ष प्र॒त्नेन॒ जन्म॑ना दे॒वो दे॒वेभ्यः॑ सु॒तः|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} हरिः॑ प॒वित्रे᳚ अर्षति||{9/10}{6.7.21.4}{9.3.9}{9.1.3.9}{1441, 726, 7719} |
| ए॒ष उ॒ स्य पु॑रुव्र॒तो ज॑ज्ञा॒नो ज॒नय॒न्निषः॑|{आजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः | पवमानः सोमः | गायत्री} धार॑या पवते सु॒तः||{10/10}{6.7.21.5}{9.3.10}{9.1.3.10}{1442, 726, 7720} |
| [96] सनाचेति दशर्चस्य सूक्तस्याङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः पवमानसोमो गायत्री |
| सना᳚ च सोम॒ जेषि॑ च॒ पव॑मान॒ महि॒ श्रवः॑|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{1/10}{6.7.22.1}{9.4.1}{9.1.4.1}{1443, 727, 7721} |
| सना॒ ज्योतिः॒ सना॒ स्व१॑(अ॒)र्विश्वा᳚ च सोम॒ सौभ॑गा|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{2/10}{6.7.22.2}{9.4.2}{9.1.4.2}{1444, 727, 7722} |
| सना॒ दक्ष॑मु॒त क्रतु॒मप॑ सोम॒ मृधो᳚ जहि|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{3/10}{6.7.22.3}{9.4.3}{9.1.4.3}{1445, 727, 7723} |
| पवी᳚तारः पुनी॒तन॒ सोम॒मिन्द्रा᳚य॒ पात॑वे|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{4/10}{6.7.22.4}{9.4.4}{9.1.4.4}{1446, 727, 7724} |
| त्वं सूर्ये᳚ न॒ आ भ॑ज॒ तव॒ क्रत्वा॒ तवो॒तिभिः॑|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{5/10}{6.7.22.5}{9.4.5}{9.1.4.5}{1447, 727, 7725} |
| तव॒ क्रत्वा॒ तवो॒तिभि॒र्ज्योक् प॑श्येम॒ सूर्य᳚म्|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{6/10}{6.7.23.1}{9.4.6}{9.1.4.6}{1448, 727, 7726} |
| अ॒भ्य॑र्ष स्वायुध॒ सोम॑ द्वि॒बर्ह॑सं र॒यिम्|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{7/10}{6.7.23.2}{9.4.7}{9.1.4.7}{1449, 727, 7727} |
| अ॒भ्य१॑(अ॒)र्षान॑पच्युतो र॒यिं स॒मत्सु॑ सास॒हिः|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{8/10}{6.7.23.3}{9.4.8}{9.1.4.8}{1450, 727, 7728} |
| त्वां य॒ज्ञैर॑वीवृध॒न् पव॑मान॒ विध᳚र्मणि|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{9/10}{6.7.23.4}{9.4.9}{9.1.4.9}{1451, 727, 7729} |
| र॒यिं न॑श्चि॒त्रम॒श्विन॒मिन्दो᳚ वि॒श्वायु॒मा भ॑र|{आङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः | पवमानः सोमः | गायत्री} अथा᳚ नो॒ वस्य॑सस्कृधि||{10/10}{6.7.23.5}{9.4.10}{9.1.4.10}{1452, 727, 7730} |
| [97] समिद्धइत्येकादशर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः क्रमेणेध्मस्तनूनपादिळोबर्हिर्देवीर्द्वार उषासानक्ता दैव्यौहोतारौ तिस्रोदेव्यः सरस्वतीळाभारत्यस्त्वष्टा वनस्पतिः स्वाहाकृतयोगायत्री अंत्याश्चतस्रोनुष्टुभः | ( इतआरभ्यविंशतिसूक्तेषुकाश्यपोदेवलोऽसितेन सहविकल्पते ) | |
| समि॑द्धो वि॒श्वत॒स्पतिः॒ पव॑मानो॒ वि रा᳚जति|{काश्यपोसितः | इध्मः समिद्धोऽग्निर्वा | गायत्री} प्री॒णन् वृषा॒ कनि॑क्रदत्||{1/11}{6.7.24.1}{9.5.1}{9.1.5.1}{1453, 728, 7731} |
| तनू॒नपा॒त् पव॑मानः॒ शृङ्गे॒ शिशा᳚नो, अर्षति|{काश्यपोसितः | तनूनपात् | गायत्री} अ॒न्तरि॑क्षेण॒ रार॑जत्||{2/11}{6.7.24.2}{9.5.2}{9.1.5.2}{1454, 728, 7732} |
| ई॒ळेन्यः॒ पव॑मानो र॒यिर्वि रा᳚जति द्यु॒मान्|{काश्यपोसितः | इळः | गायत्री} मधो॒र्धारा᳚भि॒रोज॑सा||{3/11}{6.7.24.3}{9.5.3}{9.1.5.3}{1455, 728, 7733} |
| ब॒र्हिः प्रा॒चीन॒मोज॑सा॒ पव॑मानः स्तृ॒णन् हरिः॑|{काश्यपोसितः | बर्हिः | गायत्री} दे॒वेषु॑ दे॒व ई᳚यते||{4/11}{6.7.24.4}{9.5.4}{9.1.5.4}{1456, 728, 7734} |
| उदातै᳚र्जिहते बृ॒हद् द्वारो᳚ दे॒वीर्हि॑र॒ण्ययीः᳚|{काश्यपोसितः | देवीर्द्वारः (प्रचेतसावितिगुणः) | गायत्री} पव॑मानेन॒ सुष्टु॑ताः||{5/11}{6.7.24.5}{9.5.5}{9.1.5.5}{1457, 728, 7735} |
| सु॒शि॒ल्पे बृ॑ह॒ती म॒ही पव॑मानो वृषण्यति|{काश्यपोसितः | उषासानक्ता | गायत्री} नक्तो॒षासा॒ न द॑र्श॒ते||{6/11}{6.7.25.1}{9.5.6}{9.1.5.6}{1458, 728, 7736} |
| उ॒भा दे॒वा नृ॒चक्ष॑सा॒ होता᳚रा॒ दैव्या᳚ हुवे|{काश्यपोसितः | दैव्यौ होतारौ प्रचेतसौ | गायत्री} पव॑मान॒ इन्द्रो॒ वृषा᳚||{7/11}{6.7.25.2}{9.5.7}{9.1.5.7}{1459, 728, 7737} |
| भार॑ती॒ पव॑मानस्य॒ सर॑स्व॒तीळा᳚ म॒ही|{काश्यपोसितः | सरस्वतीळाभारत्यः | अनुष्टुप्} इ॒मं नो᳚ य॒ज्ञमा ग॑मन् ति॒स्रो दे॒वीः सु॒पेश॑सः||{8/11}{6.7.25.3}{9.5.8}{9.1.5.8}{1460, 728, 7738} |
| त्वष्टा᳚रमग्र॒जां गो॒पां पु॑रो॒यावा᳚न॒मा हु॑वे|{काश्यपोसितः | त्वष्टा | अनुष्टुप्} इन्दु॒रिन्द्रो॒ वृषा॒ हरिः॒ पव॑मानः प्र॒जाप॑तिः||{9/11}{6.7.25.4}{9.5.9}{9.1.5.9}{1461, 728, 7739} |
| वन॒स्पतिं᳚ पवमान॒ मध्वा॒ सम᳚ङ्ग्धि॒ धार॑या|{काश्यपोसितः | वनस्पतिः | अनुष्टुप्} स॒हस्र॑वल्शं॒ हरि॑तं॒ भ्राज॑मानं हिर॒ण्यय᳚म्||{10/11}{6.7.25.5}{9.5.10}{9.1.5.10}{1462, 728, 7740} |
| विश्वे᳚ देवाः॒ स्वाहा᳚कृतिं॒ पव॑मान॒स्या ग॑त|{काश्यपोसितः | स्वाहाकृतयः | अनुष्टुप्} वा॒युर्बृह॒स्पतिः॒ सूर्यो॒ऽग्निरिन्द्रः॑ स॒जोष॑सः||{11/11}{6.7.25.6}{9.5.11}{9.1.5.11}{1463, 728, 7741} |
| [98] मंद्रयेति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमो गायत्री |
| म॒न्द्रया᳚ सोम॒ धार॑या॒ वृषा᳚ पवस्व देव॒युः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अव्यो॒ वारे᳚ष्वस्म॒युः||{1/9}{6.7.26.1}{9.6.1}{9.1.6.1}{1464, 729, 7742} |
| अ॒भि त्यं मद्यं॒ मद॒मिन्द॒विन्द्र॒ इति॑ क्षर|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि वा॒जिनो॒, अर्व॑तः||{2/9}{6.7.26.2}{9.6.2}{9.1.6.2}{1465, 729, 7743} |
| अ॒भि त्यं पू॒र्व्यं मदं᳚ सुवा॒नो, अ॑र्ष प॒वित्र॒ आ|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि वाज॑मु॒त श्रवः॑||{3/9}{6.7.26.3}{9.6.3}{9.1.6.3}{1466, 729, 7744} |
| अनु॑ द्र॒प्सास॒ इन्द॑व॒ आपो॒ न प्र॒वता᳚सरन्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} पु॒ना॒ना, इन्द्र॑माशत||{4/9}{6.7.26.4}{9.6.4}{9.1.6.4}{1467, 729, 7745} |
| यमत्य॑मिव वा॒जिनं᳚ मृ॒जन्ति॒ योष॑णो॒ दश॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वने॒ क्रीळ᳚न्त॒मत्य॑विम्||{5/9}{6.7.26.5}{9.6.5}{9.1.6.5}{1468, 729, 7746} |
| तं गोभि॒र्वृष॑णं॒ रसं॒ मदा᳚य दे॒ववी᳚तये|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सु॒तं भरा᳚य॒ सं सृ॑ज||{6/9}{6.7.27.1}{9.6.6}{9.1.6.6}{1469, 729, 7747} |
| दे॒वो दे॒वाय॒ धार॒येन्द्रा᳚य पवते सु॒तः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} पयो॒ यद॑स्य पी॒पय॑त्||{7/9}{6.7.27.2}{9.6.7}{9.1.6.7}{1470, 729, 7748} |
| आ॒त्मा य॒ज्ञस्य॒ रंह्या᳚ सुष्वा॒णः प॑वते सु॒तः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} प्र॒त्नं नि पा᳚ति॒ काव्य᳚म्||{8/9}{6.7.27.3}{9.6.8}{9.1.6.8}{1471, 729, 7749} |
| ए॒वा पु॑ना॒न इ᳚न्द्र॒युर्मदं᳚ मदिष्ठ वी॒तये᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} गुहा᳚ चिद्दधिषे॒ गिरः॑||{9/9}{6.7.27.4}{9.6.9}{9.1.6.9}{1472, 729, 7750} |
| [99] असृग्रमिति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोऽसितः पवमान सोमो गायत्री | |
| असृ॑ग्र॒मिन्द॑वः प॒था धर्म᳚न्नृ॒तस्य॑ सु॒श्रियः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वि॒दा॒ना, अ॑स्य॒ योज॑नम्||{1/9}{6.7.28.1}{9.7.1}{9.1.7.1}{1473, 730, 7751} |
| प्र धारा॒ मध्वो᳚ अग्रि॒यो म॒हीर॒पो वि गा᳚हते|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} ह॒विर्ह॒विष्षु॒ वन्द्यः॑||{2/9}{6.7.28.2}{9.7.2}{9.1.7.2}{1474, 730, 7752} |
| प्र यु॒जो वा॒चो, अ॑ग्रि॒यो वृषाव॑ चक्रद॒द्वने᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सद्मा॒भि स॒त्यो, अ॑ध्व॒रः||{3/9}{6.7.28.3}{9.7.3}{9.1.7.3}{1475, 730, 7753} |
| परि॒ यत् काव्या᳚ क॒विर्नृ॒म्णा वसा᳚नो॒, अर्ष॑ति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} स्व᳚र्वा॒जी सि॑षासति||{4/9}{6.7.28.4}{9.7.4}{9.1.7.4}{1476, 730, 7754} |
| पव॑मानो, अ॒भि स्पृधो॒ विशो॒ राजे᳚व सीदति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} यदी᳚मृ॒ण्वन्ति॑ वे॒धसः॑||{5/9}{6.7.28.5}{9.7.5}{9.1.7.5}{1477, 730, 7755} |
