| [1] प्रणइंदविति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोयास्यः पवमानसोमो गायत्री | (पवमान पारायण तृतीयोध्यायः){अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:44}{अनुवाक:2, सूक्त:20} |
| प्रण॑इन्दोम॒हेतन॑¦ऊ॒र्मिंनबिभ्र॑दर्षसि|अ॒भिदे॒वाँ,अ॒यास्यः॑|| 1||वर्ग:1 |
| म॒तीजु॒ष्टोधि॒याहि॒तः¦सोमो᳚हिन्वेपरा॒वति॑|विप्र॑स्य॒धार॑याक॒विः|| 2|| |
| अ॒यंदे॒वेषु॒जागृ॑विः¦सु॒तए᳚तिप॒वित्र॒आ|सोमो᳚याति॒विच॑र्षणिः|| 3|| |
| सनः॑पवस्ववाज॒युश्¦च॑क्रा॒णश्चारु॑मध्व॒रम्|ब॒र्हिष्माँ॒,आवि॑वासति|| 4|| |
| सनो॒भगा᳚यवा॒यवे॒¦विप्र॑वीरःस॒दावृ॑धः|सोमो᳚दे॒वेष्वाय॑मत्|| 5|| |
| सनो᳚अ॒द्यवसु॑त्तये¦क्रतु॒विद्गा᳚तु॒वित्त॑मः|वाजं᳚जेषि॒श्रवो᳚बृ॒हत्|| 6|| |
| [2] स पवस्वेति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोयास्यः पवमानसोमो गायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:45}{अनुवाक:2, सूक्त:21} |
| सप॑वस्व॒मदा᳚य॒कं¦नृ॒चक्षा᳚दे॒ववी᳚तये|इन्द॒विन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 1||वर्ग:2 |
| सनो᳚अर्षा॒भिदू॒त्य१॑(अं॒)¦त्वमिन्द्रा᳚यतोशसे|दे॒वान्त्सखि॑भ्य॒आवर᳚म्|| 2|| |
| उ॒तत्वाम॑रु॒णंव॒यं¦गोभि॑रञ्ज्मो॒मदा᳚य॒कम्|विनो᳚रा॒येदुरो᳚वृधि|| 3|| |
| अत्यू᳚प॒वित्र॑मक्रमीद्¦वा॒जीधुरं॒नयाम॑नि|इन्दु॑र्दे॒वेषु॑पत्यते|| 4|| |
| समी॒सखा᳚यो,अस्वर॒न्¦वने॒क्रीळ᳚न्त॒मत्य॑विम्|इन्दुं᳚ना॒वा,अ॑नूषत|| 5|| |
| तया᳚पवस्व॒धार॑या॒¦यया᳚पी॒तोवि॒चक्ष॑से|इन्दो᳚स्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|| 6|| |
| [3] असृग्रनिति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोयास्यः पवमानसोमो गायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:46}{अनुवाक:2, सूक्त:22} |
| असृ॑ग्रन्दे॒ववी᳚त॒ये¦ऽत्या᳚सः॒कृत्व्या᳚इव|क्षर᳚न्तःपर्वता॒वृधः॑|| 1||वर्ग:3 |
| परि॑ष्कृतास॒इन्द॑वो॒¦योषे᳚व॒पित्र्या᳚वती|वा॒युंसोमा᳚असृक्षत|| 2|| |
| ए॒तेसोमा᳚स॒इन्द॑वः॒¦प्रय॑स्वन्तश्च॒मूसु॒ताः|इन्द्रं᳚वर्धन्ति॒कर्म॑भिः|| 3|| |
| आधा᳚वतासुहस्त्यः¦शु॒क्रागृ॑भ्णीतम॒न्थिना᳚|गोभिः॑श्रीणीतमत्स॒रम्|| 4|| |
| सप॑वस्वधनंजय¦प्रय॒न्ताराध॑सोम॒हः|अ॒स्मभ्यं᳚सोमगातु॒वित्|| 5|| |
| ए॒तंमृ॑जन्ति॒मर्ज्यं॒¦पव॑मानं॒दश॒क्षिपः॑|इन्द्रा᳚यमत्स॒रंमद᳚म्|| 6|| |
| [4] अयासोमइति पञ्चर्चस्य सूक्तस्य भार्गवःकविः पवमानसोमो गायत्री{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:47}{अनुवाक:2, सूक्त:23} |
| अ॒यासोमः॑सुकृ॒त्यया᳚¦म॒हश्चि॑द॒भ्य॑वर्धत|म॒न्दा॒नउद्वृ॑षायते|| 1||वर्ग:4 |
| कृ॒तानीद॑स्य॒कर्त्वा॒¦चेत᳚न्तेदस्यु॒तर्ह॑णा|ऋ॒णाच॑धृ॒ष्णुश्च॑यते|| 2|| |
| आत्सोम॑इन्द्रि॒योरसो॒¦वज्रः॑सहस्र॒साभु॑वत्|उ॒क्थंयद॑स्य॒जाय॑ते|| 3|| |
| स्व॒यंक॒विर्वि॑ध॒र्तरि॒¦विप्रा᳚य॒रत्न॑मिच्छति|यदी᳚मर्मृ॒ज्यते॒धियः॑|| 4|| |
| सि॒षा॒सतू᳚रयी॒णां¦वाजे॒ष्वर्व॑तामिव|भरे᳚षुजि॒ग्युषा᳚मसि|| 5|| |
| [5] तंत्वेति पञ्चर्चस्य सूक्तस्य भार्गवःकविः पवमानसोमो गायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:48}{अनुवाक:2, सूक्त:24} |
| तंत्वा᳚नृ॒म्णानि॒बिभ्र॑तं¦स॒धस्थे᳚षुम॒होदि॒वः|चारुं᳚सुकृ॒त्यये᳚महे|| 1||वर्ग:5 |
| संवृ॑क्तधृष्णुमु॒क्थ्यं᳚¦म॒हाम॑हिव्रतं॒मद᳚म्|श॒तंपुरो᳚रुरु॒क्षणि᳚म्|| 2|| |
| अत॑स्त्वार॒यिम॒भि¦राजा᳚नंसुक्रतोदि॒वः|सु॒प॒र्णो,अ᳚व्य॒थिर्भ॑रत्|| 3|| |
| विश्व॑स्मा॒,इत्स्व॑र्दृ॒शे¦साधा᳚रणंरज॒स्तुर᳚म्|गो॒पामृ॒तस्य॒विर्भ॑रत्|| 4|| |
| अधा᳚हिन्वा॒नइ᳚न्द्रि॒यं¦ज्यायो᳚महि॒त्वमा᳚नशे|अ॒भि॒ष्टि॒कृद्विच॑र्षणिः|| 5|| |
| [6] पवस्वेति पञ्चर्चस्य सूक्तस्य भार्गवःकविः पवमानसोमो गायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:49}{अनुवाक:2, सूक्त:25} |
| पव॑स्ववृ॒ष्टिमासुनो॒¦ऽपामू॒र्मिंदि॒वस्परि॑|अ॒य॒क्ष्माबृ॑ह॒तीरिषः॑|| 1||वर्ग:6 |
| तया᳚पवस्व॒धार॑या॒¦यया॒गाव॑इ॒हागम॑न्|जन्या᳚स॒उप॑नोगृ॒हम्|| 2|| |
| घृ॒तंप॑वस्व॒धार॑या¦य॒ज्ञेषु॑देव॒वीत॑मः|अ॒स्मभ्यं᳚वृ॒ष्टिमाप॑व|| 3|| |
| सन॑ऊ॒र्जेव्य१॑(अ॒)व्ययं᳚¦प॒वित्रं᳚धाव॒धार॑या|दे॒वासः॑शृ॒णव॒न्हिक᳚म्|| 4|| |
| पव॑मानो,असिष्यद॒द्¦रक्षां᳚स्यप॒जङ्घ॑नत्|प्र॒त्न॒वद्रो॒चय॒न्रुचः॑|| 5|| |
| [7] उत्तेशुष्मासइति पञ्चर्चस्य सूक्तस्यांगिरस उचथ्यः पवमान सोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:50}{अनुवाक:2, सूक्त:26} |
| उत्ते॒शुष्मा᳚सईरते॒¦सिन्धो᳚रू॒र्मेरि॑वस्व॒नः|वा॒णस्य॑चोदयाप॒विम्|| 1||वर्ग:7 |
| प्र॒स॒वेत॒उदी᳚रते¦ति॒स्रोवाचो᳚मख॒स्युवः॑|यदव्य॒एषि॒सान॑वि|| 2|| |
| अव्यो॒वारे॒परि॑प्रि॒यं¦हरिं᳚हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|पव॑मानंमधु॒श्चुत᳚म्|| 3|| |
| आप॑वस्वमदिन्तम¦प॒वित्रं॒धार॑याकवे|अ॒र्कस्य॒योनि॑मा॒सद᳚म्|| 4|| |
| सप॑वस्वमदिन्तम॒¦गोभि॑रञ्जा॒नो,अ॒क्तुभिः॑|इन्द॒विन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 5|| |
| [8] अध्वर्यविति पञ्चर्चस्य सूक्तस्यांगिरस उचथ्यः पवमान सोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:51}{अनुवाक:2, सूक्त:27} |
| अध्व᳚र्यो॒,अद्रि॑भिःसु॒तं¦सोमं᳚प॒वित्र॒आसृ॑ज|पु॒नी॒हीन्द्रा᳚य॒पात॑वे|| 1||वर्ग:8 |
| दि॒वःपी॒यूष॑मुत्त॒मं¦सोम॒मिन्द्रा᳚यव॒ज्रिणे᳚|सु॒नोता॒मधु॑मत्तमम्|| 2|| |
| तव॒त्यइ᳚न्दो॒,अन्ध॑सो¦दे॒वामधो॒र्व्य॑श्नते|पव॑मानस्यम॒रुतः॑|| 3|| |
| त्वंहिसो᳚मव॒र्धय॑न्¦त्सु॒तोमदा᳚य॒भूर्ण॑ये|वृष᳚न्त्स्तो॒तार॑मू॒तये᳚|| 4|| |
| अ॒भ्य॑र्षविचक्षण¦प॒वित्रं॒धार॑यासु॒तः|अ॒भिवाज॑मु॒तश्रवः॑|| 5|| |
| [9] परिद्युक्षइति पञ्चर्चस्य सूक्तस्यांगिरस उचथ्यः पवमान सोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:52}{अनुवाक:2, सूक्त:28} |
| परि॑द्यु॒क्षःस॒नद्र॑यि॒¦र्भर॒द्वाजं᳚नो॒,अन्ध॑सा|सु॒वा॒नो,अ॑र्षप॒वित्र॒आ|| 1||वर्ग:9 |
| तव॑प्र॒त्नेभि॒रध्व॑भि॒¦रव्यो॒वारे॒परि॑प्रि॒यः|स॒हस्र॑धारोया॒त्तना᳚|| 2|| |
| च॒रुर्नयस्तमी᳚ङ्ख॒येन्¦दो॒नदान॑मीङ्खय|व॒धैर्व॑धस्नवीङ्खय|| 3|| |
| निशुष्म॑मिन्दवेषां॒¦पुरु॑हूत॒जना᳚नाम्|यो,अ॒स्माँ,आ॒दिदे᳚शति|| 4|| |
| श॒तंन॑इन्दऊ॒तिभिः॑¦स॒हस्रं᳚वा॒शुची᳚नाम्|पव॑स्वमंह॒यद्र॑यिः|| 5|| |
| [10] उत्तेशुष्मासइति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:53}{अनुवाक:2, सूक्त:29} |
| उत्ते॒शुष्मा᳚सो,अस्थू॒¦रक्षो᳚भि॒न्दन्तो᳚अद्रिवः|नु॒दस्व॒याःप॑रि॒स्पृधः॑|| 1||वर्ग:10 |
| अ॒यानि॑ज॒घ्निरोज॑सा¦रथसं॒गेधने᳚हि॒ते|स्तवा॒,अबि॑भ्युषाहृ॒दा|| 2|| |
| अस्य᳚व्र॒तानि॒नाधृषे॒¦पव॑मानस्यदू॒ढ्या᳚|रु॒जयस्त्वा᳚पृत॒न्यति॑|| 3|| |
| तंहि᳚न्वन्तिमद॒च्युतं॒¦हरिं᳚न॒दीषु॑वा॒जिन᳚म्|इन्दु॒मिन्द्रा᳚यमत्स॒रम्|| 4|| |
| [11] अस्यप्रत्नामिति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:54}{अनुवाक:2, सूक्त:30} |
| अ॒स्यप्र॒त्नामनु॒द्युतं᳚¦शु॒क्रंदु॑दुह्रे॒,अह्र॑यः|पयः॑सहस्र॒सामृषि᳚म्|| 1||वर्ग:11 |
| अ॒यंसूर्य॑इवोप॒दृग॒¦यंसरां᳚सिधावति|स॒प्तप्र॒वत॒आदिव᳚म्|| 2|| |
| अ॒यंविश्वा᳚नितिष्ठति¦पुना॒नोभुव॑नो॒परि॑|सोमो᳚दे॒वोनसूर्यः॑|| 3|| |
| परि॑णोदे॒ववी᳚तये॒¦वाजाँ᳚,अर्षसि॒गोम॑तः|पु॒ना॒नइ᳚न्दविन्द्र॒युः|| 4|| |
| [12] यवंयवमिति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:55}{अनुवाक:2, सूक्त:31} |
| यवं᳚यवंनो॒,अन्ध॑सा¦पु॒ष्टम्पु॑ष्टं॒परि॑स्रव|सोम॒विश्वा᳚च॒सौभ॑गा|| 1||वर्ग:12 |
| इन्दो॒यथा॒तव॒स्तवो॒¦यथा᳚तेजा॒तमन्ध॑सः|निब॒र्हिषि॑प्रि॒येस॑दः|| 2|| |
| उ॒तनो᳚गो॒विद॑श्व॒वित्¦पव॑स्वसो॒मान्ध॑सा|म॒क्षूत॑मेभि॒रह॑भिः|| 3|| |
| योजि॒नाति॒नजीय॑ते॒¦हन्ति॒शत्रु॑म॒भीत्य॑|सप॑वस्वसहस्रजित्|| 4|| |
| [13] परिसोमइति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:56}{अनुवाक:2, सूक्त:32} |
| परि॒सोम॑ऋ॒तंबृ॒ह¦दा॒शुःप॒वित्रे᳚अर्षति|वि॒घ्नन्रक्षां᳚सिदेव॒युः|| 1||वर्ग:13 |
| यत्सोमो॒वाज॒मर्ष॑ति¦श॒तंधारा᳚अप॒स्युवः॑|इन्द्र॑स्यस॒ख्यमा᳚वि॒शन्|| 2|| |
| अ॒भित्वा॒योष॑णो॒दश॑¦जा॒रंनक॒न्या᳚नूषत|मृ॒ज्यसे᳚सोमसा॒तये᳚|| 3|| |
| त्वमिन्द्रा᳚य॒विष्ण॑वे¦स्वा॒दुरि᳚न्दो॒परि॑स्रव|नॄन्त्स्तो॒तॄन्पा॒ह्यंह॑सः|| 4|| |
| [14] प्रतेधाराइति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:57}{अनुवाक:2, सूक्त:33} |
| प्रते॒धारा᳚अस॒श्चतो᳚¦दि॒वोनय᳚न्तिवृ॒ष्टयः॑|अच्छा॒वाजं᳚सह॒स्रिण᳚म्|| 1||वर्ग:14 |
| अ॒भिप्रि॒याणि॒काव्या॒¦विश्वा॒चक्षा᳚णो,अर्षति|हरि॑स्तुञ्जा॒नआयु॑धा|| 2|| |
| सम᳚र्मृजा॒नआ॒युभि॒¦रिभो॒राजे᳚वसुव्र॒तः|श्ये॒नोनवंसु॑षीदति|| 3|| |
| सनो॒विश्वा᳚दि॒वोवसू॒¦तोपृ॑थि॒व्या,अधि॑|पु॒ना॒नइ᳚न्द॒वाभ॑र|| 4|| |
| [15] तरत्समंदीति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:58}{अनुवाक:2, सूक्त:34} |
| तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति॒¦धारा᳚सु॒तस्यान्ध॑सः|तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति|| 1||वर्ग:15 |
| उ॒स्रावे᳚द॒वसू᳚नां॒¦मर्त॑स्यदे॒व्यव॑सः|तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति|| 2|| |
| ध्व॒स्रयोः᳚पुरु॒षन्त्यो॒¦रास॒हस्रा᳚णिदद्महे|तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति|| 3|| |
| आययो᳚स्त्रिं॒शतं॒तना᳚¦स॒हस्रा᳚णिच॒दद्म॑हे|तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति|| 4|| |
| [16] पवस्वेति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:59}{अनुवाक:2, सूक्त:35} |
| पव॑स्वगो॒जिद॑श्व॒जिद्¦वि॑श्व॒जित्सो᳚मरण्य॒जित्|प्र॒जाव॒द्रत्न॒माभ॑र|| 1||वर्ग:16 |
| पव॑स्वा॒द्भ्यो,अदा᳚भ्यः॒¦पव॒स्वौष॑धीभ्यः|पव॑स्वधि॒षणा᳚भ्यः|| 2|| |
| त्वंसो᳚म॒पव॑मानो॒¦विश्वा᳚निदुरि॒तात॑र|क॒विःसी᳚द॒निब॒र्हिषि॑|| 3|| |
| पव॑मान॒स्व᳚र्विदो॒¦जाय॑मानोऽभवोम॒हान्|इन्दो॒विश्वाँ᳚,अ॒भीद॑सि|| 4|| |
| [17] प्रगायत्रेणेति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमान सोमोगायत्री तृतीयापुरउष्णिक्{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:60}{अनुवाक:2, सूक्त:36} |
| प्रगा᳚य॒त्रेण॑गायत॒¦पव॑मानं॒विच॑र्षणिम्|इन्दुं᳚स॒हस्र॑चक्षसम्|| 1||वर्ग:17 |
| तंत्वा᳚स॒हस्र॑चक्षस॒¦मथो᳚स॒हस्र॑भर्णसम्|अति॒वार॑मपाविषुः|| 2|| |
| अति॒वारा॒न्पव॑मानो,असिष्यदत्¦क॒लशाँ᳚,अ॒भिधा᳚वति|इन्द्र॑स्य॒हार्द्या᳚वि॒शन्|| 3|| |
| इन्द्र॑स्यसोम॒राध॑से॒¦शंप॑वस्वविचर्षणे|प्र॒जाव॒द्रेत॒आभ॑र|| 4|| |
| [18] अयावीतीति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्यांगिरसोऽमहीयुः पवमान सोमो गायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:61}{अनुवाक:3, सूक्त:1} |
| अ॒यावी॒तीपरि॑स्रव॒¦यस्त॑इन्दो॒मदे॒ष्वा|अ॒वाह᳚न्नव॒तीर्नव॑|| 1||वर्ग:18 |
| पुरः॑स॒द्यइ॒त्थाधि॑ये॒¦दिवो᳚दासाय॒शम्ब॑रम्|अध॒त्यंतु॒र्वशं॒यदु᳚म्|| 2|| |
| परि॑णो॒,अश्व॑मश्व॒विद्¦गोम॑दिन्दो॒हिर᳚ण्यवत्|क्षरा᳚सह॒स्रिणी॒रिषः॑|| 3|| |
| पव॑मानस्यतेव॒यं¦प॒वित्र॑मभ्युन्द॒तः|स॒खि॒त्वमावृ॑णीमहे|| 4|| |
| येते᳚प॒वित्र॑मू॒र्मयो᳚¦ऽभि॒क्षर᳚न्ति॒धार॑या|तेभि᳚र्नःसोममृळय|| 5|| |
| सनः॑पुना॒नआभ॑र¦र॒यिंवी॒रव॑ती॒मिष᳚म्|ईशा᳚नःसोमवि॒श्वतः॑|| 6||वर्ग:19 |
| ए॒तमु॒त्यंदश॒क्षिपो᳚¦मृ॒जन्ति॒सिन्धु॑मातरम्|समा᳚दि॒त्येभि॑रख्यत|| 7|| |
| समिन्द्रे᳚णो॒तवा॒युना᳚¦सु॒तए᳚तिप॒वित्र॒आ|संसूर्य॑स्यर॒श्मिभिः॑|| 8|| |
| सनो॒भगा᳚यवा॒यवे᳚¦पू॒ष्णेप॑वस्व॒मधु॑मान्|चारु᳚र्मि॒त्रेवरु॑णेच|| 9|| |
| उ॒च्चाते᳚जा॒तमन्ध॑सो¦दि॒विषद्भूम्याद॑दे|उ॒ग्रंशर्म॒महि॒श्रवः॑|| 10|| |
| ए॒नाविश्वा᳚न्य॒र्यआ¦द्यु॒म्नानि॒मानु॑षाणाम्|सिषा᳚सन्तोवनामहे|| 11||वर्ग:20 |
| सन॒इन्द्रा᳚य॒यज्य॑वे॒¦वरु॑णायम॒रुद्भ्यः॑|व॒रि॒वो॒वित्परि॑स्रव|| 12|| |
| उपो॒षुजा॒तम॒प्तुरं॒¦गोभि॑र्भ॒ङ्गंपरि॑ष्कृतम्|इन्दुं᳚दे॒वा,अ॑यासिषुः|| 13|| |
| तमिद्व॑र्धन्तुनो॒गिरो᳚¦व॒त्संसं॒शिश्व॑रीरिव|यइन्द्र॑स्यहृदं॒सनिः॑|| 14|| |
| अर्षा᳚णःसोम॒शंगवे᳚¦धु॒क्षस्व॑पि॒प्युषी॒मिष᳚म्|वर्धा᳚समु॒द्रमु॒क्थ्य᳚म्|| 15|| |
| पव॑मानो,अजीजनद्¦दि॒वश्चि॒त्रंनत᳚न्य॒तुम्|ज्योति᳚र्वैश्वान॒रंबृ॒हत्|| 16||वर्ग:21 |
| पव॑मानस्यते॒रसो॒¦मदो᳚राजन्नदुच्छु॒नः|विवार॒मव्य॑मर्षति|| 17|| |
| पव॑मान॒रस॒स्तव॒¦दक्षो॒विरा᳚जतिद्यु॒मान्|ज्योति॒र्विश्वं॒स्व॑र्दृ॒शे|| 18|| |
| यस्ते॒मदो॒वरे᳚ण्य॒¦स्तेना᳚पव॒स्वान्ध॑सा|दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा|| 19|| |
| जघ्नि᳚र्वृ॒त्रम॑मि॒त्रियं॒¦सस्नि॒र्वाजं᳚दि॒वेदि॑वे|गो॒षा,उ॑अश्व॒सा,अ॑सि|| 20|| |
| सम्मि॑श्लो,अरु॒षोभ॑व¦सूप॒स्थाभि॒र्नधे॒नुभिः॑|सीद᳚ञ्छ्ये॒नोनयोनि॒मा|| 21||वर्ग:22 |
| सप॑वस्व॒यआवि॒थे¦न्द्रं᳚वृ॒त्राय॒हन्त॑वे|व॒व्रि॒वांसं᳚म॒हीर॒पः|| 22|| |
| सु॒वीरा᳚सोव॒यंधना॒¦जये᳚मसोममीढ्वः|पु॒ना॒नोव॑र्धनो॒गिरः॑|| 23|| |
| त्वोता᳚स॒स्तवाव॑सा॒¦स्याम॑व॒न्वन्त॑आ॒मुरः॑|सोम᳚व्र॒तेषु॑जागृहि|| 24|| |
| अ॒प॒घ्नन्प॑वते॒मृधो¦ऽप॒सोमो॒,अरा᳚व्णः|गच्छ॒न्निन्द्र॑स्यनिष्कृ॒तम्|| 25|| |
| म॒होनो᳚रा॒यआभ॑र॒¦पव॑मानज॒हीमृधः॑|रास्वे᳚न्दोवी॒रव॒द्यशः॑|| 26||वर्ग:23 |
| नत्वा᳚श॒तंच॒नह्रुतो॒¦राधो॒दित्स᳚न्त॒मामि॑नन्|यत्पु॑ना॒नोम॑ख॒स्यसे᳚|| 27|| |
| पव॑स्वेन्दो॒वृषा᳚सु॒तः¦कृ॒धीनो᳚य॒शसो॒जने᳚|विश्वा॒,अप॒द्विषो᳚जहि|| 28|| |
| अस्य॑तेस॒ख्येव॒यं¦तवे᳚न्दोद्यु॒म्नउ॑त्त॒मे|सा॒स॒ह्याम॑पृतन्य॒तः|| 29|| |
| याते᳚भी॒मान्यायु॑धा¦ति॒ग्मानि॒सन्ति॒धूर्व॑णे|रक्षा᳚समस्यनोनि॒दः|| 30|| |
| [19] एतेअसृग्रमिति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य भार्गवोजमदग्निः पवमानसोमो गायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:62}{अनुवाक:3, सूक्त:2} |
| ए॒ते,अ॑सृग्र॒मिन्द॑व¦स्ति॒रःप॒वित्र॑मा॒शवः॑|विश्वा᳚न्य॒भिसौभ॑गा|| 1||वर्ग:24 |
| वि॒घ्नन्तो᳚दुरि॒तापु॒रु¦सु॒गातो॒काय॑वा॒जिनः॑|तना᳚कृ॒ण्वन्तो॒,अर्व॑ते|| 2|| |
| कृ॒ण्वन्तो॒वरि॑वो॒गवे॒¦ऽभ्य॑र्षन्तिसुष्टु॒तिम्|इळा᳚म॒स्मभ्यं᳚सं॒यत᳚म्|| 3|| |
| असा᳚व्यं॒शुर्मदा᳚या॒¦ऽप्सुदक्षो᳚गिरि॒ष्ठाः|श्ये॒नोनयोनि॒मास॑दत्|| 4|| |
| शु॒भ्रमन्धो᳚दे॒ववा᳚त¦म॒प्सुधू॒तोनृभिः॑सु॒तः|स्वद᳚न्ति॒गावः॒पयो᳚भिः|| 5|| |
| आदी॒मश्वं॒नहेता॒रो¦ऽशू᳚शुभन्न॒मृता᳚य|मध्वो॒रसं᳚सध॒मादे᳚|| 6||वर्ग:25 |
| यास्ते॒धारा᳚मधु॒श्चुतो¦ऽसृ॑ग्रमिन्दऊ॒तये᳚|ताभिः॑प॒वित्र॒मास॑दः|| 7|| |
| सो,अ॒र्षेन्द्रा᳚यपी॒तये᳚¦ति॒रोरोमा᳚ण्य॒व्यया᳚|सीद॒न्योना॒वने॒ष्वा|| 8|| |
| त्वमि᳚न्दो॒परि॑स्रव॒¦स्वादि॑ष्ठो॒,अङ्गि॑रोभ्यः|व॒रि॒वो॒विद्घृ॒तंपयः॑|| 9|| |
| अ॒यंविच॑र्षणिर्हि॒तः¦पव॑मानः॒सचे᳚तति|हि॒न्वा॒नआप्यं᳚बृ॒हत्|| 10|| |
| ए॒षवृषा॒वृष᳚व्रतः॒¦पव॑मानो,अशस्ति॒हा|कर॒द्वसू᳚निदा॒शुषे᳚|| 11||वर्ग:26 |
| आप॑वस्वसह॒स्रिणं᳚¦र॒यिंगोम᳚न्तम॒श्विन᳚म्|पु॒रु॒श्च॒न्द्रंपु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 12|| |
| ए॒षस्यपरि॑षिच्यते¦मर्मृ॒ज्यमा᳚नआ॒युभिः॑|उ॒रु॒गा॒यःक॒विक्र॑तुः|| 13|| |
| स॒हस्रो᳚तिःश॒ताम॑घो¦वि॒मानो॒रज॑सःक॒विः|इन्द्रा᳚यपवते॒मदः॑|| 14|| |
| गि॒राजा॒तइ॒हस्तु॒त¦इन्दु॒रिन्द्रा᳚यधीयते|विर्योना᳚वस॒तावि॑व|| 15|| |
| पव॑मानःसु॒तोनृभिः॒¦सोमो॒वाज॑मिवासरत्|च॒मूषु॒शक्म॑ना॒सद᳚म्|| 16||वर्ग:27 |
| तंत्रि॑पृ॒ष्ठेत्रि॑वन्धु॒रे¦रथे᳚युञ्जन्ति॒यात॑वे|ऋषी᳚णांस॒प्तधी॒तिभिः॑|| 17|| |
| तंसो᳚तारोधन॒स्पृत॑¦मा॒शुंवाजा᳚य॒यात॑वे|हरिं᳚हिनोतवा॒जिन᳚म्|| 18|| |
| आ॒वि॒शन्क॒लशं᳚सु॒तो¦विश्वा॒,अर्ष᳚न्न॒भिश्रियः॑|शूरो॒नगोषु॑तिष्ठति|| 19|| |
| आत॑इन्दो॒मदा᳚य॒कं¦पयो᳚दुहन्त्या॒यवः॑|दे॒वादे॒वेभ्यो॒मधु॑|| 20|| |
| आनः॒सोमं᳚प॒वित्र॒आ¦सृ॒जता॒मधु॑मत्तमम्|दे॒वेभ्यो᳚देव॒श्रुत्त॑मम्|| 21||वर्ग:28 |
| ए॒तेसोमा᳚असृक्षत¦गृणा॒नाःश्रव॑सेम॒हे|म॒दिन्त॑मस्य॒धार॑या|| 22|| |
| अ॒भिगव्या᳚निवी॒तये᳚¦नृ॒म्णापु॑ना॒नो,अ॑र्षसि|स॒नद्वा᳚जः॒परि॑स्रव|| 23|| |
| उ॒तनो॒गोम॑ती॒रिषो॒¦विश्वा᳚अर्षपरि॒ष्टुभः॑|गृ॒णा॒नोज॒मद॑ग्निना|| 24|| |
| पव॑स्ववा॒चो,अ॑ग्रि॒यः¦सोम॑चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑|अ॒भिविश्वा᳚नि॒काव्या᳚|| 25|| |
| त्वंस॑मु॒द्रिया᳚अ॒पो᳚¦ऽग्रि॒योवाच॑ई॒रय॑न्|पव॑स्वविश्वमेजय|| 26||वर्ग:29 |
| तुभ्ये॒माभुव॑नाकवे¦महि॒म्नेसो᳚मतस्थिरे|तुभ्य॑मर्षन्ति॒सिन्ध॑वः|| 27|| |
| प्रते᳚दि॒वोनवृ॒ष्टयो॒¦धारा᳚यन्त्यस॒श्चतः॑|अ॒भिशु॒क्रामु॑प॒स्तिर᳚म्|| 28|| |
| इन्द्रा॒येन्दुं᳚पुनीतनो॒¦ग्रंदक्षा᳚य॒साध॑नम्|ई॒शा॒नंवी॒तिरा᳚धसम्|| 29|| |
| पव॑मानऋ॒तःक॒विः¦सोमः॑प॒वित्र॒मास॑दत्|दध॑त्स्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|| 30|| |
| [20] आपवस्वेति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य काश्यपोनिध्रुविः पवमान सोमो गायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:63}{अनुवाक:3, सूक्त:3} |
| आप॑वस्वसह॒स्रिणं᳚¦र॒यिंसो᳚मसु॒वीर्य᳚म्|अ॒स्मेश्रवां᳚सिधारय|| 1||वर्ग:30 |
| इष॒मूर्जं᳚चपिन्वस॒¦इन्द्रा᳚यमत्स॒रिन्त॑मः|च॒मूष्वानिषी᳚दसि|| 2|| |
| सु॒तइन्द्रा᳚य॒विष्ण॑वे॒¦सोमः॑क॒लशे᳚अक्षरत्|मधु॑माँ,अस्तुवा॒यवे᳚|| 3|| |
| ए॒ते,अ॑सृग्रमा॒शवो¦ऽति॒ह्वरां᳚सिब॒भ्रवः॑|सोमा᳚ऋ॒तस्य॒धार॑या|| 4|| |
| इन्द्रं॒वर्ध᳚न्तो,अ॒प्तुरः॑¦कृ॒ण्वन्तो॒विश्व॒मार्य᳚म्|अ॒प॒घ्नन्तो॒,अरा᳚व्णः|| 5|| |
| सु॒ता,अनु॒स्वमारजो॒¦ऽभ्य॑र्षन्तिब॒भ्रवः॑|इन्द्रं॒गच्छ᳚न्त॒इन्द॑वः|| 6||वर्ग:31 |
| अ॒याप॑वस्व॒धार॑या॒¦यया॒सूर्य॒मरो᳚चयः|हि॒न्वा॒नोमानु॑षीर॒पः|| 7|| |
| अयु॑क्त॒सूर॒एत॑शं॒¦पव॑मानोम॒नावधि॑|अ॒न्तरि॑क्षेण॒यात॑वे|| 8|| |
| उ॒तत्याह॒रितो॒दश॒¦सूरो᳚अयुक्त॒यात॑वे|इन्दु॒रिन्द्र॒इति॑ब्रु॒वन्|| 9|| |
| परी॒तोवा॒यवे᳚सु॒तं¦गिर॒इन्द्रा᳚यमत्स॒रम्|अव्यो॒वारे᳚षुसिञ्चत|| 10|| |
| पव॑मानवि॒दार॒यि¦म॒स्मभ्यं᳚सोमदु॒ष्टर᳚म्|योदू॒णाशो᳚वनुष्य॒ता|| 11||वर्ग:32 |
| अ॒भ्य॑र्षसह॒स्रिणं᳚¦र॒यिंगोम᳚न्तम॒श्विन᳚म्|अ॒भिवाज॑मु॒तश्रवः॑|| 12|| |
| सोमो᳚दे॒वोनसूर्यो¦ऽद्रि॑भिःपवतेसु॒तः|दधा᳚नःक॒लशे॒रस᳚म्|| 13|| |
| ए॒तेधामा॒न्यार्या᳚¦शु॒क्रा,ऋ॒तस्य॒धार॑या|वाजं॒गोम᳚न्तमक्षरन्|| 14|| |
| सु॒ता,इन्द्रा᳚यव॒ज्रिणे॒¦सोमा᳚सो॒दध्या᳚शिरः|प॒वित्र॒मत्य॑क्षरन्|| 15|| |
| प्रसो᳚म॒मधु॑मत्तमो¦रा॒ये,अ॑र्षप॒वित्र॒आ|मदो॒योदे᳚व॒वीत॑मः|| 16||वर्ग:33 |
| तमी᳚मृजन्त्या॒यवो॒¦हरिं᳚न॒दीषु॑वा॒जिन᳚म्|इन्दु॒मिन्द्रा᳚यमत्स॒रम्|| 17|| |
| आप॑वस्व॒हिर᳚ण्यव॒¦दश्वा᳚वत्सोमवी॒रव॑त्|वाजं॒गोम᳚न्त॒माभ॑र|| 18|| |
| परि॒वाजे॒नवा᳚ज॒यु¦मव्यो॒वारे᳚षुसिञ्चत|इन्द्रा᳚य॒मधु॑मत्तमम्|| 19|| |
| क॒विंमृ॑जन्ति॒मर्ज्यं᳚¦धी॒भिर्विप्रा᳚अव॒स्यवः॑|वृषा॒कनि॑क्रदर्षति|| 20|| |
| वृष॑णंधी॒भिर॒प्तुरं॒¦सोम॑मृ॒तस्य॒धार॑या|म॒तीविप्राः॒सम॑स्वरन्|| 21||वर्ग:34 |
| पव॑स्वदेवायु॒ष¦गिन्द्रं᳚गच्छतुते॒मदः॑|वा॒युमारो᳚ह॒धर्म॑णा|| 22|| |
| पव॑मान॒नितो᳚शसे¦र॒यिंसो᳚मश्र॒वाय्य᳚म्|प्रि॒यःस॑मु॒द्रमावि॑श|| 23|| |
| अ॒प॒घ्नन्प॑वसे॒मृधः॑¦क्रतु॒वित्सो᳚ममत्स॒रः|नु॒दस्वादे᳚वयुं॒जन᳚म्|| 24|| |
| पव॑माना,असृक्षत॒¦सोमाः᳚शु॒क्रास॒इन्द॑वः|अ॒भिविश्वा᳚नि॒काव्या᳚|| 25|| |
| पव॑मानासआ॒शवः॑¦शु॒भ्रा,अ॑सृग्र॒मिन्द॑वः|घ्नन्तो॒विश्वा॒,अप॒द्विषः॑|| 26||वर्ग:35 |
| पव॑मानादि॒वस्प¦र्य॒न्तरि॑क्षादसृक्षत|पृ॒थि॒व्या,अधि॒सान॑वि|| 27|| |
| पु॒ना॒नःसो᳚म॒धार॒ये¦न्दो॒विश्वा॒,अप॒स्रिधः॑|ज॒हिरक्षां᳚सिसुक्रतो|| 28|| |
| अ॒प॒घ्नन्त्सो᳚मर॒क्षसो॒¦ऽभ्य॑र्ष॒कनि॑क्रदत्|द्यु॒मन्तं॒शुष्म॑मुत्त॒मम्|| 29|| |
| अ॒स्मेवसू᳚निधारय॒¦सोम॑दि॒व्यानि॒पार्थि॑वा|इन्दो॒विश्वा᳚नि॒वार्या᳚|| 30|| |
| [21] वृषासोमेति त्रिंशदृचस्यसूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमोगायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:1}{मंडल:9, सूक्त:64}{अनुवाक:3, सूक्त:4} |
| वृषा᳚सोमद्यु॒माँ,अ॑सि॒¦वृषा᳚देव॒वृष᳚व्रतः|वृषा॒धर्मा᳚णिदधिषे|| 1||वर्ग:36 |
| वृष्ण॑स्ते॒वृष्ण्यं॒शवो॒¦वृषा॒वनं॒वृषा॒मदः॑|स॒त्यंवृ॑ष॒न्वृषेद॑सि|| 2|| |
| अश्वो॒नच॑क्रदो॒वृषा॒¦संगा,इ᳚न्दो॒समर्व॑तः|विनो᳚रा॒येदुरो᳚वृधि|| 3|| |
| असृ॑क्षत॒प्रवा॒जिनो᳚¦ग॒व्यासोमा᳚सो,अश्व॒या|शु॒क्रासो᳚वीर॒याशवः॑|| 4|| |
| शु॒म्भमा᳚ना,ऋता॒युभि᳚¦र्मृ॒ज्यमा᳚ना॒गभ॑स्त्योः|पव᳚न्ते॒वारे᳚अ॒व्यये᳚|| 5|| |
| तेविश्वा᳚दा॒शुषे॒वसु॒¦सोमा᳚दि॒व्यानि॒पार्थि॑वा|पव᳚न्ता॒मान्तरि॑क्ष्या|| 6||वर्ग:37 |
| पव॑मानस्यविश्ववि॒त्¦प्रते॒सर्गा᳚असृक्षत|सूर्य॑स्येव॒नर॒श्मयः॑|| 7|| |
| के॒तुंकृ॒ण्वन्दि॒वस्परि॒¦विश्वा᳚रू॒पाभ्य॑र्षसि|स॒मु॒द्रःसो᳚मपिन्वसे|| 8|| |
| हि॒न्वा॒नोवाच॑मिष्यसि॒¦पव॑मान॒विध᳚र्मणि|अक्रा᳚न्दे॒वोनसूर्यः॑|| 9|| |
| इन्दुः॑पविष्ट॒चेत॑नः¦प्रि॒यःक॑वी॒नांम॒ती|सृ॒जदश्वं᳚र॒थीरि॑व|| 10|| |
| ऊ॒र्मिर्यस्ते᳚प॒वित्र॒आ¦दे᳚वा॒वीःप॒र्यक्ष॑रत्|सीद᳚न्नृ॒तस्य॒योनि॒मा|| 11||वर्ग:38 |
| सनो᳚अर्षप॒वित्र॒आ¦मदो॒योदे᳚व॒वीत॑मः|इन्द॒विन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 12|| |
| इ॒षेप॑वस्व॒धार॑या¦मृ॒ज्यमा᳚नोमनी॒षिभिः॑|इन्दो᳚रु॒चाभिगा,इ॑हि|| 13|| |
| पु॒ना॒नोवरि॑वस्कृ॒ध्यू¦र्जं॒जना᳚यगिर्वणः|हरे᳚सृजा॒नआ॒शिर᳚म्|| 14|| |
| पु॒ना॒नोदे॒ववी᳚तय॒¦इन्द्र॑स्ययाहिनिष्कृ॒तम्|द्यु॒ता॒नोवा॒जिभि᳚र्य॒तः|| 15|| |
| प्रहि᳚न्वा॒नास॒इन्द॒वो¦ऽच्छा᳚समु॒द्रमा॒शवः॑|धि॒याजू॒ता,अ॑सृक्षत|| 16||वर्ग:39 |
| म॒र्मृ॒जा॒नास॑आ॒यवो॒¦वृथा᳚समु॒द्रमिन्द॑वः|अग्म᳚न्नृ॒तस्य॒योनि॒मा|| 17|| |
| परि॑णोयाह्यस्म॒यु¦र्विश्वा॒वसू॒न्योज॑सा|पा॒हिनः॒शर्म॑वी॒रव॑त्|| 18|| |
| मिमा᳚ति॒वह्नि॒रेत॑शः¦प॒दंयु॑जा॒नऋक्व॑भिः|प्रयत्स॑मु॒द्रआहि॑तः|| 19|| |
| आयद्योनिं᳚हिर॒ण्यय॑¦मा॒शुरृ॒तस्य॒सीद॑ति|जहा॒त्यप्र॑चेतसः|| 20|| |
| अ॒भिवे॒ना,अ॑नूष॒ते¦य॑क्षन्ति॒प्रचे᳚तसः|मज्ज॒न्त्यवि॑चेतसः|| 21||वर्ग:40 |
| इन्द्रा᳚येन्दोम॒रुत्व॑ते॒¦पव॑स्व॒मधु॑मत्तमः|ऋ॒तस्य॒योनि॑मा॒सद᳚म्|| 22|| |
| तंत्वा॒विप्रा᳚वचो॒विदः॒¦परि॑ष्कृण्वन्तिवे॒धसः॑|संत्वा᳚मृजन्त्या॒यवः॑|| 23|| |
| रसं᳚तेमि॒त्रो,अ᳚र्य॒मा¦पिब᳚न्ति॒वरु॑णःकवे|पव॑मानस्यम॒रुतः॑|| 24|| |
| त्वंसो᳚मविप॒श्चितं᳚¦पुना॒नोवाच॑मिष्यसि|इन्दो᳚स॒हस्र॑भर्णसम्|| 25|| |
| उ॒तोस॒हस्र॑भर्णसं॒¦वाचं᳚सोममख॒स्युव᳚म्|पु॒ना॒नइ᳚न्द॒वाभ॑र|| 26||वर्ग:41 |
| पु॒ना॒नइ᳚न्दवेषां॒¦पुरु॑हूत॒जना᳚नाम्|प्रि॒यःस॑मु॒द्रमावि॑श|| 27|| |
| दवि॑द्युतत्यारु॒चा¦प॑रि॒ष्टोभ᳚न्त्याकृ॒पा|सोमाः᳚शु॒क्रागवा᳚शिरः|| 28|| |
| हि॒न्वा॒नोहे॒तृभि᳚र्य॒त¦आवाजं᳚वा॒ज्य॑क्रमीत्|सीद᳚न्तोव॒नुषो᳚यथा|| 29|| |
| ऋ॒धक्सो᳚मस्व॒स्तये᳚¦संजग्मा॒नोदि॒वःक॒विः|पव॑स्व॒सूर्यो᳚दृ॒शे|| 30|| |
| [22] हिन्वन्तीति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य वारुणिर्भृगुः पवमानसोमोगायत्री | (अत्रभार्गवोजमदग्निः पाक्षिकः) (पवमान पारायण चतुर्थोध्यायः){अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:65}{अनुवाक:3, सूक्त:5} |
| हि॒न्वन्ति॒सूर॒मुस्र॑यः॒¦स्वसा᳚रोजा॒मय॒स्पति᳚म्|म॒हामिन्दुं᳚मही॒युवः॑|| 1||वर्ग:1 |
| पव॑मानरु॒चारु॑चा¦दे॒वोदे॒वेभ्य॒स्परि॑|विश्वा॒वसू॒न्यावि॑श|| 2|| |
| आप॑वमानसुष्टु॒तिं¦वृ॒ष्टिंदे॒वेभ्यो॒दुवः॑|इ॒षेप॑वस्वसं॒यत᳚म्|| 3|| |
| वृषा॒ह्यसि॑भा॒नुना᳚¦द्यु॒मन्तं᳚त्वाहवामहे|पव॑मानस्वा॒ध्यः॑|| 4|| |
| आप॑वस्वसु॒वीर्यं॒¦मन्द॑मानःस्वायुध|इ॒होष्वि᳚न्द॒वाग॑हि|| 5|| |
| यद॒द्भिःप॑रिषि॒च्यसे᳚¦मृ॒ज्यमा᳚नो॒गभ॑स्त्योः|द्रुणा᳚स॒धस्थ॑मश्नुषे|| 6||वर्ग:2 |
| प्रसोमा᳚यव्यश्व॒वत्¦पव॑मानायगायत|म॒हेस॒हस्र॑चक्षसे|| 7|| |
| यस्य॒वर्णं᳚मधु॒श्चुतं॒¦हरिं᳚हि॒न्वन्त्यद्रि॑भिः|इन्दु॒मिन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 8|| |
| तस्य॑तेवा॒जिनो᳚व॒यं¦विश्वा॒धना᳚निजि॒ग्युषः॑|स॒खि॒त्वमावृ॑णीमहे|| 9|| |
| वृषा᳚पवस्व॒धार॑या¦म॒रुत्व॑तेचमत्स॒रः|विश्वा॒दधा᳚न॒ओज॑सा|| 10|| |
| तंत्वा᳚ध॒र्तार॑मो॒ण्यो॒३॑(ओः॒)¦पव॑मानस्व॒र्दृश᳚म्|हि॒न्वेवाजे᳚षुवा॒जिन᳚म्|| 11||वर्ग:3 |
| अ॒याचि॒त्तोवि॒पानया॒¦हरिः॑पवस्व॒धार॑या|युजं॒वाजे᳚षुचोदय|| 12|| |
| आन॑इन्दोम॒हीमिषं॒¦पव॑स्ववि॒श्वद॑र्शतः|अ॒स्मभ्यं᳚सोमगातु॒वित्|| 13|| |
| आक॒लशा᳚अनूष॒ते¦न्दो॒धारा᳚भि॒रोज॑सा|एन्द्र॑स्यपी॒तये᳚विश|| 14|| |
| यस्य॑ते॒मद्यं॒रसं᳚¦ती॒व्रंदु॒हन्त्यद्रि॑भिः|सप॑वस्वाभिमाति॒हा|| 15|| |
| राजा᳚मे॒धाभि॑रीयते॒¦पव॑मानोम॒नावधि॑|अ॒न्तरि॑क्षेण॒यात॑वे|| 16||वर्ग:4 |
| आन॑इन्दोशत॒ग्विनं॒¦गवां॒पोषं॒स्वश्व्य᳚म्|वहा॒भग॑त्तिमू॒तये᳚|| 17|| |
| आनः॑सोम॒सहो॒जुवो᳚¦रू॒पंनवर्च॑सेभर|सु॒ष्वा॒णोदे॒ववी᳚तये|| 18|| |
| अर्षा᳚सोमद्यु॒मत्त॑मो॒¦ऽभिद्रोणा᳚नि॒रोरु॑वत्|सीद᳚ञ्छ्ये॒नोनयोनि॒मा|| 19|| |
| अ॒प्सा,इन्द्रा᳚यवा॒यवे॒¦वरु॑णायम॒रुद्भ्यः॑|सोमो᳚अर्षति॒विष्ण॑वे|| 20|| |
| इषं᳚तो॒काय॑नो॒दध॑द॒¦स्मभ्यं᳚सोमवि॒श्वतः॑|आप॑वस्वसह॒स्रिण᳚म्|| 21||वर्ग:5 |
