| [1] स्वादिष्ठयेति दशर्चस्य सूक्तस्य वैश्वामित्रोमधुच्छंदाः पवमान सोमो गायत्री | (पवमान पारायण प्रथमोध्यायः){मंडल:9, सूक्त:1}{अनुवाक:1, सूक्त:1}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| स्वादि॑ष्ठया॒मदि॑ष्ठया॒¦पव॑स्वसोम॒धार॑या|इन्द्रा᳚य॒पात॑वेसु॒तः|| 1||वर्ग:16 |
| र॒क्षो॒हावि॒श्वच॑र्षणि¦र॒भियोनि॒मयो᳚हतम्|द्रुणा᳚स॒धस्थ॒मास॑दत्|| 2|| |
| व॒रि॒वो॒धात॑मोभव॒¦मंहि॑ष्ठोवृत्र॒हन्त॑मः|पर्षि॒राधो᳚म॒घोना᳚म्|| 3|| |
| अ॒भ्य॑र्षम॒हानां᳚¦दे॒वानां᳚वी॒तिमन्ध॑सा|अ॒भिवाज॑मु॒तश्रवः॑|| 4|| |
| त्वामच्छा᳚चरामसि॒¦तदिदर्थं᳚दि॒वेदि॑वे|इन्दो॒त्वेन॑आ॒शसः॑|| 5|| |
| पु॒नाति॑तेपरि॒स्रुतं॒¦सोमं॒सूर्य॑स्यदुहि॒ता|वारे᳚ण॒शश्व॑ता॒तना᳚|| 6||वर्ग:17 |
| तमी॒मण्वीः᳚सम॒र्यआ¦गृ॒भ्णन्ति॒योष॑णो॒दश॑|स्वसा᳚रः॒पार्ये᳚दि॒वि|| 7|| |
| तमीं᳚हिन्वन्त्य॒ग्रुवो॒¦धम᳚न्तिबाकु॒रंदृति᳚म्|त्रि॒धातु॑वार॒णंमधु॑|| 8|| |
| अ॒भी॒३॑(ई॒)ममघ्न्या᳚उ॒त¦श्री॒णन्ति॑धे॒नवः॒शिशु᳚म्|सोम॒मिन्द्रा᳚य॒पात॑वे|| 9|| |
| अ॒स्येदिन्द्रो॒मदे॒ष्वा¦विश्वा᳚वृ॒त्राणि॑जिघ्नते|शूरो᳚म॒घाच॑मंहते|| 10|| |
| [2] पवस्वेति दशर्चस्य सूक्तस्य काण्वोमेधातिथिः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:2}{अनुवाक:1, सूक्त:2}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| पव॑स्वदेव॒वीरति॑¦प॒वित्रं᳚सोम॒रंह्या᳚|इन्द्र॑मिन्दो॒वृषावि॑श|| 1||वर्ग:18 |
| आव॑च्यस्व॒महि॒प्सरो॒¦वृषे᳚न्दोद्यु॒म्नव॑त्तमः|आयोनिं᳚धर्ण॒सिःस॑दः|| 2|| |
| अधु॑क्षतप्रि॒यंमधु॒¦धारा᳚सु॒तस्य॑वे॒धसः॑|अ॒पोव॑सिष्टसु॒क्रतुः॑|| 3|| |
| म॒हान्तं᳚त्वाम॒हीर¦न्वापो᳚अर्षन्ति॒सिन्ध॑वः|यद्गोभि᳚र्वासयि॒ष्यसे᳚|| 4|| |
| स॒मु॒द्रो,अ॒प्सुमा᳚मृजे¦विष्ट॒म्भोध॒रुणो᳚दि॒वः|सोमः॑प॒वित्रे᳚अस्म॒युः|| 5|| |
| अचि॑क्रद॒द्वृषा॒हरि᳚¦र्म॒हान्मि॒त्रोनद॑र्श॒तः|संसूर्ये᳚णरोचते|| 6||वर्ग:19 |
| गिर॑स्तइन्द॒ओज॑सा¦मर्मृ॒ज्यन्ते᳚अप॒स्युवः॑|याभि॒र्मदा᳚य॒शुम्भ॑से|| 7|| |
| तंत्वा॒मदा᳚य॒घृष्व॑य¦उलोककृ॒त्नुमी᳚महे|तव॒प्रश॑स्तयोम॒हीः|| 8|| |
| अ॒स्मभ्य॑मिन्दविन्द्र॒यु¦र्मध्वः॑पवस्व॒धार॑या|प॒र्जन्यो᳚वृष्टि॒माँ,इ॑व|| 9|| |
| गो॒षा,इ᳚न्दोनृ॒षा,अ॑स्य¦श्व॒सावा᳚ज॒सा,उ॒त|आ॒त्माय॒ज्ञस्य॑पू॒र्व्यः|| 10|| |
| [3] एषदेव इति दशर्चस्य सूक्तस्याजीगर्तिः शुनःशेपः सकृत्रिमोवैश्वामित्रोदेवरातः पवमान सोमो गायत्री ।{मंडल:9, सूक्त:3}{अनुवाक:1, सूक्त:3}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| ए॒षदे॒वो,अम॑र्त्यः¦पर्ण॒वीरि॑वदीयति|अ॒भिद्रोणा᳚न्या॒सद᳚म्|| 1||वर्ग:20 |
| ए॒षदे॒वोवि॒पाकृ॒तो¦ऽति॒ह्वरां᳚सिधावति|पव॑मानो॒,अदा᳚भ्यः|| 2|| |
| ए॒षदे॒वोवि॑प॒न्युभिः॒¦पव॑मानऋता॒युभिः॑|हरि॒र्वाजा᳚यमृज्यते|| 3|| |
| ए॒षविश्वा᳚नि॒वार्या॒¦शूरो॒यन्नि॑व॒सत्व॑भिः|पव॑मानःसिषासति|| 4|| |
| ए॒षदे॒वोर॑थर्यति॒¦पव॑मानोदशस्यति|आ॒विष्कृ॑णोतिवग्व॒नुम्|| 5|| |
| ए॒षविप्रै᳚र॒भिष्टु॑तो॒¦ऽपोदे॒वोविगा᳚हते|दध॒द्रत्ना᳚निदा॒शुषे᳚|| 6||वर्ग:21 |
| ए॒षदिवं॒विधा᳚वति¦ति॒रोरजां᳚सि॒धार॑या|पव॑मानः॒कनि॑क्रदत्|| 7|| |
| ए॒षदिवं॒व्यास॑रत्¦ति॒रोरजां॒स्यस्पृ॑तः|पव॑मानःस्वध्व॒रः|| 8|| |
| ए॒षप्र॒त्नेन॒जन्म॑ना¦दे॒वोदे॒वेभ्यः॑सु॒तः|हरिः॑प॒वित्रे᳚अर्षति|| 9|| |
| ए॒षउ॒स्यपु॑रुव्र॒तो¦ज॑ज्ञा॒नोज॒नय॒न्निषः॑|धार॑यापवतेसु॒तः|| 10|| |
| [4] सनाचेति दशर्चस्य सूक्तस्याङ्गिरसो हिरण्यस्तूपः पवमानसोमो गायत्री{मंडल:9, सूक्त:4}{अनुवाक:1, सूक्त:4}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| सना᳚चसोम॒जेषि॑च॒¦पव॑मान॒महि॒श्रवः॑|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 1||वर्ग:22 |
| सना॒ज्योतिः॒सना॒स्व१॑(अ॒)¦र्विश्वा᳚चसोम॒सौभ॑गा|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 2|| |
| सना॒दक्ष॑मु॒तक्रतु॒¦मप॑सोम॒मृधो᳚जहि|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 3|| |
| पवी᳚तारःपुनी॒तन॒¦सोम॒मिन्द्रा᳚य॒पात॑वे|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 4|| |
| त्वंसूर्ये᳚न॒आभ॑ज॒¦तव॒क्रत्वा॒तवो॒तिभिः॑|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 5|| |
| तव॒क्रत्वा॒तवो॒तिभि॒¦र्ज्योक्प॑श्येम॒सूर्य᳚म्|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 6||वर्ग:23 |
| अ॒भ्य॑र्षस्वायुध॒¦सोम॑द्वि॒बर्ह॑संर॒यिम्|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 7|| |
| अ॒भ्य१॑(अ॒)र्षान॑पच्युतो¦र॒यिंस॒मत्सु॑सास॒हिः|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 8|| |
| त्वांय॒ज्ञैर॑वीवृध॒न्¦पव॑मान॒विध᳚र्मणि|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 9|| |
| र॒यिंन॑श्चि॒त्रम॒श्विन॒¦मिन्दो᳚वि॒श्वायु॒माभ॑र|अथा᳚नो॒वस्य॑सस्कृधि|| 10|| |
| [5] समिद्धइत्येकादशर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः क्रमेणेध्मस्तनूनपादिळोबर्हिर्देवीर्द्वार उषासानक्ता दैव्यौहोतारौ तिस्रोदेव्यः सरस्वतीळाभारत्यस्त्वष्टा वनस्पतिः स्वाहाकृतयोगायत्री अंत्याश्चतस्रोनुष्टुभः | ( इतआरभ्यविंशतिसूक्तेषुकाश्यपोदेवलोऽसितेन सहविकल्पते ) |{मंडल:9, सूक्त:5}{अनुवाक:1, सूक्त:5}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| समि॑द्धोवि॒श्वत॒स्पतिः॒¦पव॑मानो॒विरा᳚जति|प्री॒णन्वृषा॒कनि॑क्रदत्|| 1||वर्ग:24 |
| तनू॒नपा॒त्पव॑मानः॒¦शृङ्गे॒शिशा᳚नो,अर्षति|अ॒न्तरि॑क्षेण॒रार॑जत्|| 2|| |
| ई॒ळेन्यः॒पव॑मानो¦र॒यिर्विरा᳚जतिद्यु॒मान्|मधो॒र्धारा᳚भि॒रोज॑सा|| 3|| |
| ब॒र्हिःप्रा॒चीन॒मोज॑सा॒¦पव॑मानःस्तृ॒णन्हरिः॑|दे॒वेषु॑दे॒वई᳚यते|| 4|| |
| उदातै᳚र्जिहतेबृ॒हद्¦द्वारो᳚दे॒वीर्हि॑र॒ण्ययीः᳚|पव॑मानेन॒सुष्टु॑ताः|| 5|| |
| सु॒शि॒ल्पेबृ॑ह॒तीम॒ही¦पव॑मानोवृषण्यति|नक्तो॒षासा॒नद॑र्श॒ते|| 6||वर्ग:25 |
| उ॒भादे॒वानृ॒चक्ष॑सा॒¦होता᳚रा॒दैव्या᳚हुवे|पव॑मान॒इन्द्रो॒वृषा᳚|| 7|| |
| भार॑ती॒पव॑मानस्य॒¦सर॑स्व॒तीळा᳚म॒ही|इ॒मंनो᳚य॒ज्ञमाग॑मन्¦ति॒स्रोदे॒वीःसु॒पेश॑सः|| 8|| |
| त्वष्टा᳚रमग्र॒जांगो॒पां¦पु॑रो॒यावा᳚न॒माहु॑वे|इन्दु॒रिन्द्रो॒वृषा॒हरिः॒¦पव॑मानःप्र॒जाप॑तिः|| 9|| |
| वन॒स्पतिं᳚पवमान॒¦मध्वा॒सम᳚ङ्ग्धि॒धार॑या|स॒हस्र॑वल्शं॒हरि॑तं॒¦भ्राज॑मानंहिर॒ण्यय᳚म्|| 10|| |
| विश्वे᳚देवाः॒स्वाहा᳚कृतिं॒¦पव॑मान॒स्याग॑त|वा॒युर्बृह॒स्पतिः॒सूर्यो॒¦ऽग्निरिन्द्रः॑स॒जोष॑सः|| 11|| |
| [6] मंद्रयेति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमो गायत्री {मंडल:9, सूक्त:6}{अनुवाक:1, सूक्त:6}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| म॒न्द्रया᳚सोम॒धार॑या॒¦वृषा᳚पवस्वदेव॒युः|अव्यो॒वारे᳚ष्वस्म॒युः|| 1||वर्ग:26 |
| अ॒भित्यंमद्यं॒मद॒¦मिन्द॒विन्द्र॒इति॑क्षर|अ॒भिवा॒जिनो॒,अर्व॑तः|| 2|| |
| अ॒भित्यंपू॒र्व्यंमदं᳚¦सुवा॒नो,अ॑र्षप॒वित्र॒आ|अ॒भिवाज॑मु॒तश्रवः॑|| 3|| |
| अनु॑द्र॒प्सास॒इन्द॑व॒¦आपो॒नप्र॒वता᳚सरन्|पु॒ना॒ना,इन्द्र॑माशत|| 4|| |
| यमत्य॑मिववा॒जिनं᳚¦मृ॒जन्ति॒योष॑णो॒दश॑|वने॒क्रीळ᳚न्त॒मत्य॑विम्|| 5|| |
| तंगोभि॒र्वृष॑णं॒रसं॒¦मदा᳚यदे॒ववी᳚तये|सु॒तंभरा᳚य॒संसृ॑ज|| 6||वर्ग:27 |
| दे॒वोदे॒वाय॒धार॒ये¦न्द्रा᳚यपवतेसु॒तः|पयो॒यद॑स्यपी॒पय॑त्|| 7|| |
| आ॒त्माय॒ज्ञस्य॒रंह्या᳚¦सुष्वा॒णःप॑वतेसु॒तः|प्र॒त्नंनिपा᳚ति॒काव्य᳚म्|| 8|| |
| ए॒वापु॑ना॒नइ᳚न्द्र॒यु¦र्मदं᳚मदिष्ठवी॒तये᳚|गुहा᳚चिद्दधिषे॒गिरः॑|| 9|| |
| [7] असृग्रमिति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोऽसितः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:7}{अनुवाक:1, सूक्त:7}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| असृ॑ग्र॒मिन्द॑वःप॒था¦धर्म᳚न्नृ॒तस्य॑सु॒श्रियः॑|वि॒दा॒ना,अ॑स्य॒योज॑नम्|| 1||वर्ग:28 |
| प्रधारा॒मध्वो᳚अग्रि॒यो¦म॒हीर॒पोविगा᳚हते|ह॒विर्ह॒विष्षु॒वन्द्यः॑|| 2|| |
| प्रयु॒जोवा॒चो,अ॑ग्रि॒यो¦वृषाव॑चक्रद॒द्वने᳚|सद्मा॒भिस॒त्यो,अ॑ध्व॒रः|| 3|| |
| परि॒यत्काव्या᳚क॒वि¦र्नृ॒म्णावसा᳚नो॒,अर्ष॑ति|स्व᳚र्वा॒जीसि॑षासति|| 4|| |
| पव॑मानो,अ॒भिस्पृधो॒¦विशो॒राजे᳚वसीदति|यदी᳚मृ॒ण्वन्ति॑वे॒धसः॑|| 5|| |
| अव्यो॒वारे॒परि॑प्रि॒यो¦हरि॒र्वने᳚षुसीदति|रे॒भोव॑नुष्यतेम॒ती|| 6||वर्ग:29 |
| सवा॒युमिन्द्र॑म॒श्विना᳚¦सा॒कंमदे᳚नगच्छति|रणा॒यो,अ॑स्य॒धर्म॑भिः|| 7|| |
| आमि॒त्रावरु॑णा॒भगं॒¦मध्वः॑पवन्तऊ॒र्मयः॑|वि॒दा॒ना,अ॑स्य॒शक्म॑भिः|| 8|| |
| अ॒स्मभ्यं᳚रोदसीर॒यिं¦मध्वो॒वाज॑स्यसा॒तये᳚|श्रवो॒वसू᳚नि॒संजि॑तम्|| 9|| |
| [8] एतेसोमा इति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:8}{अनुवाक:1, सूक्त:8}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| ए॒तेसोमा᳚अ॒भिप्रि॒य¦मिन्द्र॑स्य॒काम॑मक्षरन्|वर्ध᳚न्तो,अस्यवी॒र्य᳚म्|| 1||वर्ग:30 |
| पु॒ना॒नास॑श्चमू॒षदो॒¦गच्छ᳚न्तोवा॒युम॒श्विना᳚|तेनो᳚धान्तुसु॒वीर्य᳚म्|| 2|| |
| इन्द्र॑स्यसोम॒राध॑से¦पुना॒नोहार्दि॑चोदय|ऋ॒तस्य॒योनि॑मा॒सद᳚म्|| 3|| |
| मृ॒जन्ति॑त्वा॒दश॒क्षिपो᳚¦हि॒न्वन्ति॑स॒प्तधी॒तयः॑|अनु॒विप्रा᳚अमादिषुः|| 4|| |
| दे॒वेभ्य॑स्त्वा॒मदा᳚य॒कं¦सृ॑जा॒नमति॑मे॒ष्यः॑|संगोभि᳚र्वासयामसि|| 5|| |
| पु॒ना॒नःक॒लशे॒ष्वा¦वस्त्रा᳚ण्यरु॒षोहरिः॑|परि॒गव्या᳚न्यव्यत|| 6||वर्ग:31 |
| म॒घोन॒आप॑वस्वनो¦ज॒हिविश्वा॒,अप॒द्विषः॑|इन्दो॒सखा᳚य॒मावि॑श|| 7|| |
| वृ॒ष्टिंदि॒वःपरि॑स्रव¦द्यु॒म्नंपृ॑थि॒व्या,अधि॑|सहो᳚नःसोमपृ॒त्सुधाः᳚|| 8|| |
| नृ॒चक्ष॑संत्वाव॒य¦मिन्द्र॑पीतंस्व॒र्विद᳚म्|भ॒क्षी॒महि॑प्र॒जामिष᳚म्|| 9|| |
| [9] परिप्रियेति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमो गायत्री {मंडल:9, सूक्त:9}{अनुवाक:1, सूक्त:9}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| परि॑प्रि॒यादि॒वःक॒वि¦र्वयां᳚सिन॒प्त्यो᳚र्हि॒तः|सु॒वा॒नोया᳚तिक॒विक्र॑तुः|| 1||वर्ग:32 |
| प्रप्र॒क्षया᳚य॒पन्य॑से॒¦जना᳚य॒जुष्टो᳚अ॒द्रुहे᳚|वी॒त्य॑र्ष॒चनि॑ष्ठया|| 2|| |
| ससू॒नुर्मा॒तरा॒शुचि॑¦र्जा॒तोजा॒ते,अ॑रोचयत्|म॒हान्म॒ही,ऋ॑ता॒वृधा᳚|| 3|| |
| सस॒प्तधी॒तिभि᳚र्हि॒तो¦न॒द्यो᳚अजिन्वद॒द्रुहः॑|या,एक॒मक्षि॑वावृ॒धुः|| 4|| |
| ता,अ॒भिसन्त॒मस्तृ॑तं¦म॒हेयुवा᳚न॒माद॑धुः|इन्दु॑मिन्द्र॒तव᳚व्र॒ते|| 5|| |
| अ॒भिवह्नि॒रम॑र्त्यः¦स॒प्तप॑श्यति॒वाव॑हिः|क्रिवि॑र्दे॒वीर॑तर्पयत्|| 6||वर्ग:33 |
| अवा॒कल्पे᳚षुनःपुम॒¦स्तमां᳚सिसोम॒योध्या᳚|तानि॑पुनानजङ्घनः|| 7|| |
| नूनव्य॑से॒नवी᳚यसे¦सू॒क्ताय॑साधयाप॒थः|प्र॒त्न॒वद्रो᳚चया॒रुचः॑|| 8|| |
| पव॑मान॒महि॒श्रवो॒¦गामश्वं᳚रासिवी॒रव॑त्|सना᳚मे॒धांसना॒स्वः॑|| 9|| |
| [10] प्रस्वानास इति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:10}{अनुवाक:1, सूक्त:10}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| प्रस्वा॒नासो॒रथा᳚इ॒वा¦र्व᳚न्तो॒नश्र॑व॒स्यवः॑|सोमा᳚सोरा॒ये,अ॑क्रमुः|| 1||वर्ग:34 |
| हि॒न्वा॒नासो॒रथा᳚इव¦दधन्वि॒रेगभ॑स्त्योः|भरा᳚सःका॒रिणा᳚मिव|| 2|| |
| राजा᳚नो॒नप्रश॑स्तिभिः॒¦सोमा᳚सो॒गोभि॑रञ्जते|य॒ज्ञोनस॒प्तधा॒तृभिः॑|| 3|| |
| परि॑सुवा॒नास॒इन्द॑वो॒¦मदा᳚यब॒र्हणा᳚गि॒रा|सु॒ता,अ॑र्षन्ति॒धार॑या|| 4|| |
| आ॒पा॒नासो᳚वि॒वस्व॑तो॒¦जन᳚न्तउ॒षसो॒भग᳚म्|सूरा॒,अण्वं॒वित᳚न्वते|| 5|| |
| अप॒द्वारा᳚मती॒नां¦प्र॒त्ना,ऋ᳚ण्वन्तिका॒रवः॑|वृष्णो॒हर॑सआ॒यवः॑|| 6||वर्ग:35 |
| स॒मी॒ची॒नास॑आसते॒¦होता᳚रःस॒प्तजा᳚मयः|प॒दमेक॑स्य॒पिप्र॑तः|| 7|| |
| नाभा॒नाभिं᳚न॒आद॑दे॒¦चक्षु॑श्चि॒त्सूर्ये॒सचा᳚|क॒वेरप॑त्य॒मादु॑हे|| 8|| |
| अ॒भिप्रि॒यादि॒वस्प॒द¦म॑ध्व॒र्युभि॒र्गुहा᳚हि॒तम्|सूरः॑पश्यति॒चक्ष॑सा|| 9|| |
| [11] उपास्माइति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:11}{अनुवाक:1, सूक्त:11}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| उपा᳚स्मैगायतानरः॒¦पव॑माना॒येन्द॑वे|अ॒भिदे॒वाँ,इय॑क्षते|| 1||वर्ग:36 |
| अ॒भिते॒मधु॑ना॒पयो¦ऽथ᳚र्वाणो,अशिश्रयुः|दे॒वंदे॒वाय॑देव॒यु|| 2|| |
| सनः॑पवस्व॒शंगवे॒¦शंजना᳚य॒शमर्व॑ते|शंरा᳚ज॒न्नोष॑धीभ्यः|| 3|| |
| ब॒भ्रवे॒नुस्वत॑वसे¦ऽरु॒णाय॑दिवि॒स्पृशे᳚|सोमा᳚यगा॒थम॑र्चत|| 4|| |
| हस्त॑च्युतेभि॒रद्रि॑भिः¦सु॒तंसोमं᳚पुनीतन|मधा॒वाधा᳚वता॒मधु॑|| 5|| |
| नम॒सेदुप॑सीदत¦द॒ध्नेद॒भिश्री᳚णीतन|इन्दु॒मिन्द्रे᳚दधातन|| 6||वर्ग:37 |
| अ॒मि॒त्र॒हाविच॑र्षणिः॒¦पव॑स्वसोम॒शंगवे᳚|दे॒वेभ्यो᳚अनुकाम॒कृत्|| 7|| |
| इन्द्रा᳚यसोम॒पात॑वे॒¦मदा᳚य॒परि॑षिच्यसे|म॒न॒श्चिन्मन॑स॒स्पतिः॑|| 8|| |
| पव॑मानसु॒वीर्यं᳚¦र॒यिंसो᳚मरिरीहिनः|इन्द॒विन्द्रे᳚णनोयु॒जा|| 9|| |
| [12] सोमाअसृग्रमिति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितःपवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:12}{अनुवाक:1, सूक्त:12}{अष्टक:6, अध्याय:7} |
| सोमा᳚असृग्र॒मिन्द॑वः¦सु॒ता,ऋ॒तस्य॒साद॑ने|इन्द्रा᳚य॒मधु॑मत्तमाः|| 1||वर्ग:38 |
| अ॒भिविप्रा᳚अनूषत॒¦गावो᳚व॒त्संनमा॒तरः॑|इन्द्रं॒सोम॑स्यपी॒तये᳚|| 2|| |
| म॒द॒च्युत्क्षे᳚ति॒साद॑ने॒¦सिन्धो᳚रू॒र्मावि॑प॒श्चित्|सोमो᳚गौ॒री,अधि॑श्रि॒तः|| 3|| |
| दि॒वोनाभा᳚विचक्ष॒णो¦ऽव्यो॒वारे᳚महीयते|सोमो॒यःसु॒क्रतुः॑क॒विः|| 4|| |
| यःसोमः॑क॒लशे॒ष्वाँ,¦अ॒न्तःप॒वित्र॒आहि॑तः|तमिन्दुः॒परि॑षस्वजे|| 5|| |
| प्रवाच॒मिन्दु॑रिष्यति¦समु॒द्रस्याधि॑वि॒ष्टपि॑|जिन्व॒न्कोशं᳚मधु॒श्चुत᳚म्|| 6||वर्ग:39 |
| नित्य॑स्तोत्रो॒वन॒स्पति॑¦र्धी॒नाम॒न्तःस॑ब॒र्दुघः॑|हि॒न्वा॒नोमानु॑षायु॒गा|| 7|| |
| अ॒भिप्रि॒यादि॒वस्प॒दा¦सोमो᳚हिन्वा॒नो,अ॑र्षति|विप्र॑स्य॒धार॑याक॒विः|| 8|| |
| आप॑वमानधारयर॒यिं¦स॒हस्र॑वर्चसम्|अ॒स्मे,इ᳚न्दोस्वा॒भुव᳚म्|| 9|| |
| [13] सोमः पुनानइति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोऽसितः पवमान सोमो गायत्री | (पवमान पारायण द्वितीयोध्यायः){मंडल:9, सूक्त:13}{अनुवाक:1, सूक्त:13}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| सोमः॑पुना॒नो,अ॑र्षति¦स॒हस्र॑धारो॒,अत्य॑विः|वा॒योरिन्द्र॑स्यनिष्कृ॒तम्|| 1||वर्ग:1 |
| पव॑मानमवस्यवो॒¦विप्र॑म॒भिप्रगा᳚यत|सु॒ष्वा॒णंदे॒ववी᳚तये|| 2|| |
| पव᳚न्ते॒वाज॑सातये॒¦सोमाः᳚स॒हस्र॑पाजसः|गृ॒णा॒नादे॒ववी᳚तये|| 3|| |
| उ॒तनो॒वाज॑सातये॒¦पव॑स्वबृह॒तीरिषः॑|द्यु॒मदि᳚न्दोसु॒वीर्य᳚म्|| 4|| |
| तेनः॑सह॒स्रिणं᳚र॒यिं¦पव᳚न्ता॒मासु॒वीर्य᳚म्|सु॒वा॒नादे॒वास॒इन्द॑वः|| 5|| |
| अत्या᳚हिया॒नानहे॒तृभि॒¦रसृ॑ग्रं॒वाज॑सातये|विवार॒मव्य॑मा॒शवः॑|| 6||वर्ग:2 |
| वा॒श्रा,अ॑र्ष॒न्तीन्द॑वो॒¦ऽभिव॒त्संनधे॒नवः॑|द॒ध॒न्वि॒रेगभ॑स्त्योः|| 7|| |
| जुष्ट॒इन्द्रा᳚यमत्स॒रः¦पव॑मान॒कनि॑क्रदत्|विश्वा॒,अप॒द्विषो᳚जहि|| 8|| |
| अ॒प॒घ्नन्तो॒,अरा᳚व्णः॒¦पव॑मानाःस्व॒र्दृशः॑|योना᳚वृ॒तस्य॑सीदत|| 9|| |
| [14] परिप्रेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:14}{अनुवाक:1, सूक्त:14}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| परि॒प्रासि॑ष्यदत्क॒विः¦सिन्धो᳚रू॒र्मावधि॑श्रि॒तः|का॒रंबिभ्र॑त्पुरु॒स्पृह᳚म्|| 1||वर्ग:3 |
| गि॒रायदी॒सब᳚न्धवः॒¦पञ्च॒व्राता᳚अप॒स्यवः॑|प॒रि॒ष्कृ॒ण्वन्ति॑धर्ण॒सिम्|| 2|| |
| आद॑स्यशु॒ष्मिणो॒रसे॒¦विश्वे᳚दे॒वा,अ॑मत्सत|यदी॒गोभि᳚र्वसा॒यते᳚|| 3|| |
| नि॒रि॒णा॒नोविधा᳚वति॒¦जह॒च्छर्या᳚णि॒तान्वा᳚|अत्रा॒संजि॑घ्रतेयु॒जा|| 4|| |
| न॒प्तीभि॒र्योवि॒वस्व॑तः¦शु॒भ्रोनमा᳚मृ॒जेयुवा᳚|गाःकृ᳚ण्वा॒नोननि॒र्णिज᳚म्|| 5|| |
| अति॑श्रि॒तीति॑र॒श्चता᳚¦ग॒व्याजि॑गा॒त्यण्व्या᳚|व॒ग्नुमि॑यर्ति॒यंवि॒दे|| 6||वर्ग:4 |
| अ॒भिक्षिपः॒सम॑ग्मत¦म॒र्जय᳚न्तीरि॒षस्पति᳚म्|पृ॒ष्ठागृ॑भ्णतवा॒जिनः॑|| 7|| |
| परि॑दि॒व्यानि॒मर्मृ॑श॒द्¦विश्वा᳚निसोम॒पार्थि॑वा|वसू᳚नियाह्यस्म॒युः|| 8|| |
| [15] एषधियेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:15}{अनुवाक:1, सूक्त:15}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| ए॒षधि॒याया॒त्यण्व्या॒¦शूरो॒रथे᳚भिरा॒शुभिः॑|गच्छ॒न्निन्द्र॑स्यनिष्कृ॒तम्|| 1||वर्ग:5 |
| ए॒षपु॒रूधि॑यायते¦बृह॒तेदे॒वता᳚तये|यत्रा॒मृता᳚स॒आस॑ते|| 2|| |
| ए॒षहि॒तोविनी᳚यते॒¦ऽन्तःशु॒भ्राव॑ताप॒था|यदी᳚तु॒ञ्जन्ति॒भूर्ण॑यः|| 3|| |
| ए॒षशृङ्गा᳚णि॒दोधु॑व॒¦च्छिशी᳚तेयू॒थ्यो॒३॑(ओ॒)वृषा᳚|नृ॒म्णादधा᳚न॒ओज॑सा|| 4|| |
| ए॒षरु॒क्मिभि॑रीयते¦वा॒जीशु॒भ्रेभि॑रं॒शुभिः॑|पतिः॒सिन्धू᳚नां॒भव॑न्|| 5|| |
| ए॒षवसू᳚निपिब्द॒ना¦परु॑षाययि॒वाँ,अति॑|अव॒शादे᳚षुगच्छति|| 6|| |
| ए॒तंमृ॑जन्ति॒मर्ज्य॒¦मुप॒द्रोणे᳚ष्वा॒यवः॑|प्र॒च॒क्रा॒णंम॒हीरिषः॑|| 7|| |
| ए॒तमु॒त्यंदश॒क्षिपो᳚¦मृ॒जन्ति॑स॒प्तधी॒तयः॑|स्वा॒यु॒धंम॒दिन्त॑मम्|| 8|| |
| [16] प्रतेसोतारइत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:16}{अनुवाक:1, सूक्त:16}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रते᳚सो॒तार॑ओ॒ण्यो॒३॑(ओ॒)¦रसं॒मदा᳚य॒घृष्व॑ये|सर्गो॒नत॒क्त्येत॑शः|| 1||वर्ग:6 |
| क्रत्वा॒दक्ष॑स्यर॒थ्य॑¦म॒पोवसा᳚न॒मन्ध॑सा|गो॒षामण्वे᳚षुसश्चिम|| 2|| |
| अन॑प्तम॒प्सुदु॒ष्टरं॒¦सोमं᳚प॒वित्र॒आसृ॑ज|पु॒नी॒हीन्द्रा᳚य॒पात॑वे|| 3|| |
| प्रपु॑ना॒नस्य॒चेत॑सा॒¦सोमः॑प॒वित्रे᳚अर्षति|क्रत्वा᳚स॒धस्थ॒मास॑दत्|| 4|| |
| प्रत्वा॒नमो᳚भि॒रिन्द॑व॒¦इन्द्र॒सोमा᳚असृक्षत|म॒हेभरा᳚यका॒रिणः॑|| 5|| |
| पु॒ना॒नोरू॒पे,अ॒व्यये॒¦विश्वा॒,अर्ष᳚न्न॒भिश्रियः॑|शूरो॒नगोषु॑तिष्ठति|| 6|| |
| दि॒वोनसानु॑पि॒प्युषी॒¦धारा᳚सु॒तस्य॑वे॒धसः॑|वृथा᳚प॒वित्रे᳚अर्षति|| 7|| |
| त्वंसो᳚मविप॒श्चितं॒¦तना᳚पुना॒नआ॒युषु॑|अव्यो॒वारं॒विधा᳚वसि|| 8|| |
| [17] प्रनिम्नेनेवेत्य ष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:17}{अनुवाक:1, सूक्त:17}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रनि॒म्नेने᳚व॒सिन्ध॑वो॒¦घ्नन्तो᳚वृ॒त्राणि॒भूर्ण॑यः|सोमा᳚असृग्रमा॒शवः॑|| 1||वर्ग:7 |
| अ॒भिसु॑वा॒नास॒इन्द॑वो¦वृ॒ष्टयः॑पृथि॒वीमि॑व|इन्द्रं॒सोमा᳚सो,अक्षरन्|| 2|| |
| अत्यू᳚र्मिर्मत्स॒रोमदः॒¦सोमः॑प॒वित्रे᳚अर्षति|वि॒घ्नन्रक्षां᳚सिदेव॒युः|| 3|| |
| आक॒लशे᳚षुधावति¦प॒वित्रे॒परि॑षिच्यते|उ॒क्थैर्य॒ज्ञेषु॑वर्धते|| 4|| |
| अति॒त्रीसो᳚मरोच॒ना¦रोह॒न्नभ्रा᳚जसे॒दिव᳚म्|इ॒ष्णन्त्सूर्यं॒नचो᳚दयः|| 5|| |
| अ॒भिविप्रा᳚अनूषत¦मू॒र्धन्य॒ज्ञस्य॑का॒रवः॑|दधा᳚ना॒श्चक्ष॑सिप्रि॒यम्|| 6|| |
| तमु॑त्वावा॒जिनं॒नरो᳚¦धी॒भिर्विप्रा᳚अव॒स्यवः॑|मृ॒जन्ति॑दे॒वता᳚तये|| 7|| |
| मधो॒र्धारा॒मनु॑क्षर¦ती॒व्रःस॒धस्थ॒मास॑दः|चारु᳚रृ॒ताय॑पी॒तये᳚|| 8|| |
| [18] परिसुवानइति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:18}{अनुवाक:1, सूक्त:18}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| परि॑सुवा॒नोगि॑रि॒ष्ठाः¦प॒वित्रे॒सोमो᳚अक्षाः|मदे᳚षुसर्व॒धा,अ॑सि|| 1||वर्ग:8 |
| त्वंविप्र॒स्त्वंक॒वि¦र्मधु॒प्रजा॒तमन्ध॑सः|मदे᳚षुसर्व॒धा,अ॑सि|| 2|| |
| तव॒विश्वे᳚स॒जोष॑सो¦दे॒वासः॑पी॒तिमा᳚शत|मदे᳚षुसर्व॒धा,अ॑सि|| 3|| |
| आयोविश्वा᳚नि॒वार्या॒¦वसू᳚नि॒हस्त॑योर्द॒धे|मदे᳚षुसर्व॒धा,अ॑सि|| 4|| |
| यइ॒मेरोद॑सीम॒ही¦संमा॒तरे᳚व॒दोह॑ते|मदे᳚षुसर्व॒धा,अ॑सि|| 5|| |
| परि॒योरोद॑सी,उ॒भे¦स॒द्योवाजे᳚भि॒रर्ष॑ति|मदे᳚षुसर्व॒धा,अ॑सि|| 6|| |
| सशु॒ष्मीक॒लशे॒ष्वा¦पु॑ना॒नो,अ॑चिक्रदत्|मदे᳚षुसर्व॒धा,अ॑सि|| 7|| |
| [19] यत्सोमेति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितःपवमा नसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:19}{अनुवाक:1, सूक्त:19}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| यत्सो᳚मचि॒त्रमु॒क्थ्यं᳚¦दि॒व्यंपार्थि॑वं॒वसु॑|तन्नः॑पुना॒नआभ॑र|| 1||वर्ग:9 |
| यु॒वंहिस्थःस्व॑र्पती॒,¦इन्द्र॑श्चसोम॒गोप॑ती|ई॒शा॒नापि॑प्यतं॒धियः॑|| 2|| |
| वृषा᳚पुना॒नआ॒युषु॑¦स्त॒नय॒न्नधि॑ब॒र्हिषि॑|हरिः॒सन्योनि॒मास॑दत्|| 3|| |