| अव्यो॒ वारे॒ परि॑ प्रि॒यो हरि॒र्वने᳚षु सीदति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} रे॒भो व॑नुष्यते म॒ती||{6/9}{6.7.29.1}{9.7.6}{9.1.7.6}{1478, 730, 7756} |
| स वा॒युमिन्द्र॑म॒श्विना᳚ सा॒कं मदे᳚न गच्छति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} रणा॒ यो, अ॑स्य॒ धर्म॑भिः||{7/9}{6.7.29.2}{9.7.7}{9.1.7.7}{1479, 730, 7757} |
| आ मि॒त्रावरु॑णा॒ भगं॒ मध्वः॑ पवन्त ऊ॒र्मयः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वि॒दा॒ना, अ॑स्य॒ शक्म॑भिः||{8/9}{6.7.29.3}{9.7.8}{9.1.7.8}{1480, 730, 7758} |
| अ॒स्मभ्यं᳚ रोदसी र॒यिं मध्वो॒ वाज॑स्य सा॒तये᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} श्रवो॒ वसू᳚नि॒ सं जि॑तम्||{9/9}{6.7.29.4}{9.7.9}{9.1.7.9}{1481, 730, 7759} |
| [100] एतेसोमा इति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमो गायत्री | |
| ए॒ते सोमा᳚ अ॒भि प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम॑मक्षरन्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वर्ध᳚न्तो, अस्य वी॒र्य᳚म्||{1/9}{6.7.30.1}{9.8.1}{9.1.8.1}{1482, 731, 7760} |
| पु॒ना॒नास॑श्चमू॒षदो॒ गच्छ᳚न्तो वा॒युम॒श्विना᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} ते नो᳚ धान्तु सु॒वीर्य᳚म्||{2/9}{6.7.30.2}{9.8.2}{9.1.8.2}{1483, 731, 7761} |
| इन्द्र॑स्य सोम॒ राध॑से पुना॒नो हार्दि॑ चोदय|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} ऋ॒तस्य॒ योनि॑मा॒सद᳚म्||{3/9}{6.7.30.3}{9.8.3}{9.1.8.3}{1484, 731, 7762} |
| मृ॒जन्ति॑ त्वा॒ दश॒ क्षिपो᳚ हि॒न्वन्ति॑ स॒प्त धी॒तयः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अनु॒ विप्रा᳚ अमादिषुः||{4/9}{6.7.30.4}{9.8.4}{9.1.8.4}{1485, 731, 7763} |
| दे॒वेभ्य॑स्त्वा॒ मदा᳚य॒ कं सृ॑जा॒नमति॑ मे॒ष्यः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सं गोभि᳚र्वासयामसि||{5/9}{6.7.30.5}{9.8.5}{9.1.8.5}{1486, 731, 7764} |
| पु॒ना॒नः क॒लशे॒ष्वा वस्त्रा᳚ण्यरु॒षो हरिः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} परि॒ गव्या᳚न्यव्यत||{6/9}{6.7.31.1}{9.8.6}{9.1.8.6}{1487, 731, 7765} |
| म॒घोन॒ आ प॑वस्व नो ज॒हि विश्वा॒, अप॒ द्विषः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दो॒ सखा᳚य॒मा वि॑श||{7/9}{6.7.31.2}{9.8.7}{9.1.8.7}{1488, 731, 7766} |
| वृ॒ष्टिं दि॒वः परि॑ स्रव द्यु॒म्नं पृ॑थि॒व्या, अधि॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सहो᳚ नः सोम पृ॒त्सु धाः᳚||{8/9}{6.7.31.3}{9.8.8}{9.1.8.8}{1489, 731, 7767} |
| नृ॒चक्ष॑सं त्वा व॒यमिन्द्र॑पीतं स्व॒र्विद᳚म्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} भ॒क्षी॒महि॑ प्र॒जामिष᳚म्||{9/9}{6.7.31.4}{9.8.9}{9.1.8.9}{1490, 731, 7768} |
| [101] परिप्रियेति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमो गायत्री |
| परि॑ प्रि॒या दि॒वः क॒विर्वयां᳚सि न॒प्त्यो᳚र्हि॒तः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सु॒वा॒नो या᳚ति क॒विक्र॑तुः||{1/9}{6.7.32.1}{9.9.1}{9.1.9.1}{1491, 732, 7769} |
| प्रप्र॒ क्षया᳚य॒ पन्य॑से॒ जना᳚य॒ जुष्टो᳚ अ॒द्रुहे᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वी॒त्य॑र्ष॒ चनि॑ष्ठया||{2/9}{6.7.32.2}{9.9.2}{9.1.9.2}{1492, 732, 7770} |
| स सू॒नुर्मा॒तरा॒ शुचि॑र्जा॒तो जा॒ते, अ॑रोचयत्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} म॒हान् म॒ही, ऋ॑ता॒वृधा᳚||{3/9}{6.7.32.3}{9.9.3}{9.1.9.3}{1493, 732, 7771} |
| स स॒प्त धी॒तिभि᳚र्हि॒तो न॒द्यो᳚ अजिन्वद॒द्रुहः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} या, एक॒मक्षि॑ वावृ॒धुः||{4/9}{6.7.32.4}{9.9.4}{9.1.9.4}{1494, 732, 7772} |
| ता, अ॒भि सन्त॒मस्तृ॑तं म॒हे युवा᳚न॒मा द॑धुः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दु॑मिन्द्र॒ तव᳚ व्र॒ते||{5/9}{6.7.32.5}{9.9.5}{9.1.9.5}{1495, 732, 7773} |
| अ॒भि वह्नि॒रम॑र्त्यः स॒प्त प॑श्यति॒ वाव॑हिः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} क्रिवि॑र्दे॒वीर॑तर्पयत्||{6/9}{6.7.33.1}{9.9.6}{9.1.9.6}{1496, 732, 7774} |
| अवा॒ कल्पे᳚षु नः पुम॒स्तमां᳚सि सोम॒ योध्या᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} तानि॑ पुनान जङ्घनः||{7/9}{6.7.33.2}{9.9.7}{9.1.9.7}{1497, 732, 7775} |
| नू नव्य॑से॒ नवी᳚यसे सू॒क्ताय॑ साधया प॒थः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} प्र॒त्न॒वद्रो᳚चया॒ रुचः॑||{8/9}{6.7.33.3}{9.9.8}{9.1.9.8}{1498, 732, 7776} |
| पव॑मान॒ महि॒ श्रवो॒ गामश्वं᳚ रासि वी॒रव॑त्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सना᳚ मे॒धां सना॒ स्वः॑||{9/9}{6.7.33.4}{9.9.9}{9.1.9.9}{1499, 732, 7777} |
| [102] प्रस्वानास इति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री | |
| प्र स्वा॒नासो॒ रथा᳚ इ॒वार्व᳚न्तो॒ न श्र॑व॒स्यवः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमा᳚सो रा॒ये, अ॑क्रमुः||{1/9}{6.7.34.1}{9.10.1}{9.1.10.1}{1500, 733, 7778} |
| हि॒न्वा॒नासो॒ रथा᳚ इव दधन्वि॒रे गभ॑स्त्योः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} भरा᳚सः का॒रिणा᳚मिव||{2/9}{6.7.34.2}{9.10.2}{9.1.10.2}{1501, 733, 7779} |
| राजा᳚नो॒ न प्रश॑स्तिभिः॒ सोमा᳚सो॒ गोभि॑रञ्जते|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} य॒ज्ञो न स॒प्त धा॒तृभिः॑||{3/9}{6.7.34.3}{9.10.3}{9.1.10.3}{1502, 733, 7780} |
| परि॑ सुवा॒नास॒ इन्द॑वो॒ मदा᳚य ब॒र्हणा᳚ गि॒रा|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सु॒ता, अ॑र्षन्ति॒ धार॑या||{4/9}{6.7.34.4}{9.10.4}{9.1.10.4}{1503, 733, 7781} |
| आ॒पा॒नासो᳚ वि॒वस्व॑तो॒ जन᳚न्त उ॒षसो॒ भग᳚म्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सूरा॒, अण्वं॒ वि त᳚न्वते||{5/9}{6.7.34.5}{9.10.5}{9.1.10.5}{1504, 733, 7782} |
| अप॒ द्वारा᳚ मती॒नां प्र॒त्ना, ऋ᳚ण्वन्ति का॒रवः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वृष्णो॒ हर॑स आ॒यवः॑||{6/9}{6.7.35.1}{9.10.6}{9.1.10.6}{1505, 733, 7783} |
| स॒मी॒ची॒नास॑ आसते॒ होता᳚रः स॒प्तजा᳚मयः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} प॒दमेक॑स्य॒ पिप्र॑तः||{7/9}{6.7.35.2}{9.10.7}{9.1.10.7}{1506, 733, 7784} |
| नाभा॒ नाभिं᳚ न॒ आ द॑दे॒ चक्षु॑श्चि॒त् सूर्ये॒ सचा᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} क॒वेरप॑त्य॒मा दु॑हे||{8/9}{6.7.35.3}{9.10.8}{9.1.10.8}{1507, 733, 7785} |
| अ॒भि प्रि॒या दि॒वस्प॒दम॑ध्व॒र्युभि॒र्गुहा᳚ हि॒तम्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सूरः॑ पश्यति॒ चक्ष॑सा||{9/9}{6.7.35.4}{9.10.9}{9.1.10.9}{1508, 733, 7786} |
| [103] उपास्माइति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री | |
| उपा᳚स्मै गायता नरः॒ पव॑माना॒येन्द॑वे|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि दे॒वाँ, इय॑क्षते||{1/9}{6.7.36.1}{9.11.1}{9.1.11.1}{1509, 734, 7787} |
| अ॒भि ते॒ मधु॑ना॒ पयोऽथ᳚र्वाणो, अशिश्रयुः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} दे॒वं दे॒वाय॑ देव॒यु||{2/9}{6.7.36.2}{9.11.2}{9.1.11.2}{1510, 734, 7788} |
| स नः॑ पवस्व॒ शं गवे॒ शं जना᳚य॒ शमर्व॑ते|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} शं रा᳚ज॒न्नोष॑धीभ्यः||{3/9}{6.7.36.3}{9.11.3}{9.1.11.3}{1511, 734, 7789} |
| ब॒भ्रवे॒ नु स्वत॑वसेऽरु॒णाय॑ दिवि॒स्पृशे᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमा᳚य गा॒थम॑र्चत||{4/9}{6.7.36.4}{9.11.4}{9.1.11.4}{1512, 734, 7790} |
| हस्त॑च्युतेभि॒रद्रि॑भिः सु॒तं सोमं᳚ पुनीतन|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} मधा॒वा धा᳚वता॒ मधु॑||{5/9}{6.7.36.5}{9.11.5}{9.1.11.5}{1513, 734, 7791} |
| नम॒सेदुप॑ सीदत द॒ध्नेद॒भि श्री᳚णीतन|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दु॒मिन्द्रे᳚ दधातन||{6/9}{6.7.37.1}{9.11.6}{9.1.11.6}{1514, 734, 7792} |