| येसोमा᳚सःपरा॒वति॒¦ये,अ᳚र्वा॒वति॑सुन्वि॒रे|येवा॒दःश᳚र्य॒णाव॑ति|| 22|| |
| यआ᳚र्जी॒केषु॒कृत्व॑सु॒¦येमध्ये᳚प॒स्त्या᳚नाम्|येवा॒जने᳚षुप॒ञ्चसु॑|| 23|| |
| तेनो᳚वृ॒ष्टिंदि॒वस्परि॒¦पव᳚न्ता॒मासु॒वीर्य᳚म्|सु॒वा॒नादे॒वास॒इन्द॑वः|| 24|| |
| पव॑तेहर्य॒तोहरि॑¦र्गृणा॒नोज॒मद॑ग्निना|हि॒न्वा॒नोगोरधि॑त्व॒चि|| 25|| |
| प्रशु॒क्रासो᳚वयो॒जुवो᳚¦हिन्वा॒नासो॒नसप्त॑यः|श्री॒णा॒ना,अ॒प्सुमृ᳚ञ्जत|| 26||वर्ग:6 |
| तंत्वा᳚सु॒तेष्वा॒भुवो᳚¦हिन्वि॒रेदे॒वता᳚तये|सप॑वस्वा॒नया᳚रु॒चा|| 27|| |
| आते॒दक्षं᳚मयो॒भुवं॒¦वह्नि॑म॒द्यावृ॑णीमहे|पान्त॒मापु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 28|| |
| आम॒न्द्रमावरे᳚ण्य॒¦माविप्र॒माम॑नी॒षिण᳚म्|पान्त॒मापु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 29|| |
| आर॒यिमासु॑चे॒तुन॒¦मासु॑क्रतोत॒नूष्वा|पान्त॒मापु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 30|| |
| [23] पवस्वेति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य शतंवैखानसाः पवमानसोम एकोनविंश्यादितिसृणामग्निः पवमानोगायत्र्यष्टादश्यनुष्टुप् (शतं वैखानसाएतेस्वायंभुवाः अतएषांगोत्रंनास्तिएवमग्रेपिनारायणादयऊह्याः) |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:66}{अनुवाक:3, सूक्त:6} |
| पव॑स्वविश्वचर्षणे॒¦ऽभिविश्वा᳚नि॒काव्या᳚|सखा॒सखि॑भ्य॒ईड्यः॑|| 1||वर्ग:7 |
| ताभ्यां॒विश्व॑स्यराजसि॒¦येप॑वमान॒धाम॑नी|प्र॒ती॒चीसो᳚मत॒स्थतुः॑|| 2|| |
| परि॒धामा᳚नि॒यानि॑ते॒¦त्वंसो᳚मासिवि॒श्वतः॑|पव॑मानऋ॒तुभिः॑कवे|| 3|| |
| पव॑स्वज॒नय॒न्निषो॒¦ऽभिविश्वा᳚नि॒वार्या᳚|सखा॒सखि॑भ्यऊ॒तये᳚|| 4|| |
| तव॑शु॒क्रासो᳚अ॒र्चयो᳚¦दि॒वस्पृ॒ष्ठेवित᳚न्वते|प॒वित्रं᳚सोम॒धाम॑भिः|| 5|| |
| तवे॒मेस॒प्तसिन्ध॑वः¦प्र॒शिषं᳚सोमसिस्रते|तुभ्यं᳚धावन्तिधे॒नवः॑|| 6||वर्ग:8 |
| प्रसो᳚मयाहि॒धार॑या¦सु॒तइन्द्रा᳚यमत्स॒रः|दधा᳚नो॒,अक्षि॑ति॒श्रवः॑|| 7|| |
| समु॑त्वाधी॒भिर॑स्वरन्¦हिन्व॒तीःस॒प्तजा॒मयः॑|विप्र॑मा॒जावि॒वस्व॑तः|| 8|| |
| मृ॒जन्ति॑त्वा॒सम॒ग्रुवो¦ऽव्ये᳚जी॒रावधि॒ष्वणि॑|रे॒भोयद॒ज्यसे॒वने᳚|| 9|| |
| पव॑मानस्यतेकवे॒¦वाजि॒न्त्सर्गा᳚असृक्षत|अर्व᳚न्तो॒नश्र॑व॒स्यवः॑|| 10|| |
| अच्छा॒कोशं᳚मधु॒श्चुत॒¦मसृ॑ग्रं॒वारे᳚अ॒व्यये᳚|अवा᳚वशन्तधी॒तयः॑|| 11||वर्ग:9 |
| अच्छा᳚समु॒द्रमिन्द॒वो¦ऽस्तं॒गावो॒नधे॒नवः॑|अग्म᳚न्नृ॒तस्य॒योनि॒मा|| 12|| |
| प्रण॑इन्दोम॒हेरण॒¦आपो᳚अर्षन्ति॒सिन्ध॑वः|यद्गोभि᳚र्वासयि॒ष्यसे᳚|| 13|| |
| अस्य॑तेस॒ख्येव॒य¦मिय॑क्षन्त॒स्त्वोत॑यः|इन्दो᳚सखि॒त्वमु॑श्मसि|| 14|| |
| आप॑वस्व॒गवि॑ष्टये¦म॒हेसो᳚मनृ॒चक्ष॑से|एन्द्र॑स्यज॒ठरे᳚विश|| 15|| |
| म॒हाँ,अ॑सिसोम॒ज्येष्ठ॑¦उ॒ग्राणा᳚मिन्द॒ओजि॑ष्ठः|युध्वा॒सञ्छश्व॑ज्जिगेथ|| 16||वर्ग:10 |
| यउ॒ग्रेभ्य॑श्चि॒दोजी᳚या॒ञ्¦छूरे᳚भ्यश्चि॒च्छूर॑तरः|भू॒रि॒दाभ्य॑श्चि॒न्मंही᳚यान्|| 17|| |
| त्वंसो᳚म॒सूर॒एष॑¦स्तो॒कस्य॑सा॒तात॒नूना᳚म्|वृ॒णी॒महे᳚स॒ख्याय॑¦वृणी॒महे॒युज्या᳚य|| 18|| |
| अग्न॒आयूं᳚षिपवस॒¦आसु॒वोर्ज॒मिषं᳚चनः|आ॒रेबा᳚धस्वदु॒च्छुना᳚म्|| 19|| |
| अ॒ग्निरृषिः॒पव॑मानः॒¦पाञ्च॑जन्यःपु॒रोहि॑तः|तमी᳚महेमहाग॒यम्|| 20|| |
| अग्ने॒पव॑स्व॒स्वपा᳚¦अ॒स्मेवर्चः॑सु॒वीर्य᳚म्|दध॑द्र॒यिंमयि॒पोष᳚म्|| 21||वर्ग:11 |
| पव॑मानो॒,अति॒स्रिधो॒¦ऽभ्य॑र्षतिसुष्टु॒तिम्|सूरो॒नवि॒श्वद॑र्शतः|| 22|| |
| सम᳚र्मृजा॒नआ॒युभिः॒¦प्रय॑स्वा॒न्प्रय॑सेहि॒तः|इन्दु॒रत्यो᳚विचक्ष॒णः|| 23|| |
| पव॑मानऋ॒तंबृ॒ह¦च्छु॒क्रंज्योति॑रजीजनत्|कृ॒ष्णातमां᳚सि॒जङ्घ॑नत्|| 24|| |
| पव॑मानस्य॒जङ्घ्न॑तो॒¦हरे᳚श्च॒न्द्रा,अ॑सृक्षत|जी॒रा,अ॑जि॒रशो᳚चिषः|| 25|| |
| पव॑मानोर॒थीत॑मः¦शु॒भ्रेभिः॑शु॒भ्रश॑स्तमः|हरि॑श्चन्द्रोम॒रुद्ग॑णः|| 26||वर्ग:12 |
| पव॑मानो॒व्य॑श्नवद्¦र॒श्मिभि᳚र्वाज॒सात॑मः|दध॑त्स्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|| 27|| |
| प्रसु॑वा॒नइन्दु॑रक्षाः¦प॒वित्र॒मत्य॒व्यय᳚म्|पु॒ना॒नइन्दु॒रिन्द्र॒मा|| 28|| |
| ए॒षसोमो॒,अधि॑त्व॒चि¦गवां᳚क्रीळ॒त्यद्रि॑भिः|इन्द्रं॒मदा᳚य॒जोहु॑वत्|| 29|| |
| यस्य॑तेद्यु॒म्नव॒त्पयः॒¦पव॑मा॒नाभृ॑तंदि॒वः|तेन॑नोमृळजी॒वसे᳚|| 30|| |
| [24] त्वंसोमासीति द्वात्रिंशदृचस्य सूक्तस्य आद्यानांसप्तानांतृचानांभरद्वाजकश्यपगोतमात्रिविश्वामित्र जमदग्निवसिष्ठा ऋषयः शिष्टानामांगिरसः पवित्रऋषिः (अत्रवसिष्ठोवापवित्रवसिष्ठौवेतिविपक्षौ) पवमानसोमोदेवता दशम्यादितिसृणांपूषावा यत्तेपवित्रमित्यादिपंचानामग्निः अंत्ययोर्द्वयोः पावमान्यधेतागायत्री षोडश्याद्यास्तिस्रोद्विपदागायत्र्यः त्रिंशीपुरउष्णिक् सप्तविंश्येकत्रिंशीद्वात्रिंश्योनुष्टुभः |( पंचविंश्यादितिसृणांक्रमात्सविताग्निसवितारौविश्वेदेवाइतिदेवताअग्निनासह विकल्पंते ) |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:67}{अनुवाक:3, सूक्त:7} |
| त्वंसो᳚मासिधार॒यु¦र्म॒न्द्रओजि॑ष्ठो,अध्व॒रे|पव॑स्वमंह॒यद्र॑यिः|| 1||वर्ग:13 |
| त्वंसु॒तोनृ॒माद॑नो¦दध॒न्वान्म॑त्स॒रिन्त॑मः|इन्द्रा᳚यसू॒रिरन्ध॑सा|| 2|| |
| त्वंसु॑ष्वा॒णो,अद्रि॑भि¦र॒भ्य॑र्ष॒कनि॑क्रदत्|द्यु॒मन्तं॒शुष्म॑मुत्त॒मम्|| 3|| |
| इन्दु᳚र्हिन्वा॒नो,अ॑र्षति¦ति॒रोवारा᳚ण्य॒व्यया᳚|हरि॒र्वाज॑मचिक्रदत्|| 4|| |
| इन्दो॒व्यव्य॑मर्षसि॒¦विश्रवां᳚सि॒विसौभ॑गा|विवाजा᳚न्त्सोम॒गोम॑तः|| 5|| |
| आन॑इन्दोशत॒ग्विनं᳚¦र॒यिंगोम᳚न्तम॒श्विन᳚म्|भरा᳚सोमसह॒स्रिण᳚म्|| 6||वर्ग:14 |
| पव॑मानास॒इन्द॑व¦स्ति॒रःप॒वित्र॑मा॒शवः॑|इन्द्रं॒यामे᳚भिराशत|| 7|| |
| क॒कु॒हःसो॒म्योरस॒¦इन्दु॒रिन्द्रा᳚यपू॒र्व्यः|आ॒युःप॑वतआ॒यवे᳚|| 8|| |
| हि॒न्वन्ति॒सूर॒मुस्र॑यः॒¦पव॑मानंमधु॒श्चुत᳚म्|अ॒भिगि॒रासम॑स्वरन्|| 9|| |
| अ॒वि॒तानो᳚अ॒जाश्वः॑¦पू॒षायाम॑नियामनि|आभ॑क्षत्क॒न्या᳚सुनः|| 10|| |
| अ॒यंसोमः॑कप॒र्दिने᳚¦घृ॒तंनप॑वते॒मधु॑|आभ॑क्षत्क॒न्या᳚सुनः|| 11||वर्ग:15 |
| अ॒यंत॑आघृणेसु॒तो¦घृ॒तंनप॑वते॒शुचि॑|आभ॑क्षत्क॒न्या᳚सुनः|| 12|| |
| वा॒चोज॒न्तुःक॑वी॒नां¦पव॑स्वसोम॒धार॑या|दे॒वेषु॑रत्न॒धा,अ॑सि|| 13|| |
| आक॒लशे᳚षुधावति¦श्ये॒नोवर्म॒विगा᳚हते|अ॒भिद्रोणा॒कनि॑क्रदत्|| 14|| |
| परि॒प्रसो᳚मते॒रसो¦ऽस॑र्जिक॒लशे᳚सु॒तः|श्ये॒नोनत॒क्तो,अ॑र्षति|| 15|| |
| पव॑स्वसोमम॒न्दय॒¦न्निन्द्रा᳚य॒मधु॑मत्तमः|| 16||वर्ग:16 |
| असृ॑ग्रन्दे॒ववी᳚तये¦वाज॒यन्तो॒रथा᳚इव|| 17|| |
| तेसु॒तासो᳚म॒दिन्त॑माः¦शु॒क्रावा॒युम॑सृक्षत|| 18|| |
| ग्राव्णा᳚तु॒न्नो,अ॒भिष्टु॑तः¦प॒वित्रं᳚सोमगच्छसि|दध॑त्स्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|| 19|| |
| ए॒षतु॒न्नो,अ॒भिष्टु॑तः¦प॒वित्र॒मति॑गाहते|र॒क्षो॒हावार॑म॒व्यय᳚म्|| 20|| |
| यदन्ति॒यच्च॑दूर॒के¦भ॒यंवि॒न्दति॒मामि॒ह|पव॑मान॒वितज्ज॑हि|| 21||वर्ग:17 |
| पव॑मानः॒सो,अ॒द्यनः॑¦प॒वित्रे᳚ण॒विच॑र्षणिः|यःपो॒तासपु॑नातुनः|| 22|| |
| यत्ते᳚प॒वित्र॑म॒र्चि¦ष्यग्ने॒वित॑तम॒न्तरा|ब्रह्म॒तेन॑पुनीहिनः|| 23|| |
| यत्ते᳚प॒वित्र॑मर्चि॒व¦दग्ने॒तेन॑पुनीहिनः|ब्र॒ह्म॒स॒वैःपु॑नीहिनः|| 24|| |
| उ॒भाभ्यां᳚देवसवितः¦प॒वित्रे᳚णस॒वेन॑च|मांपु॑नीहिवि॒श्वतः॑|| 25|| |
| त्रि॒भिष्ट्वंदे᳚वसवित॒¦र्वर्षि॑ष्ठैःसोम॒धाम॑भिः|अग्ने॒दक्षैः᳚पुनीहिनः|| 26||वर्ग:18 |
| पु॒नन्तु॒मांदे᳚वज॒नाः¦पु॒नन्तु॒वस॑वोधि॒या|विश्वे᳚देवाःपुनी॒तमा॒¦जात॑वेदःपुनी॒हिमा᳚|| 27|| |
| प्रप्या᳚यस्व॒प्रस्य᳚न्दस्व॒¦सोम॒विश्वे᳚भिरं॒शुभिः॑|दे॒वेभ्य॑उत्त॒मंह॒विः|| 28|| |
| उप॑प्रि॒यंपनि॑प्नतं॒¦युवा᳚नमाहुती॒वृध᳚म्|अग᳚न्म॒बिभ्र॑तो॒नमः॑|| 29|| |
| अ॒लाय्य॑स्यपर॒शुर्न॑नाश॒त¦माप॑वस्वदेवसोम|आ॒खुंचि॑दे॒वदे᳚वसोम|| 30|| |
| यःपा᳚वमा॒नीर॒ध्ये¦त्यृषि॑भिः॒सम्भृ॑तं॒रस᳚म्|सर्वं॒सपू॒तम॑श्नाति¦स्वदि॒तंमा᳚त॒रिश्व॑ना|| 31|| |
| पा॒व॒मा॒नीर्यो,अ॒ध्ये¦त्यृषि॑भिः॒सम्भृ॑तं॒रस᳚म्|तस्मै॒सर॑स्वतीदुहे¦क्षी॒रंस॒र्पिर्मधू᳚द॒कम्|| 32|| |
| [25] प्रदेवमिति दशर्चस्य सूक्तस्य भालंदनो वत्सप्रिः पवमानसोमोजगत्यंत्यात्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:68}{अनुवाक:4, सूक्त:1} |
| प्रदे॒वमच्छा॒मधु॑मन्त॒इन्द॒वोऽसि॑ष्यदन्त॒गाव॒आनधे॒नवः॑| ब॒र्हि॒षदो᳚वच॒नाव᳚न्त॒ऊध॑भिःपरि॒स्रुत॑मु॒स्रिया᳚नि॒र्णिजं᳚धिरे|| 1||वर्ग:19 |
| सरोरु॑वद॒भिपूर्वा᳚अचिक्रददुपा॒रुहः॑श्र॒थय᳚न्त्स्वादते॒हरिः॑| ति॒रःप॒वित्रं᳚परि॒यन्नु॒रुज्रयो॒निशर्या᳚णिदधतेदे॒वआवर᳚म्|| 2|| |
| वियोम॒मेय॒म्या᳚संय॒तीमदः॑साकं॒वृधा॒पय॑सापिन्व॒दक्षि॑ता| म॒ही,अ॑पा॒रेरज॑सीवि॒वेवि॑ददभि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒पाज॒आद॑दे|| 3|| |
| समा॒तरा᳚वि॒चर᳚न्वा॒जय᳚न्न॒पःप्रमेधि॑रःस्व॒धया᳚पिन्वतेप॒दम्| अं॒शुर्यवे᳚नपिपिशेय॒तोनृभिः॒संजा॒मिभि॒र्नस॑ते॒रक्ष॑ते॒शिरः॑|| 4|| |
| संदक्षे᳚ण॒मन॑साजायतेक॒विरृ॒तस्य॒गर्भो॒निहि॑तोय॒माप॒रः| यूना᳚ह॒सन्ता᳚प्रथ॒मंविज॑ज्ञतु॒र्गुहा᳚हि॒तंजनि॑म॒नेम॒मुद्य॑तम्|| 5|| |
| म॒न्द्रस्य॑रू॒पंवि॑विदुर्मनी॒षिणः॑श्ये॒नोयदन्धो॒,अभ॑रत्परा॒वतः॑| तंम॑र्जयन्तसु॒वृधं᳚न॒दीष्वाँ,उ॒शन्त॑मं॒शुंप॑रि॒यन्त॑मृ॒ग्मिय᳚म्|| 6||वर्ग:20 |
| त्वांमृ॑जन्ति॒दश॒योष॑णःसु॒तंसोम॒ऋषि॑भिर्म॒तिभि॑र्धी॒तिभि᳚र्हि॒तम्| अव्यो॒वारे᳚भिरु॒तदे॒वहू᳚तिभि॒र्नृभि᳚र्य॒तोवाज॒माद॑र्षिसा॒तये᳚|| 7|| |
| प॒रि॒प्र॒यन्तं᳚व॒य्यं᳚सुषं॒सदं॒सोमं᳚मनी॒षा,अ॒भ्य॑नूषत॒स्तुभः॑| योधार॑या॒मधु॑माँ,ऊ॒र्मिणा᳚दि॒वइय॑र्ति॒वाचं᳚रयि॒षाळम॑र्त्यः|| 8|| |
| अ॒यंदि॒वइ॑यर्ति॒विश्व॒मारजः॒सोमः॑पुना॒नःक॒लशे᳚षुसीदति| अ॒द्भिर्गोभि᳚र्मृज्यते॒,अद्रि॑भिःसु॒तःपु॑ना॒नइन्दु॒र्वरि॑वोविदत्प्रि॒यम्|| 9|| |
| ए॒वानः॑सोमपरिषि॒च्यमा᳚नो॒वयो॒दध॑च्चि॒त्रत॑मंपवस्व| अ॒द्वे॒षेद्यावा᳚पृथि॒वीहु॑वेम॒देवा᳚ध॒त्तर॒यिम॒स्मेसु॒वीर᳚म्|| 10|| |
| [26] इषुर्नेति दशर्चस्य सूक्तस्यांगिरसोहिरण्यस्तूपः पवमानसोमोजगत्यंत्येद्वेत्रिष्टुभौ |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:69}{अनुवाक:4, सूक्त:2} |
| इषु॒र्नधन्व॒न्प्रति॑धीयतेम॒तिर्व॒त्सोनमा॒तुरुप॑स॒र्ज्यूध॑नि| उ॒रुधा᳚रेवदुहे॒,अग्र॑आय॒त्यस्य᳚व्र॒तेष्वपि॒सोम॑इष्यते|| 1||वर्ग:21 |
| उपो᳚म॒तिःपृ॒च्यते᳚सि॒च्यते॒मधु॑म॒न्द्राज॑नीचोदते,अ॒न्तरा॒सनि॑| पव॑मानःसंत॒निःप्र॑घ्न॒तामि॑व॒मधु॑मान्द्र॒प्सःपरि॒वार॑मर्षति|| 2|| |
| अव्ये᳚वधू॒युःप॑वते॒परि॑त्व॒चिश्र॑थ्नी॒तेन॒प्तीरदि॑तेरृ॒तंय॒ते| हरि॑रक्रान्यज॒तःसं᳚य॒तोमदो᳚नृ॒म्णाशिशा᳚नोमहि॒षोनशो᳚भते|| 3|| |
| उ॒क्षामि॑माति॒प्रति॑यन्तिधे॒नवो᳚दे॒वस्य॑दे॒वीरुप॑यन्तिनिष्कृ॒तम्| अत्य॑क्रमी॒दर्जु॑नं॒वार॑म॒व्यय॒मत्कं॒ननि॒क्तंपरि॒सोमो᳚अव्यत|| 4|| |
| अमृ॑क्तेन॒रुश॑ता॒वास॑सा॒हरि॒रम॑र्त्योनिर्णिजा॒नःपरि᳚व्यत| दि॒वस्पृ॒ष्ठंब॒र्हणा᳚नि॒र्णिजे᳚कृतोप॒स्तर॑णंच॒म्वो᳚र्नभ॒स्मय᳚म्|| 5|| |
| सूर्य॑स्येवर॒श्मयो᳚द्रावयि॒त्नवो᳚मत्स॒रासः॑प्र॒सुपः॑सा॒कमी᳚रते| तन्तुं᳚त॒तंपरि॒सर्गा᳚सआ॒शवो॒नेन्द्रा᳚दृ॒तेप॑वते॒धाम॒किंच॒न|| 6||वर्ग:22 |
| सिन्धो᳚रिवप्रव॒णेनि॒म्नआ॒शवो॒वृष॑च्युता॒मदा᳚सोगा॒तुमा᳚शत| शंनो᳚निवे॒शेद्वि॒पदे॒चतु॑ष्पदे॒ऽस्मेवाजाः᳚सोमतिष्ठन्तुकृ॒ष्टयः॑|| 7|| |
| आनः॑पवस्व॒वसु॑म॒द्धिर᳚ण्यव॒दश्वा᳚व॒द्गोम॒द्यव॑मत्सु॒वीर्य᳚म्| यू॒यंहिसो᳚मपि॒तरो॒मम॒स्थन॑दि॒वोमू॒र्धानः॒प्रस्थि॑तावय॒स्कृतः॑|| 8|| |
| ए॒तेसोमाः॒पव॑मानास॒इन्द्रं॒रथा᳚इव॒प्रय॑युःसा॒तिमच्छ॑| सु॒ताःप॒वित्र॒मति॑य॒न्त्यव्यं᳚हि॒त्वीव॒व्रिंह॒रितो᳚वृ॒ष्टिमच्छ॑|| 9|| |
| इन्द॒विन्द्रा᳚यबृह॒तेप॑वस्वसुमृळी॒को,अ॑नव॒द्योरि॒शादाः᳚| भरा᳚च॒न्द्राणि॑गृण॒तेवसू᳚निदे॒वैर्द्या᳚वापृथिवी॒प्राव॑तंनः|| 10|| |
| [27] त्रिरस्माइति दशर्चस्यक्तसूस्य वैश्वामित्रोरेणुः पवमानसोमोजगत्यंत्यात्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:70}{अनुवाक:4, सूक्त:3} |
| त्रिर॑स्मैस॒प्तधे॒नवो᳚दुदुह्रेस॒त्यामा॒शिरं᳚पू॒र्व्येव्यो᳚मनि| च॒त्वार्य॒न्याभुव॑नानिनि॒र्णिजे॒चारू᳚णिचक्रे॒यदृ॒तैरव॑र्धत|| 1||वर्ग:23 |
| सभिक्ष॑माणो,अ॒मृत॑स्य॒चारु॑णउ॒भेद्यावा॒काव्ये᳚ना॒विश॑श्रथे| तेजि॑ष्ठा,अ॒पोमं॒हना॒परि᳚व्यत॒यदी᳚दे॒वस्य॒श्रव॑सा॒सदो᳚वि॒दुः|| 2|| |
| ते,अ॑स्यसन्तुके॒तवोऽमृ॑त्य॒वोऽदा᳚भ्यासोज॒नुषी᳚उ॒भे,अनु॑| येभि᳚र्नृ॒म्णाच॑दे॒व्या᳚चपुन॒तआदिद्राजा᳚नंम॒नना᳚अगृभ्णत|| 3|| |
| समृ॒ज्यमा᳚नोद॒शभिः॑सु॒कर्म॑भिः॒प्रम॑ध्य॒मासु॑मा॒तृषु॑प्र॒मेसचा᳚| व्र॒तानि॑पा॒नो,अ॒मृत॑स्य॒चारु॑णउ॒भेनृ॒चक्षा॒,अनु॑पश्यते॒विशौ᳚|| 4|| |
| सम᳚र्मृजा॒नइ᳚न्द्रि॒याय॒धाय॑स॒ओभे,अ॒न्तारोद॑सीहर्षतेहि॒तः| वृषा॒शुष्मे᳚णबाधते॒विदु᳚र्म॒तीरा॒देदि॑शानःशर्य॒हेव॑शु॒रुधः॑|| 5|| |
| समा॒तरा॒नददृ॑शानउ॒स्रियो॒नान॑ददेतिम॒रुता᳚मिवस्व॒नः| जा॒नन्नृ॒तंप्र॑थ॒मंयत्स्व᳚र्णरं॒प्रश॑स्तये॒कम॑वृणीतसु॒क्रतुः॑|| 6||वर्ग:24 |
| रु॒वति॑भी॒मोवृ॑ष॒भस्त॑वि॒ष्यया॒शृङ्गे॒शिशा᳚नो॒हरि॑णीविचक्ष॒णः| आयोनिं॒सोमः॒सुकृ॑तं॒निषी᳚दतिग॒व्ययी॒त्वग्भ॑वतिनि॒र्णिग॒व्ययी᳚|| 7|| |
| शुचिः॑पुना॒नस्त॒न्व॑मरे॒पस॒मव्ये॒हरि॒र्न्य॑धाविष्ट॒सान॑वि| जुष्टो᳚मि॒त्राय॒वरु॑णायवा॒यवे᳚त्रि॒धातु॒मधु॑क्रियतेसु॒कर्म॑भिः|| 8|| |
| पव॑स्वसोमदे॒ववी᳚तये॒वृषेन्द्र॑स्य॒हार्दि॑सोम॒धान॒मावि॑श| पु॒रानो᳚बा॒धाद्दु॑रि॒ताति॑पारयक्षेत्र॒विद्धिदिश॒आहा᳚विपृच्छ॒ते|| 9|| |
| हि॒तोनसप्ति॑र॒भिवाज॑म॒र्षेन्द्र॑स्येन्दोज॒ठर॒माप॑वस्व| ना॒वानसिन्धु॒मति॑पर्षिवि॒द्वाञ्छूरो॒नयुध्य॒न्नव॑नोनि॒दःस्पः॑|| 10|| |
| [28] आदक्षिणेति नवर्चस्य सूक्तस्य वैश्वामित्र ऋषभः पवमानसोमोजगत्यंत्यान्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:71}{अनुवाक:4, सूक्त:4} |
| आदक्षि॑णासृज्यतेशु॒ष्म्या॒३॑(आ॒)सदं॒वेति॑द्रु॒होर॒क्षसः॑पाति॒जागृ॑विः| हरि॑रोप॒शंकृ॑णुते॒नभ॒स्पय॑उप॒स्तिरे᳚च॒म्वो॒३॑(ओ॒)र्ब्रह्म॑नि॒र्णिजे᳚|| 1||वर्ग:25 |
| प्रकृ॑ष्टि॒हेव॑शू॒षए᳚ति॒रोरु॑वदसु॒र्य१॑(अं॒)वर्णं॒निरि॑णीते,अस्य॒तम्| जहा᳚तिव॒व्रिंपि॒तुरे᳚तिनिष्कृ॒तमु॑प॒प्रुतं᳚कृणुतेनि॒र्णिजं॒तना᳚|| 2|| |
| अद्रि॑भिःसु॒तःप॑वते॒गभ॑स्त्योर्वृषा॒यते॒नभ॑सा॒वेप॑तेम॒ती| समो᳚दते॒नस॑ते॒साध॑तेगि॒राने᳚नि॒क्ते,अ॒प्सुयज॑ते॒परी᳚मणि|| 3|| |
| परि॑द्यु॒क्षंसह॑सःपर्वता॒वृधं॒मध्वः॑सिञ्चन्तिह॒र्म्यस्य॑स॒क्षणि᳚म्| आयस्मि॒न्गावः॑सुहु॒ताद॒ऊध॑निमू॒र्धञ्छ्री॒णन्त्य॑ग्रि॒यंवरी᳚मभिः|| 4|| |
| समी॒रथं॒नभु॒रिजो᳚रहेषत॒दश॒स्वसा᳚रो॒,अदि॑तेरु॒पस्थ॒आ| जिगा॒दुप॑ज्रयति॒गोर॑पी॒च्यं᳚प॒दंयद॑स्यम॒तुथा॒,अजी᳚जनन्|| 5|| |
| श्ये॒नोनयोनिं॒सद॑नंधि॒याकृ॒तंहि॑र॒ण्यय॑मा॒सदं᳚दे॒वएष॑ति| एरि॑णन्तिब॒र्हिषि॑प्रि॒यंगि॒राश्वो॒नदे॒वाँ,अप्ये᳚तिय॒ज्ञियः॑|| 6||वर्ग:26 |
| परा॒व्य॑क्तो,अरु॒षोदि॒वःक॒विर्वृषा᳚त्रिपृ॒ष्ठो,अ॑नविष्ट॒गा,अ॒भि| स॒हस्र॑णीति॒र्यतिः॑परा॒यती᳚रे॒भोनपू॒र्वीरु॒षसो॒विरा᳚जति|| 7|| |
| त्वे॒षंरू॒पंकृ॑णुते॒वर्णो᳚अस्य॒सयत्राश॑य॒त्समृ॑ता॒सेध॑तिस्रि॒धः| अ॒प्साया᳚तिस्व॒धया॒दैव्यं॒जनं॒संसु॑ष्टु॒तीनस॑ते॒संगो,अ॑ग्रया|| 8|| |
| उ॒क्षेव॑यू॒थाप॑रि॒यन्न॑रावी॒दधि॒त्विषी᳚रधित॒सूर्य॑स्य| दि॒व्यःसु॑प॒र्णोऽव॑चक्षत॒क्षांसोमः॒परि॒क्रतु॑नापश्यते॒जाः|| 9|| |
| [29] हरिंमृजंतीति नवर्चस्य सूक्तस्य आंगिरसोहरिमंतः पवमानसोमोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:72}{अनुवाक:4, सूक्त:5} |
| हरिं᳚मृजन्त्यरु॒षोनयु॑ज्यते॒संधे॒नुभिः॑क॒लशे॒सोमो᳚अज्यते| उद्वाच॑मी॒रय॑तिहि॒न्वते᳚म॒तीपु॑रुष्टु॒तस्य॒कति॑चित्परि॒प्रियः॑|| 1||वर्ग:27 |
| सा॒कंव॑दन्तिब॒हवो᳚मनी॒षिण॒इन्द्र॑स्य॒सोमं᳚ज॒ठरे॒यदा᳚दु॒हुः| यदी᳚मृ॒जन्ति॒सुग॑भस्तयो॒नरः॒सनी᳚ळाभिर्द॒शभिः॒काम्यं॒मधु॑|| 2|| |
| अर॑ममाणो॒,अत्ये᳚ति॒गा,अ॒भिसूर्य॑स्यप्रि॒यंदु॑हि॒तुस्ति॒रोरव᳚म्| अन्व॑स्मै॒जोष॑मभरद्विनंगृ॒सःसंद्व॒यीभिः॒स्वसृ॑भिः,क्षेतिजा॒मिभिः॑|| 3|| |
| नृधू᳚तो॒,अद्रि॑षुतोब॒र्हिषि॑प्रि॒यःपति॒र्गवां᳚प्र॒दिव॒इन्दु᳚रृ॒त्वियः॑| पुरं᳚धिवा॒न्मनु॑षोयज्ञ॒साध॑नः॒शुचि॑र्धि॒याप॑वते॒सोम॑इन्द्रते|| 4|| |
| नृबा॒हुभ्यां᳚चोदि॒तोधार॑यासु॒तो᳚ऽनुष्व॒धंप॑वते॒सोम॑इन्द्रते| आप्राः॒क्रतू॒न्त्सम॑जैरध्व॒रेम॒तीर्वेर्नद्रु॒षच्च॒म्वो॒३॑(ओ॒)रास॑द॒द्धरिः॑|| 5|| |
| अं॒शुंदु॑हन्तिस्त॒नय᳚न्त॒मक्षि॑तंक॒विंक॒वयो॒ऽपसो᳚मनी॒षिणः॑| समी॒गावो᳚म॒तयो᳚यन्तिसं॒यत॑ऋ॒तस्य॒योना॒सद॑नेपुन॒र्भुवः॑|| 6||वर्ग:28 |
| नाभा᳚पृथि॒व्याध॒रुणो᳚म॒होदि॒वो॒३॑(ओ॒)ऽपामू॒र्मौसिन्धु॑ष्व॒न्तरु॑क्षि॒तः| इन्द्र॑स्य॒वज्रो᳚वृष॒भोवि॒भूव॑सुः॒सोमो᳚हृ॒देप॑वते॒चारु॑मत्स॒रः|| 7|| |
| सतूप॑वस्व॒परि॒पार्थि॑वं॒रजः॑स्तो॒त्रेशिक्ष᳚न्नाधून्व॒तेच॑सुक्रतो| मानो॒निर्भा॒ग्वसु॑नःसादन॒स्पृशो᳚र॒यिंपि॒शङ्गं᳚बहु॒लंव॑सीमहि|| 8|| |
| आतून॑इन्दोश॒तदा॒त्वश्व्यं᳚स॒हस्र॑दातुपशु॒मद्धिर᳚ण्यवत्| उप॑मास्वबृह॒तीरे॒वती॒रिषोऽधि॑स्तो॒त्रस्य॑पवमाननोगहि|| 9|| |
| [30] स्रक्वेद्रप्सस्येति नवर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः पवित्रः पवमान सोमो जगती |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:73}{अनुवाक:4, सूक्त:6} |
| स्रक्वे᳚द्र॒प्सस्य॒धम॑तः॒सम॑स्वरन्नृ॒तस्य॒योना॒सम॑रन्त॒नाभ॑यः| त्रीन्त्समू॒र्ध्नो,असु॑रश्चक्रआ॒रभे᳚स॒त्यस्य॒नावः॑सु॒कृत॑मपीपरन्|| 1||वर्ग:29 |
| स॒म्यक्स॒म्यञ्चो᳚महि॒षा,अ॑हेषत॒सिन्धो᳚रू॒र्मावधि॑वे॒ना,अ॑वीविपन्| मधो॒र्धारा᳚भिर्ज॒नय᳚न्तो,अ॒र्कमित्प्रि॒यामिन्द्र॑स्यत॒न्व॑मवीवृधन्|| 2|| |
| प॒वित्र॑वन्तः॒परि॒वाच॑मासते¦पि॒तैषां᳚प्र॒त्नो,अ॒भिर॑क्षतिव्र॒तम्| म॒हःस॑मु॒द्रंवरु॑णस्ति॒रोद॑धे॒¦धीरा॒,इच्छे᳚कुर्ध॒रुणे᳚ष्वा॒रभ᳚म्|| 3|| |
| स॒हस्र॑धा॒रेऽव॒तेसम॑स्वरन्¦दि॒वोनाके॒मधु॑जिह्वा,अस॒श्चतः॑| अस्य॒स्पशो॒ननिमि॑षन्ति॒भूर्ण॑यः¦प॒देप॑देपा॒शिनः॑सन्ति॒सेत॑वः|| 4|| |
| पि॒तुर्मा॒तुरध्यायेस॒मस्व॑र¦न्नृ॒चाशोच᳚न्तःसं॒दह᳚न्तो,अव्र॒तान्| इन्द्र॑द्विष्टा॒मप॑धमन्तिमा॒यया॒¦त्वच॒मसि॑क्नीं॒भूम॑नोदि॒वस्परि॑|| 5|| |
| प्र॒त्नान्माना॒दध्यायेस॒मस्व॑र॒¦ञ्छ्लोक॑यन्त्रासोरभ॒सस्य॒मन्त॑वः| अपा᳚न॒क्षासो᳚बधि॒रा,अ॑हासत¦ऋ॒तस्य॒पन्थां॒नत॑रन्तिदु॒ष्कृतः॑|| 6||वर्ग:30 |
| स॒हस्र॑धारे॒वित॑तेप॒वित्र॒आ¦वाचं᳚पुनन्तिक॒वयो᳚मनी॒षिणः॑| रु॒द्रास॑एषामिषि॒रासो᳚अ॒द्रुहः॒¦स्पशः॒स्वञ्चः॑सु॒दृशो᳚नृ॒चक्ष॑सः|| 7|| |
| ऋ॒तस्य॑गो॒पानदभा᳚यसु॒क्रतु॒स्त्रीषप॒वित्रा᳚हृ॒द्य१॑(अ॒)न्तराद॑धे| वि॒द्वान्त्सविश्वा॒भुव॑ना॒भिप॑श्य॒त्यवाजु॑ष्टान्विध्यतिक॒र्ते,अ᳚व्र॒तान्|| 8|| |
| ऋ॒तस्य॒तन्तु॒र्वित॑तःप॒वित्र॒आजि॒ह्वाया॒,अग्रे॒वरु॑णस्यमा॒यया᳚| धीरा᳚श्चि॒त्तत्स॒मिन॑क्षन्तआश॒तात्रा᳚क॒र्तमव॑पदा॒त्यप्र॑भुः|| 9|| |
| [31] शिशुर्नेति नवर्चस्य सूक्तस्य दैर्घतमसः कक्षीवान्पवमान सोमोजगत्यष्टमीत्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:74}{अनुवाक:4, सूक्त:7} |
| शिशु॒र्नजा॒तोऽव॑चक्रद॒द्वने॒स्व१॑(अ॒)र्यद्वा॒ज्य॑रु॒षःसिषा᳚सति| दि॒वोरेत॑सासचतेपयो॒वृधा॒तमी᳚महेसुम॒तीशर्म॑स॒प्रथः॑|| 1||वर्ग:31 |
| दि॒वोयःस्क॒म्भोध॒रुणः॒स्वा᳚तत॒आपू᳚र्णो,अं॒शुःप॒र्येति॑वि॒श्वतः॑| सेमेम॒हीरोद॑सीयक्षदा॒वृता᳚समीची॒नेदा᳚धार॒समिषः॑क॒विः|| 2|| |
| महि॒प्सरः॒सुकृ॑तंसो॒म्यंमधू॒र्वीगव्यू᳚ति॒रदि॑तेरृ॒तंय॒ते| ईशे॒योवृ॒ष्टेरि॒तउ॒स्रियो॒वृषा॒पांने॒तायइ॒तऊ᳚तिरृ॒ग्मियः॑|| 3|| |
| आ॒त्म॒न्वन्नभो᳚दुह्यतेघृ॒तंपय॑ऋ॒तस्य॒नाभि॑र॒मृतं॒विजा᳚यते| स॒मी॒ची॒नाःसु॒दान॑वःप्रीणन्ति॒तंनरो᳚हि॒तमव॑मेहन्ति॒पेर॑वः|| 4|| |
| अरा᳚वीदं॒शुःसच॑मानऊ॒र्मिणा᳚देवा॒व्य१॑(अं॒)मनु॑षेपिन्वति॒त्वच᳚म्| दधा᳚ति॒गर्भ॒मदि॑तेरु॒पस्थ॒आयेन॑तो॒कंच॒तन॑यंच॒धाम॑हे|| 5|| |
| स॒हस्र॑धा॒रेऽव॒ता,अ॑स॒श्चत॑स्तृ॒तीये᳚सन्तु॒रज॑सिप्र॒जाव॑तीः| चत॑स्रो॒नाभो॒निहि॑ता,अ॒वोदि॒वोह॒विर्भ॑रन्त्य॒मृतं᳚घृत॒श्चुतः॑|| 6||वर्ग:32 |
| श्वे॒तंरू॒पंकृ॑णुते॒यत्सिषा᳚सति॒सोमो᳚मी॒ढ्वाँ,असु॑रोवेद॒भूम॑नः| धि॒याशमी᳚सचते॒सेम॒भिप्र॒वद्दि॒वस्कव᳚न्ध॒मव॑दर्षदु॒द्रिण᳚म्|| 7|| |
| अध॑श्वे॒तंक॒लशं॒गोभि॑र॒क्तंकार्ष्म॒न्नावा॒ज्य॑क्रमीत्सस॒वान्| आहि᳚न्विरे॒मन॑सादेव॒यन्तः॑क॒क्षीव॑तेश॒तहि॑माय॒गोना᳚म्|| 8|| |
| अ॒द्भिःसो᳚मपपृचा॒नस्य॑ते॒रसोऽव्यो॒वारं॒विप॑वमानधावति| समृ॒ज्यमा᳚नःक॒विभि᳚र्मदिन्तम॒स्वद॒स्वेन्द्रा᳚यपवमानपी॒तये᳚|| 9|| |
| [32] अभिप्रियाणीति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमानसोमोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:2}{मंडल:9, सूक्त:75}{अनुवाक:4, सूक्त:8} |
| अ॒भिप्रि॒याणि॑पवते॒चनो᳚हितो॒नामा᳚निय॒ह्वो,अधि॒येषु॒वर्ध॑ते| आसूर्य॑स्यबृह॒तोबृ॒हन्नधि॒रथं॒विष्व᳚ञ्चमरुहद्विचक्ष॒णः|| 1||वर्ग:33 |
| ऋ॒तस्य॑जि॒ह्वाप॑वते॒मधु॑प्रि॒यंव॒क्तापति॑र्धि॒यो,अ॒स्या,अदा᳚भ्यः| दधा᳚तिपु॒त्रःपि॒त्रोर॑पी॒च्य१॑(अं॒)नाम॑तृ॒तीय॒मधि॑रोच॒नेदि॒वः|| 2|| |
| अव॑द्युता॒नःक॒लशाँ᳚,अचिक्रद॒न्नृभि᳚र्येमा॒नःकोश॒आहि॑र॒ण्यये᳚| अ॒भीमृ॒तस्य॑दो॒हना᳚अनूष॒ताधि॑त्रिपृ॒ष्ठउ॒षसो॒विरा᳚जति|| 3|| |
| अद्रि॑भिःसु॒तोम॒तिभि॒श्चनो᳚हितःप्ररो॒चय॒न्रोद॑सीमा॒तरा॒शुचिः॑| रोमा॒ण्यव्या᳚स॒मया॒विधा᳚वति॒मधो॒र्धारा॒पिन्व॑मानादि॒वेदि॑वे|| 4|| |
| परि॑सोम॒प्रध᳚न्वास्व॒स्तये॒नृभिः॑पुना॒नो,अ॒भिवा᳚सया॒शिर᳚म्| येते॒मदा᳚आह॒नसो॒विहा᳚यस॒स्तेभि॒रिन्द्रं᳚चोदय॒दात॑वेम॒घम्|| 5|| |
| [33] धर्तेति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमानसोमोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:76}{अनुवाक:4, सूक्त:9} |
| ध॒र्तादि॒वःप॑वते॒कृत्व्यो॒रसो॒दक्षो᳚दे॒वाना᳚मनु॒माद्यो॒नृभिः॑| हरिः॑सृजा॒नो,अत्यो॒नसत्व॑भि॒र्वृथा॒पाजां᳚सिकृणुतेन॒दीष्वा|| 1||वर्ग:1 |
| शूरो॒नध॑त्त॒आयु॑धा॒गभ॑स्त्योः॒स्व१॑(अः॒)सिषा᳚सन्रथि॒रोगवि॑ष्टिषु| इन्द्र॑स्य॒शुष्म॑मी॒रय᳚न्नप॒स्युभि॒रिन्दु᳚र्हिन्वा॒नो,अ॑ज्यतेमनी॒षिभिः॑|| 2|| |
| इन्द्र॑स्यसोम॒पव॑मानऊ॒र्मिणा᳚तवि॒ष्यमा᳚णोज॒ठरे॒ष्वावि॑श| प्रणः॑पिन्ववि॒द्युद॒भ्रेव॒रोद॑सीधि॒यानवाजाँ॒,उप॑मासि॒शश्व॑तः|| 3|| |
| विश्व॑स्य॒राजा᳚पवतेस्व॒र्दृश॑ऋ॒तस्य॑धी॒तिमृ॑षि॒षाळ॑वीवशत्| यःसूर्य॒स्यासि॑रेणमृ॒ज्यते᳚पि॒ताम॑ती॒नामस॑मष्टकाव्यः|| 4|| |
| वृषे᳚वयू॒थापरि॒कोश॑मर्षस्य॒पामु॒पस्थे᳚वृष॒भःकनि॑क्रदत्| सइन्द्रा᳚यपवसेमत्स॒रिन्त॑मो॒यथा॒जेषा᳚मसमि॒थेत्वोत॑यः|| 5|| |
| [34] एषइति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमान सोमोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:77}{अनुवाक:4, सूक्त:10} |
| ए॒षप्रकोशे॒मधु॑माँ,अचिक्रद॒दिन्द्र॑स्य॒वज्रो॒वपु॑षो॒वपु॑ष्टरः| अ॒भीमृ॒तस्य॑सु॒दुघा᳚घृत॒श्चुतो᳚वा॒श्रा,अ॑र्षन्ति॒पय॑सेवधे॒नवः॑|| 1||वर्ग:2 |
| सपू॒र्व्यःप॑वते॒यंदि॒वस्परि॑श्ये॒नोम॑था॒यदि॑षि॒तस्ति॒रोरजः॑| समध्व॒आयु॑वते॒वेवि॑जान॒इत्कृ॒शानो॒रस्तु॒र्मन॒साह॑बि॒भ्युषा᳚|| 2|| |
| तेनः॒पूर्वा᳚स॒उप॑रास॒इन्द॑वोम॒हेवाजा᳚यधन्वन्तु॒गोम॑ते| ई॒क्षे॒ण्या᳚सो,अ॒ह्यो॒३॑(ओ॒)नचार॑वो॒ब्रह्म॑ब्रह्म॒येजु॑जु॒षुर्ह॒विर्ह॑विः|| 3|| |
| अ॒यंनो᳚वि॒द्वान्व॑नवद्वनुष्य॒तइन्दुः॑स॒त्राचा॒मन॑सापुरुष्टु॒तः| इ॒नस्य॒यःसद॑ने॒गर्भ॑माद॒धेगवा᳚मुरु॒ब्जम॒भ्यर्ष॑तिव्र॒जम्|| 4|| |
| चक्रि॑र्दि॒वःप॑वते॒कृत्व्यो॒रसो᳚म॒हाँ,अद॑ब्धो॒वरु॑णोहु॒रुग्य॒ते| असा᳚विमि॒त्रोवृ॒जने᳚षुय॒ज्ञियोऽत्यो॒नयू॒थेवृ॑ष॒युःकनि॑क्रदत्|| 5|| |
| [35] प्रराजेति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमान सोमो जगती |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:78}{अनुवाक:4, सूक्त:11} |
| प्रराजा॒वाचं᳚ज॒नय᳚न्नसिष्यदद॒पोवसा᳚नो,अ॒भिगा,इ॑यक्षति| गृ॒भ्णाति॑रि॒प्रमवि॑रस्य॒तान्वा᳚शु॒द्धोदे॒वाना॒मुप॑यातिनिष्कृ॒तम्|| 1||वर्ग:3 |
| इन्द्रा᳚यसोम॒परि॑षिच्यसे॒नृभि᳚र्नृ॒चक्षा᳚ऊ॒र्मिःक॒विर॑ज्यसे॒वने᳚| पू॒र्वीर्हिते᳚स्रु॒तयः॒सन्ति॒यात॑वेस॒हस्र॒मश्वा॒हर॑यश्चमू॒षदः॑|| 2|| |
| स॒मु॒द्रिया᳚अप्स॒रसो᳚मनी॒षिण॒मासी᳚ना,अ॒न्तर॒भिसोम॑मक्षरन्| ता,ईं᳚हिन्वन्तिह॒र्म्यस्य॑स॒क्षणिं॒याच᳚न्तेसु॒म्नंपव॑मान॒मक्षि॑तम्|| 3|| |
| गो॒जिन्नः॒सोमो᳚रथ॒जिद्धि॑रण्य॒जित्स्व॒र्जिद॒ब्जित्प॑वतेसहस्र॒जित्| यंदे॒वास॑श्चक्रि॒रेपी॒तये॒मदं॒स्वादि॑ष्ठंद्र॒प्सम॑रु॒णंम॑यो॒भुव᳚म्|| 4|| |
| ए॒तानि॑सोम॒पव॑मानो,अस्म॒युःस॒त्यानि॑कृ॒ण्वन्द्रवि॑णान्यर्षसि| ज॒हिशत्रु॑मन्ति॒केदू᳚र॒केच॒यउ॒र्वींगव्यू᳚ति॒मभ॑यंचनस्कृधि|| 5|| |
| [36] अचोदसइति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमानसोमोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:79}{अनुवाक:4, सूक्त:12} |
| अ॒चो॒दसो᳚नोधन्व॒न्त्विन्द॑वः॒प्रसु॑वा॒नासो᳚बृ॒हद्दि॑वेषु॒हर॑यः| विच॒नश᳚न्नइ॒षो,अरा᳚तयो॒ऽर्योन॑शन्त॒सनि॑षन्तनो॒धियः॑|| 1||वर्ग:4 |
| प्रणो᳚धन्व॒न्त्विन्द॑वोमद॒च्युतो॒धना᳚वा॒येभि॒रर्व॑तोजुनी॒मसि॑| ति॒रोमर्त॑स्य॒कस्य॑चि॒त्परि॑ह्वृतिंव॒यंधना᳚निवि॒श्वधा᳚भरेमहि|| 2|| |
| उ॒तस्वस्या॒,अरा᳚त्या,अ॒रिर्हिषउ॒तान्यस्या॒,अरा᳚त्या॒वृको॒हिषः| धन्व॒न्नतृष्णा॒सम॑रीत॒ताँ,अ॒भिसोम॑ज॒हिप॑वमानदुरा॒ध्यः॑|| 3|| |
| दि॒विते॒नाभा᳚पर॒मोयआ᳚द॒देपृ॑थि॒व्यास्ते᳚रुरुहुः॒सान॑वि॒क्षिपः॑| अद्र॑यस्त्वाबप्सति॒गोरधि॑त्व॒च्य१॑(अ॒)प्सुत्वा॒हस्तै᳚र्दुदुहुर्मनी॒षिणः॑|| 4|| |