| अवा᳚वशन्तधी॒तयो᳚¦वृष॒भस्याधि॒रेत॑सि|सू॒नोर्व॒त्सस्य॑मा॒तरः॑|| 4|| |
| कु॒विद्वृ॑ष॒ण्यन्ती᳚भ्यः¦पुना॒नोगर्भ॑मा॒दध॑त्|याःशु॒क्रंदु॑ह॒तेपयः॑|| 5|| |
| उप॑शिक्षापत॒स्थुषो᳚¦भि॒यस॒माधे᳚हि॒शत्रु॑षु|पव॑मानवि॒दार॒यिम्|| 6|| |
| निशत्रोः᳚सोम॒वृष्ण्यं॒¦निशुष्मं॒निवय॑स्तिर|दू॒रेवा᳚स॒तो,अन्ति॑वा|| 7|| |
| [20] प्रकविरिति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:20}{अनुवाक:1, सूक्त:20}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रक॒विर्दे॒ववी᳚त॒ये¦ऽव्यो॒वारे᳚भिरर्षति|सा॒ह्वान्विश्वा᳚अ॒भिस्पृधः॑|| 1||वर्ग:10 |
| सहिष्मा᳚जरि॒तृभ्य॒आ¦वाजं॒गोम᳚न्त॒मिन्व॑ति|पव॑मानःसह॒स्रिण᳚म्|| 2|| |
| परि॒विश्वा᳚नि॒चेत॑सा¦मृ॒शसे॒पव॑सेम॒ती|सनः॑सोम॒श्रवो᳚विदः|| 3|| |
| अ॒भ्य॑र्षबृ॒हद्यशो᳚¦म॒घव॑द्भ्योध्रु॒वंर॒यिम्|इषं᳚स्तो॒तृभ्य॒आभ॑र|| 4|| |
| त्वंराजे᳚वसुव्र॒तो¦गिरः॑सो॒मावि॑वेशिथ|पु॒ना॒नोव᳚ह्ने,अद्भुत|| 5|| |
| सवह्नि॑र॒प्सुदु॒ष्टरो᳚¦मृ॒ज्यमा᳚नो॒गभ॑स्त्योः|सोम॑श्च॒मूषु॑सीदति|| 6|| |
| क्री॒ळुर्म॒खोनमं᳚ह॒युः¦प॒वित्रं᳚सोमगच्छसि|दध॑त्स्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|| 7|| |
| [21] एतेधावंतीति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:21}{अनुवाक:1, सूक्त:21}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| ए॒तेधा᳚व॒न्तीन्द॑वः॒¦सोमा॒,इन्द्रा᳚य॒घृष्व॑यः|म॒त्स॒रासः॑स्व॒र्विदः॑|| 1||वर्ग:11 |
| प्र॒वृ॒ण्वन्तो᳚अभि॒युजः॒¦सुष्व॑येवरिवो॒विदः॑|स्व॒यंस्तो॒त्रेव॑य॒स्कृतः॑|| 2|| |
| वृथा॒क्रीळ᳚न्त॒इन्द॑वः¦स॒धस्थ॑म॒भ्येक॒मित्|सिन्धो᳚रू॒र्माव्य॑क्षरन्|| 3|| |
| ए॒तेविश्वा᳚नि॒वार्या॒¦पव॑मानासआशत|हि॒तानसप्त॑यो॒रथे᳚|| 4|| |
| आस्मि᳚न्पि॒शङ्ग॑मिन्दवो॒¦दधा᳚तावे॒नमा॒दिशे᳚|यो,अ॒स्मभ्य॒मरा᳚वा|| 5|| |
| ऋ॒भुर्नरथ्यं॒नवं॒¦दधा᳚ता॒केत॑मा॒दिशे᳚|शु॒क्राःप॑वध्व॒मर्ण॑सा|| 6|| |
| ए॒तउ॒त्ये,अ॑वीवश॒न्¦काष्ठां᳚वा॒जिनो᳚अक्रत|स॒तःप्रासा᳚विषुर्म॒तिम्|| 7|| |
| [22] एतेसोमासइति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितःपवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:22}{अनुवाक:1, सूक्त:22}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| ए॒तेसोमा᳚सआ॒शवो॒¦रथा᳚इव॒प्रवा॒जिनः॑|सर्गाः᳚सृ॒ष्टा,अ॑हेषत|| 1||वर्ग:12 |
| ए॒तेवाता᳚इवो॒रवः॑¦प॒र्जन्य॑स्येववृ॒ष्टयः॑|अ॒ग्नेरि॑वभ्र॒मावृथा᳚|| 2|| |
| ए॒तेपू॒तावि॑प॒श्चितः॒¦सोमा᳚सो॒दध्या᳚शिरः|वि॒पाव्या᳚नशु॒र्धियः॑|| 3|| |
| ए॒तेमृ॒ष्टा,अम॑र्त्याः¦ससृ॒वांसो॒नश॑श्रमुः|इय॑क्षन्तःप॒थोरजः॑|| 4|| |
| ए॒तेपृ॒ष्ठानि॒रोद॑सो¦र्विप्र॒यन्तो॒व्या᳚नशुः|उ॒तेदमु॑त्त॒मंरजः॑|| 5|| |
| तन्तुं᳚तन्वा॒नमु॑त्त॒म¦मनु॑प्र॒वत॑आशत|उ॒तेदमु॑त्त॒माय्य᳚म्|| 6|| |
| त्वंसो᳚मप॒णिभ्य॒आ¦वसु॒गव्या᳚निधारयः|त॒तंतन्तु॑मचिक्रदः|| 7|| |
| [23] सोमा असृग्रमिति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:23}{अनुवाक:1, सूक्त:23}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| सोमा᳚असृग्रमा॒शवो॒¦मधो॒र्मद॑स्य॒धार॑या|अ॒भिविश्वा᳚नि॒काव्या᳚|| 1||वर्ग:13 |
| अनु॑प्र॒त्नास॑आ॒यवः॑¦प॒दंनवी᳚यो,अक्रमुः|रु॒चेज॑नन्त॒सूर्य᳚म्|| 2|| |
| आप॑वमाननोभरा॒¦र्यो,अदा᳚शुषो॒गय᳚म्|कृ॒धिप्र॒जाव॑ती॒रिषः॑|| 3|| |
| अ॒भिसोमा᳚सआ॒यवः॒¦पव᳚न्ते॒मद्यं॒मद᳚म्|अ॒भिकोशं᳚मधु॒श्चुत᳚म्|| 4|| |
| सोमो᳚अर्षतिधर्ण॒सि¦र्दधा᳚नइन्द्रि॒यंरस᳚म्|सु॒वीरो᳚अभिशस्ति॒पाः|| 5|| |
| इन्द्रा᳚यसोमपवसे¦दे॒वेभ्यः॑सध॒माद्यः॑|इन्दो॒वाजं᳚सिषाससि|| 6|| |
| अ॒स्यपी॒त्वामदा᳚ना॒¦मिन्द्रो᳚वृ॒त्राण्य॑प्र॒ति|ज॒घान॑ज॒घन॑च्च॒नु|| 7|| |
| [24] प्रसोमासइति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काश्यपोसितः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:24}{अनुवाक:1, सूक्त:24}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रसोमा᳚सो,अधन्विषुः॒¦पव॑मानास॒इन्द॑वः|श्री॒णा॒ना,अ॒प्सुमृ᳚ञ्जत|| 1||वर्ग:14 |
| अ॒भिगावो᳚अधन्विषु॒¦रापो॒नप्र॒वता᳚य॒तीः|पु॒ना॒ना,इन्द्र॑माशत|| 2|| |
| प्रप॑वमानधन्वसि॒¦सोमेन्द्रा᳚य॒पात॑वे|नृभि᳚र्य॒तोविनी᳚यसे|| 3|| |
| त्वंसो᳚मनृ॒माद॑नः॒¦पव॑स्वचर्षणी॒सहे᳚|सस्नि॒र्यो,अ॑नु॒माद्यः॑|| 4|| |
| इन्दो॒यदद्रि॑भिःसु॒तः¦प॒वित्रं᳚परि॒धाव॑सि|अर॒मिन्द्र॑स्य॒धाम्ने᳚|| 5|| |
| पव॑स्ववृत्रहन्तमो॒¦क्थेभि॑रनु॒माद्यः॑|शुचिः॑पाव॒को,अद्भु॑तः|| 6|| |
| शुचिः॑पाव॒कउ॑च्यते॒¦सोमः॑सु॒तस्य॒मध्वः॑|दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा|| 7|| |
| [25] पवस्वेति षडृचस्य सूक्तस्यागस्त्योदृळ्हच्युतः पवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:25}{अनुवाक:2, सूक्त:1}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| पव॑स्वदक्ष॒साध॑नो¦दे॒वेभ्यः॑पी॒तये᳚हरे|म॒रुद्भ्यो᳚वा॒यवे॒मदः॑|| 1||वर्ग:15 |
| पव॑मानधि॒याहि॒तो॒३॑(ओ॒)¦ऽभियोनिं॒कनि॑क्रदत्|धर्म॑णावा॒युमावि॑श|| 2|| |
| संदे॒वैःशो᳚भते॒वृषा᳚¦क॒विर्योना॒वधि॑प्रि॒यः|वृ॒त्र॒हादे᳚व॒वीत॑मः|| 3|| |
| विश्वा᳚रू॒पाण्या᳚वि॒शन्¦पु॑ना॒नोया᳚तिहर्य॒तः|यत्रा॒मृता᳚स॒आस॑ते|| 4|| |
| अ॒रु॒षोज॒नय॒न्गिरः॒¦सोमः॑पवतआयु॒षक्|इन्द्रं॒गच्छ᳚न्क॒विक्र॑तुः|| 5|| |
| आप॑वस्वमदिन्तम¦प॒वित्रं॒धार॑याकवे|अ॒र्कस्य॒योनि॑मा॒सद᳚म्|| 6|| |
| [26] तममृक्षंतेति षडृचस्य सूक्तस्य दार्डच्युतइध्मवाहः पवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:26}{अनुवाक:2, सूक्त:2}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| तम॑मृक्षन्तवा॒जिन॑¦मु॒पस्थे॒,अदि॑ते॒रधि॑|विप्रा᳚सो॒,अण्व्या᳚धि॒या|| 1||वर्ग:16 |
| तंगावो᳚अ॒भ्य॑नूषत¦स॒हस्र॑धार॒मक्षि॑तम्|इन्दुं᳚ध॒र्तार॒मादि॒वः|| 2|| |
| तंवे॒धांमे॒धया᳚ह्य॒न्¦पव॑मान॒मधि॒द्यवि॑|ध॒र्ण॒सिंभूरि॑धायसम्|| 3|| |
| तम॑ह्यन्भु॒रिजो᳚र्धि॒या¦सं॒वसा᳚नंवि॒वस्व॑तः|पतिं᳚वा॒चो,अदा᳚भ्यम्|| 4|| |
| तंसाना॒वधि॑जा॒मयो॒¦हरिं᳚हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|ह॒र्य॒तंभूरि॑चक्षसम्|| 5|| |
| तंत्वा᳚हिन्वन्तिवे॒धसः॒¦पव॑मानगिरा॒वृध᳚म्|इन्द॒विन्द्रा᳚यमत्स॒रम्|| 6|| |
| [27] एषकविरिति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसो नृमेधः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:27}{अनुवाक:2, सूक्त:3}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| ए॒षक॒विर॒भिष्टु॑तः¦प॒वित्रे॒,अधि॑तोशते|पु॒ना॒नोघ्नन्नप॒स्रिधः॑|| 1||वर्ग:17 |
| ए॒षइन्द्रा᳚यवा॒यवे᳚¦स्व॒र्जित्परि॑षिच्यते|प॒वित्रे᳚दक्ष॒साध॑नः|| 2|| |
| ए॒षनृभि॒र्विनी᳚यते¦दि॒वोमू॒र्धावृषा᳚सु॒तः|सोमो॒वने᳚षुविश्व॒वित्|| 3|| |
| ए॒षग॒व्युर॑चिक्रद॒त्¦पव॑मानोहिरण्य॒युः|इन्दुः॑सत्रा॒जिदस्तृ॑तः|| 4|| |
| ए॒षसूर्ये᳚णहासते॒¦पव॑मानो॒,अधि॒द्यवि॑|प॒वित्रे᳚मत्स॒रोमदः॑|| 5|| |
| ए॒षशु॒ष्म्य॑सिष्यद¦द॒न्तरि॑क्षे॒वृषा॒हरिः॑|पु॒ना॒नइन्दु॒रिन्द्र॒मा|| 6|| |
| [28] एषवाजीति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसः प्रियमेधः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:28}{अनुवाक:2, सूक्त:4}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| ए॒षवा॒जीहि॒तोनृभि᳚¦र्विश्व॒विन्मन॑स॒स्पतिः॑|अव्यो॒वारं॒विधा᳚वति|| 1||वर्ग:18 |
| ए॒षप॒वित्रे᳚अक्षर॒त्¦सोमो᳚दे॒वेभ्यः॑सु॒तः|विश्वा॒धामा᳚न्यावि॒शन्|| 2|| |
| ए॒षदे॒वःशु॑भाय॒ते¦ऽधि॒योना॒वम॑र्त्यः|वृ॒त्र॒हादे᳚व॒वीत॑मः|| 3|| |
| ए॒षवृषा॒कनि॑क्रदद्¦द॒शभि॑र्जा॒मिभि᳚र्य॒तः|अ॒भिद्रोणा᳚निधावति|| 4|| |
| ए॒षसूर्य॑मरोचय॒त्¦पव॑मानो॒विच॑र्षणिः|विश्वा॒धामा᳚निविश्व॒वित्|| 5|| |
| ए॒षशु॒ष्म्यदा᳚भ्यः॒¦सोमः॑पुना॒नो,अ॑र्षति|दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा|| 6|| |
| [29] प्रास्यधाराइति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोनृमेधः पवमान सोमो गायत्री{मंडल:9, सूक्त:29}{अनुवाक:2, सूक्त:5}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रास्य॒धारा᳚अक्षर॒न्¦वृष्णः॑सु॒तस्यौज॑सा|दे॒वाँ,अनु॑प्र॒भूष॑तः|| 1||वर्ग:19 |
| सप्तिं᳚मृजन्तिवे॒धसो᳚¦गृ॒णन्तः॑का॒रवो᳚गि॒रा|ज्योति॑र्जज्ञा॒नमु॒क्थ्य᳚म्|| 2|| |
| सु॒षहा᳚सोम॒तानि॑ते¦पुना॒नाय॑प्रभूवसो|वर्धा᳚समु॒द्रमु॒क्थ्य᳚म्|| 3|| |
| विश्वा॒वसू᳚निसं॒जय॒न्¦पव॑स्वसोम॒धार॑या|इ॒नुद्वेषां᳚सिस॒ध्र्य॑क्|| 4|| |
| रक्षा॒सुनो॒,अर॑रुषः¦स्व॒नात्स॑मस्य॒कस्य॑चित्|नि॒दोयत्र॑मुमु॒च्महे᳚|| 5|| |
| एन्दो॒पार्थि॑वंर॒यिं¦दि॒व्यंप॑वस्व॒धार॑या|द्यु॒मन्तं॒शुष्म॒माभ॑र|| 6|| |
| [30] प्रधाराइति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसो बिंदुः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:30}{अनुवाक:2, सूक्त:6}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रधारा᳚अस्यशु॒ष्मिणो॒¦वृथा᳚प॒वित्रे᳚अक्षरन्|पु॒ना॒नोवाच॑मिष्यति|| 1||वर्ग:20 |
| इन्दु᳚र्हिया॒नःसो॒तृभि᳚¦र्मृ॒ज्यमा᳚नः॒कनि॑क्रदत्|इय॑र्तिव॒ग्नुमि᳚न्द्रि॒यम्|| 2|| |
| आनः॒शुष्मं᳚नृ॒षाह्यं᳚¦वी॒रव᳚न्तंपुरु॒स्पृह᳚म्|पव॑स्वसोम॒धार॑या|| 3|| |
| प्रसोमो॒,अति॒धार॑या॒¦पव॑मानो,असिष्यदत्|अ॒भिद्रोणा᳚न्या॒सद᳚म्|| 4|| |
| अ॒प्सुत्वा॒मधु॑मत्तमं॒¦हरिं᳚हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|इन्द॒विन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 5|| |
| सु॒नोता॒मधु॑मत्तमं॒¦सोम॒मिन्द्रा᳚यव॒ज्रिणे᳚|चारुं॒शर्धा᳚यमत्स॒रम्|| 6|| |
| [31] प्रसोमासइति षडृचस्य सूक्तस्य राहूगणोगोतमःपवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:31}{अनुवाक:2, सूक्त:7}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रसोमा᳚सःस्वा॒ध्य१॑(अः॒)¦पव॑मानासो,अक्रमुः|र॒यिंकृ᳚ण्वन्ति॒चेत॑नम्|| 1||वर्ग:21 |
| दि॒वस्पृ॑थि॒व्या,अधि॒¦भवे᳚न्दोद्युम्न॒वर्ध॑नः|भवा॒वाजा᳚नां॒पतिः॑|| 2|| |
| तुभ्यं॒वाता᳚अभि॒प्रिय॒¦स्तुभ्य॑मर्षन्ति॒सिन्ध॑वः|सोम॒वर्ध᳚न्तिते॒महः॑|| 3|| |
| आप्या᳚यस्व॒समे᳚तुते¦वि॒श्वतः॑सोम॒वृष्ण्य᳚म्|भवा॒वाज॑स्यसंग॒थे|| 4|| |
| तुभ्यं॒गावो᳚घृ॒तंपयो॒¦बभ्रो᳚दुदु॒ह्रे,अक्षि॑तम्|वर्षि॑ष्ठे॒,अधि॒सान॑वि|| 5|| |
| स्वा॒यु॒धस्य॑तेस॒तो¦भुव॑नस्यपतेव॒यम्|इन्दो᳚सखि॒त्वमु॑श्मसि|| 6|| |
| [32] प्रसोमासइति षडृचस्य सूक्तस्यात्रेयः श्यावाश्वः पवमान सोमो गायत्री {मंडल:9, सूक्त:32}{अनुवाक:2, सूक्त:8}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रसोमा᳚सोमद॒च्युतः॒¦श्रव॑सेनोम॒घोनः॑|सु॒तावि॒दथे᳚अक्रमुः|| 1||वर्ग:22 |
| आदीं᳚त्रि॒तस्य॒योष॑णो॒¦हरिं᳚हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|इन्दु॒मिन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 2|| |
| आदीं᳚हं॒सोयथा᳚ग॒णं¦विश्व॑स्यावीवशन्म॒तिम्|अत्यो॒नगोभि॑रज्यते|| 3|| |
| उ॒भेसो᳚माव॒चाक॑शन्¦मृ॒गोनत॒क्तो,अ॑र्षसि|सीद᳚न्नृ॒तस्य॒योनि॒मा|| 4|| |
| अ॒भिगावो᳚अनूषत॒¦योषा᳚जा॒रमि॑वप्रि॒यम्|अग᳚न्ना॒जिंयथा᳚हि॒तम्|| 5|| |
| अ॒स्मेधे᳚हिद्यु॒मद्यशो᳚¦म॒घव॑द्भ्यश्च॒मह्यं᳚च|स॒निंमे॒धामु॒तश्रवः॑|| 6|| |
| [33] प्रसोमासइति षडृचस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितः पवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:33}{अनुवाक:2, सूक्त:9}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रसोमा᳚सोविप॒श्चितो॒¦ऽपांनय᳚न्त्यू॒र्मयः॑|वना᳚निमहि॒षा,इ॑व|| 1||वर्ग:23 |
| अ॒भिद्रोणा᳚निब॒भ्रवः॑¦शु॒क्रा,ऋ॒तस्य॒धार॑या|वाजं॒गोम᳚न्तमक्षरन्|| 2|| |
| सु॒ता,इन्द्रा᳚यवा॒यवे॒¦वरु॑णायम॒रुद्भ्यः॑|सोमा᳚अर्षन्ति॒विष्ण॑वे|| 3|| |
| ति॒स्रोवाच॒उदी᳚रते॒¦गावो᳚मिमन्तिधे॒नवः॑|हरि॑रेति॒कनि॑क्रदत्|| 4|| |
| अ॒भिब्रह्मी᳚रनूषत¦य॒ह्वीरृ॒तस्य॑मा॒तरः॑|म॒र्मृ॒ज्यन्ते᳚दि॒वःशिशु᳚म्|| 5|| |
| रा॒यःस॑मु॒द्राँश्च॒तुरो॒¦ऽस्मभ्यं᳚सोमवि॒श्वतः॑|आप॑वस्वसह॒स्रिणः॑|| 6|| |
| [34] प्रसुवानइति षडृचस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितः पवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:34}{अनुवाक:2, सूक्त:10}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रसु॑वा॒नोधार॑या॒तनेन्¦दु᳚र्हिन्वा॒नो,अ॑र्षति|रु॒जद्दृ॒ळ्हाव्योज॑सा|| 1||वर्ग:24 |
| सु॒तइन्द्रा᳚यवा॒यवे॒¦वरु॑णायम॒रुद्भ्यः॑|सोमो᳚अर्षति॒विष्ण॑वे|| 2|| |
| वृषा᳚णं॒वृष॑भिर्य॒तं¦सु॒न्वन्ति॒सोम॒मद्रि॑भिः|दु॒हन्ति॒शक्म॑ना॒पयः॑|| 3|| |
| भुव॑त्त्रि॒तस्य॒मर्ज्यो॒¦भुव॒दिन्द्रा᳚यमत्स॒रः|संरू॒पैर॑ज्यते॒¦हरिः॑|| 4|| |
| अ॒भीमृ॒तस्य॑वि॒ष्टपं᳚¦दुह॒तेपृश्नि॑मातरः|चारु॑प्रि॒यत॑मंह॒विः|| 5|| |
| समे᳚न॒मह्रु॑ता,इ॒मा¦गिरो᳚अर्षन्तिस॒स्रुतः॑|धे॒नूर्वा॒श्रो,अ॑वीवशत्|| 6|| |
| [35] आनःपवस्वेति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसःप्रभूवसुः पवमानसोमोगायत्री | {मंडल:9, सूक्त:35}{अनुवाक:2, सूक्त:11}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| आनः॑पवस्व॒धार॑या॒¦पव॑मानर॒यिंपृ॒थुम्|यया॒ज्योति᳚र्वि॒दासि॑नः|| 1||वर्ग:25 |
| इन्दो᳚समुद्रमीङ्खय॒¦पव॑स्वविश्वमेजय|रा॒योध॒र्तान॒ओज॑सा|| 2|| |
| त्वया᳚वी॒रेण॑वीरवो॒¦ऽभिष्या᳚मपृतन्य॒तः|क्षरा᳚णो,अ॒भिवार्य᳚म्|| 3|| |
| प्रवाज॒मिन्दु॑रिष्यति॒¦सिषा᳚सन्वाज॒सा,ऋषिः॑|व्र॒तावि॑दा॒नआयु॑धा|| 4|| |
| तंगी॒र्भिर्वा᳚चमीङ्ख॒यं¦पु॑ना॒नंवा᳚सयामसि|सोमं॒जन॑स्य॒गोप॑तिम्|| 5|| |
| विश्वो॒यस्य᳚व्र॒तेजनो᳚¦दा॒धार॒धर्म॑ण॒स्पतेः᳚|पु॒ना॒नस्य॑प्र॒भूव॑सोः|| 6|| |
| [36] असर्जीति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसः प्रभूवसुः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:36}{अनुवाक:2, सूक्त:12}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| अस॑र्जि॒रथ्यो᳚यथा¦प॒वित्रे᳚च॒म्वोः᳚सु॒तः|कार्ष्म᳚न्वा॒जीन्य॑क्रमीत्|| 1||वर्ग:26 |
| सवह्निः॑सोम॒जागृ॑विः॒¦पव॑स्वदेव॒वीरति॑|अ॒भिकोशं᳚मधु॒श्चुत᳚म्|| 2|| |
| सनो॒ज्योतीं᳚षिपूर्व्य॒¦पव॑मान॒विरो᳚चय|क्रत्वे॒दक्षा᳚यनोहिनु|| 3|| |
| शु॒म्भमा᳚नऋता॒युभि᳚¦र्मृ॒ज्यमा᳚नो॒गभ॑स्त्योः|पव॑ते॒वारे᳚अ॒व्यये᳚|| 4|| |
| सविश्वा᳚दा॒शुषे॒वसु॒¦सोमो᳚दि॒व्यानि॒पार्थि॑वा|पव॑ता॒मान्तरि॑क्ष्या|| 5|| |
| आदि॒वस्पृ॒ष्ठम॑श्व॒यु¦र्ग᳚व्य॒युःसो᳚मरोहसि|वी॒र॒युःश॑वसस्पते|| 6|| |
| [37] ससुतइति षडृचस्यसूक्तस्यांगिरसोरहूगणः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:37}{अनुवाक:2, सूक्त:13}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| ससु॒तःपी॒तये॒वृषा॒¦सोमः॑प॒वित्रे᳚अर्षति|वि॒घ्नन्रक्षां᳚सिदेव॒युः|| 1||वर्ग:27 |
| सप॒वित्रे᳚विचक्ष॒णो¦हरि॑रर्षतिधर्ण॒सिः|अ॒भियोनिं॒कनि॑क्रदत्|| 2|| |
| सवा॒जीरो᳚च॒नादि॒वः¦पव॑मानो॒विधा᳚वति|र॒क्षो॒हावार॑म॒व्यय᳚म्|| 3|| |
| सत्रि॒तस्याधि॒सान॑वि॒¦पव॑मानो,अरोचयत्|जा॒मिभिः॒सूर्यं᳚स॒ह|| 4|| |
| सवृ॑त्र॒हावृषा᳚सु॒तो¦व॑रिवो॒विददा᳚भ्यः|सोमो॒वाज॑मिवासरत्|| 5|| |
| सदे॒वःक॒विने᳚षि॒तो॒३॑(ओ॒)¦ऽभिद्रोणा᳚निधावति|इन्दु॒रिन्द्रा᳚यमं॒हना᳚|| 6|| |
| [38] एषउस्यइति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोरहूगणः पवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:38}{अनुवाक:2, सूक्त:14}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| ए॒षउ॒स्यवृषा॒रथो¦ऽव्यो॒वारे᳚भिरर्षति|गच्छ॒न्वाजं᳚सह॒स्रिण᳚म्|| 1||वर्ग:28 |
| ए॒तंत्रि॒तस्य॒योष॑णो॒¦हरिं᳚हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|इन्दु॒मिन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 2|| |
| ए॒तंत्यंह॒रितो॒दश॑¦मर्मृ॒ज्यन्ते᳚अप॒स्युवः॑|याभि॒र्मदा᳚य॒शुम्भ॑ते|| 3|| |
| ए॒षस्यमानु॑षी॒ष्वा¦श्ये॒नोनवि॒क्षुसी᳚दति|गच्छ᳚ञ्जा॒रोनयो॒षित᳚म्|| 4|| |
| ए॒षस्यमद्यो॒रसो¦ऽव॑चष्टेदि॒वःशिशुः॑|यइन्दु॒र्वार॒मावि॑शत्|| 5|| |
| ए॒षस्यपी॒तये᳚सु॒तो¦हरि॑रर्षतिधर्ण॒सिः|क्रन्द॒न्योनि॑म॒भिप्रि॒यम्|| 6|| |
| [39] आशुरर्षेति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसो बृहन्मतिः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:39}{अनुवाक:2, सूक्त:15}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| आ॒शुर॑र्षबृहन्मते॒¦परि॑प्रि॒येण॒धाम्ना᳚|यत्र॑दे॒वा,इति॒ब्रव॑न्|| 1||वर्ग:29 |
| प॒रि॒ष्कृ॒ण्वन्ननि॑ष्कृतं॒¦जना᳚यया॒तय॒न्निषः॑|वृ॒ष्टिंदि॒वःपरि॑स्रव|| 2|| |
| सु॒तए᳚तिप॒वित्र॒आ¦त्विषिं॒दधा᳚न॒ओज॑सा|वि॒चक्षा᳚णोविरो॒चय॑न्|| 3|| |
| अ॒यंसयोदि॒वस्परि॑¦रघु॒यामा᳚प॒वित्र॒आ|सिन्धो᳚रू॒र्माव्यक्ष॑रत्|| 4|| |
| आ॒विवा᳚सन्परा॒वतो॒,¦अथो᳚अर्वा॒वतः॑सु॒तः|इन्द्रा᳚यसिच्यते॒मधु॑|| 5|| |
| स॒मी॒ची॒ना,अ॑नूषत॒¦हरिं᳚हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|योना᳚वृ॒तस्य॑सीदत|| 6|| |
| [40] पुनानइति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसो बृहन्मतिः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:40}{अनुवाक:2, सूक्त:16}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| पु॒ना॒नो,अ॑क्रमीद॒भि¦विश्वा॒मृधो॒विच॑र्षणिः|शु॒म्भन्ति॒विप्रं᳚धी॒तिभिः॑|| 1||वर्ग:30 |
| आयोनि॑मरु॒णोरु॑ह॒द्¦गम॒दिन्द्रं॒वृषा᳚सु॒तः|ध्रु॒वेसद॑सिसीदति|| 2|| |
| नूनो᳚र॒यिंम॒हामि᳚न्दो॒¦ऽस्मभ्यं᳚सोमवि॒श्वतः॑|आप॑वस्वसह॒स्रिण᳚म्|| 3|| |
| विश्वा᳚सोमपवमान¦द्यु॒म्नानी᳚न्द॒वाभ॑र|वि॒दाःस॑ह॒स्रिणी॒रिषः॑|| 4|| |
| सनः॑पुना॒नआभ॑र¦र॒यिंस्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|ज॒रि॒तुर्व॑र्धया॒गिरः॑|| 5|| |
| पु॒ना॒नइ᳚न्द॒वाभ॑र॒¦सोम॑द्वि॒बर्ह॑संर॒यिम्|वृष᳚न्निन्दोनउ॒क्थ्य᳚म्|| 6|| |
| [41] प्रयेगावइतिषडृचस्य सूक्तस्यकाण्वोमेध्यातिथिः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:41}{अनुवाक:2, सूक्त:17}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| प्रयेगावो॒नभूर्ण॑य¦स्त्वे॒षा,अ॒यासो॒,अक्र॑मुः|घ्नन्तः॑कृ॒ष्णामप॒त्वच᳚म्|| 1||वर्ग:31 |
| सु॒वि॒तस्य॑मनाम॒हे¦ऽति॒सेतुं᳚दुरा॒व्य᳚म्|सा॒ह्वांसो॒दस्यु॑मव्र॒तम्|| 2|| |
| शृ॒ण्वेवृ॒ष्टेरि॑वस्व॒नः¦पव॑मानस्यशु॒ष्मिणः॑|चर᳚न्तिवि॒द्युतो᳚दि॒वि|| 3|| |
| आप॑वस्वम॒हीमिषं॒¦गोम॑दिन्दो॒हिर᳚ण्यवत्|अश्वा᳚व॒द्वाज॑वत्सु॒तः|| 4|| |
| सप॑वस्वविचर्षण॒¦आम॒हीरोद॑सीपृण|उ॒षाःसूर्यो॒नर॒श्मिभिः॑|| 5|| |
| परि॑णःशर्म॒यन्त्या॒¦धार॑यासोमवि॒श्वतः॑|सरा᳚र॒सेव॑वि॒ष्टप᳚म्|| 6|| |
| [42] जनयन्नितिषडृचस्य सूक्तस्यकाण्वोमेध्यातिथिः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:42}{अनुवाक:2, सूक्त:18}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| ज॒नय᳚न्रोच॒नादि॒वो¦ज॒नय᳚न्न॒प्सुसूर्य᳚म्|वसा᳚नो॒गा,अ॒पोहरिः॑|| 1||वर्ग:32 |
| ए॒षप्र॒त्नेन॒मन्म॑ना¦दे॒वोदे॒वेभ्य॒स्परि॑|धार॑यापवतेसु॒तः|| 2|| |
| वा॒वृ॒धा॒नाय॒तूर्व॑ये॒¦पव᳚न्ते॒वाज॑सातये|सोमाः᳚स॒हस्र॑पाजसः|| 3|| |
| दु॒हा॒नःप्र॒त्नमित्पयः॑¦प॒वित्रे॒परि॑षिच्यते|क्रन्द᳚न्दे॒वाँ,अ॑जीजनत्|| 4|| |
| अ॒भिविश्वा᳚नि॒वार्या॒¦भिदे॒वाँऋ॑ता॒वृधः॑|सोमः॑पुना॒नो,अ॑र्षति|| 5|| |
| गोम᳚न्नःसोमवी॒रव॒¦दश्वा᳚व॒द्वाज॑वत्सु॒तः|पव॑स्वबृह॒तीरिषः॑|| 6|| |
| [43] योअत्यइवेतिषडृचस्य सूक्तस्यकाण्वोमेध्यातिथिः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:43}{अनुवाक:2, सूक्त:19}{अष्टक:6, अध्याय:8} |
| यो,अत्य॑इवमृ॒ज्यते॒¦गोभि॒र्मदा᳚यहर्य॒तः|तंगी॒र्भिर्वा᳚सयामसि|| 1||वर्ग:33 |
| तंनो॒विश्वा᳚अव॒स्युवो॒¦गिरः॑शुम्भन्तिपू॒र्वथा᳚|इन्दु॒मिन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 2|| |