| अ॒मि॒त्र॒हा विच॑र्षणिः॒ पव॑स्व सोम॒ शं गवे᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} दे॒वेभ्यो᳚ अनुकाम॒कृत्||{7/9}{6.7.37.2}{9.11.7}{9.1.11.7}{1515, 734, 7793} |
| इन्द्रा᳚य सोम॒ पात॑वे॒ मदा᳚य॒ परि॑ षिच्यसे|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} म॒न॒श्चिन्मन॑स॒स्पतिः॑||{8/9}{6.7.37.3}{9.11.8}{9.1.11.8}{1516, 734, 7794} |
| पव॑मान सु॒वीर्यं᳚ र॒यिं सो᳚म रिरीहि नः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द॒विन्द्रे᳚ण नो यु॒जा||{9/9}{6.7.37.4}{9.11.9}{9.1.11.9}{1517, 734, 7795} |
| [104] सोमाअसृग्रमिति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितःपवमान सोमो गायत्री | |
| सोमा᳚ असृग्र॒मिन्द॑वः सु॒ता, ऋ॒तस्य॒ साद॑ने|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द्रा᳚य॒ मधु॑मत्तमाः||{1/9}{6.7.38.1}{9.12.1}{9.1.12.1}{1518, 735, 7796} |
| अ॒भि विप्रा᳚ अनूषत॒ गावो᳚ व॒त्सं न मा॒तरः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये᳚||{2/9}{6.7.38.2}{9.12.2}{9.1.12.2}{1519, 735, 7797} |
| म॒द॒च्युत्क्षे᳚ति॒ साद॑ने॒ सिन्धो᳚रू॒र्मा वि॑प॒श्चित्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमो᳚ गौ॒री, अधि॑ श्रि॒तः||{3/9}{6.7.38.3}{9.12.3}{9.1.12.3}{1520, 735, 7798} |
| दि॒वो नाभा᳚ विचक्ष॒णोऽव्यो॒ वारे᳚ महीयते|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमो॒ यः सु॒क्रतुः॑ क॒विः||{4/9}{6.7.38.4}{9.12.4}{9.1.12.4}{1521, 735, 7799} |
| यः सोमः॑ क॒लशे॒ष्वाँ, अ॒न्तः प॒वित्र॒ आहि॑तः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} तमिन्दुः॒ परि॑ षस्वजे||{5/9}{6.7.38.5}{9.12.5}{9.1.12.5}{1522, 735, 7800} |
| प्र वाच॒मिन्दु॑रिष्यति समु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टपि॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} जिन्व॒न् कोशं᳚ मधु॒श्चुत᳚म्||{6/9}{6.7.39.1}{9.12.6}{9.1.12.6}{1523, 735, 7801} |
| नित्य॑स्तोत्रो॒ वन॒स्पति॑र्धी॒नाम॒न्तः स॑ब॒र्दुघः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} हि॒न्वा॒नो मानु॑षा यु॒गा||{7/9}{6.7.39.2}{9.12.7}{9.1.12.7}{1524, 735, 7802} |
| अ॒भि प्रि॒या दि॒वस्प॒दा सोमो᳚ हिन्वा॒नो, अ॑र्षति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} विप्र॑स्य॒ धार॑या क॒विः||{8/9}{6.7.39.3}{9.12.8}{9.1.12.8}{1525, 735, 7803} |
| आ प॑वमान धारय र॒यिं स॒हस्र॑वर्चसम्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒स्मे, इ᳚न्दो स्वा॒भुव᳚म्||{9/9}{6.7.39.4}{9.12.9}{9.1.12.9}{1526, 735, 7804} |
| [105] सोमः पुनानइति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोऽसितः पवमान सोमो गायत्री | (पवमान पारायण द्वितीयोध्यायः) |
| सोमः॑ पुना॒नो, अ॑र्षति स॒हस्र॑धारो॒, अत्य॑विः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वा॒योरिन्द्र॑स्य निष्कृ॒तम्||{1/9}{6.8.1.1}{9.13.1}{9.1.13.1}{1527, 736, 7805} |
| पव॑मानमवस्यवो॒ विप्र॑म॒भि प्र गा᳚यत|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सु॒ष्वा॒णं दे॒ववी᳚तये||{2/9}{6.8.1.2}{9.13.2}{9.1.13.2}{1528, 736, 7806} |
| पव᳚न्ते॒ वाज॑सातये॒ सोमाः᳚ स॒हस्र॑पाजसः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} गृ॒णा॒ना दे॒ववी᳚तये||{3/9}{6.8.1.3}{9.13.3}{9.1.13.3}{1529, 736, 7807} |
| उ॒त नो॒ वाज॑सातये॒ पव॑स्व बृह॒तीरिषः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} द्यु॒मदि᳚न्दो सु॒वीर्य᳚म्||{4/9}{6.8.1.4}{9.13.4}{9.1.13.4}{1530, 736, 7808} |
| ते नः॑ सह॒स्रिणं᳚ र॒यिं पव᳚न्ता॒मा सु॒वीर्य᳚म्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सु॒वा॒ना दे॒वास॒ इन्द॑वः||{5/9}{6.8.1.5}{9.13.5}{9.1.13.5}{1531, 736, 7809} |
| अत्या᳚ हिया॒ना न हे॒तृभि॒रसृ॑ग्रं॒ वाज॑सातये|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वि वार॒मव्य॑मा॒शवः॑||{6/9}{6.8.2.1}{9.13.6}{9.1.13.6}{1532, 736, 7810} |
| वा॒श्रा, अ॑र्ष॒न्तीन्द॑वो॒ऽभि व॒त्सं न धे॒नवः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} द॒ध॒न्वि॒रे गभ॑स्त्योः||{7/9}{6.8.2.2}{9.13.7}{9.1.13.7}{1533, 736, 7811} |
| जुष्ट॒ इन्द्रा᳚य मत्स॒रः पव॑मान॒ कनि॑क्रदत्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} विश्वा॒, अप॒ द्विषो᳚ जहि||{8/9}{6.8.2.3}{9.13.8}{9.1.13.8}{1534, 736, 7812} |
| अ॒प॒घ्नन्तो॒, अरा᳚व्णः॒ पव॑मानाः स्व॒र्दृशः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} योना᳚वृ॒तस्य॑ सीदत||{9/9}{6.8.2.4}{9.13.9}{9.1.13.9}{1535, 736, 7813} |
| [106] परिप्रेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमो गायत्री | |
| परि॒ प्रासि॑ष्यदत् क॒विः सिन्धो᳚रू॒र्मावधि॑ श्रि॒तः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} का॒रं बिभ्र॑त् पुरु॒स्पृह᳚म्||{1/8}{6.8.3.1}{9.14.1}{9.1.14.1}{1536, 737, 7814} |
| गि॒रा यदी॒ सब᳚न्धवः॒ पञ्च॒ व्राता᳚ अप॒स्यवः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} प॒रि॒ष्कृ॒ण्वन्ति॑ धर्ण॒सिम्||{2/8}{6.8.3.2}{9.14.2}{9.1.14.2}{1537, 737, 7815} |
| आद॑स्य शु॒ष्मिणो॒ रसे॒ विश्वे᳚ दे॒वा, अ॑मत्सत|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} यदी॒ गोभि᳚र्वसा॒यते᳚||{3/8}{6.8.3.3}{9.14.3}{9.1.14.3}{1538, 737, 7816} |
| नि॒रि॒णा॒नो वि धा᳚वति॒ जह॒च्छर्या᳚णि॒ तान्वा᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अत्रा॒ सं जि॑घ्रते यु॒जा||{4/8}{6.8.3.4}{9.14.4}{9.1.14.4}{1539, 737, 7817} |
| न॒प्तीभि॒र्यो वि॒वस्व॑तः शु॒भ्रो न मा᳚मृ॒जे युवा᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} गाः कृ᳚ण्वा॒नो न नि॒र्णिज᳚म्||{5/8}{6.8.3.5}{9.14.5}{9.1.14.5}{1540, 737, 7818} |
| अति॑ श्रि॒ती ति॑र॒श्चता᳚ ग॒व्या जि॑गा॒त्यण्व्या᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} व॒ग्नुमि॑यर्ति॒ यं वि॒दे||{6/8}{6.8.4.1}{9.14.6}{9.1.14.6}{1541, 737, 7819} |
| अ॒भि क्षिपः॒ सम॑ग्मत म॒र्जय᳚न्तीरि॒षस्पति᳚म्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} पृ॒ष्ठा गृ॑भ्णत वा॒जिनः॑||{7/8}{6.8.4.2}{9.14.7}{9.1.14.7}{1542, 737, 7820} |
| परि॑ दि॒व्यानि॒ मर्मृ॑श॒द् विश्वा᳚नि सोम॒ पार्थि॑वा|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वसू᳚नि याह्यस्म॒युः||{8/8}{6.8.4.3}{9.14.8}{9.1.14.8}{1543, 737, 7821} |
| [107] एषधियेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमोगायत्री | |
| ए॒ष धि॒या या॒त्यण्व्या॒ शूरो॒ रथे᳚भिरा॒शुभिः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} गच्छ॒न्निन्द्र॑स्य निष्कृ॒तम्||{1/8}{6.8.5.1}{9.15.1}{9.1.15.1}{1544, 738, 7822} |
| ए॒ष पु॒रू धि॑यायते बृह॒ते दे॒वता᳚तये|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} यत्रा॒मृता᳚स॒ आस॑ते||{2/8}{6.8.5.2}{9.15.2}{9.1.15.2}{1545, 738, 7823} |
| ए॒ष हि॒तो वि नी᳚यते॒ऽन्तः शु॒भ्राव॑ता प॒था|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} यदी᳚ तु॒ञ्जन्ति॒ भूर्ण॑यः||{3/8}{6.8.5.3}{9.15.3}{9.1.15.3}{1546, 738, 7824} |
| ए॒ष शृङ्गा᳚णि॒ दोधु॑व॒च्छिशी᳚ते यू॒थ्यो॒३॑(ओ॒) वृषा᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} नृ॒म्णा दधा᳚न॒ ओज॑सा||{4/8}{6.8.5.4}{9.15.4}{9.1.15.4}{1547, 738, 7825} |
| ए॒ष रु॒क्मिभि॑रीयते वा॒जी शु॒भ्रेभि॑रं॒शुभिः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} पतिः॒ सिन्धू᳚नां॒ भव॑न्||{5/8}{6.8.5.5}{9.15.5}{9.1.15.5}{1548, 738, 7826} |
| ए॒ष वसू᳚नि पिब्द॒ना परु॑षा ययि॒वाँ, अति॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अव॒ शादे᳚षु गच्छति||{6/8}{6.8.5.6}{9.15.6}{9.1.15.6}{1549, 738, 7827} |
| ए॒तं मृ॑जन्ति॒ मर्ज्य॒मुप॒ द्रोणे᳚ष्वा॒यवः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} प्र॒च॒क्रा॒णं म॒हीरिषः॑||{7/8}{6.8.5.7}{9.15.7}{9.1.15.7}{1550, 738, 7828} |
| ए॒तमु॒ त्यं दश॒ क्षिपो᳚ मृ॒जन्ति॑ स॒प्त धी॒तयः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} स्वा॒यु॒धं म॒दिन्त॑मम्||{8/8}{6.8.5.8}{9.15.8}{9.1.15.8}{1551, 738, 7829} |