| ए॒वात॑इन्दोसु॒भ्वं᳚सु॒पेश॑सं॒रसं᳚तुञ्जन्तिप्रथ॒मा,अ॑भि॒श्रियः॑| निदं᳚निदंपवमान॒निता᳚रिषआ॒विस्ते॒शुष्मो᳚भवतुप्रि॒योमदः॑|| 5|| |
| [37] सोमस्येति पंचर्चस्य सूक्तस्य भारद्वाजो वसुः पवमान सोमोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:80}{अनुवाक:4, सूक्त:13} |
| सोम॑स्य॒धारा᳚पवतेनृ॒चक्ष॑सऋ॒तेन॑दे॒वान्ह॑वतेदि॒वस्परि॑| बृह॒स्पते᳚र॒वथे᳚ना॒विदि॑द्युतेसमु॒द्रासो॒नसव॑नानिविव्यचुः|| 1||वर्ग:5 |
| यंत्वा᳚वाजिन्न॒घ्न्या,अ॒भ्यनू᳚ष॒तायो᳚हतं॒योनि॒मारो᳚हसिद्यु॒मान्| म॒घोना॒मायुः॑प्रति॒रन्महि॒श्रव॒इन्द्रा᳚यसोमपवसे॒वृषा॒मदः॑|| 2|| |
| एन्द्र॑स्यकु॒क्षाप॑वतेम॒दिन्त॑म॒ऊर्जं॒वसा᳚नः॒श्रव॑सेसुम॒ङ्गलः॑| प्र॒त्यङ्सविश्वा॒भुव॑ना॒भिप॑प्रथे॒क्रीळ॒न्हरि॒रत्यः॑स्यन्दते॒वृषा᳚|| 3|| |
| तंत्वा᳚दे॒वेभ्यो॒मधु॑मत्तमं॒नरः॑स॒हस्र॑धारंदुहते॒दश॒क्षिपः॑| नृभिः॑सोम॒प्रच्यु॑तो॒ग्राव॑भिःसु॒तोविश्वा᳚न्दे॒वाँ,आप॑वस्वासहस्रजित्|| 4|| |
| तंत्वा᳚ह॒स्तिनो॒मधु॑मन्त॒मद्रि॑भिर्दु॒हन्त्य॒प्सुवृ॑ष॒भंदश॒क्षिपः॑| इन्द्रं᳚सोममा॒दय॒न्दैव्यं॒जनं॒सिन्धो᳚रिवो॒र्मिःपव॑मानो,अर्षसि|| 5|| |
| [38] प्रसोमस्येति पंचर्चस्य सूक्तस्य भारद्वाजो वसुः पवमान सोमोजगत्यंत्यात्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:81}{अनुवाक:4, सूक्त:14} |
| प्रसोम॑स्य॒पव॑मानस्यो॒र्मय॒इन्द्र॑स्ययन्तिज॒ठरं᳚सु॒पेश॑सः| द॒ध्नायदी॒मुन्नी᳚ताय॒शसा॒गवां᳚दा॒नाय॒शूर॑मु॒दम᳚न्दिषुःसु॒ताः|| 1||वर्ग:6 |
| अच्छा॒हिसोमः॑क॒लशाँ॒,असि॑ष्यद॒दत्यो॒नवोळ्हा᳚र॒घुव॑र्तनि॒र्वृषा᳚| अथा᳚दे॒वाना᳚मु॒भय॑स्य॒जन्म॑नोवि॒द्वाँ,अ॑श्नोत्य॒मुत॑इ॒तश्च॒यत्|| 2|| |
| आनः॑सोम॒पव॑मानःकिरा॒वस्विन्दो॒भव॑म॒घवा॒राध॑सोम॒हः| शिक्षा᳚वयोधो॒वस॑वे॒सुचे॒तुना॒मानो॒गय॑मा॒रे,अ॒स्मत्परा᳚सिचः|| 3|| |
| आनः॑पू॒षापव॑मानःसुरा॒तयो᳚मि॒त्रोग॑च्छन्तु॒वरु॑णःस॒जोष॑सः| बृह॒स्पति᳚र्म॒रुतो᳚वा॒युर॒श्विना॒त्वष्टा᳚सवि॒तासु॒यमा॒सर॑स्वती|| 4|| |
| उ॒भेद्यावा᳚पृथि॒वीवि॑श्वमि॒न्वे,अ᳚र्य॒मादे॒वो,अदि॑तिर्विधा॒ता| भगो॒नृशंस॑उ॒र्व१॑(अ॒)न्तरि॑क्षं॒विश्वे᳚दे॒वाःपव॑मानंजुषन्त|| 5|| |
| [39] असावीति पंचर्चस्य सूक्तस्य भारद्वाजो वसुः पवमान सोमोजगत्यंत्यात्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:82}{अनुवाक:4, सूक्त:15} |
| असा᳚वि॒सोमो᳚अरु॒षोवृषा॒हरी॒राजे᳚वद॒स्मो,अ॒भिगा,अ॑चिक्रदत्| पु॒ना॒नोवारं॒पर्ये᳚त्य॒व्ययं᳚श्ये॒नोनयोनिं᳚घृ॒तव᳚न्तमा॒सद᳚म्|| 1||वर्ग:7 |
| क॒विर्वे᳚ध॒स्यापर्ये᳚षि॒माहि॑न॒मत्यो॒नमृ॒ष्टो,अ॒भिवाज॑मर्षसि| अ॒प॒सेध᳚न्दुरि॒तासो᳚ममृळयघृ॒तंवसा᳚नः॒परि॑यासिनि॒र्णिज᳚म्|| 2|| |
| प॒र्जन्यः॑पि॒ताम॑हि॒षस्य॑प॒र्णिनो॒नाभा᳚पृथि॒व्यागि॒रिषु॒क्षयं᳚दधे| स्वसा᳚र॒आपो᳚अ॒भिगा,उ॒तास॑र॒न्त्संग्राव॑भिर्नसतेवी॒ते,अ॑ध्व॒रे|| 3|| |
| जा॒येव॒पत्या॒वधि॒शेव॑मंहसे॒पज्रा᳚यागर्भशृणु॒हिब्रवी᳚मिते| अ॒न्तर्वाणी᳚षु॒प्रच॑रा॒सुजी॒वसे᳚ऽनि॒न्द्योवृ॒जने᳚सोमजागृहि|| 4|| |
| यथा॒पूर्वे᳚भ्यःशत॒सा,अमृ॑ध्रःसहस्र॒साःप॒र्यया॒वाज॑मिन्दो| ए॒वाप॑वस्वसुवि॒ताय॒नव्य॑से॒तव᳚व्र॒तमन्वापः॑सचन्ते|| 5|| |
| [40] पवित्रंतइति पंचर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः पवित्रः पवमानसोमोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:83}{अनुवाक:4, सूक्त:16} |
| प॒वित्रं᳚ते॒वित॑तंब्रह्मणस्पते¦प्र॒भुर्गात्रा᳚णि॒पर्ये᳚षिवि॒श्वतः॑| अत॑प्ततनू॒र्नतदा॒मो,अ॑श्नुते¦शृ॒तास॒इद्वह᳚न्त॒स्तत्समा᳚शत|| 1||वर्ग:8 |
| तपो᳚ष्प॒वित्रं॒वित॑तंदि॒वस्प॒देशोच᳚न्तो,अस्य॒तन्त॑वो॒व्य॑स्थिरन्| अव᳚न्त्यस्यपवी॒तार॑मा॒शवो᳚दि॒वस्पृ॒ष्ठमधि॑तिष्ठन्ति॒चेत॑सा|| 2|| |
| अरू᳚रुचदु॒षसः॒पृश्नि॑रग्रि॒यउ॒क्षाबि॑भर्ति॒भुव॑नानिवाज॒युः| मा॒या॒विनो᳚ममिरे,अस्यमा॒यया᳚नृ॒चक्ष॑सःपि॒तरो॒गर्भ॒माद॑धुः|| 3|| |
| ग॒न्ध॒र्वइ॒त्थाप॒दम॑स्यरक्षति॒पाति॑दे॒वानां॒जनि॑मा॒न्यद्भु॑तः| गृ॒भ्णाति॑रि॒पुंनि॒धया᳚नि॒धाप॑तिःसु॒कृत्त॑मा॒मधु॑नोभ॒क्षमा᳚शत|| 4|| |
| ह॒विर्ह॑विष्मो॒महि॒सद्म॒दैव्यं॒नभो॒वसा᳚नः॒परि॑यास्यध्व॒रम्| राजा᳚प॒वित्र॑रथो॒वाज॒मारु॑हःस॒हस्र॑भृष्टिर्जयसि॒श्रवो᳚बृ॒हत्|| 5|| |
| [41] पवस्वेति पंचर्चस्य सूक्तस्य वाच्यः प्रजापतिः पवमान सोमोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:84}{अनुवाक:4, सूक्त:17} |
| पव॑स्वदेव॒माद॑नो॒विच॑र्षणिर॒प्सा,इन्द्रा᳚य॒वरु॑णायवा॒यवे᳚| कृ॒धीनो᳚अ॒द्यवरि॑वःस्वस्ति॒मदु॑रुक्षि॒तौगृ॑णीहि॒दैव्यं॒जन᳚म्|| 1||वर्ग:9 |
| आयस्त॒स्थौभुव॑ना॒न्यम॑र्त्यो॒विश्वा᳚नि॒सोमः॒परि॒तान्य॑र्षति| कृ॒ण्वन्त्सं॒चृतं᳚वि॒चृत॑म॒भिष्ट॑य॒इन्दुः॑सिषक्त्यु॒षसं॒नसूर्यः॑|| 2|| |
| आयोगोभिः॑सृ॒ज्यत॒ओष॑धी॒ष्वादे॒वानां᳚सु॒म्नइ॒षय॒न्नुपा᳚वसुः| आवि॒द्युता᳚पवते॒धार॑यासु॒तइन्द्रं॒सोमो᳚मा॒दय॒न्दैव्यं॒जन᳚म्|| 3|| |
| ए॒षस्यसोमः॑पवतेसहस्र॒जिद्धि᳚न्वा॒नोवाच॑मिषि॒रामु॑ष॒र्बुध᳚म्| इन्दुः॑समु॒द्रमुदि॑यर्तिवा॒युभि॒रेन्द्र॑स्य॒हार्दि॑क॒लशे᳚षुसीदति|| 4|| |
| अ॒भित्यंगावः॒पय॑सापयो॒वृधं॒सोमं᳚श्रीणन्तिम॒तिभिः॑स्व॒र्विद᳚म्| ध॒नं॒ज॒यःप॑वते॒कृत्व्यो॒रसो॒विप्रः॑क॒विःकाव्ये᳚ना॒स्व॑र्चनाः|| 5|| |
| [42] इंद्रायेति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य भार्गवोवेनः पवमानसोमो जगत्यंत्येद्वेत्रिष्टुभौ |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:85}{अनुवाक:4, सूक्त:18} |
| इन्द्रा᳚यसोम॒सुषु॑तः॒परि॑स्र॒वापामी᳚वाभवतु॒रक्ष॑सास॒ह| माते॒रस॑स्यमत्सतद्वया॒विनो॒द्रवि॑णस्वन्तइ॒हस॒न्त्विन्द॑वः|| 1||वर्ग:10 |
| अ॒स्मान्त्स॑म॒र्येप॑वमानचोदय॒दक्षो᳚दे॒वाना॒मसि॒हिप्रि॒योमदः॑| ज॒हिशत्रूँ᳚र॒भ्याभ᳚न्दनाय॒तःपिबे᳚न्द्र॒सोम॒मव॑नो॒मृधो᳚जहि|| 2|| |
| अद॑ब्धइन्दोपवसेम॒दिन्त॑मआ॒त्मेन्द्र॑स्यभवसिधा॒सिरु॑त्त॒मः| अ॒भिस्व॑रन्तिब॒हवो᳚मनी॒षिणो॒राजा᳚नम॒स्यभुव॑नस्यनिंसते|| 3|| |
| स॒हस्र॑णीथःश॒तधा᳚रो॒,अद्भु॑त॒इन्द्रा॒येन्दुः॑पवते॒काम्यं॒मधु॑| जय॒न्क्षेत्र॑म॒भ्य॑र्षा॒जय᳚न्न॒पउ॒रुंनो᳚गा॒तुंकृ॑णुसोममीढ्वः|| 4|| |
| कनि॑क्रदत्क॒लशे॒गोभि॑रज्यसे॒व्य१॑(अ॒)व्ययं᳚स॒मया॒वार॑मर्षसि| म॒र्मृ॒ज्यमा᳚नो॒,अत्यो॒नसा᳚न॒सिरिन्द्र॑स्यसोमज॒ठरे॒सम॑क्षरः|| 5|| |
| स्वा॒दुःप॑वस्वदि॒व्याय॒जन्म॑ने¦स्वा॒दुरिन्द्रा᳚यसु॒हवी᳚तुनाम्ने| स्वा॒दुर्मि॒त्राय॒वरु॑णायवा॒यवे॒¦बृह॒स्पत॑ये॒मधु॑माँ॒,अदा᳚भ्यः|| 6||वर्ग:11 |
| अत्यं᳚मृजन्तिक॒लशे॒दश॒क्षिपः॒प्रविप्रा᳚णांम॒तयो॒वाच॑ईरते| पव॑माना,अ॒भ्य॑र्षन्तिसुष्टु॒तिमेन्द्रं᳚विशन्तिमदि॒रास॒इन्द॑वः|| 7|| |
| पव॑मानो,अ॒भ्य॑र्षासु॒वीर्य॑मु॒र्वींगव्यू᳚तिं॒महि॒शर्म॑स॒प्रथः॑| माकि᳚र्नो,अ॒स्यपरि॑षूतिरीश॒तेन्दो॒जये᳚म॒त्वया॒धनं᳚धनम्|| 8|| |
| अधि॒द्याम॑स्थाद्वृष॒भोवि॑चक्ष॒णोऽरू᳚रुच॒द्विदि॒वोरो᳚च॒नाक॒विः| राजा᳚प॒वित्र॒मत्ये᳚ति॒रोरु॑वद्दि॒वःपी॒यूषं᳚दुहतेनृ॒चक्ष॑सः|| 9|| |
| दि॒वोनाके॒मधु॑जिह्वा,अस॒श्चतो᳚वे॒नादु॑हन्त्यु॒क्षणं᳚गिरि॒ष्ठाम्| अ॒प्सुद्र॒प्संवा᳚वृधा॒नंस॑मु॒द्रआसिन्धो᳚रू॒र्मामधु॑मन्तंप॒वित्र॒आ|| 10|| |
| नाके᳚सुप॒र्णमु॑पपप्ति॒वांसं॒गिरो᳚वे॒नाना᳚मकृपन्तपू॒र्वीः| शिशुं᳚रिहन्तिम॒तयः॒पनि॑प्नतंहिर॒ण्ययं᳚शकु॒नंक्षाम॑णि॒स्थाम्|| 11|| |
| ऊ॒र्ध्वोग᳚न्ध॒र्वो,अधि॒नाके᳚अस्था॒द्विश्वा᳚रू॒पाप्र॑ति॒चक्षा᳚णो,अस्य| भा॒नुःशु॒क्रेण॑शो॒चिषा॒व्य॑द्यौ॒त्प्रारू᳚रुच॒द्रोद॑सीमा॒तरा॒शुचिः॑|| 12|| |
| [43] प्रतआशवइत्यष्टाचत्वारिंशदृचस्य सूक्तस्य आद्यानांदशानामकृष्टामाषाऋषयः एकादश्यादिदशानांसिकतानिवावरी एकविंश्यादिदशानां पृश्नियोजाः एकत्रिंश्यादिदशानामत्रेयः एकचत्वारिंश्यादिपंचानांभौमोत्रिः अत्यानांतिसृणां शौनकोगृत्समदः पवमान सोमोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:86}{अनुवाक:5, सूक्त:1} |
| प्रत॑आ॒शवः॑पवमानधी॒जवो॒मदा᳚अर्षन्तिरघु॒जा,इ॑व॒त्मना᳚| दि॒व्याःसु॑प॒र्णामधु॑मन्त॒इन्द॑वोम॒दिन्त॑मासः॒परि॒कोश॑मासते|| 1||वर्ग:12 |
| प्रते॒मदा᳚सोमदि॒रास॑आ॒शवोऽसृ॑क्षत॒रथ्या᳚सो॒यथा॒पृथ॑क्| धे॒नुर्नव॒त्संपय॑सा॒भिव॒ज्रिण॒मिन्द्र॒मिन्द॑वो॒मधु॑मन्तऊ॒र्मयः॑|| 2|| |
| अत्यो॒नहि॑या॒नो,अ॒भिवाज॑मर्षस्व॒र्वित्कोशं᳚दि॒वो,अद्रि॑मातरम्| वृषा᳚प॒वित्रे॒,अधि॒सानो᳚अ॒व्यये॒सोमः॑पुना॒नइ᳚न्द्रि॒याय॒धाय॑से|| 3|| |
| प्रत॒आश्वि॑नीःपवमानधी॒जुवो᳚दि॒व्या,अ॑सृग्र॒न्पय॑सा॒धरी᳚मणि| प्रान्तरृष॑यः॒स्थावि॑रीरसृक्षत॒येत्वा᳚मृ॒जन्त्यृ॑षिषाणवे॒धसः॑|| 4|| |
| विश्वा॒धामा᳚निविश्वचक्ष॒ऋभ्व॑सःप्र॒भोस्ते᳚स॒तःपरि॑यन्तिके॒तवः॑| व्या॒न॒शिःप॑वसेसोम॒धर्म॑भिः॒पति॒र्विश्व॑स्य॒भुव॑नस्यराजसि|| 5|| |
| उ॒भ॒यतः॒पव॑मानस्यर॒श्मयो᳚ध्रु॒वस्य॑स॒तःपरि॑यन्तिके॒तवः॑| यदी᳚प॒वित्रे॒,अधि॑मृ॒ज्यते॒हरिः॒सत्ता॒नियोना᳚क॒लशे᳚षुसीदति|| 6||वर्ग:13 |
| य॒ज्ञस्य॑के॒तुःप॑वतेस्वध्व॒रःसोमो᳚दे॒वाना॒मुप॑यातिनिष्कृ॒तम्| स॒हस्र॑धारः॒परि॒कोश॑मर्षति॒वृषा᳚प॒वित्र॒मत्ये᳚ति॒रोरु॑वत्|| 7|| |
| राजा᳚समु॒द्रंन॒द्यो॒३॑(ओ॒)विगा᳚हते॒ऽपामू॒र्मिंस॑चते॒सिन्धु॑षुश्रि॒तः| अध्य॑स्था॒त्सानु॒पव॑मानो,अ॒व्ययं॒नाभा᳚पृथि॒व्याध॒रुणो᳚म॒होदि॒वः|| 8|| |
| दि॒वोनसानु॑स्त॒नय᳚न्नचिक्रद॒द्द्यौश्च॒यस्य॑पृथि॒वीच॒धर्म॑भिः| इन्द्र॑स्यस॒ख्यंप॑वतेवि॒वेवि॑द॒त्सोमः॑पुना॒नःक॒लशे᳚षुसीदति|| 9|| |
| ज्योति᳚र्य॒ज्ञस्य॑पवते॒मधु॑प्रि॒यंपि॒तादे॒वानां᳚जनि॒तावि॒भूव॑सुः| दधा᳚ति॒रत्नं᳚स्व॒धयो᳚रपी॒च्यं᳚म॒दिन्त॑मोमत्स॒रइ᳚न्द्रि॒योरसः॑|| 10|| |
| अ॒भि॒क्रन्द᳚न्क॒लशं᳚वा॒ज्य॑र्षति॒पति॑र्दि॒वःश॒तधा᳚रोविचक्ष॒णः| हरि᳚र्मि॒त्रस्य॒सद॑नेषुसीदतिमर्मृजा॒नोऽवि॑भिः॒सिन्धु॑भि॒र्वृषा᳚|| 11||वर्ग:14 |
| अग्रे॒सिन्धू᳚नां॒पव॑मानो,अर्ष॒त्यग्रे᳚वा॒चो,अ॑ग्रि॒योगोषु॑गच्छति| अग्रे॒वाज॑स्यभजतेमहाध॒नंस्वा᳚यु॒धःसो॒तृभिः॑पूयते॒वृषा᳚|| 12|| |
| अ॒यंम॒तवा᳚ञ्छकु॒नोयथा᳚हि॒तोऽव्ये᳚ससार॒पव॑मानऊ॒र्मिणा᳚| तव॒क्रत्वा॒रोद॑सी,अन्त॒राक॑वे॒शुचि॑र्धि॒याप॑वते॒सोम॑इन्द्रते|| 13|| |
| द्रा॒पिंवसा᳚नोयज॒तोदि॑वि॒स्पृश॑मन्तरिक्ष॒प्राभुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः| स्व॑र्जज्ञा॒नोनभ॑सा॒भ्य॑क्रमीत्प्र॒त्नम॑स्यपि॒तर॒मावि॑वासति|| 14|| |
| सो,अ॑स्यवि॒शेमहि॒शर्म॑यच्छति॒यो,अ॑स्य॒धाम॑प्रथ॒मंव्या᳚न॒शे| प॒दंयद॑स्यपर॒मेव्यो᳚म॒न्यतो॒विश्वा᳚अ॒भिसंया᳚तिसं॒यतः॑|| 15|| |
| प्रो,अ॑यासी॒दिन्दु॒रिन्द्र॑स्यनिष्कृ॒तंसखा॒सख्यु॒र्नप्रमि॑नातिसं॒गिर᳚म्| मर्य॑इवयुव॒तिभिः॒सम॑र्षति॒सोमः॑क॒लशे᳚श॒तया᳚म्नाप॒था|| 16||वर्ग:15 |
| प्रवो॒धियो᳚मन्द्र॒युवो᳚विप॒न्युवः॑पन॒स्युवः॑सं॒वस॑नेष्वक्रमुः| सोमं᳚मनी॒षा,अ॒भ्य॑नूषत॒स्तुभो॒ऽभिधे॒नवः॒पय॑सेमशिश्रयुः|| 17|| |
| आनः॑सोमसं॒यतं᳚पि॒प्युषी॒मिष॒मिन्दो॒पव॑स्व॒पव॑मानो,अ॒स्रिध᳚म्| यानो॒दोह॑ते॒त्रिरह॒न्नस॑श्चुषीक्षु॒मद्वाज॑व॒न्मधु॑मत्सु॒वीर्य᳚म्|| 18|| |
| वृषा᳚मती॒नांप॑वतेविचक्ष॒णःसोमो॒,अह्नः॑प्रतरी॒तोषसो᳚दि॒वः| क्रा॒णासिन्धू᳚नांक॒लशाँ᳚,अवीवश॒दिन्द्र॑स्य॒हार्द्या᳚वि॒शन्म॑नी॒षिभिः॑|| 19|| |
| म॒नी॒षिभिः॑पवतेपू॒र्व्यःक॒विर्नृभि᳚र्य॒तःपरि॒कोशाँ᳚,अचिक्रदत्| त्रि॒तस्य॒नाम॑ज॒नय॒न्मधु॑क्षर॒दिन्द्र॑स्यवा॒योःस॒ख्याय॒कर्त॑वे|| 20|| |
| अ॒यंपु॑ना॒नउ॒षसो॒विरो᳚चयद॒यंसिन्धु॑भ्यो,अभवदुलोक॒कृत्| अ॒यंत्रिःस॒प्तदु॑दुहा॒नआ॒शिरं॒सोमो᳚हृ॒देप॑वते॒चारु॑मत्स॒रः|| 21||वर्ग:16 |
| पव॑स्वसोमदि॒व्येषु॒धाम॑सुसृजा॒नइ᳚न्दोक॒लशे᳚प॒वित्र॒आ| सीद॒न्निन्द्र॑स्यज॒ठरे॒कनि॑क्रद॒न्नृभि᳚र्य॒तःसूर्य॒मारो᳚हयोदि॒वि|| 22|| |
| अद्रि॑भिःसु॒तःप॑वसेप॒वित्र॒आँ,इन्द॒विन्द्र॑स्यज॒ठरे᳚ष्वावि॒शन्| त्वंनृ॒चक्षा᳚अभवोविचक्षण॒सोम॑गो॒त्रमङ्गि॑रोभ्योऽवृणो॒रप॑|| 23|| |
| त्वांसो᳚म॒पव॑मानंस्वा॒ध्योऽनु॒विप्रा᳚सो,अमदन्नव॒स्यवः॑| त्वांसु॑प॒र्णआभ॑रद्दि॒वस्परीन्दो॒विश्वा᳚भिर्म॒तिभिः॒परि॑ष्कृतम्|| 24|| |
| अव्ये᳚पुना॒नंपरि॒वार॑ऊ॒र्मिणा॒हरिं᳚नवन्ते,अ॒भिस॒प्तधे॒नवः॑| अ॒पामु॒पस्थे॒,अध्या॒यवः॑क॒विमृ॒तस्य॒योना᳚महि॒षा,अ॑हेषत|| 25|| |
| इन्दुः॑पुना॒नो,अति॑गाहते॒मृधो॒विश्वा᳚निकृ॒ण्वन्त्सु॒पथा᳚नि॒यज्य॑वे| गाःकृ᳚ण्वा॒नोनि॒र्णिजं᳚हर्य॒तःक॒विरत्यो॒नक्रीळ॒न्परि॒वार॑मर्षति|| 26||वर्ग:17 |
| अ॒स॒श्चतः॑श॒तधा᳚रा,अभि॒श्रियो॒हरिं᳚नव॒न्तेऽव॒ता,उ॑द॒न्युवः॑| क्षिपो᳚मृजन्ति॒परि॒गोभि॒रावृ॑तंतृ॒तीये᳚पृ॒ष्ठे,अधि॑रोच॒नेदि॒वः|| 27|| |
| तवे॒माःप्र॒जादि॒व्यस्य॒रेत॑स॒स्त्वंविश्व॑स्य॒भुव॑नस्यराजसि| अथे॒दंविश्वं᳚पवमानते॒वशे॒त्वमि᳚न्दोप्रथ॒मोधा᳚म॒धा,अ॑सि|| 28|| |
| त्वंस॑मु॒द्रो,अ॑सिविश्व॒वित्क॑वे॒तवे॒माःपञ्च॑प्र॒दिशो॒विध᳚र्मणि| त्वंद्यांच॑पृथि॒वींचाति॑जभ्रिषे॒तव॒ज्योतीं᳚षिपवमान॒सूर्यः॑|| 29|| |
| त्वंप॒वित्रे॒रज॑सो॒विध᳚र्मणिदे॒वेभ्यः॑सोमपवमानपूयसे| त्वामु॒शिजः॑प्रथ॒मा,अ॑गृभ्णत॒तुभ्ये॒माविश्वा॒भुव॑नानियेमिरे|| 30|| |
| प्ररे॒भए॒त्यति॒वार॑म॒व्ययं॒वृषा॒वने॒ष्वव॑चक्रद॒द्धरिः॑| संधी॒तयो᳚वावशा॒ना,अ॑नूषत॒शिशुं᳚रिहन्तिम॒तयः॒पनि॑प्नतम्|| 31||वर्ग:18 |
| ससूर्य॑स्यर॒श्मिभिः॒परि᳚व्यत॒तन्तुं᳚तन्वा॒नस्त्रि॒वृतं॒यथा᳚वि॒दे| नय᳚न्नृ॒तस्य॑प्र॒शिषो॒नवी᳚यसीः॒पति॒र्जनी᳚ना॒मुप॑यातिनिष्कृ॒तम्|| 32|| |
| राजा॒सिन्धू᳚नांपवते॒पति॑र्दि॒वऋ॒तस्य॑यातिप॒थिभिः॒कनि॑क्रदत्| स॒हस्र॑धारः॒परि॑षिच्यते॒हरिः॑पुना॒नोवाचं᳚ज॒नय॒न्नुपा᳚वसुः|| 33|| |
| पव॑मान॒मह्यर्णो॒विधा᳚वसि॒सूरो॒नचि॒त्रो,अव्य॑यानि॒पव्य॑या| गभ॑स्तिपूतो॒नृभि॒रद्रि॑भिःसु॒तोम॒हेवाजा᳚य॒धन्या᳚यधन्वसि|| 34|| |
| इष॒मूर्जं᳚पवमाना॒भ्य॑र्षसिश्ये॒नोनवंसु॑क॒लशे᳚षुसीदसि| इन्द्रा᳚य॒मद्वा॒मद्यो॒मदः॑सु॒तोदि॒वोवि॑ष्ट॒म्भउ॑प॒मोवि॑चक्ष॒णः|| 35|| |
| स॒प्तस्वसा᳚रो,अ॒भिमा॒तरः॒शिशुं॒नवं᳚जज्ञा॒नंजेन्यं᳚विप॒श्चित᳚म्| अ॒पांग᳚न्ध॒र्वंदि॒व्यंनृ॒चक्ष॑सं॒सोमं॒विश्व॑स्य॒भुव॑नस्यरा॒जसे᳚|| 36||वर्ग:19 |
| ई॒शा॒नइ॒माभुव॑नानि॒वीय॑सेयुजा॒नइ᳚न्दोह॒रितः॑सुप॒र्ण्यः॑| तास्ते᳚क्षरन्तु॒मधु॑मद्घृ॒तंपय॒स्तव᳚व्र॒तेसो᳚मतिष्ठन्तुकृ॒ष्टयः॑|| 37|| |
| त्वंनृ॒चक्षा᳚असिसोमवि॒श्वतः॒पव॑मानवृषभ॒ताविधा᳚वसि| सनः॑पवस्व॒वसु॑म॒द्धिर᳚ण्यवद्व॒यंस्या᳚म॒भुव॑नेषुजी॒वसे᳚|| 38|| |
| गो॒वित्प॑वस्ववसु॒विद्धि॑रण्य॒विद्रे᳚तो॒धा,इ᳚न्दो॒भुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः| त्वंसु॒वीरो᳚असिसोमविश्व॒वित्तंत्वा॒विप्रा॒,उप॑गि॒रेमआ᳚सते|| 39|| |
| उन्मध्व॑ऊ॒र्मिर्व॒नना᳚अतिष्ठिपद॒पोवसा᳚नोमहि॒षोविगा᳚हते| राजा᳚प॒वित्र॑रथो॒वाज॒मारु॑हत्स॒हस्र॑भृष्टिर्जयति॒श्रवो᳚बृ॒हत्|| 40|| |
| सभ॒न्दना॒,उदि॑यर्तिप्र॒जाव॑तीर्वि॒श्वायु॒र्विश्वाः᳚सु॒भरा॒,अह॑र्दिवि| ब्रह्म॑प्र॒जाव॑द्र॒यिमश्व॑पस्त्यंपी॒तइ᳚न्द॒विन्द्र॑म॒स्मभ्यं᳚याचतात्|| 41||वर्ग:20 |
| सो,अग्रे॒,अह्नां॒हरि᳚र्हर्य॒तोमदः॒प्रचेत॑साचेतयते॒,अनु॒द्युभिः॑| द्वाजना᳚या॒तय᳚न्न॒न्तरी᳚यते॒नरा᳚च॒शंसं॒दैव्यं᳚चध॒र्तरि॑|| 42|| |
| अ॒ञ्जते॒व्य᳚ञ्जते॒सम᳚ञ्जते॒क्रतुं᳚रिहन्ति॒मधु॑ना॒भ्य᳚ञ्जते| सिन्धो᳚रुच्छ्वा॒सेप॒तय᳚न्तमु॒क्षणं᳚हिरण्यपा॒वाःप॒शुमा᳚सुगृभ्णते|| 43|| |
| वि॒प॒श्चिते॒पव॑मानायगायतम॒हीनधारात्यन्धो᳚अर्षति| अहि॒र्नजू॒र्णामति॑सर्पति॒त्वच॒मत्यो॒नक्रीळ᳚न्नसर॒द्वृषा॒हरिः॑|| 44|| |
| अ॒ग्रे॒गोराजाप्य॑स्तविष्यतेवि॒मानो॒,अह्नां॒भुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः| हरि॑र्घृ॒तस्नुः॑सु॒दृशी᳚को,अर्ण॒वोज्यो॒तीर॑थःपवतेरा॒यओ॒क्यः॑|| 45|| |
| अस॑र्जिस्क॒म्भोदि॒वउद्य॑तो॒मदः॒परि॑त्रि॒धातु॒र्भुव॑नान्यर्षति| अं॒शुंरि॑हन्तिम॒तयः॒पनि॑प्नतंगि॒रायदि॑नि॒र्णिज॑मृ॒ग्मिणो᳚य॒युः|| 46||वर्ग:21 |
| प्रते॒धारा॒,अत्यण्वा᳚निमे॒ष्यः॑पुना॒नस्य॑सं॒यतो᳚यन्ति॒रंह॑यः| यद्गोभि॑रिन्दोच॒म्वोः᳚सम॒ज्यस॒आसु॑वा॒नःसो᳚मक॒लशे᳚षुसीदसि|| 47|| |
| पव॑स्वसोमक्रतु॒विन्न॑उ॒क्थ्योऽव्यो॒वारे॒परि॑धाव॒मधु॑प्रि॒यम्| ज॒हिविश्वा᳚न्र॒क्षस॑इन्दो,अ॒त्रिणो᳚बृ॒हद्व॑देमवि॒दथे᳚सु॒वीराः᳚|| 48|| |
| [44] प्रतुद्रवेति नवर्चस्य सूक्तस्य काव्यउशना पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:87}{अनुवाक:5, सूक्त:2} |
| प्रतुद्र॑व॒परि॒कोशं॒निषी᳚द॒नृभिः॑पुना॒नो,अ॒भिवाज॑मर्ष| अश्वं॒नत्वा᳚वा॒जिनं᳚म॒र्जय॒न्तोऽच्छा᳚ब॒र्हीर॑श॒नाभि᳚र्नयन्ति|| 1||वर्ग:22 |
| स्वा॒यु॒धःप॑वतेदे॒वइन्दु॑रशस्ति॒हावृ॒जनं॒रक्ष॑माणः| पि॒तादे॒वानां᳚जनि॒तासु॒दक्षो᳚विष्ट॒म्भोदि॒वोध॒रुणः॑पृथि॒व्याः|| 2|| |
| ऋषि॒र्विप्रः॑पुरए॒ताजना᳚नामृ॒भुर्धीर॑उ॒शना॒काव्ये᳚न| सचि॑द्विवेद॒निहि॑तं॒यदा᳚सामपी॒च्य१॑(अं॒)गुह्यं॒नाम॒गोना᳚म्|| 3|| |
| ए॒षस्यते॒मधु॑माँ,इन्द्र॒सोमो॒वृषा॒वृष्णे॒परि॑प॒वित्रे᳚अक्षाः| स॒ह॒स्र॒साःश॑त॒साभू᳚रि॒दावा᳚शश्वत्त॒मंब॒र्हिरावा॒ज्य॑स्थात्|| 4|| |
| ए॒तेसोमा᳚अ॒भिग॒व्यास॒हस्रा᳚म॒हेवाजा᳚या॒मृता᳚य॒श्रवां᳚सि| प॒वित्रे᳚भिः॒पव॑माना,असृग्रञ्छ्रव॒स्यवो॒नपृ॑त॒नाजो॒,अत्याः᳚|| 5|| |
| परि॒हिष्मा᳚पुरुहू॒तोजना᳚नां॒विश्वास॑र॒द्भोज॑नापू॒यमा᳚नः| अथाभ॑रश्येनभृत॒प्रयां᳚सिर॒यिंतुञ्जा᳚नो,अ॒भिवाज॑मर्ष|| 6||वर्ग:23 |
| ए॒षसु॑वा॒नःपरि॒सोमः॑प॒वित्रे॒सर्गो॒नसृ॒ष्टो,अ॑दधाव॒दर्वा᳚| ति॒ग्मेशिशा᳚नोमहि॒षोनशृङ्गे॒गाग॒व्यन्न॒भिशूरो॒नसत्वा᳚|| 7|| |
| ए॒षाय॑यौपर॒माद॒न्तरद्रेः॒कूचि॑त्स॒तीरू॒र्वेगावि॑वेद| दि॒वोनवि॒द्युत्स्त॒नय᳚न्त्य॒भ्रैःसोम॑स्यतेपवतइन्द्र॒धारा᳚|| 8|| |
| उ॒तस्म॑रा॒शिंपरि॑यासि॒गोना॒मिन्द्रे᳚णसोमस॒रथं᳚पुना॒नः| पू॒र्वीरिषो᳚बृह॒तीर्जी᳚रदानो॒शिक्षा᳚शचीव॒स्तव॒ता,उ॑प॒ष्टुत्|| 9|| |
| [45] अयंसोमइत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काव्य उशना पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:88}{अनुवाक:5, सूक्त:3} |
| अ॒यंसोम॑इन्द्र॒तुभ्यं᳚सुन्वे॒तुभ्यं᳚पवते॒त्वम॑स्यपाहि| त्वंह॒यंच॑कृ॒षेत्वंव॑वृ॒षइन्दुं॒मदा᳚य॒युज्या᳚य॒सोम᳚म्|| 1||वर्ग:24 |
| सईं॒रथो॒नभु॑रि॒षाळ॑योजिम॒हःपु॒रूणि॑सा॒तये॒वसू᳚नि| आदीं॒विश्वा᳚नहु॒ष्या᳚णिजा॒तास्व॑र्षाता॒वन॑ऊ॒र्ध्वान॑वन्त|| 2|| |
| वा॒युर्नयोनि॒युत्वाँ᳚,इ॒ष्टया᳚मा॒नास॑त्येव॒हव॒आशम्भ॑विष्ठः| वि॒श्ववा᳚रोद्रविणो॒दा,इ॑व॒त्मन्पू॒षेव॑धी॒जव॑नोऽसिसोम|| 3|| |
| इन्द्रो॒नयोम॒हाकर्मा᳚णि॒चक्रि᳚र्ह॒न्तावृ॒त्राणा᳚मसिसोमपू॒र्भित्| पै॒द्वोनहित्वमहि॑नाम्नांह॒न्ताविश्व॑स्यासिसोम॒दस्योः᳚|| 4|| |
| अ॒ग्निर्नयोवन॒आसृ॒ज्यमा᳚नो॒वृथा॒पाजां᳚सिकृणुतेन॒दीषु॑| जनो॒नयुध्वा᳚मह॒तउ॑प॒ब्दिरिय॑र्ति॒सोमः॒पव॑मानऊ॒र्मिम्|| 5|| |
| ए॒तेसोमा॒,अति॒वारा॒ण्यव्या᳚दि॒व्यानकोशा᳚सो,अ॒भ्रव॑र्षाः| वृथा᳚समु॒द्रंसिन्ध॑वो॒ननीचीः᳚सु॒तासो᳚अ॒भिक॒लशाँ᳚,असृग्रन्|| 6|| |
| शु॒ष्मीशर्धो॒नमारु॑तंपव॒स्वान॑भिशस्तादि॒व्यायथा॒विट्| आपो॒नम॒क्षूसु॑म॒तिर्भ॑वानःस॒हस्रा᳚प्साःपृतना॒षाण्नय॒ज्ञः|| 7|| |
| राज्ञो॒नुते॒वरु॑णस्यव्र॒तानि॑बृ॒हद्ग॑भी॒रंतव॑सोम॒धाम॑| शुचि॒ष्ट्वम॑सिप्रि॒योनमि॒त्रोद॒क्षाय्यो᳚अर्य॒मेवा᳚सिसोम|| 8|| |
| [46] प्रोस्यवह्निरिति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काव्य उशना पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:89}{अनुवाक:5, सूक्त:4} |
| प्रोस्यवह्निः॑प॒थ्या᳚भिरस्यान्दि॒वोनवृ॒ष्टिःपव॑मानो,अक्षाः| स॒हस्र॑धारो,असद॒न्न्य१॑(अ॒)स्मेमा॒तुरु॒पस्थे॒वन॒आच॒सोमः॑|| 1||वर्ग:25 |
| राजा॒सिन्धू᳚नामवसिष्ट॒वास॑ऋ॒तस्य॒नाव॒मारु॑ह॒द्रजि॑ष्ठाम्| अ॒प्सुद्र॒प्सोवा᳚वृधेश्ये॒नजू᳚तोदु॒हईं᳚पि॒तादु॒हईं᳚पि॒तुर्जाम्|| 2|| |
| सिं॒हंन॑सन्त॒मध्वो᳚अ॒यासं॒हरि॑मरु॒षंदि॒वो,अ॒स्यपति᳚म्| शूरो᳚यु॒त्सुप्र॑थ॒मःपृ॑च्छते॒गा,अस्य॒चक्ष॑सा॒परि॑पात्यु॒क्षा|| 3|| |
| मधु॑पृष्ठंघो॒रम॒यास॒मश्वं॒रथे᳚युञ्जन्त्युरुच॒क्रऋ॒ष्वम्| स्वसा᳚रईंजा॒मयो᳚मर्जयन्ति॒सना᳚भयोवा॒जिन॑मूर्जयन्ति|| 4|| |
| चत॑स्रईंघृत॒दुहः॑सचन्तेसमा॒ने,अ॒न्तर्ध॒रुणे॒निष॑त्ताः| ता,ई᳚मर्षन्ति॒नम॑सापुना॒नास्ता,ईं᳚वि॒श्वतः॒परि॑षन्तिपू॒र्वीः|| 5|| |
| वि॒ष्ट॒म्भोदि॒वोध॒रुणः॑पृथि॒व्याविश्वा᳚उ॒तक्षि॒तयो॒हस्ते᳚अस्य| अस॑त्त॒उत्सो᳚गृण॒तेनि॒युत्वा॒न्मध्वो᳚अं॒शुःप॑वतइन्द्रि॒याय॑|| 6|| |
| व॒न्वन्नवा᳚तो,अ॒भिदे॒ववी᳚ति॒मिन्द्रा᳚यसोमवृत्र॒हाप॑वस्व| श॒ग्धिम॒हःपु॑रुश्च॒न्द्रस्य॑रा॒यःसु॒वीर्य॑स्य॒पत॑यःस्याम|| 7|| |
| [47] प्रहिन्वानइति षडृचस्य सूक्तस्य मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:3}{मंडल:9, सूक्त:90}{अनुवाक:5, सूक्त:5} |
| प्रहि᳚न्वा॒नोज॑नि॒तारोद॑स्यो॒रथो॒नवाजं᳚सनि॒ष्यन्न॑यासीत्| इन्द्रं॒गच्छ॒न्नायु॑धासं॒शिशा᳚नो॒विश्वा॒वसु॒हस्त॑योरा॒दधा᳚नः|| 1||वर्ग:26 |
| अ॒भित्रि॑पृ॒ष्ठंवृष॑णंवयो॒धामा᳚ङ्गू॒षाणा᳚मवावशन्त॒वाणीः᳚| वना॒वसा᳚नो॒वरु॑णो॒नसिन्धू॒न्विर॑त्न॒धाद॑यते॒वार्या᳚णि|| 2|| |
| शूर॑ग्रामः॒सर्व॑वीरः॒सहा᳚वा॒ञ्जेता᳚पवस्व॒सनि॑ता॒धना᳚नि| ति॒ग्मायु॑धः,क्षि॒प्रध᳚न्वास॒मत्स्वषा᳚ळ्हःसा॒ह्वान्पृत॑नासु॒शत्रू॑न्|| 3|| |
| उ॒रुग᳚व्यूति॒रभ॑यानिकृ॒ण्वन्त्स॑मीची॒ने,आप॑वस्वा॒पुरं᳚धी| अ॒पःसिषा᳚सन्नु॒षसः॒स्व१॑(अ॒)र्गाःसंचि॑क्रदोम॒हो,अ॒स्मभ्यं॒वाजा॑न्|| 4|| |
| मत्सि॑सोम॒वरु॑णं॒मत्सि॑मि॒त्रंमत्सीन्द्र॑मिन्दोपवमान॒विष्णु᳚म्| मत्सि॒शर्धो॒मारु॑तं॒मत्सि॑दे॒वान्मत्सि॑म॒हामिन्द्र॑मिन्दो॒मदा᳚य|| 5|| |
| ए॒वाराजे᳚व॒क्रतु॑माँ॒,अमे᳚न॒विश्वा॒घनि॑घ्नद्दुरि॒ताप॑वस्व| इन्दो᳚सू॒क्ताय॒वच॑से॒वयो᳚धायू॒यंपा᳚तस्व॒स्तिभिः॒सदा᳚नः|| 6|| |
| [48] असर्जीति षडृचस्य सूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:91}{अनुवाक:5, सूक्त:6} |
| अस॑र्जि॒वक्वा॒रथ्ये॒यथा॒जौधि॒याम॒नोता᳚प्रथ॒मोम॑नी॒षी| दश॒स्वसा᳚रो॒,अधि॒सानो॒,अव्येऽज᳚न्ति॒वह्निं॒सद॑ना॒न्यच्छ॑|| 1||वर्ग:1 |
| वी॒तीजन॑स्यदि॒व्यस्य॑क॒व्यैरधि॑सुवा॒नोन॑हु॒ष्ये᳚भि॒रिन्दुः॑| प्रयोनृभि॑र॒मृतो॒मर्त्ये᳚भिर्मर्मृजा॒नोऽवि॑भि॒र्गोभि॑र॒द्भिः|| 2|| |
| वृषा॒वृष्णे॒रोरु॑वदं॒शुर॑स्मै॒पव॑मानो॒रुश॑दीर्ते॒पयो॒गोः| स॒हस्र॒मृक्वा᳚प॒थिभि᳚र्वचो॒विद॑ध्व॒स्मभिः॒सूरो॒,अण्वं॒विया᳚ति|| 3|| |
| रु॒जादृ॒ळ्हाचि॑द्र॒क्षसः॒सदां᳚सिपुना॒नइ᳚न्दऊर्णुहि॒विवाजा॑न्| वृ॒श्चोपरि॑ष्टात्तुज॒ताव॒धेन॒ये,अन्ति॑दू॒रादु॑पना॒यमे᳚षाम्|| 4|| |
| सप्र॑त्न॒वन्नव्य॑सेविश्ववारसू॒क्ताय॑प॒थःकृ॑णुहि॒प्राचः॑| येदुः॒षहा᳚सोव॒नुषा᳚बृ॒हन्त॒स्ताँस्ते᳚अश्यामपुरुकृत्पुरुक्षो|| 5|| |
| ए॒वापु॑ना॒नो,अ॒पःस्व१॑(अ॒)र्गा,अ॒स्मभ्यं᳚तो॒कातन॑यानि॒भूरि॑| शंनः॒,क्षेत्र॑मु॒रुज्योतीं᳚षिसोम॒ज्योङ्नः॒सूर्यं᳚दृ॒शये᳚रिरीहि|| 6|| |
| [49] परिसुवानइति षडृचस्य सूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:92}{अनुवाक:5, सूक्त:7} |
| परि॑सुवा॒नोहरि॑रं॒शुःप॒वित्रे॒रथो॒नस॑र्जिस॒नये᳚हिया॒नः| आप॒च्छ्लोक॑मिन्द्रि॒यंपू॒यमा᳚नः॒प्रति॑दे॒वाँ,अ॑जुषत॒प्रयो᳚भिः|| 1||वर्ग:2 |
| अच्छा᳚नृ॒चक्षा᳚असरत्प॒वित्रे॒नाम॒दधा᳚नःक॒विर॑स्य॒योनौ᳚| सीद॒न्होते᳚व॒सद॑नेच॒मूषूपे᳚मग्म॒न्नृष॑यःस॒प्तविप्राः᳚|| 2|| |
| प्रसु॑मे॒धागा᳚तु॒विद्वि॒श्वदे᳚वः॒सोमः॑पुना॒नःसद॑एति॒नित्य᳚म्| भुव॒द्विश्वे᳚षु॒काव्ये᳚षु॒रन्तानु॒जना᳚न्यतते॒पञ्च॒धीरः॑|| 3|| |
| तव॒त्येसो᳚मपवमाननि॒ण्येविश्वे᳚दे॒वास्त्रय॑एकाद॒शासः॑| दश॑स्व॒धाभि॒रधि॒सानो॒,अव्ये᳚मृ॒जन्ति॑त्वान॒द्यः॑स॒प्तय॒ह्वीः|| 4|| |
| तन्नुस॒त्यंपव॑मानस्यास्तु॒यत्र॒विश्वे᳚का॒रवः॑सं॒नस᳚न्त| ज्योति॒र्यदह्ने॒,अकृ॑णोदुलो॒कंप्राव॒न्मनुं॒दस्य॑वेकर॒भीक᳚म्|| 5|| |
| परि॒सद्मे᳚वपशु॒मान्ति॒होता॒राजा॒नस॒त्यःसमि॑तीरिया॒नः| सोमः॑पुना॒नःक॒लशाँ᳚,अयासी॒त्सीद᳚न्मृ॒गोनम॑हि॒षोवने᳚षु|| 6|| |
| [50] साकमुक्षइति पंचर्चस्य सूक्तस्य गौतमो नोधाः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:93}{अनुवाक:5, सूक्त:8} |
| सा॒क॒मुक्षो᳚मर्जयन्त॒स्वसा᳚रो॒दश॒धीर॑स्यधी॒तयो॒धनु॑त्रीः| हरिः॒पर्य॑द्रव॒ज्जाःसूर्य॑स्य॒द्रोणं᳚ननक्षे॒,अत्यो॒नवा॒जी|| 1||वर्ग:3 |
| संमा॒तृभि॒र्नशिशु᳚र्वावशा॒नोवृषा᳚दधन्वेपुरु॒वारो᳚अ॒द्भिः| मर्यो॒नयोषा᳚म॒भिनि॑ष्कृ॒तंयन्त्संग॑च्छतेक॒लश॑उ॒स्रिया᳚भिः|| 2|| |
| उ॒तप्रपि॑प्य॒ऊध॒रघ्न्या᳚या॒,इन्दु॒र्धारा᳚भिःसचतेसुमे॒धाः| मू॒र्धानं॒गावः॒पय॑साच॒मूष्व॒भिश्री᳚णन्ति॒वसु॑भि॒र्ननि॒क्तैः|| 3|| |
| सनो᳚दे॒वेभिः॑पवमानर॒देन्दो᳚र॒यिम॒श्विनं᳚वावशा॒नः| र॒थि॒रा॒यता᳚मुश॒तीपुरं᳚धिरस्म॒द्र्य१॑(अ॒)गादा॒वने॒वसू᳚नाम्|| 4|| |
| नूनो᳚र॒यिमुप॑मास्वनृ॒वन्तं᳚पुना॒नोवा॒ताप्यं᳚वि॒श्वश्च᳚न्द्रम्| प्रव᳚न्दि॒तुरि᳚न्दोता॒र्यायुः॑प्रा॒तर्म॒क्षूधि॒याव॑सुर्जगम्यात्|| 5|| |
| [51] अधियदिति पंचर्चस्य सूक्तस्य घौरः कण्वः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:94}{अनुवाक:5, सूक्त:9} |
| अधि॒यद॑स्मिन्वा॒जिनी᳚व॒शुभः॒स्पर्ध᳚न्ते॒धियः॒सूर्ये॒नविशः॑| अ॒पोवृ॑णा॒नःप॑वतेकवी॒यन्व्र॒जंनप॑शु॒वर्ध॑नाय॒मन्म॑|| 1||वर्ग:4 |
| द्वि॒ताव्यू॒र्ण्वन्न॒मृत॑स्य॒धाम॑स्व॒र्विदे॒भुव॑नानिप्रथन्त| धियः॑पिन्वा॒नाःस्वस॑रे॒नगाव॑ऋता॒यन्ती᳚र॒भिवा᳚वश्र॒इन्दु᳚म्|| 2|| |
| परि॒यत्क॒विःकाव्या॒भर॑ते॒शूरो॒नरथो॒भुव॑नानि॒विश्वा᳚| दे॒वेषु॒यशो॒मर्ता᳚य॒भूष॒न्दक्षा᳚यरा॒यःपु॑रु॒भूषु॒नव्यः॑|| 3|| |