| पु॒ना॒नोया᳚तिहर्य॒तः¦सोमो᳚गी॒र्भिःपरि॑ष्कृतः|विप्र॑स्य॒मेध्या᳚तिथेः|| 3|| |
| पव॑मानवि॒दार॒यि¦म॒स्मभ्यं᳚सोमसु॒श्रिय᳚म्|इन्दो᳚स॒हस्र॑वर्चसम्|| 4|| |
| इन्दु॒रत्यो॒नवा᳚ज॒सृत्¦कनि॑क्रन्तिप॒वित्र॒आ|यदक्षा॒रति॑देव॒युः|| 5|| |
| पव॑स्व॒वाज॑सातये॒¦विप्र॑स्यगृण॒तोवृ॒धे|सोम॒रास्व॑सु॒वीर्य᳚म्|| 6|| |
| [44] प्रणइंदविति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोयास्यः पवमानसोमो गायत्री | (पवमान पारायण तृतीयोध्यायः){मंडल:9, सूक्त:44}{अनुवाक:2, सूक्त:20}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| प्रण॑इन्दोम॒हेतन॑¦ऊ॒र्मिंनबिभ्र॑दर्षसि|अ॒भिदे॒वाँ,अ॒यास्यः॑|| 1||वर्ग:1 |
| म॒तीजु॒ष्टोधि॒याहि॒तः¦सोमो᳚हिन्वेपरा॒वति॑|विप्र॑स्य॒धार॑याक॒विः|| 2|| |
| अ॒यंदे॒वेषु॒जागृ॑विः¦सु॒तए᳚तिप॒वित्र॒आ|सोमो᳚याति॒विच॑र्षणिः|| 3|| |
| सनः॑पवस्ववाज॒युश्¦च॑क्रा॒णश्चारु॑मध्व॒रम्|ब॒र्हिष्माँ॒,आवि॑वासति|| 4|| |
| सनो॒भगा᳚यवा॒यवे॒¦विप्र॑वीरःस॒दावृ॑धः|सोमो᳚दे॒वेष्वाय॑मत्|| 5|| |
| सनो᳚अ॒द्यवसु॑त्तये¦क्रतु॒विद्गा᳚तु॒वित्त॑मः|वाजं᳚जेषि॒श्रवो᳚बृ॒हत्|| 6|| |
| [45] स पवस्वेति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोयास्यः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:45}{अनुवाक:2, सूक्त:21}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| सप॑वस्व॒मदा᳚य॒कं¦नृ॒चक्षा᳚दे॒ववी᳚तये|इन्द॒विन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 1||वर्ग:2 |
| सनो᳚अर्षा॒भिदू॒त्य१॑(अं॒)¦त्वमिन्द्रा᳚यतोशसे|दे॒वान्त्सखि॑भ्य॒आवर᳚म्|| 2|| |
| उ॒तत्वाम॑रु॒णंव॒यं¦गोभि॑रञ्ज्मो॒मदा᳚य॒कम्|विनो᳚रा॒येदुरो᳚वृधि|| 3|| |
| अत्यू᳚प॒वित्र॑मक्रमीद्¦वा॒जीधुरं॒नयाम॑नि|इन्दु॑र्दे॒वेषु॑पत्यते|| 4|| |
| समी॒सखा᳚यो,अस्वर॒न्¦वने॒क्रीळ᳚न्त॒मत्य॑विम्|इन्दुं᳚ना॒वा,अ॑नूषत|| 5|| |
| तया᳚पवस्व॒धार॑या॒¦यया᳚पी॒तोवि॒चक्ष॑से|इन्दो᳚स्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|| 6|| |
| [46] असृग्रनिति षडृचस्य सूक्तस्यांगिरसोयास्यः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:46}{अनुवाक:2, सूक्त:22}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| असृ॑ग्रन्दे॒ववी᳚त॒ये¦ऽत्या᳚सः॒कृत्व्या᳚इव|क्षर᳚न्तःपर्वता॒वृधः॑|| 1||वर्ग:3 |
| परि॑ष्कृतास॒इन्द॑वो॒¦योषे᳚व॒पित्र्या᳚वती|वा॒युंसोमा᳚असृक्षत|| 2|| |
| ए॒तेसोमा᳚स॒इन्द॑वः॒¦प्रय॑स्वन्तश्च॒मूसु॒ताः|इन्द्रं᳚वर्धन्ति॒कर्म॑भिः|| 3|| |
| आधा᳚वतासुहस्त्यः¦शु॒क्रागृ॑भ्णीतम॒न्थिना᳚|गोभिः॑श्रीणीतमत्स॒रम्|| 4|| |
| सप॑वस्वधनंजय¦प्रय॒न्ताराध॑सोम॒हः|अ॒स्मभ्यं᳚सोमगातु॒वित्|| 5|| |
| ए॒तंमृ॑जन्ति॒मर्ज्यं॒¦पव॑मानं॒दश॒क्षिपः॑|इन्द्रा᳚यमत्स॒रंमद᳚म्|| 6|| |
| [47] अयासोमइति पञ्चर्चस्य सूक्तस्य भार्गवःकविः पवमानसोमो गायत्री{मंडल:9, सूक्त:47}{अनुवाक:2, सूक्त:23}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| अ॒यासोमः॑सुकृ॒त्यया᳚¦म॒हश्चि॑द॒भ्य॑वर्धत|म॒न्दा॒नउद्वृ॑षायते|| 1||वर्ग:4 |
| कृ॒तानीद॑स्य॒कर्त्वा॒¦चेत᳚न्तेदस्यु॒तर्ह॑णा|ऋ॒णाच॑धृ॒ष्णुश्च॑यते|| 2|| |
| आत्सोम॑इन्द्रि॒योरसो॒¦वज्रः॑सहस्र॒साभु॑वत्|उ॒क्थंयद॑स्य॒जाय॑ते|| 3|| |
| स्व॒यंक॒विर्वि॑ध॒र्तरि॒¦विप्रा᳚य॒रत्न॑मिच्छति|यदी᳚मर्मृ॒ज्यते॒धियः॑|| 4|| |
| सि॒षा॒सतू᳚रयी॒णां¦वाजे॒ष्वर्व॑तामिव|भरे᳚षुजि॒ग्युषा᳚मसि|| 5|| |
| [48] तंत्वेति पञ्चर्चस्य सूक्तस्य भार्गवःकविः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:48}{अनुवाक:2, सूक्त:24}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| तंत्वा᳚नृ॒म्णानि॒बिभ्र॑तं¦स॒धस्थे᳚षुम॒होदि॒वः|चारुं᳚सुकृ॒त्यये᳚महे|| 1||वर्ग:5 |
| संवृ॑क्तधृष्णुमु॒क्थ्यं᳚¦म॒हाम॑हिव्रतं॒मद᳚म्|श॒तंपुरो᳚रुरु॒क्षणि᳚म्|| 2|| |
| अत॑स्त्वार॒यिम॒भि¦राजा᳚नंसुक्रतोदि॒वः|सु॒प॒र्णो,अ᳚व्य॒थिर्भ॑रत्|| 3|| |
| विश्व॑स्मा॒,इत्स्व॑र्दृ॒शे¦साधा᳚रणंरज॒स्तुर᳚म्|गो॒पामृ॒तस्य॒विर्भ॑रत्|| 4|| |
| अधा᳚हिन्वा॒नइ᳚न्द्रि॒यं¦ज्यायो᳚महि॒त्वमा᳚नशे|अ॒भि॒ष्टि॒कृद्विच॑र्षणिः|| 5|| |
| [49] पवस्वेति पञ्चर्चस्य सूक्तस्य भार्गवःकविः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:49}{अनुवाक:2, सूक्त:25}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| पव॑स्ववृ॒ष्टिमासुनो॒¦ऽपामू॒र्मिंदि॒वस्परि॑|अ॒य॒क्ष्माबृ॑ह॒तीरिषः॑|| 1||वर्ग:6 |
| तया᳚पवस्व॒धार॑या॒¦यया॒गाव॑इ॒हागम॑न्|जन्या᳚स॒उप॑नोगृ॒हम्|| 2|| |
| घृ॒तंप॑वस्व॒धार॑या¦य॒ज्ञेषु॑देव॒वीत॑मः|अ॒स्मभ्यं᳚वृ॒ष्टिमाप॑व|| 3|| |
| सन॑ऊ॒र्जेव्य१॑(अ॒)व्ययं᳚¦प॒वित्रं᳚धाव॒धार॑या|दे॒वासः॑शृ॒णव॒न्हिक᳚म्|| 4|| |
| पव॑मानो,असिष्यद॒द्¦रक्षां᳚स्यप॒जङ्घ॑नत्|प्र॒त्न॒वद्रो॒चय॒न्रुचः॑|| 5|| |
| [50] उत्तेशुष्मासइति पञ्चर्चस्य सूक्तस्यांगिरस उचथ्यः पवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:50}{अनुवाक:2, सूक्त:26}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| उत्ते॒शुष्मा᳚सईरते॒¦सिन्धो᳚रू॒र्मेरि॑वस्व॒नः|वा॒णस्य॑चोदयाप॒विम्|| 1||वर्ग:7 |
| प्र॒स॒वेत॒उदी᳚रते¦ति॒स्रोवाचो᳚मख॒स्युवः॑|यदव्य॒एषि॒सान॑वि|| 2|| |
| अव्यो॒वारे॒परि॑प्रि॒यं¦हरिं᳚हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः|पव॑मानंमधु॒श्चुत᳚म्|| 3|| |
| आप॑वस्वमदिन्तम¦प॒वित्रं॒धार॑याकवे|अ॒र्कस्य॒योनि॑मा॒सद᳚म्|| 4|| |
| सप॑वस्वमदिन्तम॒¦गोभि॑रञ्जा॒नो,अ॒क्तुभिः॑|इन्द॒विन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 5|| |
| [51] अध्वर्यविति पञ्चर्चस्य सूक्तस्यांगिरस उचथ्यः पवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:51}{अनुवाक:2, सूक्त:27}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| अध्व᳚र्यो॒,अद्रि॑भिःसु॒तं¦सोमं᳚प॒वित्र॒आसृ॑ज|पु॒नी॒हीन्द्रा᳚य॒पात॑वे|| 1||वर्ग:8 |
| दि॒वःपी॒यूष॑मुत्त॒मं¦सोम॒मिन्द्रा᳚यव॒ज्रिणे᳚|सु॒नोता॒मधु॑मत्तमम्|| 2|| |
| तव॒त्यइ᳚न्दो॒,अन्ध॑सो¦दे॒वामधो॒र्व्य॑श्नते|पव॑मानस्यम॒रुतः॑|| 3|| |
| त्वंहिसो᳚मव॒र्धय॑न्¦त्सु॒तोमदा᳚य॒भूर्ण॑ये|वृष᳚न्त्स्तो॒तार॑मू॒तये᳚|| 4|| |
| अ॒भ्य॑र्षविचक्षण¦प॒वित्रं॒धार॑यासु॒तः|अ॒भिवाज॑मु॒तश्रवः॑|| 5|| |
| [52] परिद्युक्षइति पञ्चर्चस्य सूक्तस्यांगिरस उचथ्यः पवमान सोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:52}{अनुवाक:2, सूक्त:28}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| परि॑द्यु॒क्षःस॒नद्र॑यि॒¦र्भर॒द्वाजं᳚नो॒,अन्ध॑सा|सु॒वा॒नो,अ॑र्षप॒वित्र॒आ|| 1||वर्ग:9 |
| तव॑प्र॒त्नेभि॒रध्व॑भि॒¦रव्यो॒वारे॒परि॑प्रि॒यः|स॒हस्र॑धारोया॒त्तना᳚|| 2|| |
| च॒रुर्नयस्तमी᳚ङ्ख॒येन्¦दो॒नदान॑मीङ्खय|व॒धैर्व॑धस्नवीङ्खय|| 3|| |
| निशुष्म॑मिन्दवेषां॒¦पुरु॑हूत॒जना᳚नाम्|यो,अ॒स्माँ,आ॒दिदे᳚शति|| 4|| |
| श॒तंन॑इन्दऊ॒तिभिः॑¦स॒हस्रं᳚वा॒शुची᳚नाम्|पव॑स्वमंह॒यद्र॑यिः|| 5|| |
| [53] उत्तेशुष्मासइति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:53}{अनुवाक:2, सूक्त:29}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| उत्ते॒शुष्मा᳚सो,अस्थू॒¦रक्षो᳚भि॒न्दन्तो᳚अद्रिवः|नु॒दस्व॒याःप॑रि॒स्पृधः॑|| 1||वर्ग:10 |
| अ॒यानि॑ज॒घ्निरोज॑सा¦रथसं॒गेधने᳚हि॒ते|स्तवा॒,अबि॑भ्युषाहृ॒दा|| 2|| |
| अस्य᳚व्र॒तानि॒नाधृषे॒¦पव॑मानस्यदू॒ढ्या᳚|रु॒जयस्त्वा᳚पृत॒न्यति॑|| 3|| |
| तंहि᳚न्वन्तिमद॒च्युतं॒¦हरिं᳚न॒दीषु॑वा॒जिन᳚म्|इन्दु॒मिन्द्रा᳚यमत्स॒रम्|| 4|| |
| [54] अस्यप्रत्नामिति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:54}{अनुवाक:2, सूक्त:30}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| अ॒स्यप्र॒त्नामनु॒द्युतं᳚¦शु॒क्रंदु॑दुह्रे॒,अह्र॑यः|पयः॑सहस्र॒सामृषि᳚म्|| 1||वर्ग:11 |
| अ॒यंसूर्य॑इवोप॒दृग॒¦यंसरां᳚सिधावति|स॒प्तप्र॒वत॒आदिव᳚म्|| 2|| |
| अ॒यंविश्वा᳚नितिष्ठति¦पुना॒नोभुव॑नो॒परि॑|सोमो᳚दे॒वोनसूर्यः॑|| 3|| |
| परि॑णोदे॒ववी᳚तये॒¦वाजाँ᳚,अर्षसि॒गोम॑तः|पु॒ना॒नइ᳚न्दविन्द्र॒युः|| 4|| |
| [55] यवंयवमिति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:55}{अनुवाक:2, सूक्त:31}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| यवं᳚यवंनो॒,अन्ध॑सा¦पु॒ष्टम्पु॑ष्टं॒परि॑स्रव|सोम॒विश्वा᳚च॒सौभ॑गा|| 1||वर्ग:12 |
| इन्दो॒यथा॒तव॒स्तवो॒¦यथा᳚तेजा॒तमन्ध॑सः|निब॒र्हिषि॑प्रि॒येस॑दः|| 2|| |
| उ॒तनो᳚गो॒विद॑श्व॒वित्¦पव॑स्वसो॒मान्ध॑सा|म॒क्षूत॑मेभि॒रह॑भिः|| 3|| |
| योजि॒नाति॒नजीय॑ते॒¦हन्ति॒शत्रु॑म॒भीत्य॑|सप॑वस्वसहस्रजित्|| 4|| |
| [56] परिसोमइति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:56}{अनुवाक:2, सूक्त:32}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| परि॒सोम॑ऋ॒तंबृ॒ह¦दा॒शुःप॒वित्रे᳚अर्षति|वि॒घ्नन्रक्षां᳚सिदेव॒युः|| 1||वर्ग:13 |
| यत्सोमो॒वाज॒मर्ष॑ति¦श॒तंधारा᳚अप॒स्युवः॑|इन्द्र॑स्यस॒ख्यमा᳚वि॒शन्|| 2|| |
| अ॒भित्वा॒योष॑णो॒दश॑¦जा॒रंनक॒न्या᳚नूषत|मृ॒ज्यसे᳚सोमसा॒तये᳚|| 3|| |
| त्वमिन्द्रा᳚य॒विष्ण॑वे¦स्वा॒दुरि᳚न्दो॒परि॑स्रव|नॄन्त्स्तो॒तॄन्पा॒ह्यंह॑सः|| 4|| |
| [57] प्रतेधाराइति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:57}{अनुवाक:2, सूक्त:33}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| प्रते॒धारा᳚अस॒श्चतो᳚¦दि॒वोनय᳚न्तिवृ॒ष्टयः॑|अच्छा॒वाजं᳚सह॒स्रिण᳚म्|| 1||वर्ग:14 |
| अ॒भिप्रि॒याणि॒काव्या॒¦विश्वा॒चक्षा᳚णो,अर्षति|हरि॑स्तुञ्जा॒नआयु॑धा|| 2|| |
| सम᳚र्मृजा॒नआ॒युभि॒¦रिभो॒राजे᳚वसुव्र॒तः|श्ये॒नोनवंसु॑षीदति|| 3|| |
| सनो॒विश्वा᳚दि॒वोवसू॒¦तोपृ॑थि॒व्या,अधि॑|पु॒ना॒नइ᳚न्द॒वाभ॑र|| 4|| |
| [58] तरत्समंदीति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:58}{अनुवाक:2, सूक्त:34}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति॒¦धारा᳚सु॒तस्यान्ध॑सः|तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति|| 1||वर्ग:15 |
| उ॒स्रावे᳚द॒वसू᳚नां॒¦मर्त॑स्यदे॒व्यव॑सः|तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति|| 2|| |
| ध्व॒स्रयोः᳚पुरु॒षन्त्यो॒¦रास॒हस्रा᳚णिदद्महे|तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति|| 3|| |
| आययो᳚स्त्रिं॒शतं॒तना᳚¦स॒हस्रा᳚णिच॒दद्म॑हे|तर॒त्सम॒न्दीधा᳚वति|| 4|| |
| [59] पवस्वेति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:59}{अनुवाक:2, सूक्त:35}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| पव॑स्वगो॒जिद॑श्व॒जिद्¦वि॑श्व॒जित्सो᳚मरण्य॒जित्|प्र॒जाव॒द्रत्न॒माभ॑र|| 1||वर्ग:16 |
| पव॑स्वा॒द्भ्यो,अदा᳚भ्यः॒¦पव॒स्वौष॑धीभ्यः|पव॑स्वधि॒षणा᳚भ्यः|| 2|| |
| त्वंसो᳚म॒पव॑मानो॒¦विश्वा᳚निदुरि॒तात॑र|क॒विःसी᳚द॒निब॒र्हिषि॑|| 3|| |
| पव॑मान॒स्व᳚र्विदो॒¦जाय॑मानोऽभवोम॒हान्|इन्दो॒विश्वाँ᳚,अ॒भीद॑सि|| 4|| |
| [60] प्रगायत्रेणेति चतुरृचस्य सूक्तस्य काश्यपोवत्सारः पवमान सोमोगायत्री तृतीयापुरउष्णिक्{मंडल:9, सूक्त:60}{अनुवाक:2, सूक्त:36}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| प्रगा᳚य॒त्रेण॑गायत॒¦पव॑मानं॒विच॑र्षणिम्|इन्दुं᳚स॒हस्र॑चक्षसम्|| 1||वर्ग:17 |
| तंत्वा᳚स॒हस्र॑चक्षस॒¦मथो᳚स॒हस्र॑भर्णसम्|अति॒वार॑मपाविषुः|| 2|| |
| अति॒वारा॒न्पव॑मानो,असिष्यदत्¦क॒लशाँ᳚,अ॒भिधा᳚वति|इन्द्र॑स्य॒हार्द्या᳚वि॒शन्|| 3|| |
| इन्द्र॑स्यसोम॒राध॑से॒¦शंप॑वस्वविचर्षणे|प्र॒जाव॒द्रेत॒आभ॑र|| 4|| |
| [61] अयावीतीति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्यांगिरसोऽमहीयुः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:61}{अनुवाक:3, सूक्त:1}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| अ॒यावी॒तीपरि॑स्रव॒¦यस्त॑इन्दो॒मदे॒ष्वा|अ॒वाह᳚न्नव॒तीर्नव॑|| 1||वर्ग:18 |
| पुरः॑स॒द्यइ॒त्थाधि॑ये॒¦दिवो᳚दासाय॒शम्ब॑रम्|अध॒त्यंतु॒र्वशं॒यदु᳚म्|| 2|| |
| परि॑णो॒,अश्व॑मश्व॒विद्¦गोम॑दिन्दो॒हिर᳚ण्यवत्|क्षरा᳚सह॒स्रिणी॒रिषः॑|| 3|| |
| पव॑मानस्यतेव॒यं¦प॒वित्र॑मभ्युन्द॒तः|स॒खि॒त्वमावृ॑णीमहे|| 4|| |
| येते᳚प॒वित्र॑मू॒र्मयो᳚¦ऽभि॒क्षर᳚न्ति॒धार॑या|तेभि᳚र्नःसोममृळय|| 5|| |
| सनः॑पुना॒नआभ॑र¦र॒यिंवी॒रव॑ती॒मिष᳚म्|ईशा᳚नःसोमवि॒श्वतः॑|| 6||वर्ग:19 |
| ए॒तमु॒त्यंदश॒क्षिपो᳚¦मृ॒जन्ति॒सिन्धु॑मातरम्|समा᳚दि॒त्येभि॑रख्यत|| 7|| |
| समिन्द्रे᳚णो॒तवा॒युना᳚¦सु॒तए᳚तिप॒वित्र॒आ|संसूर्य॑स्यर॒श्मिभिः॑|| 8|| |
| सनो॒भगा᳚यवा॒यवे᳚¦पू॒ष्णेप॑वस्व॒मधु॑मान्|चारु᳚र्मि॒त्रेवरु॑णेच|| 9|| |
| उ॒च्चाते᳚जा॒तमन्ध॑सो¦दि॒विषद्भूम्याद॑दे|उ॒ग्रंशर्म॒महि॒श्रवः॑|| 10|| |
| ए॒नाविश्वा᳚न्य॒र्यआ¦द्यु॒म्नानि॒मानु॑षाणाम्|सिषा᳚सन्तोवनामहे|| 11||वर्ग:20 |
| सन॒इन्द्रा᳚य॒यज्य॑वे॒¦वरु॑णायम॒रुद्भ्यः॑|व॒रि॒वो॒वित्परि॑स्रव|| 12|| |
| उपो॒षुजा॒तम॒प्तुरं॒¦गोभि॑र्भ॒ङ्गंपरि॑ष्कृतम्|इन्दुं᳚दे॒वा,अ॑यासिषुः|| 13|| |
| तमिद्व॑र्धन्तुनो॒गिरो᳚¦व॒त्संसं॒शिश्व॑रीरिव|यइन्द्र॑स्यहृदं॒सनिः॑|| 14|| |
| अर्षा᳚णःसोम॒शंगवे᳚¦धु॒क्षस्व॑पि॒प्युषी॒मिष᳚म्|वर्धा᳚समु॒द्रमु॒क्थ्य᳚म्|| 15|| |
| पव॑मानो,अजीजनद्¦दि॒वश्चि॒त्रंनत᳚न्य॒तुम्|ज्योति᳚र्वैश्वान॒रंबृ॒हत्|| 16||वर्ग:21 |
| पव॑मानस्यते॒रसो॒¦मदो᳚राजन्नदुच्छु॒नः|विवार॒मव्य॑मर्षति|| 17|| |
| पव॑मान॒रस॒स्तव॒¦दक्षो॒विरा᳚जतिद्यु॒मान्|ज्योति॒र्विश्वं॒स्व॑र्दृ॒शे|| 18|| |
| यस्ते॒मदो॒वरे᳚ण्य॒¦स्तेना᳚पव॒स्वान्ध॑सा|दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा|| 19|| |
| जघ्नि᳚र्वृ॒त्रम॑मि॒त्रियं॒¦सस्नि॒र्वाजं᳚दि॒वेदि॑वे|गो॒षा,उ॑अश्व॒सा,अ॑सि|| 20|| |
| सम्मि॑श्लो,अरु॒षोभ॑व¦सूप॒स्थाभि॒र्नधे॒नुभिः॑|सीद᳚ञ्छ्ये॒नोनयोनि॒मा|| 21||वर्ग:22 |
| सप॑वस्व॒यआवि॒थे¦न्द्रं᳚वृ॒त्राय॒हन्त॑वे|व॒व्रि॒वांसं᳚म॒हीर॒पः|| 22|| |
| सु॒वीरा᳚सोव॒यंधना॒¦जये᳚मसोममीढ्वः|पु॒ना॒नोव॑र्धनो॒गिरः॑|| 23|| |
| त्वोता᳚स॒स्तवाव॑सा॒¦स्याम॑व॒न्वन्त॑आ॒मुरः॑|सोम᳚व्र॒तेषु॑जागृहि|| 24|| |
| अ॒प॒घ्नन्प॑वते॒मृधो¦ऽप॒सोमो॒,अरा᳚व्णः|गच्छ॒न्निन्द्र॑स्यनिष्कृ॒तम्|| 25|| |
| म॒होनो᳚रा॒यआभ॑र॒¦पव॑मानज॒हीमृधः॑|रास्वे᳚न्दोवी॒रव॒द्यशः॑|| 26||वर्ग:23 |
| नत्वा᳚श॒तंच॒नह्रुतो॒¦राधो॒दित्स᳚न्त॒मामि॑नन्|यत्पु॑ना॒नोम॑ख॒स्यसे᳚|| 27|| |
| पव॑स्वेन्दो॒वृषा᳚सु॒तः¦कृ॒धीनो᳚य॒शसो॒जने᳚|विश्वा॒,अप॒द्विषो᳚जहि|| 28|| |
| अस्य॑तेस॒ख्येव॒यं¦तवे᳚न्दोद्यु॒म्नउ॑त्त॒मे|सा॒स॒ह्याम॑पृतन्य॒तः|| 29|| |
| याते᳚भी॒मान्यायु॑धा¦ति॒ग्मानि॒सन्ति॒धूर्व॑णे|रक्षा᳚समस्यनोनि॒दः|| 30|| |
| [62] एतेअसृग्रमिति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य भार्गवोजमदग्निः पवमानसोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:62}{अनुवाक:3, सूक्त:2}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| ए॒ते,अ॑सृग्र॒मिन्द॑व¦स्ति॒रःप॒वित्र॑मा॒शवः॑|विश्वा᳚न्य॒भिसौभ॑गा|| 1||वर्ग:24 |
| वि॒घ्नन्तो᳚दुरि॒तापु॒रु¦सु॒गातो॒काय॑वा॒जिनः॑|तना᳚कृ॒ण्वन्तो॒,अर्व॑ते|| 2|| |
| कृ॒ण्वन्तो॒वरि॑वो॒गवे॒¦ऽभ्य॑र्षन्तिसुष्टु॒तिम्|इळा᳚म॒स्मभ्यं᳚सं॒यत᳚म्|| 3|| |
| असा᳚व्यं॒शुर्मदा᳚या॒¦ऽप्सुदक्षो᳚गिरि॒ष्ठाः|श्ये॒नोनयोनि॒मास॑दत्|| 4|| |
| शु॒भ्रमन्धो᳚दे॒ववा᳚त¦म॒प्सुधू॒तोनृभिः॑सु॒तः|स्वद᳚न्ति॒गावः॒पयो᳚भिः|| 5|| |
| आदी॒मश्वं॒नहेता॒रो¦ऽशू᳚शुभन्न॒मृता᳚य|मध्वो॒रसं᳚सध॒मादे᳚|| 6||वर्ग:25 |
| यास्ते॒धारा᳚मधु॒श्चुतो¦ऽसृ॑ग्रमिन्दऊ॒तये᳚|ताभिः॑प॒वित्र॒मास॑दः|| 7|| |
| सो,अ॒र्षेन्द्रा᳚यपी॒तये᳚¦ति॒रोरोमा᳚ण्य॒व्यया᳚|सीद॒न्योना॒वने॒ष्वा|| 8|| |
| त्वमि᳚न्दो॒परि॑स्रव॒¦स्वादि॑ष्ठो॒,अङ्गि॑रोभ्यः|व॒रि॒वो॒विद्घृ॒तंपयः॑|| 9|| |
| अ॒यंविच॑र्षणिर्हि॒तः¦पव॑मानः॒सचे᳚तति|हि॒न्वा॒नआप्यं᳚बृ॒हत्|| 10|| |
| ए॒षवृषा॒वृष᳚व्रतः॒¦पव॑मानो,अशस्ति॒हा|कर॒द्वसू᳚निदा॒शुषे᳚|| 11||वर्ग:26 |
| आप॑वस्वसह॒स्रिणं᳚¦र॒यिंगोम᳚न्तम॒श्विन᳚म्|पु॒रु॒श्च॒न्द्रंपु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 12|| |
| ए॒षस्यपरि॑षिच्यते¦मर्मृ॒ज्यमा᳚नआ॒युभिः॑|उ॒रु॒गा॒यःक॒विक्र॑तुः|| 13|| |
| स॒हस्रो᳚तिःश॒ताम॑घो¦वि॒मानो॒रज॑सःक॒विः|इन्द्रा᳚यपवते॒मदः॑|| 14|| |
| गि॒राजा॒तइ॒हस्तु॒त¦इन्दु॒रिन्द्रा᳚यधीयते|विर्योना᳚वस॒तावि॑व|| 15|| |
| पव॑मानःसु॒तोनृभिः॒¦सोमो॒वाज॑मिवासरत्|च॒मूषु॒शक्म॑ना॒सद᳚म्|| 16||वर्ग:27 |
| तंत्रि॑पृ॒ष्ठेत्रि॑वन्धु॒रे¦रथे᳚युञ्जन्ति॒यात॑वे|ऋषी᳚णांस॒प्तधी॒तिभिः॑|| 17|| |
| तंसो᳚तारोधन॒स्पृत॑¦मा॒शुंवाजा᳚य॒यात॑वे|हरिं᳚हिनोतवा॒जिन᳚म्|| 18|| |
| आ॒वि॒शन्क॒लशं᳚सु॒तो¦विश्वा॒,अर्ष᳚न्न॒भिश्रियः॑|शूरो॒नगोषु॑तिष्ठति|| 19|| |
| आत॑इन्दो॒मदा᳚य॒कं¦पयो᳚दुहन्त्या॒यवः॑|दे॒वादे॒वेभ्यो॒मधु॑|| 20|| |
| आनः॒सोमं᳚प॒वित्र॒आ¦सृ॒जता॒मधु॑मत्तमम्|दे॒वेभ्यो᳚देव॒श्रुत्त॑मम्|| 21||वर्ग:28 |
| ए॒तेसोमा᳚असृक्षत¦गृणा॒नाःश्रव॑सेम॒हे|म॒दिन्त॑मस्य॒धार॑या|| 22|| |
| अ॒भिगव्या᳚निवी॒तये᳚¦नृ॒म्णापु॑ना॒नो,अ॑र्षसि|स॒नद्वा᳚जः॒परि॑स्रव|| 23|| |
| उ॒तनो॒गोम॑ती॒रिषो॒¦विश्वा᳚अर्षपरि॒ष्टुभः॑|गृ॒णा॒नोज॒मद॑ग्निना|| 24|| |
| पव॑स्ववा॒चो,अ॑ग्रि॒यः¦सोम॑चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑|अ॒भिविश्वा᳚नि॒काव्या᳚|| 25|| |
| त्वंस॑मु॒द्रिया᳚अ॒पो᳚¦ऽग्रि॒योवाच॑ई॒रय॑न्|पव॑स्वविश्वमेजय|| 26||वर्ग:29 |
| तुभ्ये॒माभुव॑नाकवे¦महि॒म्नेसो᳚मतस्थिरे|तुभ्य॑मर्षन्ति॒सिन्ध॑वः|| 27|| |
| प्रते᳚दि॒वोनवृ॒ष्टयो॒¦धारा᳚यन्त्यस॒श्चतः॑|अ॒भिशु॒क्रामु॑प॒स्तिर᳚म्|| 28|| |
| इन्द्रा॒येन्दुं᳚पुनीतनो॒¦ग्रंदक्षा᳚य॒साध॑नम्|ई॒शा॒नंवी॒तिरा᳚धसम्|| 29|| |
| पव॑मानऋ॒तःक॒विः¦सोमः॑प॒वित्र॒मास॑दत्|दध॑त्स्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|| 30|| |
| [63] आपवस्वेति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य काश्यपोनिध्रुविः पवमान सोमो गायत्री |{मंडल:9, सूक्त:63}{अनुवाक:3, सूक्त:3}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| आप॑वस्वसह॒स्रिणं᳚¦र॒यिंसो᳚मसु॒वीर्य᳚म्|अ॒स्मेश्रवां᳚सिधारय|| 1||वर्ग:30 |
| इष॒मूर्जं᳚चपिन्वस॒¦इन्द्रा᳚यमत्स॒रिन्त॑मः|च॒मूष्वानिषी᳚दसि|| 2|| |
| सु॒तइन्द्रा᳚य॒विष्ण॑वे॒¦सोमः॑क॒लशे᳚अक्षरत्|मधु॑माँ,अस्तुवा॒यवे᳚|| 3|| |
| ए॒ते,अ॑सृग्रमा॒शवो¦ऽति॒ह्वरां᳚सिब॒भ्रवः॑|सोमा᳚ऋ॒तस्य॒धार॑या|| 4|| |
| इन्द्रं॒वर्ध᳚न्तो,अ॒प्तुरः॑¦कृ॒ण्वन्तो॒विश्व॒मार्य᳚म्|अ॒प॒घ्नन्तो॒,अरा᳚व्णः|| 5|| |
| सु॒ता,अनु॒स्वमारजो॒¦ऽभ्य॑र्षन्तिब॒भ्रवः॑|इन्द्रं॒गच्छ᳚न्त॒इन्द॑वः|| 6||वर्ग:31 |
| अ॒याप॑वस्व॒धार॑या॒¦यया॒सूर्य॒मरो᳚चयः|हि॒न्वा॒नोमानु॑षीर॒पः|| 7|| |
| अयु॑क्त॒सूर॒एत॑शं॒¦पव॑मानोम॒नावधि॑|अ॒न्तरि॑क्षेण॒यात॑वे|| 8|| |
| उ॒तत्याह॒रितो॒दश॒¦सूरो᳚अयुक्त॒यात॑वे|इन्दु॒रिन्द्र॒इति॑ब्रु॒वन्|| 9|| |
| परी॒तोवा॒यवे᳚सु॒तं¦गिर॒इन्द्रा᳚यमत्स॒रम्|अव्यो॒वारे᳚षुसिञ्चत|| 10|| |
| पव॑मानवि॒दार॒यि¦म॒स्मभ्यं᳚सोमदु॒ष्टर᳚म्|योदू॒णाशो᳚वनुष्य॒ता|| 11||वर्ग:32 |
| अ॒भ्य॑र्षसह॒स्रिणं᳚¦र॒यिंगोम᳚न्तम॒श्विन᳚म्|अ॒भिवाज॑मु॒तश्रवः॑|| 12|| |
| सोमो᳚दे॒वोनसूर्यो¦ऽद्रि॑भिःपवतेसु॒तः|दधा᳚नःक॒लशे॒रस᳚म्|| 13|| |
| ए॒तेधामा॒न्यार्या᳚¦शु॒क्रा,ऋ॒तस्य॒धार॑या|वाजं॒गोम᳚न्तमक्षरन्|| 14|| |
| सु॒ता,इन्द्रा᳚यव॒ज्रिणे॒¦सोमा᳚सो॒दध्या᳚शिरः|प॒वित्र॒मत्य॑क्षरन्|| 15|| |
| प्रसो᳚म॒मधु॑मत्तमो¦रा॒ये,अ॑र्षप॒वित्र॒आ|मदो॒योदे᳚व॒वीत॑मः|| 16||वर्ग:33 |
| तमी᳚मृजन्त्या॒यवो॒¦हरिं᳚न॒दीषु॑वा॒जिन᳚म्|इन्दु॒मिन्द्रा᳚यमत्स॒रम्|| 17|| |
| आप॑वस्व॒हिर᳚ण्यव॒¦दश्वा᳚वत्सोमवी॒रव॑त्|वाजं॒गोम᳚न्त॒माभ॑र|| 18|| |
| परि॒वाजे॒नवा᳚ज॒यु¦मव्यो॒वारे᳚षुसिञ्चत|इन्द्रा᳚य॒मधु॑मत्तमम्|| 19|| |