| [108] प्रतेसोतारइत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री | |
| प्र ते᳚ सो॒तार॑ ओ॒ण्यो॒३॑(ओ॒) रसं॒ मदा᳚य॒ घृष्व॑ये|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सर्गो॒ न त॒क्त्येत॑शः||{1/8}{6.8.6.1}{9.16.1}{9.1.16.1}{1552, 739, 7830} |
| क्रत्वा॒ दक्ष॑स्य र॒थ्य॑म॒पो वसा᳚न॒मन्ध॑सा|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} गो॒षामण्वे᳚षु सश्चिम||{2/8}{6.8.6.2}{9.16.2}{9.1.16.2}{1553, 739, 7831} |
| अन॑प्तम॒प्सु दु॒ष्टरं॒ सोमं᳚ प॒वित्र॒ आ सृ॑ज|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} पु॒नी॒हीन्द्रा᳚य॒ पात॑वे||{3/8}{6.8.6.3}{9.16.3}{9.1.16.3}{1554, 739, 7832} |
| प्र पु॑ना॒नस्य॒ चेत॑सा॒ सोमः॑ प॒वित्रे᳚ अर्षति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} क्रत्वा᳚ स॒धस्थ॒मास॑दत्||{4/8}{6.8.6.4}{9.16.4}{9.1.16.4}{1555, 739, 7833} |
| प्र त्वा॒ नमो᳚भि॒रिन्द॑व॒ इन्द्र॒ सोमा᳚ असृक्षत|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} म॒हे भरा᳚य का॒रिणः॑||{5/8}{6.8.6.5}{9.16.5}{9.1.16.5}{1556, 739, 7834} |
| पु॒ना॒नो रू॒पे, अ॒व्यये॒ विश्वा॒, अर्ष᳚न्न॒भि श्रियः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} शूरो॒ न गोषु॑ तिष्ठति||{6/8}{6.8.6.6}{9.16.6}{9.1.16.6}{1557, 739, 7835} |
| दि॒वो न सानु॑ पि॒प्युषी॒ धारा᳚ सु॒तस्य॑ वे॒धसः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वृथा᳚ प॒वित्रे᳚ अर्षति||{7/8}{6.8.6.7}{9.16.7}{9.1.16.7}{1558, 739, 7836} |
| त्वं सो᳚म विप॒श्चितं॒ तना᳚ पुना॒न आ॒युषु॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अव्यो॒ वारं॒ वि धा᳚वसि||{8/8}{6.8.6.8}{9.16.8}{9.1.16.8}{1559, 739, 7837} |
| [109] प्रनिम्नेनेवेत्य ष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री | |
| प्र नि॒म्नेने᳚व॒ सिन्ध॑वो॒ घ्नन्तो᳚ वृ॒त्राणि॒ भूर्ण॑यः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमा᳚ असृग्रमा॒शवः॑||{1/8}{6.8.7.1}{9.17.1}{9.1.17.1}{1560, 740, 7838} |
| अ॒भि सु॑वा॒नास॒ इन्द॑वो वृ॒ष्टयः॑ पृथि॒वीमि॑व|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द्रं॒ सोमा᳚सो, अक्षरन्||{2/8}{6.8.7.2}{9.17.2}{9.1.17.2}{1561, 740, 7839} |
| अत्यू᳚र्मिर्मत्स॒रो मदः॒ सोमः॑ प॒वित्रे᳚ अर्षति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वि॒घ्नन्रक्षां᳚सि देव॒युः||{3/8}{6.8.7.3}{9.17.3}{9.1.17.3}{1562, 740, 7840} |
| आ क॒लशे᳚षु धावति प॒वित्रे॒ परि॑ षिच्यते|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} उ॒क्थैर्य॒ज्ञेषु॑ वर्धते||{4/8}{6.8.7.4}{9.17.4}{9.1.17.4}{1563, 740, 7841} |
| अति॒ त्री सो᳚म रोच॒ना रोह॒न्न भ्रा᳚जसे॒ दिव᳚म्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इ॒ष्णन् त्सूर्यं॒ न चो᳚दयः||{5/8}{6.8.7.5}{9.17.5}{9.1.17.5}{1564, 740, 7842} |
| अ॒भि विप्रा᳚ अनूषत मू॒र्धन् य॒ज्ञस्य॑ का॒रवः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} दधा᳚ना॒श्चक्ष॑सि प्रि॒यम्||{6/8}{6.8.7.6}{9.17.6}{9.1.17.6}{1565, 740, 7843} |
| तमु॑ त्वा वा॒जिनं॒ नरो᳚ धी॒भिर्विप्रा᳚ अव॒स्यवः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} मृ॒जन्ति॑ दे॒वता᳚तये||{7/8}{6.8.7.7}{9.17.7}{9.1.17.7}{1566, 740, 7844} |
| मधो॒र्धारा॒मनु॑ क्षर ती॒व्रः स॒धस्थ॒मास॑दः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} चारु᳚रृ॒ताय॑ पी॒तये᳚||{8/8}{6.8.7.8}{9.17.8}{9.1.17.8}{1567, 740, 7845} |
| [110] परिसुवानइति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री | |
| परि॑ सुवा॒नो गि॑रि॒ष्ठाः प॒वित्रे॒ सोमो᳚ अक्षाः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} मदे᳚षु सर्व॒धा, अ॑सि||{1/7}{6.8.8.1}{9.18.1}{9.1.18.1}{1568, 741, 7846} |
| त्वं विप्र॒स्त्वं क॒विर्मधु॒ प्र जा॒तमन्ध॑सः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} मदे᳚षु सर्व॒धा, अ॑सि||{2/7}{6.8.8.2}{9.18.2}{9.1.18.2}{1569, 741, 7847} |
| तव॒ विश्वे᳚ स॒जोष॑सो दे॒वासः॑ पी॒तिमा᳚शत|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} मदे᳚षु सर्व॒धा, अ॑सि||{3/7}{6.8.8.3}{9.18.3}{9.1.18.3}{1570, 741, 7848} |
| आ यो विश्वा᳚नि॒ वार्या॒ वसू᳚नि॒ हस्त॑योर्द॒धे|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} मदे᳚षु सर्व॒धा, अ॑सि||{4/7}{6.8.8.4}{9.18.4}{9.1.18.4}{1571, 741, 7849} |
| य इ॒मे रोद॑सी म॒ही सं मा॒तरे᳚व॒ दोह॑ते|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} मदे᳚षु सर्व॒धा, अ॑सि||{5/7}{6.8.8.5}{9.18.5}{9.1.18.5}{1572, 741, 7850} |
| परि॒ यो रोद॑सी, उ॒भे स॒द्यो वाजे᳚भि॒रर्ष॑ति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} मदे᳚षु सर्व॒धा, अ॑सि||{6/7}{6.8.8.6}{9.18.6}{9.1.18.6}{1573, 741, 7851} |
| स शु॒ष्मी क॒लशे॒ष्वा पु॑ना॒नो, अ॑चिक्रदत्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} मदे᳚षु सर्व॒धा, अ॑सि||{7/7}{6.8.8.7}{9.18.7}{9.1.18.7}{1574, 741, 7852} |
| [111] यत्सोमेति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितःपवमा नसोमो गायत्री | |
| यत् सो᳚म चि॒त्रमु॒क्थ्यं᳚ दि॒व्यं पार्थि॑वं॒ वसु॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} तन्नः॑ पुना॒न आ भ॑र||{1/7}{6.8.9.1}{9.19.1}{9.1.19.1}{1575, 742, 7853} |
| यु॒वं हि स्थः स्व॑र्पती॒, इन्द्र॑श्च सोम॒ गोप॑ती|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} ई॒शा॒ना पि॑प्यतं॒ धियः॑||{2/7}{6.8.9.2}{9.19.2}{9.1.19.2}{1576, 742, 7854} |
| वृषा᳚ पुना॒न आ॒युषु॑ स्त॒नय॒न्नधि॑ ब॒र्हिषि॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} हरिः॒ सन्योनि॒मास॑दत्||{3/7}{6.8.9.3}{9.19.3}{9.1.19.3}{1577, 742, 7855} |
| अवा᳚वशन्त धी॒तयो᳚ वृष॒भस्याधि॒ रेत॑सि|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सू॒नोर्व॒त्सस्य॑ मा॒तरः॑||{4/7}{6.8.9.4}{9.19.4}{9.1.19.4}{1578, 742, 7856} |
| कु॒विद् वृ॑ष॒ण्यन्ती᳚भ्यः पुना॒नो गर्भ॑मा॒दध॑त्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} याः शु॒क्रं दु॑ह॒ते पयः॑||{5/7}{6.8.9.5}{9.19.5}{9.1.19.5}{1579, 742, 7857} |
| उप॑ शिक्षापत॒स्थुषो᳚ भि॒यस॒मा धे᳚हि॒ शत्रु॑षु|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑मान वि॒दा र॒यिम्||{6/7}{6.8.9.6}{9.19.6}{9.1.19.6}{1580, 742, 7858} |
| नि शत्रोः᳚ सोम॒ वृष्ण्यं॒ नि शुष्मं॒ नि वय॑स्तिर|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} दू॒रे वा᳚ स॒तो, अन्ति॑ वा||{7/7}{6.8.9.7}{9.19.7}{9.1.19.7}{1581, 742, 7859} |
| [112] प्रकविरिति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री | |
| प्र क॒विर्दे॒ववी᳚त॒येऽव्यो॒ वारे᳚भिरर्षति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सा॒ह्वान् विश्वा᳚ अ॒भि स्पृधः॑||{1/7}{6.8.10.1}{9.20.1}{9.1.20.1}{1582, 743, 7860} |
| स हि ष्मा᳚ जरि॒तृभ्य॒ आ वाजं॒ गोम᳚न्त॒मिन्व॑ति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑मानः सह॒स्रिण᳚म्||{2/7}{6.8.10.2}{9.20.2}{9.1.20.2}{1583, 743, 7861} |
| परि॒ विश्वा᳚नि॒ चेत॑सा मृ॒शसे॒ पव॑से म॒ती|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} स नः॑ सोम॒ श्रवो᳚ विदः||{3/7}{6.8.10.3}{9.20.3}{9.1.20.3}{1584, 743, 7862} |
| अ॒भ्य॑र्ष बृ॒हद् यशो᳚ म॒घव॑द्भ्यो ध्रु॒वं र॒यिम्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इषं᳚ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र||{4/7}{6.8.10.4}{9.20.4}{9.1.20.4}{1585, 743, 7863} |
| त्वं राजे᳚व सुव्र॒तो गिरः॑ सो॒मा वि॑वेशिथ|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} पु॒ना॒नो व᳚ह्ने, अद्भुत||{5/7}{6.8.10.5}{9.20.5}{9.1.20.5}{1586, 743, 7864} |
| स वह्नि॑र॒प्सु दु॒ष्टरो᳚ मृ॒ज्यमा᳚नो॒ गभ॑स्त्योः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोम॑श्च॒मूषु॑ सीदति||{6/7}{6.8.10.6}{9.20.6}{9.1.20.6}{1587, 743, 7865} |