| श्रि॒येजा॒तःश्रि॒यआनिरि॑याय॒¦श्रियं॒वयो᳚जरि॒तृभ्यो᳚दधाति| श्रियं॒वसा᳚ना,अमृत॒त्वमा᳚य॒न्¦भव᳚न्तिस॒त्यास॑मि॒थामि॒तद्रौ᳚|| 4|| |
| इष॒मूर्ज॑म॒भ्य१॑(अ॒)र्षाश्वं॒गामु॒रुज्योतिः॑कृणुहि॒मत्सि॑दे॒वान्| विश्वा᳚नि॒हिसु॒षहा॒तानि॒तुभ्यं॒पव॑मान॒बाध॑सेसोम॒शत्रू॑न्|| 5|| |
| [52] कनिक्रंतीति पंचर्चस्य सूक्तस्य कण्वः प्रस्कण्वः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:95}{अनुवाक:5, सूक्त:10} |
| कनि॑क्रन्ति॒हरि॒रासृ॒ज्यमा᳚नः॒सीद॒न्वन॑स्यज॒ठरे᳚पुना॒नः| नृभि᳚र्य॒तःकृ॑णुतेनि॒र्णिजं॒गा,अतो᳚म॒तीर्ज॑नयतस्व॒धाभिः॑|| 1||वर्ग:5 |
| हरिः॑सृजा॒नःप॒थ्या᳚मृ॒तस्येय॑र्ति॒वाच॑मरि॒तेव॒नाव᳚म्| दे॒वोदे॒वानां॒गुह्या᳚नि॒नामा॒विष्कृ॑णोतिब॒र्हिषि॑प्र॒वाचे᳚|| 2|| |
| अ॒पामि॒वेदू॒र्मय॒स्तर्तु॑राणाः॒प्रम॑नी॒षा,ई᳚रते॒सोम॒मच्छ॑| न॒म॒स्यन्ती॒रुप॑च॒यन्ति॒संचाच॑विशन्त्युश॒तीरु॒शन्त᳚म्|| 3|| |
| तंम᳚र्मृजा॒नंम॑हि॒षंनसाना᳚वं॒शुंदु॑हन्त्यु॒क्षणं᳚गिरि॒ष्ठाम्| तंवा᳚वशा॒नंम॒तयः॑सचन्तेत्रि॒तोबि॑भर्ति॒वरु॑णंसमु॒द्रे|| 4|| |
| इष्य॒न्वाच॑मुपव॒क्तेव॒होतुः॑पुना॒नइ᳚न्दो॒विष्या᳚मनी॒षाम्| इन्द्र॑श्च॒यत्क्षय॑थः॒सौभ॑गायसु॒वीर्य॑स्य॒पत॑यःस्याम|| 5|| |
| [53] प्रसेनानीरिति चतुर्विंशत्यृचस्य सूक्तस्य दैवोदासिः प्रतर्दनः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:96}{अनुवाक:5, सूक्त:11} |
| प्रसे᳚ना॒नीःशूरो॒,अग्रे॒रथा᳚नांग॒व्यन्ने᳚ति॒हर्ष॑ते,अस्य॒सेना᳚| भ॒द्रान्कृ॒ण्वन्नि᳚न्द्रह॒वान्त्सखि॑भ्य॒आसोमो॒वस्त्रा᳚रभ॒सानि॑दत्ते|| 1||वर्ग:6 |
| सम॑स्य॒हरिं॒हर॑योमृजन्त्यश्वह॒यैरनि॑शितं॒नमो᳚भिः| आति॑ष्ठति॒रथ॒मिन्द्र॑स्य॒सखा᳚वि॒द्वाँ,ए᳚नासुम॒तिंया॒त्यच्छ॑|| 2|| |
| सनो᳚देवदे॒वता᳚तेपवस्वम॒हेसो᳚म॒प्सर॑सइन्द्र॒पानः॑| कृ॒ण्वन्न॒पोव॒र्षय॒न्द्यामु॒तेमामु॒रोरानो᳚वरिवस्यापुना॒नः|| 3|| |
| अजी᳚त॒येऽह॑तयेपवस्वस्व॒स्तये᳚स॒र्वता᳚तयेबृह॒ते| तदु॑शन्ति॒विश्व॑इ॒मेसखा᳚य॒स्तद॒हंव॑श्मिपवमानसोम|| 4|| |
| सोमः॑पवतेजनि॒ताम॑ती॒नांज॑नि॒तादि॒वोज॑नि॒तापृ॑थि॒व्याः| ज॒नि॒ताग्नेर्ज॑नि॒तासूर्य॑स्यजनि॒तेन्द्र॑स्यजनि॒तोतविष्णोः᳚|| 5|| |
| ब्र॒ह्मादे॒वानां᳚पद॒वीःक॑वी॒नामृषि॒र्विप्रा᳚णांमहि॒षोमृ॒गाणा᳚म्| श्ये॒नोगृध्रा᳚णां॒स्वधि॑ति॒र्वना᳚नां॒सोमः॑प॒वित्र॒मत्ये᳚ति॒रेभ॑न्|| 6||वर्ग:7 |
| प्रावी᳚विपद्वा॒चऊ॒र्मिंनसिन्धु॒र्गिरः॒सोमः॒पव॑मानोमनी॒षाः| अ॒न्तःपश्य᳚न्वृ॒जने॒माव॑रा॒ण्याति॑ष्ठतिवृष॒भोगोषु॑जा॒नन्|| 7|| |
| सम॑त्स॒रःपृ॒त्सुव॒न्वन्नवा᳚तःस॒हस्र॑रेता,अ॒भिवाज॑मर्ष| इन्द्रा᳚येन्दो॒पव॑मानोमनी॒ष्य१॑(अं॒)शोरू॒र्मिमी᳚रय॒गा,इ॑ष॒ण्यन्|| 8|| |
| परि॑प्रि॒यःक॒लशे᳚दे॒ववा᳚त॒इन्द्रा᳚य॒सोमो॒रण्यो॒मदा᳚य| स॒हस्र॑धारःश॒तवा᳚ज॒इन्दु᳚र्वा॒जीनसप्तिः॒सम॑नाजिगाति|| 9|| |
| सपू॒र्व्योव॑सु॒विज्जाय॑मानोमृजा॒नो,अ॒प्सुदु॑दुहा॒नो,अद्रौ᳚| अ॒भि॒श॒स्ति॒पाभुव॑नस्य॒राजा᳚वि॒दद्गा॒तुंब्रह्म॑णेपू॒यमा᳚नः|| 10|| |
| त्वया॒हिनः॑पि॒तरः॑सोम॒पूर्वे॒कर्मा᳚णिच॒क्रुःप॑वमान॒धीराः᳚| व॒न्वन्नवा᳚तःपरि॒धीँरपो᳚र्णुवी॒रेभि॒रश्वै᳚र्म॒घवा᳚भवानः|| 11||वर्ग:8 |
| यथाप॑वथा॒मन॑वेवयो॒धा,अ॑मित्र॒हाव॑रिवो॒विद्ध॒विष्मा॑न्| ए॒वाप॑वस्व॒द्रवि॑णं॒दधा᳚न॒इन्द्रे॒संति॑ष्ठज॒नयायु॑धानि|| 12|| |
| पव॑स्वसोम॒मधु॑माँऋ॒तावा॒पोवसा᳚नो॒,अधि॒सानो॒,अव्ये᳚| अव॒द्रोणा᳚निघृ॒तवा᳚न्तिसीदम॒दिन्त॑मोमत्स॒रइ᳚न्द्र॒पानः॑|| 13|| |
| वृ॒ष्टिंदि॒वःश॒तधा᳚रःपवस्वसहस्र॒सावा᳚ज॒युर्दे॒ववी᳚तौ| संसिन्धु॑भिःक॒लशे᳚वावशा॒नःसमु॒स्रिया᳚भिःप्रति॒रन्न॒आयुः॑|| 14|| |
| ए॒षस्यसोमो᳚म॒तिभिः॑पुना॒नोऽत्यो॒नवा॒जीतर॒तीदरा᳚तीः| पयो॒नदु॒ग्धमदि॑तेरिषि॒रमु॒र्वि॑वगा॒तुःसु॒यमो॒नवोळ्हा᳚|| 15|| |
| स्वा॒यु॒धःसो॒तृभिः॑पू॒यमा᳚नो॒ऽभ्य॑र्ष॒गुह्यं॒चारु॒नाम॑| अ॒भिवाजं॒सप्ति॑रिवश्रव॒स्याभिवा॒युम॒भिगादे᳚वसोम|| 16||वर्ग:9 |
| शिशुं᳚जज्ञा॒नंह᳚र्य॒तंमृ॑जन्तिशु॒म्भन्ति॒वह्निं᳚म॒रुतो᳚ग॒णेन॑| क॒विर्गी॒र्भिःकाव्ये᳚नाक॒विःसन्त्सोमः॑प॒वित्र॒मत्ये᳚ति॒रेभ॑न्|| 17|| |
| ऋषि॑मना॒यऋ॑षि॒कृत्स्व॒र्षाःस॒हस्र॑णीथःपद॒वीःक॑वी॒नाम्| तृ॒तीयं॒धाम॑महि॒षःसिषा᳚स॒न्त्सोमो᳚वि॒राज॒मनु॑राजति॒ष्टुप्|| 18|| |
| च॒मू॒षच्छ्ये॒नःश॑कु॒नोवि॒भृत्वा᳚गोवि॒न्दुर्द्र॒प्सआयु॑धानि॒बिभ्र॑त्| अ॒पामू॒र्मिंसच॑मानःसमु॒द्रंतु॒रीयं॒धाम॑महि॒षोवि॑वक्ति|| 19|| |
| मर्यो॒नशु॒भ्रस्त॒न्वं᳚मृजा॒नोऽत्यो॒नसृत्वा᳚स॒नये॒धना᳚नाम्| वृषे᳚वयू॒थापरि॒कोश॒मर्ष॒न्कनि॑क्रदच्च॒म्वो॒३॑(ओ॒)रावि॑वेश|| 20|| |
| पव॑स्वेन्दो॒पव॑मानो॒महो᳚भिः॒कनि॑क्रद॒त्परि॒वारा᳚ण्यर्ष| क्रीळ᳚ञ्च॒म्वो॒३॑(ओ॒)रावि॑शपू॒यमा᳚न॒इन्द्रं᳚ते॒रसो᳚मदि॒रोम॑मत्तु|| 21||वर्ग:10 |
| प्रास्य॒धारा᳚बृह॒तीर॑सृग्रन्न॒क्तोगोभिः॑क॒लशाँ॒,आवि॑वेश| साम॑कृ॒ण्वन्त्सा᳚म॒न्यो᳚विप॒श्चित्क्रन्द᳚न्नेत्य॒भिसख्यु॒र्नजा॒मिम्|| 22|| |
| अ॒प॒घ्नन्ने᳚षिपवमान॒शत्रू᳚न्प्रि॒यांनजा॒रो,अ॒भिगी᳚त॒इन्दुः॑| सीद॒न्वने᳚षुशकु॒नोनपत्वा॒सोमः॑पुना॒नःक॒लशे᳚षु॒सत्ता᳚|| 23|| |
| आते॒रुचः॒पव॑मानस्यसोम॒योषे᳚वयन्तिसु॒दुघाः᳚सुधा॒राः| हरि॒रानी᳚तःपुरु॒वारो᳚अ॒प्स्वचि॑क्रदत्क॒लशे᳚देवयू॒नाम्|| 24|| |
| [54] अस्यप्रेपेत्यष्टपंचाशदृचस्य सूक्तस्याद्यानांतिसृणांमैत्रावरुणिर्वसिष्ठः चतुर्थ्यादितिसृणांवासिष्ठइंद्रप्रमतिः सप्तम्यादितिसृणांवासिष्ठोवृषगणः दशम्यादितिसृणांवासिष्टोमन्युः त्रयोदश्यादितिसृणां वासिष्ठ उपमन्युः षोडश्यादितिसृणांवासिष्ठोव्याघ्रपादः एकोनविंश्यादितिसृणां वासिष्ठःशक्तिः द्वाविंश्यादितिसृणां वासिष्ठःकर्णश्रुतः पंचविंश्यादितिसृणां वासिष्ठो मृळीकः अष्टविंश्यादितिसृणां वासिष्ठोवसुक्र एकत्रिंश्यादि चतुर्दशानां शाक्त्यः पराशरः पंचचत्वारिंश्यादिचतुर्दशानामांगिरसः कुत्स ऋषयः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:97}{अनुवाक:6, सूक्त:1} |
| अ॒स्यप्रे॒षाहे॒मना᳚पू॒यमा᳚नोदे॒वोदे॒वेभिः॒सम॑पृक्त॒रस᳚म्| सु॒तःप॒वित्रं॒पर्ये᳚ति॒रेभ᳚न्मि॒तेव॒सद्म॑पशु॒मान्ति॒होता᳚|| 1||वर्ग:11 |
| भ॒द्रावस्त्रा᳚सम॒न्या॒३॑(आ॒)वसा᳚नोम॒हान्क॒विर्नि॒वच॑नानि॒शंस॑न्| आव॑च्यस्वच॒म्वोः᳚पू॒यमा᳚नोविचक्ष॒णोजागृ॑विर्दे॒ववी᳚तौ|| 2|| |
| समु॑प्रि॒योमृ॑ज्यते॒सानो॒,अव्ये᳚य॒शस्त॑रोय॒शसां॒क्षैतो᳚अ॒स्मे| अ॒भिस्व॑र॒धन्वा᳚पू॒यमा᳚नोयू॒यंपा᳚तस्व॒स्तिभिः॒सदा᳚नः|| 3|| |
| प्रगा᳚यता॒भ्य॑र्चामदे॒वान्त्सोमं᳚हिनोतमह॒तेधना᳚य| स्वा॒दुःप॑वाते॒,अति॒वार॒मव्य॒मासी᳚दातिक॒लशं᳚देव॒युर्नः॑|| 4|| |
| इन्दु॑र्दे॒वाना॒मुप॑स॒ख्यमा॒यन्त्स॒हस्र॑धारःपवते॒मदा᳚य| नृभिः॒स्तवा᳚नो॒,अनु॒धाम॒पूर्व॒मग॒न्निन्द्रं᳚मह॒तेसौभ॑गाय|| 5|| |
| स्तो॒त्रेरा॒येहरि॑रर्षापुना॒नइन्द्रं॒मदो᳚गच्छतुते॒भरा᳚य| दे॒वैर्या᳚हिस॒रथं॒राधो॒,अच्छा᳚यू॒यंपा᳚तस्व॒स्तिभिः॒सदा᳚नः|| 6||वर्ग:12 |
| प्रकाव्य॑मु॒शने᳚वब्रुवा॒णोदे॒वोदे॒वानां॒जनि॑माविवक्ति| महि᳚व्रतः॒शुचि॑बन्धुःपाव॒कःप॒दाव॑रा॒हो,अ॒भ्ये᳚ति॒रेभ॑न्|| 7|| |
| प्रहं॒सास॑स्तृ॒पलं᳚म॒न्युमच्छा॒मादस्तं॒वृष॑गणा,अयासुः| आ॒ङ्गू॒ष्य१॑(अं॒)पव॑मानं॒सखा᳚योदु॒र्मर्षं᳚सा॒कंप्रव॑दन्तिवा॒णम्|| 8|| |
| सरं᳚हतउरुगा॒यस्य॑जू॒तिंवृथा॒क्रीळ᳚न्तंमिमते॒नगावः॑| प॒री॒ण॒संकृ॑णुतेति॒ग्मशृ᳚ङ्गो॒दिवा॒हरि॒र्ददृ॑शे॒नक्त॑मृ॒ज्रः|| 9|| |
| इन्दु᳚र्वा॒जीप॑वते॒गोन्यो᳚घा॒,इन्द्रे॒सोमः॒सह॒इन्व॒न्मदा᳚य| हन्ति॒रक्षो॒बाध॑ते॒पर्यरा᳚ती॒र्वरि॑वःकृ॒ण्वन्वृ॒जन॑स्य॒राजा᳚|| 10|| |
| अध॒धार॑या॒मध्वा᳚पृचा॒नस्ति॒रोरोम॑पवते॒,अद्रि॑दुग्धः| इन्दु॒रिन्द्र॑स्यस॒ख्यंजु॑षा॒णोदे॒वोदे॒वस्य॑मत्स॒रोमदा᳚य|| 11||वर्ग:13 |
| अ॒भिप्रि॒याणि॑पवतेपुना॒नोदे॒वोदे॒वान्त्स्वेन॒रसे᳚नपृ॒ञ्चन्| इन्दु॒र्धर्मा᳚ण्यृतु॒थावसा᳚नो॒दश॒क्षिपो᳚अव्यत॒सानो॒,अव्ये᳚|| 12|| |
| वृषा॒शोणो᳚अभि॒कनि॑क्रद॒द्गान॒दय᳚न्नेतिपृथि॒वीमु॒तद्याम्| इन्द्र॑स्येवव॒ग्नुराशृ᳚ण्वआ॒जौप्र॑चे॒तय᳚न्नर्षति॒वाच॒मेमाम्|| 13|| |
| र॒साय्यः॒पय॑सा॒पिन्व॑मानई॒रय᳚न्नेषि॒मधु॑मन्तमं॒शुम्| पव॑मानःसंत॒निमे᳚षिकृ॒ण्वन्निन्द्रा᳚यसोमपरिषि॒च्यमा᳚नः|| 14|| |
| ए॒वाप॑वस्वमदि॒रोमदा᳚योदग्रा॒भस्य॑न॒मय᳚न्वध॒स्नैः| परि॒वर्णं॒भर॑माणो॒रुश᳚न्तंग॒व्युर्नो᳚अर्ष॒परि॑सोमसि॒क्तः|| 15|| |
| जु॒ष्ट्वीन॑इन्दोसु॒पथा᳚सु॒गान्यु॒रौप॑वस्व॒वरि॑वांसिकृ॒ण्वन्| घ॒नेव॒विष्व॑ग्दुरि॒तानि॑वि॒घ्नन्नधि॒ष्णुना᳚धन्व॒सानो॒,अव्ये᳚|| 16||वर्ग:14 |
| वृ॒ष्टिंनो᳚अर्षदि॒व्यांजि॑ग॒त्नुमिळा᳚वतींशं॒गयीं᳚जी॒रदा᳚नुम्| स्तुके᳚ववी॒ताध᳚न्वाविचि॒न्वन्बन्धूँ᳚रि॒माँ,अव॑राँ,इन्दोवा॒यून्|| 17|| |
| ग्र॒न्थिंनविष्य॑ग्रथि॒तंपु॑ना॒नऋ॒जुंच॑गा॒तुंवृ॑जि॒नंच॑सोम| अत्यो॒नक्र॑दो॒हरि॒रासृ॑जा॒नोमर्यो᳚देवधन्वप॒स्त्या᳚वान्|| 18|| |
| जुष्टो॒मदा᳚यदे॒वता᳚तइन्दो॒परि॒ष्णुना᳚धन्व॒सानो॒,अव्ये᳚| स॒हस्र॑धारःसुर॒भिरद॑ब्धः॒परि॑स्रव॒वाज॑सातौनृ॒षह्ये᳚|| 19|| |
| अ॒र॒श्मानो॒ये᳚ऽर॒था,अयु॑क्ता॒,अत्या᳚सो॒नस॑सृजा॒नास॑आ॒जौ| ए॒तेशु॒क्रासो᳚धन्वन्ति॒सोमा॒देवा᳚स॒स्ताँ,उप॑याता॒पिब॑ध्यै|| 20|| |
| ए॒वान॑इन्दो,अ॒भिदे॒ववी᳚तिं॒परि॑स्रव॒नभो॒,अर्ण॑श्च॒मूषु॑| सोमो᳚अ॒स्मभ्यं॒काम्यं᳚बृ॒हन्तं᳚र॒यिंद॑दातुवी॒रव᳚न्तमु॒ग्रम्|| 21||वर्ग:15 |
| तक्ष॒द्यदी॒मन॑सो॒वेन॑तो॒वाग्ज्येष्ठ॑स्यवा॒धर्म॑णि॒क्षोरनी᳚के| आदी᳚माय॒न्वर॒मावा᳚वशा॒नाजुष्टं॒पतिं᳚क॒लशे॒गाव॒इन्दु᳚म्|| 22|| |
| प्रदा᳚नु॒दोदि॒व्योदा᳚नुपि॒न्वऋ॒तमृ॒ताय॑पवतेसुमे॒धाः| ध॒र्माभु॑वद्वृज॒न्य॑स्य॒राजा॒प्रर॒श्मिभि॑र्द॒शभि॑र्भारि॒भूम॑|| 23|| |
| प॒वित्रे᳚भिः॒पव॑मानोनृ॒चक्षा॒राजा᳚दे॒वाना᳚मु॒तमर्त्या᳚नाम्| द्वि॒ताभु॑वद्रयि॒पती᳚रयी॒णामृ॒तंभ॑र॒त्सुभृ॑तं॒चार्विन्दुः॑|| 24|| |
| अर्वाँ᳚,इव॒श्रव॑सेसा॒तिमच्छेन्द्र॑स्यवा॒योर॒भिवी॒तिम॑र्ष| सनः॑स॒हस्रा᳚बृह॒तीरिषो᳚दा॒भवा᳚सोमद्रविणो॒वित्पु॑ना॒नः|| 25|| |
| दे॒वा॒व्यो᳚नःपरिषि॒च्यमा᳚नाः॒,क्षयं᳚सु॒वीरं᳚धन्वन्तु॒सोमाः᳚| आ॒य॒ज्यवः॑सुम॒तिंवि॒श्ववा᳚रा॒होता᳚रो॒नदि॑वि॒यजो᳚म॒न्द्रत॑माः|| 26||वर्ग:16 |
| ए॒वादे᳚वदे॒वता᳚तेपवस्वम॒हेसो᳚म॒प्सर॑सेदेव॒पानः॑| म॒हश्चि॒द्धिष्मसि॑हि॒ताःस॑म॒र्येकृ॒धिसु॑ष्ठा॒नेरोद॑सीपुना॒नः|| 27|| |
| अश्वो॒नोक्र॑दो॒वृष॑भिर्युजा॒नःसिं॒होनभी॒मोमन॑सो॒जवी᳚यान्| अ॒र्वा॒चीनैः᳚प॒थिभि॒र्येरजि॑ष्ठा॒,आप॑वस्वसौमन॒संन॑इन्दो|| 28|| |
| श॒तंधारा᳚दे॒वजा᳚ता,असृग्रन्त्स॒हस्र॑मेनाःक॒वयो᳚मृजन्ति| इन्दो᳚स॒नित्रं᳚दि॒वआप॑वस्वपुरए॒तासि॑मह॒तोधन॑स्य|| 29|| |
| दि॒वोनसर्गा᳚अससृग्र॒मह्नां॒राजा॒नमि॒त्रंप्रमि॑नाति॒धीरः॑| पि॒तुर्नपु॒त्रःक्रतु॑भिर्यता॒नआप॑वस्ववि॒शे,अ॒स्या,अजी᳚तिम्|| 30|| |
| प्रते॒धारा॒मधु॑मतीरसृग्र॒न्वारा॒न्यत्पू॒तो,अ॒त्येष्यव्या॑न्| पव॑मान॒पव॑से॒धाम॒गोनां᳚जज्ञा॒नःसूर्य॑मपिन्वो,अ॒र्कैः|| 31||वर्ग:17 |
| कनि॑क्रद॒दनु॒पन्था᳚मृ॒तस्य॑शु॒क्रोविभा᳚स्य॒मृत॑स्य॒धाम॑| सइन्द्रा᳚यपवसेमत्स॒रवा᳚न्हिन्वा॒नोवाचं᳚म॒तिभिः॑कवी॒नाम्|| 32|| |
| दि॒व्यःसु॑प॒र्णोऽव॑चक्षिसोम॒पिन्व॒न्धाराः॒कर्म॑णादे॒ववी᳚तौ| एन्दो᳚विशक॒लशं᳚सोम॒धानं॒क्रन्द᳚न्निहि॒सूर्य॒स्योप॑र॒श्मिम्|| 33|| |
| ति॒स्रोवाच॑ईरयति॒प्रवह्नि᳚रृ॒तस्य॑धी॒तिंब्रह्म॑णोमनी॒षाम्| गावो᳚यन्ति॒गोप॑तिंपृ॒च्छमा᳚नाः॒सोमं᳚यन्तिम॒तयो᳚वावशा॒नाः|| 34|| |
| सोमं॒गावो᳚धे॒नवो᳚वावशा॒नाःसोमं॒विप्रा᳚म॒तिभिः॑पृ॒च्छमा᳚नाः| सोमः॑सु॒तःपू᳚यते,अ॒ज्यमा᳚नः॒सोमे᳚अ॒र्कास्त्रि॒ष्टुभः॒संन॑वन्ते|| 35|| |
| ए॒वानः॑सोमपरिषि॒च्यमा᳚न॒आप॑वस्वपू॒यमा᳚नःस्व॒स्ति| इन्द्र॒मावि॑शबृह॒तारवे᳚णव॒र्धया॒वाचं᳚ज॒नया॒पुरं᳚धिम्|| 36||वर्ग:18 |
| आजागृ॑वि॒र्विप्र॑ऋ॒ताम॑ती॒नांसोमः॑पुना॒नो,अ॑सदच्च॒मूषु॑| सप᳚न्ति॒यंमि॑थु॒नासो॒निका᳚मा,अध्व॒र्यवो᳚रथि॒रासः॑सु॒हस्ताः᳚|| 37|| |
| सपु॑ना॒नउप॒सूरे॒नधातोभे,अ॑प्रा॒रोद॑सी॒विषआ᳚वः| प्रि॒याचि॒द्यस्य॑प्रिय॒सास॑ऊ॒तीसतूधनं᳚का॒रिणे॒नप्रयं᳚सत्|| 38|| |
| सव॑र्धि॒तावर्ध॑नःपू॒यमा᳚नः॒सोमो᳚मी॒ढ्वाँ,अ॒भिनो॒ज्योति॑षावीत्| येना᳚नः॒पूर्वे᳚पि॒तरः॑पद॒ज्ञाःस्व॒र्विदो᳚अ॒भिगा,अद्रि॑मु॒ष्णन्|| 39|| |
| अक्रा᳚न्त्समु॒द्रःप्र॑थ॒मेविध᳚र्मञ्ज॒नय᳚न्प्र॒जाभुव॑नस्य॒राजा᳚| वृषा᳚प॒वित्रे॒,अधि॒सानो॒,अव्ये᳚बृ॒हत्सोमो᳚वावृधेसुवा॒नइन्दुः॑|| 40|| |
| म॒हत्तत्सोमो᳚महि॒षश्च॑कारा॒पांयद्गर्भोऽवृ॑णीतदे॒वान्| अद॑धा॒दिन्द्रे॒पव॑मान॒ओजोऽज॑नय॒त्सूर्ये॒ज्योति॒रिन्दुः॑|| 41||वर्ग:19 |
| मत्सि॑वा॒युमि॒ष्टये॒राध॑सेच॒मत्सि॑मि॒त्रावरु॑णापू॒यमा᳚नः| मत्सि॒शर्धो॒मारु॑तं॒मत्सि॑दे॒वान्मत्सि॒द्यावा᳚पृथि॒वीदे᳚वसोम|| 42|| |
| ऋ॒जुःप॑वस्ववृजि॒नस्य॑ह॒न्तापामी᳚वां॒बाध॑मानो॒मृध॑श्च| अ॒भि॒श्री॒णन्पयः॒पय॑सा॒भिगोना॒मिन्द्र॑स्य॒त्वंतव॑व॒यंसखा᳚यः|| 43|| |
| मध्वः॒सूदं᳚पवस्व॒वस्व॒उत्सं᳚वी॒रंच॑न॒आप॑वस्वा॒भगं᳚च| स्वद॒स्वेन्द्रा᳚य॒पव॑मानइन्दोर॒यिंच॑न॒आप॑वस्वासमु॒द्रात्|| 44|| |
| सोमः॑सु॒तोधार॒यात्यो॒नहित्वा॒सिन्धु॒र्ननि॒म्नम॒भिवा॒ज्य॑क्षाः| आयोनिं॒वन्य॑मसदत्पुना॒नःसमिन्दु॒र्गोभि॑रसर॒त्सम॒द्भिः|| 45|| |
| ए॒षस्यते᳚पवतइन्द्र॒सोम॑श्च॒मूषु॒धीर॑उश॒तेतव॑स्वान्| स्व॑र्चक्षारथि॒रःस॒त्यशु॑ष्मः॒कामो॒नयोदे᳚वय॒तामस॑र्जि|| 46||वर्ग:20 |
| ए॒षप्र॒त्नेन॒वय॑सापुना॒नस्ति॒रोवर्पां᳚सिदुहि॒तुर्दधा᳚नः| वसा᳚नः॒शर्म॑त्रि॒वरू᳚थम॒प्सुहोते᳚वयाति॒सम॑नेषु॒रेभ॑न्|| 47|| |
| नून॒स्त्वंर॑थि॒रोदे᳚वसोम॒परि॑स्रवच॒म्वोः᳚पू॒यमा᳚नः| अ॒प्सुस्वादि॑ष्ठो॒मधु॑माँऋ॒तावा᳚दे॒वोनयःस॑वि॒तास॒त्यम᳚न्मा|| 48|| |
| अ॒भिवा॒युंवी॒त्य॑र्षागृणा॒नो॒३॑(ओ॒)ऽभिमि॒त्रावरु॑णापू॒यमा᳚नः| अ॒भीनरं᳚धी॒जव॑नंरथे॒ष्ठाम॒भीन्द्रं॒वृष॑णं॒वज्र॑बाहुम्|| 49|| |
| अ॒भिवस्त्रा᳚सुवस॒नान्य॑र्षा॒भिधे॒नूःसु॒दुघाः᳚पू॒यमा᳚नः| अ॒भिच॒न्द्राभर्त॑वेनो॒हिर᳚ण्या॒भ्यश्वा᳚न्र॒थिनो᳚देवसोम|| 50|| |
| अ॒भीनो᳚अर्षदि॒व्यावसू᳚न्य॒भिविश्वा॒पार्थि॑वापू॒यमा᳚नः| अ॒भियेन॒द्रवि॑णम॒श्नवा᳚मा॒भ्या᳚र्षे॒यंज॑मदग्नि॒वन्नः॑|| 51||वर्ग:21 |
| अ॒याप॒वाप॑वस्वै॒नावसू᳚निमाँश्च॒त्वइ᳚न्दो॒सर॑सि॒प्रध᳚न्व| ब्र॒ध्नश्चि॒दत्र॒वातो॒नजू॒तःपु॑रु॒मेध॑श्चि॒त्तक॑वे॒नरं᳚दात्|| 52|| |
| उ॒तन॑ए॒नाप॑व॒याप॑व॒स्वाधि॑श्रु॒तेश्र॒वाय्य॑स्यती॒र्थे| ष॒ष्टिंस॒हस्रा᳚नैगु॒तोवसू᳚निवृ॒क्षंनप॒क्वंधू᳚नव॒द्रणा᳚य|| 53|| |
| मही॒मे,अ॑स्य॒वृष॒नाम॑शू॒षेमाँश्च॑त्वेवा॒पृश॑नेवा॒वध॑त्रे| अस्वा᳚पयन्नि॒गुतः॑स्ने॒हय॒च्चापा॒मित्राँ॒,अपा॒चितो᳚अचे॒तः|| 54|| |
| संत्रीप॒वित्रा॒वित॑तान्ये॒ष्यन्वेकं᳚धावसिपू॒यमा᳚नः| असि॒भगो॒,असि॑दा॒त्रस्य॑दा॒तासि॑म॒घवा᳚म॒घव॑द्भ्यइन्दो|| 55|| |
| ए॒षवि॑श्व॒वित्प॑वतेमनी॒षीसोमो॒विश्व॑स्य॒भुव॑नस्य॒राजा᳚| द्र॒प्साँ,ई॒रय᳚न्वि॒दथे॒ष्विन्दु॒र्विवार॒मव्यं᳚स॒मयाति॑याति|| 56||वर्ग:22 |
| इन्दुं᳚रिहन्तिमहि॒षा,अद॑ब्धाःप॒देरे᳚भन्तिक॒वयो॒नगृध्राः᳚| हि॒न्वन्ति॒धीरा᳚द॒शभिः॒,क्षिपा᳚भिः॒सम᳚ञ्जतेरू॒पम॒पांरसे᳚न|| 57|| |
| त्वया᳚व॒यंपव॑मानेनसोम॒भरे᳚कृ॒तंविचि॑नुयाम॒शश्व॑त्| तन्नो᳚मि॒त्रोवरु॑णोमामहन्ता॒मदि॑तिः॒सिन्धुः॑पृथि॒वी,उ॒तद्यौः|| 58|| |
| [55] अभिनइति द्वादशर्चस्य सूक्तस्यांबरीषऋजिश्वानौ पवमानसोमोनुष्टुबेकादशीबृहती |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:98}{अनुवाक:6, सूक्त:2} |
| अ॒भिनो᳚वाज॒सात॑मंर॒यिम॑र्षपुरु॒स्पृह᳚म्|इन्दो᳚स॒हस्र॑भर्णसंतुविद्यु॒म्नंवि॑भ्वा॒सह᳚म्|| 1||वर्ग:23 |
| परि॒ष्यसु॑वा॒नो,अ॒व्ययं॒रथे॒नवर्मा᳚व्यत|इन्दु॑र॒भिद्रुणा᳚हि॒तोहि॑या॒नोधारा᳚भिरक्षाः|| 2|| |
| परि॒ष्यसु॑वा॒नो,अ॑क्षा॒,इन्दु॒रव्ये॒मद॑च्युतः|धारा॒यऊ॒र्ध्वो,अ॑ध्व॒रेभ्रा॒जानैति॑गव्य॒युः|| 3|| |
| सहित्वंदे᳚व॒शश्व॑ते॒वसु॒मर्ता᳚यदा॒शुषे᳚|इन्दो᳚सह॒स्रिणं᳚र॒यिंश॒तात्मा᳚नंविवाससि|| 4|| |
| व॒यंते᳚अ॒स्यवृ॑त्रह॒न्वसो॒वस्वः॑पुरु॒स्पृहः॑|निनेदि॑ष्ठतमा,इ॒षःस्याम॑सु॒म्नस्या᳚ध्रिगो|| 5|| |
| द्विर्यंपञ्च॒स्वय॑शसं॒स्वसा᳚रो॒,अद्रि॑संहतम्|प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒काम्यं᳚प्रस्ना॒पय᳚न्त्यू॒र्मिण᳚म्|| 6|| |
| परि॒त्यंह᳚र्य॒तंहरिं᳚ब॒भ्रुंपु॑नन्ति॒वारे᳚ण|योदे॒वान्विश्वाँ॒,इत्परि॒मदे᳚नस॒हगच्छ॑ति|| 7||वर्ग:24 |
| अ॒स्यवो॒ह्यव॑सा॒पान्तो᳚दक्ष॒साध॑नम्|यःसू॒रिषु॒श्रवो᳚बृ॒हद्द॒धेस्व१॑(अ॒)र्णह᳚र्य॒तः|| 8|| |
| सवां᳚य॒ज्ञेषु॑मानवी॒,इन्दु॑र्जनिष्टरोदसी|दे॒वोदे᳚वीगिरि॒ष्ठा,अस्रे᳚ध॒न्तंतु॑वि॒ष्वणि॑|| 9|| |
| इन्द्रा᳚यसोम॒पात॑वेवृत्र॒घ्नेपरि॑षिच्यसे|नरे᳚च॒दक्षि॑णावतेदे॒वाय॑सदना॒सदे᳚|| 10|| |
| तेप्र॒त्नासो॒व्यु॑ष्टिषु॒सोमाः᳚प॒वित्रे᳚अक्षरन्| अ॒प॒प्रोथ᳚न्तःसनु॒तर्हु॑र॒श्चितः॑प्रा॒तस्ताँ,अप्र॑चेतसः|| 11|| |
| तंस॑खायःपुरो॒रुचं᳚यू॒यंव॒यंच॑सू॒रयः॑|अ॒श्याम॒वाज॑गन्ध्यंस॒नेम॒वाज॑पस्त्यम्|| 12|| |
| [56] आहर्यतायेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपौ रेभसूनु पवमानसोमोनुष्ठुबाद्याबृहती |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:99}{अनुवाक:6, सूक्त:3} |
| आह᳚र्य॒ताय॑धृ॒ष्णवे॒धनु॑स्तन्वन्ति॒पौंस्य᳚म्| शु॒क्रांव॑य॒न्त्यसु॑रायनि॒र्णिजं᳚वि॒पामग्रे᳚मही॒युवः॑|| 1||वर्ग:25 |
| अध॑क्ष॒पापरि॑ष्कृतो॒वाजाँ᳚,अ॒भिप्रगा᳚हते|यदी᳚वि॒वस्व॑तो॒धियो॒हरिं᳚हि॒न्वन्ति॒यात॑वे|| 2|| |
| तम॑स्यमर्जयामसि॒मदो॒यइ᳚न्द्र॒पात॑मः|यंगाव॑आ॒सभि॑र्द॒धुःपु॒रानू॒नंच॑सू॒रयः॑|| 3|| |
| तंगाथ॑यापुरा॒ण्यापु॑ना॒नम॒भ्य॑नूषत|उ॒तोकृ॑पन्तधी॒तयो᳚दे॒वानां॒नाम॒बिभ्र॑तीः|| 4|| |
| तमु॒क्षमा᳚णम॒व्यये॒वारे᳚पुनन्तिधर्ण॒सिम्|दू॒तंनपू॒र्वचि॑त्तय॒आशा᳚सतेमनी॒षिणः॑|| 5|| |
| सपु॑ना॒नोम॒दिन्त॑मः॒सोम॑श्च॒मूषु॑सीदति|प॒शौनरेत॑आ॒दध॒त्पति᳚र्वचस्यतेधि॒यः|| 6||वर्ग:26 |
| समृ॑ज्यतेसु॒कर्म॑भिर्दे॒वोदे॒वेभ्यः॑सु॒तः|वि॒देयदा᳚सुसंद॒दिर्म॒हीर॒पोविगा᳚हते|| 7|| |
| सु॒तइ᳚न्दोप॒वित्र॒आनृभि᳚र्य॒तोविनी᳚यसे|इन्द्रा᳚यमत्स॒रिन्त॑मश्च॒मूष्वानिषी᳚दसि|| 8|| |
| [57] अभीनवंतइति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपौ रेभसूनू पवमान सोमोनुष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:4}{मंडल:9, सूक्त:100}{अनुवाक:6, सूक्त:4} |
| अ॒भीन॑वन्ते,अ॒द्रुहः॑प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒काम्य᳚म्|व॒त्संनपूर्व॒आयु॑निजा॒तंरि॑हन्तिमा॒तरः॑|| 1||वर्ग:27 |
| पु॒ना॒नइ᳚न्द॒वाभ॑र॒सोम॑द्वि॒बर्ह॑संर॒यिम्|त्वंवसू᳚निपुष्यसि॒विश्वा᳚निदा॒शुषो᳚गृ॒हे|| 2|| |
| त्वंधियं᳚मनो॒युजं᳚सृ॒जावृ॒ष्टिंनत᳚न्य॒तुः|त्वंवसू᳚नि॒पार्थि॑वादि॒व्याच॑सोमपुष्यसि|| 3|| |
| परि॑तेजि॒ग्युषो᳚यथा॒धारा᳚सु॒तस्य॑धावति|रंह॑माणा॒व्य१॑(अ॒)व्ययं॒वारं᳚वा॒जीव॑सान॒सिः|| 4|| |
| क्रत्वे॒दक्षा᳚यनःकवे॒पव॑स्वसोम॒धार॑या|इन्द्रा᳚य॒पात॑वेसु॒तोमि॒त्राय॒वरु॑णायच|| 5|| |
| पव॑स्ववाज॒सात॑मःप॒वित्रे॒धार॑यासु॒तः|इन्द्रा᳚यसोम॒विष्ण॑वेदे॒वेभ्यो॒मधु॑मत्तमः|| 6||वर्ग:28 |
| त्वांरि॑हन्तिमा॒तरो॒हरिं᳚प॒वित्रे᳚अ॒द्रुहः॑|व॒त्संजा॒तंनधे॒नवः॒पव॑मान॒विध᳚र्मणि|| 7|| |
| पव॑मान॒महि॒श्रव॑श्चि॒त्रेभि᳚र्यासिर॒श्मिभिः॑|शर्ध॒न्तमां᳚सिजिघ्नसे॒विश्वा᳚निदा॒शुषो᳚गृ॒हे|| 8|| |
| त्वंद्यांच॑महिव्रतपृथि॒वींचाति॑जभ्रिषे|प्रति॑द्रा॒पिम॑मुञ्चथाः॒पव॑मानमहित्व॒ना|| 9|| |
| [58] पुरोजितीति षोळशर्चस्य सूक्तस्याद्यानांतिसृणांश्यावाश्विरंधीगुः चतुर्थ्यादितिसृणांनाहुषोययातिः सप्तम्यादितिसृणांमानवोनहुषः दशम्यादितिसृणांसांवरणोमनुः त्रयोदश्यादिचतसृणां वैश्वामित्रः प्रजापतिः पवमान सोमोनुष्टुप् द्वितीयातृतीये गायत्र्यौ |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:101}{अनुवाक:6, सूक्त:5} |
| पु॒रोजि॑तीवो॒,अन्ध॑सःसु॒ताय॑मादयि॒त्नवे᳚|अप॒श्वानं᳚श्नथिष्टन॒सखा᳚योदीर्घजि॒ह्व्य᳚म्|| 1||वर्ग:1 |
| योधार॑यापाव॒कया᳚परिप्र॒स्यन्द॑तेसु॒तः|इन्दु॒रश्वो॒नकृत्व्यः॑|| 2|| |
| तंदु॒रोष॑म॒भीनरः॒सोमं᳚वि॒श्वाच्या᳚धि॒या|य॒ज्ञंहि᳚न्व॒न्त्यद्रि॑भिः|| 3|| |
| सु॒तासो॒मधु॑मत्तमाः॒सोमा॒,इन्द्रा᳚यम॒न्दिनः॑|प॒वित्र॑वन्तो,अक्षरन्दे॒वान्ग॑च्छन्तुवो॒मदाः᳚|| 4|| |
| इन्दु॒रिन्द्रा᳚यपवत॒इति॑दे॒वासो᳚अब्रुवन्|वा॒चस्पति᳚र्मखस्यते॒विश्व॒स्येशा᳚न॒ओज॑सा|| 5|| |
| स॒हस्र॑धारःपवतेसमु॒द्रोवा᳚चमीङ्ख॒यः|सोमः॒पती᳚रयी॒णांसखेन्द्र॑स्यदि॒वेदि॑वे|| 6||वर्ग:2 |
| अ॒यंपू॒षार॒यिर्भगः॒सोमः॑पुना॒नो,अ॑र्षति|पति॒र्विश्व॑स्य॒भूम॑नो॒व्य॑ख्य॒द्रोद॑सी,उ॒भे|| 7|| |
| समु॑प्रि॒या,अ॑नूषत॒गावो॒मदा᳚य॒घृष्व॑यः|सोमा᳚सःकृण्वतेप॒थःपव॑मानास॒इन्द॑वः|| 8|| |
| यओजि॑ष्ठ॒स्तमाभ॑र॒पव॑मानश्र॒वाय्य᳚म्|यःपञ्च॑चर्ष॒णीर॒भिर॒यिंयेन॒वना᳚महै|| 9|| |
| सोमाः᳚पवन्त॒इन्द॑वो॒ऽस्मभ्यं᳚गातु॒वित्त॑माः|मि॒त्राःसु॑वा॒ना,अ॑रे॒पसः॑स्वा॒ध्यः॑स्व॒र्विदः॑|| 10|| |
| सु॒ष्वा॒णासो॒व्यद्रि॑भि॒श्चिता᳚ना॒गोरधि॑त्व॒चि|इष॑म॒स्मभ्य॑म॒भितः॒सम॑स्वरन्वसु॒विदः॑|| 11||वर्ग:3 |
| ए॒तेपू॒तावि॑प॒श्चितः॒सोमा᳚सो॒दध्या᳚शिरः|सूर्या᳚सो॒नद॑र्श॒तासो᳚जिग॒त्नवो᳚ध्रु॒वाघृ॒ते|| 12|| |
| प्रसु᳚न्वा॒नस्यान्ध॑सो॒मर्तो॒नवृ॑त॒तद्वचः॑|अप॒श्वान॑मरा॒धसं᳚ह॒ताम॒खंनभृग॑वः|| 13|| |
| आजा॒मिरत्के᳚अव्यतभु॒जेनपु॒त्रओ॒ण्योः᳚|सर॑ज्जा॒रोनयोष॑णांव॒रोनयोनि॑मा॒सद᳚म्|| 14|| |
| सवी॒रोद॑क्ष॒साध॑नो॒वियस्त॒स्तम्भ॒रोद॑सी|हरिः॑प॒वित्रे᳚अव्यतवे॒धानयोनि॑मा॒सद᳚म्|| 15|| |
| अव्यो॒वारे᳚भिःपवते॒सोमो॒गव्ये॒,अधि॑त्व॒चि|कनि॑क्रद॒द्वृषा॒हरि॒रिन्द्र॑स्या॒भ्ये᳚तिनिष्कृ॒तम्|| 16|| |
| [59] क्राणाशिशुरित्यष्टर्चस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितः पवमानसोमउष्णिक् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:102}{अनुवाक:6, सूक्त:6} |
| क्रा॒णाशिशु᳚र्म॒हीनां᳚हि॒न्वन्नृ॒तस्य॒दीधि॑तिम्|विश्वा॒परि॑प्रि॒याभु॑व॒दध॑द्वि॒ता|| 1||वर्ग:4 |
| उप॑त्रि॒तस्य॑पा॒ष्यो॒३॑(ओ॒)रभ॑क्त॒यद्गुहा᳚प॒दम्|य॒ज्ञस्य॑स॒प्तधाम॑भि॒रध॑प्रि॒यम्|| 2|| |
| त्रीणि॑त्रि॒तस्य॒धार॑यापृ॒ष्ठेष्वेर॑यार॒यिम्|मिमी᳚ते,अस्य॒योज॑ना॒विसु॒क्रतुः॑|| 3|| |
| ज॒ज्ञा॒नंस॒प्तमा॒तरो᳚वे॒धाम॑शासतश्रि॒ये|अ॒यंध्रु॒वोर॑यी॒णांचिके᳚त॒यत्|| 4|| |
| अ॒स्यव्र॒तेस॒जोष॑सो॒विश्वे᳚दे॒वासो᳚अ॒द्रुहः॑|स्पा॒र्हाभ॑वन्ति॒रन्त॑योजु॒षन्त॒यत्|| 5|| |
| यमी॒गर्भ॑मृता॒वृधो᳚दृ॒शेचारु॒मजी᳚जनन्|क॒विंमंहि॑ष्ठमध्व॒रेपु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 6||वर्ग:5 |
| स॒मी॒ची॒ने,अ॒भित्मना᳚य॒ह्वी,ऋ॒तस्य॑मा॒तरा᳚|त॒न्वा॒नाय॒ज्ञमा᳚नु॒षग्यद᳚ञ्ज॒ते|| 7|| |
| क्रत्वा᳚शु॒क्रेभि॑र॒क्षभि᳚रृ॒णोरप᳚व्र॒जंदि॒वः|हि॒न्वन्नृ॒तस्य॒दीधि॑तिं॒प्राध्व॒रे|| 8|| |
| [60] प्रपुनानायेति षडृचस्य सूक्तस्याप्त्योद्वितः पवमानसोमउष्णिक् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:103}{अनुवाक:6, सूक्त:7} |
| प्रपु॑ना॒नाय॑वे॒धसे॒सोमा᳚य॒वच॒उद्य॑तम्|भृ॒तिंनभ॑राम॒तिभि॒र्जुजो᳚षते|| 1||वर्ग:6 |
| परि॒वारा᳚ण्य॒व्यया॒गोभि॑रञ्जा॒नो,अ॑र्षति|त्रीष॒धस्था᳚पुना॒नःकृ॑णुते॒हरिः॑|| 2|| |
| परि॒कोशं᳚मधु॒श्चुत॑म॒व्यये॒वारे᳚अर्षति|अ॒भिवाणी॒रृषी᳚णांस॒प्तनू᳚षत|| 3|| |
| परि॑णे॒ताम॑ती॒नांवि॒श्वदे᳚वो॒,अदा᳚भ्यः|सोमः॑पुना॒नश्च॒म्वो᳚र्विश॒द्धरिः॑|| 4|| |
| परि॒दैवी॒रनु॑स्व॒धा,इन्द्रे᳚णयाहिस॒रथ᳚म्|पु॒ना॒नोवा॒घद्वा॒घद्भि॒रम॑र्त्यः|| 5|| |
| परि॒सप्ति॒र्नवा᳚ज॒युर्दे॒वोदे॒वेभ्यः॑सु॒तः|व्या॒न॒शिःपव॑मानो॒विधा᳚वति|| 6|| |
| [61] सखायइति षडृचस्य सूक्तस्य काश्यपौपर्वतनारदौ पवमान सोमउष्णिक् (शिखंडिन्यावप्सरसौऋषिकेत्रपाक्षिकं किंचपर्वतनारदौकाण्वावपि) |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:104}{अनुवाक:7, सूक्त:1} |
| सखा᳚य॒आनिषी᳚दतपुना॒नाय॒प्रगा᳚यत|शिशुं॒नय॒ज्ञैःपरि॑भूषतश्रि॒ये|| 1||वर्ग:7 |
| समी᳚व॒त्संनमा॒तृभिः॑सृ॒जता᳚गय॒साध॑नम्|दे॒वा॒व्य१॑(अं॒)मद॑म॒भिद्विश॑वसम्|| 2|| |
| पु॒नाता᳚दक्ष॒साध॑नं॒यथा॒शर्धा᳚यवी॒तये᳚|यथा᳚मि॒त्राय॒वरु॑णाय॒शंत॑मः|| 3|| |
| अ॒स्मभ्यं᳚त्वावसु॒विद॑म॒भिवाणी᳚रनूषत|गोभि॑ष्टे॒वर्ण॑म॒भिवा᳚सयामसि|| 4|| |
| सनो᳚मदानांपत॒इन्दो᳚दे॒वप्स॑रा,असि|सखे᳚व॒सख्ये᳚गातु॒वित्त॑मोभव|| 5|| |
| सने᳚मिकृ॒ध्य१॑(अ॒)स्मदार॒क्षसं॒कंचि॑द॒त्रिण᳚म्|अपादे᳚वंद्व॒युमंहो᳚युयोधिनः|| 6|| |
| [62] तंवइति षडृचस्य सूक्तस्य पर्वतनारदौ पवमानसोमउष्णिक् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:105}{अनुवाक:7, सूक्त:2} |
| तंवः॑सखायो॒मदा᳚यपुना॒नम॒भिगा᳚यत|शिशुं॒नय॒ज्ञैःस्व॑दयन्तगू॒र्तिभिः॑|| 1||वर्ग:8 |
| संव॒त्सइ॑वमा॒तृभि॒रिन्दु᳚र्हिन्वा॒नो,अ॑ज्यते|दे॒वा॒वीर्मदो᳚म॒तिभिः॒परि॑ष्कृतः|| 2|| |
| अ॒यंदक्षा᳚य॒साध॑नो॒ऽयंशर्धा᳚यवी॒तये᳚|अ॒यंदे॒वेभ्यो॒मधु॑मत्तमःसु॒तः|| 3|| |
| गोम᳚न्नइन्दो॒,अश्व॑वत्सु॒तःसु॑दक्षधन्व|शुचिं᳚ते॒वर्ण॒मधि॒गोषु॑दीधरम्|| 4|| |
| सनो᳚हरीणांपत॒इन्दो᳚दे॒वप्स॑रस्तमः|सखे᳚व॒सख्ये॒नर्यो᳚रु॒चेभ॑व|| 5|| |
| सने᳚मि॒त्वम॒स्मदाँ,अदे᳚वं॒कंचि॑द॒त्रिण᳚म्|सा॒ह्वाँ,इ᳚न्दो॒परि॒बाधो॒,अप॑द्व॒युम्|| 6|| |
| [63] इंद्रमच्छेति चतुर्दशर्चस्यसूक्तस्याद्यानांतिसृणां चाक्षुषोग्निः चतुर्थ्यादितिसृणां मानवश्चक्षुः सप्तम्यादितिसृणामाप्सवोमनुः दशम्यादिपंचानां चाक्षुषोग्निः पवमान सोमउष्णिक् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:106}{अनुवाक:7, सूक्त:3} |