| क॒विंमृ॑जन्ति॒मर्ज्यं᳚¦धी॒भिर्विप्रा᳚अव॒स्यवः॑|वृषा॒कनि॑क्रदर्षति|| 20|| |
| वृष॑णंधी॒भिर॒प्तुरं॒¦सोम॑मृ॒तस्य॒धार॑या|म॒तीविप्राः॒सम॑स्वरन्|| 21||वर्ग:34 |
| पव॑स्वदेवायु॒ष¦गिन्द्रं᳚गच्छतुते॒मदः॑|वा॒युमारो᳚ह॒धर्म॑णा|| 22|| |
| पव॑मान॒नितो᳚शसे¦र॒यिंसो᳚मश्र॒वाय्य᳚म्|प्रि॒यःस॑मु॒द्रमावि॑श|| 23|| |
| अ॒प॒घ्नन्प॑वसे॒मृधः॑¦क्रतु॒वित्सो᳚ममत्स॒रः|नु॒दस्वादे᳚वयुं॒जन᳚म्|| 24|| |
| पव॑माना,असृक्षत॒¦सोमाः᳚शु॒क्रास॒इन्द॑वः|अ॒भिविश्वा᳚नि॒काव्या᳚|| 25|| |
| पव॑मानासआ॒शवः॑¦शु॒भ्रा,अ॑सृग्र॒मिन्द॑वः|घ्नन्तो॒विश्वा॒,अप॒द्विषः॑|| 26||वर्ग:35 |
| पव॑मानादि॒वस्प¦र्य॒न्तरि॑क्षादसृक्षत|पृ॒थि॒व्या,अधि॒सान॑वि|| 27|| |
| पु॒ना॒नःसो᳚म॒धार॒ये¦न्दो॒विश्वा॒,अप॒स्रिधः॑|ज॒हिरक्षां᳚सिसुक्रतो|| 28|| |
| अ॒प॒घ्नन्त्सो᳚मर॒क्षसो॒¦ऽभ्य॑र्ष॒कनि॑क्रदत्|द्यु॒मन्तं॒शुष्म॑मुत्त॒मम्|| 29|| |
| अ॒स्मेवसू᳚निधारय॒¦सोम॑दि॒व्यानि॒पार्थि॑वा|इन्दो॒विश्वा᳚नि॒वार्या᳚|| 30|| |
| [64] वृषासोमेति त्रिंशदृचस्यसूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमोगायत्री |{मंडल:9, सूक्त:64}{अनुवाक:3, सूक्त:4}{अष्टक:7, अध्याय:1} |
| वृषा᳚सोमद्यु॒माँ,अ॑सि॒¦वृषा᳚देव॒वृष᳚व्रतः|वृषा॒धर्मा᳚णिदधिषे|| 1||वर्ग:36 |
| वृष्ण॑स्ते॒वृष्ण्यं॒शवो॒¦वृषा॒वनं॒वृषा॒मदः॑|स॒त्यंवृ॑ष॒न्वृषेद॑सि|| 2|| |
| अश्वो॒नच॑क्रदो॒वृषा॒¦संगा,इ᳚न्दो॒समर्व॑तः|विनो᳚रा॒येदुरो᳚वृधि|| 3|| |
| असृ॑क्षत॒प्रवा॒जिनो᳚¦ग॒व्यासोमा᳚सो,अश्व॒या|शु॒क्रासो᳚वीर॒याशवः॑|| 4|| |
| शु॒म्भमा᳚ना,ऋता॒युभि᳚¦र्मृ॒ज्यमा᳚ना॒गभ॑स्त्योः|पव᳚न्ते॒वारे᳚अ॒व्यये᳚|| 5|| |
| तेविश्वा᳚दा॒शुषे॒वसु॒¦सोमा᳚दि॒व्यानि॒पार्थि॑वा|पव᳚न्ता॒मान्तरि॑क्ष्या|| 6||वर्ग:37 |
| पव॑मानस्यविश्ववि॒त्¦प्रते॒सर्गा᳚असृक्षत|सूर्य॑स्येव॒नर॒श्मयः॑|| 7|| |
| के॒तुंकृ॒ण्वन्दि॒वस्परि॒¦विश्वा᳚रू॒पाभ्य॑र्षसि|स॒मु॒द्रःसो᳚मपिन्वसे|| 8|| |
| हि॒न्वा॒नोवाच॑मिष्यसि॒¦पव॑मान॒विध᳚र्मणि|अक्रा᳚न्दे॒वोनसूर्यः॑|| 9|| |
| इन्दुः॑पविष्ट॒चेत॑नः¦प्रि॒यःक॑वी॒नांम॒ती|सृ॒जदश्वं᳚र॒थीरि॑व|| 10|| |
| ऊ॒र्मिर्यस्ते᳚प॒वित्र॒आ¦दे᳚वा॒वीःप॒र्यक्ष॑रत्|सीद᳚न्नृ॒तस्य॒योनि॒मा|| 11||वर्ग:38 |
| सनो᳚अर्षप॒वित्र॒आ¦मदो॒योदे᳚व॒वीत॑मः|इन्द॒विन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 12|| |
| इ॒षेप॑वस्व॒धार॑या¦मृ॒ज्यमा᳚नोमनी॒षिभिः॑|इन्दो᳚रु॒चाभिगा,इ॑हि|| 13|| |
| पु॒ना॒नोवरि॑वस्कृ॒ध्यू¦र्जं॒जना᳚यगिर्वणः|हरे᳚सृजा॒नआ॒शिर᳚म्|| 14|| |
| पु॒ना॒नोदे॒ववी᳚तय॒¦इन्द्र॑स्ययाहिनिष्कृ॒तम्|द्यु॒ता॒नोवा॒जिभि᳚र्य॒तः|| 15|| |
| प्रहि᳚न्वा॒नास॒इन्द॒वो¦ऽच्छा᳚समु॒द्रमा॒शवः॑|धि॒याजू॒ता,अ॑सृक्षत|| 16||वर्ग:39 |
| म॒र्मृ॒जा॒नास॑आ॒यवो॒¦वृथा᳚समु॒द्रमिन्द॑वः|अग्म᳚न्नृ॒तस्य॒योनि॒मा|| 17|| |
| परि॑णोयाह्यस्म॒यु¦र्विश्वा॒वसू॒न्योज॑सा|पा॒हिनः॒शर्म॑वी॒रव॑त्|| 18|| |
| मिमा᳚ति॒वह्नि॒रेत॑शः¦प॒दंयु॑जा॒नऋक्व॑भिः|प्रयत्स॑मु॒द्रआहि॑तः|| 19|| |
| आयद्योनिं᳚हिर॒ण्यय॑¦मा॒शुरृ॒तस्य॒सीद॑ति|जहा॒त्यप्र॑चेतसः|| 20|| |
| अ॒भिवे॒ना,अ॑नूष॒ते¦य॑क्षन्ति॒प्रचे᳚तसः|मज्ज॒न्त्यवि॑चेतसः|| 21||वर्ग:40 |
| इन्द्रा᳚येन्दोम॒रुत्व॑ते॒¦पव॑स्व॒मधु॑मत्तमः|ऋ॒तस्य॒योनि॑मा॒सद᳚म्|| 22|| |
| तंत्वा॒विप्रा᳚वचो॒विदः॒¦परि॑ष्कृण्वन्तिवे॒धसः॑|संत्वा᳚मृजन्त्या॒यवः॑|| 23|| |
| रसं᳚तेमि॒त्रो,अ᳚र्य॒मा¦पिब᳚न्ति॒वरु॑णःकवे|पव॑मानस्यम॒रुतः॑|| 24|| |
| त्वंसो᳚मविप॒श्चितं᳚¦पुना॒नोवाच॑मिष्यसि|इन्दो᳚स॒हस्र॑भर्णसम्|| 25|| |
| उ॒तोस॒हस्र॑भर्णसं॒¦वाचं᳚सोममख॒स्युव᳚म्|पु॒ना॒नइ᳚न्द॒वाभ॑र|| 26||वर्ग:41 |
| पु॒ना॒नइ᳚न्दवेषां॒¦पुरु॑हूत॒जना᳚नाम्|प्रि॒यःस॑मु॒द्रमावि॑श|| 27|| |
| दवि॑द्युतत्यारु॒चा¦प॑रि॒ष्टोभ᳚न्त्याकृ॒पा|सोमाः᳚शु॒क्रागवा᳚शिरः|| 28|| |
| हि॒न्वा॒नोहे॒तृभि᳚र्य॒त¦आवाजं᳚वा॒ज्य॑क्रमीत्|सीद᳚न्तोव॒नुषो᳚यथा|| 29|| |
| ऋ॒धक्सो᳚मस्व॒स्तये᳚¦संजग्मा॒नोदि॒वःक॒विः|पव॑स्व॒सूर्यो᳚दृ॒शे|| 30|| |
| [65] हिन्वन्तीति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य वारुणिर्भृगुः पवमानसोमोगायत्री | (अत्रभार्गवोजमदग्निः पाक्षिकः) (पवमान पारायण चतुर्थोध्यायः){मंडल:9, सूक्त:65}{अनुवाक:3, सूक्त:5}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| हि॒न्वन्ति॒सूर॒मुस्र॑यः॒¦स्वसा᳚रोजा॒मय॒स्पति᳚म्|म॒हामिन्दुं᳚मही॒युवः॑|| 1||वर्ग:1 |
| पव॑मानरु॒चारु॑चा¦दे॒वोदे॒वेभ्य॒स्परि॑|विश्वा॒वसू॒न्यावि॑श|| 2|| |
| आप॑वमानसुष्टु॒तिं¦वृ॒ष्टिंदे॒वेभ्यो॒दुवः॑|इ॒षेप॑वस्वसं॒यत᳚म्|| 3|| |
| वृषा॒ह्यसि॑भा॒नुना᳚¦द्यु॒मन्तं᳚त्वाहवामहे|पव॑मानस्वा॒ध्यः॑|| 4|| |
| आप॑वस्वसु॒वीर्यं॒¦मन्द॑मानःस्वायुध|इ॒होष्वि᳚न्द॒वाग॑हि|| 5|| |
| यद॒द्भिःप॑रिषि॒च्यसे᳚¦मृ॒ज्यमा᳚नो॒गभ॑स्त्योः|द्रुणा᳚स॒धस्थ॑मश्नुषे|| 6||वर्ग:2 |
| प्रसोमा᳚यव्यश्व॒वत्¦पव॑मानायगायत|म॒हेस॒हस्र॑चक्षसे|| 7|| |
| यस्य॒वर्णं᳚मधु॒श्चुतं॒¦हरिं᳚हि॒न्वन्त्यद्रि॑भिः|इन्दु॒मिन्द्रा᳚यपी॒तये᳚|| 8|| |
| तस्य॑तेवा॒जिनो᳚व॒यं¦विश्वा॒धना᳚निजि॒ग्युषः॑|स॒खि॒त्वमावृ॑णीमहे|| 9|| |
| वृषा᳚पवस्व॒धार॑या¦म॒रुत्व॑तेचमत्स॒रः|विश्वा॒दधा᳚न॒ओज॑सा|| 10|| |
| तंत्वा᳚ध॒र्तार॑मो॒ण्यो॒३॑(ओः॒)¦पव॑मानस्व॒र्दृश᳚म्|हि॒न्वेवाजे᳚षुवा॒जिन᳚म्|| 11||वर्ग:3 |
| अ॒याचि॒त्तोवि॒पानया॒¦हरिः॑पवस्व॒धार॑या|युजं॒वाजे᳚षुचोदय|| 12|| |
| आन॑इन्दोम॒हीमिषं॒¦पव॑स्ववि॒श्वद॑र्शतः|अ॒स्मभ्यं᳚सोमगातु॒वित्|| 13|| |
| आक॒लशा᳚अनूष॒ते¦न्दो॒धारा᳚भि॒रोज॑सा|एन्द्र॑स्यपी॒तये᳚विश|| 14|| |
| यस्य॑ते॒मद्यं॒रसं᳚¦ती॒व्रंदु॒हन्त्यद्रि॑भिः|सप॑वस्वाभिमाति॒हा|| 15|| |
| राजा᳚मे॒धाभि॑रीयते॒¦पव॑मानोम॒नावधि॑|अ॒न्तरि॑क्षेण॒यात॑वे|| 16||वर्ग:4 |
| आन॑इन्दोशत॒ग्विनं॒¦गवां॒पोषं॒स्वश्व्य᳚म्|वहा॒भग॑त्तिमू॒तये᳚|| 17|| |
| आनः॑सोम॒सहो॒जुवो᳚¦रू॒पंनवर्च॑सेभर|सु॒ष्वा॒णोदे॒ववी᳚तये|| 18|| |
| अर्षा᳚सोमद्यु॒मत्त॑मो॒¦ऽभिद्रोणा᳚नि॒रोरु॑वत्|सीद᳚ञ्छ्ये॒नोनयोनि॒मा|| 19|| |
| अ॒प्सा,इन्द्रा᳚यवा॒यवे॒¦वरु॑णायम॒रुद्भ्यः॑|सोमो᳚अर्षति॒विष्ण॑वे|| 20|| |
| इषं᳚तो॒काय॑नो॒दध॑द॒¦स्मभ्यं᳚सोमवि॒श्वतः॑|आप॑वस्वसह॒स्रिण᳚म्|| 21||वर्ग:5 |
| येसोमा᳚सःपरा॒वति॒¦ये,अ᳚र्वा॒वति॑सुन्वि॒रे|येवा॒दःश᳚र्य॒णाव॑ति|| 22|| |
| यआ᳚र्जी॒केषु॒कृत्व॑सु॒¦येमध्ये᳚प॒स्त्या᳚नाम्|येवा॒जने᳚षुप॒ञ्चसु॑|| 23|| |
| तेनो᳚वृ॒ष्टिंदि॒वस्परि॒¦पव᳚न्ता॒मासु॒वीर्य᳚म्|सु॒वा॒नादे॒वास॒इन्द॑वः|| 24|| |
| पव॑तेहर्य॒तोहरि॑¦र्गृणा॒नोज॒मद॑ग्निना|हि॒न्वा॒नोगोरधि॑त्व॒चि|| 25|| |
| प्रशु॒क्रासो᳚वयो॒जुवो᳚¦हिन्वा॒नासो॒नसप्त॑यः|श्री॒णा॒ना,अ॒प्सुमृ᳚ञ्जत|| 26||वर्ग:6 |
| तंत्वा᳚सु॒तेष्वा॒भुवो᳚¦हिन्वि॒रेदे॒वता᳚तये|सप॑वस्वा॒नया᳚रु॒चा|| 27|| |
| आते॒दक्षं᳚मयो॒भुवं॒¦वह्नि॑म॒द्यावृ॑णीमहे|पान्त॒मापु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 28|| |
| आम॒न्द्रमावरे᳚ण्य॒¦माविप्र॒माम॑नी॒षिण᳚म्|पान्त॒मापु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 29|| |
| आर॒यिमासु॑चे॒तुन॒¦मासु॑क्रतोत॒नूष्वा|पान्त॒मापु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 30|| |
| [66] पवस्वेति त्रिंशदृचस्य सूक्तस्य शतंवैखानसाः पवमानसोम एकोनविंश्यादितिसृणामग्निः पवमानोगायत्र्यष्टादश्यनुष्टुप् (शतं वैखानसाएतेस्वायंभुवाः अतएषांगोत्रंनास्तिएवमग्रेपिनारायणादयऊह्याः) |{मंडल:9, सूक्त:66}{अनुवाक:3, सूक्त:6}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| पव॑स्वविश्वचर्षणे॒¦ऽभिविश्वा᳚नि॒काव्या᳚|सखा॒सखि॑भ्य॒ईड्यः॑|| 1||वर्ग:7 |
| ताभ्यां॒विश्व॑स्यराजसि॒¦येप॑वमान॒धाम॑नी|प्र॒ती॒चीसो᳚मत॒स्थतुः॑|| 2|| |
| परि॒धामा᳚नि॒यानि॑ते॒¦त्वंसो᳚मासिवि॒श्वतः॑|पव॑मानऋ॒तुभिः॑कवे|| 3|| |
| पव॑स्वज॒नय॒न्निषो॒¦ऽभिविश्वा᳚नि॒वार्या᳚|सखा॒सखि॑भ्यऊ॒तये᳚|| 4|| |
| तव॑शु॒क्रासो᳚अ॒र्चयो᳚¦दि॒वस्पृ॒ष्ठेवित᳚न्वते|प॒वित्रं᳚सोम॒धाम॑भिः|| 5|| |
| तवे॒मेस॒प्तसिन्ध॑वः¦प्र॒शिषं᳚सोमसिस्रते|तुभ्यं᳚धावन्तिधे॒नवः॑|| 6||वर्ग:8 |
| प्रसो᳚मयाहि॒धार॑या¦सु॒तइन्द्रा᳚यमत्स॒रः|दधा᳚नो॒,अक्षि॑ति॒श्रवः॑|| 7|| |
| समु॑त्वाधी॒भिर॑स्वरन्¦हिन्व॒तीःस॒प्तजा॒मयः॑|विप्र॑मा॒जावि॒वस्व॑तः|| 8|| |
| मृ॒जन्ति॑त्वा॒सम॒ग्रुवो¦ऽव्ये᳚जी॒रावधि॒ष्वणि॑|रे॒भोयद॒ज्यसे॒वने᳚|| 9|| |
| पव॑मानस्यतेकवे॒¦वाजि॒न्त्सर्गा᳚असृक्षत|अर्व᳚न्तो॒नश्र॑व॒स्यवः॑|| 10|| |
| अच्छा॒कोशं᳚मधु॒श्चुत॒¦मसृ॑ग्रं॒वारे᳚अ॒व्यये᳚|अवा᳚वशन्तधी॒तयः॑|| 11||वर्ग:9 |
| अच्छा᳚समु॒द्रमिन्द॒वो¦ऽस्तं॒गावो॒नधे॒नवः॑|अग्म᳚न्नृ॒तस्य॒योनि॒मा|| 12|| |
| प्रण॑इन्दोम॒हेरण॒¦आपो᳚अर्षन्ति॒सिन्ध॑वः|यद्गोभि᳚र्वासयि॒ष्यसे᳚|| 13|| |
| अस्य॑तेस॒ख्येव॒य¦मिय॑क्षन्त॒स्त्वोत॑यः|इन्दो᳚सखि॒त्वमु॑श्मसि|| 14|| |
| आप॑वस्व॒गवि॑ष्टये¦म॒हेसो᳚मनृ॒चक्ष॑से|एन्द्र॑स्यज॒ठरे᳚विश|| 15|| |
| म॒हाँ,अ॑सिसोम॒ज्येष्ठ॑¦उ॒ग्राणा᳚मिन्द॒ओजि॑ष्ठः|युध्वा॒सञ्छश्व॑ज्जिगेथ|| 16||वर्ग:10 |
| यउ॒ग्रेभ्य॑श्चि॒दोजी᳚या॒ञ्¦छूरे᳚भ्यश्चि॒च्छूर॑तरः|भू॒रि॒दाभ्य॑श्चि॒न्मंही᳚यान्|| 17|| |
| त्वंसो᳚म॒सूर॒एष॑¦स्तो॒कस्य॑सा॒तात॒नूना᳚म्|वृ॒णी॒महे᳚स॒ख्याय॑¦वृणी॒महे॒युज्या᳚य|| 18|| |
| अग्न॒आयूं᳚षिपवस॒¦आसु॒वोर्ज॒मिषं᳚चनः|आ॒रेबा᳚धस्वदु॒च्छुना᳚म्|| 19|| |
| अ॒ग्निरृषिः॒पव॑मानः॒¦पाञ्च॑जन्यःपु॒रोहि॑तः|तमी᳚महेमहाग॒यम्|| 20|| |
| अग्ने॒पव॑स्व॒स्वपा᳚¦अ॒स्मेवर्चः॑सु॒वीर्य᳚म्|दध॑द्र॒यिंमयि॒पोष᳚म्|| 21||वर्ग:11 |
| पव॑मानो॒,अति॒स्रिधो॒¦ऽभ्य॑र्षतिसुष्टु॒तिम्|सूरो॒नवि॒श्वद॑र्शतः|| 22|| |
| सम᳚र्मृजा॒नआ॒युभिः॒¦प्रय॑स्वा॒न्प्रय॑सेहि॒तः|इन्दु॒रत्यो᳚विचक्ष॒णः|| 23|| |
| पव॑मानऋ॒तंबृ॒ह¦च्छु॒क्रंज्योति॑रजीजनत्|कृ॒ष्णातमां᳚सि॒जङ्घ॑नत्|| 24|| |
| पव॑मानस्य॒जङ्घ्न॑तो॒¦हरे᳚श्च॒न्द्रा,अ॑सृक्षत|जी॒रा,अ॑जि॒रशो᳚चिषः|| 25|| |
| पव॑मानोर॒थीत॑मः¦शु॒भ्रेभिः॑शु॒भ्रश॑स्तमः|हरि॑श्चन्द्रोम॒रुद्ग॑णः|| 26||वर्ग:12 |
| पव॑मानो॒व्य॑श्नवद्¦र॒श्मिभि᳚र्वाज॒सात॑मः|दध॑त्स्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|| 27|| |
| प्रसु॑वा॒नइन्दु॑रक्षाः¦प॒वित्र॒मत्य॒व्यय᳚म्|पु॒ना॒नइन्दु॒रिन्द्र॒मा|| 28|| |
| ए॒षसोमो॒,अधि॑त्व॒चि¦गवां᳚क्रीळ॒त्यद्रि॑भिः|इन्द्रं॒मदा᳚य॒जोहु॑वत्|| 29|| |
| यस्य॑तेद्यु॒म्नव॒त्पयः॒¦पव॑मा॒नाभृ॑तंदि॒वः|तेन॑नोमृळजी॒वसे᳚|| 30|| |
| [67] त्वंसोमासीति द्वात्रिंशदृचस्य सूक्तस्य आद्यानांसप्तानांतृचानांभरद्वाजकश्यपगोतमात्रिविश्वामित्र जमदग्निवसिष्ठा ऋषयः शिष्टानामांगिरसः पवित्रऋषिः (अत्रवसिष्ठोवापवित्रवसिष्ठौवेतिविपक्षौ) पवमानसोमोदेवता दशम्यादितिसृणांपूषावा यत्तेपवित्रमित्यादिपंचानामग्निः अंत्ययोर्द्वयोः पावमान्यधेतागायत्री षोडश्याद्यास्तिस्रोद्विपदागायत्र्यः त्रिंशीपुरउष्णिक् सप्तविंश्येकत्रिंशीद्वात्रिंश्योनुष्टुभः |( पंचविंश्यादितिसृणांक्रमात्सविताग्निसवितारौविश्वेदेवाइतिदेवताअग्निनासह विकल्पंते ) |{मंडल:9, सूक्त:67}{अनुवाक:3, सूक्त:7}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| त्वंसो᳚मासिधार॒यु¦र्म॒न्द्रओजि॑ष्ठो,अध्व॒रे|पव॑स्वमंह॒यद्र॑यिः|| 1||वर्ग:13 |
| त्वंसु॒तोनृ॒माद॑नो¦दध॒न्वान्म॑त्स॒रिन्त॑मः|इन्द्रा᳚यसू॒रिरन्ध॑सा|| 2|| |
| त्वंसु॑ष्वा॒णो,अद्रि॑भि¦र॒भ्य॑र्ष॒कनि॑क्रदत्|द्यु॒मन्तं॒शुष्म॑मुत्त॒मम्|| 3|| |
| इन्दु᳚र्हिन्वा॒नो,अ॑र्षति¦ति॒रोवारा᳚ण्य॒व्यया᳚|हरि॒र्वाज॑मचिक्रदत्|| 4|| |
| इन्दो॒व्यव्य॑मर्षसि॒¦विश्रवां᳚सि॒विसौभ॑गा|विवाजा᳚न्त्सोम॒गोम॑तः|| 5|| |
| आन॑इन्दोशत॒ग्विनं᳚¦र॒यिंगोम᳚न्तम॒श्विन᳚म्|भरा᳚सोमसह॒स्रिण᳚म्|| 6||वर्ग:14 |
| पव॑मानास॒इन्द॑व¦स्ति॒रःप॒वित्र॑मा॒शवः॑|इन्द्रं॒यामे᳚भिराशत|| 7|| |
| क॒कु॒हःसो॒म्योरस॒¦इन्दु॒रिन्द्रा᳚यपू॒र्व्यः|आ॒युःप॑वतआ॒यवे᳚|| 8|| |
| हि॒न्वन्ति॒सूर॒मुस्र॑यः॒¦पव॑मानंमधु॒श्चुत᳚म्|अ॒भिगि॒रासम॑स्वरन्|| 9|| |
| अ॒वि॒तानो᳚अ॒जाश्वः॑¦पू॒षायाम॑नियामनि|आभ॑क्षत्क॒न्या᳚सुनः|| 10|| |
| अ॒यंसोमः॑कप॒र्दिने᳚¦घृ॒तंनप॑वते॒मधु॑|आभ॑क्षत्क॒न्या᳚सुनः|| 11||वर्ग:15 |
| अ॒यंत॑आघृणेसु॒तो¦घृ॒तंनप॑वते॒शुचि॑|आभ॑क्षत्क॒न्या᳚सुनः|| 12|| |
| वा॒चोज॒न्तुःक॑वी॒नां¦पव॑स्वसोम॒धार॑या|दे॒वेषु॑रत्न॒धा,अ॑सि|| 13|| |
| आक॒लशे᳚षुधावति¦श्ये॒नोवर्म॒विगा᳚हते|अ॒भिद्रोणा॒कनि॑क्रदत्|| 14|| |
| परि॒प्रसो᳚मते॒रसो¦ऽस॑र्जिक॒लशे᳚सु॒तः|श्ये॒नोनत॒क्तो,अ॑र्षति|| 15|| |
| पव॑स्वसोमम॒न्दय॒¦न्निन्द्रा᳚य॒मधु॑मत्तमः|| 16||वर्ग:16 |
| असृ॑ग्रन्दे॒ववी᳚तये¦वाज॒यन्तो॒रथा᳚इव|| 17|| |
| तेसु॒तासो᳚म॒दिन्त॑माः¦शु॒क्रावा॒युम॑सृक्षत|| 18|| |
| ग्राव्णा᳚तु॒न्नो,अ॒भिष्टु॑तः¦प॒वित्रं᳚सोमगच्छसि|दध॑त्स्तो॒त्रेसु॒वीर्य᳚म्|| 19|| |
| ए॒षतु॒न्नो,अ॒भिष्टु॑तः¦प॒वित्र॒मति॑गाहते|र॒क्षो॒हावार॑म॒व्यय᳚म्|| 20|| |
| यदन्ति॒यच्च॑दूर॒के¦भ॒यंवि॒न्दति॒मामि॒ह|पव॑मान॒वितज्ज॑हि|| 21||वर्ग:17 |
| पव॑मानः॒सो,अ॒द्यनः॑¦प॒वित्रे᳚ण॒विच॑र्षणिः|यःपो॒तासपु॑नातुनः|| 22|| |
| यत्ते᳚प॒वित्र॑म॒र्चि¦ष्यग्ने॒वित॑तम॒न्तरा|ब्रह्म॒तेन॑पुनीहिनः|| 23|| |
| यत्ते᳚प॒वित्र॑मर्चि॒व¦दग्ने॒तेन॑पुनीहिनः|ब्र॒ह्म॒स॒वैःपु॑नीहिनः|| 24|| |
| उ॒भाभ्यां᳚देवसवितः¦प॒वित्रे᳚णस॒वेन॑च|मांपु॑नीहिवि॒श्वतः॑|| 25|| |
| त्रि॒भिष्ट्वंदे᳚वसवित॒¦र्वर्षि॑ष्ठैःसोम॒धाम॑भिः|अग्ने॒दक्षैः᳚पुनीहिनः|| 26||वर्ग:18 |
| पु॒नन्तु॒मांदे᳚वज॒नाः¦पु॒नन्तु॒वस॑वोधि॒या|विश्वे᳚देवाःपुनी॒तमा॒¦जात॑वेदःपुनी॒हिमा᳚|| 27|| |
| प्रप्या᳚यस्व॒प्रस्य᳚न्दस्व॒¦सोम॒विश्वे᳚भिरं॒शुभिः॑|दे॒वेभ्य॑उत्त॒मंह॒विः|| 28|| |
| उप॑प्रि॒यंपनि॑प्नतं॒¦युवा᳚नमाहुती॒वृध᳚म्|अग᳚न्म॒बिभ्र॑तो॒नमः॑|| 29|| |
| अ॒लाय्य॑स्यपर॒शुर्न॑नाश॒त¦माप॑वस्वदेवसोम|आ॒खुंचि॑दे॒वदे᳚वसोम|| 30|| |
| यःपा᳚वमा॒नीर॒ध्ये¦त्यृषि॑भिः॒सम्भृ॑तं॒रस᳚म्|सर्वं॒सपू॒तम॑श्नाति¦स्वदि॒तंमा᳚त॒रिश्व॑ना|| 31|| |
| पा॒व॒मा॒नीर्यो,अ॒ध्ये¦त्यृषि॑भिः॒सम्भृ॑तं॒रस᳚म्|तस्मै॒सर॑स्वतीदुहे¦क्षी॒रंस॒र्पिर्मधू᳚द॒कम्|| 32|| |
| [68] प्रदेवमिति दशर्चस्य सूक्तस्य भालंदनो वत्सप्रिः पवमानसोमोजगत्यंत्यात्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:68}{अनुवाक:4, सूक्त:1}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| प्रदे॒वमच्छा॒मधु॑मन्त॒इन्द॒वोऽसि॑ष्यदन्त॒गाव॒आनधे॒नवः॑| ब॒र्हि॒षदो᳚वच॒नाव᳚न्त॒ऊध॑भिःपरि॒स्रुत॑मु॒स्रिया᳚नि॒र्णिजं᳚धिरे|| 1||वर्ग:19 |
| सरोरु॑वद॒भिपूर्वा᳚अचिक्रददुपा॒रुहः॑श्र॒थय᳚न्त्स्वादते॒हरिः॑| ति॒रःप॒वित्रं᳚परि॒यन्नु॒रुज्रयो॒निशर्या᳚णिदधतेदे॒वआवर᳚म्|| 2|| |
| वियोम॒मेय॒म्या᳚संय॒तीमदः॑साकं॒वृधा॒पय॑सापिन्व॒दक्षि॑ता| म॒ही,अ॑पा॒रेरज॑सीवि॒वेवि॑ददभि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒पाज॒आद॑दे|| 3|| |
| समा॒तरा᳚वि॒चर᳚न्वा॒जय᳚न्न॒पःप्रमेधि॑रःस्व॒धया᳚पिन्वतेप॒दम्| अं॒शुर्यवे᳚नपिपिशेय॒तोनृभिः॒संजा॒मिभि॒र्नस॑ते॒रक्ष॑ते॒शिरः॑|| 4|| |
| संदक्षे᳚ण॒मन॑साजायतेक॒विरृ॒तस्य॒गर्भो॒निहि॑तोय॒माप॒रः| यूना᳚ह॒सन्ता᳚प्रथ॒मंविज॑ज्ञतु॒र्गुहा᳚हि॒तंजनि॑म॒नेम॒मुद्य॑तम्|| 5|| |
| म॒न्द्रस्य॑रू॒पंवि॑विदुर्मनी॒षिणः॑श्ये॒नोयदन्धो॒,अभ॑रत्परा॒वतः॑| तंम॑र्जयन्तसु॒वृधं᳚न॒दीष्वाँ,उ॒शन्त॑मं॒शुंप॑रि॒यन्त॑मृ॒ग्मिय᳚म्|| 6||वर्ग:20 |
| त्वांमृ॑जन्ति॒दश॒योष॑णःसु॒तंसोम॒ऋषि॑भिर्म॒तिभि॑र्धी॒तिभि᳚र्हि॒तम्| अव्यो॒वारे᳚भिरु॒तदे॒वहू᳚तिभि॒र्नृभि᳚र्य॒तोवाज॒माद॑र्षिसा॒तये᳚|| 7|| |
| प॒रि॒प्र॒यन्तं᳚व॒य्यं᳚सुषं॒सदं॒सोमं᳚मनी॒षा,अ॒भ्य॑नूषत॒स्तुभः॑| योधार॑या॒मधु॑माँ,ऊ॒र्मिणा᳚दि॒वइय॑र्ति॒वाचं᳚रयि॒षाळम॑र्त्यः|| 8|| |
| अ॒यंदि॒वइ॑यर्ति॒विश्व॒मारजः॒सोमः॑पुना॒नःक॒लशे᳚षुसीदति| अ॒द्भिर्गोभि᳚र्मृज्यते॒,अद्रि॑भिःसु॒तःपु॑ना॒नइन्दु॒र्वरि॑वोविदत्प्रि॒यम्|| 9|| |
| ए॒वानः॑सोमपरिषि॒च्यमा᳚नो॒वयो॒दध॑च्चि॒त्रत॑मंपवस्व| अ॒द्वे॒षेद्यावा᳚पृथि॒वीहु॑वेम॒देवा᳚ध॒त्तर॒यिम॒स्मेसु॒वीर᳚म्|| 10|| |
| [69] इषुर्नेति दशर्चस्य सूक्तस्यांगिरसोहिरण्यस्तूपः पवमानसोमोजगत्यंत्येद्वेत्रिष्टुभौ |{मंडल:9, सूक्त:69}{अनुवाक:4, सूक्त:2}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| इषु॒र्नधन्व॒न्प्रति॑धीयतेम॒तिर्व॒त्सोनमा॒तुरुप॑स॒र्ज्यूध॑नि| उ॒रुधा᳚रेवदुहे॒,अग्र॑आय॒त्यस्य᳚व्र॒तेष्वपि॒सोम॑इष्यते|| 1||वर्ग:21 |
| उपो᳚म॒तिःपृ॒च्यते᳚सि॒च्यते॒मधु॑म॒न्द्राज॑नीचोदते,अ॒न्तरा॒सनि॑| पव॑मानःसंत॒निःप्र॑घ्न॒तामि॑व॒मधु॑मान्द्र॒प्सःपरि॒वार॑मर्षति|| 2|| |
| अव्ये᳚वधू॒युःप॑वते॒परि॑त्व॒चिश्र॑थ्नी॒तेन॒प्तीरदि॑तेरृ॒तंय॒ते| हरि॑रक्रान्यज॒तःसं᳚य॒तोमदो᳚नृ॒म्णाशिशा᳚नोमहि॒षोनशो᳚भते|| 3|| |
| उ॒क्षामि॑माति॒प्रति॑यन्तिधे॒नवो᳚दे॒वस्य॑दे॒वीरुप॑यन्तिनिष्कृ॒तम्| अत्य॑क्रमी॒दर्जु॑नं॒वार॑म॒व्यय॒मत्कं॒ननि॒क्तंपरि॒सोमो᳚अव्यत|| 4|| |
| अमृ॑क्तेन॒रुश॑ता॒वास॑सा॒हरि॒रम॑र्त्योनिर्णिजा॒नःपरि᳚व्यत| दि॒वस्पृ॒ष्ठंब॒र्हणा᳚नि॒र्णिजे᳚कृतोप॒स्तर॑णंच॒म्वो᳚र्नभ॒स्मय᳚म्|| 5|| |
| सूर्य॑स्येवर॒श्मयो᳚द्रावयि॒त्नवो᳚मत्स॒रासः॑प्र॒सुपः॑सा॒कमी᳚रते| तन्तुं᳚त॒तंपरि॒सर्गा᳚सआ॒शवो॒नेन्द्रा᳚दृ॒तेप॑वते॒धाम॒किंच॒न|| 6||वर्ग:22 |
| सिन्धो᳚रिवप्रव॒णेनि॒म्नआ॒शवो॒वृष॑च्युता॒मदा᳚सोगा॒तुमा᳚शत| शंनो᳚निवे॒शेद्वि॒पदे॒चतु॑ष्पदे॒ऽस्मेवाजाः᳚सोमतिष्ठन्तुकृ॒ष्टयः॑|| 7|| |
| आनः॑पवस्व॒वसु॑म॒द्धिर᳚ण्यव॒दश्वा᳚व॒द्गोम॒द्यव॑मत्सु॒वीर्य᳚म्| यू॒यंहिसो᳚मपि॒तरो॒मम॒स्थन॑दि॒वोमू॒र्धानः॒प्रस्थि॑तावय॒स्कृतः॑|| 8|| |
| ए॒तेसोमाः॒पव॑मानास॒इन्द्रं॒रथा᳚इव॒प्रय॑युःसा॒तिमच्छ॑| सु॒ताःप॒वित्र॒मति॑य॒न्त्यव्यं᳚हि॒त्वीव॒व्रिंह॒रितो᳚वृ॒ष्टिमच्छ॑|| 9|| |
| इन्द॒विन्द्रा᳚यबृह॒तेप॑वस्वसुमृळी॒को,अ॑नव॒द्योरि॒शादाः᳚| भरा᳚च॒न्द्राणि॑गृण॒तेवसू᳚निदे॒वैर्द्या᳚वापृथिवी॒प्राव॑तंनः|| 10|| |
| [70] त्रिरस्माइति दशर्चस्यक्तसूस्य वैश्वामित्रोरेणुः पवमानसोमोजगत्यंत्यात्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:70}{अनुवाक:4, सूक्त:3}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| त्रिर॑स्मैस॒प्तधे॒नवो᳚दुदुह्रेस॒त्यामा॒शिरं᳚पू॒र्व्येव्यो᳚मनि| च॒त्वार्य॒न्याभुव॑नानिनि॒र्णिजे॒चारू᳚णिचक्रे॒यदृ॒तैरव॑र्धत|| 1||वर्ग:23 |
| सभिक्ष॑माणो,अ॒मृत॑स्य॒चारु॑णउ॒भेद्यावा॒काव्ये᳚ना॒विश॑श्रथे| तेजि॑ष्ठा,अ॒पोमं॒हना॒परि᳚व्यत॒यदी᳚दे॒वस्य॒श्रव॑सा॒सदो᳚वि॒दुः|| 2|| |
| ते,अ॑स्यसन्तुके॒तवोऽमृ॑त्य॒वोऽदा᳚भ्यासोज॒नुषी᳚उ॒भे,अनु॑| येभि᳚र्नृ॒म्णाच॑दे॒व्या᳚चपुन॒तआदिद्राजा᳚नंम॒नना᳚अगृभ्णत|| 3|| |
| समृ॒ज्यमा᳚नोद॒शभिः॑सु॒कर्म॑भिः॒प्रम॑ध्य॒मासु॑मा॒तृषु॑प्र॒मेसचा᳚| व्र॒तानि॑पा॒नो,अ॒मृत॑स्य॒चारु॑णउ॒भेनृ॒चक्षा॒,अनु॑पश्यते॒विशौ᳚|| 4|| |
| सम᳚र्मृजा॒नइ᳚न्द्रि॒याय॒धाय॑स॒ओभे,अ॒न्तारोद॑सीहर्षतेहि॒तः| वृषा॒शुष्मे᳚णबाधते॒विदु᳚र्म॒तीरा॒देदि॑शानःशर्य॒हेव॑शु॒रुधः॑|| 5|| |
| समा॒तरा॒नददृ॑शानउ॒स्रियो॒नान॑ददेतिम॒रुता᳚मिवस्व॒नः| जा॒नन्नृ॒तंप्र॑थ॒मंयत्स्व᳚र्णरं॒प्रश॑स्तये॒कम॑वृणीतसु॒क्रतुः॑|| 6||वर्ग:24 |
| रु॒वति॑भी॒मोवृ॑ष॒भस्त॑वि॒ष्यया॒शृङ्गे॒शिशा᳚नो॒हरि॑णीविचक्ष॒णः| आयोनिं॒सोमः॒सुकृ॑तं॒निषी᳚दतिग॒व्ययी॒त्वग्भ॑वतिनि॒र्णिग॒व्ययी᳚|| 7|| |
| शुचिः॑पुना॒नस्त॒न्व॑मरे॒पस॒मव्ये॒हरि॒र्न्य॑धाविष्ट॒सान॑वि| जुष्टो᳚मि॒त्राय॒वरु॑णायवा॒यवे᳚त्रि॒धातु॒मधु॑क्रियतेसु॒कर्म॑भिः|| 8|| |
| पव॑स्वसोमदे॒ववी᳚तये॒वृषेन्द्र॑स्य॒हार्दि॑सोम॒धान॒मावि॑श| पु॒रानो᳚बा॒धाद्दु॑रि॒ताति॑पारयक्षेत्र॒विद्धिदिश॒आहा᳚विपृच्छ॒ते|| 9|| |
| हि॒तोनसप्ति॑र॒भिवाज॑म॒र्षेन्द्र॑स्येन्दोज॒ठर॒माप॑वस्व| ना॒वानसिन्धु॒मति॑पर्षिवि॒द्वाञ्छूरो॒नयुध्य॒न्नव॑नोनि॒दःस्पः॑|| 10|| |