| क्री॒ळुर्म॒खो न मं᳚ह॒युः प॒वित्रं᳚ सोम गच्छसि|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} दध॑त् स्तो॒त्रे सु॒वीर्य᳚म्||{7/7}{6.8.10.7}{9.20.7}{9.1.20.7}{1588, 743, 7866} |
| [113] एतेधावंतीति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री | |
| ए॒ते धा᳚व॒न्तीन्द॑वः॒ सोमा॒, इन्द्रा᳚य॒ घृष्व॑यः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} म॒त्स॒रासः॑ स्व॒र्विदः॑||{1/7}{6.8.11.1}{9.21.1}{9.1.21.1}{1589, 744, 7867} |
| प्र॒वृ॒ण्वन्तो᳚ अभि॒युजः॒ सुष्व॑ये वरिवो॒विदः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} स्व॒यं स्तो॒त्रे व॑य॒स्कृतः॑||{2/7}{6.8.11.2}{9.21.2}{9.1.21.2}{1590, 744, 7868} |
| वृथा॒ क्रीळ᳚न्त॒ इन्द॑वः स॒धस्थ॑म॒भ्येक॒मित्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सिन्धो᳚रू॒र्मा व्य॑क्षरन्||{3/7}{6.8.11.3}{9.21.3}{9.1.21.3}{1591, 744, 7869} |
| ए॒ते विश्वा᳚नि॒ वार्या॒ पव॑मानास आशत|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} हि॒ता न सप्त॑यो॒ रथे᳚||{4/7}{6.8.11.4}{9.21.4}{9.1.21.4}{1592, 744, 7870} |
| आस्मि᳚न् पि॒शङ्ग॑मिन्दवो॒ दधा᳚ता वे॒नमा॒दिशे᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} यो, अ॒स्मभ्य॒मरा᳚वा||{5/7}{6.8.11.5}{9.21.5}{9.1.21.5}{1593, 744, 7871} |
| ऋ॒भुर्न रथ्यं॒ नवं॒ दधा᳚ता॒ केत॑मा॒दिशे᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} शु॒क्राः प॑वध्व॒मर्ण॑सा||{6/7}{6.8.11.6}{9.21.6}{9.1.21.6}{1594, 744, 7872} |
| ए॒त उ॒ त्ये, अ॑वीवश॒न् काष्ठां᳚ वा॒जिनो᳚ अक्रत|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} स॒तः प्रासा᳚विषुर्म॒तिम्||{7/7}{6.8.11.7}{9.21.7}{9.1.21.7}{1595, 744, 7873} |
| [114] एतेसोमासइति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितःपवमानसोमोगायत्री | |
| ए॒ते सोमा᳚स आ॒शवो॒ रथा᳚ इव॒ प्र वा॒जिनः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सर्गाः᳚ सृ॒ष्टा, अ॑हेषत||{1/7}{6.8.12.1}{9.22.1}{9.1.22.1}{1596, 745, 7874} |
| ए॒ते वाता᳚ इवो॒रवः॑ प॒र्जन्य॑स्येव वृ॒ष्टयः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒ग्नेरि॑व भ्र॒मा वृथा᳚||{2/7}{6.8.12.2}{9.22.2}{9.1.22.2}{1597, 745, 7875} |
| ए॒ते पू॒ता वि॑प॒श्चितः॒ सोमा᳚सो॒ दध्या᳚शिरः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} वि॒पा व्या᳚नशु॒र्धियः॑||{3/7}{6.8.12.3}{9.22.3}{9.1.22.3}{1598, 745, 7876} |
| ए॒ते मृ॒ष्टा, अम॑र्त्याः ससृ॒वांसो॒ न श॑श्रमुः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इय॑क्षन्तः प॒थो रजः॑||{4/7}{6.8.12.4}{9.22.4}{9.1.22.4}{1599, 745, 7877} |
| ए॒ते पृ॒ष्ठानि॒ रोद॑सोर्विप्र॒यन्तो॒ व्या᳚नशुः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} उ॒तेदमु॑त्त॒मं रजः॑||{5/7}{6.8.12.5}{9.22.5}{9.1.22.5}{1600, 745, 7878} |
| तन्तुं᳚ तन्वा॒नमु॑त्त॒ममनु॑ प्र॒वत॑ आशत|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} उ॒तेदमु॑त्त॒माय्य᳚म्||{6/7}{6.8.12.6}{9.22.6}{9.1.22.6}{1601, 745, 7879} |
| त्वं सो᳚म प॒णिभ्य॒ आ वसु॒ गव्या᳚नि धारयः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} त॒तं तन्तु॑मचिक्रदः||{7/7}{6.8.12.7}{9.22.7}{9.1.22.7}{1602, 745, 7880} |
| [115] सोमा असृग्रमिति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमोगायत्री | |
| सोमा᳚ असृग्रमा॒शवो॒ मधो॒र्मद॑स्य॒ धार॑या|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि विश्वा᳚नि॒ काव्या᳚||{1/7}{6.8.13.1}{9.23.1}{9.1.23.1}{1603, 746, 7881} |
| अनु॑ प्र॒त्नास॑ आ॒यवः॑ प॒दं नवी᳚यो, अक्रमुः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} रु॒चे ज॑नन्त॒ सूर्य᳚म्||{2/7}{6.8.13.2}{9.23.2}{9.1.23.2}{1604, 746, 7882} |
| आ प॑वमान नो भरा॒र्यो, अदा᳚शुषो॒ गय᳚म्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} कृ॒धि प्र॒जाव॑ती॒रिषः॑||{3/7}{6.8.13.3}{9.23.3}{9.1.23.3}{1605, 746, 7883} |
| अ॒भि सोमा᳚स आ॒यवः॒ पव᳚न्ते॒ मद्यं॒ मद᳚म्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि कोशं᳚ मधु॒श्चुत᳚म्||{4/7}{6.8.13.4}{9.23.4}{9.1.23.4}{1606, 746, 7884} |
| सोमो᳚ अर्षति धर्ण॒सिर्दधा᳚न इन्द्रि॒यं रस᳚म्|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सु॒वीरो᳚ अभिशस्ति॒पाः||{5/7}{6.8.13.5}{9.23.5}{9.1.23.5}{1607, 746, 7885} |
| इन्द्रा᳚य सोम पवसे दे॒वेभ्यः॑ सध॒माद्यः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दो॒ वाजं᳚ सिषाससि||{6/7}{6.8.13.6}{9.23.6}{9.1.23.6}{1608, 746, 7886} |
| अ॒स्य पी॒त्वा मदा᳚ना॒मिन्द्रो᳚ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ति|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} ज॒घान॑ ज॒घन॑च्च॒ नु||{7/7}{6.8.13.7}{9.23.7}{9.1.23.7}{1609, 746, 7887} |
| [116] प्रसोमासइति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री | |
| प्र सोमा᳚सो, अधन्विषुः॒ पव॑मानास॒ इन्द॑वः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} श्री॒णा॒ना, अ॒प्सु मृ᳚ञ्जत||{1/7}{6.8.14.1}{9.24.1}{9.1.24.1}{1610, 747, 7888} |
| अ॒भि गावो᳚ अधन्विषु॒रापो॒ न प्र॒वता᳚ य॒तीः|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} पु॒ना॒ना, इन्द्र॑माशत||{2/7}{6.8.14.2}{9.24.2}{9.1.24.2}{1611, 747, 7889} |
| प्र प॑वमान धन्वसि॒ सोमेन्द्रा᳚य॒ पात॑वे|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} नृभि᳚र्य॒तो वि नी᳚यसे||{3/7}{6.8.14.3}{9.24.3}{9.1.24.3}{1612, 747, 7890} |
| त्वं सो᳚म नृ॒माद॑नः॒ पव॑स्व चर्षणी॒सहे᳚|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} सस्नि॒र्यो, अ॑नु॒माद्यः॑||{4/7}{6.8.14.4}{9.24.4}{9.1.24.4}{1613, 747, 7891} |
| इन्दो॒ यदद्रि॑भिः सु॒तः प॒वित्रं᳚ परि॒धाव॑सि|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} अर॒मिन्द्र॑स्य॒ धाम्ने᳚||{5/7}{6.8.14.5}{9.24.5}{9.1.24.5}{1614, 747, 7892} |
| पव॑स्व वृत्रहन्तमो॒क्थेभि॑रनु॒माद्यः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} शुचिः॑ पाव॒को, अद्भु॑तः||{6/7}{6.8.14.6}{9.24.6}{9.1.24.6}{1615, 747, 7893} |
| शुचिः॑ पाव॒क उ॑च्यते॒ सोमः॑ सु॒तस्य॒ मध्वः॑|{काश्यपोसितः | पवमानः सोमः | गायत्री} दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा||{7/7}{6.8.14.7}{9.24.7}{9.1.24.7}{1616, 747, 7894} |
| [117] पवस्वेति षडृचस्य सूक्तस्यागस्त्योदृळ्हच्युतः पवमान सोमोगायत्री | |
| पव॑स्व दक्ष॒साध॑नो दे॒वेभ्यः॑ पी॒तये᳚ हरे|{अगस्त्यो दृळहच्युतः | पवमानः सोमः | गायत्री} म॒रुद्भ्यो᳚ वा॒यवे॒ मदः॑||{1/6}{6.8.15.1}{9.25.1}{9.2.1.1}{1617, 748, 7895} |
| पव॑मान धि॒या हि॒तो॒३॑(ओ॒)ऽभि योनिं॒ कनि॑क्रदत्|{अगस्त्यो दृळहच्युतः | पवमानः सोमः | गायत्री} धर्म॑णा वा॒युमा वि॑श||{2/6}{6.8.15.2}{9.25.2}{9.2.1.2}{1618, 748, 7896} |
| सं दे॒वैः शो᳚भते॒ वृषा᳚ क॒विर्योना॒वधि॑ प्रि॒यः|{अगस्त्यो दृळहच्युतः | पवमानः सोमः | गायत्री} वृ॒त्र॒हा दे᳚व॒वीत॑मः||{3/6}{6.8.15.3}{9.25.3}{9.2.1.3}{1619, 748, 7897} |
| विश्वा᳚ रू॒पाण्या᳚वि॒शन् पु॑ना॒नो या᳚ति हर्य॒तः|{अगस्त्यो दृळहच्युतः | पवमानः सोमः | गायत्री} यत्रा॒मृता᳚स॒ आस॑ते||{4/6}{6.8.15.4}{9.25.4}{9.2.1.4}{1620, 748, 7898} |
| अ॒रु॒षो ज॒नय॒न् गिरः॒ सोमः॑ पवत आयु॒षक्|{अगस्त्यो दृळहच्युतः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द्रं॒ गच्छ᳚न् क॒विक्र॑तुः||{5/6}{6.8.15.5}{9.25.5}{9.2.1.5}{1621, 748, 7899} |
| आ प॑वस्व मदिन्तम प॒वित्रं॒ धार॑या कवे|{अगस्त्यो दृळहच्युतः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒र्कस्य॒ योनि॑मा॒सद᳚म्||{6/6}{6.8.15.6}{9.25.6}{9.2.1.6}{1622, 748, 7900} |
| [118] तममृक्षंतेति षडृचस्य सूक्तस्य दार्डच्युतइध्मवाहः पवमान सोमोगायत्री | |
| तम॑मृक्षन्त वा॒जिन॑मु॒पस्थे॒, अदि॑ते॒रधि॑|{दार्डच्युतइध्मवाहः | पवमानः सोमः | गायत्री} विप्रा᳚सो॒, अण्व्या᳚ धि॒या||{1/6}{6.8.16.1}{9.26.1}{9.2.2.1}{1623, 749, 7901} |