| इन्द्र॒मच्छ॑सु॒ता,इ॒मेवृष॑णंयन्तु॒हर॑यः|श्रु॒ष्टीजा॒तास॒इन्द॑वःस्व॒र्विदः॑|| 1||वर्ग:9 |
| अ॒यंभरा᳚यसान॒सिरिन्द्रा᳚यपवतेसु॒तः|सोमो॒जैत्र॑स्यचेतति॒यथा᳚वि॒दे|| 2|| |
| अ॒स्येदिन्द्रो॒मदे॒ष्वाग्रा॒भंगृ॑भ्णीतसान॒सिम्|वज्रं᳚च॒वृष॑णंभर॒त्सम॑प्सु॒जित्|| 3|| |
| प्रध᳚न्वासोम॒जागृ॑वि॒रिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|द्यु॒मन्तं॒शुष्म॒माभ॑रास्व॒र्विद᳚म्|| 4|| |
| इन्द्रा᳚य॒वृष॑णं॒मदं॒पव॑स्ववि॒श्वद॑र्शतः|स॒हस्र॑यामापथि॒कृद्वि॑चक्ष॒णः|| 5|| |
| अ॒स्मभ्यं᳚गातु॒वित्त॑मोदे॒वेभ्यो॒मधु॑मत्तमः|स॒हस्रं᳚याहिप॒थिभिः॒कनि॑क्रदत्|| 6||वर्ग:10 |
| पव॑स्वदे॒ववी᳚तय॒इन्दो॒धारा᳚भि॒रोज॑सा|आक॒लशं॒मधु॑मान्त्सोमनःसदः|| 7|| |
| तव॑द्र॒प्सा,उ॑द॒प्रुत॒इन्द्रं॒मदा᳚यवावृधुः|त्वांदे॒वासो᳚अ॒मृता᳚य॒कंप॑पुः|| 8|| |
| आनः॑सुतासइन्दवःपुना॒नाधा᳚वतार॒यिम्|वृ॒ष्टिद्या᳚वोरीत्यापःस्व॒र्विदः॑|| 9|| |
| सोमः॑पुना॒नऊ॒र्मिणाव्यो॒वारं॒विधा᳚वति|अग्रे᳚वा॒चःपव॑मानः॒कनि॑क्रदत्|| 10|| |
| धी॒भिर्हि᳚न्वन्तिवा॒जिनं॒वने॒क्रीळ᳚न्त॒मत्य॑विम्|अ॒भित्रि॑पृ॒ष्ठंम॒तयः॒सम॑स्वरन्|| 11||वर्ग:11 |
| अस॑र्जिक॒लशाँ᳚,अ॒भिमी॒ळ्हेसप्ति॒र्नवा᳚ज॒युः|पु॒ना॒नोवाचं᳚ज॒नय᳚न्नसिष्यदत्|| 12|| |
| पव॑तेहर्य॒तोहरि॒रति॒ह्वरां᳚सि॒रंह्या᳚|अ॒भ्यर्ष᳚न्त्स्तो॒तृभ्यो᳚वी॒रव॒द्यशः॑|| 13|| |
| अ॒याप॑वस्वदेव॒युर्मधो॒र्धारा᳚असृक्षत|रेभ᳚न्प॒वित्रं॒पर्ये᳚षिवि॒श्वतः॑|| 14|| |
| [64] परीतइति षड्विंशत्यृचस्य सूक्तस्य बार्हस्पत्यो भरद्वाजो मारीचः कश्यपो राहूगणो गोतमोभौमोत्रिर्गाथिनो विश्वामित्रो भार्गवोजमदग्निः मैत्रावरुणिर्वसिष्ट ऋषयः पवमान सोमोदेवता आद्याचतुर्थीषष्ट्यष्टमी नवमीदशमी द्वादशी चतुर्दश्यः सप्तदश्यायश्चयुजः बृहत्यः द्वितीयापंचमी सप्तम्येकादशी त्रयोदशी पंचदश्योष्टादश्यादि युजश्चसतोबृहत्यः षोडशीचद्विपदाविराट् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:107}{अनुवाक:7, सूक्त:4} |
| परी॒तोषि᳚ञ्चतासु॒तंसोमो॒यउ॑त्त॒मंह॒विः| द॒ध॒न्वाँऽयोनर्यो᳚अ॒प्स्व१॑(अ॒)न्तरासु॒षाव॒सोम॒मद्रि॑भिः|| 1||वर्ग:12 |
| नू॒नंपु॑ना॒नोऽवि॑भिः॒परि॑स्र॒वाद॑ब्धःसुर॒भिन्त॑रः| सु॒तेचि॑त्त्वा॒प्सुम॑दामो॒,अन्ध॑साश्री॒णन्तो॒गोभि॒रुत्त॑रम्|| 2|| |
| परि॑सुवा॒नश्चक्ष॑सेदेव॒माद॑नः॒क्रतु॒रिन्दु᳚र्विचक्ष॒णः|| 3|| |
| पु॒ना॒नःसो᳚म॒धार॑या॒पोवसा᳚नो,अर्षसि| आर॑त्न॒धायोनि॑मृ॒तस्य॑सीद॒स्युत्सो᳚देवहिर॒ण्ययः॑|| 4|| |
| दु॒हा॒नऊध॑र्दि॒व्यंमधु॑प्रि॒यंप्र॒त्नंस॒धस्थ॒मास॑दत्| आ॒पृच्छ्यं᳚ध॒रुणं᳚वा॒ज्य॑र्षति॒नृभि॑र्धू॒तोवि॑चक्ष॒णः|| 5|| |
| पु॒ना॒नःसो᳚म॒जागृ॑वि॒रव्यो॒वारे॒परि॑प्रि॒यः| त्वंविप्रो᳚अभ॒वोऽङ्गि॑रस्तमो॒मध्वा᳚य॒ज्ञंमि॑मिक्षनः|| 6||वर्ग:13 |
| सोमो᳚मी॒ढ्वान्प॑वतेगातु॒वित्त॑म॒ऋषि॒र्विप्रो᳚विचक्ष॒णः| त्वंक॒विर॑भवोदेव॒वीत॑म॒आसूर्यं᳚रोहयोदि॒वि|| 7|| |
| सोम॑उषुवा॒णःसो॒तृभि॒रधि॒ष्णुभि॒रवी᳚नाम्| अश्व॑येवह॒रिता᳚याति॒धार॑याम॒न्द्रया᳚याति॒धार॑या|| 8|| |
| अ॒नू॒पेगोमा॒न्गोभि॑रक्षाः॒सोमो᳚दु॒ग्धाभि॑रक्षाः| स॒मु॒द्रंनसं॒वर॑णान्यग्मन्म॒न्दीमदा᳚यतोशते|| 9|| |
| आसो᳚मसुवा॒नो,अद्रि॑भिस्ति॒रोवारा᳚ण्य॒व्यया᳚| जनो॒नपु॒रिच॒म्वो᳚र्विश॒द्धरिः॒सदो॒वने᳚षुदधिषे|| 10|| |
| समा᳚मृजेति॒रो,अण्वा᳚निमे॒ष्यो᳚मी॒ळ्हेसप्ति॒र्नवा᳚ज॒युः| अ॒नु॒माद्यः॒पव॑मानोमनी॒षिभिः॒सोमो॒विप्रे᳚भि॒रृक्व॑भिः|| 11||वर्ग:14 |
| प्रसो᳚मदे॒ववी᳚तये॒सिन्धु॒र्नपि॑प्ये॒,अर्ण॑सा| अं॒शोःपय॑सामदि॒रोनजागृ॑वि॒रच्छा॒कोशं᳚मधु॒श्चुत᳚म्|| 12|| |
| आह᳚र्य॒तो,अर्जु॑ने॒,अत्के᳚अव्यतप्रि॒यःसू॒नुर्नमर्ज्यः॑| तमीं᳚हिन्वन्त्य॒पसो॒यथा॒रथं᳚न॒दीष्वागभ॑स्त्योः|| 13|| |
| अ॒भिसोमा᳚सआ॒यवः॒पव᳚न्ते॒मद्यं॒मद᳚म्| स॒मु॒द्रस्याधि॑वि॒ष्टपि॑मनी॒षिणो᳚मत्स॒रासः॑स्व॒र्विदः॑|| 14|| |
| तर॑त्समु॒द्रंपव॑मानऊ॒र्मिणा॒राजा᳚दे॒वऋ॒तंबृ॒हत्| अर्ष᳚न्मि॒त्रस्य॒वरु॑णस्य॒धर्म॑णा॒प्रहि᳚न्वा॒नऋ॒तंबृ॒हत्|| 15|| |
| नृभि᳚र्येमा॒नोह᳚र्य॒तोवि॑चक्ष॒णोराजा᳚दे॒वःस॑मु॒द्रियः॑|| 16||वर्ग:15 |
| इन्द्रा᳚यपवते॒मदः॒सोमो᳚म॒रुत्व॑तेसु॒तः| स॒हस्र॑धारो॒,अत्यव्य॑मर्षति॒तमी᳚मृजन्त्या॒यवः॑|| 17|| |
| पु॒ना॒नश्च॒मूज॒नय᳚न्म॒तिंक॒विःसोमो᳚दे॒वेषु॑रण्यति| अ॒पोवसा᳚नः॒परि॒गोभि॒रुत्त॑रः॒सीद॒न्वने᳚ष्वव्यत|| 18|| |
| तवा॒हंसो᳚मरारणस॒ख्यइ᳚न्दोदि॒वेदि॑वे| पु॒रूणि॑बभ्रो॒निच॑रन्ति॒मामव॑परि॒धीँरति॒ताँ,इ॑हि|| 19|| |
| उ॒ताहंनक्त॑मु॒तसो᳚मते॒दिवा᳚स॒ख्याय॑बभ्र॒ऊध॑नि| घृ॒णातप᳚न्त॒मति॒सूर्यं᳚प॒रःश॑कु॒ना,इ॑वपप्तिम|| 20|| |
| मृ॒ज्यमा᳚नःसुहस्त्यसमु॒द्रेवाच॑मिन्वसि| र॒यिंपि॒शङ्गं᳚बहु॒लंपु॑रु॒स्पृहं॒पव॑माना॒भ्य॑र्षसि|| 21||वर्ग:16 |
| मृ॒जा॒नोवारे॒पव॑मानो,अ॒व्यये॒वृषाव॑चक्रदो॒वने᳚| दे॒वानां᳚सोमपवमाननिष्कृ॒तंगोभि॑रञ्जा॒नो,अ॑र्षसि|| 22|| |
| पव॑स्व॒वाज॑सातये॒ऽभिविश्वा᳚नि॒काव्या᳚| त्वंस॑मु॒द्रंप्र॑थ॒मोविधा᳚रयोदे॒वेभ्यः॑सोममत्स॒रः|| 23|| |
| सतूप॑वस्व॒परि॒पार्थि॑वं॒रजो᳚दि॒व्याच॑सोम॒धर्म॑भिः| त्वांविप्रा᳚सोम॒तिभि᳚र्विचक्षणशु॒भ्रंहि᳚न्वन्तिधी॒तिभिः॑|| 24|| |
| पव॑माना,असृक्षतप॒वित्र॒मति॒धार॑या| म॒रुत्व᳚न्तोमत्स॒रा,इ᳚न्द्रि॒याहया᳚मे॒धाम॒भिप्रयां᳚सिच|| 25|| |
| अ॒पोवसा᳚नः॒परि॒कोश॑मर्ष॒तीन्दु᳚र्हिया॒नःसो॒तृभिः॑| ज॒नय॒ञ्ज्योति᳚र्म॒न्दना᳚अवीवश॒द्गाःकृ᳚ण्वा॒नोननि॒र्णिज᳚म्|| 26|| |
| [65] पवस्वेति षोळशर्चस्य सूक्तस्याद्ययोर्द्वयोः शाक्तयोगौरिवीतिः तृतीयायावसिष्ठःशक्तिः चतुर्थ्यादिद्वयोरांगिरसउरुः षष्ठ्यादिद्वयोर्भारद्वाजऋजिश्वः अष्टम्यादिद्वयोरांगिरस ऊर्ध्वसद्मः दशम्यादिद्वयोरांगिरसः कृतयशः द्वादश्यादिद्वयोरृणंचयः चतुर्दश्यादितिसृणांवासिष्ठःशक्तिः इत्य ऋषयः पवमानसोमोदेवता अयुजः ककुभो युजःसतोबृहत्यः ससुन्वेय इति यवमध्यागायत्री |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:108}{अनुवाक:7, सूक्त:5} |
| पव॑स्व॒मधु॑मत्तम॒इन्द्रा᳚यसोमक्रतु॒वित्त॑मो॒मदः॑|महि॑द्यु॒क्षत॑मो॒मदः॑|| 1||वर्ग:17 |
| यस्य॑तेपी॒त्वावृ॑ष॒भोवृ॑षा॒यते॒ऽस्यपी॒तास्व॒र्विदः॑| ससु॒प्रके᳚तो,अ॒भ्य॑क्रमी॒दिषोऽच्छा॒वाजं॒नैत॑शः|| 2|| |
| त्वंह्य१॑(अ॒)ङ्गदैव्या॒पव॑मान॒जनि॑मानिद्यु॒मत्त॑मः|अ॒मृ॒त॒त्वाय॑घो॒षयः॑|| 3|| |
| येना॒नव॑ग्वोद॒ध्यङ्ङ॑पोर्णु॒तेयेन॒विप्रा᳚सआपि॒रे| दे॒वानां᳚सु॒म्ने,अ॒मृत॑स्य॒चारु॑णो॒येन॒श्रवां᳚स्यान॒शुः|| 4|| |
| ए॒षस्यधार॑यासु॒तोऽव्यो॒वारे᳚भिःपवतेम॒दिन्त॑मः|क्रीळ᳚न्नू॒र्मिर॒पामि॑व|| 5|| |
| यउ॒स्रिया॒,अप्या᳚अ॒न्तरश्म॑नो॒निर्गा,अकृ᳚न्त॒दोज॑सा| अ॒भिव्र॒जंत॑त्निषे॒गव्य॒मश्व्यं᳚व॒र्मीव॑धृष्ण॒वारु॑ज|| 6||वर्ग:18 |
| आसो᳚ता॒परि॑षिञ्च॒ताश्वं॒नस्तोम॑म॒प्तुरं᳚रज॒स्तुर᳚म्|व॒न॒क्र॒क्षमु॑द॒प्रुत᳚म्|| 7|| |
| स॒हस्र॑धारंवृष॒भंप॑यो॒वृधं᳚प्रि॒यंदे॒वाय॒जन्म॑ने| ऋ॒तेन॒यऋ॒तजा᳚तोविवावृ॒धेराजा᳚दे॒वऋ॒तंबृ॒हत्|| 8|| |
| अ॒भिद्यु॒म्नंबृ॒हद्यश॒इष॑स्पतेदिदी॒हिदे᳚वदेव॒युः|विकोशं᳚मध्य॒मंयु॑व|| 9|| |
| आव॑च्यस्वसुदक्षच॒म्वोः᳚सु॒तोवि॒शांवह्नि॒र्नवि॒श्पतिः॑| वृ॒ष्टिंदि॒वःप॑वस्वरी॒तिम॒पांजिन्वा॒गवि॑ष्टये॒धियः॑|| 10|| |
| ए॒तमु॒त्यंम॑द॒च्युतं᳚स॒हस्र॑धारंवृष॒भंदिवो᳚दुहुः|विश्वा॒वसू᳚नि॒बिभ्र॑तम्|| 11||वर्ग:19 |
| वृषा॒विज॑ज्ञेज॒नय॒न्नम॑र्त्यःप्र॒तप॒ञ्ज्योति॑षा॒तमः॑| ससुष्टु॑तःक॒विभि᳚र्नि॒र्णिजं᳚दधेत्रि॒धात्व॑स्य॒दंस॑सा|| 12|| |
| ससु᳚न्वे॒योवसू᳚नां॒योरा॒यामा᳚ने॒तायइळा᳚नाम्|सोमो॒यःसु॑क्षिती॒नाम्|| 13|| |
| यस्य॑न॒इन्द्रः॒पिबा॒द्यस्य॑म॒रुतो॒यस्य॑वार्य॒मणा॒भगः॑| आयेन॑मि॒त्रावरु॑णा॒करा᳚मह॒एन्द्र॒मव॑सेम॒हे|| 14|| |
| इन्द्रा᳚यसोम॒पात॑वे॒नृभि᳚र्य॒तःस्वा᳚यु॒धोम॒दिन्त॑मः|पव॑स्व॒मधु॑मत्तमः|| 15|| |
| इन्द्र॑स्य॒हार्दि॑सोम॒धान॒मावि॑शसमु॒द्रमि॑व॒सिन्ध॑वः| जुष्टो᳚मि॒त्राय॒वरु॑णायवा॒यवे᳚दि॒वोवि॑ष्ट॒म्भउ॑त्त॒मः|| 16|| |
| [66] परिप्रेतिद्वाविंशत्यृचस्य सूक्तस्यैश्वरयोधिष्ण्याग्नयः पवमान सोमोद्विपदा विराट् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:109}{अनुवाक:7, सूक्त:6} |
| परि॒प्रध॒न्वेन्द्रा᳚यसोमस्वा॒दुर्मि॒त्राय॑पू॒ष्णेभगा᳚य|| 1||वर्ग:20 |
| इन्द्र॑स्तेसोमसु॒तस्य॑पेयाः॒क्रत्वे॒दक्षा᳚य॒विश्वे᳚चदे॒वाः|| 2|| |
| ए॒वामृता᳚यम॒हेक्षया᳚य॒सशु॒क्रो,अ॑र्षदि॒व्यःपी॒यूषः॑|| 3|| |
| पव॑स्वसोमम॒हान्त्स॑मु॒द्रःपि॒तादे॒वानां॒विश्वा॒भिधाम॑|| 4|| |
| शु॒क्रःप॑वस्वदे॒वेभ्यः॑सोमदि॒वेपृ॑थि॒व्यैशंच॑प्र॒जायै᳚|| 5|| |
| दि॒वोध॒र्तासि॑शु॒क्रःपी॒यूषः॑स॒त्येविध᳚र्मन्वा॒जीप॑वस्व|| 6|| |
| पव॑स्वसोमद्यु॒म्नीसु॑धा॒रोम॒हामवी᳚ना॒मनु॑पू॒र्व्यः|| 7|| |
| नृभि᳚र्येमा॒नोज॑ज्ञा॒नःपू॒तः,क्षर॒द्विश्वा᳚निम॒न्द्रःस्व॒र्वित्|| 8|| |
| इन्दुः॑पुना॒नःप्र॒जामु॑रा॒णःकर॒द्विश्वा᳚नि॒द्रवि॑णानिनः|| 9|| |
| पव॑स्वसोम॒क्रत्वे॒दक्षा॒याश्वो॒ननि॒क्तोवा॒जीधना᳚य|| 10|| |
| तंते᳚सो॒तारो॒रसं॒मदा᳚यपु॒नन्ति॒सोमं᳚म॒हेद्यु॒म्नाय॑|| 11||वर्ग:21 |
| शिशुं᳚जज्ञा॒नंहरिं᳚मृजन्तिप॒वित्रे॒सोमं᳚दे॒वेभ्य॒इन्दु᳚म्|| 12|| |
| इन्दुः॑पविष्ट॒चारु॒र्मदा᳚या॒पामु॒पस्थे᳚क॒विर्भगा᳚य|| 13|| |
| बिभ॑र्ति॒चार्विन्द्र॑स्य॒नाम॒येन॒विश्वा᳚निवृ॒त्राज॒घान॑|| 14|| |
| पिब᳚न्त्यस्य॒विश्वे᳚दे॒वासो॒गोभिः॑श्री॒तस्य॒नृभिः॑सु॒तस्य॑|| 15|| |
| प्रसु॑वा॒नो,अ॑क्षाःस॒हस्र॑धारस्ति॒रःप॒वित्रं॒विवार॒मव्य᳚म्|| 16|| |
| सवा॒ज्य॑क्षाःस॒हस्र॑रेता,अ॒द्भिर्मृ॑जा॒नोगोभिः॑श्रीणा॒नः|| 17|| |
| प्रसो᳚मया॒हीन्द्र॑स्यकु॒क्षानृभि᳚र्येमा॒नो,अद्रि॑भिःसु॒तः|| 18|| |
| अस॑र्जिवा॒जीति॒रःप॒वित्र॒मिन्द्रा᳚य॒सोमः॑स॒हस्र॑धारः|| 19|| |
| अ॒ञ्जन्त्ये᳚नं॒मध्वो॒रसे॒नेन्द्रा᳚य॒वृष्ण॒इन्दुं॒मदा᳚य|| 20|| |
| दे॒वेभ्य॑स्त्वा॒वृथा॒पाज॑से॒ऽपोवसा᳚नं॒हरिं᳚मृजन्ति|| 21|| |
| इन्दु॒रिन्द्रा᳚यतोशते॒नितो᳚शतेश्री॒णन्नु॒ग्रोरि॒णन्न॒पः|| 22|| |
| [67] पर्यूष्विति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य त्र्यरुणत्रसदस्यू राजानौ पवमान सोमः आद्यास्तिस्रोनुष्टुभः पिपीलिकमध्याः चतुर्थ्यादिषळूर्ध्व बृहत्योंऽत्यास्तिस्रोविराजः |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:110}{अनुवाक:7, सूक्त:7} |
| पर्यू॒षुप्रध᳚न्व॒वाज॑सातये॒परि॑वृ॒त्राणि॑स॒क्षणिः॑|द्वि॒षस्त॒रध्या᳚ऋण॒यान॑ईयसे|| 1||वर्ग:22 |
| अनु॒हित्वा᳚सु॒तंसो᳚म॒मदा᳚मसिम॒हेस॑मर्य॒राज्ये᳚|वाजाँ᳚,अ॒भिप॑वमान॒प्रगा᳚हसे|| 2|| |
| अजी᳚जनो॒हिप॑वमान॒सूर्यं᳚वि॒धारे॒शक्म॑ना॒पयः॑|गोजी᳚रया॒रंह॑माणः॒पुरं᳚ध्या|| 3|| |
| अजी᳚जनो,अमृत॒मर्त्ये॒ष्वाँऋ॒तस्य॒धर्म᳚न्न॒मृत॑स्य॒चारु॑णः| सदा᳚सरो॒वाज॒मच्छा॒सनि॑ष्यदत्|| 4|| |
| अ॒भ्य॑भि॒हिश्रव॑सात॒तर्दि॒थोत्सं॒नकंचि॑ज्जन॒पान॒मक्षि॑तम्| शर्या᳚भि॒र्नभर॑माणो॒गभ॑स्त्योः|| 5|| |
| आदीं॒केचि॒त्पश्य॑मानास॒आप्यं᳚वसु॒रुचो᳚दि॒व्या,अ॒भ्य॑नूषत| वारं॒नदे॒वःस॑वि॒ताव्यू᳚र्णुते|| 6|| |
| त्वेसो᳚मप्रथ॒मावृ॒क्तब᳚र्हिषोम॒हेवाजा᳚य॒श्रव॑से॒धियं᳚दधुः| सत्वंनो᳚वीरवी॒र्या᳚यचोदय|| 7||वर्ग:23 |
| दि॒वःपी॒यूषं᳚पू॒र्व्यंयदु॒क्थ्यं᳚म॒होगा॒हाद्दि॒वआनिर॑धुक्षत| इन्द्र॑म॒भिजाय॑मानं॒सम॑स्वरन्|| 8|| |
| अध॒यदि॒मेप॑वमान॒रोद॑सी,इ॒माच॒विश्वा॒भुव॑ना॒भिम॒ज्मना᳚| यू॒थेननि॒ष्ठावृ॑ष॒भोविति॑ष्ठसे|| 9|| |
| सोमः॑पुना॒नो,अ॒व्यये॒वारे॒शिशु॒र्नक्रीळ॒न्पव॑मानो,अक्षाः|स॒हस्र॑धारःश॒तवा᳚ज॒इन्दुः॑|| 10|| |
| ए॒षपु॑ना॒नोमधु॑माँऋ॒तावेन्द्रा॒येन्दुः॑पवतेस्वा॒दुरू॒र्मिः|वा॒ज॒सनि᳚र्वरिवो॒विद्व॑यो॒धाः|| 11|| |
| सप॑वस्व॒सह॑मानःपृत॒न्यून्त्सेध॒न्रक्षां॒स्यप॑दु॒र्गहा᳚णि|स्वा॒यु॒धःसा᳚स॒ह्वान्त्सो᳚म॒शत्रू॑न्|| 12|| |
| [68] अयारुचेति तृचस्य सूक्तस्य पारुच्छेपिरनानतः पवमान सोमोत्यष्टिः |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:111}{अनुवाक:7, सूक्त:8} |
| अ॒यारु॒चाहरि᳚ण्यापुना॒नोविश्वा॒द्वेषां᳚सितरतिस्व॒युग्व॑भिः॒सूरो॒नस्व॒युग्व॑भिः| धारा᳚सु॒तस्य॑रोचतेपुना॒नो,अ॑रु॒षोहरिः॑| विश्वा॒यद्रू॒पाप॑रि॒यात्यृक्व॑भिःस॒प्तास्ये᳚भि॒रृक्व॑भिः|| 1||वर्ग:24 |
| त्वंत्यत्प॑णी॒नांवि॑दो॒वसु॒संमा॒तृभि᳚र्मर्जयसि॒स्वआदम॑ऋ॒तस्य॑धी॒तिभि॒र्दमे᳚| प॒रा॒वतो॒नसाम॒तद्यत्रा॒रण᳚न्तिधी॒तयः॑| त्रि॒धातु॑भि॒ररु॑षीभि॒र्वयो᳚दधे॒रोच॑मानो॒वयो᳚दधे|| 2|| |
| पूर्वा॒मनु॑प्र॒दिशं᳚याति॒चेकि॑त॒त्संर॒श्मिभि᳚र्यततेदर्श॒तोरथो॒दैव्यो᳚दर्श॒तोरथः॑| अग्म᳚न्नु॒क्थानि॒पौंस्येन्द्रं॒जैत्रा᳚यहर्षयन्| वज्र॑श्च॒यद्भव॑थो॒,अन॑पच्युतास॒मत्स्वन॑पच्युता|| 3|| |
| [69] नानानमिति चतुरृचस्य सूक्तस्यांगिरसः शिशुः पवमानसोमःपंक्तिः |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:112}{अनुवाक:7, सूक्त:9} |
| ना॒ना॒नंवा,उ॑नो॒धियो॒विव्र॒तानि॒जना᳚नाम्| तक्षा᳚रि॒ष्टंरु॒तंभि॒षग्ब्र॒ह्मासु॒न्वन्त॑मिच्छ॒तीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 1||वर्ग:25 |
| जर॑तीभि॒रोष॑धीभिःप॒र्णेभिः॑शकु॒नाना᳚म्| का॒र्मा॒रो,अश्म॑भि॒र्द्युभि॒र्हिर᳚ण्यवन्तमिच्छ॒तीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 2|| |
| का॒रुर॒हंत॒तोभि॒षगु॑पलप्र॒क्षिणी᳚न॒ना| नाना᳚धियोवसू॒यवोऽनु॒गा,इ॑वतस्थि॒मेन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 3|| |
| अश्वो॒वोळ्हा᳚सु॒खंरथं᳚हस॒नामु॑पम॒न्त्रिणः॑| शेपो॒रोम᳚ण्वन्तौभे॒दौवारिन्म॒ण्डूक॑इच्छ॒तीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 4|| |
| [70] शर्यणावतीत्येकादशर्चस्य सूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमः पंक्तिः |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:113}{अनुवाक:7, सूक्त:10} |
| श॒र्य॒णाव॑ति॒सोम॒मिन्द्रः॑पिबतुवृत्र॒हा| बलं॒दधा᳚नआ॒त्मनि॑करि॒ष्यन्वी॒र्यं᳚म॒हदिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 1||वर्ग:26 |
| आप॑वस्वदिशांपतआर्जी॒कात्सो᳚ममीढ्वः| ऋ॒त॒वा॒केन॑स॒त्येन॑श्र॒द्धया॒तप॑सासु॒तइन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 2|| |
| प॒र्जन्य॑वृद्धंमहि॒षंतंसूर्य॑स्यदुहि॒ताभ॑रत्| तंग᳚न्ध॒र्वाःप्रत्य॑गृभ्ण॒न्तंसोमे॒रस॒माद॑धु॒रिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 3|| |
| ऋ॒तंवद᳚न्नृतद्युम्नस॒त्यंवद᳚न्त्सत्यकर्मन्| श्र॒द्धांवद᳚न्त्सोमराजन्धा॒त्रासो᳚म॒परि॑ष्कृत॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 4|| |
| स॒त्यमु॑ग्रस्यबृह॒तःसंस्र॑वन्तिसंस्र॒वाः| संय᳚न्तिर॒सिनो॒रसाः᳚पुना॒नोब्रह्म॑णाहर॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 5|| |
| यत्र॑ब्र॒ह्माप॑वमानछन्द॒स्या॒३॑(आं॒)वाचं॒वद॑न्| ग्राव्णा॒सोमे᳚मही॒यते॒सोमे᳚नान॒न्दंज॒नय॒न्निन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 6||वर्ग:27 |
| यत्र॒ज्योति॒रज॑स्रं॒यस्मिँ᳚ल्लो॒केस्व᳚र्हि॒तम्| तस्मि॒न्मांधे᳚हिपवमाना॒मृते᳚लो॒के,अक्षि॑त॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 7|| |
| यत्र॒राजा᳚वैवस्व॒तोयत्रा᳚व॒रोध॑नंदि॒वः| यत्रा॒मूर्य॒ह्वती॒राप॒स्तत्र॒माम॒मृतं᳚कृ॒धीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 8|| |
| यत्रा᳚नुका॒मंचर॑णंत्रिना॒केत्रि॑दि॒वेदि॒वः| लो॒कायत्र॒ज्योति॑ष्मन्त॒स्तत्र॒माम॒मृतं᳚कृ॒धीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 9|| |
| यत्र॒कामा᳚निका॒माश्च॒यत्र॑ब्र॒ध्नस्य॑वि॒ष्टप᳚म्| स्व॒धाच॒यत्र॒तृप्ति॑श्च॒तत्र॒माम॒मृतं᳚कृ॒धीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 10|| |
| यत्रा᳚न॒न्दाश्च॒मोदा᳚श्च॒मुदः॑प्र॒मुद॒आस॑ते| काम॑स्य॒यत्रा॒प्ताःकामा॒स्तत्र॒माम॒मृतं᳚कृ॒धीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 11|| |
| [71] यइंदोरिति चतुरृचस्य सूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमःपंक्तिः |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:9, सूक्त:114}{अनुवाक:7, सूक्त:11} |
| यइन्दोः॒पव॑मान॒स्यानु॒धामा॒न्यक्र॑मीत्| तमा᳚हुःसुप्र॒जा,इति॒यस्ते᳚सो॒मावि॑ध॒न्मन॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 1||वर्ग:28 |
| ऋषे᳚मन्त्र॒कृतां॒स्तोमैः॒कश्य॑पोद्व॒र्धय॒न्गिरः॑| सोमं᳚नमस्य॒राजा᳚नं॒योज॒ज्ञेवी॒रुधां॒पति॒रिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 2|| |
| स॒प्तदिशो॒नाना᳚सूर्याःस॒प्तहोता᳚रऋ॒त्विजः॑| दे॒वा,आ᳚दि॒त्यायेस॒प्ततेभिः॑सोमा॒भिर॑क्षन॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 3|| |
| यत्ते᳚राजञ्छृ॒तंह॒विस्तेन॑सोमा॒भिर॑क्षनः| अ॒रा॒ती॒वामान॑स्तारी॒न्मोच॑नः॒किंच॒नाम॑म॒दिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 4|| |
| [72] अग्नेबृहन्निति सप्तर्चस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितोग्निस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:10, सूक्त:1}{अनुवाक:1, सूक्त:1} |
| अग्रे᳚बृ॒हन्नु॒षसा᳚मू॒र्ध्वो,अ॑स्थान्निर्जग॒न्वान्तम॑सो॒ज्योति॒षागा᳚त्| अ॒ग्निर्भा॒नुना॒रुश॑ता॒स्वङ्ग॒आजा॒तोविश्वा॒सद्मा᳚न्यप्राः|| 1||वर्ग:29 |
| सजा॒तोगर्भो᳚असि॒रोद॑स्यो॒रग्ने॒चारु॒र्विभृ॑त॒ओष॑धीषु| चि॒त्रःशिशुः॒परि॒तमां᳚स्य॒क्तून्प्रमा॒तृभ्यो॒,अधि॒कनि॑क्रदद्गाः|| 2|| |
| विष्णु॑रि॒त्थाप॑र॒मम॑स्यवि॒द्वाञ्जा॒तोबृ॒हन्न॒भिपा᳚तितृ॒तीय᳚म्| आ॒सायद॑स्य॒पयो॒,अक्र॑त॒स्वंसचे᳚तसो,अ॒भ्य॑र्च॒न्त्यत्र॑|| 3|| |
| अत॑उत्वापितु॒भृतो॒जनि॑त्रीरन्ना॒वृधं॒प्रति॑चर॒न्त्यन्नैः᳚| ता,ईं॒प्रत्ये᳚षि॒पुन॑र॒न्यरू᳚पा॒,असि॒त्वंवि॒क्षुमानु॑षीषु॒होता᳚|| 4|| |
| होता᳚रंचि॒त्रर॑थमध्व॒रस्य॑य॒ज्ञस्य॑यज्ञस्यके॒तुंरुश᳚न्तम्| प्रत्य॑र्धिंदे॒वस्य॑देवस्यम॒ह्नाश्रि॒यात्व१॑(अ॒)ग्निमति॑थिं॒जना᳚नाम्|| 5|| |
| सतुवस्त्रा॒ण्यध॒पेश॑नानि॒वसा᳚नो,अ॒ग्निर्नाभा᳚पृथि॒व्याः| अ॒रु॒षोजा॒तःप॒दइळा᳚याःपु॒रोहि॑तोराजन्यक्षी॒हदे॒वान्|| 6|| |
| आहिद्यावा᳚पृथि॒वी,अ॑ग्नउ॒भेसदा᳚पु॒त्रोनमा॒तरा᳚त॒तन्थ॑| प्रया॒ह्यच्छो᳚श॒तोय॑वि॒ष्ठाथाव॑हसहस्ये॒हदे॒वान्|| 7|| |
| [73] पिप्रीहीति सप्तर्चस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितोग्निस्त्रिष्टुप् | (१ नात्रस्वाहाकारः किंतुमंत्रांत एव हविः प्रक्षेपः)|{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:10, सूक्त:2}{अनुवाक:1, सूक्त:2} |
| पि॒प्री॒हिदे॒वाँ,उ॑श॒तोय॑विष्ठवि॒द्वाँऋ॒तूँरृ॑तुपतेयजे॒ह| येदैव्या᳚ऋ॒त्विज॒स्तेभि॑रग्ने॒त्वंहोतॄ᳚णाम॒स्याय॑जिष्ठः|| 1||वर्ग:30 |
| वेषि॑हो॒त्रमु॒तपो॒त्रंजना᳚नांमन्धा॒तासि॑द्रविणो॒दा,ऋ॒तावा᳚| स्वाहा᳚व॒यंकृ॒णवा᳚माह॒वींषि॑दे॒वोदे॒वान्य॑जत्व॒ग्निरर्ह॑न्|| 2|| |
| आदे॒वाना॒मपि॒पन्था᳚मगन्म॒यच्छ॒क्नवा᳚म॒तदनु॒प्रवो᳚ळ्हुम्| अ॒ग्निर्वि॒द्वान्त्सय॑जा॒त्सेदु॒होता॒सो,अ॑ध्व॒रान्त्सऋ॒तून्क᳚ल्पयाति|| 3|| |
| यद्वो᳚व॒यंप्र॑मि॒नाम᳚व्र॒तानि॑वि॒दुषां᳚देवा॒,अवि॑दुष्टरासः| अ॒ग्निष्टद्विश्व॒मापृ॑णातिवि॒द्वान्येभि॑र्दे॒वाँऋ॒तुभिः॑क॒ल्पया᳚ति|| 4|| |
| यत्पा᳚क॒त्रामन॑सादी॒नद॑क्षा॒नय॒ज्ञस्य॑मन्व॒तेमर्त्या᳚सः| अ॒ग्निष्टद्धोता᳚क्रतु॒विद्वि॑जा॒नन्यजि॑ष्ठोदे॒वाँऋ॑तु॒शोय॑जाति|| 5|| |
| विश्वे᳚षां॒ह्य॑ध्व॒राणा॒मनी᳚कंचि॒त्रंके॒तुंजनि॑तात्वाज॒जान॑| सआय॑जस्वनृ॒वती॒रनु॒क्षाःस्पा॒र्हा,इषः॑,क्षु॒मती᳚र्वि॒श्वज᳚न्याः|| 6|| |
| यंत्वा॒द्यावा᳚पृथि॒वीयंत्वाप॒स्त्वष्टा॒यंत्वा᳚सु॒जनि॑माज॒जान॑| पन्था॒मनु॑प्रवि॒द्वान्पि॑तृ॒याणं᳚द्यु॒मद॑ग्नेसमिधा॒नोविभा᳚हि|| 7|| |
| [74] इनोराजन्निति सप्तर्चस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितोग्निस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:10, सूक्त:3}{अनुवाक:1, सूक्त:3} |
| इ॒नोरा᳚जन्नर॒तिःसमि॑द्धो॒रौद्रो॒दक्षा᳚यसुषु॒माँ,अ॑दर्शि| चि॒किद्विभा᳚तिभा॒साबृ॑ह॒तासि॑क्नीमेति॒रुश॑तीम॒पाज॑न्|| 1||वर्ग:31 |
| कृ॒ष्णांयदेनी᳚म॒भिवर्प॑सा॒भूज्ज॒नय॒न्योषां᳚बृह॒तःपि॒तुर्जाम्| ऊ॒र्ध्वंभा॒नुंसूर्य॑स्यस्तभा॒यन्दि॒वोवसु॑भिरर॒तिर्विभा᳚ति|| 2|| |
| भ॒द्रोभ॒द्रया॒सच॑मान॒आगा॒त्स्वसा᳚रंजा॒रो,अ॒भ्ये᳚तिप॒श्चात्| सु॒प्र॒के॒तैर्द्युभि॑र॒ग्निर्वि॒तिष्ठ॒न्रुश॑द्भि॒र्वर्णै᳚र॒भिरा॒मम॑स्थात्|| 3|| |
| अ॒स्ययामा᳚सोबृह॒तोनव॒ग्नूनिन्धा᳚ना,अ॒ग्नेःसख्युः॑शि॒वस्य॑| ईड्य॑स्य॒वृष्णो᳚बृह॒तःस्वासो॒भामा᳚सो॒याम᳚न्न॒क्तव॑श्चिकित्रे|| 4|| |
| स्व॒नानयस्य॒भामा᳚सः॒पव᳚न्ते॒रोच॑मानस्यबृह॒तःसु॒दिवः॑| ज्येष्ठे᳚भि॒र्यस्तेजि॑ष्ठैःक्रीळु॒मद्भि॒र्वर्षि॑ष्ठेभिर्भा॒नुभि॒र्नक्ष॑ति॒द्याम्|| 5|| |
| अ॒स्यशुष्मा᳚सोददृशा॒नप॑वे॒र्जेह॑मानस्यस्वनयन्नि॒युद्भिः॑| प्र॒त्नेभि॒र्योरुश॑द्भिर्दे॒वत॑मो॒विरेभ॑द्भिरर॒तिर्भाति॒विभ्वा᳚|| 6|| |
| सआव॑क्षि॒महि॑न॒आच॑सत्सिदि॒वस्पृ॑थि॒व्योर॑र॒तिर्यु॑व॒त्योः| अ॒ग्निःसु॒तुकः॑सु॒तुके᳚भि॒रश्वै॒रभ॑स्वद्भी॒रभ॑स्वाँ॒,एहग᳚म्याः|| 7|| |
| [75] प्रतइति सप्तर्चस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितोग्निस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:10, सूक्त:4}{अनुवाक:1, सूक्त:4} |
| प्रते᳚यक्षि॒प्रत॑इयर्मि॒मन्म॒भुवो॒यथा॒वन्द्यो᳚नो॒हवे᳚षु| धन्व᳚न्निवप्र॒पा,अ॑सि॒त्वम॑ग्नइय॒क्षवे᳚पू॒रवे᳚प्रत्नराजन्|| 1||वर्ग:32 |
| यंत्वा॒जना᳚सो,अ॒भिसं॒चर᳚न्ति॒गाव॑उ॒ष्णमि॑वव्र॒जंय॑विष्ठ| दू॒तोदे॒वाना᳚मसि॒मर्त्या᳚नाम॒न्तर्म॒हाँश्च॑रसिरोच॒नेन॑|| 2|| |
| शिशुं॒नत्वा॒जेन्यं᳚व॒र्धय᳚न्तीमा॒ताबि॑भर्तिसचन॒स्यमा᳚ना| धनो॒रधि॑प्र॒वता᳚यासि॒हर्य॒ञ्जिगी᳚षसेप॒शुरि॒वाव॑सृष्टः|| 3|| |
| मू॒रा,अ॑मूर॒नव॒यंचि॑कित्वोमहि॒त्वम॑ग्ने॒त्वम॒ङ्गवि॑त्से| शये᳚व॒व्रिश्चर॑तिजि॒ह्वया॒दन्रे᳚रि॒ह्यते᳚युव॒तिंवि॒श्पतिः॒सन्|| 4|| |
| कूचि॑ज्जायते॒सन॑यासु॒नव्यो॒वने᳚तस्थौपलि॒तोधू॒मके᳚तुः| अ॒स्ना॒तापो᳚वृष॒भोनप्रवे᳚ति॒सचे᳚तसो॒यंप्र॒णय᳚न्त॒मर्ताः᳚|| 5|| |
| त॒नू॒त्यजे᳚व॒तस्क॑रावन॒र्गूर॑श॒नाभि॑र्द॒शभि॑र॒भ्य॑धीताम्| इ॒यंते᳚अग्ने॒नव्य॑सीमनी॒षायु॒क्ष्वारथं॒नशु॒चय॑द्भि॒रङ्गैः᳚|| 6|| |
| ब्रह्म॑चतेजातवेदो॒नम॑श्चे॒यंच॒गीःसद॒मिद्वर्ध॑नीभूत्| रक्षा᳚णो,अग्ने॒तन॑यानितो॒कारक्षो॒तन॑स्त॒न्वो॒३॑(ओ॒)अप्र॑युच्छन्|| 7|| |
| [76] एकःसमुद्रइति सप्तर्चस्य सूक्तस्यात्यस्त्रितोग्नित्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:5}{मंडल:10, सूक्त:5}{अनुवाक:1, सूक्त:5} |
| एकः॑समु॒द्रोध॒रुणो᳚रयी॒णाम॒स्मद्धृ॒दोभूरि॑जन्मा॒विच॑ष्टे| सिष॒क्त्यूध᳚र्नि॒ण्योरु॒पस्थ॒उत्स॑स्य॒मध्ये॒निहि॑तंप॒दंवेः|| 1||वर्ग:33 |
| स॒मा॒नंनी॒ळंवृष॑णो॒वसा᳚नाः॒संज॑ग्मिरेमहि॒षा,अर्व॑तीभिः| ऋ॒तस्य॑प॒दंक॒वयो॒निपा᳚न्ति॒गुहा॒नामा᳚निदधिरे॒परा᳚णि|| 2|| |
| ऋ॒ता॒यिनी᳚मा॒यिनी॒संद॑धातेमि॒त्वाशिशुं᳚जज्ञतुर्व॒र्धय᳚न्ती| विश्व॑स्य॒नाभिं॒चर॑तोध्रु॒वस्य॑क॒वेश्चि॒त्तन्तुं॒मन॑सावि॒यन्तः॑|| 3|| |
| ऋ॒तस्य॒हिव॑र्त॒नयः॒सुजा᳚त॒मिषो॒वाजा᳚यप्र॒दिवः॒सच᳚न्ते| अ॒धी॒वा॒संरोद॑सीवावसा॒नेघृ॒तैरन्नै᳚र्वावृधाते॒मधू᳚नाम्|| 4|| |
| स॒प्तस्वसॄ॒ररु॑षीर्वावशा॒नोवि॒द्वान्मध्व॒उज्ज॑भारादृ॒शेकम्| अ॒न्तर्ये᳚मे,अ॒न्तरि॑क्षेपुरा॒जा,इ॒च्छन्व॒व्रिम॑विदत्पूष॒णस्य॑|| 5|| |
| स॒प्तम॒र्यादाः᳚क॒वय॑स्ततक्षु॒स्तासा॒मेका॒मिद॒भ्यं᳚हु॒रोगा᳚त्| आ॒योर्ह॑स्क॒म्भउ॑प॒मस्य॑नी॒ळेप॒थांवि॑स॒र्गेध॒रुणे᳚षुतस्थौ|| 6|| |
| अस॑च्च॒सच्च॑पर॒मेव्यो᳚म॒न्दक्ष॑स्य॒जन्म॒न्नदि॑तेरु॒पस्थे᳚| अ॒ग्निर्ह॑नःप्रथम॒जा,ऋ॒तस्य॒पूर्व॒आयु॑निवृष॒भश्च॑धे॒नुः|| 7|| |
| [77] अयंसइति सप्तर्चस्य सूक्तस्यात्यस्त्रितोग्नित्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:6}{अनुवाक:1, सूक्त:6} |
| अ॒यंसयस्य॒शर्म॒न्नवो᳚भिर॒ग्नेरेध॑तेजरि॒ताभिष्टौ᳚| ज्येष्ठे᳚भि॒र्योभा॒नुभि᳚रृषू॒णांप॒र्येति॒परि॑वीतोवि॒भावा᳚|| 1||वर्ग:1 |
| योभा॒नुभि᳚र्वि॒भावा᳚वि॒भात्य॒ग्निर्दे॒वेभि᳚रृ॒तावाज॑स्रः| आयोवि॒वाय॑स॒ख्यासखि॒भ्योऽप॑रिह्वृतो॒,अत्यो॒नसप्तिः॑|| 2|| |
| ईशे॒योविश्व॑स्यादे॒ववी᳚ते॒रीशे᳚वि॒श्वायु॑रु॒षसो॒व्यु॑ष्टौ| आयस्मि᳚न्म॒नाह॒वींष्य॒ग्नावरि॑ष्टरथःस्क॒भ्नाति॑शू॒षैः|| 3|| |
| शू॒षेभि᳚र्वृ॒धोजु॑षा॒णो,अ॒र्कैर्दे॒वाँ,अच्छा᳚रघु॒पत्वा᳚जिगाति| म॒न्द्रोहोता॒सजु॒ह्वा॒३॑(आ॒)यजि॑ष्ठः॒सम्मि॑श्लो,अ॒ग्निराजि॑घर्तिदे॒वान्|| 4|| |
| तमु॒स्रामिन्द्रं॒नरेज॑मानम॒ग्निंगी॒र्भिर्नमो᳚भि॒राकृ॑णुध्वम्| आयंविप्रा᳚सोम॒तिभि॑र्गृ॒णन्ति॑जा॒तवे᳚दसंजु॒ह्वं᳚स॒हाना᳚म्|| 5|| |
| संयस्मि॒न्विश्वा॒वसू᳚निज॒ग्मुर्वाजे॒नाश्वाः॒सप्ती᳚वन्त॒एवैः᳚| अ॒स्मे,ऊ॒तीरिन्द्र॑वाततमा,अर्वाची॒ना,अ॑ग्न॒आकृ॑णुष्व|| 6|| |
| अधा॒ह्य॑ग्नेम॒ह्नानि॒षद्या᳚स॒द्योज॑ज्ञा॒नोहव्यो᳚ब॒भूथ॑| तंते᳚दे॒वासो॒,अनु॒केत॑माय॒न्नधा᳚वर्धन्तप्रथ॒मास॒ऊमाः᳚|| 7|| |
| [78] स्वस्तिनइति सप्तर्चस्य सूक्तस्यात्यस्त्रितोग्नित्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:7}{अनुवाक:1, सूक्त:7} |
| स्व॒स्तिनो᳚दि॒वो,अ॑ग्नेपृथि॒व्यावि॒श्वायु॑र्धेहिय॒जथा᳚यदेव| सचे᳚महि॒तव॑दस्मप्रके॒तैरु॑रु॒ष्याण॑उ॒रुभि॑र्देव॒शंसैः᳚|| 1||वर्ग:2 |