| [71] आदक्षिणेति नवर्चस्य सूक्तस्य वैश्वामित्र ऋषभः पवमानसोमोजगत्यंत्यान्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:71}{अनुवाक:4, सूक्त:4}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| आदक्षि॑णासृज्यतेशु॒ष्म्या॒३॑(आ॒)सदं॒वेति॑द्रु॒होर॒क्षसः॑पाति॒जागृ॑विः| हरि॑रोप॒शंकृ॑णुते॒नभ॒स्पय॑उप॒स्तिरे᳚च॒म्वो॒३॑(ओ॒)र्ब्रह्म॑नि॒र्णिजे᳚|| 1||वर्ग:25 |
| प्रकृ॑ष्टि॒हेव॑शू॒षए᳚ति॒रोरु॑वदसु॒र्य१॑(अं॒)वर्णं॒निरि॑णीते,अस्य॒तम्| जहा᳚तिव॒व्रिंपि॒तुरे᳚तिनिष्कृ॒तमु॑प॒प्रुतं᳚कृणुतेनि॒र्णिजं॒तना᳚|| 2|| |
| अद्रि॑भिःसु॒तःप॑वते॒गभ॑स्त्योर्वृषा॒यते॒नभ॑सा॒वेप॑तेम॒ती| समो᳚दते॒नस॑ते॒साध॑तेगि॒राने᳚नि॒क्ते,अ॒प्सुयज॑ते॒परी᳚मणि|| 3|| |
| परि॑द्यु॒क्षंसह॑सःपर्वता॒वृधं॒मध्वः॑सिञ्चन्तिह॒र्म्यस्य॑स॒क्षणि᳚म्| आयस्मि॒न्गावः॑सुहु॒ताद॒ऊध॑निमू॒र्धञ्छ्री॒णन्त्य॑ग्रि॒यंवरी᳚मभिः|| 4|| |
| समी॒रथं॒नभु॒रिजो᳚रहेषत॒दश॒स्वसा᳚रो॒,अदि॑तेरु॒पस्थ॒आ| जिगा॒दुप॑ज्रयति॒गोर॑पी॒च्यं᳚प॒दंयद॑स्यम॒तुथा॒,अजी᳚जनन्|| 5|| |
| श्ये॒नोनयोनिं॒सद॑नंधि॒याकृ॒तंहि॑र॒ण्यय॑मा॒सदं᳚दे॒वएष॑ति| एरि॑णन्तिब॒र्हिषि॑प्रि॒यंगि॒राश्वो॒नदे॒वाँ,अप्ये᳚तिय॒ज्ञियः॑|| 6||वर्ग:26 |
| परा॒व्य॑क्तो,अरु॒षोदि॒वःक॒विर्वृषा᳚त्रिपृ॒ष्ठो,अ॑नविष्ट॒गा,अ॒भि| स॒हस्र॑णीति॒र्यतिः॑परा॒यती᳚रे॒भोनपू॒र्वीरु॒षसो॒विरा᳚जति|| 7|| |
| त्वे॒षंरू॒पंकृ॑णुते॒वर्णो᳚अस्य॒सयत्राश॑य॒त्समृ॑ता॒सेध॑तिस्रि॒धः| अ॒प्साया᳚तिस्व॒धया॒दैव्यं॒जनं॒संसु॑ष्टु॒तीनस॑ते॒संगो,अ॑ग्रया|| 8|| |
| उ॒क्षेव॑यू॒थाप॑रि॒यन्न॑रावी॒दधि॒त्विषी᳚रधित॒सूर्य॑स्य| दि॒व्यःसु॑प॒र्णोऽव॑चक्षत॒क्षांसोमः॒परि॒क्रतु॑नापश्यते॒जाः|| 9|| |
| [72] हरिंमृजंतीति नवर्चस्य सूक्तस्य आंगिरसोहरिमंतः पवमानसोमोजगती |{मंडल:9, सूक्त:72}{अनुवाक:4, सूक्त:5}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| हरिं᳚मृजन्त्यरु॒षोनयु॑ज्यते॒संधे॒नुभिः॑क॒लशे॒सोमो᳚अज्यते| उद्वाच॑मी॒रय॑तिहि॒न्वते᳚म॒तीपु॑रुष्टु॒तस्य॒कति॑चित्परि॒प्रियः॑|| 1||वर्ग:27 |
| सा॒कंव॑दन्तिब॒हवो᳚मनी॒षिण॒इन्द्र॑स्य॒सोमं᳚ज॒ठरे॒यदा᳚दु॒हुः| यदी᳚मृ॒जन्ति॒सुग॑भस्तयो॒नरः॒सनी᳚ळाभिर्द॒शभिः॒काम्यं॒मधु॑|| 2|| |
| अर॑ममाणो॒,अत्ये᳚ति॒गा,अ॒भिसूर्य॑स्यप्रि॒यंदु॑हि॒तुस्ति॒रोरव᳚म्| अन्व॑स्मै॒जोष॑मभरद्विनंगृ॒सःसंद्व॒यीभिः॒स्वसृ॑भिः,क्षेतिजा॒मिभिः॑|| 3|| |
| नृधू᳚तो॒,अद्रि॑षुतोब॒र्हिषि॑प्रि॒यःपति॒र्गवां᳚प्र॒दिव॒इन्दु᳚रृ॒त्वियः॑| पुरं᳚धिवा॒न्मनु॑षोयज्ञ॒साध॑नः॒शुचि॑र्धि॒याप॑वते॒सोम॑इन्द्रते|| 4|| |
| नृबा॒हुभ्यां᳚चोदि॒तोधार॑यासु॒तो᳚ऽनुष्व॒धंप॑वते॒सोम॑इन्द्रते| आप्राः॒क्रतू॒न्त्सम॑जैरध्व॒रेम॒तीर्वेर्नद्रु॒षच्च॒म्वो॒३॑(ओ॒)रास॑द॒द्धरिः॑|| 5|| |
| अं॒शुंदु॑हन्तिस्त॒नय᳚न्त॒मक्षि॑तंक॒विंक॒वयो॒ऽपसो᳚मनी॒षिणः॑| समी॒गावो᳚म॒तयो᳚यन्तिसं॒यत॑ऋ॒तस्य॒योना॒सद॑नेपुन॒र्भुवः॑|| 6||वर्ग:28 |
| नाभा᳚पृथि॒व्याध॒रुणो᳚म॒होदि॒वो॒३॑(ओ॒)ऽपामू॒र्मौसिन्धु॑ष्व॒न्तरु॑क्षि॒तः| इन्द्र॑स्य॒वज्रो᳚वृष॒भोवि॒भूव॑सुः॒सोमो᳚हृ॒देप॑वते॒चारु॑मत्स॒रः|| 7|| |
| सतूप॑वस्व॒परि॒पार्थि॑वं॒रजः॑स्तो॒त्रेशिक्ष᳚न्नाधून्व॒तेच॑सुक्रतो| मानो॒निर्भा॒ग्वसु॑नःसादन॒स्पृशो᳚र॒यिंपि॒शङ्गं᳚बहु॒लंव॑सीमहि|| 8|| |
| आतून॑इन्दोश॒तदा॒त्वश्व्यं᳚स॒हस्र॑दातुपशु॒मद्धिर᳚ण्यवत्| उप॑मास्वबृह॒तीरे॒वती॒रिषोऽधि॑स्तो॒त्रस्य॑पवमाननोगहि|| 9|| |
| [73] स्रक्वेद्रप्सस्येति नवर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः पवित्रः पवमान सोमो जगती |{मंडल:9, सूक्त:73}{अनुवाक:4, सूक्त:6}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| स्रक्वे᳚द्र॒प्सस्य॒धम॑तः॒सम॑स्वरन्नृ॒तस्य॒योना॒सम॑रन्त॒नाभ॑यः| त्रीन्त्समू॒र्ध्नो,असु॑रश्चक्रआ॒रभे᳚स॒त्यस्य॒नावः॑सु॒कृत॑मपीपरन्|| 1||वर्ग:29 |
| स॒म्यक्स॒म्यञ्चो᳚महि॒षा,अ॑हेषत॒सिन्धो᳚रू॒र्मावधि॑वे॒ना,अ॑वीविपन्| मधो॒र्धारा᳚भिर्ज॒नय᳚न्तो,अ॒र्कमित्प्रि॒यामिन्द्र॑स्यत॒न्व॑मवीवृधन्|| 2|| |
| प॒वित्र॑वन्तः॒परि॒वाच॑मासते¦पि॒तैषां᳚प्र॒त्नो,अ॒भिर॑क्षतिव्र॒तम्| म॒हःस॑मु॒द्रंवरु॑णस्ति॒रोद॑धे॒¦धीरा॒,इच्छे᳚कुर्ध॒रुणे᳚ष्वा॒रभ᳚म्|| 3|| |
| स॒हस्र॑धा॒रेऽव॒तेसम॑स्वरन्¦दि॒वोनाके॒मधु॑जिह्वा,अस॒श्चतः॑| अस्य॒स्पशो॒ननिमि॑षन्ति॒भूर्ण॑यः¦प॒देप॑देपा॒शिनः॑सन्ति॒सेत॑वः|| 4|| |
| पि॒तुर्मा॒तुरध्यायेस॒मस्व॑र¦न्नृ॒चाशोच᳚न्तःसं॒दह᳚न्तो,अव्र॒तान्| इन्द्र॑द्विष्टा॒मप॑धमन्तिमा॒यया॒¦त्वच॒मसि॑क्नीं॒भूम॑नोदि॒वस्परि॑|| 5|| |
| प्र॒त्नान्माना॒दध्यायेस॒मस्व॑र॒¦ञ्छ्लोक॑यन्त्रासोरभ॒सस्य॒मन्त॑वः| अपा᳚न॒क्षासो᳚बधि॒रा,अ॑हासत¦ऋ॒तस्य॒पन्थां॒नत॑रन्तिदु॒ष्कृतः॑|| 6||वर्ग:30 |
| स॒हस्र॑धारे॒वित॑तेप॒वित्र॒आ¦वाचं᳚पुनन्तिक॒वयो᳚मनी॒षिणः॑| रु॒द्रास॑एषामिषि॒रासो᳚अ॒द्रुहः॒¦स्पशः॒स्वञ्चः॑सु॒दृशो᳚नृ॒चक्ष॑सः|| 7|| |
| ऋ॒तस्य॑गो॒पानदभा᳚यसु॒क्रतु॒स्त्रीषप॒वित्रा᳚हृ॒द्य१॑(अ॒)न्तराद॑धे| वि॒द्वान्त्सविश्वा॒भुव॑ना॒भिप॑श्य॒त्यवाजु॑ष्टान्विध्यतिक॒र्ते,अ᳚व्र॒तान्|| 8|| |
| ऋ॒तस्य॒तन्तु॒र्वित॑तःप॒वित्र॒आजि॒ह्वाया॒,अग्रे॒वरु॑णस्यमा॒यया᳚| धीरा᳚श्चि॒त्तत्स॒मिन॑क्षन्तआश॒तात्रा᳚क॒र्तमव॑पदा॒त्यप्र॑भुः|| 9|| |
| [74] शिशुर्नेति नवर्चस्य सूक्तस्य दैर्घतमसः कक्षीवान्पवमान सोमोजगत्यष्टमीत्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:74}{अनुवाक:4, सूक्त:7}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| शिशु॒र्नजा॒तोऽव॑चक्रद॒द्वने॒स्व१॑(अ॒)र्यद्वा॒ज्य॑रु॒षःसिषा᳚सति| दि॒वोरेत॑सासचतेपयो॒वृधा॒तमी᳚महेसुम॒तीशर्म॑स॒प्रथः॑|| 1||वर्ग:31 |
| दि॒वोयःस्क॒म्भोध॒रुणः॒स्वा᳚तत॒आपू᳚र्णो,अं॒शुःप॒र्येति॑वि॒श्वतः॑| सेमेम॒हीरोद॑सीयक्षदा॒वृता᳚समीची॒नेदा᳚धार॒समिषः॑क॒विः|| 2|| |
| महि॒प्सरः॒सुकृ॑तंसो॒म्यंमधू॒र्वीगव्यू᳚ति॒रदि॑तेरृ॒तंय॒ते| ईशे॒योवृ॒ष्टेरि॒तउ॒स्रियो॒वृषा॒पांने॒तायइ॒तऊ᳚तिरृ॒ग्मियः॑|| 3|| |
| आ॒त्म॒न्वन्नभो᳚दुह्यतेघृ॒तंपय॑ऋ॒तस्य॒नाभि॑र॒मृतं॒विजा᳚यते| स॒मी॒ची॒नाःसु॒दान॑वःप्रीणन्ति॒तंनरो᳚हि॒तमव॑मेहन्ति॒पेर॑वः|| 4|| |
| अरा᳚वीदं॒शुःसच॑मानऊ॒र्मिणा᳚देवा॒व्य१॑(अं॒)मनु॑षेपिन्वति॒त्वच᳚म्| दधा᳚ति॒गर्भ॒मदि॑तेरु॒पस्थ॒आयेन॑तो॒कंच॒तन॑यंच॒धाम॑हे|| 5|| |
| स॒हस्र॑धा॒रेऽव॒ता,अ॑स॒श्चत॑स्तृ॒तीये᳚सन्तु॒रज॑सिप्र॒जाव॑तीः| चत॑स्रो॒नाभो॒निहि॑ता,अ॒वोदि॒वोह॒विर्भ॑रन्त्य॒मृतं᳚घृत॒श्चुतः॑|| 6||वर्ग:32 |
| श्वे॒तंरू॒पंकृ॑णुते॒यत्सिषा᳚सति॒सोमो᳚मी॒ढ्वाँ,असु॑रोवेद॒भूम॑नः| धि॒याशमी᳚सचते॒सेम॒भिप्र॒वद्दि॒वस्कव᳚न्ध॒मव॑दर्षदु॒द्रिण᳚म्|| 7|| |
| अध॑श्वे॒तंक॒लशं॒गोभि॑र॒क्तंकार्ष्म॒न्नावा॒ज्य॑क्रमीत्सस॒वान्| आहि᳚न्विरे॒मन॑सादेव॒यन्तः॑क॒क्षीव॑तेश॒तहि॑माय॒गोना᳚म्|| 8|| |
| अ॒द्भिःसो᳚मपपृचा॒नस्य॑ते॒रसोऽव्यो॒वारं॒विप॑वमानधावति| समृ॒ज्यमा᳚नःक॒विभि᳚र्मदिन्तम॒स्वद॒स्वेन्द्रा᳚यपवमानपी॒तये᳚|| 9|| |
| [75] अभिप्रियाणीति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमानसोमोजगती |{मंडल:9, सूक्त:75}{अनुवाक:4, सूक्त:8}{अष्टक:7, अध्याय:2} |
| अ॒भिप्रि॒याणि॑पवते॒चनो᳚हितो॒नामा᳚निय॒ह्वो,अधि॒येषु॒वर्ध॑ते| आसूर्य॑स्यबृह॒तोबृ॒हन्नधि॒रथं॒विष्व᳚ञ्चमरुहद्विचक्ष॒णः|| 1||वर्ग:33 |
| ऋ॒तस्य॑जि॒ह्वाप॑वते॒मधु॑प्रि॒यंव॒क्तापति॑र्धि॒यो,अ॒स्या,अदा᳚भ्यः| दधा᳚तिपु॒त्रःपि॒त्रोर॑पी॒च्य१॑(अं॒)नाम॑तृ॒तीय॒मधि॑रोच॒नेदि॒वः|| 2|| |
| अव॑द्युता॒नःक॒लशाँ᳚,अचिक्रद॒न्नृभि᳚र्येमा॒नःकोश॒आहि॑र॒ण्यये᳚| अ॒भीमृ॒तस्य॑दो॒हना᳚अनूष॒ताधि॑त्रिपृ॒ष्ठउ॒षसो॒विरा᳚जति|| 3|| |
| अद्रि॑भिःसु॒तोम॒तिभि॒श्चनो᳚हितःप्ररो॒चय॒न्रोद॑सीमा॒तरा॒शुचिः॑| रोमा॒ण्यव्या᳚स॒मया॒विधा᳚वति॒मधो॒र्धारा॒पिन्व॑मानादि॒वेदि॑वे|| 4|| |
| परि॑सोम॒प्रध᳚न्वास्व॒स्तये॒नृभिः॑पुना॒नो,अ॒भिवा᳚सया॒शिर᳚म्| येते॒मदा᳚आह॒नसो॒विहा᳚यस॒स्तेभि॒रिन्द्रं᳚चोदय॒दात॑वेम॒घम्|| 5|| |
| [76] धर्तेति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमानसोमोजगती |{मंडल:9, सूक्त:76}{अनुवाक:4, सूक्त:9}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| ध॒र्तादि॒वःप॑वते॒कृत्व्यो॒रसो॒दक्षो᳚दे॒वाना᳚मनु॒माद्यो॒नृभिः॑| हरिः॑सृजा॒नो,अत्यो॒नसत्व॑भि॒र्वृथा॒पाजां᳚सिकृणुतेन॒दीष्वा|| 1||वर्ग:1 |
| शूरो॒नध॑त्त॒आयु॑धा॒गभ॑स्त्योः॒स्व१॑(अः॒)सिषा᳚सन्रथि॒रोगवि॑ष्टिषु| इन्द्र॑स्य॒शुष्म॑मी॒रय᳚न्नप॒स्युभि॒रिन्दु᳚र्हिन्वा॒नो,अ॑ज्यतेमनी॒षिभिः॑|| 2|| |
| इन्द्र॑स्यसोम॒पव॑मानऊ॒र्मिणा᳚तवि॒ष्यमा᳚णोज॒ठरे॒ष्वावि॑श| प्रणः॑पिन्ववि॒द्युद॒भ्रेव॒रोद॑सीधि॒यानवाजाँ॒,उप॑मासि॒शश्व॑तः|| 3|| |
| विश्व॑स्य॒राजा᳚पवतेस्व॒र्दृश॑ऋ॒तस्य॑धी॒तिमृ॑षि॒षाळ॑वीवशत्| यःसूर्य॒स्यासि॑रेणमृ॒ज्यते᳚पि॒ताम॑ती॒नामस॑मष्टकाव्यः|| 4|| |
| वृषे᳚वयू॒थापरि॒कोश॑मर्षस्य॒पामु॒पस्थे᳚वृष॒भःकनि॑क्रदत्| सइन्द्रा᳚यपवसेमत्स॒रिन्त॑मो॒यथा॒जेषा᳚मसमि॒थेत्वोत॑यः|| 5|| |
| [77] एषइति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमान सोमोजगती |{मंडल:9, सूक्त:77}{अनुवाक:4, सूक्त:10}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| ए॒षप्रकोशे॒मधु॑माँ,अचिक्रद॒दिन्द्र॑स्य॒वज्रो॒वपु॑षो॒वपु॑ष्टरः| अ॒भीमृ॒तस्य॑सु॒दुघा᳚घृत॒श्चुतो᳚वा॒श्रा,अ॑र्षन्ति॒पय॑सेवधे॒नवः॑|| 1||वर्ग:2 |
| सपू॒र्व्यःप॑वते॒यंदि॒वस्परि॑श्ये॒नोम॑था॒यदि॑षि॒तस्ति॒रोरजः॑| समध्व॒आयु॑वते॒वेवि॑जान॒इत्कृ॒शानो॒रस्तु॒र्मन॒साह॑बि॒भ्युषा᳚|| 2|| |
| तेनः॒पूर्वा᳚स॒उप॑रास॒इन्द॑वोम॒हेवाजा᳚यधन्वन्तु॒गोम॑ते| ई॒क्षे॒ण्या᳚सो,अ॒ह्यो॒३॑(ओ॒)नचार॑वो॒ब्रह्म॑ब्रह्म॒येजु॑जु॒षुर्ह॒विर्ह॑विः|| 3|| |
| अ॒यंनो᳚वि॒द्वान्व॑नवद्वनुष्य॒तइन्दुः॑स॒त्राचा॒मन॑सापुरुष्टु॒तः| इ॒नस्य॒यःसद॑ने॒गर्भ॑माद॒धेगवा᳚मुरु॒ब्जम॒भ्यर्ष॑तिव्र॒जम्|| 4|| |
| चक्रि॑र्दि॒वःप॑वते॒कृत्व्यो॒रसो᳚म॒हाँ,अद॑ब्धो॒वरु॑णोहु॒रुग्य॒ते| असा᳚विमि॒त्रोवृ॒जने᳚षुय॒ज्ञियोऽत्यो॒नयू॒थेवृ॑ष॒युःकनि॑क्रदत्|| 5|| |
| [78] प्रराजेति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमान सोमो जगती |{मंडल:9, सूक्त:78}{अनुवाक:4, सूक्त:11}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| प्रराजा॒वाचं᳚ज॒नय᳚न्नसिष्यदद॒पोवसा᳚नो,अ॒भिगा,इ॑यक्षति| गृ॒भ्णाति॑रि॒प्रमवि॑रस्य॒तान्वा᳚शु॒द्धोदे॒वाना॒मुप॑यातिनिष्कृ॒तम्|| 1||वर्ग:3 |
| इन्द्रा᳚यसोम॒परि॑षिच्यसे॒नृभि᳚र्नृ॒चक्षा᳚ऊ॒र्मिःक॒विर॑ज्यसे॒वने᳚| पू॒र्वीर्हिते᳚स्रु॒तयः॒सन्ति॒यात॑वेस॒हस्र॒मश्वा॒हर॑यश्चमू॒षदः॑|| 2|| |
| स॒मु॒द्रिया᳚अप्स॒रसो᳚मनी॒षिण॒मासी᳚ना,अ॒न्तर॒भिसोम॑मक्षरन्| ता,ईं᳚हिन्वन्तिह॒र्म्यस्य॑स॒क्षणिं॒याच᳚न्तेसु॒म्नंपव॑मान॒मक्षि॑तम्|| 3|| |
| गो॒जिन्नः॒सोमो᳚रथ॒जिद्धि॑रण्य॒जित्स्व॒र्जिद॒ब्जित्प॑वतेसहस्र॒जित्| यंदे॒वास॑श्चक्रि॒रेपी॒तये॒मदं॒स्वादि॑ष्ठंद्र॒प्सम॑रु॒णंम॑यो॒भुव᳚म्|| 4|| |
| ए॒तानि॑सोम॒पव॑मानो,अस्म॒युःस॒त्यानि॑कृ॒ण्वन्द्रवि॑णान्यर्षसि| ज॒हिशत्रु॑मन्ति॒केदू᳚र॒केच॒यउ॒र्वींगव्यू᳚ति॒मभ॑यंचनस्कृधि|| 5|| |
| [79] अचोदसइति पंचर्चस्य सूक्तस्य भार्गवः कविः पवमानसोमोजगती |{मंडल:9, सूक्त:79}{अनुवाक:4, सूक्त:12}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| अ॒चो॒दसो᳚नोधन्व॒न्त्विन्द॑वः॒प्रसु॑वा॒नासो᳚बृ॒हद्दि॑वेषु॒हर॑यः| विच॒नश᳚न्नइ॒षो,अरा᳚तयो॒ऽर्योन॑शन्त॒सनि॑षन्तनो॒धियः॑|| 1||वर्ग:4 |
| प्रणो᳚धन्व॒न्त्विन्द॑वोमद॒च्युतो॒धना᳚वा॒येभि॒रर्व॑तोजुनी॒मसि॑| ति॒रोमर्त॑स्य॒कस्य॑चि॒त्परि॑ह्वृतिंव॒यंधना᳚निवि॒श्वधा᳚भरेमहि|| 2|| |
| उ॒तस्वस्या॒,अरा᳚त्या,अ॒रिर्हिषउ॒तान्यस्या॒,अरा᳚त्या॒वृको॒हिषः| धन्व॒न्नतृष्णा॒सम॑रीत॒ताँ,अ॒भिसोम॑ज॒हिप॑वमानदुरा॒ध्यः॑|| 3|| |
| दि॒विते॒नाभा᳚पर॒मोयआ᳚द॒देपृ॑थि॒व्यास्ते᳚रुरुहुः॒सान॑वि॒क्षिपः॑| अद्र॑यस्त्वाबप्सति॒गोरधि॑त्व॒च्य१॑(अ॒)प्सुत्वा॒हस्तै᳚र्दुदुहुर्मनी॒षिणः॑|| 4|| |
| ए॒वात॑इन्दोसु॒भ्वं᳚सु॒पेश॑सं॒रसं᳚तुञ्जन्तिप्रथ॒मा,अ॑भि॒श्रियः॑| निदं᳚निदंपवमान॒निता᳚रिषआ॒विस्ते॒शुष्मो᳚भवतुप्रि॒योमदः॑|| 5|| |
| [80] सोमस्येति पंचर्चस्य सूक्तस्य भारद्वाजो वसुः पवमान सोमोजगती |{मंडल:9, सूक्त:80}{अनुवाक:4, सूक्त:13}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| सोम॑स्य॒धारा᳚पवतेनृ॒चक्ष॑सऋ॒तेन॑दे॒वान्ह॑वतेदि॒वस्परि॑| बृह॒स्पते᳚र॒वथे᳚ना॒विदि॑द्युतेसमु॒द्रासो॒नसव॑नानिविव्यचुः|| 1||वर्ग:5 |
| यंत्वा᳚वाजिन्न॒घ्न्या,अ॒भ्यनू᳚ष॒तायो᳚हतं॒योनि॒मारो᳚हसिद्यु॒मान्| म॒घोना॒मायुः॑प्रति॒रन्महि॒श्रव॒इन्द्रा᳚यसोमपवसे॒वृषा॒मदः॑|| 2|| |
| एन्द्र॑स्यकु॒क्षाप॑वतेम॒दिन्त॑म॒ऊर्जं॒वसा᳚नः॒श्रव॑सेसुम॒ङ्गलः॑| प्र॒त्यङ्सविश्वा॒भुव॑ना॒भिप॑प्रथे॒क्रीळ॒न्हरि॒रत्यः॑स्यन्दते॒वृषा᳚|| 3|| |
| तंत्वा᳚दे॒वेभ्यो॒मधु॑मत्तमं॒नरः॑स॒हस्र॑धारंदुहते॒दश॒क्षिपः॑| नृभिः॑सोम॒प्रच्यु॑तो॒ग्राव॑भिःसु॒तोविश्वा᳚न्दे॒वाँ,आप॑वस्वासहस्रजित्|| 4|| |
| तंत्वा᳚ह॒स्तिनो॒मधु॑मन्त॒मद्रि॑भिर्दु॒हन्त्य॒प्सुवृ॑ष॒भंदश॒क्षिपः॑| इन्द्रं᳚सोममा॒दय॒न्दैव्यं॒जनं॒सिन्धो᳚रिवो॒र्मिःपव॑मानो,अर्षसि|| 5|| |
| [81] प्रसोमस्येति पंचर्चस्य सूक्तस्य भारद्वाजो वसुः पवमान सोमोजगत्यंत्यात्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:81}{अनुवाक:4, सूक्त:14}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| प्रसोम॑स्य॒पव॑मानस्यो॒र्मय॒इन्द्र॑स्ययन्तिज॒ठरं᳚सु॒पेश॑सः| द॒ध्नायदी॒मुन्नी᳚ताय॒शसा॒गवां᳚दा॒नाय॒शूर॑मु॒दम᳚न्दिषुःसु॒ताः|| 1||वर्ग:6 |
| अच्छा॒हिसोमः॑क॒लशाँ॒,असि॑ष्यद॒दत्यो॒नवोळ्हा᳚र॒घुव॑र्तनि॒र्वृषा᳚| अथा᳚दे॒वाना᳚मु॒भय॑स्य॒जन्म॑नोवि॒द्वाँ,अ॑श्नोत्य॒मुत॑इ॒तश्च॒यत्|| 2|| |
| आनः॑सोम॒पव॑मानःकिरा॒वस्विन्दो॒भव॑म॒घवा॒राध॑सोम॒हः| शिक्षा᳚वयोधो॒वस॑वे॒सुचे॒तुना॒मानो॒गय॑मा॒रे,अ॒स्मत्परा᳚सिचः|| 3|| |
| आनः॑पू॒षापव॑मानःसुरा॒तयो᳚मि॒त्रोग॑च्छन्तु॒वरु॑णःस॒जोष॑सः| बृह॒स्पति᳚र्म॒रुतो᳚वा॒युर॒श्विना॒त्वष्टा᳚सवि॒तासु॒यमा॒सर॑स्वती|| 4|| |
| उ॒भेद्यावा᳚पृथि॒वीवि॑श्वमि॒न्वे,अ᳚र्य॒मादे॒वो,अदि॑तिर्विधा॒ता| भगो॒नृशंस॑उ॒र्व१॑(अ॒)न्तरि॑क्षं॒विश्वे᳚दे॒वाःपव॑मानंजुषन्त|| 5|| |
| [82] असावीति पंचर्चस्य सूक्तस्य भारद्वाजो वसुः पवमान सोमोजगत्यंत्यात्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:82}{अनुवाक:4, सूक्त:15}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| असा᳚वि॒सोमो᳚अरु॒षोवृषा॒हरी॒राजे᳚वद॒स्मो,अ॒भिगा,अ॑चिक्रदत्| पु॒ना॒नोवारं॒पर्ये᳚त्य॒व्ययं᳚श्ये॒नोनयोनिं᳚घृ॒तव᳚न्तमा॒सद᳚म्|| 1||वर्ग:7 |
| क॒विर्वे᳚ध॒स्यापर्ये᳚षि॒माहि॑न॒मत्यो॒नमृ॒ष्टो,अ॒भिवाज॑मर्षसि| अ॒प॒सेध᳚न्दुरि॒तासो᳚ममृळयघृ॒तंवसा᳚नः॒परि॑यासिनि॒र्णिज᳚म्|| 2|| |
| प॒र्जन्यः॑पि॒ताम॑हि॒षस्य॑प॒र्णिनो॒नाभा᳚पृथि॒व्यागि॒रिषु॒क्षयं᳚दधे| स्वसा᳚र॒आपो᳚अ॒भिगा,उ॒तास॑र॒न्त्संग्राव॑भिर्नसतेवी॒ते,अ॑ध्व॒रे|| 3|| |
| जा॒येव॒पत्या॒वधि॒शेव॑मंहसे॒पज्रा᳚यागर्भशृणु॒हिब्रवी᳚मिते| अ॒न्तर्वाणी᳚षु॒प्रच॑रा॒सुजी॒वसे᳚ऽनि॒न्द्योवृ॒जने᳚सोमजागृहि|| 4|| |
| यथा॒पूर्वे᳚भ्यःशत॒सा,अमृ॑ध्रःसहस्र॒साःप॒र्यया॒वाज॑मिन्दो| ए॒वाप॑वस्वसुवि॒ताय॒नव्य॑से॒तव᳚व्र॒तमन्वापः॑सचन्ते|| 5|| |
| [83] पवित्रंतइति पंचर्चस्य सूक्तस्यांगिरसः पवित्रः पवमानसोमोजगती |{मंडल:9, सूक्त:83}{अनुवाक:4, सूक्त:16}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| प॒वित्रं᳚ते॒वित॑तंब्रह्मणस्पते¦प्र॒भुर्गात्रा᳚णि॒पर्ये᳚षिवि॒श्वतः॑| अत॑प्ततनू॒र्नतदा॒मो,अ॑श्नुते¦शृ॒तास॒इद्वह᳚न्त॒स्तत्समा᳚शत|| 1||वर्ग:8 |
| तपो᳚ष्प॒वित्रं॒वित॑तंदि॒वस्प॒देशोच᳚न्तो,अस्य॒तन्त॑वो॒व्य॑स्थिरन्| अव᳚न्त्यस्यपवी॒तार॑मा॒शवो᳚दि॒वस्पृ॒ष्ठमधि॑तिष्ठन्ति॒चेत॑सा|| 2|| |
| अरू᳚रुचदु॒षसः॒पृश्नि॑रग्रि॒यउ॒क्षाबि॑भर्ति॒भुव॑नानिवाज॒युः| मा॒या॒विनो᳚ममिरे,अस्यमा॒यया᳚नृ॒चक्ष॑सःपि॒तरो॒गर्भ॒माद॑धुः|| 3|| |
| ग॒न्ध॒र्वइ॒त्थाप॒दम॑स्यरक्षति॒पाति॑दे॒वानां॒जनि॑मा॒न्यद्भु॑तः| गृ॒भ्णाति॑रि॒पुंनि॒धया᳚नि॒धाप॑तिःसु॒कृत्त॑मा॒मधु॑नोभ॒क्षमा᳚शत|| 4|| |
| ह॒विर्ह॑विष्मो॒महि॒सद्म॒दैव्यं॒नभो॒वसा᳚नः॒परि॑यास्यध्व॒रम्| राजा᳚प॒वित्र॑रथो॒वाज॒मारु॑हःस॒हस्र॑भृष्टिर्जयसि॒श्रवो᳚बृ॒हत्|| 5|| |
| [84] पवस्वेति पंचर्चस्य सूक्तस्य वाच्यः प्रजापतिः पवमान सोमोजगती |{मंडल:9, सूक्त:84}{अनुवाक:4, सूक्त:17}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| पव॑स्वदेव॒माद॑नो॒विच॑र्षणिर॒प्सा,इन्द्रा᳚य॒वरु॑णायवा॒यवे᳚| कृ॒धीनो᳚अ॒द्यवरि॑वःस्वस्ति॒मदु॑रुक्षि॒तौगृ॑णीहि॒दैव्यं॒जन᳚म्|| 1||वर्ग:9 |
| आयस्त॒स्थौभुव॑ना॒न्यम॑र्त्यो॒विश्वा᳚नि॒सोमः॒परि॒तान्य॑र्षति| कृ॒ण्वन्त्सं॒चृतं᳚वि॒चृत॑म॒भिष्ट॑य॒इन्दुः॑सिषक्त्यु॒षसं॒नसूर्यः॑|| 2|| |
| आयोगोभिः॑सृ॒ज्यत॒ओष॑धी॒ष्वादे॒वानां᳚सु॒म्नइ॒षय॒न्नुपा᳚वसुः| आवि॒द्युता᳚पवते॒धार॑यासु॒तइन्द्रं॒सोमो᳚मा॒दय॒न्दैव्यं॒जन᳚म्|| 3|| |
| ए॒षस्यसोमः॑पवतेसहस्र॒जिद्धि᳚न्वा॒नोवाच॑मिषि॒रामु॑ष॒र्बुध᳚म्| इन्दुः॑समु॒द्रमुदि॑यर्तिवा॒युभि॒रेन्द्र॑स्य॒हार्दि॑क॒लशे᳚षुसीदति|| 4|| |
| अ॒भित्यंगावः॒पय॑सापयो॒वृधं॒सोमं᳚श्रीणन्तिम॒तिभिः॑स्व॒र्विद᳚म्| ध॒नं॒ज॒यःप॑वते॒कृत्व्यो॒रसो॒विप्रः॑क॒विःकाव्ये᳚ना॒स्व॑र्चनाः|| 5|| |
| [85] इंद्रायेति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य भार्गवोवेनः पवमानसोमो जगत्यंत्येद्वेत्रिष्टुभौ |{मंडल:9, सूक्त:85}{अनुवाक:4, सूक्त:18}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| इन्द्रा᳚यसोम॒सुषु॑तः॒परि॑स्र॒वापामी᳚वाभवतु॒रक्ष॑सास॒ह| माते॒रस॑स्यमत्सतद्वया॒विनो॒द्रवि॑णस्वन्तइ॒हस॒न्त्विन्द॑वः|| 1||वर्ग:10 |
| अ॒स्मान्त्स॑म॒र्येप॑वमानचोदय॒दक्षो᳚दे॒वाना॒मसि॒हिप्रि॒योमदः॑| ज॒हिशत्रूँ᳚र॒भ्याभ᳚न्दनाय॒तःपिबे᳚न्द्र॒सोम॒मव॑नो॒मृधो᳚जहि|| 2|| |
| अद॑ब्धइन्दोपवसेम॒दिन्त॑मआ॒त्मेन्द्र॑स्यभवसिधा॒सिरु॑त्त॒मः| अ॒भिस्व॑रन्तिब॒हवो᳚मनी॒षिणो॒राजा᳚नम॒स्यभुव॑नस्यनिंसते|| 3|| |
| स॒हस्र॑णीथःश॒तधा᳚रो॒,अद्भु॑त॒इन्द्रा॒येन्दुः॑पवते॒काम्यं॒मधु॑| जय॒न्क्षेत्र॑म॒भ्य॑र्षा॒जय᳚न्न॒पउ॒रुंनो᳚गा॒तुंकृ॑णुसोममीढ्वः|| 4|| |
| कनि॑क्रदत्क॒लशे॒गोभि॑रज्यसे॒व्य१॑(अ॒)व्ययं᳚स॒मया॒वार॑मर्षसि| म॒र्मृ॒ज्यमा᳚नो॒,अत्यो॒नसा᳚न॒सिरिन्द्र॑स्यसोमज॒ठरे॒सम॑क्षरः|| 5|| |
| स्वा॒दुःप॑वस्वदि॒व्याय॒जन्म॑ने¦स्वा॒दुरिन्द्रा᳚यसु॒हवी᳚तुनाम्ने| स्वा॒दुर्मि॒त्राय॒वरु॑णायवा॒यवे॒¦बृह॒स्पत॑ये॒मधु॑माँ॒,अदा᳚भ्यः|| 6||वर्ग:11 |
| अत्यं᳚मृजन्तिक॒लशे॒दश॒क्षिपः॒प्रविप्रा᳚णांम॒तयो॒वाच॑ईरते| पव॑माना,अ॒भ्य॑र्षन्तिसुष्टु॒तिमेन्द्रं᳚विशन्तिमदि॒रास॒इन्द॑वः|| 7|| |
| पव॑मानो,अ॒भ्य॑र्षासु॒वीर्य॑मु॒र्वींगव्यू᳚तिं॒महि॒शर्म॑स॒प्रथः॑| माकि᳚र्नो,अ॒स्यपरि॑षूतिरीश॒तेन्दो॒जये᳚म॒त्वया॒धनं᳚धनम्|| 8|| |
| अधि॒द्याम॑स्थाद्वृष॒भोवि॑चक्ष॒णोऽरू᳚रुच॒द्विदि॒वोरो᳚च॒नाक॒विः| राजा᳚प॒वित्र॒मत्ये᳚ति॒रोरु॑वद्दि॒वःपी॒यूषं᳚दुहतेनृ॒चक्ष॑सः|| 9|| |
| दि॒वोनाके॒मधु॑जिह्वा,अस॒श्चतो᳚वे॒नादु॑हन्त्यु॒क्षणं᳚गिरि॒ष्ठाम्| अ॒प्सुद्र॒प्संवा᳚वृधा॒नंस॑मु॒द्रआसिन्धो᳚रू॒र्मामधु॑मन्तंप॒वित्र॒आ|| 10|| |
| नाके᳚सुप॒र्णमु॑पपप्ति॒वांसं॒गिरो᳚वे॒नाना᳚मकृपन्तपू॒र्वीः| शिशुं᳚रिहन्तिम॒तयः॒पनि॑प्नतंहिर॒ण्ययं᳚शकु॒नंक्षाम॑णि॒स्थाम्|| 11|| |
| ऊ॒र्ध्वोग᳚न्ध॒र्वो,अधि॒नाके᳚अस्था॒द्विश्वा᳚रू॒पाप्र॑ति॒चक्षा᳚णो,अस्य| भा॒नुःशु॒क्रेण॑शो॒चिषा॒व्य॑द्यौ॒त्प्रारू᳚रुच॒द्रोद॑सीमा॒तरा॒शुचिः॑|| 12|| |
| [86] प्रतआशवइत्यष्टाचत्वारिंशदृचस्य सूक्तस्य आद्यानांदशानामकृष्टामाषाऋषयः एकादश्यादिदशानांसिकतानिवावरी एकविंश्यादिदशानां पृश्नियोजाः एकत्रिंश्यादिदशानामत्रेयः एकचत्वारिंश्यादिपंचानांभौमोत्रिः अत्यानांतिसृणां शौनकोगृत्समदः पवमान सोमोजगती |{मंडल:9, सूक्त:86}{अनुवाक:5, सूक्त:1}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| प्रत॑आ॒शवः॑पवमानधी॒जवो॒मदा᳚अर्षन्तिरघु॒जा,इ॑व॒त्मना᳚| दि॒व्याःसु॑प॒र्णामधु॑मन्त॒इन्द॑वोम॒दिन्त॑मासः॒परि॒कोश॑मासते|| 1||वर्ग:12 |