| तं गावो᳚ अ॒भ्य॑नूषत स॒हस्र॑धार॒मक्षि॑तम्|{दार्डच्युतइध्मवाहः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दुं᳚ ध॒र्तार॒मा दि॒वः||{2/6}{6.8.16.2}{9.26.2}{9.2.2.2}{1624, 749, 7902} |
| तं वे॒धां मे॒धया᳚ह्य॒न् पव॑मान॒मधि॒ द्यवि॑|{दार्डच्युतइध्मवाहः | पवमानः सोमः | गायत्री} ध॒र्ण॒सिं भूरि॑धायसम्||{3/6}{6.8.16.3}{9.26.3}{9.2.2.3}{1625, 749, 7903} |
| तम॑ह्यन् भु॒रिजो᳚र्धि॒या सं॒वसा᳚नं वि॒वस्व॑तः|{दार्डच्युतइध्मवाहः | पवमानः सोमः | गायत्री} पतिं᳚ वा॒चो, अदा᳚भ्यम्||{4/6}{6.8.16.4}{9.26.4}{9.2.2.4}{1626, 749, 7904} |
| तं साना॒वधि॑ जा॒मयो॒ हरिं᳚ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|{दार्डच्युतइध्मवाहः | पवमानः सोमः | गायत्री} ह॒र्य॒तं भूरि॑चक्षसम्||{5/6}{6.8.16.5}{9.26.5}{9.2.2.5}{1627, 749, 7905} |
| तं त्वा᳚ हिन्वन्ति वे॒धसः॒ पव॑मान गिरा॒वृध᳚म्|{दार्डच्युतइध्मवाहः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द॒विन्द्रा᳚य मत्स॒रम्||{6/6}{6.8.16.6}{9.26.6}{9.2.2.6}{1628, 749, 7906} |
| [119] एषकविरिति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसो नृमेधः पवमान सोमो गायत्री | |
| ए॒ष क॒विर॒भिष्टु॑तः प॒वित्रे॒, अधि॑ तोशते|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} पु॒ना॒नो घ्नन्नप॒ स्रिधः॑||{1/6}{6.8.17.1}{9.27.1}{9.2.3.1}{1629, 750, 7907} |
| ए॒ष इन्द्रा᳚य वा॒यवे᳚ स्व॒र्जित् परि॑ षिच्यते|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} प॒वित्रे᳚ दक्ष॒साध॑नः||{2/6}{6.8.17.2}{9.27.2}{9.2.3.2}{1630, 750, 7908} |
| ए॒ष नृभि॒र्वि नी᳚यते दि॒वो मू॒र्धा वृषा᳚ सु॒तः|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमो॒ वने᳚षु विश्व॒वित्||{3/6}{6.8.17.3}{9.27.3}{9.2.3.3}{1631, 750, 7909} |
| ए॒ष ग॒व्युर॑चिक्रद॒त् पव॑मानो हिरण्य॒युः|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दुः॑ सत्रा॒जिदस्तृ॑तः||{4/6}{6.8.17.4}{9.27.4}{9.2.3.4}{1632, 750, 7910} |
| ए॒ष सूर्ये᳚ण हासते॒ पव॑मानो॒, अधि॒ द्यवि॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} प॒वित्रे᳚ मत्स॒रो मदः॑||{5/6}{6.8.17.5}{9.27.5}{9.2.3.5}{1633, 750, 7911} |
| ए॒ष शु॒ष्म्य॑सिष्यदद॒न्तरि॑क्षे॒ वृषा॒ हरिः॑|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} पु॒ना॒न इन्दु॒रिन्द्र॒मा||{6/6}{6.8.17.6}{9.27.6}{9.2.3.6}{1634, 750, 7912} |
| [120] एषवाजीति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसः प्रियमेधः पवमानसोमो गायत्री | |
| ए॒ष वा॒जी हि॒तो नृभि᳚र्विश्व॒विन्मन॑स॒स्पतिः॑|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} अव्यो॒ वारं॒ वि धा᳚वति||{1/6}{6.8.18.1}{9.28.1}{9.2.4.1}{1635, 751, 7913} |
| ए॒ष प॒वित्रे᳚ अक्षर॒त् सोमो᳚ दे॒वेभ्यः॑ सु॒तः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} विश्वा॒ धामा᳚न्यावि॒शन्||{2/6}{6.8.18.2}{9.28.2}{9.2.4.2}{1636, 751, 7914} |
| ए॒ष दे॒वः शु॑भाय॒तेऽधि॒ योना॒वम॑र्त्यः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} वृ॒त्र॒हा दे᳚व॒वीत॑मः||{3/6}{6.8.18.3}{9.28.3}{9.2.4.3}{1637, 751, 7915} |
| ए॒ष वृषा॒ कनि॑क्रदद्द॒शभि॑र्जा॒मिभि᳚र्य॒तः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि द्रोणा᳚नि धावति||{4/6}{6.8.18.4}{9.28.4}{9.2.4.4}{1638, 751, 7916} |
| ए॒ष सूर्य॑मरोचय॒त् पव॑मानो॒ विच॑र्षणिः|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} विश्वा॒ धामा᳚नि विश्व॒वित्||{5/6}{6.8.18.5}{9.28.5}{9.2.4.5}{1639, 751, 7917} |
| ए॒ष शु॒ष्म्यदा᳚भ्यः॒ सोमः॑ पुना॒नो, अ॑र्षति|{आङ्गिरसः प्रियमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा||{6/6}{6.8.18.6}{9.28.6}{9.2.4.6}{1640, 751, 7918} |
| [121] प्रास्यधाराइति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोनृमेधः पवमान सोमो गायत्री |
| प्रास्य॒ धारा᳚ अक्षर॒न् वृष्णः॑ सु॒तस्यौज॑सा|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} दे॒वाँ, अनु॑ प्र॒भूष॑तः||{1/6}{6.8.19.1}{9.29.1}{9.2.5.1}{1641, 752, 7919} |
| सप्तिं᳚ मृजन्ति वे॒धसो᳚ गृ॒णन्तः॑ का॒रवो᳚ गि॒रा|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} ज्योति॑र्जज्ञा॒नमु॒क्थ्य᳚म्||{2/6}{6.8.19.2}{9.29.2}{9.2.5.2}{1642, 752, 7920} |
| सु॒षहा᳚ सोम॒ तानि॑ ते पुना॒नाय॑ प्रभूवसो|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} वर्धा᳚ समु॒द्रमु॒क्थ्य᳚म्||{3/6}{6.8.19.3}{9.29.3}{9.2.5.3}{1643, 752, 7921} |
| विश्वा॒ वसू᳚नि सं॒जय॒न् पव॑स्व सोम॒ धार॑या|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} इ॒नु द्वेषां᳚सि स॒ध्र्य॑क्||{4/6}{6.8.19.4}{9.29.4}{9.2.5.4}{1644, 752, 7922} |
| रक्षा॒ सु नो॒, अर॑रुषः स्व॒नात् स॑मस्य॒ कस्य॑ चित्|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} नि॒दो यत्र॑ मुमु॒च्महे᳚||{5/6}{6.8.19.5}{9.29.5}{9.2.5.5}{1645, 752, 7923} |
| एन्दो॒ पार्थि॑वं र॒यिं दि॒व्यं प॑वस्व॒ धार॑या|{आङ्गिरसो नृमेधः | पवमानः सोमः | गायत्री} द्यु॒मन्तं॒ शुष्म॒मा भ॑र||{6/6}{6.8.19.6}{9.29.6}{9.2.5.6}{1646, 752, 7924} |
| [122] प्रधाराइति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसो बिंदुः पवमानसोमोगायत्री | |
| प्र धारा᳚ अस्य शु॒ष्मिणो॒ वृथा᳚ प॒वित्रे᳚ अक्षरन्|{आङ्गिरसो बिंदुः | पवमानः सोमः | गायत्री} पु॒ना॒नो वाच॑मिष्यति||{1/6}{6.8.20.1}{9.30.1}{9.2.6.1}{1647, 753, 7925} |
| इन्दु᳚र्हिया॒नः सो॒तृभि᳚र्मृ॒ज्यमा᳚नः॒ कनि॑क्रदत्|{आङ्गिरसो बिंदुः | पवमानः सोमः | गायत्री} इय॑र्ति व॒ग्नुमि᳚न्द्रि॒यम्||{2/6}{6.8.20.2}{9.30.2}{9.2.6.2}{1648, 753, 7926} |
| आ नः॒ शुष्मं᳚ नृ॒षाह्यं᳚ वी॒रव᳚न्तं पुरु॒स्पृह᳚म्|{आङ्गिरसो बिंदुः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑स्व सोम॒ धार॑या||{3/6}{6.8.20.3}{9.30.3}{9.2.6.3}{1649, 753, 7927} |
| प्र सोमो॒, अति॒ धार॑या॒ पव॑मानो, असिष्यदत्|{आङ्गिरसो बिंदुः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि द्रोणा᳚न्या॒सद᳚म्||{4/6}{6.8.20.4}{9.30.4}{9.2.6.4}{1650, 753, 7928} |
| अ॒प्सु त्वा॒ मधु॑मत्तमं॒ हरिं᳚ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|{आङ्गिरसो बिंदुः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द॒विन्द्रा᳚य पी॒तये᳚||{5/6}{6.8.20.5}{9.30.5}{9.2.6.5}{1651, 753, 7929} |
| सु॒नोता॒ मधु॑मत्तमं॒ सोम॒मिन्द्रा᳚य व॒ज्रिणे᳚|{आङ्गिरसो बिंदुः | पवमानः सोमः | गायत्री} चारुं॒ शर्धा᳚य मत्स॒रम्||{6/6}{6.8.20.6}{9.30.6}{9.2.6.6}{1652, 753, 7930} |
| [123] प्रसोमासइति षडृचस्य सूक्तस्य राहूगणोगोतमःपवमान सोमोगायत्री | |
| प्र सोमा᳚सः स्वा॒ध्य१॑(अः॒) पव॑मानासो, अक्रमुः|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} र॒यिं कृ᳚ण्वन्ति॒ चेत॑नम्||{1/6}{6.8.21.1}{9.31.1}{9.2.7.1}{1653, 754, 7931} |
| दि॒वस्पृ॑थि॒व्या, अधि॒ भवे᳚न्दो द्युम्न॒वर्ध॑नः|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} भवा॒ वाजा᳚नां॒ पतिः॑||{2/6}{6.8.21.2}{9.31.2}{9.2.7.2}{1654, 754, 7932} |
| तुभ्यं॒ वाता᳚ अभि॒प्रिय॒स्तुभ्य॑मर्षन्ति॒ सिन्ध॑वः|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोम॒ वर्ध᳚न्ति ते॒ महः॑||{3/6}{6.8.21.3}{9.31.3}{9.2.7.3}{1655, 754, 7933} |
| आ प्या᳚यस्व॒ समे᳚तु ते वि॒श्वतः॑ सोम॒ वृष्ण्य᳚म्|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} भवा॒ वाज॑स्य संग॒थे||{4/6}{6.8.21.4}{9.31.4}{9.2.7.4}{1656, 754, 7934} |
| तुभ्यं॒ गावो᳚ घृ॒तं पयो॒ बभ्रो᳚ दुदु॒ह्रे, अक्षि॑तम्|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} वर्षि॑ष्ठे॒, अधि॒ सान॑वि||{5/6}{6.8.21.5}{9.31.5}{9.2.7.5}{1657, 754, 7935} |
| स्वा॒यु॒धस्य॑ ते स॒तो भुव॑नस्य पते व॒यम्|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दो᳚ सखि॒त्वमु॑श्मसि||{6/6}{6.8.21.6}{9.31.6}{9.2.7.6}{1658, 754, 7936} |
| [124] प्रसोमासइति षडृचस्य सूक्तस्यात्रेयः श्यावाश्वः पवमान सोमो गायत्री |