| इ॒मा,अ॑ग्नेम॒तय॒स्तुभ्यं᳚जा॒तागोभि॒रश्वै᳚र॒भिगृ॑णन्ति॒राधः॑| य॒दाते॒मर्तो॒,अनु॒भोग॒मान॒ड्वसो॒दधा᳚नोम॒तिभिः॑सुजात|| 2|| |
| अ॒ग्निंम᳚न्येपि॒तर॑म॒ग्निमा॒पिम॒ग्निंभ्रात॑रं॒सद॒मित्सखा᳚यम्| अ॒ग्नेरनी᳚कंबृह॒तःस॑पर्यंदि॒विशु॒क्रंय॑ज॒तंसूर्य॑स्य|| 3|| |
| सि॒ध्रा,अ॑ग्ने॒धियो᳚अ॒स्मेसनु॑त्री॒र्यंत्राय॑से॒दम॒आनित्य॑होता| ऋ॒तावा॒सरो॒हिद॑श्वःपुरु॒क्षुर्द्युभि॑रस्मा॒,अह॑भिर्वा॒मम॑स्तु|| 4|| |
| द्युभि᳚र्हि॒तंमि॒त्रमि॑वप्र॒योगं᳚प्र॒त्नमृ॒त्विज॑मध्व॒रस्य॑जा॒रम्| बा॒हुभ्या᳚म॒ग्निमा॒यवो᳚ऽजनन्तवि॒क्षुहोता᳚रं॒न्य॑सादयन्त|| 5|| |
| स्व॒यंय॑जस्वदि॒विदे᳚वदे॒वान्किंते॒पाकः॑कृणव॒दप्र॑चेताः| यथाय॑जऋ॒तुभि॑र्देवदे॒वाने॒वाय॑जस्वत॒न्वं᳚सुजात|| 6|| |
| भवा᳚नो,अग्नेऽवि॒तोतगो॒पाभवा᳚वय॒स्कृदु॒तनो᳚वयो॒धाः| रास्वा᳚चनःसुमहोह॒व्यदा᳚तिं॒त्रास्वो॒तन॑स्त॒न्वो॒३॑(ओ॒)अप्र॑युच्छन्|| 7|| |
| [79] प्रकेतुनेति नवर्चस्य सूक्तस्यत्वाष्ट्रस्त्रिशिराअग्निः अंत्यतृचस्येंद्रस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:8}{अनुवाक:1, सूक्त:8} |
| प्रके॒तुना᳚बृह॒ताया᳚त्य॒ग्निरारोद॑सीवृष॒भोरो᳚रवीति| दि॒वश्चि॒दन्ताँ᳚,उप॒माँ,उदा᳚नळ॒पामु॒पस्थे᳚महि॒षोव॑वर्ध|| 1||वर्ग:3 |
| मु॒मोद॒गर्भो᳚वृष॒भःक॒कुद्मा᳚नस्रे॒माव॒त्सःशिमी᳚वाँ,अरावीत्| सदे॒वता॒त्युद्य॑तानिकृ॒ण्वन्त्स्वेषु॒क्षये᳚षुप्रथ॒मोजि॑गाति|| 2|| |
| आयोमू॒र्धानं᳚पि॒त्रोरर॑ब्ध॒न्य॑ध्व॒रेद॑धिरे॒सूरो॒,अर्णः॑| अस्य॒पत्म॒न्नरु॑षी॒रश्व॑बुध्ना,ऋ॒तस्य॒योनौ᳚त॒न्वो᳚जुषन्त|| 3|| |
| उ॒षौ᳚षो॒हिव॑सो॒,अग्र॒मेषि॒त्वंय॒मयो᳚रभवोवि॒भावा᳚| ऋ॒ताय॑स॒प्तद॑धिषेप॒दानि॑ज॒नय᳚न्मि॒त्रंत॒न्वे॒३॑(ए॒)स्वायै᳚|| 4|| |
| भुव॒श्चक्षु᳚र्म॒हऋ॒तस्य॑गो॒पाभुवो॒वरु॑णो॒यदृ॒ताय॒वेषि॑| भुवो᳚अ॒पांनपा᳚ज्जातवेदो॒भुवो᳚दू॒तोयस्य॑ह॒व्यंजुजो᳚षः|| 5|| |
| भुवो᳚य॒ज्ञस्य॒रज॑सश्चने॒तायत्रा᳚नि॒युद्भिः॒सच॑सेशि॒वाभिः॑| दि॒विमू॒र्धानं᳚दधिषेस्व॒र्षांजि॒ह्वाम॑ग्नेचकृषेहव्य॒वाह᳚म्|| 6||वर्ग:4 |
| अ॒स्यत्रि॒तःक्रतु॑नाव॒व्रे,अ॒न्तरि॒च्छन्धी॒तिंपि॒तुरेवैः॒पर॑स्य| स॒च॒स्यमा᳚नःपि॒त्रोरु॒पस्थे᳚जा॒मिब्रु॑वा॒णआयु॑धानिवेति|| 7|| |
| सपित्र्या॒ण्यायु॑धानिवि॒द्वानिन्द्रे᳚षितआ॒प्त्यो,अ॒भ्य॑युध्यत्| त्रि॒शी॒र्षाणं᳚स॒प्तर॑श्मिंजघ॒न्वान्त्वा॒ष्ट्रस्य॑चि॒न्निःस॑सृजेत्रि॒तोगाः|| 8|| |
| भूरीदिन्द्र॑उ॒दिन॑क्षन्त॒मोजोऽवा᳚भिन॒त्सत्प॑ति॒र्मन्य॑मानम्| त्वा॒ष्ट्रस्य॑चिद्वि॒श्वरू᳚पस्य॒गोना᳚माचक्रा॒णस्त्रीणि॑शी॒र्षापरा᳚वर्क्|| 9|| |
| [80] आपोहिष्ठेति नवर्चस्य सूक्तस्य आंबरीषः सिंधुद्वीप आपो गायत्री पंचमीवर्धमाना सप्तमीप्रतिष्ठांत्येद्वेअनुष्टुभौ | आपोहिसिंधुद्वीपोवांबरीष इत्येवमनुक्रमण्यां सिंधुद्वीपस्य पाक्षिकत्व स्वीकारे पूर्वोक्तस्त्रिशिराः प्राप्नोतितथापि प्रयोक्तृभिः सिंधुद्वीप एवाद्रियते |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:9}{अनुवाक:1, सूक्त:9} |
| आपो॒हिष्ठाम॑यो॒भुव॒¦स्तान॑ऊ॒र्जेद॑धातन|म॒हेरणा᳚य॒चक्ष॑से|| 1||वर्ग:5 |
| योवः॑शि॒वत॑मो॒रस॒¦स्तस्य॑भाजयते॒हनः॑|उ॒श॒तीरि॑वमा॒तरः॑|| 2|| |
| तस्मा॒,अरं᳚गमामवो॒¦यस्य॒क्षया᳚य॒जिन्व॑थ|आपो᳚ज॒नय॑थाचनः|| 3|| |
| शंनो᳚दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒¦आपो᳚भवन्तुपी॒तये᳚|शंयोर॒भिस्र॑वन्तुनः|| 4|| |
| ईशा᳚ना॒वार्या᳚णां॒¦क्षय᳚न्तीश्चर्षणी॒नाम्|अ॒पोया᳚चामिभेष॒जम्|| 5|| |
| अ॒प्सुमे॒सोमो᳚अब्रवी¦द॒न्तर्विश्वा᳚निभेष॒जा|अ॒ग्निंच॑वि॒श्वश᳚म्भुवम्|| 6|| |
| आपः॑पृणी॒तभे᳚ष॒जं¦वरू᳚थंत॒न्वे॒३॑(ए॒)मम॑|ज्योक्च॒सूर्यं᳚दृ॒शे|| 7|| |
| इ॒दमा᳚पः॒प्रव॑हत॒¦यत्किंच॑दुरि॒तंमयि॑|यद्वा॒हम॑भिदु॒द्रोह॒¦यद्वा᳚शे॒पउ॒तानृ॑तम्|| 8|| |
| आपो᳚अ॒द्यान्व॑चारिषं॒¦रसे᳚न॒सम॑गस्महि|पय॑स्वानग्न॒आग॑हि॒¦तंमा॒संसृ॑ज॒वर्च॑सा|| 9|| |
| [81] ओचिदिति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य नवमी वर्ज्यानामयुजां षष्ठ्याश्च वैवस्वतीयमी ऋषिका यमोदेवता षष्ठीवर्ज्यानांयुजां नवम्याश्च वैवस्वतोयमीत्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:10}{अनुवाक:1, सूक्त:10} |
| ओचि॒त्सखा᳚यंस॒ख्याव॑वृत्यांति॒रःपु॒रूचि॑दर्ण॒वंज॑ग॒न्वान्| पि॒तुर्नपा᳚त॒माद॑धीतवे॒धा,अधि॒क्षमि॑प्रत॒रंदीध्या᳚नः|| 1||वर्ग:6 |
| नते॒सखा᳚स॒ख्यंव॑ष्ट्ये॒तत्सल॑क्ष्मा॒यद्विषु॑रूपा॒भवा᳚ति| म॒हस्पु॒त्रासो॒,असु॑रस्यवी॒रादि॒वोध॒र्तार॑उर्वि॒यापरि॑ख्यन्|| 2|| |
| उ॒शन्ति॑घा॒ते,अ॒मृता᳚सए॒तदेक॑स्यचित्त्य॒जसं॒मर्त्य॑स्य| निते॒मनो॒मन॑सिधाय्य॒स्मेजन्युः॒पति॑स्त॒न्व१॑(अ॒)मावि॑विश्याः|| 3|| |
| नयत्पु॒राच॑कृ॒माकद्ध॑नू॒नमृ॒तावद᳚न्तो॒,अनृ॑तंरपेम| ग॒न्ध॒र्वो,अ॒प्स्वप्या᳚च॒योषा॒सानो॒नाभिः॑पर॒मंजा॒मितन्नौ᳚|| 4|| |
| गर्भे॒नुनौ᳚जनि॒तादम्प॑तीकर्दे॒वस्त्वष्टा᳚सवि॒तावि॒श्वरू᳚पः| नकि॑रस्य॒प्रमि॑नन्तिव्र॒तानि॒वेद॑नाव॒स्यपृ॑थि॒वी,उ॒तद्यौः|| 5|| |
| को,अ॒स्यवे᳚दप्रथ॒मस्याह्नः॒कईं᳚ददर्श॒कइ॒हप्रवो᳚चत्| बृ॒हन्मि॒त्रस्य॒वरु॑णस्य॒धाम॒कदु॑ब्रवआहनो॒वीच्या॒नॄन्|| 6||वर्ग:7 |
| य॒मस्य॑माय॒म्य१॑(अं॒)काम॒आग᳚न्त्समा॒नेयोनौ᳚सह॒शेय्या᳚य| जा॒येव॒पत्ये᳚त॒न्वं᳚रिरिच्यां॒विचि॑द्वृहेव॒रथ्ये᳚वच॒क्रा|| 7|| |
| नति॑ष्ठन्ति॒ननिमि॑षन्त्ये॒तेदे॒वानां॒स्पश॑इ॒हयेचर᳚न्ति| अ॒न्येन॒मदा᳚हनोयाहि॒तूयं॒तेन॒विवृ॑ह॒रथ्ये᳚वच॒क्रा|| 8|| |
| रात्री᳚भिरस्मा॒,अह॑भिर्दशस्ये॒त्सूर्य॑स्य॒चक्षु॒र्मुहु॒रुन्मि॑मीयात्| दि॒वापृ॑थि॒व्यामि॑थु॒नासब᳚न्धूय॒मीर्य॒मस्य॑बिभृया॒दजा᳚मि|| 9|| |
| आघा॒ताग॑च्छा॒नुत्त॑रायु॒गानि॒यत्र॑जा॒मयः॑कृ॒णव॒न्नजा᳚मि| उप॑बर्बृहिवृष॒भाय॑बा॒हुम॒न्यमि॑च्छस्वसुभगे॒पतिं॒मत्|| 10|| |
| किंभ्राता᳚स॒द्यद॑ना॒थंभवा᳚ति॒किमु॒स्वसा॒यन्निरृ॑तिर्नि॒गच्छा᳚त्| काम॑मूताब॒ह्वे॒३॑(ए॒)तद्र॑पामित॒न्वा᳚मेत॒न्व१॑(अं॒)संपि॑पृग्धि|| 11||वर्ग:8 |
| नवा,उ॑तेत॒न्वा᳚त॒न्व१॑(अं॒)संप॑पृच्यांपा॒पमा᳚हु॒र्यःस्वसा᳚रंनि॒गच्छा᳚त्| अ॒न्येन॒मत्प्र॒मुदः॑कल्पयस्व॒नते॒भ्राता᳚सुभगेवष्ट्ये॒तत्|| 12|| |
| ब॒तोब॑तासियम॒नैवते॒मनो॒हृद॑यंचाविदाम| अ॒न्याकिल॒त्वांक॒क्ष्ये᳚वयु॒क्तंपरि॑ष्वजाते॒लिबु॑जेववृ॒क्षम्|| 13|| |
| अ॒न्यमू॒षुत्वंय᳚म्य॒न्यउ॒त्वांपरि॑ष्वजाते॒लिबु॑जेववृ॒क्षम्| तस्य॑वा॒त्वंमन॑इ॒च्छासवा॒तवाधा᳚कृणुष्वसं॒विदं॒सुभ॑द्राम्|| 14|| |
| [82] वृषावृष्ण इति नवर्चस्य सूक्तस्यांगिर्हविर्धानोऽग्निर्जगती अंत्यास्तिस्रत्रिष्टुभः |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:11}{अनुवाक:1, सूक्त:11} |
| वृषा॒वृष्णे᳚दुदुहे॒दोह॑सादि॒वःपयां᳚सिय॒ह्वो,अदि॑ते॒रदा᳚भ्यः| विश्वं॒सवे᳚द॒वरु॑णो॒यथा᳚धि॒यासय॒ज्ञियो᳚यजतुय॒ज्ञियाँ᳚ऋ॒तून्|| 1||वर्ग:9 |
| रप॑द्गन्ध॒र्वीरप्या᳚च॒योष॑णान॒दस्य॑ना॒देपरि॑पातुमे॒मनः॑| इ॒ष्टस्य॒मध्ये॒,अदि॑ति॒र्निधा᳚तुनो॒भ्राता᳚नोज्ये॒ष्ठःप्र॑थ॒मोविवो᳚चति|| 2|| |
| सोचि॒न्नुभ॒द्राक्षु॒मती॒यश॑स्वत्यु॒षा,उ॑वास॒मन॑वे॒स्व᳚र्वती| यदी᳚मु॒शन्त॑मुश॒तामनु॒क्रतु॑म॒ग्निंहोता᳚रंवि॒दथा᳚य॒जीज॑नन्|| 3|| |
| अध॒त्यंद्र॒प्संवि॒भ्वं᳚विचक्ष॒णंविराभ॑रदिषि॒तःश्ये॒नो,अ॑ध्व॒रे| यदी॒विशो᳚वृ॒णते᳚द॒स्ममार्या᳚अ॒ग्निंहोता᳚र॒मध॒धीर॑जायत|| 4|| |
| सदा᳚सिर॒ण्वोयव॑सेव॒पुष्य॑ते॒होत्रा᳚भिरग्ने॒मनु॑षःस्वध्व॒रः| विप्र॑स्यवा॒यच्छ॑शमा॒नउ॒क्थ्य१॑(अं॒)वाजं᳚सस॒वाँ,उ॑प॒यासि॒भूरि॑भिः|| 5|| |
| उदी᳚रयपि॒तरा᳚जा॒रआभग॒मिय॑क्षतिहर्य॒तोहृ॒त्तइ॑ष्यति| विव॑क्ति॒वह्निः॑स्वप॒स्यते᳚म॒खस्त॑वि॒ष्यते॒,असु॑रो॒वेप॑तेम॒ती|| 6||वर्ग:10 |
| यस्ते᳚अग्नेसुम॒तिंमर्तो॒,अक्ष॒त्सह॑सःसूनो॒,अति॒सप्रशृ᳚ण्वे| इषं॒दधा᳚नो॒वह॑मानो॒,अश्वै॒रासद्यु॒माँ,अम॑वान्भूषति॒द्यून्|| 7|| |
| यद॑ग्नए॒षासमि॑ति॒र्भवा᳚तिदे॒वीदे॒वेषु॑यज॒ताय॑जत्र| रत्ना᳚च॒यद्वि॒भजा᳚सिस्वधावोभा॒गंनो॒,अत्र॒वसु॑मन्तंवीतात्|| 8|| |
| श्रु॒धीनो᳚अग्ने॒सद॑नेस॒धस्थे᳚यु॒क्ष्वारथ॑म॒मृत॑स्यद्रवि॒त्नुम्| आनो᳚वह॒रोद॑सीदे॒वपु॑त्रे॒माकि॑र्दे॒वाना॒मप॑भूरि॒हस्याः᳚|| 9|| |
| [83] द्यावाहेति नवर्चस्य सूक्तस्यहविर्धानोग्निस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:12}{अनुवाक:1, सूक्त:12} |
| द्यावा᳚ह॒क्षामा᳚प्रथ॒मे,ऋ॒तेना᳚भिश्रा॒वेभ॑वतःसत्य॒वाचा᳚| दे॒वोयन्मर्ता᳚न्य॒जथा᳚यकृ॒ण्वन्त्सीद॒द्धोता᳚प्र॒त्यङ्स्वमसुं॒यन्|| 1||वर्ग:11 |
| दे॒वोदे॒वान्प॑रि॒भूरृ॒तेन॒वहा᳚नोह॒व्यंप्र॑थ॒मश्चि॑कि॒त्वान्| धू॒मके᳚तुःस॒मिधा॒भाऋ॑जीकोम॒न्द्रोहोता॒नित्यो᳚वा॒चायजी᳚यान्|| 2|| |
| स्वावृ॑ग्दे॒वस्या॒मृतं॒यदी॒गोरतो᳚जा॒तासो᳚धारयन्तउ॒र्वी| विश्वे᳚दे॒वा,अनु॒तत्ते॒यजु॑र्गुर्दु॒हेयदेनी᳚दि॒व्यंघृ॒तंवाः|| 3|| |
| अर्चा᳚मिवां॒वर्धा॒यापो᳚घृतस्नू॒द्यावा᳚भूमीशृणु॒तंरो᳚दसीमे| अहा॒यद्द्यावोऽसु॑नीति॒मय॒न्मध्वा᳚नो॒,अत्र॑पि॒तरा᳚शिशीताम्|| 4|| |
| किंस्वि᳚न्नो॒राजा᳚जगृहे॒कद॒स्याति᳚व्र॒तंच॑कृमा॒कोविवे᳚द| मि॒त्रश्चि॒द्धिष्मा᳚जुहुरा॒णोदे॒वाञ्छ्लोको॒नया॒तामपि॒वाजो॒,अस्ति॑|| 5|| |
| दु॒र्मन्त्वत्रा॒मृत॑स्य॒नाम॒सल॑क्ष्मा॒यद्विषु॑रूपा॒भवा᳚ति| य॒मस्य॒योम॒नव॑तेसु॒मन्त्वग्ने॒तमृ॑ष्वपा॒ह्यप्र॑युच्छन्|| 6||वर्ग:12 |
| यस्मि᳚न्दे॒वावि॒दथे᳚मा॒दय᳚न्तेवि॒वस्व॑तः॒सद॑नेधा॒रय᳚न्ते| सूर्ये॒ज्योति॒रद॑धुर्मा॒स्य१॑(अ॒)क्तून्परि॑द्योत॒निंच॑रतो॒,अज॑स्रा|| 7|| |
| यस्मि᳚न्दे॒वामन्म॑निसं॒चर᳚न्त्यपी॒च्ये॒३॑(ए॒)नव॒यम॑स्यविद्म| मि॒त्रोनो॒,अत्रादि॑ति॒रना᳚गान्त्सवि॒तादे॒वोवरु॑णायवोचत्|| 8|| |
| श्रु॒धीनो᳚अग्ने॒सद॑नेस॒धस्थे᳚यु॒क्ष्वारथ॑म॒मृत॑स्यद्रवि॒त्नुम्| आनो᳚वह॒रोद॑सीदे॒वपु॑त्रे॒माकि॑र्दे॒वाना॒मप॑भूरि॒हस्याः᳚|| 9|| |
| [84] युजेवामिति पंचर्चस्य सूक्तस्यादित्योविवस्वान्हविर्धानस्त्रिष्टुबंत्याजगती |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:13}{अनुवाक:1, सूक्त:13} |
| यु॒जेवां॒ब्रह्म॑पू॒र्व्यंनमो᳚भि॒र्विश्लोक॑एतुप॒थ्ये᳚वसू॒रेः| शृ॒ण्वन्तु॒विश्वे᳚अ॒मृत॑स्यपु॒त्रा,आयेधामा᳚निदि॒व्यानि॑त॒स्थुः|| 1||वर्ग:13 |
| य॒मे,इ॑व॒यत॑माने॒यदैतं॒प्रवां᳚भर॒न्मानु॑षादेव॒यन्तः॑| आसी᳚दतं॒स्वमु॑लो॒कंविदा᳚नेस्वास॒स्थेभ॑वत॒मिन्द॑वेनः|| 2|| |
| पञ्च॑प॒दानि॑रु॒पो,अन्व॑रोहं॒चतु॑ष्पदी॒मन्वे᳚मिव्र॒तेन॑| अ॒क्षरे᳚ण॒प्रति॑मिमए॒तामृ॒तस्य॒नाभा॒वधि॒संपु॑नामि|| 3|| |
| दे॒वेभ्यः॒कम॑वृणीतमृ॒त्युंप्र॒जायै॒कम॒मृतं॒नावृ॑णीत| बृह॒स्पतिं᳚य॒ज्ञम॑कृण्वत॒ऋषिं᳚प्रि॒यांय॒मस्त॒न्व१॑(अं॒)प्रारि॑रेचीत्|| 4|| |
| स॒प्तक्ष॑रन्ति॒शिश॑वेम॒रुत्व॑तेपि॒त्रेपु॒त्रासो॒,अप्य॑वीवतन्नृ॒तम्| उ॒भे,इद॑स्यो॒भय॑स्यराजतउ॒भेय॑तेते,उ॒भय॑स्यपुष्यतः|| 5|| |
| [85] परेयिवांसमिति षोळशर्चस्य सूक्तस्य वैवस्वतोयमऋषिः यमोदेवता षष्ठ्यांगिरःपित्रथर्वभृगुसोमाः दशम्यादितिसृणांश्वानौ त्रिष्टुप् त्रयोदशीचतुर्दशीषोडश्योनुष्टुभः पंचदशीबृहती ( प्रेहिप्रेहीत्यादितिसृणां पितृदेवतावैकल्पिकी ) |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:14}{अनुवाक:1, सूक्त:14} |
| प॒रे॒यि॒वांसं᳚प्र॒वतो᳚म॒हीरनु॑ब॒हुभ्यः॒पन्था᳚मनुपस्पशा॒नम्| वै॒व॒स्व॒तंसं॒गम॑नं॒जना᳚नांय॒मंराजा᳚नंह॒विषा᳚दुवस्य|| 1||वर्ग:14 |
| य॒मोनो᳚गा॒तुंप्र॑थ॒मोवि॑वेद॒नैषागव्यू᳚ति॒रप॑भर्त॒वा,उ॑| यत्रा᳚नः॒पूर्वे᳚पि॒तरः॑परे॒युरे॒नाज॑ज्ञा॒नाःप॒थ्या॒३॑(आ॒)अनु॒स्वाः|| 2|| |
| मात॑लीक॒व्यैर्य॒मो,अङ्गि॑रोभि॒र्बृह॒स्पति॒रृक्व॑भिर्वावृधा॒नः| याँश्च॑दे॒वावा᳚वृ॒धुर्येच॑दे॒वान्त्स्वाहा॒न्येस्व॒धया॒न्येम॑दन्ति|| 3|| |
| इ॒मंय॑मप्रस्त॒रमाहिसीदाङ्गि॑रोभिःपि॒तृभिः॑संविदा॒नः| आत्वा॒मन्त्राः᳚कविश॒स्ताव॑हन्त्वे॒नारा᳚जन्ह॒विषा᳚मादयस्व|| 4|| |
| अङ्गि॑रोभि॒राग॑हिय॒ज्ञिये᳚भि॒र्यम॑वैरू॒पैरि॒हमा᳚दयस्व| विव॑स्वन्तंहुवे॒यःपि॒ताते॒ऽस्मिन्य॒ज्ञेब॒र्हिष्यानि॒षद्य॑|| 5|| |
| अङ्गि॑रसोनःपि॒तरो॒नव॑ग्वा॒,अथ᳚र्वाणो॒भृग॑वःसो॒म्यासः॑| तेषां᳚व॒यंसु॑म॒तौय॒ज्ञिया᳚ना॒मपि॑भ॒द्रेसौ᳚मन॒सेस्या᳚म|| 6||वर्ग:15 |
| प्रेहि॒प्रेहि॑प॒थिभिः॑पू॒र्व्येभि॒र्यत्रा᳚नः॒पूर्वे᳚पि॒तरः॑परे॒युः| उ॒भाराजा᳚नास्व॒धया॒मद᳚न्ताय॒मंप॑श्यासि॒वरु॑णंचदे॒वम्|| 7|| |
| संग॑च्छस्वपि॒तृभिः॒संय॒मेने᳚ष्टापू॒र्तेन॑पर॒मेव्यो᳚मन्| हि॒त्वाया᳚व॒द्यंपुन॒रस्त॒मेहि॒संग॑च्छस्वत॒न्वा᳚सु॒वर्चाः᳚|| 8|| |
| अपे᳚त॒वी᳚त॒विच॑सर्प॒तातो॒ऽस्मा,ए॒तंपि॒तरो᳚लो॒कम॑क्रन्| अहो᳚भिर॒द्भिर॒क्तुभि॒र्व्य॑क्तंय॒मोद॑दात्यव॒सान॑मस्मै|| 9|| |
| अति॑द्रवसारमे॒यौश्वानौ᳚चतुर॒क्षौश॒बलौ᳚सा॒धुना᳚प॒था| अथा᳚पि॒तॄन्त्सु॑वि॒दत्राँ॒,उपे᳚हिय॒मेन॒येस॑ध॒मादं॒मद᳚न्ति|| 10|| |
| यौते॒श्वानौ᳚यमरक्षि॒तारौ᳚चतुर॒क्षौप॑थि॒रक्षी᳚नृ॒चक्ष॑सौ| ताभ्या᳚मेनं॒परि॑देहिराजन्त्स्व॒स्तिचा᳚स्मा,अनमी॒वंच॑धेहि|| 11||वर्ग:16 |
| उ॒रू॒ण॒साव॑सु॒तृपा᳚उदुम्ब॒लौय॒मस्य॑दू॒तौच॑रतो॒जनाँ॒,अनु॑| ताव॒स्मभ्यं᳚दृ॒शये॒सूर्या᳚य॒पुन॑र्दाता॒मसु॑म॒द्येहभ॒द्रम्|| 12|| |
| य॒माय॒सोमं᳚सुनुत¦य॒माय॑जुहुताह॒विः|य॒मंह॑य॒ज्ञोग॑च्छ¦त्य॒ग्निदू᳚तो॒,अरं᳚कृतः|| 13|| |
| य॒माय॑घृ॒तव॑द्ध॒विर्जु॒होत॒प्रच॑तिष्ठत|सनो᳚दे॒वेष्वाय॑मद्दी॒र्घमायुः॒प्रजी॒वसे᳚|| 14|| |
| य॒माय॒मधु॑मत्तमं॒राज्ञे᳚ह॒व्यंजु॑होतन| इ॒दंनम॒ऋषि॑भ्यःपूर्व॒जेभ्यः॒पूर्वे᳚भ्यःपथि॒कृद्भ्यः॑|| 15|| |
| त्रिक॑द्रुकेभिःपतति॒षळु॒र्वीरेक॒मिद्बृ॒हत्|त्रि॒ष्टुब्गा᳚य॒त्रीछन्दां᳚सि॒सर्वा॒ताय॒मआहि॑ता|| 16|| |
| [86] उदीरतामिति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य यामायनः शंखः पितरस्त्रिष्टुप् एकादशीजगती |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:15}{अनुवाक:1, सूक्त:15} |
| उदी᳚रता॒मव॑र॒उत्परा᳚स॒¦उन्म॑ध्य॒माःपि॒तरः॑सो॒म्यासः॑| असुं॒यई॒युर॑वृ॒का,ऋ॑त॒ज्ञा¦स्तेनो᳚ऽवन्तुपि॒तरो॒हवे᳚षु|| 1||वर्ग:17 |
| इ॒दंपि॒तृभ्यो॒नमो᳚अस्त्व॒द्ययेपूर्वा᳚सो॒यउप॑रासई॒युः| येपार्थि॑वे॒रज॒स्यानिष॑त्ता॒येवा᳚नू॒नंसु॑वृ॒जना᳚सुवि॒क्षु|| 2|| |
| आहंपि॒तॄन्त्सु॑वि॒दत्राँ᳚,अवित्सि॒नपा᳚तंचवि॒क्रम॑णंच॒विष्णोः᳚| ब॒र्हि॒षदो॒येस्व॒धया᳚सु॒तस्य॒भज᳚न्तपि॒त्वस्तइ॒हाग॑मिष्ठाः|| 3|| |
| बर्हि॑षदःपितरऊ॒त्य१॑(अ॒)र्वागि॒मावो᳚ह॒व्याच॑कृमाजु॒षध्व᳚म्| तआग॒ताव॑सा॒शंत॑मे॒नाथा᳚नः॒शंयोर॑र॒पोद॑धात|| 4|| |
| उप॑हूताःपि॒तरः॑सो॒म्यासो᳚बर्हि॒ष्ये᳚षुनि॒धिषु॑प्रि॒येषु॑| तआग॑मन्तु॒तइ॒हश्रु॑व॒न्त्वधि॑ब्रुवन्तु॒ते᳚ऽवन्त्व॒स्मान्|| 5|| |
| आच्या॒जानु॑दक्षिण॒तोनि॒षद्ये॒मंय॒ज्ञम॒भिगृ॑णीत॒विश्वे᳚| माहिं᳚सिष्टपितरः॒केन॑चिन्नो॒यद्व॒आगः॑पुरु॒षता॒करा᳚म|| 6||वर्ग:18 |
| आसी᳚नासो,अरु॒णीना᳚मु॒पस्थे᳚र॒यिंध॑त्तदा॒शुषे॒मर्त्या᳚य| पु॒त्रेभ्यः॑पितर॒स्तस्य॒वस्वः॒प्रय॑च्छत॒तइ॒होर्जं᳚दधात|| 7|| |
| येनः॒पूर्वे᳚पि॒तरः॑सो॒म्यासो᳚ऽनूहि॒रेसो᳚मपी॒थंवसि॑ष्ठाः| तेभि᳚र्य॒मःसं᳚ररा॒णोह॒वींष्यु॒शन्नु॒शद्भिः॑प्रतिका॒मम॑त्तु|| 8|| |
| येता᳚तृ॒षुर्दे᳚व॒त्राजेह॑मानाहोत्रा॒विदः॒स्तोम॑तष्टासो,अ॒र्कैः| आग्ने᳚याहिसुवि॒दत्रे᳚भिर॒र्वाङ्स॒त्यैःक॒व्यैःपि॒तृभि॑र्घर्म॒सद्भिः॑|| 9|| |
| येस॒त्यासो᳚हवि॒रदो᳚हवि॒ष्पा,इन्द्रे᳚णदे॒वैःस॒रथं॒दधा᳚नाः| आग्ने᳚याहिस॒हस्रं᳚देवव॒न्दैःपरैः॒पूर्वैः᳚पि॒तृभि॑र्घर्म॒सद्भिः॑|| 10|| |
| अग्नि॑ष्वात्ताःपितर॒एहग॑च्छत॒सदः॑सदःसदतसुप्रणीतयः| अ॒त्ताह॒वींषि॒प्रय॑तानिब॒र्हिष्यथा᳚र॒यिंसर्व॑वीरंदधातन|| 11||वर्ग:19 |
| त्वम॑ग्नईळि॒तोजा᳚तवे॒दोऽवा᳚ड्ढ॒व्यानि॑सुर॒भीणि॑कृ॒त्वी| प्रादाः᳚पि॒तृभ्यः॑स्व॒धया॒ते,अ॑क्षन्न॒द्धित्वंदे᳚व॒प्रय॑ताह॒वींषि॑|| 12|| |
| येचे॒हपि॒तरो॒येच॒नेहयाँश्च॑वि॒द्मयाँ,उ॑च॒नप्र॑वि॒द्म| त्वंवे᳚त्थ॒यति॒तेजा᳚तवेदःस्व॒धाभि᳚र्य॒ज्ञंसुकृ॑तंजुषस्व|| 13|| |
| ये,अ॑ग्निद॒ग्धाये,अन॑ग्निदग्धा॒मध्ये᳚दि॒वःस्व॒धया᳚मा॒दय᳚न्ते| तेभिः॑स्व॒राळसु॑नीतिमे॒तांय॑थाव॒शंत॒न्वं᳚कल्पयस्व|| 14|| |
| [87] मैनमिति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य यामायनोदमनोग्निस्त्रिष्टुबंत्याञ्चतस्रोनुष्टुभः |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:16}{अनुवाक:1, सूक्त:16} |
| मैन॑मग्ने॒विद॑हो॒माभिशो᳚चो॒मास्य॒त्वचं᳚चिक्षिपो॒माशरी᳚रम्| य॒दाशृ॒तंकृ॒णवो᳚जातवे॒दोऽथे᳚मेनं॒प्रहि॑णुतात्पि॒तृभ्यः॑|| 1||वर्ग:20 |
| शृ॒तंय॒दाकर॑सिजातवे॒दोऽथे᳚मेनं॒परि॑दत्तात्पि॒तृभ्यः॑| य॒दागच्छा॒त्यसु॑नीतिमे॒तामथा᳚दे॒वानां᳚वश॒नीर्भ॑वाति|| 2|| |
| सूर्यं॒चक्षु॑र्गच्छतु॒वात॑मा॒त्माद्यांच॑गच्छपृथि॒वींच॒धर्म॑णा| अ॒पोवा᳚गच्छ॒यदि॒तत्र॑तेहि॒तमोष॑धीषु॒प्रति॑तिष्ठा॒शरी᳚रैः|| 3|| |
| अ॒जोभा॒गस्तप॑सा॒तंत॑पस्व॒तंते᳚शो॒चिस्त॑पतु॒तंते᳚अ॒र्चिः| यास्ते᳚शि॒वास्त॒न्वो᳚जातवेद॒स्ताभि᳚र्वहैनंसु॒कृता᳚मुलो॒कम्|| 4|| |
| अव॑सृज॒पुन॑रग्नेपि॒तृभ्यो॒यस्त॒आहु॑त॒श्चर॑तिस्व॒धाभिः॑| आयु॒र्वसा᳚न॒उप॑वेतु॒शेषः॒संग॑च्छतांत॒न्वा᳚जातवेदः|| 5|| |
| यत्ते᳚कृ॒ष्णःश॑कु॒नआ᳚तु॒तोद॑पिपी॒लःस॒र्पउ॒तवा॒श्वाप॑दः| अ॒ग्निष्टद्वि॒श्वाद॑ग॒दंकृ॑णोतु॒सोम॑श्च॒योब्रा᳚ह्म॒णाँ,आ᳚वि॒वेश॑|| 6||वर्ग:21 |
| अ॒ग्नेर्वर्म॒परि॒गोभि᳚र्व्ययस्व॒संप्रोर्णु॑ष्व॒पीव॑सा॒मेद॑साच| नेत्त्वा᳚धृ॒ष्णुर्हर॑सा॒जर्हृ॑षाणोद॒धृग्वि॑ध॒क्ष्यन्प᳚र्य॒ङ्खया᳚ते|| 7|| |
| इ॒मम॑ग्नेचम॒संमाविजि॑ह्वरःप्रि॒योदे॒वाना᳚मु॒तसो॒म्याना᳚म्| ए॒षयश्च॑म॒सोदे᳚व॒पान॒स्तस्मि᳚न्दे॒वा,अ॒मृता᳚मादयन्ते|| 8|| |
| क्र॒व्याद॑म॒ग्निंप्रहि॑णोमिदू॒रंय॒मरा᳚ज्ञोगच्छतुरिप्रवा॒हः| इ॒हैवायमित॑रोजा॒तवे᳚दादे॒वेभ्यो᳚ह॒व्यंव॑हतुप्रजा॒नन्|| 9|| |
| यो,अ॒ग्निःक्र॒व्यात्प्र॑वि॒वेश॑वोगृ॒हमि॒मंपश्य॒न्नित॑रंजा॒तवे᳚दसम्| तंह॑रामिपितृय॒ज्ञाय॑दे॒वंसघ॒र्ममि᳚न्वात्पर॒मेस॒धस्थे᳚|| 10|| |
| यो,अ॒ग्निःक्र᳚व्य॒वाह॑नःपि॒तॄन्यक्ष॑दृता॒वृधः॑|प्रेदु॑ह॒व्यानि॑वोचतिदे॒वेभ्य॑श्चपि॒तृभ्य॒आ|| 11||वर्ग:22 |
| उ॒शन्त॑स्त्वा॒निधी᳚मह्यु॒शन्तः॒समि॑धीमहि|उ॒शन्नु॑श॒तआव॑हपि॒तॄन्ह॒विषे॒,अत्त॑वे|| 12|| |
| यंत्वम॑ग्नेस॒मद॑ह॒स्तमु॒निर्वा᳚पया॒पुनः॑|कि॒याम्ब्वत्र॑रोहतुपाकदू॒र्वाव्य॑ल्कशा|| 13|| |
| शीति॑के॒शीति॑कावति॒ह्लादि॑के॒ह्लादि॑कावति|म॒ण्डू॒क्या॒३॑(आ॒)सुसंग॑मइ॒मंस्व१॑(अ॒)ग्निंह॑र्षय|| 14|| |
| [88] त्वष्टादुहित्र इति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य यामायनोवेदश्रवाऋषिः आद्ययोर्द्वयोः सरण्यूदेवता ततश्चतसृणांपूषा ततस्तिसृणांसरस्वती ततःपंचानामापस्त्रिष्टुप् अंत्येद्वेअनुष्टुभौ (द्रप्सश्चस्कन्देति तिसृणां सोमोदेवतावाउपांत्यापुरस्ताद्बृहतीवेतिच) |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:17}{अनुवाक:2, सूक्त:1} |
| त्वष्टा᳚दुहि॒त्रेव॑ह॒तुंकृ॑णो॒तीती॒दंविश्वं॒भुव॑नं॒समे᳚ति| य॒मस्य॑मा॒ताप᳚र्यु॒ह्यमा᳚नाम॒होजा॒याविव॑स्वतोननाश|| 1||वर्ग:23 |
| अपा᳚गूहन्न॒मृतां॒मर्त्ये᳚भ्यःकृ॒त्वीसव᳚र्णामददु॒र्विव॑स्वते| उ॒ताश्विना᳚वभर॒द्यत्तदासी॒दज॑हादु॒द्वामि॑थु॒नास॑र॒ण्यूः|| 2|| |
| पू॒षात्वे॒तश्च्या᳚वयतु॒प्रवि॒द्वानन॑ष्टपशु॒र्भुव॑नस्यगो॒पाः| सत्वै॒तेभ्यः॒परि॑ददत्पि॒तृभ्यो॒ऽग्निर्दे॒वेभ्यः॑सुविद॒त्रिये᳚भ्यः|| 3|| |
| आयु᳚र्वि॒श्वायुः॒परि॑पासतित्वापू॒षात्वा᳚पातु॒प्रप॑थेपु॒रस्ता᳚त्| यत्रास॑तेसु॒कृतो॒यत्र॒तेय॒युस्तत्र॑त्वादे॒वःस॑वि॒ताद॑धातु|| 4|| |
| पू॒षेमा,आशा॒,अनु॑वेद॒सर्वाः॒सो,अ॒स्माँ,अभ॑यतमेननेषत्| स्व॒स्ति॒दा,आघृ॑णिः॒सर्व॑वी॒रोऽप्र॑युच्छन्पु॒रए᳚तुप्रजा॒नन्|| 5|| |
| प्रप॑थेप॒थाम॑जनिष्टपू॒षाप्रप॑थेदि॒वःप्रप॑थेपृथि॒व्याः| उ॒भे,अ॒भिप्रि॒यत॑मेस॒धस्थे॒,आच॒परा᳚चचरतिप्रजा॒नन्|| 6||वर्ग:24 |
| सर॑स्वतींदेव॒यन्तो᳚हवन्ते॒¦सर॑स्वतीमध्व॒रेता॒यमा᳚ने| सर॑स्वतींसु॒कृतो᳚अह्वयन्त॒¦सर॑स्वतीदा॒शुषे॒वार्यं᳚दात्|| 7|| |
| सर॑स्वति॒यास॒रथं᳚य॒याथ॑¦स्व॒धाभि॑र्देविपि॒तृभि॒र्मद᳚न्ती| आ॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑मादयस्वा¦नमी॒वा,इष॒आधे᳚ह्य॒स्मे|| 8|| |
| सर॑स्वतीं॒यांपि॒तरो॒हव᳚न्ते¦दक्षि॒णाय॒ज्ञम॑भि॒नक्ष॑माणाः| स॒ह॒स्रा॒र्घमि॒ळो,अत्र॑भा॒गं¦रा॒यस्पोषं॒यज॑मानेषुधेहि|| 9|| |
| आपो᳚अ॒स्मान्मा॒तरः॑शुन्धयन्तुघृ॒तेन॑नोघृत॒प्वः॑पुनन्तु| विश्वं॒हिरि॒प्रंप्र॒वह᳚न्तिदे॒वीरुदिदा᳚भ्यः॒शुचि॒रापू॒तए᳚मि|| 10|| |
| द्र॒प्सश्च॑स्कन्दप्रथ॒माँ,अनु॒द्यूनि॒मंच॒योनि॒मनु॒यश्च॒पूर्वः॑| स॒मा॒नंयोनि॒मनु॑सं॒चर᳚न्तंद्र॒प्संजु॑हो॒म्यनु॑स॒प्तहोत्राः᳚|| 11||वर्ग:25 |
| यस्ते᳚द्र॒प्सःस्कन्द॑ति॒यस्ते᳚अं॒शुर्बा॒हुच्यु॑तोधि॒षणा᳚या,उ॒पस्था᳚त्| अ॒ध्व॒र्योर्वा॒परि॑वा॒यःप॒वित्रा॒त्तंते᳚जुहोमि॒मन॑सा॒वष॑ट्कृतम्|| 12|| |
| यस्ते᳚द्र॒प्सःस्क॒न्नोयस्ते᳚अं॒शुर॒वश्च॒यःप॒रःस्रु॒चा| अ॒यंदे॒वोबृह॒स्पतिः॒संतंसि᳚ञ्चतु॒राध॑से|| 13|| |
| पय॑स्वती॒रोष॑धयः॒पय॑स्वन्माम॒कंवचः॑|अ॒पांपय॑स्व॒दित्पय॒स्तेन॑मास॒हशु᳚न्धत|| 14|| |
| [89] परंमृत्योइति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य यामायनः संकुसुकः आद्यानांचतसृणांमृत्युः पंचम्याधाता षष्ठ्यास्त्वष्टा शिष्टानां पितृमेधास्त्रिष्टुप् एकादशीप्रस्तारपंक्तिः त्रयोदशीजगत्यंत्येनुष्टुभौ (अंत्यायाः प्रजापतिर्वादेवता) |{अष्टक:7, अध्याय:6}{मंडल:10, सूक्त:18}{अनुवाक:2, सूक्त:2} |
| परं᳚मृत्यो॒,अनु॒परे᳚हि॒पन्थां॒¦यस्ते॒स्वइत॑रोदेव॒याना᳚त्| चक्षु॑ष्मतेशृण्व॒तेते᳚ब्रवीमि॒¦मानः॑प्र॒जांरी᳚रिषो॒मोतवी॒रान्|| 1||वर्ग:26 |
| मृ॒त्योःप॒दंयो॒पय᳚न्तो॒यदैत॒द्राघी᳚य॒आयुः॑प्रत॒रंदधा᳚नाः| आ॒प्याय॑मानाःप्र॒जया॒धने᳚नशु॒द्धाःपू॒ताभ॑वतयज्ञियासः|| 2|| |
| इ॒मेजी॒वाविमृ॒तैराव॑वृत्र॒न्नभू᳚द्भ॒द्रादे॒वहू᳚तिर्नो,अ॒द्य| प्राञ्चो᳚अगामनृ॒तये॒हसा᳚य॒द्राघी᳚य॒आयुः॑प्रत॒रंदधा᳚नाः|| 3|| |
| इ॒मंजी॒वेभ्यः॑परि॒धिंद॑धामि॒मैषां॒नुगा॒दप॑रो॒,अर्थ॑मे॒तम्| श॒तंजी᳚वन्तुश॒रदः॑पुरू॒चीर॒न्तर्मृ॒त्युंद॑धतां॒पर्व॑तेन|| 4|| |
| यथाहा᳚न्यनुपू॒र्वंभव᳚न्ति॒यथ॑ऋ॒तव॑ऋ॒तुभि॒र्यन्ति॑सा॒धु| यथा॒नपूर्व॒मप॑रो॒जहा᳚त्ये॒वाधा᳚त॒रायूं᳚षिकल्पयैषाम्|| 5|| |
| आरो᳚ह॒तायु॑र्ज॒रसं᳚वृणा॒ना,अ॑नुपू॒र्वंयत॑माना॒यति॒ष्ठ| इ॒हत्वष्टा᳚सु॒जनि॑मास॒जोषा᳚दी॒र्घमायुः॑करतिजी॒वसे᳚वः|| 6||वर्ग:27 |
| इ॒मानारी᳚रविध॒वाःसु॒पत्नी॒राञ्ज॑नेनस॒र्पिषा॒संवि॑शन्तु| अ॒न॒श्रवो᳚ऽनमी॒वाःसु॒रत्ना॒,आरो᳚हन्तु॒जन॑यो॒योनि॒मग्रे᳚|| 7|| |
| उदी᳚र्ष्वनार्य॒भिजी᳚वलो॒कंग॒तासु॑मे॒तमुप॑शेष॒एहि॑| ह॒स्त॒ग्रा॒भस्य॑दिधि॒षोस्तवे॒दंपत्यु॑र्जनि॒त्वम॒भिसंब॑भूथ|| 8|| |
| धनु॒र्हस्ता᳚दा॒ददा᳚नोमृ॒तस्या॒स्मेक्ष॒त्राय॒वर्च॑से॒बला᳚य| अत्रै॒वत्वमि॒हव॒यंसु॒वीरा॒विश्वाः॒स्पृधो᳚अ॒भिमा᳚तीर्जयेम|| 9|| |
| उप॑सर्पमा॒तरं॒भूमि॑मे॒तामु॑रु॒व्यच॑संपृथि॒वींसु॒शेवा᳚म्| ऊर्ण᳚म्रदायुव॒तिर्दक्षि॑णावतए॒षात्वा᳚पातु॒निरृ॑तेरु॒पस्था᳚त्|| 10|| |
| उच्छ्व᳚ञ्चस्वपृथिवि॒मानिबा᳚धथाःसूपाय॒नास्मै᳚भवसूपवञ्च॒ना| मा॒तापु॒त्रंयथा᳚सि॒चाभ्ये᳚नंभूमऊर्णुहि|| 11||वर्ग:28 |
| उ॒च्छ्वञ्च॑मानापृथि॒वीसुति॑ष्ठतुस॒हस्रं॒मित॒उप॒हिश्रय᳚न्ताम्| तेगृ॒हासो᳚घृत॒श्चुतो᳚भवन्तुवि॒श्वाहा᳚स्मैशर॒णाःस॒न्त्वत्र॑|| 12|| |
| उत्ते᳚स्तभ्नामिपृथि॒वींत्वत्परी॒मंलो॒गंनि॒दध॒न्मो,अ॒हंरि॑षम्| ए॒तांस्थूणां᳚पि॒तरो᳚धारयन्तु॒तेऽत्रा᳚य॒मःसाद॑नातेमिनोतु|| 13|| |
| प्र॒ती॒चीने॒मामह॒नीष्वाः᳚प॒र्णमि॒वाद॑धुः|प्र॒तीचीं᳚जग्रभा॒वाच॒मश्वं᳚रश॒नया᳚यथा|| 14|| |
| [90] निवर्तध्वमित्यष्टर्चस्य सूक्तस्य यामायनोमथितऋषिः आपोदेवताः आद्यायाअग्नीषोमा अनुष्टुप् षष्ठीगायत्री | (अत्रसूक्ते वारुणिर्भृगुर्भार्गवश्च यवनश्चेमौ पाक्षिकावृषीगौर्वादेवता) |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:19}{अनुवाक:2, सूक्त:3} |
| निव॑र्तध्वं॒मानु॑गाता॒स्मान्त्सि॑षक्तरेवतीः|अग्नी᳚षोमापुनर्वसू,अ॒स्मेधा᳚रयतंर॒यिम्|| 1||वर्ग:1 |
| पुन॑रेना॒निव॑र्तय॒पुन॑रेना॒न्याकु॑रु|इन्द्र॑एणा॒निय॑च्छत्व॒ग्निरे᳚ना,उ॒पाज॑तु|| 2|| |
| पुन॑रे॒तानिव॑र्तन्ताम॒स्मिन्पु॑ष्यन्तु॒गोप॑तौ|इ॒हैवाग्ने॒निधा᳚रये॒हति॑ष्ठतु॒यार॒यिः|| 3|| |
| यन्नि॒यानं॒न्यय॑नंसं॒ज्ञानं॒यत्प॒राय॑णम्|आ॒वर्त॑नंनि॒वर्त॑नं॒योगो॒पा,अपि॒तंहु॑वे|| 4|| |
| यउ॒दान॒ड्व्यय॑नं॒यउ॒दान॑ट्प॒राय॑णम्|आ॒वर्त॑नंनि॒वर्त॑न॒मपि॑गो॒पानिव॑र्तताम्|| 5|| |
| आनि॑वर्त॒निव॑र्तय॒पुन᳚र्नइन्द्र॒गादे᳚हि|जी॒वाभि॑र्भुनजामहै|| 6|| |
| परि॑वोवि॒श्वतो᳚दधऊ॒र्जाघृ॒तेन॒पय॑सा|येदे॒वाःकेच॑य॒ज्ञिया॒स्तेर॒य्यासंसृ॑जन्तुनः|| 7|| |
| आनि॑वर्तनवर्तय॒निनि॑वर्तनवर्तय|भूम्या॒श्चत॑स्रःप्र॒दिश॒स्ताभ्य॑एना॒निव॑र्तय|| 8|| |
| [91] भद्रमिति दशर्चस्य सूक्तस्यैंद्रो विमदोग्निर्गायत्री आद्यैकपदाविराट् द्वितीयानुष्टुबंत्येविराट् त्रिष्टुभौ (भद्रंनःप्रभृति सप्तसूक्तेषु य एंद्रोविमदः सप्राजापत्योर्वैकल्पिकः किंचवासुक्रोवसुकृद्वा) |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:20}{अनुवाक:2, सूक्त:4} |
| भ॒द्रंनो॒,अपि॑वातय॒मनः॑|| 1||वर्ग:2 |
| अ॒ग्निमी᳚ळेभु॒जांयवि॑ष्ठंशा॒सामि॒त्रंदु॒र्धरी᳚तुम्|यस्य॒धर्म॒न्त्स्व१॑(अ॒)रेनीः᳚सप॒र्यन्ति॑मा॒तुरूधः॑|| 2|| |
| यमा॒साकृ॒पनी᳚ळंभा॒साके᳚तुंव॒र्धय᳚न्ति|भ्राज॑ते॒श्रेणि॑दन्|| 3|| |
| अ॒र्योवि॒शांगा॒तुरे᳚ति॒प्रयदान॑ड्दि॒वो,अन्ता॑न्|क॒विर॒भ्रंदीद्या᳚नः|| 4|| |