| प्रते॒मदा᳚सोमदि॒रास॑आ॒शवोऽसृ॑क्षत॒रथ्या᳚सो॒यथा॒पृथ॑क्| धे॒नुर्नव॒त्संपय॑सा॒भिव॒ज्रिण॒मिन्द्र॒मिन्द॑वो॒मधु॑मन्तऊ॒र्मयः॑|| 2|| |
| अत्यो॒नहि॑या॒नो,अ॒भिवाज॑मर्षस्व॒र्वित्कोशं᳚दि॒वो,अद्रि॑मातरम्| वृषा᳚प॒वित्रे॒,अधि॒सानो᳚अ॒व्यये॒सोमः॑पुना॒नइ᳚न्द्रि॒याय॒धाय॑से|| 3|| |
| प्रत॒आश्वि॑नीःपवमानधी॒जुवो᳚दि॒व्या,अ॑सृग्र॒न्पय॑सा॒धरी᳚मणि| प्रान्तरृष॑यः॒स्थावि॑रीरसृक्षत॒येत्वा᳚मृ॒जन्त्यृ॑षिषाणवे॒धसः॑|| 4|| |
| विश्वा॒धामा᳚निविश्वचक्ष॒ऋभ्व॑सःप्र॒भोस्ते᳚स॒तःपरि॑यन्तिके॒तवः॑| व्या॒न॒शिःप॑वसेसोम॒धर्म॑भिः॒पति॒र्विश्व॑स्य॒भुव॑नस्यराजसि|| 5|| |
| उ॒भ॒यतः॒पव॑मानस्यर॒श्मयो᳚ध्रु॒वस्य॑स॒तःपरि॑यन्तिके॒तवः॑| यदी᳚प॒वित्रे॒,अधि॑मृ॒ज्यते॒हरिः॒सत्ता॒नियोना᳚क॒लशे᳚षुसीदति|| 6||वर्ग:13 |
| य॒ज्ञस्य॑के॒तुःप॑वतेस्वध्व॒रःसोमो᳚दे॒वाना॒मुप॑यातिनिष्कृ॒तम्| स॒हस्र॑धारः॒परि॒कोश॑मर्षति॒वृषा᳚प॒वित्र॒मत्ये᳚ति॒रोरु॑वत्|| 7|| |
| राजा᳚समु॒द्रंन॒द्यो॒३॑(ओ॒)विगा᳚हते॒ऽपामू॒र्मिंस॑चते॒सिन्धु॑षुश्रि॒तः| अध्य॑स्था॒त्सानु॒पव॑मानो,अ॒व्ययं॒नाभा᳚पृथि॒व्याध॒रुणो᳚म॒होदि॒वः|| 8|| |
| दि॒वोनसानु॑स्त॒नय᳚न्नचिक्रद॒द्द्यौश्च॒यस्य॑पृथि॒वीच॒धर्म॑भिः| इन्द्र॑स्यस॒ख्यंप॑वतेवि॒वेवि॑द॒त्सोमः॑पुना॒नःक॒लशे᳚षुसीदति|| 9|| |
| ज्योति᳚र्य॒ज्ञस्य॑पवते॒मधु॑प्रि॒यंपि॒तादे॒वानां᳚जनि॒तावि॒भूव॑सुः| दधा᳚ति॒रत्नं᳚स्व॒धयो᳚रपी॒च्यं᳚म॒दिन्त॑मोमत्स॒रइ᳚न्द्रि॒योरसः॑|| 10|| |
| अ॒भि॒क्रन्द᳚न्क॒लशं᳚वा॒ज्य॑र्षति॒पति॑र्दि॒वःश॒तधा᳚रोविचक्ष॒णः| हरि᳚र्मि॒त्रस्य॒सद॑नेषुसीदतिमर्मृजा॒नोऽवि॑भिः॒सिन्धु॑भि॒र्वृषा᳚|| 11||वर्ग:14 |
| अग्रे॒सिन्धू᳚नां॒पव॑मानो,अर्ष॒त्यग्रे᳚वा॒चो,अ॑ग्रि॒योगोषु॑गच्छति| अग्रे॒वाज॑स्यभजतेमहाध॒नंस्वा᳚यु॒धःसो॒तृभिः॑पूयते॒वृषा᳚|| 12|| |
| अ॒यंम॒तवा᳚ञ्छकु॒नोयथा᳚हि॒तोऽव्ये᳚ससार॒पव॑मानऊ॒र्मिणा᳚| तव॒क्रत्वा॒रोद॑सी,अन्त॒राक॑वे॒शुचि॑र्धि॒याप॑वते॒सोम॑इन्द्रते|| 13|| |
| द्रा॒पिंवसा᳚नोयज॒तोदि॑वि॒स्पृश॑मन्तरिक्ष॒प्राभुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः| स्व॑र्जज्ञा॒नोनभ॑सा॒भ्य॑क्रमीत्प्र॒त्नम॑स्यपि॒तर॒मावि॑वासति|| 14|| |
| सो,अ॑स्यवि॒शेमहि॒शर्म॑यच्छति॒यो,अ॑स्य॒धाम॑प्रथ॒मंव्या᳚न॒शे| प॒दंयद॑स्यपर॒मेव्यो᳚म॒न्यतो॒विश्वा᳚अ॒भिसंया᳚तिसं॒यतः॑|| 15|| |
| प्रो,अ॑यासी॒दिन्दु॒रिन्द्र॑स्यनिष्कृ॒तंसखा॒सख्यु॒र्नप्रमि॑नातिसं॒गिर᳚म्| मर्य॑इवयुव॒तिभिः॒सम॑र्षति॒सोमः॑क॒लशे᳚श॒तया᳚म्नाप॒था|| 16||वर्ग:15 |
| प्रवो॒धियो᳚मन्द्र॒युवो᳚विप॒न्युवः॑पन॒स्युवः॑सं॒वस॑नेष्वक्रमुः| सोमं᳚मनी॒षा,अ॒भ्य॑नूषत॒स्तुभो॒ऽभिधे॒नवः॒पय॑सेमशिश्रयुः|| 17|| |
| आनः॑सोमसं॒यतं᳚पि॒प्युषी॒मिष॒मिन्दो॒पव॑स्व॒पव॑मानो,अ॒स्रिध᳚म्| यानो॒दोह॑ते॒त्रिरह॒न्नस॑श्चुषीक्षु॒मद्वाज॑व॒न्मधु॑मत्सु॒वीर्य᳚म्|| 18|| |
| वृषा᳚मती॒नांप॑वतेविचक्ष॒णःसोमो॒,अह्नः॑प्रतरी॒तोषसो᳚दि॒वः| क्रा॒णासिन्धू᳚नांक॒लशाँ᳚,अवीवश॒दिन्द्र॑स्य॒हार्द्या᳚वि॒शन्म॑नी॒षिभिः॑|| 19|| |
| म॒नी॒षिभिः॑पवतेपू॒र्व्यःक॒विर्नृभि᳚र्य॒तःपरि॒कोशाँ᳚,अचिक्रदत्| त्रि॒तस्य॒नाम॑ज॒नय॒न्मधु॑क्षर॒दिन्द्र॑स्यवा॒योःस॒ख्याय॒कर्त॑वे|| 20|| |
| अ॒यंपु॑ना॒नउ॒षसो॒विरो᳚चयद॒यंसिन्धु॑भ्यो,अभवदुलोक॒कृत्| अ॒यंत्रिःस॒प्तदु॑दुहा॒नआ॒शिरं॒सोमो᳚हृ॒देप॑वते॒चारु॑मत्स॒रः|| 21||वर्ग:16 |
| पव॑स्वसोमदि॒व्येषु॒धाम॑सुसृजा॒नइ᳚न्दोक॒लशे᳚प॒वित्र॒आ| सीद॒न्निन्द्र॑स्यज॒ठरे॒कनि॑क्रद॒न्नृभि᳚र्य॒तःसूर्य॒मारो᳚हयोदि॒वि|| 22|| |
| अद्रि॑भिःसु॒तःप॑वसेप॒वित्र॒आँ,इन्द॒विन्द्र॑स्यज॒ठरे᳚ष्वावि॒शन्| त्वंनृ॒चक्षा᳚अभवोविचक्षण॒सोम॑गो॒त्रमङ्गि॑रोभ्योऽवृणो॒रप॑|| 23|| |
| त्वांसो᳚म॒पव॑मानंस्वा॒ध्योऽनु॒विप्रा᳚सो,अमदन्नव॒स्यवः॑| त्वांसु॑प॒र्णआभ॑रद्दि॒वस्परीन्दो॒विश्वा᳚भिर्म॒तिभिः॒परि॑ष्कृतम्|| 24|| |
| अव्ये᳚पुना॒नंपरि॒वार॑ऊ॒र्मिणा॒हरिं᳚नवन्ते,अ॒भिस॒प्तधे॒नवः॑| अ॒पामु॒पस्थे॒,अध्या॒यवः॑क॒विमृ॒तस्य॒योना᳚महि॒षा,अ॑हेषत|| 25|| |
| इन्दुः॑पुना॒नो,अति॑गाहते॒मृधो॒विश्वा᳚निकृ॒ण्वन्त्सु॒पथा᳚नि॒यज्य॑वे| गाःकृ᳚ण्वा॒नोनि॒र्णिजं᳚हर्य॒तःक॒विरत्यो॒नक्रीळ॒न्परि॒वार॑मर्षति|| 26||वर्ग:17 |
| अ॒स॒श्चतः॑श॒तधा᳚रा,अभि॒श्रियो॒हरिं᳚नव॒न्तेऽव॒ता,उ॑द॒न्युवः॑| क्षिपो᳚मृजन्ति॒परि॒गोभि॒रावृ॑तंतृ॒तीये᳚पृ॒ष्ठे,अधि॑रोच॒नेदि॒वः|| 27|| |
| तवे॒माःप्र॒जादि॒व्यस्य॒रेत॑स॒स्त्वंविश्व॑स्य॒भुव॑नस्यराजसि| अथे॒दंविश्वं᳚पवमानते॒वशे॒त्वमि᳚न्दोप्रथ॒मोधा᳚म॒धा,अ॑सि|| 28|| |
| त्वंस॑मु॒द्रो,अ॑सिविश्व॒वित्क॑वे॒तवे॒माःपञ्च॑प्र॒दिशो॒विध᳚र्मणि| त्वंद्यांच॑पृथि॒वींचाति॑जभ्रिषे॒तव॒ज्योतीं᳚षिपवमान॒सूर्यः॑|| 29|| |
| त्वंप॒वित्रे॒रज॑सो॒विध᳚र्मणिदे॒वेभ्यः॑सोमपवमानपूयसे| त्वामु॒शिजः॑प्रथ॒मा,अ॑गृभ्णत॒तुभ्ये॒माविश्वा॒भुव॑नानियेमिरे|| 30|| |
| प्ररे॒भए॒त्यति॒वार॑म॒व्ययं॒वृषा॒वने॒ष्वव॑चक्रद॒द्धरिः॑| संधी॒तयो᳚वावशा॒ना,अ॑नूषत॒शिशुं᳚रिहन्तिम॒तयः॒पनि॑प्नतम्|| 31||वर्ग:18 |
| ससूर्य॑स्यर॒श्मिभिः॒परि᳚व्यत॒तन्तुं᳚तन्वा॒नस्त्रि॒वृतं॒यथा᳚वि॒दे| नय᳚न्नृ॒तस्य॑प्र॒शिषो॒नवी᳚यसीः॒पति॒र्जनी᳚ना॒मुप॑यातिनिष्कृ॒तम्|| 32|| |
| राजा॒सिन्धू᳚नांपवते॒पति॑र्दि॒वऋ॒तस्य॑यातिप॒थिभिः॒कनि॑क्रदत्| स॒हस्र॑धारः॒परि॑षिच्यते॒हरिः॑पुना॒नोवाचं᳚ज॒नय॒न्नुपा᳚वसुः|| 33|| |
| पव॑मान॒मह्यर्णो॒विधा᳚वसि॒सूरो॒नचि॒त्रो,अव्य॑यानि॒पव्य॑या| गभ॑स्तिपूतो॒नृभि॒रद्रि॑भिःसु॒तोम॒हेवाजा᳚य॒धन्या᳚यधन्वसि|| 34|| |
| इष॒मूर्जं᳚पवमाना॒भ्य॑र्षसिश्ये॒नोनवंसु॑क॒लशे᳚षुसीदसि| इन्द्रा᳚य॒मद्वा॒मद्यो॒मदः॑सु॒तोदि॒वोवि॑ष्ट॒म्भउ॑प॒मोवि॑चक्ष॒णः|| 35|| |
| स॒प्तस्वसा᳚रो,अ॒भिमा॒तरः॒शिशुं॒नवं᳚जज्ञा॒नंजेन्यं᳚विप॒श्चित᳚म्| अ॒पांग᳚न्ध॒र्वंदि॒व्यंनृ॒चक्ष॑सं॒सोमं॒विश्व॑स्य॒भुव॑नस्यरा॒जसे᳚|| 36||वर्ग:19 |
| ई॒शा॒नइ॒माभुव॑नानि॒वीय॑सेयुजा॒नइ᳚न्दोह॒रितः॑सुप॒र्ण्यः॑| तास्ते᳚क्षरन्तु॒मधु॑मद्घृ॒तंपय॒स्तव᳚व्र॒तेसो᳚मतिष्ठन्तुकृ॒ष्टयः॑|| 37|| |
| त्वंनृ॒चक्षा᳚असिसोमवि॒श्वतः॒पव॑मानवृषभ॒ताविधा᳚वसि| सनः॑पवस्व॒वसु॑म॒द्धिर᳚ण्यवद्व॒यंस्या᳚म॒भुव॑नेषुजी॒वसे᳚|| 38|| |
| गो॒वित्प॑वस्ववसु॒विद्धि॑रण्य॒विद्रे᳚तो॒धा,इ᳚न्दो॒भुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः| त्वंसु॒वीरो᳚असिसोमविश्व॒वित्तंत्वा॒विप्रा॒,उप॑गि॒रेमआ᳚सते|| 39|| |
| उन्मध्व॑ऊ॒र्मिर्व॒नना᳚अतिष्ठिपद॒पोवसा᳚नोमहि॒षोविगा᳚हते| राजा᳚प॒वित्र॑रथो॒वाज॒मारु॑हत्स॒हस्र॑भृष्टिर्जयति॒श्रवो᳚बृ॒हत्|| 40|| |
| सभ॒न्दना॒,उदि॑यर्तिप्र॒जाव॑तीर्वि॒श्वायु॒र्विश्वाः᳚सु॒भरा॒,अह॑र्दिवि| ब्रह्म॑प्र॒जाव॑द्र॒यिमश्व॑पस्त्यंपी॒तइ᳚न्द॒विन्द्र॑म॒स्मभ्यं᳚याचतात्|| 41||वर्ग:20 |
| सो,अग्रे॒,अह्नां॒हरि᳚र्हर्य॒तोमदः॒प्रचेत॑साचेतयते॒,अनु॒द्युभिः॑| द्वाजना᳚या॒तय᳚न्न॒न्तरी᳚यते॒नरा᳚च॒शंसं॒दैव्यं᳚चध॒र्तरि॑|| 42|| |
| अ॒ञ्जते॒व्य᳚ञ्जते॒सम᳚ञ्जते॒क्रतुं᳚रिहन्ति॒मधु॑ना॒भ्य᳚ञ्जते| सिन्धो᳚रुच्छ्वा॒सेप॒तय᳚न्तमु॒क्षणं᳚हिरण्यपा॒वाःप॒शुमा᳚सुगृभ्णते|| 43|| |
| वि॒प॒श्चिते॒पव॑मानायगायतम॒हीनधारात्यन्धो᳚अर्षति| अहि॒र्नजू॒र्णामति॑सर्पति॒त्वच॒मत्यो॒नक्रीळ᳚न्नसर॒द्वृषा॒हरिः॑|| 44|| |
| अ॒ग्रे॒गोराजाप्य॑स्तविष्यतेवि॒मानो॒,अह्नां॒भुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः| हरि॑र्घृ॒तस्नुः॑सु॒दृशी᳚को,अर्ण॒वोज्यो॒तीर॑थःपवतेरा॒यओ॒क्यः॑|| 45|| |
| अस॑र्जिस्क॒म्भोदि॒वउद्य॑तो॒मदः॒परि॑त्रि॒धातु॒र्भुव॑नान्यर्षति| अं॒शुंरि॑हन्तिम॒तयः॒पनि॑प्नतंगि॒रायदि॑नि॒र्णिज॑मृ॒ग्मिणो᳚य॒युः|| 46||वर्ग:21 |
| प्रते॒धारा॒,अत्यण्वा᳚निमे॒ष्यः॑पुना॒नस्य॑सं॒यतो᳚यन्ति॒रंह॑यः| यद्गोभि॑रिन्दोच॒म्वोः᳚सम॒ज्यस॒आसु॑वा॒नःसो᳚मक॒लशे᳚षुसीदसि|| 47|| |
| पव॑स्वसोमक्रतु॒विन्न॑उ॒क्थ्योऽव्यो॒वारे॒परि॑धाव॒मधु॑प्रि॒यम्| ज॒हिविश्वा᳚न्र॒क्षस॑इन्दो,अ॒त्रिणो᳚बृ॒हद्व॑देमवि॒दथे᳚सु॒वीराः᳚|| 48|| |
| [87] प्रतुद्रवेति नवर्चस्य सूक्तस्य काव्यउशना पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:87}{अनुवाक:5, सूक्त:2}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| प्रतुद्र॑व॒परि॒कोशं॒निषी᳚द॒नृभिः॑पुना॒नो,अ॒भिवाज॑मर्ष| अश्वं॒नत्वा᳚वा॒जिनं᳚म॒र्जय॒न्तोऽच्छा᳚ब॒र्हीर॑श॒नाभि᳚र्नयन्ति|| 1||वर्ग:22 |
| स्वा॒यु॒धःप॑वतेदे॒वइन्दु॑रशस्ति॒हावृ॒जनं॒रक्ष॑माणः| पि॒तादे॒वानां᳚जनि॒तासु॒दक्षो᳚विष्ट॒म्भोदि॒वोध॒रुणः॑पृथि॒व्याः|| 2|| |
| ऋषि॒र्विप्रः॑पुरए॒ताजना᳚नामृ॒भुर्धीर॑उ॒शना॒काव्ये᳚न| सचि॑द्विवेद॒निहि॑तं॒यदा᳚सामपी॒च्य१॑(अं॒)गुह्यं॒नाम॒गोना᳚म्|| 3|| |
| ए॒षस्यते॒मधु॑माँ,इन्द्र॒सोमो॒वृषा॒वृष्णे॒परि॑प॒वित्रे᳚अक्षाः| स॒ह॒स्र॒साःश॑त॒साभू᳚रि॒दावा᳚शश्वत्त॒मंब॒र्हिरावा॒ज्य॑स्थात्|| 4|| |
| ए॒तेसोमा᳚अ॒भिग॒व्यास॒हस्रा᳚म॒हेवाजा᳚या॒मृता᳚य॒श्रवां᳚सि| प॒वित्रे᳚भिः॒पव॑माना,असृग्रञ्छ्रव॒स्यवो॒नपृ॑त॒नाजो॒,अत्याः᳚|| 5|| |
| परि॒हिष्मा᳚पुरुहू॒तोजना᳚नां॒विश्वास॑र॒द्भोज॑नापू॒यमा᳚नः| अथाभ॑रश्येनभृत॒प्रयां᳚सिर॒यिंतुञ्जा᳚नो,अ॒भिवाज॑मर्ष|| 6||वर्ग:23 |
| ए॒षसु॑वा॒नःपरि॒सोमः॑प॒वित्रे॒सर्गो॒नसृ॒ष्टो,अ॑दधाव॒दर्वा᳚| ति॒ग्मेशिशा᳚नोमहि॒षोनशृङ्गे॒गाग॒व्यन्न॒भिशूरो॒नसत्वा᳚|| 7|| |
| ए॒षाय॑यौपर॒माद॒न्तरद्रेः॒कूचि॑त्स॒तीरू॒र्वेगावि॑वेद| दि॒वोनवि॒द्युत्स्त॒नय᳚न्त्य॒भ्रैःसोम॑स्यतेपवतइन्द्र॒धारा᳚|| 8|| |
| उ॒तस्म॑रा॒शिंपरि॑यासि॒गोना॒मिन्द्रे᳚णसोमस॒रथं᳚पुना॒नः| पू॒र्वीरिषो᳚बृह॒तीर्जी᳚रदानो॒शिक्षा᳚शचीव॒स्तव॒ता,उ॑प॒ष्टुत्|| 9|| |
| [88] अयंसोमइत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काव्य उशना पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:88}{अनुवाक:5, सूक्त:3}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| अ॒यंसोम॑इन्द्र॒तुभ्यं᳚सुन्वे॒तुभ्यं᳚पवते॒त्वम॑स्यपाहि| त्वंह॒यंच॑कृ॒षेत्वंव॑वृ॒षइन्दुं॒मदा᳚य॒युज्या᳚य॒सोम᳚म्|| 1||वर्ग:24 |
| सईं॒रथो॒नभु॑रि॒षाळ॑योजिम॒हःपु॒रूणि॑सा॒तये॒वसू᳚नि| आदीं॒विश्वा᳚नहु॒ष्या᳚णिजा॒तास्व॑र्षाता॒वन॑ऊ॒र्ध्वान॑वन्त|| 2|| |
| वा॒युर्नयोनि॒युत्वाँ᳚,इ॒ष्टया᳚मा॒नास॑त्येव॒हव॒आशम्भ॑विष्ठः| वि॒श्ववा᳚रोद्रविणो॒दा,इ॑व॒त्मन्पू॒षेव॑धी॒जव॑नोऽसिसोम|| 3|| |
| इन्द्रो॒नयोम॒हाकर्मा᳚णि॒चक्रि᳚र्ह॒न्तावृ॒त्राणा᳚मसिसोमपू॒र्भित्| पै॒द्वोनहित्वमहि॑नाम्नांह॒न्ताविश्व॑स्यासिसोम॒दस्योः᳚|| 4|| |
| अ॒ग्निर्नयोवन॒आसृ॒ज्यमा᳚नो॒वृथा॒पाजां᳚सिकृणुतेन॒दीषु॑| जनो॒नयुध्वा᳚मह॒तउ॑प॒ब्दिरिय॑र्ति॒सोमः॒पव॑मानऊ॒र्मिम्|| 5|| |
| ए॒तेसोमा॒,अति॒वारा॒ण्यव्या᳚दि॒व्यानकोशा᳚सो,अ॒भ्रव॑र्षाः| वृथा᳚समु॒द्रंसिन्ध॑वो॒ननीचीः᳚सु॒तासो᳚अ॒भिक॒लशाँ᳚,असृग्रन्|| 6|| |
| शु॒ष्मीशर्धो॒नमारु॑तंपव॒स्वान॑भिशस्तादि॒व्यायथा॒विट्| आपो॒नम॒क्षूसु॑म॒तिर्भ॑वानःस॒हस्रा᳚प्साःपृतना॒षाण्नय॒ज्ञः|| 7|| |
| राज्ञो॒नुते॒वरु॑णस्यव्र॒तानि॑बृ॒हद्ग॑भी॒रंतव॑सोम॒धाम॑| शुचि॒ष्ट्वम॑सिप्रि॒योनमि॒त्रोद॒क्षाय्यो᳚अर्य॒मेवा᳚सिसोम|| 8|| |
| [89] प्रोस्यवह्निरिति सप्तर्चस्य सूक्तस्य काव्य उशना पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:89}{अनुवाक:5, सूक्त:4}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| प्रोस्यवह्निः॑प॒थ्या᳚भिरस्यान्दि॒वोनवृ॒ष्टिःपव॑मानो,अक्षाः| स॒हस्र॑धारो,असद॒न्न्य१॑(अ॒)स्मेमा॒तुरु॒पस्थे॒वन॒आच॒सोमः॑|| 1||वर्ग:25 |
| राजा॒सिन्धू᳚नामवसिष्ट॒वास॑ऋ॒तस्य॒नाव॒मारु॑ह॒द्रजि॑ष्ठाम्| अ॒प्सुद्र॒प्सोवा᳚वृधेश्ये॒नजू᳚तोदु॒हईं᳚पि॒तादु॒हईं᳚पि॒तुर्जाम्|| 2|| |
| सिं॒हंन॑सन्त॒मध्वो᳚अ॒यासं॒हरि॑मरु॒षंदि॒वो,अ॒स्यपति᳚म्| शूरो᳚यु॒त्सुप्र॑थ॒मःपृ॑च्छते॒गा,अस्य॒चक्ष॑सा॒परि॑पात्यु॒क्षा|| 3|| |
| मधु॑पृष्ठंघो॒रम॒यास॒मश्वं॒रथे᳚युञ्जन्त्युरुच॒क्रऋ॒ष्वम्| स्वसा᳚रईंजा॒मयो᳚मर्जयन्ति॒सना᳚भयोवा॒जिन॑मूर्जयन्ति|| 4|| |
| चत॑स्रईंघृत॒दुहः॑सचन्तेसमा॒ने,अ॒न्तर्ध॒रुणे॒निष॑त्ताः| ता,ई᳚मर्षन्ति॒नम॑सापुना॒नास्ता,ईं᳚वि॒श्वतः॒परि॑षन्तिपू॒र्वीः|| 5|| |
| वि॒ष्ट॒म्भोदि॒वोध॒रुणः॑पृथि॒व्याविश्वा᳚उ॒तक्षि॒तयो॒हस्ते᳚अस्य| अस॑त्त॒उत्सो᳚गृण॒तेनि॒युत्वा॒न्मध्वो᳚अं॒शुःप॑वतइन्द्रि॒याय॑|| 6|| |
| व॒न्वन्नवा᳚तो,अ॒भिदे॒ववी᳚ति॒मिन्द्रा᳚यसोमवृत्र॒हाप॑वस्व| श॒ग्धिम॒हःपु॑रुश्च॒न्द्रस्य॑रा॒यःसु॒वीर्य॑स्य॒पत॑यःस्याम|| 7|| |
| [90] प्रहिन्वानइति षडृचस्य सूक्तस्य मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:90}{अनुवाक:5, सूक्त:5}{अष्टक:7, अध्याय:3} |
| प्रहि᳚न्वा॒नोज॑नि॒तारोद॑स्यो॒रथो॒नवाजं᳚सनि॒ष्यन्न॑यासीत्| इन्द्रं॒गच्छ॒न्नायु॑धासं॒शिशा᳚नो॒विश्वा॒वसु॒हस्त॑योरा॒दधा᳚नः|| 1||वर्ग:26 |
| अ॒भित्रि॑पृ॒ष्ठंवृष॑णंवयो॒धामा᳚ङ्गू॒षाणा᳚मवावशन्त॒वाणीः᳚| वना॒वसा᳚नो॒वरु॑णो॒नसिन्धू॒न्विर॑त्न॒धाद॑यते॒वार्या᳚णि|| 2|| |
| शूर॑ग्रामः॒सर्व॑वीरः॒सहा᳚वा॒ञ्जेता᳚पवस्व॒सनि॑ता॒धना᳚नि| ति॒ग्मायु॑धः,क्षि॒प्रध᳚न्वास॒मत्स्वषा᳚ळ्हःसा॒ह्वान्पृत॑नासु॒शत्रू॑न्|| 3|| |
| उ॒रुग᳚व्यूति॒रभ॑यानिकृ॒ण्वन्त्स॑मीची॒ने,आप॑वस्वा॒पुरं᳚धी| अ॒पःसिषा᳚सन्नु॒षसः॒स्व१॑(अ॒)र्गाःसंचि॑क्रदोम॒हो,अ॒स्मभ्यं॒वाजा॑न्|| 4|| |
| मत्सि॑सोम॒वरु॑णं॒मत्सि॑मि॒त्रंमत्सीन्द्र॑मिन्दोपवमान॒विष्णु᳚म्| मत्सि॒शर्धो॒मारु॑तं॒मत्सि॑दे॒वान्मत्सि॑म॒हामिन्द्र॑मिन्दो॒मदा᳚य|| 5|| |
| ए॒वाराजे᳚व॒क्रतु॑माँ॒,अमे᳚न॒विश्वा॒घनि॑घ्नद्दुरि॒ताप॑वस्व| इन्दो᳚सू॒क्ताय॒वच॑से॒वयो᳚धायू॒यंपा᳚तस्व॒स्तिभिः॒सदा᳚नः|| 6|| |
| [91] असर्जीति षडृचस्य सूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:91}{अनुवाक:5, सूक्त:6}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| अस॑र्जि॒वक्वा॒रथ्ये॒यथा॒जौधि॒याम॒नोता᳚प्रथ॒मोम॑नी॒षी| दश॒स्वसा᳚रो॒,अधि॒सानो॒,अव्येऽज᳚न्ति॒वह्निं॒सद॑ना॒न्यच्छ॑|| 1||वर्ग:1 |
| वी॒तीजन॑स्यदि॒व्यस्य॑क॒व्यैरधि॑सुवा॒नोन॑हु॒ष्ये᳚भि॒रिन्दुः॑| प्रयोनृभि॑र॒मृतो॒मर्त्ये᳚भिर्मर्मृजा॒नोऽवि॑भि॒र्गोभि॑र॒द्भिः|| 2|| |
| वृषा॒वृष्णे॒रोरु॑वदं॒शुर॑स्मै॒पव॑मानो॒रुश॑दीर्ते॒पयो॒गोः| स॒हस्र॒मृक्वा᳚प॒थिभि᳚र्वचो॒विद॑ध्व॒स्मभिः॒सूरो॒,अण्वं॒विया᳚ति|| 3|| |
| रु॒जादृ॒ळ्हाचि॑द्र॒क्षसः॒सदां᳚सिपुना॒नइ᳚न्दऊर्णुहि॒विवाजा॑न्| वृ॒श्चोपरि॑ष्टात्तुज॒ताव॒धेन॒ये,अन्ति॑दू॒रादु॑पना॒यमे᳚षाम्|| 4|| |
| सप्र॑त्न॒वन्नव्य॑सेविश्ववारसू॒क्ताय॑प॒थःकृ॑णुहि॒प्राचः॑| येदुः॒षहा᳚सोव॒नुषा᳚बृ॒हन्त॒स्ताँस्ते᳚अश्यामपुरुकृत्पुरुक्षो|| 5|| |
| ए॒वापु॑ना॒नो,अ॒पःस्व१॑(अ॒)र्गा,अ॒स्मभ्यं᳚तो॒कातन॑यानि॒भूरि॑| शंनः॒,क्षेत्र॑मु॒रुज्योतीं᳚षिसोम॒ज्योङ्नः॒सूर्यं᳚दृ॒शये᳚रिरीहि|| 6|| |
| [92] परिसुवानइति षडृचस्य सूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:92}{अनुवाक:5, सूक्त:7}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| परि॑सुवा॒नोहरि॑रं॒शुःप॒वित्रे॒रथो॒नस॑र्जिस॒नये᳚हिया॒नः| आप॒च्छ्लोक॑मिन्द्रि॒यंपू॒यमा᳚नः॒प्रति॑दे॒वाँ,अ॑जुषत॒प्रयो᳚भिः|| 1||वर्ग:2 |
| अच्छा᳚नृ॒चक्षा᳚असरत्प॒वित्रे॒नाम॒दधा᳚नःक॒विर॑स्य॒योनौ᳚| सीद॒न्होते᳚व॒सद॑नेच॒मूषूपे᳚मग्म॒न्नृष॑यःस॒प्तविप्राः᳚|| 2|| |
| प्रसु॑मे॒धागा᳚तु॒विद्वि॒श्वदे᳚वः॒सोमः॑पुना॒नःसद॑एति॒नित्य᳚म्| भुव॒द्विश्वे᳚षु॒काव्ये᳚षु॒रन्तानु॒जना᳚न्यतते॒पञ्च॒धीरः॑|| 3|| |
| तव॒त्येसो᳚मपवमाननि॒ण्येविश्वे᳚दे॒वास्त्रय॑एकाद॒शासः॑| दश॑स्व॒धाभि॒रधि॒सानो॒,अव्ये᳚मृ॒जन्ति॑त्वान॒द्यः॑स॒प्तय॒ह्वीः|| 4|| |
| तन्नुस॒त्यंपव॑मानस्यास्तु॒यत्र॒विश्वे᳚का॒रवः॑सं॒नस᳚न्त| ज्योति॒र्यदह्ने॒,अकृ॑णोदुलो॒कंप्राव॒न्मनुं॒दस्य॑वेकर॒भीक᳚म्|| 5|| |
| परि॒सद्मे᳚वपशु॒मान्ति॒होता॒राजा॒नस॒त्यःसमि॑तीरिया॒नः| सोमः॑पुना॒नःक॒लशाँ᳚,अयासी॒त्सीद᳚न्मृ॒गोनम॑हि॒षोवने᳚षु|| 6|| |
| [93] साकमुक्षइति पंचर्चस्य सूक्तस्य गौतमो नोधाः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:93}{अनुवाक:5, सूक्त:8}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| सा॒क॒मुक्षो᳚मर्जयन्त॒स्वसा᳚रो॒दश॒धीर॑स्यधी॒तयो॒धनु॑त्रीः| हरिः॒पर्य॑द्रव॒ज्जाःसूर्य॑स्य॒द्रोणं᳚ननक्षे॒,अत्यो॒नवा॒जी|| 1||वर्ग:3 |
| संमा॒तृभि॒र्नशिशु᳚र्वावशा॒नोवृषा᳚दधन्वेपुरु॒वारो᳚अ॒द्भिः| मर्यो॒नयोषा᳚म॒भिनि॑ष्कृ॒तंयन्त्संग॑च्छतेक॒लश॑उ॒स्रिया᳚भिः|| 2|| |
| उ॒तप्रपि॑प्य॒ऊध॒रघ्न्या᳚या॒,इन्दु॒र्धारा᳚भिःसचतेसुमे॒धाः| मू॒र्धानं॒गावः॒पय॑साच॒मूष्व॒भिश्री᳚णन्ति॒वसु॑भि॒र्ननि॒क्तैः|| 3|| |
| सनो᳚दे॒वेभिः॑पवमानर॒देन्दो᳚र॒यिम॒श्विनं᳚वावशा॒नः| र॒थि॒रा॒यता᳚मुश॒तीपुरं᳚धिरस्म॒द्र्य१॑(अ॒)गादा॒वने॒वसू᳚नाम्|| 4|| |
| नूनो᳚र॒यिमुप॑मास्वनृ॒वन्तं᳚पुना॒नोवा॒ताप्यं᳚वि॒श्वश्च᳚न्द्रम्| प्रव᳚न्दि॒तुरि᳚न्दोता॒र्यायुः॑प्रा॒तर्म॒क्षूधि॒याव॑सुर्जगम्यात्|| 5|| |
| [94] अधियदिति पंचर्चस्य सूक्तस्य घौरः कण्वः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:94}{अनुवाक:5, सूक्त:9}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| अधि॒यद॑स्मिन्वा॒जिनी᳚व॒शुभः॒स्पर्ध᳚न्ते॒धियः॒सूर्ये॒नविशः॑| अ॒पोवृ॑णा॒नःप॑वतेकवी॒यन्व्र॒जंनप॑शु॒वर्ध॑नाय॒मन्म॑|| 1||वर्ग:4 |
| द्वि॒ताव्यू॒र्ण्वन्न॒मृत॑स्य॒धाम॑स्व॒र्विदे॒भुव॑नानिप्रथन्त| धियः॑पिन्वा॒नाःस्वस॑रे॒नगाव॑ऋता॒यन्ती᳚र॒भिवा᳚वश्र॒इन्दु᳚म्|| 2|| |
| परि॒यत्क॒विःकाव्या॒भर॑ते॒शूरो॒नरथो॒भुव॑नानि॒विश्वा᳚| दे॒वेषु॒यशो॒मर्ता᳚य॒भूष॒न्दक्षा᳚यरा॒यःपु॑रु॒भूषु॒नव्यः॑|| 3|| |
| श्रि॒येजा॒तःश्रि॒यआनिरि॑याय॒¦श्रियं॒वयो᳚जरि॒तृभ्यो᳚दधाति| श्रियं॒वसा᳚ना,अमृत॒त्वमा᳚य॒न्¦भव᳚न्तिस॒त्यास॑मि॒थामि॒तद्रौ᳚|| 4|| |
| इष॒मूर्ज॑म॒भ्य१॑(अ॒)र्षाश्वं॒गामु॒रुज्योतिः॑कृणुहि॒मत्सि॑दे॒वान्| विश्वा᳚नि॒हिसु॒षहा॒तानि॒तुभ्यं॒पव॑मान॒बाध॑सेसोम॒शत्रू॑न्|| 5|| |
| [95] कनिक्रंतीति पंचर्चस्य सूक्तस्य कण्वः प्रस्कण्वः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:95}{अनुवाक:5, सूक्त:10}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| कनि॑क्रन्ति॒हरि॒रासृ॒ज्यमा᳚नः॒सीद॒न्वन॑स्यज॒ठरे᳚पुना॒नः| नृभि᳚र्य॒तःकृ॑णुतेनि॒र्णिजं॒गा,अतो᳚म॒तीर्ज॑नयतस्व॒धाभिः॑|| 1||वर्ग:5 |
| हरिः॑सृजा॒नःप॒थ्या᳚मृ॒तस्येय॑र्ति॒वाच॑मरि॒तेव॒नाव᳚म्| दे॒वोदे॒वानां॒गुह्या᳚नि॒नामा॒विष्कृ॑णोतिब॒र्हिषि॑प्र॒वाचे᳚|| 2|| |
| अ॒पामि॒वेदू॒र्मय॒स्तर्तु॑राणाः॒प्रम॑नी॒षा,ई᳚रते॒सोम॒मच्छ॑| न॒म॒स्यन्ती॒रुप॑च॒यन्ति॒संचाच॑विशन्त्युश॒तीरु॒शन्त᳚म्|| 3|| |
| तंम᳚र्मृजा॒नंम॑हि॒षंनसाना᳚वं॒शुंदु॑हन्त्यु॒क्षणं᳚गिरि॒ष्ठाम्| तंवा᳚वशा॒नंम॒तयः॑सचन्तेत्रि॒तोबि॑भर्ति॒वरु॑णंसमु॒द्रे|| 4|| |
| इष्य॒न्वाच॑मुपव॒क्तेव॒होतुः॑पुना॒नइ᳚न्दो॒विष्या᳚मनी॒षाम्| इन्द्र॑श्च॒यत्क्षय॑थः॒सौभ॑गायसु॒वीर्य॑स्य॒पत॑यःस्याम|| 5|| |
| [96] प्रसेनानीरिति चतुर्विंशत्यृचस्य सूक्तस्य दैवोदासिः प्रतर्दनः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:96}{अनुवाक:5, सूक्त:11}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| प्रसे᳚ना॒नीःशूरो॒,अग्रे॒रथा᳚नांग॒व्यन्ने᳚ति॒हर्ष॑ते,अस्य॒सेना᳚| भ॒द्रान्कृ॒ण्वन्नि᳚न्द्रह॒वान्त्सखि॑भ्य॒आसोमो॒वस्त्रा᳚रभ॒सानि॑दत्ते|| 1||वर्ग:6 |
| सम॑स्य॒हरिं॒हर॑योमृजन्त्यश्वह॒यैरनि॑शितं॒नमो᳚भिः| आति॑ष्ठति॒रथ॒मिन्द्र॑स्य॒सखा᳚वि॒द्वाँ,ए᳚नासुम॒तिंया॒त्यच्छ॑|| 2|| |
| सनो᳚देवदे॒वता᳚तेपवस्वम॒हेसो᳚म॒प्सर॑सइन्द्र॒पानः॑| कृ॒ण्वन्न॒पोव॒र्षय॒न्द्यामु॒तेमामु॒रोरानो᳚वरिवस्यापुना॒नः|| 3|| |
| अजी᳚त॒येऽह॑तयेपवस्वस्व॒स्तये᳚स॒र्वता᳚तयेबृह॒ते| तदु॑शन्ति॒विश्व॑इ॒मेसखा᳚य॒स्तद॒हंव॑श्मिपवमानसोम|| 4|| |
| सोमः॑पवतेजनि॒ताम॑ती॒नांज॑नि॒तादि॒वोज॑नि॒तापृ॑थि॒व्याः| ज॒नि॒ताग्नेर्ज॑नि॒तासूर्य॑स्यजनि॒तेन्द्र॑स्यजनि॒तोतविष्णोः᳚|| 5|| |