| प्र सोमा᳚सो मद॒च्युतः॒ श्रव॑से नो म॒घोनः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} सु॒ता वि॒दथे᳚ अक्रमुः||{1/6}{6.8.22.1}{9.32.1}{9.2.8.1}{1659, 755, 7937} |
| आदीं᳚ त्रि॒तस्य॒ योष॑णो॒ हरिं᳚ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दु॒मिन्द्रा᳚य पी॒तये᳚||{2/6}{6.8.22.2}{9.32.2}{9.2.8.2}{1660, 755, 7938} |
| आदीं᳚ हं॒सो यथा᳚ ग॒णं विश्व॑स्यावीवशन्म॒तिम्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} अत्यो॒ न गोभि॑रज्यते||{3/6}{6.8.22.3}{9.32.3}{9.2.8.3}{1661, 755, 7939} |
| उ॒भे सो᳚माव॒चाक॑शन् मृ॒गो न त॒क्तो, अ॑र्षसि|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} सीद᳚न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा||{4/6}{6.8.22.4}{9.32.4}{9.2.8.4}{1662, 755, 7940} |
| अ॒भि गावो᳚ अनूषत॒ योषा᳚ जा॒रमि॑व प्रि॒यम्|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} अग᳚न्ना॒जिं यथा᳚ हि॒तम्||{5/6}{6.8.22.5}{9.32.5}{9.2.8.5}{1663, 755, 7941} |
| अ॒स्मे धे᳚हि द्यु॒मद् यशो᳚ म॒घव॑द्भ्यश्च॒ मह्यं᳚ च|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} स॒निं मे॒धामु॒त श्रवः॑||{6/6}{6.8.22.6}{9.32.6}{9.2.8.6}{1664, 755, 7942} |
| [125] प्रसोमासइति षडृचस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितः पवमान सोमोगायत्री | |
| प्र सोमा᳚सो विप॒श्चितो॒ऽपां न य᳚न्त्यू॒र्मयः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} वना᳚नि महि॒षा, इ॑व||{1/6}{6.8.23.1}{9.33.1}{9.2.9.1}{1665, 756, 7943} |
| अ॒भि द्रोणा᳚नि ब॒भ्रवः॑ शु॒क्रा, ऋ॒तस्य॒ धार॑या|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} वाजं॒ गोम᳚न्तमक्षरन्||{2/6}{6.8.23.2}{9.33.2}{9.2.9.2}{1666, 756, 7944} |
| सु॒ता, इन्द्रा᳚य वा॒यवे॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्यः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमा᳚ अर्षन्ति॒ विष्ण॑वे||{3/6}{6.8.23.3}{9.33.3}{9.2.9.3}{1667, 756, 7945} |
| ति॒स्रो वाच॒ उदी᳚रते॒ गावो᳚ मिमन्ति धे॒नवः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} हरि॑रेति॒ कनि॑क्रदत्||{4/6}{6.8.23.4}{9.33.4}{9.2.9.4}{1668, 756, 7946} |
| अ॒भि ब्रह्मी᳚रनूषत य॒ह्वीरृ॒तस्य॑ मा॒तरः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} म॒र्मृ॒ज्यन्ते᳚ दि॒वः शिशु᳚म्||{5/6}{6.8.23.5}{9.33.5}{9.2.9.5}{1669, 756, 7947} |
| रा॒यः स॑मु॒द्राँश्च॒तुरो॒ऽस्मभ्यं᳚ सोम वि॒श्वतः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} आ प॑वस्व सह॒स्रिणः॑||{6/6}{6.8.23.6}{9.33.6}{9.2.9.6}{1670, 756, 7948} |
| [126] प्रसुवानइति षडृचस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितः पवमान सोमोगायत्री | |
| प्र सु॑वा॒नो धार॑या॒ तनेन्दु᳚र्हिन्वा॒नो, अ॑र्षति|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} रु॒जद्दृ॒ळ्हा व्योज॑सा||{1/6}{6.8.24.1}{9.34.1}{9.2.10.1}{1671, 757, 7949} |
| सु॒त इन्द्रा᳚य वा॒यवे॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्यः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमो᳚ अर्षति॒ विष्ण॑वे||{2/6}{6.8.24.2}{9.34.2}{9.2.10.2}{1672, 757, 7950} |
| वृषा᳚णं॒ वृष॑भिर्य॒तं सु॒न्वन्ति॒ सोम॒मद्रि॑भिः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} दु॒हन्ति॒ शक्म॑ना॒ पयः॑||{3/6}{6.8.24.3}{9.34.3}{9.2.10.3}{1673, 757, 7951} |
| भुव॑त् त्रि॒तस्य॒ मर्ज्यो॒ भुव॒दिन्द्रा᳚य मत्स॒रः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} सं रू॒पैर॑ज्यते॒ हरिः॑||{4/6}{6.8.24.4}{9.34.4}{9.2.10.4}{1674, 757, 7952} |
| अ॒भीमृ॒तस्य॑ वि॒ष्टपं᳚ दुह॒ते पृश्नि॑मातरः|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} चारु॑ प्रि॒यत॑मं ह॒विः||{5/6}{6.8.24.5}{9.34.5}{9.2.10.5}{1675, 757, 7953} |
| समे᳚न॒मह्रु॑ता, इ॒मा गिरो᳚ अर्षन्ति स॒स्रुतः॑|{आत्रेयः श्यावाश्वः | पवमानः सोमः | गायत्री} धे॒नूर्वा॒श्रो, अ॑वीवशत्||{6/6}{6.8.24.6}{9.34.6}{9.2.10.6}{1676, 757, 7954} |
| [127] आनःपवस्वेति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसःप्रभूवसुः पवमानसोमोगायत्री | |
| आ नः॑ पवस्व॒ धार॑या॒ पव॑मान र॒यिं पृ॒थुम्|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} यया॒ ज्योति᳚र्वि॒दासि॑ नः||{1/6}{6.8.25.1}{9.35.1}{9.2.11.1}{1677, 758, 7955} |
| इन्दो᳚ समुद्रमीङ्खय॒ पव॑स्व विश्वमेजय|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} रा॒यो ध॒र्ता न॒ ओज॑सा||{2/6}{6.8.25.2}{9.35.2}{9.2.11.2}{1678, 758, 7956} |
| त्वया᳚ वी॒रेण॑ वीरवो॒ऽभि ष्या᳚म पृतन्य॒तः|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} क्षरा᳚ णो, अ॒भि वार्य᳚म्||{3/6}{6.8.25.3}{9.35.3}{9.2.11.3}{1679, 758, 7957} |
| प्र वाज॒मिन्दु॑रिष्यति॒ सिषा᳚सन् वाज॒सा, ऋषिः॑|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} व्र॒ता वि॑दा॒न आयु॑धा||{4/6}{6.8.25.4}{9.35.4}{9.2.11.4}{1680, 758, 7958} |
| तं गी॒र्भिर्वा᳚चमीङ्ख॒यं पु॑ना॒नं वा᳚सयामसि|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमं॒ जन॑स्य॒ गोप॑तिम्||{5/6}{6.8.25.5}{9.35.5}{9.2.11.5}{1681, 758, 7959} |
| विश्वो॒ यस्य᳚ व्र॒ते जनो᳚ दा॒धार॒ धर्म॑ण॒स्पतेः᳚|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} पु॒ना॒नस्य॑ प्र॒भूव॑सोः||{6/6}{6.8.25.6}{9.35.6}{9.2.11.6}{1682, 758, 7960} |
| [128] असर्जीति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसः प्रभूवसुः पवमानसोमोगायत्री | |
| अस॑र्जि॒ रथ्यो᳚ यथा प॒वित्रे᳚ च॒म्वोः᳚ सु॒तः|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} कार्ष्म᳚न् वा॒जी न्य॑क्रमीत्||{1/6}{6.8.26.1}{9.36.1}{9.2.12.1}{1683, 759, 7961} |
| स वह्निः॑ सोम॒ जागृ॑विः॒ पव॑स्व देव॒वीरति॑|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि कोशं᳚ मधु॒श्चुत᳚म्||{2/6}{6.8.26.2}{9.36.2}{9.2.12.2}{1684, 759, 7962} |
| स नो॒ ज्योतीं᳚षि पूर्व्य॒ पव॑मान॒ वि रो᳚चय|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} क्रत्वे॒ दक्षा᳚य नो हिनु||{3/6}{6.8.26.3}{9.36.3}{9.2.12.3}{1685, 759, 7963} |
| शु॒म्भमा᳚न ऋता॒युभि᳚र्मृ॒ज्यमा᳚नो॒ गभ॑स्त्योः|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑ते॒ वारे᳚ अ॒व्यये᳚||{4/6}{6.8.26.4}{9.36.4}{9.2.12.4}{1686, 759, 7964} |
| स विश्वा᳚ दा॒शुषे॒ वसु॒ सोमो᳚ दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑ता॒मान्तरि॑क्ष्या||{5/6}{6.8.26.5}{9.36.5}{9.2.12.5}{1687, 759, 7965} |
| आ दि॒वस्पृ॒ष्ठम॑श्व॒युर्ग᳚व्य॒युः सो᳚म रोहसि|{आङ्गिरसःप्रभूवसुः | पवमानः सोमः | गायत्री} वी॒र॒युः श॑वसस्पते||{6/6}{6.8.26.6}{9.36.6}{9.2.12.6}{1688, 759, 7966} |
| [129] ससुतइति षडृचस्यसूक्तस्यांगिरसोरहूगणः पवमान सोमो गायत्री | |
| स सु॒तः पी॒तये॒ वृषा॒ सोमः॑ प॒वित्रे᳚ अर्षति|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} वि॒घ्नन्रक्षां᳚सि देव॒युः||{1/6}{6.8.27.1}{9.37.1}{9.2.13.1}{1689, 760, 7967} |
| स प॒वित्रे᳚ विचक्ष॒णो हरि॑रर्षति धर्ण॒सिः|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} अ॒भि योनिं॒ कनि॑क्रदत्||{2/6}{6.8.27.2}{9.37.2}{9.2.13.2}{1690, 760, 7968} |
| स वा॒जी रो᳚च॒ना दि॒वः पव॑मानो॒ वि धा᳚वति|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} र॒क्षो॒हा वार॑म॒व्यय᳚म्||{3/6}{6.8.27.3}{9.37.3}{9.2.13.3}{1691, 760, 7969} |
| स त्रि॒तस्याधि॒ सान॑वि॒ पव॑मानो, अरोचयत्|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} जा॒मिभिः॒ सूर्यं᳚ स॒ह||{4/6}{6.8.27.4}{9.37.4}{9.2.13.4}{1692, 760, 7970} |
| स वृ॑त्र॒हा वृषा᳚ सु॒तो व॑रिवो॒विददा᳚भ्यः|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमो॒ वाज॑मिवासरत्||{5/6}{6.8.27.5}{9.37.5}{9.2.13.5}{1693, 760, 7971} |
| स दे॒वः क॒विने᳚षि॒तो॒३॑(ओ॒)ऽभि द्रोणा᳚नि धावति|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दु॒रिन्द्रा᳚य मं॒हना᳚||{6/6}{6.8.27.6}{9.37.6}{9.2.13.6}{1694, 760, 7972} |
| [130] एषउस्यइति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोरहूगणः पवमान सोमोगायत्री | |