| जु॒षद्ध॒व्यामानु॑षस्यो॒र्ध्वस्त॑स्था॒वृभ्वा᳚य॒ज्ञे|मि॒न्वन्त्सद्म॑पु॒रए᳚ति|| 5|| |
| सहिक्षेमो᳚ह॒विर्य॒ज्ञःश्रु॒ष्टीद॑स्यगा॒तुरे᳚ति|अ॒ग्निंदे॒वावाशी᳚मन्तम्|| 6|| |
| य॒ज्ञा॒साहं॒दुव॑इषे॒ऽग्निंपूर्व॑स्य॒शेव॑स्य|अद्रेः᳚सू॒नुमा॒युमा᳚हुः|| 7||वर्ग:3 |
| नरो॒येकेचा॒स्मदाविश्वेत्तेवा॒मआस्युः॑|अ॒ग्निंह॒विषा॒वर्ध᳚न्तः|| 8|| |
| कृ॒ष्णःश्वे॒तो᳚ऽरु॒षोयामो᳚अस्यब्र॒ध्नऋ॒ज्रउ॒तशोणो॒यश॑स्वान्|हिर᳚ण्यरूपं॒जनि॑ताजजान|| 9|| |
| ए॒वाते᳚अग्नेविम॒दोम॑नी॒षामूर्जो᳚नपाद॒मृते᳚भिःस॒जोषाः᳚| गिर॒आव॑क्षत्सुम॒तीरि॑या॒नइष॒मूर्जं᳚सुक्षि॒तिंविश्व॒माभाः᳚|| 10|| |
| [92] आग्निंनेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्यैंद्रो विमदोग्निरास्तारपंक्तिः |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:21}{अनुवाक:2, सूक्त:5} |
| आग्निंनस्ववृ॑क्तिभि॒र्होता᳚रंत्वावृणीमहे| य॒ज्ञाय॑स्ती॒र्णब᳚र्हिषे॒विवो॒मदे᳚शी॒रंपा᳚व॒कशो᳚चिषं॒विव॑क्षसे|| 1||वर्ग:4 |
| त्वामु॒तेस्वा॒भुवः॑शु॒म्भन्त्यश्व॑राधसः| वेति॒त्वामु॑प॒सेच॑नी॒विवो॒मद॒ऋजी᳚तिरग्न॒आहु॑ति॒र्विव॑क्षसे|| 2|| |
| त्वेध॒र्माण॑आसतेजु॒हूभिः॑सिञ्च॒तीरि॑व| कृ॒ष्णारू॒पाण्यर्जु॑ना॒विवो॒मदे॒विश्वा॒,अधि॒श्रियो᳚धिषे॒विव॑क्षसे|| 3|| |
| यम॑ग्ने॒मन्य॑सेर॒यिंसह॑सावन्नमर्त्य| तमानो॒वाज॑सातये॒विवो॒मदे᳚य॒ज्ञेषु॑चि॒त्रमाभ॑रा॒विव॑क्षसे|| 4|| |
| अ॒ग्निर्जा॒तो,अथ᳚र्वणावि॒दद्विश्वा᳚नि॒काव्या᳚| भुव॑द्दू॒तोवि॒वस्व॑तो॒विवो॒मदे᳚प्रि॒योय॒मस्य॒काम्यो॒विव॑क्षसे|| 5|| |
| त्वांय॒ज्ञेष्वी᳚ळ॒तेऽग्ने᳚प्रय॒त्य॑ध्व॒रे| त्वंवसू᳚नि॒काम्या॒विवो॒मदे॒विश्वा᳚दधासिदा॒शुषे॒विव॑क्षसे|| 6||वर्ग:5 |
| त्वांय॒ज्ञेष्वृ॒त्विजं॒चारु॑मग्ने॒निषे᳚दिरे| घृ॒तप्र॑तीकं॒मनु॑षो॒विवो॒मदे᳚शु॒क्रंचेति॑ष्ठम॒क्षभि॒र्विव॑क्षसे|| 7|| |
| अग्ने᳚शु॒क्रेण॑शो॒चिषो॒रुप्र॑थयसेबृ॒हत्| अ॒भि॒क्रन्द᳚न्वृषायसे॒विवो॒मदे॒गर्भं᳚दधासिजा॒मिषु॒विव॑क्षसे|| 8|| |
| [93] कुहश्रुतइति पंचदशर्चस्य सूक्तस्यैंद्रोविमदइंद्रः पुरस्ताद्बहती पंचमी सप्तमी नवम्योनुष्टुभोंत्यात्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:22}{अनुवाक:2, सूक्त:6} |
| कुह॑श्रु॒तइन्द्रः॒कस्मि᳚न्न॒द्यजने᳚मि॒त्रोनश्रू᳚यते| ऋषी᳚णांवा॒यः,क्षये॒गुहा᳚वा॒चर्कृ॑षेगि॒रा|| 1||वर्ग:6 |
| इ॒हश्रु॒तइन्द्रो᳚अ॒स्मे,अ॒द्यस्तवे᳚व॒ज्र्यृची᳚षमः| मि॒त्रोनयोजने॒ष्वायश॑श्च॒क्रे,असा॒म्या|| 2|| |
| म॒होयस्पतिः॒शव॑सो॒,असा॒म्याम॒होनृ॒म्णस्य॑तूतु॒जिः| भ॒र्तावज्र॑स्यधृ॒ष्णोःपि॒तापु॒त्रमि॑वप्रि॒यम्|| 3|| |
| यु॒जा॒नो,अश्वा॒वात॑स्य॒धुनी᳚दे॒वोदे॒वस्य॑वज्रिवः| स्यन्ता᳚प॒थावि॒रुक्म॑तासृजा॒नःस्तो॒ष्यध्व॑नः|| 4|| |
| त्वंत्याचि॒द्वात॒स्याश्वागा᳚ऋ॒ज्रात्मना॒वह॑ध्यै|ययो᳚र्दे॒वोनमर्त्यो᳚य॒न्तानकि᳚र्वि॒दाय्यः॑|| 5|| |
| अध॒ग्मन्तो॒शना᳚पृच्छतेवां॒कद॑र्थान॒आगृ॒हम्| आज॑ग्मथुःपरा॒काद्दि॒वश्च॒ग्मश्च॒मर्त्य᳚म्|| 6||वर्ग:7 |
| आन॑इन्द्रपृक्षसे॒ऽस्माकं॒ब्रह्मोद्य॑तम्|तत्त्वा᳚याचाम॒हेऽवः॒शुष्णं॒यद्धन्नमा᳚नुषम्|| 7|| |
| अ॒क॒र्मादस्यु॑र॒भिनो᳚अम॒न्तुर॒न्यव्र॑तो॒,अमा᳚नुषः| त्वंतस्या᳚मित्रह॒न्वध॑र्दा॒सस्य॑दम्भय|| 8|| |
| त्वंन॑इन्द्रशूर॒शूरै᳚रु॒तत्वोता᳚सोब॒र्हणा᳚|पु॒रु॒त्राते॒विपू॒र्तयो॒नव᳚न्तक्षो॒णयो᳚यथा|| 9|| |
| त्वंतान्वृ॑त्र॒हत्ये᳚चोदयो॒नॄन्का᳚र्पा॒णेशू᳚रवज्रिवः| गुहा॒यदी᳚कवी॒नांवि॒शांनक्ष॑त्रशवसाम्|| 10|| |
| म॒क्षूतात॑इन्द्रदा॒नाप्न॑सआक्षा॒णेशू᳚रवज्रिवः| यद्ध॒शुष्ण॑स्यद॒म्भयो᳚जा॒तंविश्वं᳚स॒याव॑भिः|| 11||वर्ग:8 |
| माकु॒ध्र्य॑गिन्द्रशूर॒वस्वी᳚र॒स्मेभू᳚वन्न॒भिष्ट॑यः| व॒यंव॑यंतआसांसु॒म्नेस्या᳚मवज्रिवः|| 12|| |
| अ॒स्मेतात॑इन्द्रसन्तुस॒त्याहिं᳚सन्तीरुप॒स्पृशः॑| वि॒द्याम॒यासां॒भुजो᳚धेनू॒नांनव॑ज्रिवः|| 13|| |
| अ॒ह॒स्तायद॒पदी॒वर्ध॑त॒क्षाःशची᳚भिर्वे॒द्याना᳚म्| शुष्णं॒परि॑प्रदक्षि॒णिद्वि॒श्वाय॑वे॒निशि॑श्नथः|| 14|| |
| पिबा᳚पि॒बेदि᳚न्द्रशूर॒सोमं॒मारि॑षण्योवसवान॒वसुः॒सन्| उ॒तत्रा᳚यस्वगृण॒तोम॒घोनो᳚म॒हश्च॑रा॒योरे॒वत॑स्कृधीनः|| 15|| |
| [94] यजामहइति सप्तर्चस्य सूक्तस्यैंद्रो विमदइंद्रोजगत्याद्यांत्येत्रिष्टुभौ पंचम्यभिसारिणी |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:23}{अनुवाक:2, सूक्त:7} |
| यजा᳚मह॒इन्द्रं॒वज्र॑दक्षिणं॒हरी᳚णांर॒थ्य१॑(अं॒)विव्र॑तानाम्| प्रश्मश्रु॒दोधु॑वदू॒र्ध्वथा᳚भू॒द्विसेना᳚भि॒र्दय॑मानो॒विराध॑सा|| 1||वर्ग:9 |
| हरी॒न्व॑स्य॒यावने᳚वि॒देवस्विन्द्रो᳚म॒घैर्म॒घवा᳚वृत्र॒हाभु॑वत्| ऋ॒भुर्वाज॑ऋभु॒क्षाःप॑त्यते॒शवोऽव॑क्ष्णौमि॒दास॑स्य॒नाम॑चित्|| 2|| |
| य॒दावज्रं॒हिर᳚ण्य॒मिदथा॒रथं॒हरी॒यम॑स्य॒वह॑तो॒विसू॒रिभिः॑| आति॑ष्ठतिम॒घवा॒सन॑श्रुत॒इन्द्रो॒वाज॑स्यदी॒र्घश्र॑वस॒स्पतिः॑|| 3|| |
| सोचि॒न्नुवृ॒ष्टिर्यू॒थ्या॒३॑(आ॒)स्वासचाँ॒,इन्द्रः॒श्मश्रू᳚णि॒हरि॑ता॒भिप्रु॑ष्णुते| अव॑वेतिसु॒क्षयं᳚सु॒तेमधूदिद्धू᳚नोति॒वातो॒यथा॒वन᳚म्|| 4|| |
| योवा॒चाविवा᳚चोमृ॒ध्रवा᳚चःपु॒रूस॒हस्राशि॑वाज॒घान॑| तत्त॒दिद॑स्य॒पौंस्यं᳚गृणीमसिपि॒तेव॒यस्तवि॑षींवावृ॒धेशवः॑|| 5|| |
| स्तोमं᳚तइन्द्रविम॒दा,अ॑जीजन॒न्नपू᳚र्व्यंपुरु॒तमं᳚सु॒दान॑वे| वि॒द्माह्य॑स्य॒भोज॑नमि॒नस्य॒यदाप॒शुंनगो॒पाःक॑रामहे|| 6|| |
| माकि᳚र्नए॒नास॒ख्यावियौ᳚षु॒स्तव॑चेन्द्रविम॒दस्य॑च॒ऋषेः᳚| वि॒द्माहिते॒प्रम॑तिंदेवजामि॒वद॒स्मेते᳚सन्तुस॒ख्याशि॒वानि॑|| 7|| |
| [95] इंद्रसोममिति षडृचस्य सूक्तस्यैंद्रो विमदइंद्रोंत्यस्तिसृणामश्विनावास्तारपंक्तिः अंत्यास्तिस्रोनुष्टुभः |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:24}{अनुवाक:2, सूक्त:8} |
| इन्द्र॒सोम॑मि॒मंपि॑ब॒मधु॑मन्तंच॒मूसु॒तम्| अ॒स्मेर॒यिंनिधा᳚रय॒विवो॒मदे᳚सह॒स्रिणं᳚पुरूवसो॒विव॑क्षसे|| 1||वर्ग:10 |
| त्वांय॒ज्ञेभि॑रु॒क्थैरुप॑ह॒व्येभि॑रीमहे| शची᳚पतेशचीनां॒विवो॒मदे॒श्रेष्ठं᳚नोधेहि॒वार्यं॒विव॑क्षसे|| 2|| |
| यस्पति॒र्वार्या᳚णा॒मसि॑र॒ध्रस्य॑चोदि॒ता| इन्द्र॑स्तोतॄ॒णाम॑वि॒ताविवो॒मदे᳚द्वि॒षोनः॑पा॒ह्यंह॑सो॒विव॑क्षसे|| 3|| |
| यु॒वंश॑क्रामाया॒विना᳚समी॒चीनिर॑मन्थतम्|वि॒म॒देन॒यदी᳚ळि॒तानास॑त्यानि॒रम᳚न्थतम्|| 4|| |
| विश्वे᳚दे॒वा,अ॑कृपन्तसमी॒च्योर्नि॒ष्पत᳚न्त्योः|नास॑त्यावब्रुवन्दे॒वाःपुन॒राव॑हता॒दिति॑|| 5|| |
| मधु॑मन्मेप॒राय॑णं॒मधु॑म॒त्पुन॒राय॑नम्|तानो᳚देवादे॒वत॑यायु॒वंमधु॑मतस्कृतम्|| 6|| |
| [96] भद्रमित्येकादशर्चस्य सूक्तस्यैंद्रोविमदः सोमआस्तारपंक्तिः |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:25}{अनुवाक:2, सूक्त:9} |
| भ॒द्रंनो॒,अपि॑वातय॒मनो॒दक्ष॑मु॒तक्रतु᳚म्| अधा᳚तेस॒ख्ये,अन्ध॑सो॒विवो॒मदे॒रण॒न्गावो॒नयव॑से॒विव॑क्षसे|| 1||वर्ग:11 |
| हृ॒दि॒स्पृश॑स्तआसते॒विश्वे᳚षुसोम॒धाम॑सु| अधा॒कामा᳚इ॒मेमम॒विवो॒मदे॒विति॑ष्ठन्तेवसू॒यवो॒विव॑क्षसे|| 2|| |
| उ॒तव्र॒तानि॑सोमते॒प्राहंमि॑नामिपा॒क्या᳚| अधा᳚पि॒तेव॑सू॒नवे॒विवो॒मदे᳚मृ॒ळानो᳚अ॒भिचि॑द्व॒धाद्विव॑क्षसे|| 3|| |
| समु॒प्रय᳚न्तिधी॒तयः॒सर्गा᳚सोऽव॒ताँ,इ॑व| क्रतुं᳚नःसोमजी॒वसे॒विवो॒मदे᳚धा॒रया᳚चम॒साँ,इ॑व॒विव॑क्षसे|| 4|| |
| तव॒त्येसो᳚म॒शक्ति॑भि॒र्निका᳚मासो॒व्यृ᳚ण्विरे| गृत्स॑स्य॒धीरा᳚स्त॒वसो॒विवो॒मदे᳚व्र॒जंगोम᳚न्तम॒श्विनं॒विव॑क्षसे|| 5|| |
| प॒शुंनः॑सोमरक्षसिपुरु॒त्राविष्ठि॑तं॒जग॑त्| स॒माकृ॑णोषिजी॒वसे॒विवो॒मदे॒विश्वा᳚स॒म्पश्य॒न्भुव॑ना॒विव॑क्षसे|| 6||वर्ग:12 |
| त्वंनः॑सोमवि॒श्वतो᳚गो॒पा,अदा᳚भ्योभव| सेध॑राज॒न्नप॒स्रिधो॒विवो॒मदे॒मानो᳚दुः॒शंस॑ईशता॒विव॑क्षसे|| 7|| |
| त्वंनः॑सोमसु॒क्रतु᳚र्वयो॒धेया᳚यजागृहि| क्षे॒त्र॒वित्त॑रो॒मनु॑षो॒विवो॒मदे᳚द्रु॒होनः॑पा॒ह्यंह॑सो॒विव॑क्षसे|| 8|| |
| त्वंनो᳚वृत्रहन्त॒मेन्द्र॑स्येन्दोशि॒वःसखा᳚| यत्सीं॒हव᳚न्तेसमि॒थेविवो॒मदे॒युध्य॑मानास्तो॒कसा᳚तौ॒विव॑क्षसे|| 9|| |
| अ॒यंघ॒सतु॒रोमद॒इन्द्र॑स्यवर्धतप्रि॒यः| अ॒यंक॒क्षीव॑तोम॒होविवो॒मदे᳚म॒तिंविप्र॑स्यवर्धय॒द्विव॑क्षसे|| 10|| |
| अ॒यंविप्रा᳚यदा॒शुषे॒वाजाँ᳚,इयर्ति॒गोम॑तः| अ॒यंस॒प्तभ्य॒आवरं॒विवो॒मदे॒प्रान्धंश्रो॒णंच॑तारिष॒द्विव॑क्षसे|| 11|| |
| [97] प्रह्यच्छेति नवर्चस्य सूक्तस्यैंद्रो विमदः पूषानुष्टुप् आद्याचतुर्थ्यावुष्णिहौ |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:26}{अनुवाक:2, सूक्त:10} |
| प्रह्यच्छा᳚मनी॒षास्पा॒र्हायन्ति॑नि॒युतः॑|प्रद॒स्रानि॒युद्र॑थःपू॒षा,अ॑विष्टु॒माहि॑नः|| 1||वर्ग:13 |
| यस्य॒त्यन्म॑हि॒त्वंवा॒ताप्य॑म॒यंजनः॑|विप्र॒आवं᳚सद्धी॒तिभि॒श्चिके᳚तसुष्टुती॒नाम्|| 2|| |
| सवे᳚दसुष्टुती॒नामिन्दु॒र्नपू॒षावृषा᳚|अ॒भिप्सुरः॑प्रुषायतिव्र॒जंन॒आप्रु॑षायति|| 3|| |
| मं॒सी॒महि॑त्वाव॒यम॒स्माकं᳚देवपूषन्|म॒ती॒नांच॒साध॑नं॒विप्रा᳚णांचाध॒वम्|| 4|| |
| प्रत्य॑र्धिर्य॒ज्ञाना᳚मश्वह॒योरथा᳚नाम्|ऋषिः॒सयोमनु᳚र्हितो॒विप्र॑स्ययावयत्स॒खः|| 5|| |
| आ॒धीष॑माणायाः॒पतिः॑शु॒चाया᳚श्चशु॒चस्य॑च|वा॒सो॒वा॒योऽवी᳚ना॒मावासां᳚सि॒मर्मृ॑जत्|| 6||वर्ग:14 |
| इ॒नोवाजा᳚नां॒पति॑रि॒नःपु॑ष्टी॒नांसखा᳚|प्रश्मश्रु॑हर्य॒तोदू᳚धो॒द्विवृथा॒यो,अदा᳚भ्यः|| 7|| |
| आते॒रथ॑स्यपूषन्न॒जाधुरं᳚ववृत्युः|विश्व॑स्या॒र्थिनः॒सखा᳚सनो॒जा,अन॑पच्युतः|| 8|| |
| अ॒स्माक॑मू॒र्जारथं᳚पू॒षा,अ॑विष्टु॒माहि॑नः|भुव॒द्वाजा᳚नांवृ॒धइ॒मंनः॑शृणव॒द्धव᳚म्|| 9|| |
| [98] असत्स्विति चतुर्विंशत्यृचस्य सूक्तस्यैंद्रोवसुक्रइंद्रस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:27}{अनुवाक:2, सूक्त:11} |
| अस॒त्सुमे᳚जरितः॒साभि॑वे॒गोयत्सु᳚न्व॒तेयज॑मानाय॒शिक्ष᳚म्| अना᳚शीर्दाम॒हम॑स्मिप्रह॒न्तास॑त्य॒ध्वृतं᳚वृजिना॒यन्त॑मा॒भुम्|| 1||वर्ग:15 |
| यदीद॒हंयु॒धये᳚सं॒नया॒न्यदे᳚वयून्त॒न्वा॒३॑(आ॒)शूशु॑जानान्| अ॒माते॒तुम्रं᳚वृष॒भंप॑चानिती॒व्रंसु॒तंप᳚ञ्चद॒शंनिषि᳚ञ्चम्|| 2|| |
| नाहंतंवे᳚द॒यइति॒ब्रवी॒त्यदे᳚वयून्त्स॒मर॑णेजघ॒न्वान्| य॒दावाख्य॑त्स॒मर॑ण॒मृघा᳚व॒दादिद्ध॑मेवृष॒भाप्रब्रु॑वन्ति|| 3|| |
| यदज्ञा᳚तेषुवृ॒जने॒ष्वासं॒विश्वे᳚स॒तोम॒घवा᳚नोमआसन्| जि॒नामि॒वेत्क्षेम॒आसन्त॑मा॒भुंप्रतंक्षि॑णां॒पर्व॑तेपाद॒गृह्य॑|| 4|| |
| नवा,उ॒मांवृ॒जने᳚वारयन्ते॒नपर्व॑तासो॒यद॒हंम॑न॒स्ये| मम॑स्व॒नात्कृ॑धु॒कर्णो᳚भयातए॒वेदनु॒द्यून्कि॒रणः॒समे᳚जात्|| 5|| |
| दर्श॒न्न्वत्र॑शृत॒पाँ,अ॑नि॒न्द्रान्बा᳚हु॒क्षदः॒शर॑वे॒पत्य॑मानान्| घृषुं᳚वा॒येनि॑नि॒दुःसखा᳚य॒मध्यू॒न्वे᳚षुप॒वयो᳚ववृत्युः|| 6||वर्ग:16 |
| अभू॒र्वौक्षी॒र्व्यु१॑(उ॒)आयु॑रान॒ड्दर्ष॒न्नुपूर्वो॒,अप॑रो॒नुद॑र्षत्| द्वेप॒वस्ते॒परि॒तंनभू᳚तो॒यो,अ॒स्यपा॒रेरज॑सोवि॒वेष॑|| 7|| |
| गावो॒यवं॒प्रयु॑ता,अ॒र्यो,अ॑क्ष॒न्ता,अ॑पश्यंस॒हगो᳚पा॒श्चर᳚न्तीः| हवा॒,इद॒र्यो,अ॒भितः॒समा᳚य॒न्किय॑दासु॒स्वप॑तिश्छन्दयाते|| 8|| |
| संयद्वयं᳚यव॒सादो॒जना᳚नाम॒हंय॒वाद॑उ॒र्वज्रे᳚अ॒न्तः| अत्रा᳚यु॒क्तो᳚ऽवसा॒तार॑मिच्छा॒दथो॒,अयु॑क्तंयुनजद्वव॒न्वान्|| 9|| |
| अत्रेदु॑मेमंससेस॒त्यमु॒क्तंद्वि॒पाच्च॒यच्चतु॑ष्पात्संसृ॒जानि॑| स्त्री॒भिर्यो,अत्र॒वृष॑णंपृत॒न्यादयु॑द्धो,अस्य॒विभ॑जानि॒वेदः॑|| 10|| |
| यस्या᳚न॒क्षादु॑हि॒ताजात्वास॒कस्तांवि॒द्वाँ,अ॒भिम᳚न्याते,अ॒न्धाम्| क॒त॒रोमे॒निंप्रति॒तंमु॑चाते॒यईं॒वहा᳚ते॒यईं᳚वावरे॒यात्|| 11||वर्ग:17 |
| किय॑ती॒योषा᳚मर्य॒तोव॑धू॒योःपरि॑प्रीता॒पन्य॑सा॒वार्ये᳚ण| भ॒द्राव॒धूर्भ॑वति॒यत्सु॒पेशाः᳚स्व॒यंसामि॒त्रंव॑नुते॒जने᳚चित्|| 12|| |
| प॒त्तोज॑गारप्र॒त्यञ्च॑मत्तिशी॒र्ष्णाशिरः॒प्रति॑दधौ॒वरू᳚थम्| आसी᳚नऊ॒र्ध्वामु॒पसि॑क्षिणाति॒न्य᳚ङ्ङुत्ता॒नामन्वे᳚ति॒भूमि᳚म्|| 13|| |
| बृ॒हन्न॑च्छा॒यो,अ॑पला॒शो,अर्वा᳚त॒स्थौमा॒ताविषि॑तो,अत्ति॒गर्भः॑| अ॒न्यस्या᳚व॒त्संरि॑ह॒तीमि॑माय॒कया᳚भु॒वानिद॑धेधे॒नुरूधः॑|| 14|| |
| स॒प्तवी॒रासो᳚अध॒रादुदा᳚यन्न॒ष्टोत्त॒रात्ता॒त्सम॑जग्मिर॒न्ते| नव॑प॒श्चाता᳚त्स्थिवि॒मन्त॑आय॒न्दश॒प्राक्सानु॒विति॑र॒न्त्यश्नः॑|| 15|| |
| द॒शा॒नामेकं᳚कपि॒लंस॑मा॒नंतंहि᳚न्वन्ति॒क्रत॑वे॒पार्या᳚य| गर्भं᳚मा॒तासुधि॑तंव॒क्षणा॒स्ववे᳚नन्तंतु॒षय᳚न्तीबिभर्ति|| 16||वर्ग:18 |
| पीवा᳚नंमे॒षम॑पचन्तवी॒रान्यु॑प्ता,अ॒क्षा,अनु॑दी॒वआ᳚सन्| द्वाधनुं᳚बृह॒तीम॒प्स्व१॑(अ॒)न्तःप॒वित्र॑वन्ताचरतःपु॒नन्ता᳚|| 17|| |
| विक्रो᳚श॒नासो॒विष्व᳚ञ्चआय॒न्पचा᳚ति॒नेमो᳚न॒हिपक्ष॑द॒र्धः| अ॒यंमे᳚दे॒वःस॑वि॒तातदा᳚ह॒द्र्व᳚न्न॒इद्व॑नवत्स॒र्पिर᳚न्नः|| 18|| |
| अप॑श्यं॒ग्रामं॒वह॑मानमा॒राद॑च॒क्रया᳚स्व॒धया॒वर्त॑मानम्| सिष॑क्त्य॒र्यःप्रयु॒गाजना᳚नांस॒द्यःशि॒श्नाप्र॑मिना॒नोनवी᳚यान्|| 19|| |
| ए॒तौमे॒गावौ᳚प्रम॒रस्य॑यु॒क्तौमोषुप्रसे᳚धी॒र्मुहु॒रिन्म॑मन्धि| आप॑श्चिदस्य॒विन॑श॒न्त्यर्थं॒सूर॑श्चम॒र्कउप॑रोबभू॒वान्|| 20|| |
| अ॒यंयोवज्रः॑पुरु॒धाविवृ॑त्तो॒ऽवःसूर्य॑स्यबृह॒तःपुरी᳚षात्| श्रव॒इदे॒नाप॒रो,अ॒न्यद॑स्ति॒तद᳚व्य॒थीज॑रि॒माण॑स्तरन्ति|| 21||वर्ग:19 |
| वृ॒क्षेवृ॑क्षे॒निय॑तामीमय॒द्गौस्ततो॒वयः॒प्रप॑तान्पूरु॒षादः॑| अथे॒दंविश्वं॒भुव॑नंभयात॒इन्द्रा᳚यसु॒न्वदृष॑येच॒शिक्ष॑त्|| 22|| |
| दे॒वानां॒माने᳚प्रथ॒मा,अ॑तिष्ठन्कृ॒न्तत्रा᳚देषा॒मुप॑रा॒,उदा᳚यन्| त्रय॑स्तपन्तिपृथि॒वीम॑नू॒पाद्वाबृबू᳚कंवहतः॒पुरी᳚षम्|| 23|| |
| साते᳚जी॒वातु॑रु॒ततस्य॑विद्धि॒मास्मै᳚ता॒दृगप॑गूहःसम॒र्ये| आ॒विःस्वः॑कृणु॒तेगूह॑तेबु॒संसपा॒दुर॑स्यनि॒र्णिजो॒नमु॑च्यते|| 24|| |
| [99] विश्वेहीति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य आद्यायाइंद्रस्नुषाऋषिका द्वितीयादिचतुर्थीवर्जानां युजामिंद्रऋषिः चतुर्थीसहितानामयुजांवसुक्रऋषिः चतुर्थीवर्ज्यानांयुजांवसुक्रोदेवता शिष्टानामिंद्रस्त्रिष्टुप् | (अत्रसूक्तेप्रथमर्चींद्रस्नुषार्षत्वे विकल्पं शौनकोमन्यते तत्पक्षे तत्रवसुक्रोविज्ञेयः) |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:28}{अनुवाक:2, सूक्त:12} |
| विश्वो॒ह्य१॑(अ॒)न्यो,अ॒रिरा᳚ज॒गाम॒ममेदह॒श्वशु॑रो॒नाज॑गाम| ज॒क्षी॒याद्धा॒ना,उ॒तसोमं᳚पपीया॒त्स्वा᳚शितः॒पुन॒रस्तं᳚जगायात्|| 1||वर्ग:20 |
| सरोरु॑वद्वृष॒भस्ति॒ग्मशृ᳚ङ्गो॒वर्ष्म᳚न्तस्थौ॒वरि॑म॒न्नापृ॑थि॒व्याः| विश्वे᳚ष्वेनंवृ॒जने᳚षुपामि॒योमे᳚कु॒क्षीसु॒तसो᳚मःपृ॒णाति॑|| 2|| |
| अद्रि॑णातेम॒न्दिन॑इन्द्र॒तूया᳚न्त्सु॒न्वन्ति॒सोमा॒न्पिब॑सि॒त्वमे᳚षाम्| पच᳚न्तितेवृष॒भाँ,अत्सि॒तेषां᳚पृ॒क्षेण॒यन्म॑घवन्हू॒यमा᳚नः|| 3|| |
| इ॒दंसुमे᳚जरित॒राचि॑किद्धिप्रती॒पंशापं᳚न॒द्यो᳚वहन्ति| लो॒पा॒शःसिं॒हंप्र॒त्यञ्च॑मत्साःक्रो॒ष्टाव॑रा॒हंनिर॑तक्त॒कक्षा᳚त्|| 4|| |
| क॒थात॑ए॒तद॒हमाचि॑केतं॒गृत्स॑स्य॒पाक॑स्त॒वसो᳚मनी॒षाम्| त्वंनो᳚वि॒द्वाँऋ॑तु॒थाविवो᳚चो॒यमर्धं᳚तेमघवन्क्षे॒म्याधूः|| 5|| |
| ए॒वाहिमांत॒वसं᳚व॒र्धय᳚न्तिदि॒वश्चि᳚न्मेबृह॒तउत्त॑रा॒धूः| पु॒रूस॒हस्रा॒निशि॑शामिसा॒कम॑श॒त्रुंहिमा॒जनि॑ताज॒जान॑|| 6|| |
| ए॒वाहिमांत॒वसं᳚ज॒ज्ञुरु॒ग्रंकर्म᳚न्कर्म॒न्वृष॑णमिन्द्रदे॒वाः| वधीं᳚वृ॒त्रंवज्रे᳚णमन्दसा॒नोऽप᳚व्र॒जंम॑हि॒नादा॒शुषे᳚वम्|| 7||वर्ग:21 |
| दे॒वास॑आयन्पर॒शूँर॑बिभ्र॒न्वना᳚वृ॒श्चन्तो᳚अ॒भिवि॒ड्भिरा᳚यन्| निसु॒द्र्व१॑(अं॒)दध॑तोव॒क्षणा᳚सु॒यत्रा॒कृपी᳚ट॒मनु॒तद्द॑हन्ति|| 8|| |
| श॒शः,क्षु॒रंप्र॒त्यञ्चं᳚जगा॒राद्रिं᳚लो॒गेन॒व्य॑भेदमा॒रात्| बृ॒हन्तं᳚चिदृह॒तेर᳚न्धयानि॒वय॑द्व॒त्सोवृ॑ष॒भंशूशु॑वानः|| 9|| |
| सु॒प॒र्णइ॒त्थान॒खमासि॑षा॒याव॑रुद्धःपरि॒पदं॒नसिं॒हः| नि॒रु॒द्धश्चि᳚न्महि॒षस्त॒र्ष्यावा᳚न्गो॒धातस्मा᳚अ॒यथं᳚कर्षदे॒तत्|| 10|| |
| तेभ्यो᳚गो॒धा,अ॒यथं᳚कर्षदे॒तद्येब्र॒ह्मणः॑प्रति॒पीय॒न्त्यन्नैः᳚| सि॒मउ॒क्ष्णो᳚ऽवसृ॒ष्टाँ,अ॑दन्तिस्व॒यंबला᳚नित॒न्वः॑शृणा॒नाः|| 11|| |
| ए॒तेशमी᳚भिःसु॒शमी᳚अभूव॒न्येहि᳚न्वि॒रेत॒न्व१॑(अः॒)सोम॑उ॒क्थैः| नृ॒वद्वद॒न्नुप॑नोमाहि॒वाजा᳚न्दि॒विश्रवो᳚दधिषे॒नाम॑वी॒रः|| 12|| |
| [100] वनेनेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्यैंद्रोवसुक्रइंद्रस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:29}{अनुवाक:2, सूक्त:13} |
| वने॒नवा॒योन्य॑धायिचा॒कञ्छुचि᳚र्वां॒स्तोमो᳚भुरणावजीगः| यस्येदिन्द्रः॑पुरु॒दिने᳚षु॒होता᳚नृ॒णांनर्यो॒नृत॑मः,क्ष॒पावा॑न्|| 1||वर्ग:22 |
| प्रते᳚अ॒स्या,उ॒षसः॒प्राप॑रस्यानृ॒तौस्या᳚म॒नृत॑मस्यनृ॒णाम्| अनु॑त्रि॒शोकः॑श॒तमाव॑ह॒न्नॄन्कुत्से᳚न॒रथो॒यो,अस॑त्सस॒वान्|| 2|| |
| कस्ते॒मद॑इन्द्र॒रन्त्यो᳚भू॒द्दुरो॒गिरो᳚अ॒भ्यु१॑(उ॒)ग्रोविधा᳚व| कद्वाहो᳚अ॒र्वागुप॑मामनी॒षा,आत्वा᳚शक्यामुप॒मंराधो॒,अन्नैः᳚|| 3|| |
| कदु॑द्यु॒म्नमि᳚न्द्र॒त्वाव॑तो॒नॄन्कया᳚धि॒याक॑रसे॒कन्न॒आग॑न्| मि॒त्रोनस॒त्यउ॑रुगायभृ॒त्या,अन्ने᳚समस्य॒यदस᳚न्मनी॒षाः|| 4|| |
| प्रेर॑य॒सूरो॒,अर्थं॒नपा॒रंये,अ॑स्य॒कामं᳚जनि॒धा,इ॑व॒ग्मन्| गिर॑श्च॒येते᳚तुविजातपू॒र्वीर्नर॑इन्द्रप्रति॒शिक्ष॒न्त्यन्नैः᳚|| 5|| |
| मात्रे॒नुते॒सुमि॑ते,इन्द्रपू॒र्वीद्यौर्म॒ज्मना᳚पृथि॒वीकाव्ये᳚न| वरा᳚यतेघृ॒तव᳚न्तःसु॒तासः॒स्वाद्म᳚न्भवन्तुपी॒तये॒मधू᳚नि|| 6||वर्ग:23 |
| आमध्वो᳚अस्मा,असिच॒न्नम॑त्र॒मिन्द्रा᳚यपू॒र्णंसहिस॒त्यरा᳚धाः| सवा᳚वृधे॒वरि॑म॒न्नापृ॑थि॒व्या,अ॒भिक्रत्वा॒नर्यः॒पौंस्यै᳚श्च|| 7|| |
| व्या᳚न॒ळिन्द्रः॒पृत॑नाः॒स्वोजा॒,आस्मै᳚यतन्तेस॒ख्याय॑पू॒र्वीः| आस्मा॒रथं॒नपृत॑नासुतिष्ठ॒यंभ॒द्रया᳚सुम॒त्याचो॒दया᳚से|| 8|| |
| [101] प्रदेवत्रेति पंचदशर्चस्य सूक्तस्यैलूषः कवषआपस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:30}{अनुवाक:3, सूक्त:1} |
| प्रदे᳚व॒त्राब्रह्म॑णेगा॒तुरे᳚त्व॒पो,अच्छा॒मन॑सो॒नप्रयु॑क्ति| म॒हींमि॒त्रस्य॒वरु॑णस्यधा॒सिंपृ॑थु॒ज्रय॑सेरीरधासुवृ॒क्तिम्|| 1||वर्ग:24 |
| अध्व᳚र्यवोह॒विष्म᳚न्तो॒हिभू॒ताच्छा॒पइ॑तोश॒तीरु॑शन्तः| अव॒याश्चष्टे᳚अरु॒णःसु॑प॒र्णस्तमास्य॑ध्वमू॒र्मिम॒द्यासु॑हस्ताः|| 2|| |
| अध्व᳚र्यवो॒ऽपइ॑तासमु॒द्रम॒पांनपा᳚तंह॒विषा᳚यजध्वम्| सवो᳚दददू॒र्मिम॒द्यासुपू᳚तं॒तस्मै॒सोमं॒मधु॑मन्तंसुनोत|| 3|| |
| यो,अ॑नि॒ध्मोदीद॑यद॒प्स्व१॑(अ॒)न्तर्यंविप्रा᳚स॒ईळ॑ते,अध्व॒रेषु॑| अपां᳚नपा॒न्मधु॑मतीर॒पोदा॒याभि॒रिन्द्रो᳚वावृ॒धेवी॒र्या᳚य|| 4|| |
| याभिः॒सोमो॒मोद॑ते॒हर्ष॑तेचकल्या॒णीभि᳚र्युव॒तिभि॒र्नमर्यः॑| ता,अ॑ध्वर्यो,अ॒पो,अच्छा॒परे᳚हि॒यदा᳚सि॒ञ्चा,ओष॑धीभिःपुनीतात्|| 5|| |
| ए॒वेद्यूने᳚युव॒तयो᳚नमन्त॒यदी᳚मु॒शन्नु॑श॒तीरेत्यच्छ॑| संजा᳚नते॒मन॑सा॒संचि॑कित्रेऽध्व॒र्यवो᳚धि॒षणाप॑श्चदे॒वीः|| 6||वर्ग:25 |
| योवो᳚वृ॒ताभ्यो॒,अकृ॑णोदुलो॒कंयोवो᳚म॒ह्या,अ॒भिश॑स्ते॒रमु᳚ञ्चत्| तस्मा॒,इन्द्रा᳚य॒मधु॑मन्तमू॒र्मिंदे᳚व॒माद॑नं॒प्रहि॑णोतनापः|| 7|| |
| प्रास्मै᳚हिनोत॒मधु॑मन्तमू॒र्मिंगर्भो॒योवः॑सिन्धवो॒मध्व॒उत्सः॑| घृ॒तपृ॑ष्ठ॒मीड्य॑मध्व॒रेष्वापो᳚रेवतीःशृणु॒ताहवं᳚मे|| 8|| |
| तंसि᳚न्धवोमत्स॒रमि᳚न्द्र॒पान॑मू॒र्मिंप्रहे᳚त॒यउ॒भे,इय॑र्ति| म॒द॒च्युत॑मौशा॒नंन॑भो॒जांपरि॑त्रि॒तन्तुं᳚वि॒चर᳚न्त॒मुत्स᳚म्|| 9|| |
| आ॒वर्वृ॑तती॒रध॒नुद्वि॒धारा᳚गोषु॒युधो॒ननि॑य॒वंचर᳚न्तीः| ऋषे॒जनि॑त्री॒र्भुव॑नस्य॒पत्नी᳚र॒पोव᳚न्दस्वस॒वृधः॒सयो᳚नीः|| 10|| |
| हि॒नोता᳚नो,अध्व॒रंदे᳚वय॒ज्याहि॒नोत॒ब्रह्म॑स॒नये॒धना᳚नाम्| ऋ॒तस्य॒योगे॒विष्य॑ध्व॒मूधः॑श्रुष्टी॒वरी᳚र्भूतना॒स्मभ्य॑मापः|| 11||वर्ग:26 |
| आपो᳚रेवतीः॒,क्षय॑था॒हिवस्वः॒क्रतुं᳚चभ॒द्रंबि॑भृ॒थामृतं᳚च| रा॒यश्च॒स्थस्व॑प॒त्यस्य॒पत्नीः॒सर॑स्वती॒तद्गृ॑ण॒तेवयो᳚धात्|| 12|| |
| प्रति॒यदापो॒,अदृ॑श्रमाय॒तीर्घृ॒तंपयां᳚सि॒बिभ्र॑ती॒र्मधू᳚नि| अ॒ध्व॒र्युभि॒र्मन॑सासंविदा॒ना,इन्द्रा᳚य॒सोमं॒सुषु॑तं॒भर᳚न्तीः|| 13|| |
| एमा,अ॑ग्मन्रे॒वती᳚र्जी॒वध᳚न्या॒,अध्व᳚र्यवःसा॒दय॑तासखायः| निब॒र्हिषि॑धत्तनसोम्यासो॒ऽपांनप्त्रा᳚संविदा॒नास॑एनाः|| 14|| |
| आग्म॒न्नाप॑उश॒तीर्ब॒र्हिरेदंन्य॑ध्व॒रे,अ॑सदन्देव॒यन्तीः᳚| अध्व᳚र्यवःसुनु॒तेन्द्रा᳚य॒सोम॒मभू᳚दुवःसु॒शका᳚देवय॒ज्या|| 15|| |
| [102] आनोदेवानामित्येकादशर्चस्य सूक्तस्यैलूषःकवषो विश्वेदेवात्रिष्टुप् (भेदपक्षे- विश्वेदेवाः ९ अश्वत्थगर्भाशमी १ उषोग्नी १ एवं ११) |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:31}{अनुवाक:3, सूक्त:2} |
| आनो᳚दे॒वाना॒मुप॑वेतु॒शंसो॒विश्वे᳚भिस्तु॒रैरव॑से॒यज॑त्रः| तेभि᳚र्व॒यंसु॑ष॒खायो᳚भवेम॒तर᳚न्तो॒विश्वा᳚दुरि॒तास्या᳚म|| 1||वर्ग:27 |
| परि॑चि॒न्मर्तो॒द्रवि॑णंममन्यादृ॒तस्य॑प॒थानम॒सावि॑वासेत्| उ॒तस्वेन॒क्रतु॑ना॒संव॑देत॒श्रेयां᳚सं॒दक्षं॒मन॑साजगृभ्यात्|| 2|| |
| अधा᳚यिधी॒तिरस॑सृग्र॒मंशा᳚स्ती॒र्थेनद॒स्ममुप॑य॒न्त्यूमाः᳚| अ॒भ्या᳚नश्मसुवि॒तस्य॑शू॒षंनवे᳚दसो,अ॒मृता᳚नामभूम|| 3|| |
| नित्य॑श्चाकन्या॒त्स्वप॑ति॒र्दमू᳚ना॒यस्मा᳚उदे॒वःस॑वि॒ताज॒जान॑| भगो᳚वा॒गोभि॑रर्य॒मेम॑नज्या॒त्सो,अ॑स्मै॒चारु॑श्छदयदु॒तस्या᳚त्|| 4|| |
| इ॒यंसाभू᳚या,उ॒षसा᳚मिव॒क्षायद्ध॑क्षु॒मन्तः॒शव॑सास॒माय॑न्| अ॒स्यस्तु॒तिंज॑रि॒तुर्भिक्ष॑माणा॒,आनः॑श॒ग्मास॒उप॑यन्तु॒वाजाः᳚|| 5|| |
| अ॒स्येदे॒षासु॑म॒तिःप॑प्रथा॒नाभ॑वत्पू॒र्व्याभूम॑ना॒गौः| अ॒स्यसनी᳚ळा॒,असु॑रस्य॒योनौ᳚समा॒नआभर॑णे॒बिभ्र॑माणाः|| 6||वर्ग:28 |
| किंस्वि॒द्वनं॒कउ॒सवृ॒क्षआ᳚स॒यतो॒द्यावा᳚पृथि॒वीनि॑ष्टत॒क्षुः| सं॒त॒स्था॒ने,अ॒जरे᳚इ॒तऊ᳚ती॒,अहा᳚निपू॒र्वीरु॒षसो᳚जरन्त|| 7|| |
| नैताव॑दे॒नाप॒रो,अ॒न्यद॑स्त्यु॒क्षासद्यावा᳚पृथि॒वीबि॑भर्ति| त्वचं᳚प॒वित्रं᳚कृणुतस्व॒धावा॒न्यदीं॒सूर्यं॒नह॒रितो॒वह᳚न्ति|| 8|| |
| स्ते॒गोनक्षामत्ये᳚तिपृ॒थ्वींमिहं॒नवातो॒विह॑वाति॒भूम॑| मि॒त्रोयत्र॒वरु॑णो,अ॒ज्यमा᳚नो॒ऽग्निर्वने॒नव्यसृ॑ष्ट॒शोक᳚म्|| 9|| |
| स्त॒रीर्यत्सूत॑स॒द्यो,अ॒ज्यमा᳚ना॒व्यथि॑रव्य॒थीःकृ॑णुत॒स्वगो᳚पा| पु॒त्रोयत्पूर्वः॑पि॒त्रोर्जनि॑ष्टश॒म्यांगौर्ज॑गार॒यद्ध॑पृ॒च्छान्|| 10|| |
| उ॒तकण्वं᳚नृ॒षदः॑पु॒त्रमा᳚हुरु॒तश्या॒वोधन॒माद॑त्तवा॒जी| प्रकृ॒ष्णाय॒रुश॑दपिन्व॒तोध᳚रृ॒तमत्र॒नकि॑रस्मा,अपीपेत्|| 11|| |
| [103] प्रसुग्मंतेति नवर्चस्य सूक्तस्यैलूषः कवषइंद्रोजगती अंत्याश्चतस्रस्त्रिष्टुभः |{अष्टक:7, अध्याय:7}{मंडल:10, सूक्त:32}{अनुवाक:3, सूक्त:3} |
| प्रसुग्मन्ता᳚धियसा॒नस्य॑स॒क्षणि॑व॒रेभि᳚र्व॒राँ,अ॒भिषुप्र॒सीद॑तः| अ॒स्माक॒मिन्द्र॑उ॒भयं᳚जुजोषति॒यत्सो॒म्यस्यान्ध॑सो॒बुबो᳚धति|| 1||वर्ग:29 |
| वी᳚न्द्रयासिदि॒व्यानि॑रोच॒नाविपार्थि॑वानि॒रज॑सापुरुष्टुत| येत्वा॒वह᳚न्ति॒मुहु॑रध्व॒राँ,उप॒तेसुव᳚न्वन्तुवग्व॒नाँ,अ॑रा॒धसः॑|| 2|| |
| तदिन्मे᳚छन्त्स॒द्वपु॑षो॒वपु॑ष्टरंपु॒त्रोयज्जानं᳚पि॒त्रोर॒धीय॑ति| जा॒यापतिं᳚वहतिव॒ग्नुना᳚सु॒मत्पुं॒सइद्भ॒द्रोव॑ह॒तुःपरि॑ष्कृतः|| 3|| |
| तदित्स॒धस्थ॑म॒भिचारु॑दीधय॒गावो॒यच्छास᳚न्वह॒तुंनधे॒नवः॑| मा॒तायन्मन्तु᳚र्यू॒थस्य॑पू॒र्व्याभिवा॒णस्य॑स॒प्तधा᳚तु॒रिज्जनः॑|| 4|| |
| प्रवोऽच्छा᳚रिरिचेदेव॒युष्प॒दमेको᳚रु॒द्रेभि᳚र्यातितु॒र्वणिः॑| ज॒रावा॒येष्व॒मृते᳚षुदा॒वने॒परि॑व॒ऊमे᳚भ्यःसिञ्चता॒मधु॑|| 5|| |
| नि॒धी॒यमा᳚न॒मप॑गूळ्हम॒प्सुप्रमे᳚दे॒वानां᳚व्रत॒पा,उ॑वाच| इन्द्रो᳚वि॒द्वाँ,अनु॒हित्वा᳚च॒चक्ष॒तेना॒हम॑ग्ने॒,अनु॑शिष्ट॒आगा᳚म्|| 6||वर्ग:30 |
| अक्षे᳚त्रवित्क्षेत्र॒विदं॒ह्यप्रा॒ट्सप्रैति॑क्षेत्र॒विदानु॑शिष्टः| ए॒तद्वैभ॒द्रम॑नु॒शास॑नस्यो॒तस्रु॒तिंवि᳚न्दत्यञ्ज॒सीना᳚म्|| 7|| |
| अ॒द्येदु॒प्राणी॒दम॑मन्नि॒माहापी᳚वृतो,अधयन्मा॒तुरूधः॑| एमे᳚नमापजरि॒मायुवा᳚न॒महे᳚ळ॒न्वसुः॑सु॒मना᳚बभूव|| 8|| |
| ए॒तानि॑भ॒द्राक॑लशक्रियाम॒कुरु॑श्रवण॒दद॑तोम॒घानि॑| दा॒नइद्वो᳚मघवानः॒सो,अ॑स्त्व॒यंच॒सोमो᳚हृ॒दियंबिभ᳚र्मि|| 9|| |
| [104] प्रमायुयुज्रइति नवर्चस्य सूक्तस्यैलूषःकवषऋषिः आद्याया विश्वेदेवाः ततोद्वयोरिंद्रः चतुर्थीपंचम्योः कुरुश्रवणः षष्ठ्यदादिचतसृणामुपश्र वा आद्यात्रिष्टुप् द्वितीयाबृहती तृतीया सतोबृहती शेषाः षड्गायत्र्यः |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:33}{अनुवाक:3, सूक्त:4} |
| प्रमा᳚युयुज्रेप्र॒युजो॒जना᳚नां॒वहा᳚मिस्मपू॒षण॒मन्त॑रेण| विश्वे᳚दे॒वासो॒,अध॒माम॑रक्षन्दुः॒शासु॒रागा॒दिति॒घोष॑आसीत्|| 1||वर्ग:1 |
| संमा᳚तपन्त्य॒भितः॑स॒पत्नी᳚रिव॒पर्श॑वः| निबा᳚धते॒,अम॑तिर्न॒ग्नता॒जसु॒र्वेर्नवे᳚वीयतेम॒तिः|| 2|| |
| मूषो॒नशि॒श्नाव्य॑दन्तिमा॒ध्यः॑स्तो॒तारं᳚तेशतक्रतो| स॒कृत्सुनो᳚मघवन्निन्द्रमृळ॒याधा᳚पि॒तेव॑नोभव|| 3|| |
| कु॒रु॒श्रव॑णमावृणि॒राजा᳚नं॒त्रास॑दस्यवम्|मंहि॑ष्ठंवा॒घता॒मृषिः॑|| 4|| |
| यस्य॑माह॒रितो॒रथे᳚ति॒स्रोवह᳚न्तिसाधु॒या|स्तवै᳚स॒हस्र॑दक्षिणे|| 5|| |
| यस्य॒प्रस्वा᳚दसो॒गिर॑उप॒मश्र॑वसःपि॒तुः|क्षेत्रं॒नर॒ण्वमू॒चुषे᳚|| 6||वर्ग:2 |
| अधि॑पुत्रोपमश्रवो॒नपा᳚न्मित्रातिथेरिहि|पि॒तुष्टे᳚अस्मिवन्दि॒ता|| 7|| |
| यदीशी᳚या॒मृता᳚नामु॒तवा॒मर्त्या᳚नाम्|जीवे॒दिन्म॒घवा॒मम॑|| 8|| |
| नदे॒वाना॒मति᳚व्र॒तंश॒तात्मा᳚च॒नजी᳚वति|तथा᳚यु॒जाविवा᳚वृते|| 9|| |
| [105] प्रावेपाइति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य मौजवानक्ष ऋषिः आद्या सप्तमी नवमीद्वादशीनामक्षादेवताः त्रयोदश्याः कृषिः शिष्टानामक्षनिंदा देवता त्रिष्टुप् सप्तमी जगती |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:34}{अनुवाक:3, सूक्त:5} |
| प्रा॒वे॒पामा᳚बृह॒तोमा᳚दयन्तिप्रवाते॒जा,इरि॑णे॒वर्वृ॑तानाः| सोम॑स्येवमौजव॒तस्य॑भ॒क्षोवि॒भीद॑को॒जागृ॑वि॒र्मह्य॑मच्छान्|| 1||वर्ग:3 |