| ब्र॒ह्मादे॒वानां᳚पद॒वीःक॑वी॒नामृषि॒र्विप्रा᳚णांमहि॒षोमृ॒गाणा᳚म्| श्ये॒नोगृध्रा᳚णां॒स्वधि॑ति॒र्वना᳚नां॒सोमः॑प॒वित्र॒मत्ये᳚ति॒रेभ॑न्|| 6||वर्ग:7 |
| प्रावी᳚विपद्वा॒चऊ॒र्मिंनसिन्धु॒र्गिरः॒सोमः॒पव॑मानोमनी॒षाः| अ॒न्तःपश्य᳚न्वृ॒जने॒माव॑रा॒ण्याति॑ष्ठतिवृष॒भोगोषु॑जा॒नन्|| 7|| |
| सम॑त्स॒रःपृ॒त्सुव॒न्वन्नवा᳚तःस॒हस्र॑रेता,अ॒भिवाज॑मर्ष| इन्द्रा᳚येन्दो॒पव॑मानोमनी॒ष्य१॑(अं॒)शोरू॒र्मिमी᳚रय॒गा,इ॑ष॒ण्यन्|| 8|| |
| परि॑प्रि॒यःक॒लशे᳚दे॒ववा᳚त॒इन्द्रा᳚य॒सोमो॒रण्यो॒मदा᳚य| स॒हस्र॑धारःश॒तवा᳚ज॒इन्दु᳚र्वा॒जीनसप्तिः॒सम॑नाजिगाति|| 9|| |
| सपू॒र्व्योव॑सु॒विज्जाय॑मानोमृजा॒नो,अ॒प्सुदु॑दुहा॒नो,अद्रौ᳚| अ॒भि॒श॒स्ति॒पाभुव॑नस्य॒राजा᳚वि॒दद्गा॒तुंब्रह्म॑णेपू॒यमा᳚नः|| 10|| |
| त्वया॒हिनः॑पि॒तरः॑सोम॒पूर्वे॒कर्मा᳚णिच॒क्रुःप॑वमान॒धीराः᳚| व॒न्वन्नवा᳚तःपरि॒धीँरपो᳚र्णुवी॒रेभि॒रश्वै᳚र्म॒घवा᳚भवानः|| 11||वर्ग:8 |
| यथाप॑वथा॒मन॑वेवयो॒धा,अ॑मित्र॒हाव॑रिवो॒विद्ध॒विष्मा॑न्| ए॒वाप॑वस्व॒द्रवि॑णं॒दधा᳚न॒इन्द्रे॒संति॑ष्ठज॒नयायु॑धानि|| 12|| |
| पव॑स्वसोम॒मधु॑माँऋ॒तावा॒पोवसा᳚नो॒,अधि॒सानो॒,अव्ये᳚| अव॒द्रोणा᳚निघृ॒तवा᳚न्तिसीदम॒दिन्त॑मोमत्स॒रइ᳚न्द्र॒पानः॑|| 13|| |
| वृ॒ष्टिंदि॒वःश॒तधा᳚रःपवस्वसहस्र॒सावा᳚ज॒युर्दे॒ववी᳚तौ| संसिन्धु॑भिःक॒लशे᳚वावशा॒नःसमु॒स्रिया᳚भिःप्रति॒रन्न॒आयुः॑|| 14|| |
| ए॒षस्यसोमो᳚म॒तिभिः॑पुना॒नोऽत्यो॒नवा॒जीतर॒तीदरा᳚तीः| पयो॒नदु॒ग्धमदि॑तेरिषि॒रमु॒र्वि॑वगा॒तुःसु॒यमो॒नवोळ्हा᳚|| 15|| |
| स्वा॒यु॒धःसो॒तृभिः॑पू॒यमा᳚नो॒ऽभ्य॑र्ष॒गुह्यं॒चारु॒नाम॑| अ॒भिवाजं॒सप्ति॑रिवश्रव॒स्याभिवा॒युम॒भिगादे᳚वसोम|| 16||वर्ग:9 |
| शिशुं᳚जज्ञा॒नंह᳚र्य॒तंमृ॑जन्तिशु॒म्भन्ति॒वह्निं᳚म॒रुतो᳚ग॒णेन॑| क॒विर्गी॒र्भिःकाव्ये᳚नाक॒विःसन्त्सोमः॑प॒वित्र॒मत्ये᳚ति॒रेभ॑न्|| 17|| |
| ऋषि॑मना॒यऋ॑षि॒कृत्स्व॒र्षाःस॒हस्र॑णीथःपद॒वीःक॑वी॒नाम्| तृ॒तीयं॒धाम॑महि॒षःसिषा᳚स॒न्त्सोमो᳚वि॒राज॒मनु॑राजति॒ष्टुप्|| 18|| |
| च॒मू॒षच्छ्ये॒नःश॑कु॒नोवि॒भृत्वा᳚गोवि॒न्दुर्द्र॒प्सआयु॑धानि॒बिभ्र॑त्| अ॒पामू॒र्मिंसच॑मानःसमु॒द्रंतु॒रीयं॒धाम॑महि॒षोवि॑वक्ति|| 19|| |
| मर्यो॒नशु॒भ्रस्त॒न्वं᳚मृजा॒नोऽत्यो॒नसृत्वा᳚स॒नये॒धना᳚नाम्| वृषे᳚वयू॒थापरि॒कोश॒मर्ष॒न्कनि॑क्रदच्च॒म्वो॒३॑(ओ॒)रावि॑वेश|| 20|| |
| पव॑स्वेन्दो॒पव॑मानो॒महो᳚भिः॒कनि॑क्रद॒त्परि॒वारा᳚ण्यर्ष| क्रीळ᳚ञ्च॒म्वो॒३॑(ओ॒)रावि॑शपू॒यमा᳚न॒इन्द्रं᳚ते॒रसो᳚मदि॒रोम॑मत्तु|| 21||वर्ग:10 |
| प्रास्य॒धारा᳚बृह॒तीर॑सृग्रन्न॒क्तोगोभिः॑क॒लशाँ॒,आवि॑वेश| साम॑कृ॒ण्वन्त्सा᳚म॒न्यो᳚विप॒श्चित्क्रन्द᳚न्नेत्य॒भिसख्यु॒र्नजा॒मिम्|| 22|| |
| अ॒प॒घ्नन्ने᳚षिपवमान॒शत्रू᳚न्प्रि॒यांनजा॒रो,अ॒भिगी᳚त॒इन्दुः॑| सीद॒न्वने᳚षुशकु॒नोनपत्वा॒सोमः॑पुना॒नःक॒लशे᳚षु॒सत्ता᳚|| 23|| |
| आते॒रुचः॒पव॑मानस्यसोम॒योषे᳚वयन्तिसु॒दुघाः᳚सुधा॒राः| हरि॒रानी᳚तःपुरु॒वारो᳚अ॒प्स्वचि॑क्रदत्क॒लशे᳚देवयू॒नाम्|| 24|| |
| [97] अस्यप्रेपेत्यष्टपंचाशदृचस्य सूक्तस्याद्यानांतिसृणांमैत्रावरुणिर्वसिष्ठः चतुर्थ्यादितिसृणांवासिष्ठइंद्रप्रमतिः सप्तम्यादितिसृणांवासिष्ठोवृषगणः दशम्यादितिसृणांवासिष्टोमन्युः त्रयोदश्यादितिसृणां वासिष्ठ उपमन्युः षोडश्यादितिसृणांवासिष्ठोव्याघ्रपादः एकोनविंश्यादितिसृणां वासिष्ठःशक्तिः द्वाविंश्यादितिसृणां वासिष्ठःकर्णश्रुतः पंचविंश्यादितिसृणां वासिष्ठो मृळीकः अष्टविंश्यादितिसृणां वासिष्ठोवसुक्र एकत्रिंश्यादि चतुर्दशानां शाक्त्यः पराशरः पंचचत्वारिंश्यादिचतुर्दशानामांगिरसः कुत्स ऋषयः पवमानसोमस्त्रिष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:97}{अनुवाक:6, सूक्त:1}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| अ॒स्यप्रे॒षाहे॒मना᳚पू॒यमा᳚नोदे॒वोदे॒वेभिः॒सम॑पृक्त॒रस᳚म्| सु॒तःप॒वित्रं॒पर्ये᳚ति॒रेभ᳚न्मि॒तेव॒सद्म॑पशु॒मान्ति॒होता᳚|| 1||वर्ग:11 |
| भ॒द्रावस्त्रा᳚सम॒न्या॒३॑(आ॒)वसा᳚नोम॒हान्क॒विर्नि॒वच॑नानि॒शंस॑न्| आव॑च्यस्वच॒म्वोः᳚पू॒यमा᳚नोविचक्ष॒णोजागृ॑विर्दे॒ववी᳚तौ|| 2|| |
| समु॑प्रि॒योमृ॑ज्यते॒सानो॒,अव्ये᳚य॒शस्त॑रोय॒शसां॒क्षैतो᳚अ॒स्मे| अ॒भिस्व॑र॒धन्वा᳚पू॒यमा᳚नोयू॒यंपा᳚तस्व॒स्तिभिः॒सदा᳚नः|| 3|| |
| प्रगा᳚यता॒भ्य॑र्चामदे॒वान्त्सोमं᳚हिनोतमह॒तेधना᳚य| स्वा॒दुःप॑वाते॒,अति॒वार॒मव्य॒मासी᳚दातिक॒लशं᳚देव॒युर्नः॑|| 4|| |
| इन्दु॑र्दे॒वाना॒मुप॑स॒ख्यमा॒यन्त्स॒हस्र॑धारःपवते॒मदा᳚य| नृभिः॒स्तवा᳚नो॒,अनु॒धाम॒पूर्व॒मग॒न्निन्द्रं᳚मह॒तेसौभ॑गाय|| 5|| |
| स्तो॒त्रेरा॒येहरि॑रर्षापुना॒नइन्द्रं॒मदो᳚गच्छतुते॒भरा᳚य| दे॒वैर्या᳚हिस॒रथं॒राधो॒,अच्छा᳚यू॒यंपा᳚तस्व॒स्तिभिः॒सदा᳚नः|| 6||वर्ग:12 |
| प्रकाव्य॑मु॒शने᳚वब्रुवा॒णोदे॒वोदे॒वानां॒जनि॑माविवक्ति| महि᳚व्रतः॒शुचि॑बन्धुःपाव॒कःप॒दाव॑रा॒हो,अ॒भ्ये᳚ति॒रेभ॑न्|| 7|| |
| प्रहं॒सास॑स्तृ॒पलं᳚म॒न्युमच्छा॒मादस्तं॒वृष॑गणा,अयासुः| आ॒ङ्गू॒ष्य१॑(अं॒)पव॑मानं॒सखा᳚योदु॒र्मर्षं᳚सा॒कंप्रव॑दन्तिवा॒णम्|| 8|| |
| सरं᳚हतउरुगा॒यस्य॑जू॒तिंवृथा॒क्रीळ᳚न्तंमिमते॒नगावः॑| प॒री॒ण॒संकृ॑णुतेति॒ग्मशृ᳚ङ्गो॒दिवा॒हरि॒र्ददृ॑शे॒नक्त॑मृ॒ज्रः|| 9|| |
| इन्दु᳚र्वा॒जीप॑वते॒गोन्यो᳚घा॒,इन्द्रे॒सोमः॒सह॒इन्व॒न्मदा᳚य| हन्ति॒रक्षो॒बाध॑ते॒पर्यरा᳚ती॒र्वरि॑वःकृ॒ण्वन्वृ॒जन॑स्य॒राजा᳚|| 10|| |
| अध॒धार॑या॒मध्वा᳚पृचा॒नस्ति॒रोरोम॑पवते॒,अद्रि॑दुग्धः| इन्दु॒रिन्द्र॑स्यस॒ख्यंजु॑षा॒णोदे॒वोदे॒वस्य॑मत्स॒रोमदा᳚य|| 11||वर्ग:13 |
| अ॒भिप्रि॒याणि॑पवतेपुना॒नोदे॒वोदे॒वान्त्स्वेन॒रसे᳚नपृ॒ञ्चन्| इन्दु॒र्धर्मा᳚ण्यृतु॒थावसा᳚नो॒दश॒क्षिपो᳚अव्यत॒सानो॒,अव्ये᳚|| 12|| |
| वृषा॒शोणो᳚अभि॒कनि॑क्रद॒द्गान॒दय᳚न्नेतिपृथि॒वीमु॒तद्याम्| इन्द्र॑स्येवव॒ग्नुराशृ᳚ण्वआ॒जौप्र॑चे॒तय᳚न्नर्षति॒वाच॒मेमाम्|| 13|| |
| र॒साय्यः॒पय॑सा॒पिन्व॑मानई॒रय᳚न्नेषि॒मधु॑मन्तमं॒शुम्| पव॑मानःसंत॒निमे᳚षिकृ॒ण्वन्निन्द्रा᳚यसोमपरिषि॒च्यमा᳚नः|| 14|| |
| ए॒वाप॑वस्वमदि॒रोमदा᳚योदग्रा॒भस्य॑न॒मय᳚न्वध॒स्नैः| परि॒वर्णं॒भर॑माणो॒रुश᳚न्तंग॒व्युर्नो᳚अर्ष॒परि॑सोमसि॒क्तः|| 15|| |
| जु॒ष्ट्वीन॑इन्दोसु॒पथा᳚सु॒गान्यु॒रौप॑वस्व॒वरि॑वांसिकृ॒ण्वन्| घ॒नेव॒विष्व॑ग्दुरि॒तानि॑वि॒घ्नन्नधि॒ष्णुना᳚धन्व॒सानो॒,अव्ये᳚|| 16||वर्ग:14 |
| वृ॒ष्टिंनो᳚अर्षदि॒व्यांजि॑ग॒त्नुमिळा᳚वतींशं॒गयीं᳚जी॒रदा᳚नुम्| स्तुके᳚ववी॒ताध᳚न्वाविचि॒न्वन्बन्धूँ᳚रि॒माँ,अव॑राँ,इन्दोवा॒यून्|| 17|| |
| ग्र॒न्थिंनविष्य॑ग्रथि॒तंपु॑ना॒नऋ॒जुंच॑गा॒तुंवृ॑जि॒नंच॑सोम| अत्यो॒नक्र॑दो॒हरि॒रासृ॑जा॒नोमर्यो᳚देवधन्वप॒स्त्या᳚वान्|| 18|| |
| जुष्टो॒मदा᳚यदे॒वता᳚तइन्दो॒परि॒ष्णुना᳚धन्व॒सानो॒,अव्ये᳚| स॒हस्र॑धारःसुर॒भिरद॑ब्धः॒परि॑स्रव॒वाज॑सातौनृ॒षह्ये᳚|| 19|| |
| अ॒र॒श्मानो॒ये᳚ऽर॒था,अयु॑क्ता॒,अत्या᳚सो॒नस॑सृजा॒नास॑आ॒जौ| ए॒तेशु॒क्रासो᳚धन्वन्ति॒सोमा॒देवा᳚स॒स्ताँ,उप॑याता॒पिब॑ध्यै|| 20|| |
| ए॒वान॑इन्दो,अ॒भिदे॒ववी᳚तिं॒परि॑स्रव॒नभो॒,अर्ण॑श्च॒मूषु॑| सोमो᳚अ॒स्मभ्यं॒काम्यं᳚बृ॒हन्तं᳚र॒यिंद॑दातुवी॒रव᳚न्तमु॒ग्रम्|| 21||वर्ग:15 |
| तक्ष॒द्यदी॒मन॑सो॒वेन॑तो॒वाग्ज्येष्ठ॑स्यवा॒धर्म॑णि॒क्षोरनी᳚के| आदी᳚माय॒न्वर॒मावा᳚वशा॒नाजुष्टं॒पतिं᳚क॒लशे॒गाव॒इन्दु᳚म्|| 22|| |
| प्रदा᳚नु॒दोदि॒व्योदा᳚नुपि॒न्वऋ॒तमृ॒ताय॑पवतेसुमे॒धाः| ध॒र्माभु॑वद्वृज॒न्य॑स्य॒राजा॒प्रर॒श्मिभि॑र्द॒शभि॑र्भारि॒भूम॑|| 23|| |
| प॒वित्रे᳚भिः॒पव॑मानोनृ॒चक्षा॒राजा᳚दे॒वाना᳚मु॒तमर्त्या᳚नाम्| द्वि॒ताभु॑वद्रयि॒पती᳚रयी॒णामृ॒तंभ॑र॒त्सुभृ॑तं॒चार्विन्दुः॑|| 24|| |
| अर्वाँ᳚,इव॒श्रव॑सेसा॒तिमच्छेन्द्र॑स्यवा॒योर॒भिवी॒तिम॑र्ष| सनः॑स॒हस्रा᳚बृह॒तीरिषो᳚दा॒भवा᳚सोमद्रविणो॒वित्पु॑ना॒नः|| 25|| |
| दे॒वा॒व्यो᳚नःपरिषि॒च्यमा᳚नाः॒,क्षयं᳚सु॒वीरं᳚धन्वन्तु॒सोमाः᳚| आ॒य॒ज्यवः॑सुम॒तिंवि॒श्ववा᳚रा॒होता᳚रो॒नदि॑वि॒यजो᳚म॒न्द्रत॑माः|| 26||वर्ग:16 |
| ए॒वादे᳚वदे॒वता᳚तेपवस्वम॒हेसो᳚म॒प्सर॑सेदेव॒पानः॑| म॒हश्चि॒द्धिष्मसि॑हि॒ताःस॑म॒र्येकृ॒धिसु॑ष्ठा॒नेरोद॑सीपुना॒नः|| 27|| |
| अश्वो॒नोक्र॑दो॒वृष॑भिर्युजा॒नःसिं॒होनभी॒मोमन॑सो॒जवी᳚यान्| अ॒र्वा॒चीनैः᳚प॒थिभि॒र्येरजि॑ष्ठा॒,आप॑वस्वसौमन॒संन॑इन्दो|| 28|| |
| श॒तंधारा᳚दे॒वजा᳚ता,असृग्रन्त्स॒हस्र॑मेनाःक॒वयो᳚मृजन्ति| इन्दो᳚स॒नित्रं᳚दि॒वआप॑वस्वपुरए॒तासि॑मह॒तोधन॑स्य|| 29|| |
| दि॒वोनसर्गा᳚अससृग्र॒मह्नां॒राजा॒नमि॒त्रंप्रमि॑नाति॒धीरः॑| पि॒तुर्नपु॒त्रःक्रतु॑भिर्यता॒नआप॑वस्ववि॒शे,अ॒स्या,अजी᳚तिम्|| 30|| |
| प्रते॒धारा॒मधु॑मतीरसृग्र॒न्वारा॒न्यत्पू॒तो,अ॒त्येष्यव्या॑न्| पव॑मान॒पव॑से॒धाम॒गोनां᳚जज्ञा॒नःसूर्य॑मपिन्वो,अ॒र्कैः|| 31||वर्ग:17 |
| कनि॑क्रद॒दनु॒पन्था᳚मृ॒तस्य॑शु॒क्रोविभा᳚स्य॒मृत॑स्य॒धाम॑| सइन्द्रा᳚यपवसेमत्स॒रवा᳚न्हिन्वा॒नोवाचं᳚म॒तिभिः॑कवी॒नाम्|| 32|| |
| दि॒व्यःसु॑प॒र्णोऽव॑चक्षिसोम॒पिन्व॒न्धाराः॒कर्म॑णादे॒ववी᳚तौ| एन्दो᳚विशक॒लशं᳚सोम॒धानं॒क्रन्द᳚न्निहि॒सूर्य॒स्योप॑र॒श्मिम्|| 33|| |
| ति॒स्रोवाच॑ईरयति॒प्रवह्नि᳚रृ॒तस्य॑धी॒तिंब्रह्म॑णोमनी॒षाम्| गावो᳚यन्ति॒गोप॑तिंपृ॒च्छमा᳚नाः॒सोमं᳚यन्तिम॒तयो᳚वावशा॒नाः|| 34|| |
| सोमं॒गावो᳚धे॒नवो᳚वावशा॒नाःसोमं॒विप्रा᳚म॒तिभिः॑पृ॒च्छमा᳚नाः| सोमः॑सु॒तःपू᳚यते,अ॒ज्यमा᳚नः॒सोमे᳚अ॒र्कास्त्रि॒ष्टुभः॒संन॑वन्ते|| 35|| |
| ए॒वानः॑सोमपरिषि॒च्यमा᳚न॒आप॑वस्वपू॒यमा᳚नःस्व॒स्ति| इन्द्र॒मावि॑शबृह॒तारवे᳚णव॒र्धया॒वाचं᳚ज॒नया॒पुरं᳚धिम्|| 36||वर्ग:18 |
| आजागृ॑वि॒र्विप्र॑ऋ॒ताम॑ती॒नांसोमः॑पुना॒नो,अ॑सदच्च॒मूषु॑| सप᳚न्ति॒यंमि॑थु॒नासो॒निका᳚मा,अध्व॒र्यवो᳚रथि॒रासः॑सु॒हस्ताः᳚|| 37|| |
| सपु॑ना॒नउप॒सूरे॒नधातोभे,अ॑प्रा॒रोद॑सी॒विषआ᳚वः| प्रि॒याचि॒द्यस्य॑प्रिय॒सास॑ऊ॒तीसतूधनं᳚का॒रिणे॒नप्रयं᳚सत्|| 38|| |
| सव॑र्धि॒तावर्ध॑नःपू॒यमा᳚नः॒सोमो᳚मी॒ढ्वाँ,अ॒भिनो॒ज्योति॑षावीत्| येना᳚नः॒पूर्वे᳚पि॒तरः॑पद॒ज्ञाःस्व॒र्विदो᳚अ॒भिगा,अद्रि॑मु॒ष्णन्|| 39|| |
| अक्रा᳚न्त्समु॒द्रःप्र॑थ॒मेविध᳚र्मञ्ज॒नय᳚न्प्र॒जाभुव॑नस्य॒राजा᳚| वृषा᳚प॒वित्रे॒,अधि॒सानो॒,अव्ये᳚बृ॒हत्सोमो᳚वावृधेसुवा॒नइन्दुः॑|| 40|| |
| म॒हत्तत्सोमो᳚महि॒षश्च॑कारा॒पांयद्गर्भोऽवृ॑णीतदे॒वान्| अद॑धा॒दिन्द्रे॒पव॑मान॒ओजोऽज॑नय॒त्सूर्ये॒ज्योति॒रिन्दुः॑|| 41||वर्ग:19 |
| मत्सि॑वा॒युमि॒ष्टये॒राध॑सेच॒मत्सि॑मि॒त्रावरु॑णापू॒यमा᳚नः| मत्सि॒शर्धो॒मारु॑तं॒मत्सि॑दे॒वान्मत्सि॒द्यावा᳚पृथि॒वीदे᳚वसोम|| 42|| |
| ऋ॒जुःप॑वस्ववृजि॒नस्य॑ह॒न्तापामी᳚वां॒बाध॑मानो॒मृध॑श्च| अ॒भि॒श्री॒णन्पयः॒पय॑सा॒भिगोना॒मिन्द्र॑स्य॒त्वंतव॑व॒यंसखा᳚यः|| 43|| |
| मध्वः॒सूदं᳚पवस्व॒वस्व॒उत्सं᳚वी॒रंच॑न॒आप॑वस्वा॒भगं᳚च| स्वद॒स्वेन्द्रा᳚य॒पव॑मानइन्दोर॒यिंच॑न॒आप॑वस्वासमु॒द्रात्|| 44|| |
| सोमः॑सु॒तोधार॒यात्यो॒नहित्वा॒सिन्धु॒र्ननि॒म्नम॒भिवा॒ज्य॑क्षाः| आयोनिं॒वन्य॑मसदत्पुना॒नःसमिन्दु॒र्गोभि॑रसर॒त्सम॒द्भिः|| 45|| |
| ए॒षस्यते᳚पवतइन्द्र॒सोम॑श्च॒मूषु॒धीर॑उश॒तेतव॑स्वान्| स्व॑र्चक्षारथि॒रःस॒त्यशु॑ष्मः॒कामो॒नयोदे᳚वय॒तामस॑र्जि|| 46||वर्ग:20 |
| ए॒षप्र॒त्नेन॒वय॑सापुना॒नस्ति॒रोवर्पां᳚सिदुहि॒तुर्दधा᳚नः| वसा᳚नः॒शर्म॑त्रि॒वरू᳚थम॒प्सुहोते᳚वयाति॒सम॑नेषु॒रेभ॑न्|| 47|| |
| नून॒स्त्वंर॑थि॒रोदे᳚वसोम॒परि॑स्रवच॒म्वोः᳚पू॒यमा᳚नः| अ॒प्सुस्वादि॑ष्ठो॒मधु॑माँऋ॒तावा᳚दे॒वोनयःस॑वि॒तास॒त्यम᳚न्मा|| 48|| |
| अ॒भिवा॒युंवी॒त्य॑र्षागृणा॒नो॒३॑(ओ॒)ऽभिमि॒त्रावरु॑णापू॒यमा᳚नः| अ॒भीनरं᳚धी॒जव॑नंरथे॒ष्ठाम॒भीन्द्रं॒वृष॑णं॒वज्र॑बाहुम्|| 49|| |
| अ॒भिवस्त्रा᳚सुवस॒नान्य॑र्षा॒भिधे॒नूःसु॒दुघाः᳚पू॒यमा᳚नः| अ॒भिच॒न्द्राभर्त॑वेनो॒हिर᳚ण्या॒भ्यश्वा᳚न्र॒थिनो᳚देवसोम|| 50|| |
| अ॒भीनो᳚अर्षदि॒व्यावसू᳚न्य॒भिविश्वा॒पार्थि॑वापू॒यमा᳚नः| अ॒भियेन॒द्रवि॑णम॒श्नवा᳚मा॒भ्या᳚र्षे॒यंज॑मदग्नि॒वन्नः॑|| 51||वर्ग:21 |
| अ॒याप॒वाप॑वस्वै॒नावसू᳚निमाँश्च॒त्वइ᳚न्दो॒सर॑सि॒प्रध᳚न्व| ब्र॒ध्नश्चि॒दत्र॒वातो॒नजू॒तःपु॑रु॒मेध॑श्चि॒त्तक॑वे॒नरं᳚दात्|| 52|| |
| उ॒तन॑ए॒नाप॑व॒याप॑व॒स्वाधि॑श्रु॒तेश्र॒वाय्य॑स्यती॒र्थे| ष॒ष्टिंस॒हस्रा᳚नैगु॒तोवसू᳚निवृ॒क्षंनप॒क्वंधू᳚नव॒द्रणा᳚य|| 53|| |
| मही॒मे,अ॑स्य॒वृष॒नाम॑शू॒षेमाँश्च॑त्वेवा॒पृश॑नेवा॒वध॑त्रे| अस्वा᳚पयन्नि॒गुतः॑स्ने॒हय॒च्चापा॒मित्राँ॒,अपा॒चितो᳚अचे॒तः|| 54|| |
| संत्रीप॒वित्रा॒वित॑तान्ये॒ष्यन्वेकं᳚धावसिपू॒यमा᳚नः| असि॒भगो॒,असि॑दा॒त्रस्य॑दा॒तासि॑म॒घवा᳚म॒घव॑द्भ्यइन्दो|| 55|| |
| ए॒षवि॑श्व॒वित्प॑वतेमनी॒षीसोमो॒विश्व॑स्य॒भुव॑नस्य॒राजा᳚| द्र॒प्साँ,ई॒रय᳚न्वि॒दथे॒ष्विन्दु॒र्विवार॒मव्यं᳚स॒मयाति॑याति|| 56||वर्ग:22 |
| इन्दुं᳚रिहन्तिमहि॒षा,अद॑ब्धाःप॒देरे᳚भन्तिक॒वयो॒नगृध्राः᳚| हि॒न्वन्ति॒धीरा᳚द॒शभिः॒,क्षिपा᳚भिः॒सम᳚ञ्जतेरू॒पम॒पांरसे᳚न|| 57|| |
| त्वया᳚व॒यंपव॑मानेनसोम॒भरे᳚कृ॒तंविचि॑नुयाम॒शश्व॑त्| तन्नो᳚मि॒त्रोवरु॑णोमामहन्ता॒मदि॑तिः॒सिन्धुः॑पृथि॒वी,उ॒तद्यौः|| 58|| |
| [98] अभिनइति द्वादशर्चस्य सूक्तस्यांबरीषऋजिश्वानौ पवमानसोमोनुष्टुबेकादशीबृहती |{मंडल:9, सूक्त:98}{अनुवाक:6, सूक्त:2}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| अ॒भिनो᳚वाज॒सात॑मंर॒यिम॑र्षपुरु॒स्पृह᳚म्|इन्दो᳚स॒हस्र॑भर्णसंतुविद्यु॒म्नंवि॑भ्वा॒सह᳚म्|| 1||वर्ग:23 |
| परि॒ष्यसु॑वा॒नो,अ॒व्ययं॒रथे॒नवर्मा᳚व्यत|इन्दु॑र॒भिद्रुणा᳚हि॒तोहि॑या॒नोधारा᳚भिरक्षाः|| 2|| |
| परि॒ष्यसु॑वा॒नो,अ॑क्षा॒,इन्दु॒रव्ये॒मद॑च्युतः|धारा॒यऊ॒र्ध्वो,अ॑ध्व॒रेभ्रा॒जानैति॑गव्य॒युः|| 3|| |
| सहित्वंदे᳚व॒शश्व॑ते॒वसु॒मर्ता᳚यदा॒शुषे᳚|इन्दो᳚सह॒स्रिणं᳚र॒यिंश॒तात्मा᳚नंविवाससि|| 4|| |
| व॒यंते᳚अ॒स्यवृ॑त्रह॒न्वसो॒वस्वः॑पुरु॒स्पृहः॑|निनेदि॑ष्ठतमा,इ॒षःस्याम॑सु॒म्नस्या᳚ध्रिगो|| 5|| |
| द्विर्यंपञ्च॒स्वय॑शसं॒स्वसा᳚रो॒,अद्रि॑संहतम्|प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒काम्यं᳚प्रस्ना॒पय᳚न्त्यू॒र्मिण᳚म्|| 6|| |
| परि॒त्यंह᳚र्य॒तंहरिं᳚ब॒भ्रुंपु॑नन्ति॒वारे᳚ण|योदे॒वान्विश्वाँ॒,इत्परि॒मदे᳚नस॒हगच्छ॑ति|| 7||वर्ग:24 |
| अ॒स्यवो॒ह्यव॑सा॒पान्तो᳚दक्ष॒साध॑नम्|यःसू॒रिषु॒श्रवो᳚बृ॒हद्द॒धेस्व१॑(अ॒)र्णह᳚र्य॒तः|| 8|| |
| सवां᳚य॒ज्ञेषु॑मानवी॒,इन्दु॑र्जनिष्टरोदसी|दे॒वोदे᳚वीगिरि॒ष्ठा,अस्रे᳚ध॒न्तंतु॑वि॒ष्वणि॑|| 9|| |
| इन्द्रा᳚यसोम॒पात॑वेवृत्र॒घ्नेपरि॑षिच्यसे|नरे᳚च॒दक्षि॑णावतेदे॒वाय॑सदना॒सदे᳚|| 10|| |
| तेप्र॒त्नासो॒व्यु॑ष्टिषु॒सोमाः᳚प॒वित्रे᳚अक्षरन्| अ॒प॒प्रोथ᳚न्तःसनु॒तर्हु॑र॒श्चितः॑प्रा॒तस्ताँ,अप्र॑चेतसः|| 11|| |
| तंस॑खायःपुरो॒रुचं᳚यू॒यंव॒यंच॑सू॒रयः॑|अ॒श्याम॒वाज॑गन्ध्यंस॒नेम॒वाज॑पस्त्यम्|| 12|| |
| [99] आहर्यतायेत्यष्टर्चस्य सूक्तस्य काश्यपौ रेभसूनु पवमानसोमोनुष्ठुबाद्याबृहती |{मंडल:9, सूक्त:99}{अनुवाक:6, सूक्त:3}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| आह᳚र्य॒ताय॑धृ॒ष्णवे॒धनु॑स्तन्वन्ति॒पौंस्य᳚म्| शु॒क्रांव॑य॒न्त्यसु॑रायनि॒र्णिजं᳚वि॒पामग्रे᳚मही॒युवः॑|| 1||वर्ग:25 |
| अध॑क्ष॒पापरि॑ष्कृतो॒वाजाँ᳚,अ॒भिप्रगा᳚हते|यदी᳚वि॒वस्व॑तो॒धियो॒हरिं᳚हि॒न्वन्ति॒यात॑वे|| 2|| |
| तम॑स्यमर्जयामसि॒मदो॒यइ᳚न्द्र॒पात॑मः|यंगाव॑आ॒सभि॑र्द॒धुःपु॒रानू॒नंच॑सू॒रयः॑|| 3|| |
| तंगाथ॑यापुरा॒ण्यापु॑ना॒नम॒भ्य॑नूषत|उ॒तोकृ॑पन्तधी॒तयो᳚दे॒वानां॒नाम॒बिभ्र॑तीः|| 4|| |
| तमु॒क्षमा᳚णम॒व्यये॒वारे᳚पुनन्तिधर्ण॒सिम्|दू॒तंनपू॒र्वचि॑त्तय॒आशा᳚सतेमनी॒षिणः॑|| 5|| |
| सपु॑ना॒नोम॒दिन्त॑मः॒सोम॑श्च॒मूषु॑सीदति|प॒शौनरेत॑आ॒दध॒त्पति᳚र्वचस्यतेधि॒यः|| 6||वर्ग:26 |
| समृ॑ज्यतेसु॒कर्म॑भिर्दे॒वोदे॒वेभ्यः॑सु॒तः|वि॒देयदा᳚सुसंद॒दिर्म॒हीर॒पोविगा᳚हते|| 7|| |
| सु॒तइ᳚न्दोप॒वित्र॒आनृभि᳚र्य॒तोविनी᳚यसे|इन्द्रा᳚यमत्स॒रिन्त॑मश्च॒मूष्वानिषी᳚दसि|| 8|| |
| [100] अभीनवंतइति नवर्चस्य सूक्तस्य काश्यपौ रेभसूनू पवमान सोमोनुष्टुप् |{मंडल:9, सूक्त:100}{अनुवाक:6, सूक्त:4}{अष्टक:7, अध्याय:4} |
| अ॒भीन॑वन्ते,अ॒द्रुहः॑प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒काम्य᳚म्|व॒त्संनपूर्व॒आयु॑निजा॒तंरि॑हन्तिमा॒तरः॑|| 1||वर्ग:27 |
| पु॒ना॒नइ᳚न्द॒वाभ॑र॒सोम॑द्वि॒बर्ह॑संर॒यिम्|त्वंवसू᳚निपुष्यसि॒विश्वा᳚निदा॒शुषो᳚गृ॒हे|| 2|| |
| त्वंधियं᳚मनो॒युजं᳚सृ॒जावृ॒ष्टिंनत᳚न्य॒तुः|त्वंवसू᳚नि॒पार्थि॑वादि॒व्याच॑सोमपुष्यसि|| 3|| |
| परि॑तेजि॒ग्युषो᳚यथा॒धारा᳚सु॒तस्य॑धावति|रंह॑माणा॒व्य१॑(अ॒)व्ययं॒वारं᳚वा॒जीव॑सान॒सिः|| 4|| |
| क्रत्वे॒दक्षा᳚यनःकवे॒पव॑स्वसोम॒धार॑या|इन्द्रा᳚य॒पात॑वेसु॒तोमि॒त्राय॒वरु॑णायच|| 5|| |
| पव॑स्ववाज॒सात॑मःप॒वित्रे॒धार॑यासु॒तः|इन्द्रा᳚यसोम॒विष्ण॑वेदे॒वेभ्यो॒मधु॑मत्तमः|| 6||वर्ग:28 |
| त्वांरि॑हन्तिमा॒तरो॒हरिं᳚प॒वित्रे᳚अ॒द्रुहः॑|व॒त्संजा॒तंनधे॒नवः॒पव॑मान॒विध᳚र्मणि|| 7|| |
| पव॑मान॒महि॒श्रव॑श्चि॒त्रेभि᳚र्यासिर॒श्मिभिः॑|शर्ध॒न्तमां᳚सिजिघ्नसे॒विश्वा᳚निदा॒शुषो᳚गृ॒हे|| 8|| |
| त्वंद्यांच॑महिव्रतपृथि॒वींचाति॑जभ्रिषे|प्रति॑द्रा॒पिम॑मुञ्चथाः॒पव॑मानमहित्व॒ना|| 9|| |
| [101] पुरोजितीति षोळशर्चस्य सूक्तस्याद्यानांतिसृणांश्यावाश्विरंधीगुः चतुर्थ्यादितिसृणांनाहुषोययातिः सप्तम्यादितिसृणांमानवोनहुषः दशम्यादितिसृणांसांवरणोमनुः त्रयोदश्यादिचतसृणां वैश्वामित्रः प्रजापतिः पवमान सोमोनुष्टुप् द्वितीयातृतीये गायत्र्यौ |{मंडल:9, सूक्त:101}{अनुवाक:6, सूक्त:5}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| पु॒रोजि॑तीवो॒,अन्ध॑सःसु॒ताय॑मादयि॒त्नवे᳚|अप॒श्वानं᳚श्नथिष्टन॒सखा᳚योदीर्घजि॒ह्व्य᳚म्|| 1||वर्ग:1 |
| योधार॑यापाव॒कया᳚परिप्र॒स्यन्द॑तेसु॒तः|इन्दु॒रश्वो॒नकृत्व्यः॑|| 2|| |
| तंदु॒रोष॑म॒भीनरः॒सोमं᳚वि॒श्वाच्या᳚धि॒या|य॒ज्ञंहि᳚न्व॒न्त्यद्रि॑भिः|| 3|| |
| सु॒तासो॒मधु॑मत्तमाः॒सोमा॒,इन्द्रा᳚यम॒न्दिनः॑|प॒वित्र॑वन्तो,अक्षरन्दे॒वान्ग॑च्छन्तुवो॒मदाः᳚|| 4|| |
| इन्दु॒रिन्द्रा᳚यपवत॒इति॑दे॒वासो᳚अब्रुवन्|वा॒चस्पति᳚र्मखस्यते॒विश्व॒स्येशा᳚न॒ओज॑सा|| 5|| |
| स॒हस्र॑धारःपवतेसमु॒द्रोवा᳚चमीङ्ख॒यः|सोमः॒पती᳚रयी॒णांसखेन्द्र॑स्यदि॒वेदि॑वे|| 6||वर्ग:2 |
| अ॒यंपू॒षार॒यिर्भगः॒सोमः॑पुना॒नो,अ॑र्षति|पति॒र्विश्व॑स्य॒भूम॑नो॒व्य॑ख्य॒द्रोद॑सी,उ॒भे|| 7|| |
| समु॑प्रि॒या,अ॑नूषत॒गावो॒मदा᳚य॒घृष्व॑यः|सोमा᳚सःकृण्वतेप॒थःपव॑मानास॒इन्द॑वः|| 8|| |
| यओजि॑ष्ठ॒स्तमाभ॑र॒पव॑मानश्र॒वाय्य᳚म्|यःपञ्च॑चर्ष॒णीर॒भिर॒यिंयेन॒वना᳚महै|| 9|| |
| सोमाः᳚पवन्त॒इन्द॑वो॒ऽस्मभ्यं᳚गातु॒वित्त॑माः|मि॒त्राःसु॑वा॒ना,अ॑रे॒पसः॑स्वा॒ध्यः॑स्व॒र्विदः॑|| 10|| |
| सु॒ष्वा॒णासो॒व्यद्रि॑भि॒श्चिता᳚ना॒गोरधि॑त्व॒चि|इष॑म॒स्मभ्य॑म॒भितः॒सम॑स्वरन्वसु॒विदः॑|| 11||वर्ग:3 |
| ए॒तेपू॒तावि॑प॒श्चितः॒सोमा᳚सो॒दध्या᳚शिरः|सूर्या᳚सो॒नद॑र्श॒तासो᳚जिग॒त्नवो᳚ध्रु॒वाघृ॒ते|| 12|| |
| प्रसु᳚न्वा॒नस्यान्ध॑सो॒मर्तो॒नवृ॑त॒तद्वचः॑|अप॒श्वान॑मरा॒धसं᳚ह॒ताम॒खंनभृग॑वः|| 13|| |
| आजा॒मिरत्के᳚अव्यतभु॒जेनपु॒त्रओ॒ण्योः᳚|सर॑ज्जा॒रोनयोष॑णांव॒रोनयोनि॑मा॒सद᳚म्|| 14|| |
| सवी॒रोद॑क्ष॒साध॑नो॒वियस्त॒स्तम्भ॒रोद॑सी|हरिः॑प॒वित्रे᳚अव्यतवे॒धानयोनि॑मा॒सद᳚म्|| 15|| |
| अव्यो॒वारे᳚भिःपवते॒सोमो॒गव्ये॒,अधि॑त्व॒चि|कनि॑क्रद॒द्वृषा॒हरि॒रिन्द्र॑स्या॒भ्ये᳚तिनिष्कृ॒तम्|| 16|| |
| [102] क्राणाशिशुरित्यष्टर्चस्य सूक्तस्याप्त्यस्त्रितः पवमानसोमउष्णिक् |{मंडल:9, सूक्त:102}{अनुवाक:6, सूक्त:6}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| क्रा॒णाशिशु᳚र्म॒हीनां᳚हि॒न्वन्नृ॒तस्य॒दीधि॑तिम्|विश्वा॒परि॑प्रि॒याभु॑व॒दध॑द्वि॒ता|| 1||वर्ग:4 |
| उप॑त्रि॒तस्य॑पा॒ष्यो॒३॑(ओ॒)रभ॑क्त॒यद्गुहा᳚प॒दम्|य॒ज्ञस्य॑स॒प्तधाम॑भि॒रध॑प्रि॒यम्|| 2|| |
| त्रीणि॑त्रि॒तस्य॒धार॑यापृ॒ष्ठेष्वेर॑यार॒यिम्|मिमी᳚ते,अस्य॒योज॑ना॒विसु॒क्रतुः॑|| 3|| |
| ज॒ज्ञा॒नंस॒प्तमा॒तरो᳚वे॒धाम॑शासतश्रि॒ये|अ॒यंध्रु॒वोर॑यी॒णांचिके᳚त॒यत्|| 4|| |