| ए॒ष उ॒ स्य वृषा॒ रथोऽव्यो॒ वारे᳚भिरर्षति|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} गच्छ॒न् वाजं᳚ सह॒स्रिण᳚म्||{1/6}{6.8.28.1}{9.38.1}{9.2.14.1}{1695, 761, 7973} |
| ए॒तं त्रि॒तस्य॒ योष॑णो॒ हरिं᳚ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दु॒मिन्द्रा᳚य पी॒तये᳚||{2/6}{6.8.28.2}{9.38.2}{9.2.14.2}{1696, 761, 7974} |
| ए॒तं त्यं ह॒रितो॒ दश॑ मर्मृ॒ज्यन्ते᳚ अप॒स्युवः॑|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} याभि॒र्मदा᳚य॒ शुम्भ॑ते||{3/6}{6.8.28.3}{9.38.3}{9.2.14.3}{1697, 761, 7975} |
| ए॒ष स्य मानु॑षी॒ष्वा श्ये॒नो न वि॒क्षु सी᳚दति|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} गच्छ᳚ञ्जा॒रो न यो॒षित᳚म्||{4/6}{6.8.28.4}{9.38.4}{9.2.14.4}{1698, 761, 7976} |
| ए॒ष स्य मद्यो॒ रसोऽव॑ चष्टे दि॒वः शिशुः॑|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} य इन्दु॒र्वार॒मावि॑शत्||{5/6}{6.8.28.5}{9.38.5}{9.2.14.5}{1699, 761, 7977} |
| ए॒ष स्य पी॒तये᳚ सु॒तो हरि॑रर्षति धर्ण॒सिः|{रहूगणो गोतमः | पवमानः सोमः | गायत्री} क्रन्द॒न् योनि॑म॒भि प्रि॒यम्||{6/6}{6.8.28.6}{9.38.6}{9.2.14.6}{1700, 761, 7978} |
| [131] आशुरर्षेति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसो बृहन्मतिः पवमानसोमोगायत्री | |
| आ॒शुर॑र्ष बृहन्मते॒ परि॑ प्रि॒येण॒ धाम्ना᳚|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} यत्र॑ दे॒वा, इति॒ ब्रव॑न्||{1/6}{6.8.29.1}{9.39.1}{9.2.15.1}{1701, 762, 7979} |
| प॒रि॒ष्कृ॒ण्वन्ननि॑ष्कृतं॒ जना᳚य या॒तय॒न्निषः॑|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} वृ॒ष्टिं दि॒वः परि॑ स्रव||{2/6}{6.8.29.2}{9.39.2}{9.2.15.2}{1702, 762, 7980} |
| सु॒त ए᳚ति प॒वित्र॒ आ त्विषिं॒ दधा᳚न॒ ओज॑सा|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} वि॒चक्षा᳚णो विरो॒चय॑न्||{3/6}{6.8.29.3}{9.39.3}{9.2.15.3}{1703, 762, 7981} |
| अ॒यं स यो दि॒वस्परि॑ रघु॒यामा᳚ प॒वित्र॒ आ|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} सिन्धो᳚रू॒र्मा व्यक्ष॑रत्||{4/6}{6.8.29.4}{9.39.4}{9.2.15.4}{1704, 762, 7982} |
| आ॒विवा᳚सन् परा॒वतो॒, अथो᳚ अर्वा॒वतः॑ सु॒तः|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्द्रा᳚य सिच्यते॒ मधु॑||{5/6}{6.8.29.5}{9.39.5}{9.2.15.5}{1705, 762, 7983} |
| स॒मी॒ची॒ना, अ॑नूषत॒ हरिं᳚ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} योना᳚वृ॒तस्य॑ सीदत||{6/6}{6.8.29.6}{9.39.6}{9.2.15.6}{1706, 762, 7984} |
| [132] पुनानइति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसो बृहन्मतिः पवमानसोमोगायत्री | |
| पु॒ना॒नो, अ॑क्रमीद॒भि विश्वा॒ मृधो॒ विच॑र्षणिः|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} शु॒म्भन्ति॒ विप्रं᳚ धी॒तिभिः॑||{1/6}{6.8.30.1}{9.40.1}{9.2.16.1}{1707, 763, 7985} |
| आ योनि॑मरु॒णो रु॑ह॒द्गम॒दिन्द्रं॒ वृषा᳚ सु॒तः|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} ध्रु॒वे सद॑सि सीदति||{2/6}{6.8.30.2}{9.40.2}{9.2.16.2}{1708, 763, 7986} |
| नू नो᳚ र॒यिं म॒हामि᳚न्दो॒ऽस्मभ्यं᳚ सोम वि॒श्वतः॑|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} आ प॑वस्व सह॒स्रिण᳚म्||{3/6}{6.8.30.3}{9.40.3}{9.2.16.3}{1709, 763, 7987} |
| विश्वा᳚ सोम पवमान द्यु॒म्नानी᳚न्द॒वा भ॑र|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} वि॒दाः स॑ह॒स्रिणी॒रिषः॑||{4/6}{6.8.30.4}{9.40.4}{9.2.16.4}{1710, 763, 7988} |
| स नः॑ पुना॒न आ भ॑र र॒यिं स्तो॒त्रे सु॒वीर्य᳚म्|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} ज॒रि॒तुर्व॑र्धया॒ गिरः॑||{5/6}{6.8.30.5}{9.40.5}{9.2.16.5}{1711, 763, 7989} |
| पु॒ना॒न इ᳚न्द॒वा भ॑र॒ सोम॑ द्वि॒बर्ह॑सं र॒यिम्|{आङ्गिरसो बृहन्मतिः | पवमानः सोमः | गायत्री} वृष᳚न्निन्दो न उ॒क्थ्य᳚म्||{6/6}{6.8.30.6}{9.40.6}{9.2.16.6}{1712, 763, 7990} |
| [133] प्रयेगावइतिषडृचस्य सूक्तस्यकाण्वोमेध्यातिथिः पवमानसोमो गायत्री | |
| प्र ये गावो॒ न भूर्ण॑यस्त्वे॒षा, अ॒यासो॒, अक्र॑मुः|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} घ्नन्तः॑ कृ॒ष्णामप॒ त्वच᳚म्||{1/6}{6.8.31.1}{9.41.1}{9.2.17.1}{1713, 764, 7991} |
| सु॒वि॒तस्य॑ मनाम॒हेऽति॒ सेतुं᳚ दुरा॒व्य᳚म्|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} सा॒ह्वांसो॒ दस्यु॑मव्र॒तम्||{2/6}{6.8.31.2}{9.41.2}{9.2.17.2}{1714, 764, 7992} |
| शृ॒ण्वे वृ॒ष्टेरि॑व स्व॒नः पव॑मानस्य शु॒ष्मिणः॑|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} चर᳚न्ति वि॒द्युतो᳚ दि॒वि||{3/6}{6.8.31.3}{9.41.3}{9.2.17.3}{1715, 764, 7993} |
| आ प॑वस्व म॒हीमिषं॒ गोम॑दिन्दो॒ हिर᳚ण्यवत्|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} अश्वा᳚व॒द् वाज॑वत् सु॒तः||{4/6}{6.8.31.4}{9.41.4}{9.2.17.4}{1716, 764, 7994} |
| स प॑वस्व विचर्षण॒ आ म॒ही रोद॑सी पृण|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} उ॒षाः सूर्यो॒ न र॒श्मिभिः॑||{5/6}{6.8.31.5}{9.41.5}{9.2.17.5}{1717, 764, 7995} |
| परि॑ णः शर्म॒यन्त्या॒ धार॑या सोम वि॒श्वतः॑|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} सरा᳚ र॒सेव॑ वि॒ष्टप᳚म्||{6/6}{6.8.31.6}{9.41.6}{9.2.17.6}{1718, 764, 7996} |
| [134] जनयन्नितिषडृचस्य सूक्तस्यकाण्वोमेध्यातिथिः पवमानसोमो गायत्री | |
| ज॒नय᳚न्रोच॒ना दि॒वो ज॒नय᳚न्न॒प्सु सूर्य᳚म्|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} वसा᳚नो॒ गा, अ॒पो हरिः॑||{1/6}{6.8.32.1}{9.42.1}{9.2.18.1}{1719, 765, 7997} |
| ए॒ष प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना दे॒वो दे॒वेभ्य॒स्परि॑|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} धार॑या पवते सु॒तः||{2/6}{6.8.32.2}{9.42.2}{9.2.18.2}{1720, 765, 7998} |
| वा॒वृ॒धा॒नाय॒ तूर्व॑ये॒ पव᳚न्ते॒ वाज॑सातये|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमाः᳚ स॒हस्र॑पाजसः||{3/6}{6.8.32.3}{9.42.3}{9.2.18.3}{1721, 765, 7999} |
| दु॒हा॒नः प्र॒त्नमित् पयः॑ प॒वित्रे॒ परि॑ षिच्यते|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} क्रन्द᳚न् दे॒वाँ, अ॑जीजनत्||{4/6}{6.8.32.4}{9.42.4}{9.2.18.4}{1722, 765, 8000} |
| अ॒भि विश्वा᳚नि॒ वार्या॒भि दे॒वाँ ऋ॑ता॒वृधः॑|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोमः॑ पुना॒नो, अ॑र्षति||{5/6}{6.8.32.5}{9.42.5}{9.2.18.5}{1723, 765, 8001} |
| गोम᳚न्नः सोम वी॒रव॒दश्वा᳚व॒द् वाज॑वत् सु॒तः|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} पव॑स्व बृह॒तीरिषः॑||{6/6}{6.8.32.6}{9.42.6}{9.2.18.6}{1724, 765, 8002} |
| [135] योअत्यइवेतिषडृचस्य सूक्तस्यकाण्वोमेध्यातिथिः पवमानसोमो गायत्री | |
| यो, अत्य॑ इव मृ॒ज्यते॒ गोभि॒र्मदा᳚य हर्य॒तः|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} तं गी॒र्भिर्वा᳚सयामसि||{1/6}{6.8.33.1}{9.43.1}{9.2.19.1}{1725, 766, 8003} |
| तं नो॒ विश्वा᳚ अव॒स्युवो॒ गिरः॑ शुम्भन्ति पू॒र्वथा᳚|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दु॒मिन्द्रा᳚य पी॒तये᳚||{2/6}{6.8.33.2}{9.43.2}{9.2.19.2}{1726, 766, 8004} |
| पु॒ना॒नो या᳚ति हर्य॒तः सोमो᳚ गी॒र्भिः परि॑ष्कृतः|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} विप्र॑स्य॒ मेध्या᳚तिथेः||{3/6}{6.8.33.3}{9.43.3}{9.2.19.3}{1727, 766, 8005} |
| पव॑मान वि॒दा र॒यिम॒स्मभ्यं᳚ सोम सु॒श्रिय᳚म्|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} इन्दो᳚ स॒हस्र॑वर्चसम्||{4/6}{6.8.33.4}{9.43.4}{9.2.19.4}{1728, 766, 8006} |
| इन्दु॒रत्यो॒ न वा᳚ज॒सृत् कनि॑क्रन्ति प॒वित्र॒ आ|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} यदक्षा॒रति॑ देव॒युः||{5/6}{6.8.33.5}{9.43.5}{9.2.19.5}{1729, 766, 8007} |
| पव॑स्व॒ वाज॑सातये॒ विप्र॑स्य गृण॒तो वृ॒धे|{काण्वो मेध्यातिथिः | पवमानः सोमः | गायत्री} सोम॒ रास्व॑ सु॒वीर्य᳚म्||{6/6}{6.8.33.6}{9.43.6}{9.2.19.6}{1730, 766, 8008} |