| नमा᳚मिमेथ॒नजि॑हीळए॒षाशि॒वासखि॑भ्यउ॒तमह्य॑मासीत्| अ॒क्षस्या॒हमे᳚कप॒रस्य॑हे॒तोरनु᳚व्रता॒मप॑जा॒याम॑रोधम्|| 2|| |
| द्वेष्टि॑श्व॒श्रूरप॑जा॒यारु॑णद्धि॒नना᳚थि॒तोवि᳚न्दतेमर्डि॒तार᳚म्| अश्व॑स्येव॒जर॑तो॒वस्न्य॑स्य॒नाहंवि᳚न्दामिकित॒वस्य॒भोग᳚म्|| 3|| |
| अ॒न्येजा॒यांपरि॑मृशन्त्यस्य॒यस्यागृ॑ध॒द्वेद॑नेवा॒ज्य१॑(अ॒)क्षः| पि॒तामा॒ताभ्रात॑रएनमाहु॒र्नजा᳚नीमो॒नय॑ताब॒द्धमे॒तम्|| 4|| |
| यदा॒दीध्ये॒नद॑विषाण्येभिःपरा॒यद्भ्योऽव॑हीये॒सखि॑भ्यः| न्यु॑प्ताश्चब॒भ्रवो॒वाच॒मक्र॑तँ॒,एमीदे᳚षांनिष्कृ॒तंजा॒रिणी᳚व|| 5|| |
| स॒भामे᳚तिकित॒वःपृ॒च्छमा᳚नोजे॒ष्यामीति॑त॒न्वा॒३॑(आ॒)शूशु॑जानः| अ॒क्षासो᳚अस्य॒विति॑रन्ति॒कामं᳚प्रति॒दीव्ने॒दध॑त॒आकृ॒तानि॑|| 6||वर्ग:4 |
| अ॒क्षास॒इद᳚ङ्कु॒शिनो᳚नितो॒दिनो᳚नि॒कृत्वा᳚न॒स्तप॑नास्तापयि॒ष्णवः॑| कु॒मा॒रदे᳚ष्णा॒जय॑तःपुन॒र्हणो॒मध्वा॒सम्पृ॑क्ताःकित॒वस्य॑ब॒र्हणा᳚|| 7|| |
| त्रि॒प॒ञ्चा॒शःक्री᳚ळति॒व्रात॑एषांदे॒वइ॑वसवि॒तास॒त्यध᳚र्मा| उ॒ग्रस्य॑चिन्म॒न्यवे॒नान॑मन्ते॒राजा᳚चिदेभ्यो॒नम॒इत्कृ॑णोति|| 8|| |
| नी॒चाव॑र्तन्तउ॒परि॑स्फुरन्त्यह॒स्तासो॒हस्त॑वन्तंसहन्ते| दि॒व्या,अङ्गा᳚रा॒,इरि॑णे॒न्यु॑प्ताःशी॒ताःसन्तो॒हृद॑यं॒निर्द॑हन्ति|| 9|| |
| जा॒यात॑प्यतेकित॒वस्य॑ही॒नामा॒तापु॒त्रस्य॒चर॑तः॒क्व॑स्वित्| ऋ॒णा॒वाबिभ्य॒द्धन॑मि॒च्छमा᳚नो॒ऽन्येषा॒मस्त॒मुप॒नक्त॑मेति|| 10|| |
| स्त्रियं᳚दृ॒ष्ट्वाय॑कित॒वंत॑तापा॒न्येषां᳚जा॒यांसुकृ॑तंच॒योनि᳚म्| पू॒र्वा॒ह्णे,अश्वा᳚न्युयु॒जेहिब॒भ्रून्त्सो,अ॒ग्नेरन्ते᳚वृष॒लःप॑पाद|| 11||वर्ग:5 |
| योवः॑सेना॒नीर्म॑ह॒तोग॒णस्य॒राजा॒व्रात॑स्यप्रथ॒मोब॒भूव॑| तस्मै᳚कृणोमि॒नधना᳚रुणध्मि॒दशा॒हंप्राची॒स्तदृ॒तंव॑दामि|| 12|| |
| अ॒क्षैर्मादी᳚व्यःकृ॒षिमित्कृ॑षस्ववि॒त्तेर॑मस्वब॒हुमन्य॑मानः| तत्र॒गावः॑कितव॒तत्र॑जा॒यातन्मे॒विच॑ष्टेसवि॒तायम॒र्यः|| 13|| |
| मि॒त्रंकृ॑णुध्वं॒खलु॑मृ॒ळता᳚नो॒मानो᳚घो॒रेण॑चरता॒भिधृ॒ष्णु| निवो॒नुम॒न्युर्वि॑शता॒मरा᳚तिर॒न्योब॑भ्रू॒णांप्रसि॑तौ॒न्व॑स्तु|| 14|| |
| [106] अबुध्रमिति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य धानाकोलुशोविश्वेदेवाजगत्यंत्येद्वेत्रिष्टुभौ (भेद - विश्वेदेवाः ३ उषसोग्निः २ विश्वेदेवाः ९ एवं १४) |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:35}{अनुवाक:3, सूक्त:6} |
| अबु॑ध्रमु॒त्यइन्द्र॑वन्तो,अ॒ग्नयो॒ज्योति॒र्भर᳚न्तउ॒षसो॒व्यु॑ष्टिषु| म॒हीद्यावा᳚पृथि॒वीचे᳚तता॒मपो॒ऽद्यादे॒वाना॒मव॒आवृ॑णीमहे|| 1||वर्ग:6 |
| दि॒वस्पृ॑थि॒व्योरव॒आवृ॑णीमहेमा॒तॄन्त्सिन्धू॒न्पर्व॑ताञ्छर्य॒णाव॑तः| अ॒ना॒गा॒स्त्वंसूर्य॑मु॒षास॑मीमहेभ॒द्रंसोमः॑सुवा॒नो,अ॒द्याकृ॑णोतुनः|| 2|| |
| द्यावा᳚नो,अ॒द्यपृ॑थि॒वी,अना᳚गसोम॒हीत्रा᳚येतांसुवि॒ताय॑मा॒तरा᳚| उ॒षा,उ॒च्छन्त्यप॑बाधताम॒घंस्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 3|| |
| इ॒यंन॑उ॒स्राप्र॑थ॒मासु॑दे॒व्यं᳚रे॒वत्स॒निभ्यो᳚रे॒वती॒व्यु॑च्छतु| आ॒रेम॒न्युंदु᳚र्वि॒दत्र॑स्यधीमहिस्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 4|| |
| प्रयाःसिस्र॑ते॒सूर्य॑स्यर॒श्मिभि॒र्ज्योति॒र्भर᳚न्तीरु॒षसो॒व्यु॑ष्टिषु| भ॒द्रानो᳚अ॒द्यश्रव॑से॒व्यु॑च्छतस्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 5|| |
| अ॒न॒मी॒वा,उ॒षस॒आच॑रन्तुन॒उद॒ग्नयो᳚जिहतां॒ज्योति॑षाबृ॒हत्| आयु॑क्षाताम॒श्विना॒तूतु॑जिं॒रथं᳚स्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 6||वर्ग:7 |
| श्रेष्ठं᳚नो,अ॒द्यस॑वित॒र्वरे᳚ण्यंभा॒गमासु॑व॒सहिर॑त्न॒धा,असि॑| रा॒योजनि॑त्रींधि॒षणा॒मुप॑ब्रुवेस्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 7|| |
| पिप॑र्तुमा॒तदृ॒तस्य॑प्र॒वाच॑नंदे॒वानां॒यन्म॑नु॒ष्या॒३॑(आ॒)अम᳚न्महि| विश्वा॒,इदु॒स्राःस्पळुदे᳚ति॒सूर्यः॑स्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 8|| |
| अ॒द्वे॒षो,अ॒द्यब॒र्हिषः॒स्तरी᳚मणि॒ग्राव्णां॒योगे॒मन्म॑नः॒साध॑ईमहे| आ॒दि॒त्यानां॒शर्म॑णि॒स्थाभु॑रण्यसिस्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 9|| |
| आनो᳚ब॒र्हिःस॑ध॒मादे᳚बृ॒हद्दि॒विदे॒वाँ,ई᳚ळेसा॒दया᳚स॒प्तहोतॄ॑न्| इन्द्रं᳚मि॒त्रंवरु॑णंसा॒तये॒भगं᳚स्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 10|| |
| तआ᳚दित्या॒,आग॑तास॒र्वता᳚तयेवृ॒धेनो᳚य॒ज्ञम॑वतासजोषसः| बृह॒स्पतिं᳚पू॒षण॑म॒श्विना॒भगं᳚स्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 11||वर्ग:8 |
| तन्नो᳚देवायच्छतसुप्रवाच॒नंछ॒र्दिरा᳚दित्याःसु॒भरं᳚नृ॒पाय्य᳚म्| पश्वे᳚तो॒काय॒तन॑यायजी॒वसे᳚स्व॒स्त्य१॑(अ॒)ग्निंस॑मिधा॒नमी᳚महे|| 12|| |
| विश्वे᳚अ॒द्यम॒रुतो॒विश्व॑ऊ॒तीविश्वे᳚भवन्त्व॒ग्नयः॒समि॑द्धाः| विश्वे᳚नोदे॒वा,अव॒साग॑मन्तु॒विश्व॑मस्तु॒द्रवि॑णं॒वाजो᳚अ॒स्मे|| 13|| |
| यंदे᳚वा॒सोऽव॑थ॒वाज॑सातौ॒यंत्राय॑ध्वे॒यंपि॑पृ॒थात्यंहः॑| योवो᳚गोपी॒थेनभ॒यस्य॒वेद॒तेस्या᳚मदे॒ववी᳚तयेतुरासः|| 14|| |
| [107] उषासानक्तेति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य धानाकोलुशोविश्वेदेवाजगत्यंत्येद्वे त्रिष्टुभौ (भेदपक्षे - विश्वेदेवाः १३ सविता १ एवं १४) |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:36}{अनुवाक:3, सूक्त:7} |
| उ॒षासा॒नक्ता᳚बृह॒तीसु॒पेश॑सा॒द्यावा॒क्षामा॒वरु॑णोमि॒त्रो,अ᳚र्य॒मा| इन्द्रं᳚हुवेम॒रुतः॒पर्व॑ताँ,अ॒पआ᳚दि॒त्यान्द्यावा᳚पृथि॒वी,अ॒पःस्वः॑|| 1||वर्ग:9 |
| द्यौश्च॑नःपृथि॒वीच॒प्रचे᳚तसऋ॒ताव॑रीरक्षता॒मंह॑सोरि॒षः| मादु᳚र्वि॒दत्रा॒निरृ॑तिर्नईशत॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 2|| |
| विश्व॑स्मान्नो॒,अदि॑तिःपा॒त्वंह॑सोमा॒तामि॒त्रस्य॒वरु॑णस्यरे॒वतः॑| स्व᳚र्व॒ज्ज्योति॑रवृ॒कंन॑शीमहि॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 3|| |
| ग्रावा॒वद॒न्नप॒रक्षां᳚सिसेधतुदु॒ष्ष्वप्न्यं॒निरृ॑तिं॒विश्व॑म॒त्रिण᳚म्| आ॒दि॒त्यंशर्म॑म॒रुता᳚मशीमहि॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 4|| |
| एन्द्रो᳚ब॒र्हिःसीद॑तु॒पिन्व॑ता॒मिळा॒बृह॒स्पतिः॒साम॑भिरृ॒क्वो,अ॑र्चतु| सु॒प्र॒के॒तंजी॒वसे॒मन्म॑धीमहि॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 5|| |
| दि॒वि॒स्पृशं᳚य॒ज्ञम॒स्माक॑मश्विनाजी॒राध्व॑रंकृणुतंसु॒म्नमि॒ष्टये᳚| प्रा॒चीन॑रश्मि॒माहु॑तंघृ॒तेन॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 6||वर्ग:10 |
| उप॑ह्वयेसु॒हवं॒मारु॑तंग॒णंपा᳚व॒कमृ॒ष्वंस॒ख्याय॑श॒म्भुव᳚म्| रा॒यस्पोषं᳚सौश्रव॒साय॑धीमहि॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 7|| |
| अ॒पांपेरुं᳚जी॒वध᳚न्यंभरामहेदेवा॒व्यं᳚सु॒हव॑मध्वर॒श्रिय᳚म्| सु॒र॒श्मिंसोम॑मिन्द्रि॒यंय॑मीमहि॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 8|| |
| स॒नेम॒तत्सु॑स॒निता᳚स॒नित्व॑भिर्व॒यंजी॒वाजी॒वपु॑त्रा॒,अना᳚गसः| ब्र॒ह्म॒द्विषो॒विष्व॒गेनो᳚भरेरत॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 9|| |
| येस्थामनो᳚र्य॒ज्ञिया॒स्तेशृ॑णोतन॒यद्वो᳚देवा॒,ईम॑हे॒तद्द॑दातन| जैत्रं॒क्रतुं᳚रयि॒मद्वी॒रव॒द्यश॒स्तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 10|| |
| म॒हद॒द्यम॑ह॒तामावृ॑णीम॒हेऽवो᳚दे॒वानां᳚बृह॒ताम॑न॒र्वणा᳚म्| यथा॒वसु॑वी॒रजा᳚तं॒नशा᳚महै॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 11||वर्ग:11 |
| म॒हो,अ॒ग्नेःस॑मिधा॒नस्य॒शर्म॒ण्यना᳚गामि॒त्रेवरु॑णेस्व॒स्तये᳚| श्रेष्ठे᳚स्यामसवि॒तुःसवी᳚मनि॒तद्दे॒वाना॒मवो᳚अ॒द्यावृ॑णीमहे|| 12|| |
| येस॑वि॒तुःस॒त्यस॑वस्य॒विश्वे᳚मि॒त्रस्य᳚व्र॒तेवरु॑णस्यदे॒वाः| तेसौभ॑गंवी॒रव॒द्गोम॒दप्नो॒दधा᳚तन॒द्रवि॑णंचि॒त्रम॒स्मे|| 13|| |
| स॒वि॒ताप॒श्चाता᳚त्सवि॒तापु॒रस्ता᳚त्सवि॒तोत्त॒रात्ता᳚त्सवि॒ताध॒रात्ता᳚त्| स॒वि॒तानः॑सुवतुस॒र्वता᳚तिंसवि॒तानो᳚रासतांदी॒र्घमायुः॑|| 14|| |
| [108] नमोमित्रस्येति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य सौर्योभितपाः सूर्योजगती दशमी त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:37}{अनुवाक:3, सूक्त:8} |
| नमो᳚मि॒त्रस्य॒वरु॑णस्य॒चक्ष॑से¦म॒होदे॒वाय॒तदृ॒तंस॑पर्यत| दू॒रे॒दृशे᳚दे॒वजा᳚तायके॒तवे᳚¦दि॒वस्पु॒त्राय॒सूर्या᳚यशंसत|| 1||वर्ग:12 |
| सामा᳚स॒त्योक्तिः॒परि॑पातुवि॒श्वतो॒¦द्यावा᳚च॒यत्र॑त॒तन॒न्नहा᳚निच| विश्व॑म॒न्यन्निवि॑शते॒यदेज॑ति¦वि॒श्वाहापो᳚वि॒श्वाहोदे᳚ति॒सूर्यः॑|| 2|| |
| नते॒,अदे᳚वःप्र॒दिवो॒निवा᳚सते॒¦यदे᳚त॒शेभिः॑पत॒रैर॑थ॒र्यसि॑| प्रा॒चीन॑म॒न्यदनु॑वर्तते॒रज॒¦उद॒न्येन॒ज्योति॑षायासिसूर्य|| 3|| |
| येन॑सूर्य॒ज्योति॑षा॒बाध॑से॒तमो॒¦जग॑च्च॒विश्व॑मुदि॒यर्षि॑भा॒नुना᳚| तेना॒स्मद्विश्वा॒मनि॑रा॒मना᳚हुति॒¦मपामी᳚वा॒मप॑दु॒ष्ष्वप्न्यं᳚सुव|| 4|| |
| विश्व॑स्य॒हिप्रेषि॑तो॒रक्ष॑सिव्र॒त¦महे᳚ळयन्नु॒च्चर॑सिस्व॒धा,अनु॑| यद॒द्यत्वा᳚सूर्योप॒ब्रवा᳚महै॒¦तंनो᳚दे॒वा,अनु॑मंसीरत॒क्रतु᳚म्|| 5|| |
| तंनो॒द्यावा᳚पृथि॒वीतन्न॒आप॒¦इन्द्रः॑शृण्वन्तुम॒रुतो॒हवं॒वचः॑| माशूने᳚भूम॒सूर्य॑स्यसं॒दृशि॑¦भ॒द्रंजीव᳚न्तोजर॒णाम॑शीमहि|| 6|| |
| वि॒श्वाहा᳚त्वासु॒मन॑सःसु॒चक्ष॑सः¦प्र॒जाव᳚न्तो,अनमी॒वा,अना᳚गसः| उ॒द्यन्तं᳚त्वामित्रमहोदि॒वेदि॑वे॒¦ज्योग्जी॒वाःप्रति॑पश्येमसूर्य|| 7||वर्ग:13 |
| महि॒ज्योति॒र्बिभ्र॑तंत्वाविचक्षण॒¦भास्व᳚न्तं॒चक्षु॑षेचक्षुषे॒मयः॑| आ॒रोह᳚न्तंबृह॒तःपाज॑स॒स्परि॑¦व॒यंजी॒वाःप्रति॑पश्येमसूर्य|| 8|| |
| यस्य॑ते॒विश्वा॒भुव॑नानिके॒तुना॒¦प्रचेर॑ते॒निच॑वि॒शन्ते᳚अ॒क्तुभिः॑| अ॒ना॒गा॒स्त्वेन॑हरिकेशसू॒र्या¦ह्ना᳚ह्नानो॒वस्य॑सावस्य॒सोदि॑हि|| 9|| |
| शंनो᳚भव॒चक्ष॑सा॒शंनो॒,अह्ना॒¦शंभा॒नुना॒शंहि॒माशंघृ॒णेन॑| यथा॒शमध्व॒ञ्छमस॑द्दुरो॒णे¦तत्सू᳚र्य॒द्रवि॑णंधेहिचि॒त्रम्|| 10|| |
| अ॒स्माकं᳚देवा,उ॒भया᳚य॒जन्म॑ने॒¦शर्म॑यच्छतद्वि॒पदे॒चतु॑ष्पदे| अ॒दत्पिब॑दू॒र्जय॑मान॒माशि॑तं॒¦तद॒स्मेशंयोर॑र॒पोद॑धातन|| 11|| |
| यद्वो᳚देवाश्चकृ॒मजि॒ह्वया᳚गु॒रु¦मन॑सोवा॒प्रयु॑तीदेव॒हेळ॑नम्| अरा᳚वा॒योनो᳚अ॒भिदु॑च्छुना॒यते॒¦तस्मि॒न्तदेनो᳚वसवो॒निधे᳚तन|| 12|| |
| [109] अस्मिन्नइति पंचर्चस्य सूक्तस्य मुष्कवानिंद्रइंद्रोजगती |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:38}{अनुवाक:3, सूक्त:9} |
| अ॒स्मिन्न॑इन्द्रपृत्सु॒तौयश॑स्वति॒शिमी᳚वति॒क्रन्द॑सि॒प्राव॑सा॒तये᳚| यत्र॒गोषा᳚ताधृषि॒तेषु॑खा॒दिषु॒विष्व॒क्पत᳚न्तिदि॒द्यवो᳚नृ॒षाह्ये᳚|| 1||वर्ग:14 |
| सनः॑,क्षु॒मन्तं॒सद॑ने॒व्यू᳚र्णुहि॒गो,अ᳚र्णसंर॒यिमि᳚न्द्रश्र॒वाय्य᳚म्| स्याम॑ते॒जय॑तःशक्रमे॒दिनो॒यथा᳚व॒यमु॒श्मसि॒तद्व॑सोकृधि|| 2|| |
| योनो॒दास॒आर्यो᳚वापुरुष्टु॒तादे᳚वइन्द्रयु॒धये॒चिके᳚तति| अ॒स्माभि॑ष्टेसु॒षहाः᳚सन्तु॒शत्र॑व॒स्त्वया᳚व॒यंतान्व॑नुयामसंग॒मे|| 3|| |
| योद॒भ्रेभि॒र्हव्यो॒यश्च॒भूरि॑भि॒र्यो,अ॒भीके᳚वरिवो॒विन्नृ॒षाह्ये᳚| तंवि॑खा॒देसस्नि॑म॒द्यश्रु॒तंनर॑म॒र्वाञ्च॒मिन्द्र॒मव॑सेकरामहे|| 4|| |
| स्व॒वृजं॒हित्वाम॒हमि᳚न्द्रशु॒श्रवा᳚नानु॒दंवृ॑षभरध्र॒चोद॑नम्| प्रमु᳚ञ्चस्व॒परि॒कुत्सा᳚दि॒हाग॑हि॒किमु॒त्वावा᳚न्मु॒ष्कयो᳚र्ब॒द्धआ᳚सते|| 5|| |
| [110] योवामिति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य काक्षीवतीघोषाश्विनौ जगत्यंत्यात्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:39}{अनुवाक:3, सूक्त:10} |
| योवां॒परि॑ज्मासु॒वृद॑श्विना॒रथो᳚दो॒षामु॒षासो॒हव्यो᳚ह॒विष्म॑ता| श॒श्व॒त्त॒मास॒स्तमु॑वामि॒दंव॒यंपि॒तुर्ननाम॑सु॒हवं᳚हवामहे|| 1||वर्ग:15 |
| चो॒दय॑तंसू॒नृताः॒पिन्व॑तं॒धिय॒उत्पुरं᳚धीरीरयतं॒तदु॑श्मसि| य॒शसं᳚भा॒गंकृ॑णुतंनो,अश्विना॒सोमं॒नचारुं᳚म॒घव॑त्सुनस्कृतम्|| 2|| |
| अ॒मा॒जुर॑श्चिद्भवथोयु॒वंभगो᳚ऽना॒शोश्चि॑दवि॒तारा᳚प॒मस्य॑चित्| अ॒न्धस्य॑चिन्नासत्याकृ॒शस्य॑चिद्यु॒वामिदा᳚हुर्भि॒षजा᳚रु॒तस्य॑चित्|| 3|| |
| यु॒वंच्यवा᳚नंस॒नयं॒यथा॒रथं॒पुन॒र्युवा᳚नंच॒रथा᳚यतक्षथुः| निष्टौ॒ग्र्यमू᳚हथुर॒द्भ्यस्परि॒विश्वेत्तावां॒सव॑नेषुप्र॒वाच्या᳚|| 4|| |
| पु॒रा॒णावां᳚वी॒र्या॒३॑(आ॒)प्रब्र॑वा॒जनेऽथो᳚हासथुर्भि॒षजा᳚मयो॒भुवा᳚| तावां॒नुनव्या॒वव॑सेकरामहे॒ऽयंना᳚सत्या॒श्रद॒रिर्यथा॒दध॑त्|| 5|| |
| इ॒यंवा᳚मह्वेशृणु॒तंमे᳚अश्विनापु॒त्राये᳚वपि॒तरा॒मह्यं᳚शिक्षतम्| अना᳚पि॒रज्ञा᳚असजा॒त्याम॑तिःपु॒रातस्या᳚अ॒भिश॑स्ते॒रव॑स्पृतम्|| 6||वर्ग:16 |
| यु॒वंरथे᳚नविम॒दाय॑शु॒न्ध्युवं॒न्यू᳚हथुःपुरुमि॒त्रस्य॒योष॑णाम्| यु॒वंहवं᳚वध्रिम॒त्या,अ॑गच्छतंयु॒वंसुषु॑तिंचक्रथुः॒पुरं᳚धये|| 7|| |
| यु॒वंविप्र॑स्यजर॒णामु॑पे॒युषः॒पुनः॑क॒लेर॑कृणुतं॒युव॒द्वयः॑| यु॒वंवन्द॑नमृश्य॒दादुदू᳚पथुर्यु॒वंस॒द्योवि॒श्पला॒मेत॑वेकृथः|| 8|| |
| यु॒वंह॑रे॒भंवृ॑षणा॒गुहा᳚हि॒तमुदै᳚रयतंममृ॒वांस॑मश्विना| यु॒वमृ॒बीस॑मु॒तत॒प्तमत्र॑य॒ओम᳚न्वन्तंचक्रथुःस॒प्तव॑ध्रये|| 9|| |
| यु॒वंश्वे॒तंपे॒दवे᳚ऽश्वि॒नाश्वं᳚न॒वभि॒र्वाजै᳚र्नव॒तीच॑वा॒जिन᳚म्| च॒र्कृत्यं᳚ददथुर्द्राव॒यत्स॑खं॒भगं॒ननृभ्यो॒हव्यं᳚मयो॒भुव᳚म्|| 10|| |
| नतंरा᳚जानावदिते॒कुत॑श्च॒ननांहो᳚अश्नोतिदुरि॒तंनकि॑र्भ॒यम्| यम॑श्विनासुहवारुद्रवर्तनीपुरोर॒थंकृ॑णु॒थःपत्न्या᳚स॒ह|| 11||वर्ग:17 |
| आतेन॑यातं॒मन॑सो॒जवी᳚यसा॒रथं॒यंवा᳚मृ॒भव॑श्च॒क्रुर॑श्विना| यस्य॒योगे᳚दुहि॒ताजाय॑तेदि॒वउ॒भे,अह॑नीसु॒दिने᳚वि॒वस्व॑तः|| 12|| |
| ताव॒र्तिर्या᳚तंज॒युषा॒विपर्व॑त॒मपि᳚न्वतंश॒यवे᳚धे॒नुम॑श्विना| वृक॑स्यचि॒द्वर्ति॑काम॒न्तरा॒स्या᳚द्यु॒वंशची᳚भिर्ग्रसि॒ताम॑मुञ्चतम्|| 13|| |
| ए॒तंवां॒स्तोम॑मश्विनावक॒र्मात॑क्षाम॒भृग॑वो॒नरथ᳚म्| न्य॑मृक्षाम॒योष॑णां॒नमर्ये॒नित्यं॒नसू॒नुंतन॑यं॒दधा᳚नाः|| 14|| |
| [111] रथंयांतमिति चतुर्दशर्चस्य सूक्तस्य काक्षीवतीघोषाश्विनौजगती |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:40}{अनुवाक:3, सूक्त:11} |
| रथं॒यान्तं॒कुह॒कोह॑वांनरा॒प्रति॑द्यु॒मन्तं᳚सुवि॒ताय॑भूषति| प्रा॒त॒र्यावा᳚णंवि॒भ्वं᳚वि॒शेवि॑शे॒वस्तो᳚र्वस्तो॒र्वह॑मानंधि॒याशमि॑|| 1||वर्ग:18 |
| कुह॑स्विद्दो॒षाकुह॒वस्तो᳚र॒श्विना॒कुहा᳚भिपि॒त्वंक॑रतः॒कुहो᳚षतुः| कोवां᳚शयु॒त्रावि॒धवे᳚वदे॒वरं॒मर्यं॒नयोषा᳚कृणुतेस॒धस्थ॒आ|| 2|| |
| प्रा॒तर्ज॑रेथेजर॒णेव॒काप॑या॒वस्तो᳚र्वस्तोर्यज॒ताग॑च्छथोगृ॒हम्| कस्य॑ध्व॒स्राभ॑वथः॒कस्य॑वानराराजपु॒त्रेव॒सव॒नाव॑गच्छथः|| 3|| |
| यु॒वांमृ॒गेव॑वार॒णामृ॑ग॒ण्यवो᳚दो॒षावस्तो᳚र्ह॒विषा॒निह्व॑यामहे| यु॒वंहोत्रा᳚मृतु॒थाजुह्व॑तेन॒रेषं॒जना᳚यवहथःशुभस्पती|| 4|| |
| यु॒वांह॒घोषा॒पर्य॑श्विनाय॒तीराज्ञ॑ऊचेदुहि॒तापृ॒च्छेवां᳚नरा| भू॒तंमे॒,अह्न॑उ॒तभू᳚तम॒क्तवेऽश्वा᳚वतेर॒थिने᳚शक्त॒मर्व॑ते|| 5|| |
| यु॒वंक॒वीष्ठः॒पर्य॑श्विना॒रथं॒विशो॒नकुत्सो᳚जरि॒तुर्न॑शायथः| यु॒वोर्ह॒मक्षा॒पर्य॑श्विना॒मध्वा॒साभ॑रतनिष्कृ॒तंनयोष॑णा|| 6||वर्ग:19 |
| यु॒वंह॑भु॒ज्युंयु॒वम॑श्विना॒वशं᳚यु॒वंशि॒ञ्जार॑मु॒शना॒मुपा᳚रथुः| यु॒वोररा᳚वा॒परि॑स॒ख्यमा᳚सतेयु॒वोर॒हमव॑सासु॒म्नमाच॑के|| 7|| |
| यु॒वंह॑कृ॒शंयु॒वम॑श्विनाश॒युंयु॒वंवि॒धन्तं᳚वि॒धवा᳚मुरुष्यथः| यु॒वंस॒निभ्यः॑स्त॒नय᳚न्तमश्वि॒नाप᳚व्र॒जमू᳚र्णुथःस॒प्तास्य᳚म्|| 8|| |
| जनि॑ष्ट॒योषा᳚प॒तय॑त्कनीन॒कोविचारु॑हन्वी॒रुधो᳚दं॒सना॒,अनु॑| आस्मै᳚रीयन्तेनिव॒नेव॒सिन्ध॑वो॒ऽस्मा,अह्ने᳚भवति॒तत्प॑तित्व॒नम्|| 9|| |
| जी॒वंरु॑दन्ति॒विम॑यन्ते,अध्व॒रेदी॒र्घामनु॒प्रसि॑तिंदीधियु॒र्नरः॑| वा॒मंपि॒तृभ्यो॒यइ॒दंस॑मेरि॒रेमयः॒पति॑भ्यो॒जन॑यःपरि॒ष्वजे᳚|| 10|| |
| नतस्य॑विद्म॒तदु॒षुप्रवो᳚चत॒युवा᳚ह॒यद्यु॑व॒त्याः,क्षेति॒योनि॑षु| प्रि॒योस्रि॑यस्यवृष॒भस्य॑रे॒तिनो᳚गृ॒हंग॑मेमाश्विना॒तदु॑श्मसि|| 11||वर्ग:20 |
| आवा᳚मगन्त्सुम॒तिर्वा᳚जिनीवसू॒न्य॑श्विनाहृ॒त्सुकामा᳚अयंसत| अभू᳚तंगो॒पामि॑थु॒नाशु॑भस्पतीप्रि॒या,अ᳚र्य॒म्णोदुर्याँ᳚,अशीमहि|| 12|| |
| ताम᳚न्दसा॒नामनु॑षोदुरो॒णआध॒त्तंर॒यिंस॒हवी᳚रंवच॒स्यवे᳚| कृ॒तंती॒र्थंसु॑प्रपा॒णंशु॑भस्पतीस्था॒णुंप॑थे॒ष्ठामप॑दुर्म॒तिंह॑तम्|| 13|| |
| क्व॑स्विद॒द्यक॑त॒मास्व॒श्विना᳚वि॒क्षुद॒स्रामा᳚दयेतेशु॒भस्पती᳚| कईं॒निये᳚मेकत॒मस्य॑जग्मतु॒र्विप्र॑स्यवा॒यज॑मानस्यवागृ॒हम्|| 14|| |
| [112] समानमिति तृचस्य सूक्तस्य घौषेयः सुहस्त्योश्विनौजगती |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:41}{अनुवाक:3, सूक्त:12} |
| स॒मा॒नमु॒त्यंपु॑रुहू॒तमु॒क्थ्य१॑(अं॒)रथं᳚त्रिच॒क्रंसव॑ना॒गनि॑ग्मतम्| परि॑ज्मानंविद॒थ्यं᳚सुवृ॒क्तिभि᳚र्व॒यंव्यु॑ष्टा,उ॒षसो᳚हवामहे|| 1||वर्ग:21 |
| प्रा॒त॒र्युजं᳚नास॒त्याधि॑तिष्ठथःप्रात॒र्यावा᳚णंमधु॒वाह॑नं॒रथ᳚म्| विशो॒येन॒गच्छ॑थो॒यज्व॑रीर्नराकी॒रेश्चि॑द्य॒ज्ञंहोतृ॑मन्तमश्विना|| 2|| |
| अ॒ध्व॒र्युंवा॒मधु॑पाणिंसु॒हस्त्य॑म॒ग्निधं᳚वाधृ॒तद॑क्षं॒दमू᳚नसम्| विप्र॑स्यवा॒यत्सव॑नानि॒गच्छ॒थोऽत॒आया᳚तंमधु॒पेय॑मश्विना|| 3|| |
| [113] अस्तेवेत्येकादशर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः कृष्णइंद्रस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:42}{अनुवाक:3, सूक्त:13} |
| अस्ते᳚व॒सुप्र॑त॒रंलाय॒मस्य॒न्भूष᳚न्निव॒प्रभ॑रा॒स्तोम॑मस्मै| वा॒चावि॑प्रास्तरत॒वाच॑म॒र्योनिरा᳚मयजरितः॒सोम॒इन्द्र᳚म्|| 1||वर्ग:22 |
| दोहे᳚न॒गामुप॑शिक्षा॒सखा᳚यं॒प्रबो᳚धयजरितर्जा॒रमिन्द्र᳚म्| कोशं॒नपू॒र्णंवसु॑ना॒न्यृ॑ष्ट॒माच्या᳚वयमघ॒देया᳚य॒शूर᳚म्|| 2|| |
| किम॒ङ्गत्वा᳚मघवन्भो॒जमा᳚हुःशिशी॒हिमा᳚शिश॒यंत्वा᳚शृणोमि| अप्न॑स्वती॒मम॒धीर॑स्तुशक्रवसु॒विदं॒भग॑मि॒न्द्राभ॑रानः|| 3|| |
| त्वांजना᳚ममस॒त्येष्वि᳚न्द्रसंतस्था॒नाविह्व॑यन्तेसमी॒के| अत्रा॒युजं᳚कृणुते॒योह॒विष्मा॒न्नासु᳚न्वतास॒ख्यंव॑ष्टि॒शूरः॑|| 4|| |
| धनं॒नस्य॒न्द्रंब॑हु॒लंयो,अ॑स्मैती॒व्रान्त्सोमाँ᳚,आसु॒नोति॒प्रय॑स्वान्| तस्मै॒शत्रू᳚न्त्सु॒तुका᳚न्प्रा॒तरह्नो॒निस्वष्ट्रा᳚न्यु॒वति॒हन्ति॑वृ॒त्रम्|| 5|| |
| यस्मि᳚न्व॒यंद॑धि॒माशंस॒मिन्द्रे॒यःशि॒श्राय॑म॒घवा॒काम॑म॒स्मे| आ॒राच्चि॒त्सन्भ॑यतामस्य॒शत्रु॒र्न्य॑स्मैद्यु॒म्नाजन्या᳚नमन्ताम्|| 6||वर्ग:23 |
| आ॒राच्छत्रु॒मप॑बाधस्वदू॒रमु॒ग्रोयःशम्बः॑पुरुहूत॒तेन॑| अ॒स्मेधे᳚हि॒यव॑म॒द्गोम॑दिन्द्रकृ॒धीधियं᳚जरि॒त्रेवाज॑रत्नाम्|| 7|| |
| प्रयम॒न्तर्वृ॑षस॒वासो॒,अग्म᳚न्ती॒व्राःसोमा᳚बहु॒लान्ता᳚स॒इन्द्र᳚म्| नाह॑दा॒मानं᳚म॒घवा॒नियं᳚स॒न्निसु᳚न्व॒तेव॑हति॒भूरि॑वा॒मम्|| 8|| |
| उ॒तप्र॒हाम॑ति॒दीव्या᳚जयातिकृ॒तंयच्छ्व॒घ्नीवि॑चि॒नोति॑का॒ले| योदे॒वका᳚मो॒नधना᳚रुणद्धि॒समित्तंरा॒यासृ॑जतिस्व॒धावा॑न्|| 9|| |
| गोभि॑ष्टरे॒माम॑तिंदु॒रेवां॒यवे᳚न॒क्षुधं᳚पुरुहूत॒विश्वा᳚म्| व॒यंराज॑भिःप्रथ॒माधना᳚न्य॒स्माके᳚नवृ॒जने᳚नाजयेम|| 10|| |
| बृह॒स्पति᳚र्नः॒परि॑पातुप॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः| इन्द्रः॑पु॒रस्ता᳚दु॒तम॑ध्य॒तोनः॒सखा॒सखि॑भ्यो॒वरि॑वःकृणोतु|| 11|| |
| [114] अच्छामइत्येकादशर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः कृष्णइंद्रोजगत्यंत्येद्वेत्रिष्टुभौ |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:43}{अनुवाक:4, सूक्त:1} |
| अच्छा᳚म॒इन्द्रं᳚म॒तयः॑स्व॒र्विदः॑स॒ध्रीची॒र्विश्वा᳚उश॒तीर॑नूषत| परि॑ष्वजन्ते॒जन॑यो॒यथा॒पतिं॒मर्यं॒नशु॒न्ध्युंम॒घवा᳚नमू॒तये᳚|| 1||वर्ग:24 |
| नघा᳚त्व॒द्रिगप॑वेतिमे॒मन॒स्त्वे,इत्कामं᳚पुरुहूतशिश्रय| राजे᳚वदस्म॒निष॒दोऽधि॑ब॒र्हिष्य॒स्मिन्त्सुसोमे᳚ऽव॒पान॑मस्तुते|| 2|| |
| वि॒षू॒वृदिन्द्रो॒,अम॑तेरु॒तक्षु॒धःसइद्रा॒योम॒घवा॒वस्व॑ईशते| तस्येदि॒मेप्र॑व॒णेस॒प्तसिन्ध॑वो॒वयो᳚वर्धन्तिवृष॒भस्य॑शु॒ष्मिणः॑|| 3|| |
| वयो॒नवृ॒क्षंसु॑पला॒शमास॑द॒न्त्सोमा᳚स॒इन्द्रं᳚म॒न्दिन॑श्चमू॒षदः॑| प्रैषा॒मनी᳚कं॒शव॑सा॒दवि॑द्युतद्वि॒दत्स्व१॑(अ॒)र्मन॑वे॒ज्योति॒रार्य᳚म्|| 4|| |
| कृ॒तंनश्व॒घ्नीविचि॑नोति॒देव॑नेसं॒वर्गं॒यन्म॒घवा॒सूर्यं॒जय॑त्| नतत्ते᳚अ॒न्यो,अनु॑वी॒र्यं᳚शक॒न्नपु॑रा॒णोम॑घव॒न्नोतनूत॑नः|| 5|| |
| विशं᳚विशंम॒घवा॒पर्य॑शायत॒जना᳚नां॒धेना᳚अव॒चाक॑श॒द्वृषा᳚| यस्याह॑श॒क्रःसव॑नेषु॒रण्य॑ति॒सती॒व्रैःसोमैः᳚सहतेपृतन्य॒तः|| 6||वर्ग:25 |
| आपो॒नसिन्धु॑म॒भियत्स॒मक्ष॑र॒न्त्सोमा᳚स॒इन्द्रं᳚कु॒ल्या,इ॑वह्र॒दम्| वर्ध᳚न्ति॒विप्रा॒महो᳚अस्य॒साद॑ने॒यवं॒नवृ॒ष्टिर्दि॒व्येन॒दानु॑ना|| 7|| |
| वृषा॒नक्रु॒द्धःप॑तय॒द्रज॒स्स्वायो,अ॒र्यप॑त्नी॒रकृ॑णोदि॒मा,अ॒पः| ससु᳚न्व॒तेम॒घवा᳚जी॒रदा᳚न॒वेऽवि᳚न्द॒ज्ज्योति॒र्मन॑वेह॒विष्म॑ते|| 8|| |
| उज्जा᳚यतांपर॒शुर्ज्योति॑षास॒हभू॒या,ऋ॒तस्य॑सु॒दुघा᳚पुराण॒वत्| विरो᳚चतामरु॒षोभा॒नुना॒शुचिः॒स्व१॑(अ॒)र्णशु॒क्रंशु॑शुचीत॒सत्प॑तिः|| 9|| |
| गोभि॑ष्टरे॒माम॑तिंदु॒रेवां॒यवे᳚न॒क्षुधं᳚पुरुहूत॒विश्वा᳚म्| व॒यंराज॑भिःप्रथ॒माधना᳚न्य॒स्माके᳚नवृ॒जने᳚नाजयेम|| 10|| |
| बृह॒स्पति᳚र्नः॒परि॑पातुप॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः| इन्द्रः॑पु॒रस्ता᳚दु॒तम॑ध्य॒तोनः॒सखा॒सखि॑भ्यो॒वरि॑वःकृणोतु|| 11|| |
| [115] आयात्वित्येकादशर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः कृष्णइंद्रोजगती आद्यास्तिस्रोंत्येद्वेचत्रिष्टुभः |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:44}{अनुवाक:4, सूक्त:2} |
| आया॒त्विन्द्रः॒स्वप॑ति॒र्मदा᳚य॒योधर्म॑णातूतुजा॒नस्तुवि॑ष्मान्| प्र॒त्व॒क्षा॒णो,अति॒विश्वा॒सहां᳚स्यपा॒रेण॑मह॒तावृष्ण्ये᳚न|| 1||वर्ग:26 |
| सु॒ष्ठामा॒रथः॑सु॒यमा॒हरी᳚तेमि॒म्यक्ष॒वज्रो᳚नृपते॒गभ॑स्तौ| शीभं᳚राजन्त्सु॒पथाया᳚ह्य॒र्वाङ्वर्धा᳚मतेप॒पुषो॒वृष्ण्या᳚नि|| 2|| |
| एन्द्र॒वाहो᳚नृ॒पतिं॒वज्र॑बाहुमु॒ग्रमु॒ग्रास॑स्तवि॒षास॑एनम्| प्रत्व॑क्षसंवृष॒भंस॒त्यशु॑ष्म॒मेम॑स्म॒त्रास॑ध॒मादो᳚वहन्तु|| 3|| |
| ए॒वापतिं᳚द्रोण॒साचं॒सचे᳚तसमू॒र्जःस्क॒म्भंध॒रुण॒आवृ॑षायसे| ओजः॑कृष्व॒संगृ॑भाय॒त्वे,अप्यसो॒यथा᳚केनि॒पाना᳚मि॒नोवृ॒धे|| 4|| |
| गम᳚न्न॒स्मेवसू॒न्याहिशंसि॑षंस्वा॒शिषं॒भर॒माया᳚हिसो॒मिनः॑| त्वमी᳚शिषे॒सास्मिन्नास॑त्सिब॒र्हिष्य॑नाधृ॒ष्यातव॒पात्रा᳚णि॒धर्म॑णा|| 5|| |
| पृथ॒क्प्राय᳚न्प्रथ॒मादे॒वहू᳚त॒योऽकृ᳚ण्वतश्रव॒स्या᳚निदु॒ष्टरा᳚| नयेशे॒कुर्य॒ज्ञियां॒नाव॑मा॒रुह॑मी॒र्मैवतेन्य॑विशन्त॒केप॑यः|| 6||वर्ग:27 |
| ए॒वैवापा॒गप॑रेसन्तुदू॒ढ्योऽश्वा॒येषां᳚दु॒र्युज॑आयुयु॒ज्रे| इ॒त्थायेप्रागुप॑रे॒सन्ति॑दा॒वने᳚पु॒रूणि॒यत्र॑व॒युना᳚नि॒भोज॑ना|| 7|| |
| गि॒रीँरज्रा॒न्रेज॑मानाँ,अधारय॒द्द्यौःक्र᳚न्दद॒न्तरि॑क्षाणिकोपयत्| स॒मी॒ची॒नेधि॒षणे॒विष्क॑भायति॒वृष्णः॑पी॒त्वामद॑उ॒क्थानि॑शंसति|| 8|| |
| इ॒मंबि॑भर्मि॒सुकृ॑तंते,अङ्कु॒शंयेना᳚रु॒जासि॑मघवञ्छफा॒रुजः॑| अ॒स्मिन्त्सुते॒सव॑ने,अस्त्वो॒क्यं᳚सु॒तइ॒ष्टौम॑घवन्बो॒ध्याभ॑गः|| 9|| |
| गोभि॑ष्टरे॒माम॑तिंदु॒रेवां॒यवे᳚न॒क्षुधं᳚पुरुहूत॒विश्वा᳚म्| व॒यंराज॑भिःप्रथ॒माधना᳚न्य॒स्माके᳚नवृ॒जने᳚नाजयेम|| 10|| |
| बृह॒स्पति᳚र्नः॒परि॑पातुप॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः| इन्द्रः॑पु॒रस्ता᳚दु॒तम॑ध्य॒तोनः॒सखा॒सखि॑भ्यो॒वरि॑वःकृणोतु|| 11|| |
| [116] दिवस्परीति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य भालंदनो वत्सप्रिरग्निस्त्रिष्टुप् |{अष्टक:7, अध्याय:8}{मंडल:10, सूक्त:45}{अनुवाक:4, सूक्त:3} |
| दि॒वस्परि॑प्रथ॒मंज॑ज्ञे,अ॒ग्निर॒स्मद्द्वि॒तीयं॒परि॑जा॒तवे᳚दाः| तृ॒तीय॑म॒प्सुनृ॒मणा॒,अज॑स्र॒मिन्धा᳚नएनंजरतेस्वा॒धीः|| 1||वर्ग:28 |
| वि॒द्माते᳚अग्नेत्रे॒धात्र॒याणि॑वि॒द्माते॒धाम॒विभृ॑तापुरु॒त्रा| वि॒द्माते॒नाम॑पर॒मंगुहा॒यद्वि॒द्मातमुत्सं॒यत॑आज॒गन्थ॑|| 2|| |
| स॒मु॒द्रेत्वा᳚नृ॒मणा᳚अ॒प्स्व१॑(अ॒)न्तर्नृ॒चक्षा᳚ईधेदि॒वो,अ॑ग्न॒ऊध॑न्| तृ॒तीये᳚त्वा॒रज॑सितस्थि॒वांस॑म॒पामु॒पस्थे᳚महि॒षा,अ॑वर्धन्|| 3|| |
| अक्र᳚न्दद॒ग्निःस्त॒नय᳚न्निव॒द्यौः,क्षामा॒रेरि॑हद्वी॒रुधः॑सम॒ञ्जन्| स॒द्योज॑ज्ञा॒नोविहीमि॒द्धो,अख्य॒दारोद॑सीभा॒नुना᳚भात्य॒न्तः|| 4|| |
| श्री॒णामु॑दा॒रोध॒रुणो᳚रयी॒णांम॑नी॒षाणां॒प्रार्प॑णः॒सोम॑गोपाः| वसुः॑सू॒नुःसह॑सो,अ॒प्सुराजा॒विभा॒त्यग्र॑उ॒षसा᳚मिधा॒नः|| 5|| |
| विश्व॑स्यके॒तुर्भुव॑नस्य॒गर्भ॒आरोद॑सी,अपृणा॒ज्जाय॑मानः| वी॒ळुंचि॒दद्रि॑मभिनत्परा॒यञ्जना॒यद॒ग्निमय॑जन्त॒पञ्च॑|| 6|| |
| उ॒शिक्पा᳚व॒को,अ॑र॒तिःसु॑मे॒धामर्ते᳚ष्व॒ग्निर॒मृतो॒निधा᳚यि| इय॑र्तिधू॒मम॑रु॒षंभरि॑भ्र॒दुच्छु॒क्रेण॑शो॒चिषा॒द्यामिन॑क्षन्|| 7||वर्ग:29 |
| दृ॒शा॒नोरु॒क्मउ᳚र्वि॒याव्य॑द्यौद्दु॒र्मर्ष॒मायुः॑श्रि॒येरु॑चा॒नः| अ॒ग्निर॒मृतो᳚अभव॒द्वयो᳚भि॒र्यदे᳚नं॒द्यौर्ज॒नय॑त्सु॒रेताः᳚|| 8|| |
| यस्ते᳚अ॒द्यकृ॒णव॑द्भद्रशोचेऽपू॒पंदे᳚वघृ॒तव᳚न्तमग्ने| प्रतंन॑यप्रत॒रंवस्यो॒,अच्छा॒भिसु॒म्नंदे॒वभ॑क्तंयविष्ठ|| 9|| |
| आतंभ॑जसौश्रव॒सेष्व॑ग्नउ॒क्थौ᳚क्थ॒आभ॑जश॒स्यमा᳚ने| प्रि॒यःसूर्ये᳚प्रि॒यो,अ॒ग्नाभ॑वा॒त्युज्जा॒तेन॑भि॒नद॒दुज्जनि॑त्वैः|| 10|| |
| त्वाम॑ग्ने॒यज॑माना॒,अनु॒द्यून्विश्वा॒वसु॑दधिरे॒वार्या᳚णि| त्वया᳚स॒हद्रवि॑णमि॒च्छमा᳚नाव्र॒जंगोम᳚न्तमु॒शिजो॒विव᳚व्रुः|| 11|| |
| अस्ता᳚व्य॒ग्निर्न॒रांसु॒शेवो᳚वैश्वान॒रऋषि॑भिः॒सोम॑गोपाः| अ॒द्वे॒षेद्यावा᳚पृथि॒वीहु॑वेम॒देवा᳚ध॒त्तर॒यिम॒स्मेसु॒वीर᳚म्|| 12|| |