| अ॒स्यव्र॒तेस॒जोष॑सो॒विश्वे᳚दे॒वासो᳚अ॒द्रुहः॑|स्पा॒र्हाभ॑वन्ति॒रन्त॑योजु॒षन्त॒यत्|| 5|| |
| यमी॒गर्भ॑मृता॒वृधो᳚दृ॒शेचारु॒मजी᳚जनन्|क॒विंमंहि॑ष्ठमध्व॒रेपु॑रु॒स्पृह᳚म्|| 6||वर्ग:5 |
| स॒मी॒ची॒ने,अ॒भित्मना᳚य॒ह्वी,ऋ॒तस्य॑मा॒तरा᳚|त॒न्वा॒नाय॒ज्ञमा᳚नु॒षग्यद᳚ञ्ज॒ते|| 7|| |
| क्रत्वा᳚शु॒क्रेभि॑र॒क्षभि᳚रृ॒णोरप᳚व्र॒जंदि॒वः|हि॒न्वन्नृ॒तस्य॒दीधि॑तिं॒प्राध्व॒रे|| 8|| |
| [103] प्रपुनानायेति षडृचस्य सूक्तस्याप्त्योद्वितः पवमानसोमउष्णिक् |{मंडल:9, सूक्त:103}{अनुवाक:6, सूक्त:7}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| प्रपु॑ना॒नाय॑वे॒धसे॒सोमा᳚य॒वच॒उद्य॑तम्|भृ॒तिंनभ॑राम॒तिभि॒र्जुजो᳚षते|| 1||वर्ग:6 |
| परि॒वारा᳚ण्य॒व्यया॒गोभि॑रञ्जा॒नो,अ॑र्षति|त्रीष॒धस्था᳚पुना॒नःकृ॑णुते॒हरिः॑|| 2|| |
| परि॒कोशं᳚मधु॒श्चुत॑म॒व्यये॒वारे᳚अर्षति|अ॒भिवाणी॒रृषी᳚णांस॒प्तनू᳚षत|| 3|| |
| परि॑णे॒ताम॑ती॒नांवि॒श्वदे᳚वो॒,अदा᳚भ्यः|सोमः॑पुना॒नश्च॒म्वो᳚र्विश॒द्धरिः॑|| 4|| |
| परि॒दैवी॒रनु॑स्व॒धा,इन्द्रे᳚णयाहिस॒रथ᳚म्|पु॒ना॒नोवा॒घद्वा॒घद्भि॒रम॑र्त्यः|| 5|| |
| परि॒सप्ति॒र्नवा᳚ज॒युर्दे॒वोदे॒वेभ्यः॑सु॒तः|व्या॒न॒शिःपव॑मानो॒विधा᳚वति|| 6|| |
| [104] सखायइति षडृचस्य सूक्तस्य काश्यपौपर्वतनारदौ पवमान सोमउष्णिक् (शिखंडिन्यावप्सरसौऋषिकेत्रपाक्षिकं किंचपर्वतनारदौकाण्वावपि) |{मंडल:9, सूक्त:104}{अनुवाक:7, सूक्त:1}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| सखा᳚य॒आनिषी᳚दतपुना॒नाय॒प्रगा᳚यत|शिशुं॒नय॒ज्ञैःपरि॑भूषतश्रि॒ये|| 1||वर्ग:7 |
| समी᳚व॒त्संनमा॒तृभिः॑सृ॒जता᳚गय॒साध॑नम्|दे॒वा॒व्य१॑(अं॒)मद॑म॒भिद्विश॑वसम्|| 2|| |
| पु॒नाता᳚दक्ष॒साध॑नं॒यथा॒शर्धा᳚यवी॒तये᳚|यथा᳚मि॒त्राय॒वरु॑णाय॒शंत॑मः|| 3|| |
| अ॒स्मभ्यं᳚त्वावसु॒विद॑म॒भिवाणी᳚रनूषत|गोभि॑ष्टे॒वर्ण॑म॒भिवा᳚सयामसि|| 4|| |
| सनो᳚मदानांपत॒इन्दो᳚दे॒वप्स॑रा,असि|सखे᳚व॒सख्ये᳚गातु॒वित्त॑मोभव|| 5|| |
| सने᳚मिकृ॒ध्य१॑(अ॒)स्मदार॒क्षसं॒कंचि॑द॒त्रिण᳚म्|अपादे᳚वंद्व॒युमंहो᳚युयोधिनः|| 6|| |
| [105] तंवइति षडृचस्य सूक्तस्य पर्वतनारदौ पवमानसोमउष्णिक् |{मंडल:9, सूक्त:105}{अनुवाक:7, सूक्त:2}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| तंवः॑सखायो॒मदा᳚यपुना॒नम॒भिगा᳚यत|शिशुं॒नय॒ज्ञैःस्व॑दयन्तगू॒र्तिभिः॑|| 1||वर्ग:8 |
| संव॒त्सइ॑वमा॒तृभि॒रिन्दु᳚र्हिन्वा॒नो,अ॑ज्यते|दे॒वा॒वीर्मदो᳚म॒तिभिः॒परि॑ष्कृतः|| 2|| |
| अ॒यंदक्षा᳚य॒साध॑नो॒ऽयंशर्धा᳚यवी॒तये᳚|अ॒यंदे॒वेभ्यो॒मधु॑मत्तमःसु॒तः|| 3|| |
| गोम᳚न्नइन्दो॒,अश्व॑वत्सु॒तःसु॑दक्षधन्व|शुचिं᳚ते॒वर्ण॒मधि॒गोषु॑दीधरम्|| 4|| |
| सनो᳚हरीणांपत॒इन्दो᳚दे॒वप्स॑रस्तमः|सखे᳚व॒सख्ये॒नर्यो᳚रु॒चेभ॑व|| 5|| |
| सने᳚मि॒त्वम॒स्मदाँ,अदे᳚वं॒कंचि॑द॒त्रिण᳚म्|सा॒ह्वाँ,इ᳚न्दो॒परि॒बाधो॒,अप॑द्व॒युम्|| 6|| |
| [106] इंद्रमच्छेति चतुर्दशर्चस्यसूक्तस्याद्यानांतिसृणां चाक्षुषोग्निः चतुर्थ्यादितिसृणां मानवश्चक्षुः सप्तम्यादितिसृणामाप्सवोमनुः दशम्यादिपंचानां चाक्षुषोग्निः पवमान सोमउष्णिक् |{मंडल:9, सूक्त:106}{अनुवाक:7, सूक्त:3}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| इन्द्र॒मच्छ॑सु॒ता,इ॒मेवृष॑णंयन्तु॒हर॑यः|श्रु॒ष्टीजा॒तास॒इन्द॑वःस्व॒र्विदः॑|| 1||वर्ग:9 |
| अ॒यंभरा᳚यसान॒सिरिन्द्रा᳚यपवतेसु॒तः|सोमो॒जैत्र॑स्यचेतति॒यथा᳚वि॒दे|| 2|| |
| अ॒स्येदिन्द्रो॒मदे॒ष्वाग्रा॒भंगृ॑भ्णीतसान॒सिम्|वज्रं᳚च॒वृष॑णंभर॒त्सम॑प्सु॒जित्|| 3|| |
| प्रध᳚न्वासोम॒जागृ॑वि॒रिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|द्यु॒मन्तं॒शुष्म॒माभ॑रास्व॒र्विद᳚म्|| 4|| |
| इन्द्रा᳚य॒वृष॑णं॒मदं॒पव॑स्ववि॒श्वद॑र्शतः|स॒हस्र॑यामापथि॒कृद्वि॑चक्ष॒णः|| 5|| |
| अ॒स्मभ्यं᳚गातु॒वित्त॑मोदे॒वेभ्यो॒मधु॑मत्तमः|स॒हस्रं᳚याहिप॒थिभिः॒कनि॑क्रदत्|| 6||वर्ग:10 |
| पव॑स्वदे॒ववी᳚तय॒इन्दो॒धारा᳚भि॒रोज॑सा|आक॒लशं॒मधु॑मान्त्सोमनःसदः|| 7|| |
| तव॑द्र॒प्सा,उ॑द॒प्रुत॒इन्द्रं॒मदा᳚यवावृधुः|त्वांदे॒वासो᳚अ॒मृता᳚य॒कंप॑पुः|| 8|| |
| आनः॑सुतासइन्दवःपुना॒नाधा᳚वतार॒यिम्|वृ॒ष्टिद्या᳚वोरीत्यापःस्व॒र्विदः॑|| 9|| |
| सोमः॑पुना॒नऊ॒र्मिणाव्यो॒वारं॒विधा᳚वति|अग्रे᳚वा॒चःपव॑मानः॒कनि॑क्रदत्|| 10|| |
| धी॒भिर्हि᳚न्वन्तिवा॒जिनं॒वने॒क्रीळ᳚न्त॒मत्य॑विम्|अ॒भित्रि॑पृ॒ष्ठंम॒तयः॒सम॑स्वरन्|| 11||वर्ग:11 |
| अस॑र्जिक॒लशाँ᳚,अ॒भिमी॒ळ्हेसप्ति॒र्नवा᳚ज॒युः|पु॒ना॒नोवाचं᳚ज॒नय᳚न्नसिष्यदत्|| 12|| |
| पव॑तेहर्य॒तोहरि॒रति॒ह्वरां᳚सि॒रंह्या᳚|अ॒भ्यर्ष᳚न्त्स्तो॒तृभ्यो᳚वी॒रव॒द्यशः॑|| 13|| |
| अ॒याप॑वस्वदेव॒युर्मधो॒र्धारा᳚असृक्षत|रेभ᳚न्प॒वित्रं॒पर्ये᳚षिवि॒श्वतः॑|| 14|| |
| [107] परीतइति षड्विंशत्यृचस्य सूक्तस्य बार्हस्पत्यो भरद्वाजो मारीचः कश्यपो राहूगणो गोतमोभौमोत्रिर्गाथिनो विश्वामित्रो भार्गवोजमदग्निः मैत्रावरुणिर्वसिष्ट ऋषयः पवमान सोमोदेवता आद्याचतुर्थीषष्ट्यष्टमी नवमीदशमी द्वादशी चतुर्दश्यः सप्तदश्यायश्चयुजः बृहत्यः द्वितीयापंचमी सप्तम्येकादशी त्रयोदशी पंचदश्योष्टादश्यादि युजश्चसतोबृहत्यः षोडशीचद्विपदाविराट् |{मंडल:9, सूक्त:107}{अनुवाक:7, सूक्त:4}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| परी॒तोषि᳚ञ्चतासु॒तंसोमो॒यउ॑त्त॒मंह॒विः| द॒ध॒न्वाँऽयोनर्यो᳚अ॒प्स्व१॑(अ॒)न्तरासु॒षाव॒सोम॒मद्रि॑भिः|| 1||वर्ग:12 |
| नू॒नंपु॑ना॒नोऽवि॑भिः॒परि॑स्र॒वाद॑ब्धःसुर॒भिन्त॑रः| सु॒तेचि॑त्त्वा॒प्सुम॑दामो॒,अन्ध॑साश्री॒णन्तो॒गोभि॒रुत्त॑रम्|| 2|| |
| परि॑सुवा॒नश्चक्ष॑सेदेव॒माद॑नः॒क्रतु॒रिन्दु᳚र्विचक्ष॒णः|| 3|| |
| पु॒ना॒नःसो᳚म॒धार॑या॒पोवसा᳚नो,अर्षसि| आर॑त्न॒धायोनि॑मृ॒तस्य॑सीद॒स्युत्सो᳚देवहिर॒ण्ययः॑|| 4|| |
| दु॒हा॒नऊध॑र्दि॒व्यंमधु॑प्रि॒यंप्र॒त्नंस॒धस्थ॒मास॑दत्| आ॒पृच्छ्यं᳚ध॒रुणं᳚वा॒ज्य॑र्षति॒नृभि॑र्धू॒तोवि॑चक्ष॒णः|| 5|| |
| पु॒ना॒नःसो᳚म॒जागृ॑वि॒रव्यो॒वारे॒परि॑प्रि॒यः| त्वंविप्रो᳚अभ॒वोऽङ्गि॑रस्तमो॒मध्वा᳚य॒ज्ञंमि॑मिक्षनः|| 6||वर्ग:13 |
| सोमो᳚मी॒ढ्वान्प॑वतेगातु॒वित्त॑म॒ऋषि॒र्विप्रो᳚विचक्ष॒णः| त्वंक॒विर॑भवोदेव॒वीत॑म॒आसूर्यं᳚रोहयोदि॒वि|| 7|| |
| सोम॑उषुवा॒णःसो॒तृभि॒रधि॒ष्णुभि॒रवी᳚नाम्| अश्व॑येवह॒रिता᳚याति॒धार॑याम॒न्द्रया᳚याति॒धार॑या|| 8|| |
| अ॒नू॒पेगोमा॒न्गोभि॑रक्षाः॒सोमो᳚दु॒ग्धाभि॑रक्षाः| स॒मु॒द्रंनसं॒वर॑णान्यग्मन्म॒न्दीमदा᳚यतोशते|| 9|| |
| आसो᳚मसुवा॒नो,अद्रि॑भिस्ति॒रोवारा᳚ण्य॒व्यया᳚| जनो॒नपु॒रिच॒म्वो᳚र्विश॒द्धरिः॒सदो॒वने᳚षुदधिषे|| 10|| |
| समा᳚मृजेति॒रो,अण्वा᳚निमे॒ष्यो᳚मी॒ळ्हेसप्ति॒र्नवा᳚ज॒युः| अ॒नु॒माद्यः॒पव॑मानोमनी॒षिभिः॒सोमो॒विप्रे᳚भि॒रृक्व॑भिः|| 11||वर्ग:14 |
| प्रसो᳚मदे॒ववी᳚तये॒सिन्धु॒र्नपि॑प्ये॒,अर्ण॑सा| अं॒शोःपय॑सामदि॒रोनजागृ॑वि॒रच्छा॒कोशं᳚मधु॒श्चुत᳚म्|| 12|| |
| आह᳚र्य॒तो,अर्जु॑ने॒,अत्के᳚अव्यतप्रि॒यःसू॒नुर्नमर्ज्यः॑| तमीं᳚हिन्वन्त्य॒पसो॒यथा॒रथं᳚न॒दीष्वागभ॑स्त्योः|| 13|| |
| अ॒भिसोमा᳚सआ॒यवः॒पव᳚न्ते॒मद्यं॒मद᳚म्| स॒मु॒द्रस्याधि॑वि॒ष्टपि॑मनी॒षिणो᳚मत्स॒रासः॑स्व॒र्विदः॑|| 14|| |
| तर॑त्समु॒द्रंपव॑मानऊ॒र्मिणा॒राजा᳚दे॒वऋ॒तंबृ॒हत्| अर्ष᳚न्मि॒त्रस्य॒वरु॑णस्य॒धर्म॑णा॒प्रहि᳚न्वा॒नऋ॒तंबृ॒हत्|| 15|| |
| नृभि᳚र्येमा॒नोह᳚र्य॒तोवि॑चक्ष॒णोराजा᳚दे॒वःस॑मु॒द्रियः॑|| 16||वर्ग:15 |
| इन्द्रा᳚यपवते॒मदः॒सोमो᳚म॒रुत्व॑तेसु॒तः| स॒हस्र॑धारो॒,अत्यव्य॑मर्षति॒तमी᳚मृजन्त्या॒यवः॑|| 17|| |
| पु॒ना॒नश्च॒मूज॒नय᳚न्म॒तिंक॒विःसोमो᳚दे॒वेषु॑रण्यति| अ॒पोवसा᳚नः॒परि॒गोभि॒रुत्त॑रः॒सीद॒न्वने᳚ष्वव्यत|| 18|| |
| तवा॒हंसो᳚मरारणस॒ख्यइ᳚न्दोदि॒वेदि॑वे| पु॒रूणि॑बभ्रो॒निच॑रन्ति॒मामव॑परि॒धीँरति॒ताँ,इ॑हि|| 19|| |
| उ॒ताहंनक्त॑मु॒तसो᳚मते॒दिवा᳚स॒ख्याय॑बभ्र॒ऊध॑नि| घृ॒णातप᳚न्त॒मति॒सूर्यं᳚प॒रःश॑कु॒ना,इ॑वपप्तिम|| 20|| |
| मृ॒ज्यमा᳚नःसुहस्त्यसमु॒द्रेवाच॑मिन्वसि| र॒यिंपि॒शङ्गं᳚बहु॒लंपु॑रु॒स्पृहं॒पव॑माना॒भ्य॑र्षसि|| 21||वर्ग:16 |
| मृ॒जा॒नोवारे॒पव॑मानो,अ॒व्यये॒वृषाव॑चक्रदो॒वने᳚| दे॒वानां᳚सोमपवमाननिष्कृ॒तंगोभि॑रञ्जा॒नो,अ॑र्षसि|| 22|| |
| पव॑स्व॒वाज॑सातये॒ऽभिविश्वा᳚नि॒काव्या᳚| त्वंस॑मु॒द्रंप्र॑थ॒मोविधा᳚रयोदे॒वेभ्यः॑सोममत्स॒रः|| 23|| |
| सतूप॑वस्व॒परि॒पार्थि॑वं॒रजो᳚दि॒व्याच॑सोम॒धर्म॑भिः| त्वांविप्रा᳚सोम॒तिभि᳚र्विचक्षणशु॒भ्रंहि᳚न्वन्तिधी॒तिभिः॑|| 24|| |
| पव॑माना,असृक्षतप॒वित्र॒मति॒धार॑या| म॒रुत्व᳚न्तोमत्स॒रा,इ᳚न्द्रि॒याहया᳚मे॒धाम॒भिप्रयां᳚सिच|| 25|| |
| अ॒पोवसा᳚नः॒परि॒कोश॑मर्ष॒तीन्दु᳚र्हिया॒नःसो॒तृभिः॑| ज॒नय॒ञ्ज्योति᳚र्म॒न्दना᳚अवीवश॒द्गाःकृ᳚ण्वा॒नोननि॒र्णिज᳚म्|| 26|| |
| [108] पवस्वेति षोळशर्चस्य सूक्तस्याद्ययोर्द्वयोः शाक्तयोगौरिवीतिः तृतीयायावसिष्ठःशक्तिः चतुर्थ्यादिद्वयोरांगिरसउरुः षष्ठ्यादिद्वयोर्भारद्वाजऋजिश्वः अष्टम्यादिद्वयोरांगिरस ऊर्ध्वसद्मः दशम्यादिद्वयोरांगिरसः कृतयशः द्वादश्यादिद्वयोरृणंचयः चतुर्दश्यादितिसृणांवासिष्ठःशक्तिः इत्य ऋषयः पवमानसोमोदेवता अयुजः ककुभो युजःसतोबृहत्यः ससुन्वेय इति यवमध्यागायत्री |{मंडल:9, सूक्त:108}{अनुवाक:7, सूक्त:5}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| पव॑स्व॒मधु॑मत्तम॒इन्द्रा᳚यसोमक्रतु॒वित्त॑मो॒मदः॑|महि॑द्यु॒क्षत॑मो॒मदः॑|| 1||वर्ग:17 |
| यस्य॑तेपी॒त्वावृ॑ष॒भोवृ॑षा॒यते॒ऽस्यपी॒तास्व॒र्विदः॑| ससु॒प्रके᳚तो,अ॒भ्य॑क्रमी॒दिषोऽच्छा॒वाजं॒नैत॑शः|| 2|| |
| त्वंह्य१॑(अ॒)ङ्गदैव्या॒पव॑मान॒जनि॑मानिद्यु॒मत्त॑मः|अ॒मृ॒त॒त्वाय॑घो॒षयः॑|| 3|| |
| येना॒नव॑ग्वोद॒ध्यङ्ङ॑पोर्णु॒तेयेन॒विप्रा᳚सआपि॒रे| दे॒वानां᳚सु॒म्ने,अ॒मृत॑स्य॒चारु॑णो॒येन॒श्रवां᳚स्यान॒शुः|| 4|| |
| ए॒षस्यधार॑यासु॒तोऽव्यो॒वारे᳚भिःपवतेम॒दिन्त॑मः|क्रीळ᳚न्नू॒र्मिर॒पामि॑व|| 5|| |
| यउ॒स्रिया॒,अप्या᳚अ॒न्तरश्म॑नो॒निर्गा,अकृ᳚न्त॒दोज॑सा| अ॒भिव्र॒जंत॑त्निषे॒गव्य॒मश्व्यं᳚व॒र्मीव॑धृष्ण॒वारु॑ज|| 6||वर्ग:18 |
| आसो᳚ता॒परि॑षिञ्च॒ताश्वं॒नस्तोम॑म॒प्तुरं᳚रज॒स्तुर᳚म्|व॒न॒क्र॒क्षमु॑द॒प्रुत᳚म्|| 7|| |
| स॒हस्र॑धारंवृष॒भंप॑यो॒वृधं᳚प्रि॒यंदे॒वाय॒जन्म॑ने| ऋ॒तेन॒यऋ॒तजा᳚तोविवावृ॒धेराजा᳚दे॒वऋ॒तंबृ॒हत्|| 8|| |
| अ॒भिद्यु॒म्नंबृ॒हद्यश॒इष॑स्पतेदिदी॒हिदे᳚वदेव॒युः|विकोशं᳚मध्य॒मंयु॑व|| 9|| |
| आव॑च्यस्वसुदक्षच॒म्वोः᳚सु॒तोवि॒शांवह्नि॒र्नवि॒श्पतिः॑| वृ॒ष्टिंदि॒वःप॑वस्वरी॒तिम॒पांजिन्वा॒गवि॑ष्टये॒धियः॑|| 10|| |
| ए॒तमु॒त्यंम॑द॒च्युतं᳚स॒हस्र॑धारंवृष॒भंदिवो᳚दुहुः|विश्वा॒वसू᳚नि॒बिभ्र॑तम्|| 11||वर्ग:19 |
| वृषा॒विज॑ज्ञेज॒नय॒न्नम॑र्त्यःप्र॒तप॒ञ्ज्योति॑षा॒तमः॑| ससुष्टु॑तःक॒विभि᳚र्नि॒र्णिजं᳚दधेत्रि॒धात्व॑स्य॒दंस॑सा|| 12|| |
| ससु᳚न्वे॒योवसू᳚नां॒योरा॒यामा᳚ने॒तायइळा᳚नाम्|सोमो॒यःसु॑क्षिती॒नाम्|| 13|| |
| यस्य॑न॒इन्द्रः॒पिबा॒द्यस्य॑म॒रुतो॒यस्य॑वार्य॒मणा॒भगः॑| आयेन॑मि॒त्रावरु॑णा॒करा᳚मह॒एन्द्र॒मव॑सेम॒हे|| 14|| |
| इन्द्रा᳚यसोम॒पात॑वे॒नृभि᳚र्य॒तःस्वा᳚यु॒धोम॒दिन्त॑मः|पव॑स्व॒मधु॑मत्तमः|| 15|| |
| इन्द्र॑स्य॒हार्दि॑सोम॒धान॒मावि॑शसमु॒द्रमि॑व॒सिन्ध॑वः| जुष्टो᳚मि॒त्राय॒वरु॑णायवा॒यवे᳚दि॒वोवि॑ष्ट॒म्भउ॑त्त॒मः|| 16|| |
| [109] परिप्रेतिद्वाविंशत्यृचस्य सूक्तस्यैश्वरयोधिष्ण्याग्नयः पवमान सोमोद्विपदा विराट् |{मंडल:9, सूक्त:109}{अनुवाक:7, सूक्त:6}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| परि॒प्रध॒न्वेन्द्रा᳚यसोमस्वा॒दुर्मि॒त्राय॑पू॒ष्णेभगा᳚य|| 1||वर्ग:20 |
| इन्द्र॑स्तेसोमसु॒तस्य॑पेयाः॒क्रत्वे॒दक्षा᳚य॒विश्वे᳚चदे॒वाः|| 2|| |
| ए॒वामृता᳚यम॒हेक्षया᳚य॒सशु॒क्रो,अ॑र्षदि॒व्यःपी॒यूषः॑|| 3|| |
| पव॑स्वसोमम॒हान्त्स॑मु॒द्रःपि॒तादे॒वानां॒विश्वा॒भिधाम॑|| 4|| |
| शु॒क्रःप॑वस्वदे॒वेभ्यः॑सोमदि॒वेपृ॑थि॒व्यैशंच॑प्र॒जायै᳚|| 5|| |
| दि॒वोध॒र्तासि॑शु॒क्रःपी॒यूषः॑स॒त्येविध᳚र्मन्वा॒जीप॑वस्व|| 6|| |
| पव॑स्वसोमद्यु॒म्नीसु॑धा॒रोम॒हामवी᳚ना॒मनु॑पू॒र्व्यः|| 7|| |
| नृभि᳚र्येमा॒नोज॑ज्ञा॒नःपू॒तः,क्षर॒द्विश्वा᳚निम॒न्द्रःस्व॒र्वित्|| 8|| |
| इन्दुः॑पुना॒नःप्र॒जामु॑रा॒णःकर॒द्विश्वा᳚नि॒द्रवि॑णानिनः|| 9|| |
| पव॑स्वसोम॒क्रत्वे॒दक्षा॒याश्वो॒ननि॒क्तोवा॒जीधना᳚य|| 10|| |
| तंते᳚सो॒तारो॒रसं॒मदा᳚यपु॒नन्ति॒सोमं᳚म॒हेद्यु॒म्नाय॑|| 11||वर्ग:21 |
| शिशुं᳚जज्ञा॒नंहरिं᳚मृजन्तिप॒वित्रे॒सोमं᳚दे॒वेभ्य॒इन्दु᳚म्|| 12|| |
| इन्दुः॑पविष्ट॒चारु॒र्मदा᳚या॒पामु॒पस्थे᳚क॒विर्भगा᳚य|| 13|| |
| बिभ॑र्ति॒चार्विन्द्र॑स्य॒नाम॒येन॒विश्वा᳚निवृ॒त्राज॒घान॑|| 14|| |
| पिब᳚न्त्यस्य॒विश्वे᳚दे॒वासो॒गोभिः॑श्री॒तस्य॒नृभिः॑सु॒तस्य॑|| 15|| |
| प्रसु॑वा॒नो,अ॑क्षाःस॒हस्र॑धारस्ति॒रःप॒वित्रं॒विवार॒मव्य᳚म्|| 16|| |
| सवा॒ज्य॑क्षाःस॒हस्र॑रेता,अ॒द्भिर्मृ॑जा॒नोगोभिः॑श्रीणा॒नः|| 17|| |
| प्रसो᳚मया॒हीन्द्र॑स्यकु॒क्षानृभि᳚र्येमा॒नो,अद्रि॑भिःसु॒तः|| 18|| |
| अस॑र्जिवा॒जीति॒रःप॒वित्र॒मिन्द्रा᳚य॒सोमः॑स॒हस्र॑धारः|| 19|| |
| अ॒ञ्जन्त्ये᳚नं॒मध्वो॒रसे॒नेन्द्रा᳚य॒वृष्ण॒इन्दुं॒मदा᳚य|| 20|| |
| दे॒वेभ्य॑स्त्वा॒वृथा॒पाज॑से॒ऽपोवसा᳚नं॒हरिं᳚मृजन्ति|| 21|| |
| इन्दु॒रिन्द्रा᳚यतोशते॒नितो᳚शतेश्री॒णन्नु॒ग्रोरि॒णन्न॒पः|| 22|| |
| [110] पर्यूष्विति द्वादशर्चस्य सूक्तस्य त्र्यरुणत्रसदस्यू राजानौ पवमान सोमः आद्यास्तिस्रोनुष्टुभः पिपीलिकमध्याः चतुर्थ्यादिषळूर्ध्व बृहत्योंऽत्यास्तिस्रोविराजः |{मंडल:9, सूक्त:110}{अनुवाक:7, सूक्त:7}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| पर्यू॒षुप्रध᳚न्व॒वाज॑सातये॒परि॑वृ॒त्राणि॑स॒क्षणिः॑|द्वि॒षस्त॒रध्या᳚ऋण॒यान॑ईयसे|| 1||वर्ग:22 |
| अनु॒हित्वा᳚सु॒तंसो᳚म॒मदा᳚मसिम॒हेस॑मर्य॒राज्ये᳚|वाजाँ᳚,अ॒भिप॑वमान॒प्रगा᳚हसे|| 2|| |
| अजी᳚जनो॒हिप॑वमान॒सूर्यं᳚वि॒धारे॒शक्म॑ना॒पयः॑|गोजी᳚रया॒रंह॑माणः॒पुरं᳚ध्या|| 3|| |
| अजी᳚जनो,अमृत॒मर्त्ये॒ष्वाँऋ॒तस्य॒धर्म᳚न्न॒मृत॑स्य॒चारु॑णः| सदा᳚सरो॒वाज॒मच्छा॒सनि॑ष्यदत्|| 4|| |
| अ॒भ्य॑भि॒हिश्रव॑सात॒तर्दि॒थोत्सं॒नकंचि॑ज्जन॒पान॒मक्षि॑तम्| शर्या᳚भि॒र्नभर॑माणो॒गभ॑स्त्योः|| 5|| |
| आदीं॒केचि॒त्पश्य॑मानास॒आप्यं᳚वसु॒रुचो᳚दि॒व्या,अ॒भ्य॑नूषत| वारं॒नदे॒वःस॑वि॒ताव्यू᳚र्णुते|| 6|| |
| त्वेसो᳚मप्रथ॒मावृ॒क्तब᳚र्हिषोम॒हेवाजा᳚य॒श्रव॑से॒धियं᳚दधुः| सत्वंनो᳚वीरवी॒र्या᳚यचोदय|| 7||वर्ग:23 |
| दि॒वःपी॒यूषं᳚पू॒र्व्यंयदु॒क्थ्यं᳚म॒होगा॒हाद्दि॒वआनिर॑धुक्षत| इन्द्र॑म॒भिजाय॑मानं॒सम॑स्वरन्|| 8|| |
| अध॒यदि॒मेप॑वमान॒रोद॑सी,इ॒माच॒विश्वा॒भुव॑ना॒भिम॒ज्मना᳚| यू॒थेननि॒ष्ठावृ॑ष॒भोविति॑ष्ठसे|| 9|| |
| सोमः॑पुना॒नो,अ॒व्यये॒वारे॒शिशु॒र्नक्रीळ॒न्पव॑मानो,अक्षाः|स॒हस्र॑धारःश॒तवा᳚ज॒इन्दुः॑|| 10|| |
| ए॒षपु॑ना॒नोमधु॑माँऋ॒तावेन्द्रा॒येन्दुः॑पवतेस्वा॒दुरू॒र्मिः|वा॒ज॒सनि᳚र्वरिवो॒विद्व॑यो॒धाः|| 11|| |
| सप॑वस्व॒सह॑मानःपृत॒न्यून्त्सेध॒न्रक्षां॒स्यप॑दु॒र्गहा᳚णि|स्वा॒यु॒धःसा᳚स॒ह्वान्त्सो᳚म॒शत्रू॑न्|| 12|| |
| [111] अयारुचेति तृचस्य सूक्तस्य पारुच्छेपिरनानतः पवमान सोमोत्यष्टिः |{मंडल:9, सूक्त:111}{अनुवाक:7, सूक्त:8}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| अ॒यारु॒चाहरि᳚ण्यापुना॒नोविश्वा॒द्वेषां᳚सितरतिस्व॒युग्व॑भिः॒सूरो॒नस्व॒युग्व॑भिः| धारा᳚सु॒तस्य॑रोचतेपुना॒नो,अ॑रु॒षोहरिः॑| विश्वा॒यद्रू॒पाप॑रि॒यात्यृक्व॑भिःस॒प्तास्ये᳚भि॒रृक्व॑भिः|| 1||वर्ग:24 |
| त्वंत्यत्प॑णी॒नांवि॑दो॒वसु॒संमा॒तृभि᳚र्मर्जयसि॒स्वआदम॑ऋ॒तस्य॑धी॒तिभि॒र्दमे᳚| प॒रा॒वतो॒नसाम॒तद्यत्रा॒रण᳚न्तिधी॒तयः॑| त्रि॒धातु॑भि॒ररु॑षीभि॒र्वयो᳚दधे॒रोच॑मानो॒वयो᳚दधे|| 2|| |
| पूर्वा॒मनु॑प्र॒दिशं᳚याति॒चेकि॑त॒त्संर॒श्मिभि᳚र्यततेदर्श॒तोरथो॒दैव्यो᳚दर्श॒तोरथः॑| अग्म᳚न्नु॒क्थानि॒पौंस्येन्द्रं॒जैत्रा᳚यहर्षयन्| वज्र॑श्च॒यद्भव॑थो॒,अन॑पच्युतास॒मत्स्वन॑पच्युता|| 3|| |
| [112] नानानमिति चतुरृचस्य सूक्तस्यांगिरसः शिशुः पवमानसोमःपंक्तिः |{मंडल:9, सूक्त:112}{अनुवाक:7, सूक्त:9}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| ना॒ना॒नंवा,उ॑नो॒धियो॒विव्र॒तानि॒जना᳚नाम्| तक्षा᳚रि॒ष्टंरु॒तंभि॒षग्ब्र॒ह्मासु॒न्वन्त॑मिच्छ॒तीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 1||वर्ग:25 |
| जर॑तीभि॒रोष॑धीभिःप॒र्णेभिः॑शकु॒नाना᳚म्| का॒र्मा॒रो,अश्म॑भि॒र्द्युभि॒र्हिर᳚ण्यवन्तमिच्छ॒तीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 2|| |
| का॒रुर॒हंत॒तोभि॒षगु॑पलप्र॒क्षिणी᳚न॒ना| नाना᳚धियोवसू॒यवोऽनु॒गा,इ॑वतस्थि॒मेन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 3|| |
| अश्वो॒वोळ्हा᳚सु॒खंरथं᳚हस॒नामु॑पम॒न्त्रिणः॑| शेपो॒रोम᳚ण्वन्तौभे॒दौवारिन्म॒ण्डूक॑इच्छ॒तीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 4|| |
| [113] शर्यणावतीत्येकादशर्चस्य सूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमः पंक्तिः |{मंडल:9, सूक्त:113}{अनुवाक:7, सूक्त:10}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| श॒र्य॒णाव॑ति॒सोम॒मिन्द्रः॑पिबतुवृत्र॒हा| बलं॒दधा᳚नआ॒त्मनि॑करि॒ष्यन्वी॒र्यं᳚म॒हदिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 1||वर्ग:26 |
| आप॑वस्वदिशांपतआर्जी॒कात्सो᳚ममीढ्वः| ऋ॒त॒वा॒केन॑स॒त्येन॑श्र॒द्धया॒तप॑सासु॒तइन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 2|| |
| प॒र्जन्य॑वृद्धंमहि॒षंतंसूर्य॑स्यदुहि॒ताभ॑रत्| तंग᳚न्ध॒र्वाःप्रत्य॑गृभ्ण॒न्तंसोमे॒रस॒माद॑धु॒रिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 3|| |
| ऋ॒तंवद᳚न्नृतद्युम्नस॒त्यंवद᳚न्त्सत्यकर्मन्| श्र॒द्धांवद᳚न्त्सोमराजन्धा॒त्रासो᳚म॒परि॑ष्कृत॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 4|| |
| स॒त्यमु॑ग्रस्यबृह॒तःसंस्र॑वन्तिसंस्र॒वाः| संय᳚न्तिर॒सिनो॒रसाः᳚पुना॒नोब्रह्म॑णाहर॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 5|| |
| यत्र॑ब्र॒ह्माप॑वमानछन्द॒स्या॒३॑(आं॒)वाचं॒वद॑न्| ग्राव्णा॒सोमे᳚मही॒यते॒सोमे᳚नान॒न्दंज॒नय॒न्निन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 6||वर्ग:27 |
| यत्र॒ज्योति॒रज॑स्रं॒यस्मिँ᳚ल्लो॒केस्व᳚र्हि॒तम्| तस्मि॒न्मांधे᳚हिपवमाना॒मृते᳚लो॒के,अक्षि॑त॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 7|| |
| यत्र॒राजा᳚वैवस्व॒तोयत्रा᳚व॒रोध॑नंदि॒वः| यत्रा॒मूर्य॒ह्वती॒राप॒स्तत्र॒माम॒मृतं᳚कृ॒धीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 8|| |
| यत्रा᳚नुका॒मंचर॑णंत्रिना॒केत्रि॑दि॒वेदि॒वः| लो॒कायत्र॒ज्योति॑ष्मन्त॒स्तत्र॒माम॒मृतं᳚कृ॒धीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 9|| |
| यत्र॒कामा᳚निका॒माश्च॒यत्र॑ब्र॒ध्नस्य॑वि॒ष्टप᳚म्| स्व॒धाच॒यत्र॒तृप्ति॑श्च॒तत्र॒माम॒मृतं᳚कृ॒धीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 10|| |
| यत्रा᳚न॒न्दाश्च॒मोदा᳚श्च॒मुदः॑प्र॒मुद॒आस॑ते| काम॑स्य॒यत्रा॒प्ताःकामा॒स्तत्र॒माम॒मृतं᳚कृ॒धीन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 11|| |
| [114] यइंदोरिति चतुरृचस्य सूक्तस्य मारीचः कश्यपः पवमानसोमःपंक्तिः |{मंडल:9, सूक्त:114}{अनुवाक:7, सूक्त:11}{अष्टक:7, अध्याय:5} |
| यइन्दोः॒पव॑मान॒स्यानु॒धामा॒न्यक्र॑मीत्| तमा᳚हुःसुप्र॒जा,इति॒यस्ते᳚सो॒मावि॑ध॒न्मन॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 1||वर्ग:28 |
| ऋषे᳚मन्त्र॒कृतां॒स्तोमैः॒कश्य॑पोद्व॒र्धय॒न्गिरः॑| सोमं᳚नमस्य॒राजा᳚नं॒योज॒ज्ञेवी॒रुधां॒पति॒रिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 2|| |
| स॒प्तदिशो॒नाना᳚सूर्याःस॒प्तहोता᳚रऋ॒त्विजः॑| दे॒वा,आ᳚दि॒त्यायेस॒प्ततेभिः॑सोमा॒भिर॑क्षन॒इन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 3|| |
| यत्ते᳚राजञ्छृ॒तंह॒विस्तेन॑सोमा॒भिर॑क्षनः| अ॒रा॒ती॒वामान॑स्तारी॒न्मोच॑नः॒किंच॒नाम॑म॒दिन्द्रा᳚येन्दो॒परि॑स्रव|| 4|| |